
Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
Upa-parva: Vāraṇāvata-gamana (Pāṇḍava-pravāsa) Episode
Vaiśaṃpāyana reports that Duryodhana gradually consolidates key constituencies through material incentives and honorific gestures. Skilled ministers, acting under Dhṛtarāṣṭra’s direction, repeatedly describe Vāraṇāvata as exceptionally delightful and prosperous, emphasizing its festivals, beauty, and abundance. As these reports circulate, a plan forms for the Pāṇḍavas’ travel to Vāraṇāvata. Dhṛtarāṣṭra addresses the Pāṇḍavas, presenting the journey as an opportunity to enjoy the festivities with attendants, distribute gifts to Brahmins and singers, and return happily to Hāstinapura afterward. Yudhiṣṭhira understands Dhṛtarāṣṭra’s intent and acknowledges his own lack of supportive power, yet replies with formal acceptance. He then informs senior figures—Bhīṣma, Vidura, Droṇa, Bāhlika, Somadatta, Kṛpa, and Gāndhārī—stating that they will reside in Vāraṇāvata by the king’s command. The elders respond with auspicious blessings for safe passage and protection from misfortune. After performing customary rites and completing preparations, the Pāṇḍavas depart for Vāraṇāvata, explicitly linked to the pursuit of political security and eventual restoration of status.
Chapter Arc: गौतमगोत्रीय शरद्वान के वंश-प्रसंग से कथा धनुर्वेद और ब्राह्मतेज की पृष्ठभूमि रचती है—और उसी धरातल पर द्रोण–द्रुपद की मित्रता का स्मरण उभरता है। → पंचालराज द्रुपद, द्रोण के प्रेमपूर्ण मित्र-वचनों को सुनकर भी ऐश्वर्य-मद में भर उठता है; क्रोध से भौंहें टेढ़ी, नेत्र रक्त—वह मित्रता की समानता पर प्रश्न उठाता है: ‘जो श्रोत्रिय नहीं, वह श्रोत्रिय का मित्र कैसे? जो राजा नहीं, वह राजा का मित्र कैसे?’ इस अपमान से द्रोण का मन्यु भीतर-भीतर जलने लगता है। → द्रुपद का कटु निषेध—मित्रता को पद-प्रतिष्ठा की कसौटी पर तोलना—द्रोण के भीतर प्रतिशोध का संकल्प पक्का कर देता है; वह समझ लेता है कि अब न्याय/प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना केवल शक्ति-साधना और राजाश्रय से होगी। → द्रोण अपने जीवन को नए लक्ष्य पर मोड़ता है: पुत्र अश्वत्थामा (कृपी से) की प्राप्ति और भविष्य की सिद्धि के लिए वह राजकीय संरक्षण खोजने लगता है; द्रुपद के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर वह उसी ‘प्रिय सखा’ के पास जाने का निश्चय करता है, पर अब भाव मित्रता का नहीं—प्रतिज्ञा का है। → कुमारों से संवाद के बाद द्रोण उन्हें भीष्म के पास भेजने का संकेत देता है—अब प्रश्न यह है कि भीष्म द्रोण को किस रूप में स्वीकार करेंगे: आचार्य, शरणागत, या भविष्य के युद्ध-यंत्र के रूप में?
Verse 1
ऑपन--माज बक। चॉ-ज:ड: - गौतमगोत्रीय होनेके कारण शरद्वानूको भी गौतम कहा जाता था। - धर्नुर्वेदके चार भेद इस प्रकार हैं--मुक्त, अमुक्त, मुक्तामुक्त तथा मन्त्रमुक्त। छोड़े जानेवाले बाण आदिको "मुक्त! कहते हैं। जिन्हें हाथमें लेकर प्रहार किया जाय, उन खड़्ग आदिको “अमुक्त” कहते हैं। जिस अस्त्रको चलाने और समेटनेकी कला मालूम हो, वह अस्त्र 'मुक्तामुक्तर कहलाता है। जिसे मन्त्र पढ़कर चला तो दिया जाय किंतु उसके उपसंहारकी विधि मालूम न हो, वह अस्त्र 'मन्त्रमुक्त' कहा गया है, शस्त्र, अस्त्र, प्रत्यस्त्र और परमास्त्र--ये भी धरनुर्वेदके चार भेद हैं। इसी प्रकार आदान, संधान, विमोक्ष और संहार--इन चार क्रियाओंके भेदसे भी धनुर्वेदके चार भेद होते हैं। त्रिशर्दाधिकशततमो<्ध्याय: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी बीटा* और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना वैशम्पायन उवाच ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाज: प्रतापवान् | अनब्रवीत् पार्थिवं राजन् सखायं विद्धि मामिह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! प्रतापी द्रोण राजा ट्रपदके यहाँ जाकर उनसे इस प्रकार बोले--'राजन! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं तुम्हारा मित्र द्रोण यहाँ तुमसे मिलनेके लिये आया हूँ
وَیشَمپایَن نے کہا—تب بہادر بھاردواج (دروṇa) نے راجا دروپد کے پاس جا کر کہا: “اے راجن! یہاں مجھے اپنا دوست جانو؛ میں تم سے ملنے آیا ہوں۔”
Verse 2
इत्येवमुक्त: सख्या स प्रीतिपूर्व जनेश्वर: । भारद्वाजेन पाज्चालो नामृष्यत वचो<5स्य तत्,मित्र द्रोणके द्वारा इस प्रकार प्रेमपूर्वक कहे जानेपर पंचालदेशके नरेश ट्रपद उनकी इस बातको सह न सके
جب دوست دروṇa نے محبت سے یوں کہا تو پانچال کے راجا دروپد، بھاردواج کے بیٹے کے اُن الفاظ کو برداشت نہ کر سکا۔
Verse 3
सक्रोधामर्षजिद्दय भ्रू: कषघायीकृतलोचन: । ऐश्वर्यमदसम्पन्नो द्रोणं राजाब्रवीदिदम्,क्रोध और अमर्षसे उनकी भौंहें टेढ़ी हो गयीं, आँखोंमें लाली छा गयी; धन और ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त होकर वे राजा द्रोणसे यों बोले
غصّے اور زخمی غرور سے اس کی بھنویں تن گئیں اور آنکھیں سرخ ہو اٹھیں؛ دولت و سلطنت کے نشے میں چور ہو کر راجا نے دروṇa سے یوں کہا۔
Verse 4
हुपद उवाच अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मनू नातिसमञ्जसा । यन्मां ब्रवीषि प्रसभं॑ सखा ते5हमिति द्विज,द्रपदने कहा--ब्रह्मन! तुम्हारी बुद्धि सर्वथा संस्कारशून्य--अपरिपक्व है। तुम्हारी यह बुद्धि यथार्थ नहीं है। तभी तो तुम धृष्टतापूर्वक मुझसे कह रहे हो कि “राजन! मैं तुम्हारा सखा हूँ
دروپد نے کہا: “اے برہمن! تیری سمجھ کچی ہے اور مناسب آداب کے مطابق نہیں؛ اسی لیے تو تُو بےباکی سے مجھ سے کہتا ہے: ‘اے دِوِج! میں تیرا دوست ہوں۔’”
Verse 5
न हि रज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरै: क्वचित् । सख्यं भवति मन्दात्मन् श्रिया हीनैर्धनच्युतै:,ओ मूढ़! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता नहीं होती
اے کم عقل! بلند مرتبہ اور مقتدر بادشاہ کبھی بھی تم جیسے بے نصیب اور دولت سے گرے ہوئے لوگوں سے دوستی نہیں کرتے۔
Verse 6
सौह्दान्यपि जीर्यन्ते कालेन परिजीर्यत: । सौद्ददं मे त्वया हयासीत् पूर्व सामर्थ्यबन्धनम्,समयके अनुसार मनुष्य ज्यों-ज्यों बूढ़ा होता है, त्यों-ही-त्यों उसकी मैत्री भी क्षीण होती चली जाती है। पहले तुम्हारे साथ जो मेरी मित्रता थी, वह सामर्थ्यको लेकर थी--उस समय मैं और तुम दोनों समान शक्तिशाली थे
وقت کے ساتھ جیسے جیسے آدمی بوڑھا اور کمزور ہوتا جاتا ہے، ویسے ہی دوستی کے بندھن بھی گھس جاتے ہیں۔ پہلے تم سے میری دوستی دراصل قوت و صلاحیت کے رشتے سے بندھی تھی—اس وقت تم اور میں طاقت میں برابر تھے۔
Verse 7
न सख्यमजरं लोके हृदि तिष्ठति कस्यचित् । कालो होन॑ विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत,लोकमें किसी भी मनुष्यके हृदयमें मैत्री अमिट होकर नहीं रहती। समय एक मित्रको दूसरेसे विलग कर देता है अथवा क्रोध मनुष्यको मित्रतासे हटा देता है
اس دنیا میں کسی کے دل میں دوستی ابدی اور بے زوال ہو کر نہیں ٹھہرتی۔ کبھی زمانہ دوستوں کو جدا کر دیتا ہے، اور کبھی غصہ انسان کو دوستی سے کھینچ کر دور لے جاتا ہے۔
Verse 8
मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सख्यं भवत्वपाकृधि । आसीत् सख्य॑ द्विजश्रेष्ठ त्वया मे5र्थनिबन्धनम्,इस प्रकार क्षीण होनेवाली मैत्रीका भरोसा न करो। हम दोनों एक-दूसरेके मित्र थे-- इस भावको हृदयसे निकाल दो। द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि स्वार्थको लेकर हुई थी
یوں بوسیدہ ہو چکی دوستی کا سہارا نہ لو؛ ‘ہم دونوں دوست ہیں’—اس خیال کو دل سے نکال دو۔ اے برہمنوں میں افضل! پہلے تم سے میری دوستی غرض و منفعت کے بندھن سے تھی—اکٹھے کھیلنے، پڑھنے اور اسی طرح کے فائدوں کے لیے۔
Verse 9
न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान् विदुष: सखा । न शूरस्य सखा क्लीब: सखिपूर्व किमिष्यते,सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवानका, मूर्ख विद्वान्का और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो
سچ یہ ہے کہ مفلس آدمی دولت مند کا ساتھی نہیں بن سکتا، جاہل عالم کا ساتھی نہیں بن سکتا، اور بزدل بہادر کا ساتھی نہیں بن سکتا؛ پھر گزری ہوئی دوستی پر کیا بھروسا؟
Verse 10
ययोरेव सम॑ वित्तं ययोरेव सम॑ श्रुतम् । तयोरविवाह: सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयो:,जिनका धन समान है, जिनकी विद्या एक-सी है, उन्हींमें विवाह और मैत्रीका सम्बन्ध हो सकता है। हृष्ट-पुष्ट और दुर्बलमें (धनवान् और निर्धनमें) कभी मित्रता नहीं हो सकती
جن کی دولت برابر ہو اور جن کا علم بھی برابر ہو، انہی کے درمیان نکاح اور دوستی کا رشتہ درست طور پر قائم ہوتا ہے۔ خوش حال اور نادار—توانا اور کمزور—کے بیچ سچی رفاقت قائم نہیں رہتی۔
Verse 11
नाश्रोत्रिय: श्रोत्रियस्थ नारथी रथिन: सखा । नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिष्यते,जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय (वेदवेत्ता)-का मित्र नहीं हो सकता। जो रथी नहीं है, वह रथीका सखा नहीं हो सकता। इसी प्रकार जो राजा नहीं है, वह किसी राजाका मित्र कदापि नहीं हो सकता। फिर तुम पुरानी मित्रताका क्यों स्मरण करते हो?
