Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
ननर्तोत्थाय कौरव्य हृष्टो बाल्याद् विमोहित: । त॑ दृष्टवा नृत्यमानं तु बालै: परिवृतं सुतम्,मैं लौटकर आया तो देखता हूँ कि छोटे-छोटे बालक आटेके पानीसे अभश्वत्थामाको ललचा रहे हैं और वह अज्ञानमोहित बालक उस आटेके जलको ही पीकर मारे हर्षके फ़ूला नहीं समाता तथा यह कहता हुआ उठकर नाच रहा है कि "मैंने दूध पी लिया'। कुरुनन्दन! बालकोंसे घिरे हुए अपने पुत्रको इस प्रकार नाचते और उसकी हँसी उड़ायी जाती देख मेरे मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उस समय कुछ लोग इस प्रकार कह रहे थे, 'इस धनहीन द्रोणको धिक््कार है, जो धनका उपार्जन नहीं करता
nanartotthāya kauravya hṛṣṭo bālyād vimohitaḥ | taṁ dṛṣṭvā nṛtyamānaṁ tu bālaiḥ parivṛtaṁ sutam |
وَیشَمپایَن نے کہا—اے کوروونش کے نامور! بچپن کے فریب میں مبتلا وہ خوشی سے اچھل کر اٹھا اور ناچنے لگا۔ لڑکوں میں گھرا ہوا وہ بیٹا ناچتا رہا اور ان کی ہنسی کا نشانہ بنا؛ اسے دیکھ کر میرا دل گہری اذیت سے بھر گیا۔
वैशम्पायन उवाच