جو شروتریہ نہیں، وہ شروتریہ کا دوست نہیں ہو سکتا؛ جو رتھی نہیں، وہ رتھی کا رفیق نہیں ہو سکتا؛ اسی طرح جو بادشاہ نہیں، وہ کسی بادشاہ کا سچا دوست نہیں ہو سکتا۔ پھر تم پرانی دوستی کو کیوں یاد دلاتے ہو؟
Verse 12
वैशग्पायन उवाच द्रुपदेनैवमुक्तस्तु भारद्वाज: प्रतापवान् | मुहूर्त चिन्तयित्वा तु मन्युनाभिपरिष्लुत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा द्रुपदके यों कहनेपर प्रतापी द्रोण क्रोधसे जल उठे और दो घड़ीतक गहरी चिन्तामें डूबे रहे। वे बुद्धिमान् तो थे ही, पांचालनरेशसे बदला लेनेके विषयमें मन-ही-मन कुछ निश्चय करके कौरवोंकी राजधानी हस्तिनापुर नगरमें चले गये
وَیشَمپایَن نے کہا—اے جنمیجَے! دروپد کے یوں کہنے پر بہادر بھاردواج پُتر درونہ غصّے سے بھر گیا۔ کچھ دیر سوچ میں ڈوبا رہا اور اس کا دل رنج و کینہ سے لبریز ہو اٹھا۔
Verse 13
स विनिश्ित्य मनसा पाज्चालं प्रति बुद्धिमान् जगाम कुरुमुख्यानां नगरं नागसाह्वयम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा द्रुपदके यों कहनेपर प्रतापी द्रोण क्रोधसे जल उठे और दो घड़ीतक गहरी चिन्तामें डूबे रहे। वे बुद्धिमान् तो थे ही, पांचालनरेशसे बदला लेनेके विषयमें मन-ही-मन कुछ निश्चय करके कौरवोंकी राजधानी हस्तिनापुर नगरमें चले गये
وَیشَمپایَن نے کہا—وہ دانا درونہ پَانچال کے راجا کے خلاف دل میں پختہ ارادہ باندھ کر کُروؤں کے سرداروں کے شہر، ناگساہویہ—ہستناپور—کی طرف روانہ ہوا۔
Verse 14
स नागपुरमागम्य गौतमस्य निवेशने । भारद्वाजो5वसत् तत्र प्रच्छन्नं द्विजसत्तम:,हस्तिनापुरमें पहुँचकर द्विजश्रेष्ठ द्रोण गौतमगोत्रीय कृपाचार्यके घरमें गुप्तरूपसे निवास करने लगे
وَیشَمپایَن نے کہا—ناگپور (ہستناپور) پہنچ کر، دو بار جنم لینے والوں میں افضل، بھاردواج پُتر درونہ، گوتَم کے نسل سے کِرِپ کے گھر میں پوشیدہ طور پر ٹھہرا۔
Verse 15
ततो<स्य तनुज: पार्थान् कृपस्यानन्तरं प्रभु: । अस्त्राणि शिक्षयामास नाबुध्यन्त च तं जना:,वहाँ उनके पुत्र शक्तिशाली अभश्व॒त्थामा कृपाचार्यके बाद पाण्डवोंको स्वयं ही अस्त्रविद्याकी शिक्षा देने लगे; किंतु लोग उन्हें पहचान न सके
پھر اُس کا بیٹا—قوی و زورآور اشوتھاما—کرِپا کے بعد خود ہی پارتھوں کو اسلحہ و فنِ حرب کی تعلیم دینے لگا؛ مگر لوگ اسے اس کی حقیقت کے ساتھ پہچان نہ سکے۔
Verse 16
एवं स तत्र गूढात्मा कंचित् कालमुवास ह । कुमारास्त्वथ निष्क्रम्प समेता गजसाह्दयात्,इस प्रकार द्रोणने वहाँ अपने आपको छिपाये रखकर कुछ कालतक निवास किया। तदनन्तर एक दिन कौरव-पाण्डव सभी वीर कुमार हस्तिनापुरसे बाहर निकलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ मिलकर वहाँ गुल्ली-डंडा खेलने लगे। उस समय खेलमें लगे हुए उन कुमारोंकी वह बीटा कुएँमें गिर पड़ी
یوں وہ وہاں باطن میں پوشیدہ رہ کر کچھ عرصہ مقیم رہا۔ پھر ایک دن گجساہویہ (ہستناپور) سے نکل کر کورو اور پانڈو کے سب شہزادے خوشی سے اکٹھے ہوئے۔
Verse 17
क्रीडन्तो वीटया तत्र वीरा: पर्यचरन् मुदा । पपात कूपे सा वीटा तेषां वै क्रीडतां तदा,इस प्रकार द्रोणने वहाँ अपने आपको छिपाये रखकर कुछ कालतक निवास किया। तदनन्तर एक दिन कौरव-पाण्डव सभी वीर कुमार हस्तिनापुरसे बाहर निकलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ मिलकर वहाँ गुल्ली-डंडा खेलने लगे। उस समय खेलमें लगे हुए उन कुमारोंकी वह बीटा कुएँमें गिर पड़ी
وہ بہادر شہزادے وہاں ویٹا (کھیل کی لکڑی/ڈنڈا) سے خوشی خوشی کھیل رہے تھے۔ کھیل ہی کھیل میں وہی ویٹا کنویں میں جا گری۔
Verse 18
ततस्ते यत्नमातिष्ठन् वीटामुद्धर्तुमादृता: । नच ते प्रत्यपद्यन्त कर्म वीटोपलब्धये,तब वे उस बीटाको निकालनेके लिये बड़ी तत्परताके साथ प्रयत्नमें लग गये; परंतु उसे प्राप्त करनेका कोई भी उपाय उनके ध्यानमें नहीं आया
تب وہ پوری دلجمعی سے ویٹا نکالنے کی کوشش کرنے لگے؛ مگر اسے حاصل کرنے کا کوئی طریقہ ان کے ذہن میں نہ آیا۔
Verse 19
ततोडन्योन्यमवैक्षन्त व्रीडयावनतानना: । तस्या योगमविन्दन्तो भृशं चोत्कण्ठिताभवन्,इस कारण लज्जासे नतमस्तक होकर वे एक-दूसरेकी ओर देखने लगे। गुल्ली निकालनेका कोई उपाय न मिलनेके कारण वे अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये
پھر شرم سے سر جھکائے وہ ایک دوسرے کی طرف دیکھنے لگے۔ اس کا کوئی تدبیر نہ پا کر وہ نہایت بے قرار و مضطرب ہو گئے۔
Verse 20
ते5पश्यन् ब्राह्मणं श्याममापन्नं पलितं कृशम् । कृत्यवन्तमदूरस्थमग्निहोत्रपुरस्कृतम्,इसी समय उन्होंने एक श्याम वर्णके ब्राह्मणको थोड़ी ही दूरपर बैठे देखा, जो अग्निहोत्र करके किसी प्रयोजनसे वहाँ रुके हुए थे। वे आपत्तिग्रस्त जान पड़ते थे। उनके सिरके बाल सफेद हो गये थे और शरीर अत्यन्त दुर्बल था
اسی وقت انہوں نے زیادہ دور نہیں ایک سیاہ رنگ برہمن کو وہاں بیٹھا دیکھا—جس نے ابھی اگنی ہوترا کیا تھا اور کسی مقصد سے وہیں ٹھہرا ہوا تھا۔ وہ مصیبت زدہ معلوم ہوتا تھا؛ اس کے بال سفید ہو چکے تھے اور جسم نہایت لاغر تھا۔
Verse 21
उन महात्मा ब्राह्मगको देखकर वे सभी कुमार उनके पास गये और उन्हें घेरकर खड़े हो गये। उनका उत्साह भंग हो गया था। कोई काम करनेकी इच्छा नहीं होती थी। मनमें भारी निराशा भर गयी थी
اس عظیم النفس برہمن کو دیکھ کر وہ سب کمار اس کے پاس گئے اور اسے گھیر کر کھڑے ہو گئے۔ ان کا حوصلہ ٹوٹ چکا تھا؛ کسی کام کی خواہش نہ رہی۔ دلوں میں بھاری ناامیدی بھر گئی تھی۔
Verse 22
अथ द्रोण: कुमारांस्तान् दृष्टवा कृत्यवतस्तदा । प्रहस्य मन्दं पैशल्यादभ्यभाषत वीर्यवान्,तदनन्तर पराक्रमी द्रोण यह देखकर कि इन कुमारोंका अभीष्ट कार्य पूर्ण नहीं हुआ है “-ये उसी प्रयोजनसे मेरे पास आये हैं, उस समय मन्द मुसकराहटके साथ बड़े कौशलसे बोले--
پھر پرَاکرمی درون نے یہ دیکھ کر کہ ان کماروں کا مطلوبہ کام ابھی پورا نہیں ہوا اور وہ اسی غرض سے اس کے پاس آئے ہیں، ہلکی سی مسکراہٹ کے ساتھ بڑی مہارت سے کہا—
Verse 23
अहो वो धिग् बल क्षात्रं धिगेतां व: कृतास्त्राताम् । भरतस्यान्वये जाता ये वीटां नाधिगच्छत,“अहो! तुमलोगोंके क्षत्रिययलको धिक्कार है और तुमलोगोंकी इस अस्त्र-विद्या- विषयक निपुणताको भी धिक्कार है; क्योंकि तुमलोग भरतवंशमें जन्म लेकर भी कुएँमें गिरी हुई गुल्लीको नहीं निकाल पाते
“ہائے! تمہارے کشتریہ بل پر لعنت، اور ہتھیاروں کی مہارت پر بھی لعنت؛ کہ تم بھرت کے ونش میں جنم لے کر بھی کنویں میں گری ہوئی ایک چھوٹی سی گولی تک نہیں نکال سکتے۔”
Verse 24
वीटां च मुद्रिकां चैव हाहमेतदपि द्वयम् । उद्धरेयमिषीकाभिशर्भोजन मे प्रदीयताम्,“देखो, मैं तुम्हारी गुल्ली और अपनी इस आअँगूठी दोनोंको सींकोंसे निकाल सकता हूँ। तुमलोग मेरी जीविकाकी व्यवस्था करो”
“دیکھو! میں تمہاری گولی اور اپنی یہ انگوٹھی—یہ دونوں بھی محض باریک سرکنڈوں سے نکال دوں گا۔ تم لوگ میرے گزر بسر کا بندوبست کرو۔”
Verse 25
एवमुक््त्वा कुमारांस्तान् द्रोण: स्वाडुलिवेष्टनम् । कूपे निरुदके तस्मिन्नपातयदरिंदम:,उन कुमारोंसे यों कहकर शत्रुओंका दमन करनेवाले द्रोणने उस निर्जल कुएँमें अपनी अँगूठी डाल दी
یوں اُن شہزادوں سے کہہ کر، دشمنوں کو دبانے والے درون نے اُس بے آب کنویں میں اپنی انگوٹھی پھینک دی۔
Verse 26
युधिछिर उवाच कृपस्यानुमते ब्रह्मन् भिक्षामाप्तुहि शाश्वतीम्
یُدھشٹھِر نے کہا—“اے برہمن! کِرپا کی اجازت سے میں یہاں بھیک حاصل کرنا چاہتا ہوں، تاکہ یہ دائمی گزر بسر کا ذریعہ بنے۔”
Verse 27
द्रोण उवाच एषा मुष्टिरिषीकाणां मयास्त्रेणाभिमन्त्रिता,द्रोण बोले--ये मुदट्ठीभर सींकें हैं, जिन्हें मैंने अस्त्र-मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित किया है
درون نے کہا—“یہ سرکنڈوں کی ایک مٹھی ہے، جسے میں نے استر-منتر سے ابھِمنترت کیا ہے۔”
Verse 28
अस्या वीर्य निरीक्षध्वं यदन्यस्य न विद्यते । भेत्स्यामीषीकया वीटां तामिषीकां तथान्यया,तुमलोग इसका बल देखो, जो दूसरेमें नहीं है। मैं पहले एक सींकसे उस गुल्लीको बींध दूँगा; फिर दूसरी सींकसे उस पहली सींकको बींधूँगा
درون نے کہا—“اس کی قوت دیکھو، جو کسی اور میں نہیں۔ ایک سرکنڈے سے میں نشانے کو چھید دوں گا؛ پھر دوسرے سرکنڈے سے اسی پہلے سرکنڈے کو بھی چھید دوں گا۔”
Verse 29
वैशम्पायन उवाच ततो यथोक्तं द्रोणेन तत् सर्व कृतमज्जसा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर द्रोणने जैसा कहा था, वह सब कुछ अनायास ही कर दिखाया
وَیشَمپایَن نے کہا—“پھر درون نے جیسا کہا تھا، وہ سب کچھ بے تکلفی سے انجام پا گیا۔”
Verse 30
तददवेक्ष्य कुमारास्ते विस्मयोत्फुल्ललोचना: । आश्चर्यमिदमत्यन्तमिति मत्वा वचो<ब्रुवन्,यह अद्भुत कार्य देखकर उन कुमारोंके नेत्र आश्वर्यसे खिल उठे। इसे अत्यन्त आश्चर्य मानकर वे इस प्रकार बोले
اس غیر معمولی کارنامے کو دیکھ کر اُن شہزادوں کی آنکھیں حیرت سے پھیل گئیں۔ اسے نہایت عجیب و غریب سمجھ کر وہ تعجب سے مغلوب ہو کر بول اٹھے۔
Verse 31
कुमारा ऊचु. मुद्रिकामपि विप्रर्षे शीघ्रमेतां समुद्धर । कुमारोंने कहा--ब्रह्मर्ष! अब आप शीघ्र ही इस अँगूठीको भी निकाल दीजिये ।। ३० १ कल वैशम्पायन उवाच ततः शरं समादाय भरनुद्रोणो महायशा:,वैशम्पायनजी कहते हैं--तब महायशस्वी द्रोणने धनुष-बाण लेकर बाणसे उस अँगूठीको बींध दिया और उसे ऊपर निकाल लिया। शक्तिशाली द्रोणने इस प्रकार कुएँसे बाणसहित अँगूठी निकालकर उन आश्वर्यचकित कुमारोंके हाथमें दे दी; किंतु वे स्वयं तनिक भी विस्मित नहीं हुए। उस अँगूठीको कुएँसे निकाली हुई देखकर उन कुमारोंने द्रोणसे कहा
لڑکوں نے کہا—“اے برہمرشی! اس انگوٹھی کو بھی جلدی نکال دیجیے۔”
Verse 32
शरेण विद्ृध्वा मुद्रां तामूर्ध्वमावाहयत् प्रभु: । सशरं समुपादाय कूपादड्जुलिवेष्टनम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--तब महायशस्वी द्रोणने धनुष-बाण लेकर बाणसे उस अँगूठीको बींध दिया और उसे ऊपर निकाल लिया। शक्तिशाली द्रोणने इस प्रकार कुएँसे बाणसहित अँगूठी निकालकर उन आश्वर्यचकित कुमारोंके हाथमें दे दी; किंतु वे स्वयं तनिक भी विस्मित नहीं हुए। उस अँगूठीको कुएँसे निकाली हुई देखकर उन कुमारोंने द्रोणसे कहा
وَیشَمپایَن نے کہا—تب زورآور اور نامور درون نے کمان و تیر اٹھایا، تیر سے اس انگوٹھی کو چھیدا اور کنویں سے اوپر کھینچ لیا۔ یوں تیر سمیت انگوٹھی نکال کر اس نے حیرت زدہ شہزادوں کے ہاتھ میں رکھ دی؛ مگر وہ خود ذرا بھی متعجب نہ ہوا۔
Verse 33
ददौ तत: कुमाराणां विस्मितानामविस्मित: । मुद्रिकामुद्धूतां दृष्टवा तमाहुस्ते कुमारका:,वैशम्पायनजी कहते हैं--तब महायशस्वी द्रोणने धनुष-बाण लेकर बाणसे उस अँगूठीको बींध दिया और उसे ऊपर निकाल लिया। शक्तिशाली द्रोणने इस प्रकार कुएँसे बाणसहित अँगूठी निकालकर उन आश्वर्यचकित कुमारोंके हाथमें दे दी; किंतु वे स्वयं तनिक भी विस्मित नहीं हुए। उस अँगूठीको कुएँसे निकाली हुई देखकर उन कुमारोंने द्रोणसे कहा
وَیشَمپایَن نے کہا—شہزادے حیرت میں کھڑے تھے، مگر درون بےتعجب رہا اور اس نے انگوٹھی انہیں دے دی۔ کنویں سے نکالی ہوئی اس مُدرِکہ کو دیکھ کر اُن لڑکوں نے اسے پھر مخاطب کیا۔
Verse 34
कुमारा ऊचु: अभिवादयामहे ब्रह्मन् नैतदन्येषु विद्यते । को5सि कस्यासि जानीमो वयं कि करवामहे,कुमार बोले--ब्रह्मन! हम आपको प्रणाम करते हैं। यह अस्त्र-कौशल दूसरे किसीमें नहीं है। आप कौन हैं, किसके पुत्र हैं--यह हम जानना हैं। बताइये, हमलोग आपकी कया सेवा करें?
لڑکوں نے کہا—“اے برہمن! ہم آپ کو پرنام کرتے ہیں۔ ایسا ہتھیاروں کا کمال کسی اور میں نہیں۔ آپ کون ہیں، کس کے فرزند ہیں—ہم جاننا چاہتے ہیں۔ بتائیے، ہم آپ کی کیا خدمت کریں؟”
Verse 35
द्रोण उदाच आचक्षध्वं च भीष्माय रूपेण च गुणैश्व माम्
درون نے کہا—“بھیشم سے میرا حال بھی بیان کرنا—میرے ظاہر ی روپ سے بھی اور میری خوبیوں سے بھی۔”
Verse 36
वैशम्पायन उवाच तथेत्युक्त्वा च गत्वा च भीष्ममूचु: कुमारका:,वैशम्पायनजी कहते हैं--“बहुत अच्छा” कहकर वे कुमार भीष्मजीके पास गये और ब्राह्यणकी सच्ची बातों तथा उनके उस अद्भुत पराक्रमको भी उन्होंने भीष्मजीसे कह सुनाया। कुमारोंकी बातें सुनकर भीष्मजी समझ गये कि वे आचार्य द्रोण हैं
وَیشَمپایَن نے کہا—“یوں ہی ہو” کہہ کر وہ کم سن شہزادے بھیشم کے پاس گئے اور اس برہمن کے سچے کلمات اور اس کے دکھائے ہوئے حیرت انگیز پرَاکرم کا حال بھیشم کو سنایا۔ ان کی باتیں سن کر بھیشم سمجھ گئے کہ وہ برہمن آچاریہ درون ہی ہیں۔
Verse 37
ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तच्च कर्म तथाविधम् | भीष्म: श्रुत्वा कुमाराणां द्रोणं तं प्रत्यजानत,वैशम्पायनजी कहते हैं--“बहुत अच्छा” कहकर वे कुमार भीष्मजीके पास गये और ब्राह्यणकी सच्ची बातों तथा उनके उस अद्भुत पराक्रमको भी उन्होंने भीष्मजीसे कह सुनाया। कुमारोंकी बातें सुनकर भीष्मजी समझ गये कि वे आचार्य द्रोण हैं
اس برہمن کے کلمات سچے تھے اور اس کا کارنامہ بھی ویسا ہی غیر معمولی تھا۔ کماروں کی بات سن کر بھیشم نے اس مرد کو درون کے طور پر پہچان لیا۔
Verse 38
युक्तरूप: स हि गुरुरित्येवमनुचिन्त्य च | अथैनमानीय तदा स्वयमेव सुसत्कृतम्,फिर यह सोचकर कि द्रोणाचार्य ही इन कुमारोंके उपयुक्त गुरु हो सकते हैं, भीष्मजी स्वयं ही आकर उन्हें सत्कारपूर्वक घर ले गये। वहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मने बड़ी बुद्धिमत्ताके साथ द्रोणाचार्यसे उनके आगमनका कारण पूछा और द्रोणने वह सब कारण इस प्रकार निवेदन किया
یہ سوچ کر کہ یہی کماروں کے لیے موزوں ترین گرو ہیں، بھیشم خود انہیں لے آئے اور حسبِ دستور نہایت عزت و تکریم کے ساتھ ان کا استقبال کیا۔
Verse 39
परिपप्रच्छ निपुणं भीष्म: शस्त्रभृतां वर: | हेतुमागमने तच्च द्रोण: सर्व न्यवेदयत्,फिर यह सोचकर कि द्रोणाचार्य ही इन कुमारोंके उपयुक्त गुरु हो सकते हैं, भीष्मजी स्वयं ही आकर उन्हें सत्कारपूर्वक घर ले गये। वहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मने बड़ी बुद्धिमत्ताके साथ द्रोणाचार्यसे उनके आगमनका कारण पूछा और द्रोणने वह सब कारण इस प्रकार निवेदन किया
اسلحہ برداروں میں برتر بھیشم نے نہایت بصیرت سے درون سے ان کے آنے کا سبب پوچھا؛ تب درون نے سارا سبب تفصیل سے عرض کر دیا۔
Verse 40
द्रोण उदाच महर्षेरग्निवेशस्य सकाशमहमच्युत । अन्त्रार्थमगमं पूर्व धनुर्वेदजिघृक्षया,द्रोणाचार्यने कहा--अपनी प्रतिज्ञासे कभी च्युत न होनेवाले भीष्मजी! पहलेकी बात है, मैं अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा तथा धरनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये महर्षि अग्निवेशके समीप गया था
دروṇa نے کہا—اے اَچُیُت-پرَتِجْنَ بھیشم! قدیم زمانے میں میں دھنُروید کا علم اور اسلحہ و اسطر کی تعلیم حاصل کرنے کی خواہش سے مہارشی اگنیویش کے حضور گیا تھا۔
Verse 41
ब्रह्मचारी विनीतात्मा जटिलो बहुला: समा: । अवसं सुचिरं तत्र गुरुशुश्रूषणे रत:,वहाँ मैं विनीत हृदयसे ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए सिरपर जटा धारण किये बहुत वर्षोतक रहा। गुरुकी सेवामें निरन्तर संलग्न रहकर मैंने दीर्घकालतक उनके आश्रममें निवास किया
وہاں میں نہایت منکسرالمزاج برہماچاری بن کر، جٹا دھارے ہوئے، بہت برسوں تک رہا۔ گُرو کی خدمت میں مسلسل مشغول رہ کر میں طویل عرصہ اُن کے آشرم میں مقیم رہا۔
Verse 42
पाज्चालो राजपुत्रश्न यज्ञसेनो महाबल: । इष्वस्त्रहेतोर्न्यवसत् तस्मिन्नेव गुरौ प्रभु:,उन दिनों पंचालराजकुमार महाबली यज्ञसेन ट्रुपद भी, जो बड़े शक्तिशाली थे, धनुर्वेदकी शिक्षा पानेके लिये उन्हीं गुरुदेव अग्निवेशके समीप रहते थे
اُن دنوں پانچال کا راجکمار مہابلی یجنسین (دروپد) بھی اسی گُرو کے پاس رہتا تھا، تاکہ تیراندازی، اسطر و شستر کی ودیا اور دھنُروید کا علم حاصل کرے۔
Verse 43
स मे तत्र सखा चासीदुपकारी प्रियश्न मे । तेनाहं सह संगम्य वर्तयन् सुचिरं प्रभो,वे उस गुरुकुलमें मेरे बड़े ही उपकारी और प्रिय मित्र थे। प्रभो! उनके साथ मिल- जुलकर मैं बहुत दिनोंतक आश्रममें रहा
وہ وہاں میرا دوست تھا—میرے لیے مددگار اور عزیز بھی۔ اے پرَبھُو! اُس کے ساتھ قربت سے رہ کر میں بہت مدت تک اُس آشرم میں رہا۔
Verse 44
बाल्यात् प्रभृति कौरव्य सहाध्ययनमेव च । स मे सखा सदा तत्र प्रियवादी प्रियंकर:,बचपनसे ही हम दोनोंका अध्ययन साथ-साथ चलता था। द्रुपद वहाँ मेरे घनिष्ठ मित्र थे। वे सदा मुझसे प्रिय वचन बोलते और मेरा प्रिय कार्य करते थे
اے کوروَونشی! بچپن ہی سے ہماری تعلیم ساتھ ساتھ چلتی رہی۔ وہاں دروپد ہمیشہ میرا قریبی دوست تھا—محبت سے شیریں کلام کرتا اور میرے پسندیدہ کام انجام دیتا۔
Verse 45
अब्रवीदिति मां भीष्म वचन प्रीतिवर्धनम् अहं प्रियतमः पुत्र: पितुद्रोण महात्मन:,भीष्मजी! वे एक दिन मुझसे मेरी प्रसन्नताको बढ़ानेवाली यह बात बोले--'द्रोण! मैं अपने महात्मा पिताका अत्यन्त प्रिय पुत्र हूँ
وَیشَمپایَن نے کہا—“اے بھیشم! اُس نے ایک بار مجھ سے ایسے الفاظ کہے جن سے میری خوشی بڑھ گئی—‘درون! میں اپنے مہاتما باپ کا سب سے زیادہ محبوب بیٹا ہوں۔’”
Verse 46
अभिषेक्ष्यति मां राज्ये स पाड्चालो यदा तदा । त्वद्धोग्यं भविता तात सखे सत्येन ते शपे,“तात! जब पांचालनरेश मुझे राज्यपर अभिषिक्त करेंगे, उस समय मेरा राज्य तुम्हारे उपभोगमें आयेगा। सखे! मैं सत्यकी सौगंध खाकर कहता हूँ--मेरे भोग, वैभव और सुख सब तुम्हारे अधीन होंगे।' यों कहकर वे अस्त्रविद्यामें निपुण हो मुझसे सम्मानित होकर अपने देशको लौट गये
وَیشَمپایَن نے کہا—“اے تات! جب کبھی پانچال کا راجا مجھے راجیہ پر ابھیشیک کرے گا، تب میرا راج تمہارے بھوگ کے لیے ہوگا۔ اے دوست! میں سچ کی قسم کھا کر کہتا ہوں—میرے عیش، میری شان و شوکت اور میری خوشیاں سب تمہارے اختیار میں ہوں گی۔”
Verse 47
मम भोगाश्च वित्त च त्वदधीनं सुखानि च । एवमुक््त्वाथ वबच्राज कृतास्त्र: पूजितो मया,“तात! जब पांचालनरेश मुझे राज्यपर अभिषिक्त करेंगे, उस समय मेरा राज्य तुम्हारे उपभोगमें आयेगा। सखे! मैं सत्यकी सौगंध खाकर कहता हूँ--मेरे भोग, वैभव और सुख सब तुम्हारे अधीन होंगे।' यों कहकर वे अस्त्रविद्यामें निपुण हो मुझसे सम्मानित होकर अपने देशको लौट गये
وَیشَمپایَن نے کہا—“میرے بھوگ، میرا مال و دولت اور میری خوشیاں—سب تمہارے اختیار میں ہیں۔” یہ کہہ کر وہ راجکمار، اسلحہ و فنِ جنگ میں کامل ہو چکا تھا؛ میرے ہاتھوں معزز ہوا اور اپنے دیس لوٹ گیا۔
Verse 48
तच्च वाक्यमहं नित्यं मनसा धारयंस्तदा । सो<हं पितृनियोगेन पुत्रलोभाद् यशस्विनीम्,उनकी उस समय कही हुई इस बातको मैं अपने मनमें सदा याद रखता था। कुछ दिनोंके बाद पितरोंकी प्रेरणासे मैंने पुत्र-प्राप्तिके लोभसे परम बुद्धिमती, महान् व्रतका पालन करनेवाली, अन्निहोत्र, सत्र तथा शम-दमके पालनमें मेरे साथ सदा संलग्न रहनेवाली शरद्वानकी पुत्री यशस्विनी कृपीसे, जिसके केश बहुत बड़े नहीं थे, विवाह किया
وَیشَمپایَن نے کہا—“میں اُس کے کہے ہوئے اس قول کو ہمیشہ دل میں بسائے رکھتا تھا۔ پھر پِتروں کے حکم کی تعمیل میں اور بیٹے کی خواہش سے میں نے شَرَدْوَت کی بیٹی، نامور کِرپی سے نکاح کیا—جس کے بال بہت لمبے نہ تھے، جو نہایت دانا اور عظیم ورت کی پابند تھی؛ اور جو اگنی ہوترا، سَتر اور شَم و دَم کی ریاضت میں ہمیشہ میرے ساتھ مشغول رہتی تھی۔”
Verse 49
नातिकेशीं महाप्रज्ञामुपयेमे महाव्रताम् । अन्निहोत्रे च सत्रे च दमे च सततं रताम्,उनकी उस समय कही हुई इस बातको मैं अपने मनमें सदा याद रखता था। कुछ दिनोंके बाद पितरोंकी प्रेरणासे मैंने पुत्र-प्राप्तिके लोभसे परम बुद्धिमती, महान् व्रतका पालन करनेवाली, अन्निहोत्र, सत्र तथा शम-दमके पालनमें मेरे साथ सदा संलग्न रहनेवाली शरद्वानकी पुत्री यशस्विनी कृपीसे, जिसके केश बहुत बड़े नहीं थे, विवाह किया
وَیشَمپایَن نے کہا—“میں نے ناتیکیشی، نہایت دانا اور عظیم ورت کی پابند (کرپی) سے نکاح کیا؛ وہ اگنی ہوترا، سَتر اور دَم کی ریاضت میں ہمیشہ مشغول رہتی تھی۔”
Verse 50
अलभद् गौतमी पुत्रमश्चत्थामानमौरसम् । भीमविक्रमकर्माणमादित्यसमतेजसम्,उस गौतमी कृपीने मुझसे मेरे औरस पुत्र अश्वत्थामाको प्राप्त किया, जो सूर्यके समान तेजस्वी तथा भयंकर पराक्रम एवं पुरुषार्थ करनेवाला है
وَیشَمپایَن نے کہا—گَوتَمی (کِرپی) نے مجھ سے اپنا جائز (اورَس) بیٹا اشوتھاما پایا؛ وہ سورج کے مانند تاباں اور ہولناک شجاعت و کارناموں والا تھا۔
Verse 51
पुत्रेण तेन प्रीतो5हं भरद्वाजो मया यथा । गोक्षीरं पिबतो दृष्टवा धनिनस्तत्र पुत्रकान् अश्वत्थामारुदद् बालस्तन्मे संदेहयद् दिश:,उस पुत्रसे मुझे उतनी ही प्रसन्नता हुई, जितनी मुझसे मेरे पिता भरद्वाजको हुई थी। एक दिनकी बात है, गोधनके धनी ऋषिकुमार गायका दूध पी रहे थे। उन्हें देखकर मेरा छोटा बच्चा अश्वत्थामा भी बाल-स्वभावके कारण दूध पीनेके लिये मचल उठा और रोने लगा। इससे मेरी आँखोंके सामने अँधेरा छा गया--मुझे दिशाओंके पहचाननेमें भी संशय होने लगा
وَیشَمپایَن نے کہا—اس بیٹے کے سبب مجھے ویسی ہی خوشی ہوئی جیسی میرے باپ بھردواج کو کبھی مجھ سے ہوئی تھی۔ مگر ایک دن وہاں دولت مندوں کے بیٹوں کو گائے کا دودھ پیتے دیکھ کر میرا ننھا اشوتھاما بچپنے کی بے بسی میں دودھ کے لیے مچل اٹھا اور رونے لگا۔ یہ منظر دیکھ کر میرا دل گھبرا گیا؛ گویا آنکھوں کے آگے اندھیرا چھا گیا اور سمتوں کی پہچان بھی مشتبہ ہو گئی۔
Verse 52
न सनातको<5वसीदेत वर्तमान: स्वकर्मसु । इति संचिन्त्य मनसा तं॑ देशं बहुशो भ्रमन्,मैंने मन-ही-मन सोचा, यदि मैं किसी कम गायवाले ब्राह्मणसे गाय माँगता हूँ तो कहीं ऐसा न हो कि वह अपने अग्निहोत्र आदि कर्मोंमें लगा हुआ स्नातक गोदुग्धके बिना कष्टमें पड़ जाय; अतः जिसके पास बहुत-सी गौएँ हों, उसीसे धर्मानुकूल विशुद्ध दान लेनेकी इच्छा रखकर मैंने उस देशमें कई बार भ्रमण किया। गंगानन्दन! एक देशसे दूसरे देशमें घूमनेपर भी मुझे दूध देनेवाली कोई गाय न मिल सकी
وَیشَمپایَن نے کہا—میں نے دل میں سوچا: جو سْناتک اپنے مقررہ اعمال میں مشغول ہو، اسے تنگی میں نہیں ڈالنا چاہیے۔ یہ سوچ کر میں اس خطّے میں بار بار پھرتا رہا، اس ارادے سے کہ صرف اسی سے دھرم کے مطابق پاکیزہ دان قبول کروں جس کے پاس بہت سی گائیں ہوں؛ مبادا کم گائے رکھنے والے کسی برہمن سے گائے مانگوں تو وہ اگنی ہوترا وغیرہ کے فرائض میں دودھ کی کمی سے مبتلا ہو جائے۔
Verse 53
विशुद्धमिच्छन् गाड़ेय धर्मोपेतं प्रतिग्रहम् अन्तादन्तं परिक्रम्य नाध्यगच्छ॑ पयस्विनीम्,मैंने मन-ही-मन सोचा, यदि मैं किसी कम गायवाले ब्राह्मणसे गाय माँगता हूँ तो कहीं ऐसा न हो कि वह अपने अग्निहोत्र आदि कर्मोंमें लगा हुआ स्नातक गोदुग्धके बिना कष्टमें पड़ जाय; अतः जिसके पास बहुत-सी गौएँ हों, उसीसे धर्मानुकूल विशुद्ध दान लेनेकी इच्छा रखकर मैंने उस देशमें कई बार भ्रमण किया। गंगानन्दन! एक देशसे दूसरे देशमें घूमनेपर भी मुझे दूध देनेवाली कोई गाय न मिल सकी
وَیشَمپایَن نے کہا—اے گاڑےی! دھرم کے مطابق پاکیزہ دان قبول کرنے کی خواہش میں میں نے اس سرزمین کو سرے سے سرے تک چھان مارا، مگر کوئی دودھ دینے والی گائے نہ پا سکا۔
Verse 54
अथ पिष्टोदकेनैनं लोभयन्ति कुमारका: । पीत्वा पिष्टरसं बाल: क्षीरं॑ पीत॑ मयापि च,मैं लौटकर आया तो देखता हूँ कि छोटे-छोटे बालक आटेके पानीसे अभश्वत्थामाको ललचा रहे हैं और वह अज्ञानमोहित बालक उस आटेके जलको ही पीकर मारे हर्षके फ़ूला नहीं समाता तथा यह कहता हुआ उठकर नाच रहा है कि "मैंने दूध पी लिया'। कुरुनन्दन! बालकोंसे घिरे हुए अपने पुत्रको इस प्रकार नाचते और उसकी हँसी उड़ायी जाती देख मेरे मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उस समय कुछ लोग इस प्रकार कह रहे थे, 'इस धनहीन द्रोणको धिक््कार है, जो धनका उपार्जन नहीं करता
وَیشَمپایَن نے کہا—پھر لڑکوں نے اسے آٹے ملے پانی سے للچایا۔ وہ بچہ وہی آٹے کا رس پی کر خوشی سے پھول گیا اور ناچتے ہوئے بولا—“میں نے بھی دودھ پی لیا!”
Verse 55
ननर्तोत्थाय कौरव्य हृष्टो बाल्याद् विमोहित: । त॑ दृष्टवा नृत्यमानं तु बालै: परिवृतं सुतम्,मैं लौटकर आया तो देखता हूँ कि छोटे-छोटे बालक आटेके पानीसे अभश्वत्थामाको ललचा रहे हैं और वह अज्ञानमोहित बालक उस आटेके जलको ही पीकर मारे हर्षके फ़ूला नहीं समाता तथा यह कहता हुआ उठकर नाच रहा है कि "मैंने दूध पी लिया'। कुरुनन्दन! बालकोंसे घिरे हुए अपने पुत्रको इस प्रकार नाचते और उसकी हँसी उड़ायी जाती देख मेरे मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उस समय कुछ लोग इस प्रकार कह रहे थे, 'इस धनहीन द्रोणको धिक््कार है, जो धनका उपार्जन नहीं करता
وَیشَمپایَن نے کہا—اے کوروونش کے نامور! بچپن کے فریب میں مبتلا وہ خوشی سے اچھل کر اٹھا اور ناچنے لگا۔ لڑکوں میں گھرا ہوا وہ بیٹا ناچتا رہا اور ان کی ہنسی کا نشانہ بنا؛ اسے دیکھ کر میرا دل گہری اذیت سے بھر گیا۔
Verse 56
हास्यतामुपसम्प्राप्तं कश्मलं तत्र मे5भवत् । द्रोणं धिगस्त्वधनिनं यो धनं नाधिगच्छति,मैं लौटकर आया तो देखता हूँ कि छोटे-छोटे बालक आटेके पानीसे अभश्वत्थामाको ललचा रहे हैं और वह अज्ञानमोहित बालक उस आटेके जलको ही पीकर मारे हर्षके फ़ूला नहीं समाता तथा यह कहता हुआ उठकर नाच रहा है कि "मैंने दूध पी लिया'। कुरुनन्दन! बालकोंसे घिरे हुए अपने पुत्रको इस प्रकार नाचते और उसकी हँसी उड़ायी जाती देख मेरे मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उस समय कुछ लोग इस प्रकार कह रहे थे, 'इस धनहीन द्रोणको धिक््कार है, जो धनका उपार्जन नहीं करता
وَیشَمپایَن نے کہا—تب مجھ پر سخت کرب طاری ہوا، کیونکہ میں نے اپنے بیٹے کو تمسخر کا نشانہ بنتے دیکھا۔ وہاں کچھ لوگ کہہ رہے تھے: ‘اس مفلس درون پر لعنت، جو دولت حاصل نہیں کرتا!’
Verse 57
पिष्टोदक॑ सुतो यस्य पीत्वा क्षीरस्य तृष्णया । नृत्यति सम मुदाविष्ट: क्षीरं पीत॑ मयाप्युत
وَیشَمپایَن نے کہا—‘جس کا بیٹا گویا “پِشٹودک-سُت” ہو، وہ پیاس میں دودھ پینے کا گمان کرکے سرشار ہو کر ناچتا ہے اور کہتا ہے: “میں نے بھی دودھ پی لیا!”’
Verse 58
इति सम्भाषतां वाचं श्रुत्वा मे बुद्धिरच्यवत् । आत्मानं चात्मना गर्हन् मनसेदं व्यचिन्तयम्
وَیشَمپایَن نے کہا—ان کی باہمی گفتگو کے یہ الفاظ سن کر میری عقل ڈگمگا گئی۔ میں نے دل ہی دل میں اپنے آپ کو ملامت کرتے ہوئے یہ سوچا۔
Verse 59
अपि चाह ं पुरा विप्रैर्वर्जितो गर्हितो वसे । परोपसेवां पापिष्ठां न च कुर्या धनेप्सया
میں بھی ایک زمانے میں برہمنوں کے ہاتھوں ترک کیا گیا اور ملامت زدہ ہو کر رہا ہوں؛ مگر دولت کی خواہش میں میں کسی دوسرے کی ذلت آمیز خدمت—اس نہایت گناہگار غلامی—کو ہرگز اختیار نہیں کروں گا۔
Verse 60
“जिसका बेटा दूधकी लालसासे आटा मिला हुआ जल पीकर आनन्दमग्न हो यह कहता हुआ नाच रहा है कि “मैंने भी दूध पी लिया।” इस प्रकारकी बातें करनेवाले लोगोंकी आवाज मेरे कानोंमें पड़ी तो मेरी बुद्धि स्थिर न रह सकी। मैं स्वयं ही अपने-आपकी निन्दा करता हुआ मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगा--“मुझे दरिद्र जानकर पहलेसे ही ब्राह्मणोंने मेरा साथ छोड़ दिया। मैं धनाभावके कारण निन्दित होकर उपवास भले ही कर लूँगा, परंतु धनके लोभसे दूसरोंकी सेवा, जो अत्यन्त पापपूर्ण कर्म है, कदापि नहीं कर सकता” || ५७ “7५९ || इति मत्वा प्रियं पुत्र भीष्मादाय ततो हाहम् । पूर्वस्नेहानुरागित्वात्ू सदार: सौमकि गत:,भीष्मजी! ऐसा निश्चय करके मैं अपने प्रिय पुत्र और पत्नीको साथ लेकर पहलेके स्नेह और अनुरागके कारण राजा ट्रुपदके यहाँ गया
یوں عزمِ پختہ کر کے میں اپنے عزیز بیٹے بھیشم کو ساتھ لے کر، پرانے سنےہ اور لگاؤ کے باعث، بیوی سمیت سَومَک (دروپد کے دیس) کی طرف روانہ ہوا۔ فقر کی ملامت سہہ کر بھوکا رہ لینا مجھے گوارا تھا، مگر دولت کے لالچ میں دوسروں کی غلامانہ خدمت—جو عظیم گناہ ہے—میں ہرگز نہیں کر سکتا۔
Verse 61
अभिफषिक्तं तु श्र॒ुत्वैव कृतार्थो5स्मीति चिन्तयन् । प्रियं सखायं सुप्रीतो राज्यस्थं समुपागमम्,मैंने सुन रखा था कि ट्रुपदका राज्याभिषेक हो चुका है, अतः मैं मन-ही-मन अपनेको कृतार्थ मानने लगा और बड़ी प्रसन्नताके साथ राज्यसिंहासनपर बैठे हुए अपने प्रिय सखाके समीप गया
یہ سن کر کہ وہ بالفعل تخت نشین (مُقدّس رسمِ تاج پوشی کے ساتھ) ہو چکا ہے، میں دل ہی دل میں سوچنے لگا: “میں کِرتارتھ ہو گیا۔” پھر نہایت خوش ہو کر میں اپنے عزیز دوست کے پاس گیا جو اپنے شاہی منصب پر، تخت پر متمکن تھا۔
Verse 62
संस्मरन् संगमं चैव वचन चैव तस्य तत् | ततो द्रुपदमागम्य सखिपूर्वमहं प्रभो,उस समय मुझे द्रुपदकी मैत्री और उनकी कही हुई पूर्वोक्त बातोंका बारंबार स्मरण हो आता था। तदनन्तर अपने पहलेके सखा द्रुपदके पास पहुँचकर मैंने कहा--“नरश्रेष्ठ! मुझ अपने मित्रको पहचानो तो सही।' प्रभो! मैं ट्रपदके पास पहुँचनेपर उनसे मित्रकी ही भाँति मिला
اس وقت مجھے بار بار ہماری پہلی ملاقات اور اُس کے کہے ہوئے وہی الفاظ یاد آتے رہے۔ پھر میں اپنے سابقہ دوست دروپد کے پاس جا پہنچا۔
Verse 63
अब्रुवं पुरुषव्यात्र सखायं विद्धि मामिति । उपस्थितस्तु द्रुपदं सखिवच्चास्मि संगत:,उस समय मुझे द्रुपदकी मैत्री और उनकी कही हुई पूर्वोक्त बातोंका बारंबार स्मरण हो आता था। तदनन्तर अपने पहलेके सखा द्रुपदके पास पहुँचकर मैंने कहा--“नरश्रेष्ठ! मुझ अपने मित्रको पहचानो तो सही।' प्रभो! मैं ट्रपदके पास पहुँचनेपर उनसे मित्रकी ही भाँति मिला
میں نے کہا: “اے مردوں کے شیر! مجھے اپنا دوست سمجھ کر پہچانو۔” پھر دروپد کے حضور پہنچ کر میں اس سے دوست کی طرح ملا۔
Verse 64
स मां निराकारमिव प्रहसन्निदमब्रवीत् | अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मनू नातिसमञज्जसा,परंतु द्रपदने मुझे नीच मनुष्यके समान समझकर उपहास करते हुए इस प्रकार कहा --ब्राह्मण! तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त असंगत एवं अशुद्ध है
مگر اس نے مجھے حقیر جان کر تمسخر آمیز مسکراہٹ کے ساتھ کہا: “اے برہمن! تیری سمجھ بگڑی ہوئی ہے؛ یہ بالکل بھی موزوں اور معقول نہیں۔”
Verse 65
यदात्थ मां त्वं प्रसभं सखा ते5हमिति द्विज । संगतानीह जीर्यन्ति कालेन परिजीर्यत:,“तभी तो तुम मुझसे यह कहनेकी धृष्टता कर रहे हो कि “राजन! मैं तुम्हारा सखा हूँ!” समयके अनुसार मनुष्य ज्यों-ज्यों बूढ़ा होता है, त्यों-त्यों उसकी मैत्री भी क्षीण होती चली जाती है
اے دِوِج! تم جو بےباکی سے مجھ سے کہتے ہو—“اے راجن! میں تمہارا سکھا ہوں”—یہی تو بات ہے۔ اس دنیا میں رفاقت اور دوستی زمانے کے ساتھ بوسیدہ ہو جاتی ہے؛ آدمی جوں جوں بوڑھا ہوتا ہے، توں توں اس کی دوستی بھی کمزور پڑتی جاتی ہے۔
Verse 66
सौद्दं मे त्वया हयासीत् पूर्व सामर्थ्यबन्धनम् । नाक्रोत्रिय: श्रोत्रियस्थ नारथी रथिन: सखा,“पहले तुम्हारे साथ मेरी जो मित्रता थी, वह सामर्थ्यको लेकर थी--उस समय हम दोनोंकी शक्ति समान थी (किंतु अब वैसी बात नहीं है)। जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय (वेदवेत्ता)-का, जो रथी नहीं है, वह रथीका सखा नहीं हो सकता
پہلے تمہارے ساتھ میرا سَوہرد اسی بندھن پر قائم تھا جو برابری کی صلاحیت سے بنتا ہے—اس وقت ہماری قوت یکساں تھی؛ مگر اب وہ بات نہیں رہی۔ جو شروتریہ نہیں، وہ شروتریہ کا سکھا نہیں ہو سکتا؛ اور جو رتھی نہیں، وہ رتھن کا دوست نہیں ہو سکتا۔
Verse 67
साम्याद्धि सख्यं भवति वैषम्यात्रोपपद्यते | न सख्यमजरं लोके विद्यते जातु कस्यचित्,सब बातोंमें समानता होनेसे ही मित्रता होती है। विषमता होनेपर मैत्रीका होना असम्भव है। फिर लोकमें कभी किसीकी मैत्री अजर-अमर नहीं होती
دوستی تو برابری ہی سے پیدا ہوتی ہے؛ جہاں ناہمواری ہو وہاں وہ ٹھیک طرح جم نہیں سکتی۔ اور اس دنیا میں کسی کی دوستی کبھی بھی اَجر و اَمر (ہمیشہ قائم رہنے والی) نہیں پائی جاتی۔
Verse 68
कालो वैनं विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत । मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सत्यं भवत्वपाकृधि,“समय एक मित्रको दूसरेसे विलग कर देता है अथवा क्रोध मनुष्यको मित्रतासे हटा देता है। इस प्रकार क्षीण होनेवाली मैत्रीकी उपासना (भरोसा) न करो। हम दोनों एक- दूसरेके मित्र थे, इस भावको हृदयसे निकाल दो”
زمانہ اس رشتے کو ڈھیلا کر دیتا ہے، اور غصہ بھی اسے چھین لے جاتا ہے۔ اس لیے جو دوستی بوسیدہ ہو چکی ہو، اس کی پرستش—اس پر بھروسا—نہ کرو۔ اپنے دل سے یہ خیال نکال دو کہ “ہم دونوں دوست تھے”؛ یہی سچ ٹھہرے—اسے دور کر دو۔
Verse 69
आसीत् सख्य॑ द्विजश्रेष्ठ त्वया मे5र्थनिबन्धनम् । न हानाढ्य: सखाढ्यस्य नाविद्वान् विदुष: सखा,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्का, मूर्ख विद्वान्कां और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है
اے دِوِجِ برتر! تمہارے ساتھ میری جو دوستی تھی وہ غرض—مفاد—کے بندھن سے تھی۔ سچ یہ ہے کہ مفلس آدمی دولت مند کا سکھا نہیں ہو سکتا، اور بےعلم آدمی عالم کا دوست نہیں ہو سکتا۔
Verse 70
न शूरस्य सखा क्लीब: सखिपूर्व किमिष्यते । न हि राज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरै: क्वचित्,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्का, मूर्ख विद्वान्कां और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है
وَیشَمپایَن نے کہا— بزدل بہادر کا سچا دوست نہیں ہو سکتا؛ پھر پرانی دوستی کا سہارا لینے میں کیا قدر ہے؟ اے برہمنوں میں برتر، اقتدار میں بلند ہونے والے عظیم راجے ایسے لوگوں سے کہیں بھی رفاقت نہیں کرتے۔ جس رشتۂ دوستی کی تم یاد دلاتے ہو وہ پہلے محض مصلحت کی پرانی وابستگی تھی؛ آج اسے اخلاقی حق سمجھ کر تھاما نہیں جا سکتا۔ جو شروتریہ نہیں وہ شروتریہ کا، جو رتھی نہیں وہ رتھی کا، اور جو راجا نہیں وہ راجا کا دوست نہیں بن سکتا۔ پھر تم مجھے اس بوسیدہ دوستی کی یاد کیوں دلاتے ہو؟
Verse 71
सख्यं भवति मन्दात्मन् श्रियाहीनैर्धनच्युतै: । नाश्रोत्रिय: श्रोत्रियस्थ नारथी रथिन: सखा,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्का, मूर्ख विद्वान्कां और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है
وَیشَمپایَن نے کہا— اے کند ذہن، جن کے پاس شان و شوکت نہیں اور جو دولت سے گرے ہوئے ہیں، ان کے ساتھ سچی دوستی قائم نہیں رہتی۔ اے برہمنوں میں برتر، جو شروتریہ نہیں وہ شروتریہ کا، اور جو رتھی نہیں وہ رتھی کا دوست نہیں بن سکتا۔ اس لیے ناہموار مرتبے میں پرانی، بوسیدہ دوستی کو پھر سہارا نہ بنا—ایسی رفاقت کبھی پائدار نہیں ہوتی۔
Verse 72
नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिष्यते । अहं त्वया न जानामि राज्यार्थे संविदं कृताम्,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्का, मूर्ख विद्वान्कां और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है
وَیشَمپایَن نے کہا— بادشاہ کے لیے بھی کسی معمولی زمینی فرمانروا کے ساتھ پرانی دوستی کی کیا وقعت؟ اے برہمنوں میں برتر، میں نہیں جانتا کہ سلطنت کے لیے تمہارے ساتھ کوئی معاہدہ کیا گیا تھا۔ غریب امیر کا، نادان عالم کا، اور بزدل بہادر کا دوست نہیں ہو سکتا۔ پھر تم جیسے بےجلال اور بےسروسامان لوگوں سے بڑے بڑے راجے سچی دوستی کیسے کریں؟ جو شروتریہ نہیں وہ شروتریہ کا، جو رتھی نہیں وہ رتھی کا، اور جو راجا نہیں وہ راجا کا دوست نہیں بن سکتا۔ پھر تم مجھے اس پھٹی پرانی دوستی کی یاد کیوں دلاتے ہو؟ مجھے یاد نہیں کہ میں نے اپنی سلطنت کے بارے میں تم سے کوئی عہد کیا ہو۔
Verse 73
एकरात्र तु ते ब्रह्मन् काम॑ दास्यामि भोजनम् | एवमुक्तस्त्वहं तेन सदार: प्रस्थितस्तदा,“ब्रह्मन! तुम्हारी इच्छा हो तो मैं तुम्हें एक रातके लिये अच्छी तरह भोजन दे सकता ' राजा ट्रुपदके यों कहनेपर मैं पत्नी और पुत्रके साथ वहाँसे चल दिया
وَیشَمپایَن نے کہا— “اے برہمن، اگر تم چاہو تو میں تمہیں ایک رات کا کھانا دے دوں گا۔” جب راجا دروپد نے مجھ سے یوں کہا تو میں اسی وقت بیوی اور بیٹے کے ساتھ وہاں سے روانہ ہوا—میزبان و مہمان کے دھرم کے مطابق اس مہمان نوازی کو قبول کرتے ہوئے۔
Verse 74
तां प्रतिज्ञां प्रतिज्ञाय यां कर्तास्म्यचिरादिव । द्रुपदेनैवमुक्तो5हं मनन््युनाभिपरिप्लुत:,चलते समय मैंने एक प्रतिज्ञा की थी, जिसे शीघ्र पूर्ण करूँगा। ट्रुपदके द्वारा जो इस प्रकार तिरस्कारपूर्ण वचन मेरे प्रति कहा गया है, उसके कारण मैं क्षोभसे अत्यन्त व्याकुल हो रहा हूँ
روانہ ہوتے وقت میں نے وہ عہد کیا جسے میں جلد ہی پورا کروں گا۔ دروپد نے مجھ سے جس طرح تحقیر آمیز باتیں کیں، ان کے باعث میں غصّے سے لبریز ہوں؛ توہین کی چبھن مجھے بےقرار کیے دیتی ہے اور بدلے کا میرا ارادہ اور بھی پختہ ہو گیا ہے۔
Verse 75
अभ्यागच्छ॑ कुरून् भीष्म शिष्यैरर्थी गुणान्वितै: । ततो<हं भवतः काम॑ संवर्धयितुमागत:
اے بھیشم! نیک اوصاف اور تعلیم کے طالب لائق شاگردوں کے ساتھ کوروؤں کے پاس آؤ۔ اسی لیے میں تمہاری خواہش و مقصد کو پورا کرنے اور بڑھانے کے لیے آیا ہوں۔
Verse 76
हूँ वैशग्पायन उवाच एवमुक्तस्तदा भीष्मो भारद्वाजमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--द्रोणाचार्यके यों कहनेपर भीष्मने उनसे कहा
وَیشَمپایَن نے کہا—جب بھاردواج (درون) نے یوں کہا تو بھیشم نے تب جواب میں اسے مخاطب کیا۔
Verse 77
भीष्म उवाच अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय । भुड्क्ष्य भोगान् भृशं प्रीत: पूज्यमान: कुरुक्षये,भीष्मजी बोले--विप्रवर! अब आप अपने धनुषकी डोरी उतार दीजिये और यहाँ रहकर राजकुमारोंको धरनुर्वेद एवं अस्त्र-शस्त्रोंकी अच्छी शिक्षा दीजिये। कौरवोंके घरमें सदा सम्मानित रहकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ मनोवांछित भोगोंका उपभोग कीजिये
بھیشم نے کہا—اے برہمنِ برتر! کمان کی ڈوری کھول کر اسے ایک طرف رکھ دو۔ یہیں ٹھہرو اور راجکماروں کو دھنُروید اور عمدہ اَستر و شستر کا صحیح طریقے سے علم دو۔ کوروگھر میں ہمیشہ معزز رہ کر، بڑی مسرت کے ساتھ اپنی من چاہی نعمتوں سے بہرہ مند ہو۔
Verse 78
कुरूणामस्ति यद् वित्तं राज्यं चेद॑ सराष्ट्रकम् । त्वमेव परमो राजा सर्वे च कुरवस्तव,कौरवोंके पास जो धन, राज्य-वैभव तथा राष्ट्र है, उसके आप ही सबसे बड़े राजा हैं। समस्त कौरव आपके अधीन हैं
کوروؤں کے پاس جو دولت ہے اور جو سلطنت اپنے ملک و صوبوں سمیت ہے—اس سب کے تم ہی اعلیٰ ترین فرمانروا ہو؛ تمام کورو تمہارے تابع ہیں۔
Verse 79
यच्च ते प्रार्थितं ब्रह्मन् कृतं तदिति चिन्त्यताम् । दिष्ट्या प्राप्तोडसि विप्रर्षे महान् मेडनुग्रह: कृत:,ब्रह्म! आपने जो माँग की है, उसे पूर्ण हुई समझिये। ब्रह्मर्ष] आप आये, यह हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है। आपने यहाँ पधारकर मुझपर महान् अनुग्रह किया है
اے برہمن! جو کچھ تم نے مانگا ہے اسے پورا ہوا ہی سمجھو۔ اے وِپررِشی! تمہارا یہاں آنا ہمارے لیے بڑی سعادت ہے؛ یہاں تشریف لا کر تم نے مجھ پر عظیم احسان کیا ہے۔
Verse 129
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपव॑के अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र- विद्याकी प्राप्तिविषयक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
یوں مقدّس شری مہابھارت کے آدی پَرو کے ضمن میں سمبھَو پَرو کے اندر پرشورام جی سے درون کے استر-ودیا حاصل کرنے کے بیان پر مشتمل ایک سو انتیسواں ادھیائے اختتام کو پہنچا۔
Verse 130
इति श्रीमहा भारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मद्रोणसमागमे त्रिंशयधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपव॑के अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्य-द्रोण-समागमविषयक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
اسی شری مہابھارت کے آدی پَرو کے ضمن میں سمبھَو پَرو کے اندر بھیشم اور درون کی ملاقات کے بیان پر مشتمل ایک سو تیسواں ادھیائے اختتام کو پہنچا۔
Verse 231
ते तं दृष्टवा महात्मानमुपगम्य कुमारका: । भग्नोत्साहक्रियात्मानो ब्राह्मुणं पर्यवारयन्
اس عظیم النفس کو دیکھ کر وہ لڑکے اس کے پاس آئے؛ ان کا حوصلہ اور سعی ٹوٹ چکی تھی، اور وہ مضطرب ہو کر اس برہمن کے گرد حلقہ باندھ کر قریب ہی کھڑے ہو گئے۔
Verse 253
ततोअब्रवीत् तदा द्रोणं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । उस समय कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने द्रोणसे कहा
پھر اسی وقت کنتی کے پتر یُدھشٹھِر نے درون سے کہا۔
Verse 263
एवमुक्त: प्रत्युवाच प्रहस्य भरतानिदम् | युधिष्ठिर बोले--ब्रह्मन! आप कृपाचार्यकी अनुमति ले सदा यहीं रहकर भिक्षा प्राप्त करें। उनके यों कहनेपर द्रोणने हँसकर उन भरतवंशी राजकुमारोंसे कहा
یُدھشٹھِر کے یوں کہنے پر درون نے مسکرا کر اُن بھرت ونشی راجکماروں کو جواب دیا۔
Verse 283
तामन्यया समायोगे वीटाया ग्रहणं मम । इसी प्रकार दूसरीको तीसरीसे बींधते हुए अनेक सींकोंका संयोग होनेपर मुझे गुल्ली मिल जायगी
درون نے کہا—اگر ایک کو دوسرے کے ساتھ درست ترکیب سے جوڑا جائے تو وہ ‘ویٹا’ (گُلّی) میرے ہاتھ آ جائے گی۔
Verse 753
इदं नागपुर रम्यं ब्रूहि किं करवाणि ते । भीष्मजी! मैं गुणवान् शिष्योंके द्वारा अपने अभीष्टकी सिद्धि चाहता हुआ आपके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये पंचालदेशसे कुरुराज्यके भीतर इस रमणीय हस्तिनापुर नगरमें आया हूँ। बताइये, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?
یہ دلکش ناگپور (ہستناپور) ہے؛ فرمائیے، میں آپ کا کون سا کام کروں؟
Verse 3436
वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्ततो द्रोण: प्रत्युवाच कुमारकान् । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुमारोंके इस प्रकार पूछनेपर द्रोणने उनसे कहा
وَیشَمپاین نے کہا—اے جنمیجَے! یوں مخاطب کیے جانے پر درون نے اُن شہزادوں کو جواب دیا۔
Verse 3536
स एव सुमहातेजा: साम्प्रतं प्रतिपत्स्यते । द्रोण बोले--तुम सब लोग भीष्मजीके पास जाकर मेरे रूप और गुणोंका परिचय दो। वे महातेजस्वी भीष्मजी ही मुझे इस समय पहचान सकते हैं
درون نے کہا—تم سب بھیشم جی کے پاس جاؤ اور میری صورت و صفات کا تعارف کراؤ؛ اس وقت مجھے پہچاننے والے وہی عظیم الشان بھیشم ہیں۔
Yudhiṣṭhira faces the tension between obedience to the reigning authority and prudent self-protection; he recognizes strategic risk but chooses formal compliance due to limited institutional support.
The chapter illustrates dharma in governance as situational: ethical action may require restraint and procedural correctness even when motives around a directive appear ambiguous or politically charged.
No explicit phalaśruti is stated here; the passage functions as narrative causality, emphasizing how ritual propriety, public messaging, and courtly consent can advance consequential political outcomes.