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सोपान-प्रवेश: ‘श्रद्धा’ और ‘सत्संग’ के द्वारा रामकथा-मानस में अवगाहन। यह खंड साधक को बताता है कि कथा का अधिकार (adhikāra) कैसे बनता है—गुरु-कृपा, शुद्ध जिज्ञासा, और राम-प्रियता। यहाँ ‘मानस-सर’ रूपक से यह भी स्थिर होता है कि पाठ/श्रवण केवल साहित्य-रस नहीं, बल्कि कलिमल-शमन और विवेक-प्रबोधन की साधना है।
अयं अंशः बालकाण्डस्य आरम्भिके ‘भूमिका-सोपाने’ घनत्वं वहति। तुलसी गुरु-श्रवण-परम्परां प्रदर्शयन् कथा-प्रवाहं प्रामाणिक-संवाद-श्रृङ्खलायां विभजति (शिवात् आरभ्य भरद्वाजपर्यन्तम्)। भाव-रसे शान्त-अद्भुतयोः संयोगः—कथायाः अनन्तता (रामोऽनन्तः, अनन्ता गुणाः) तथा श्रोत्र-योग्यतायाः विवेकः। अत्र ‘मानस-सरः’ रूपकं केन्द्रीयम्: चौपाईः पुरइन्यः, दोहा-सोरठे कमलानि, अर्थः परागः, सत्सङ्गः वसन्त-ऋतुरिति निर्दिश्य पाठकाय दर्श्यते यत् अयं ग्रन्थः ‘सोपानः’—जलवत् मल-हारी, अग्निवत् कुतर्क-दाहकः, चन्द्रवत् शीतल-आनन्ददायकश्च। सिद्धान्ततः अयं खण्डः निर्गुण-सगुण-समन्वयस्य भूमिं करोति: शिव-प्रेरिता कथा, लक्ष्यं तु रघुनाथ-भक्तिः। अतः बालकाण्डस्यायं भागः साधकं ‘श्रवण-मार्गे’ स्थापयित्वा अग्रिम-लीला-वर्णनाय पात्रं करोति।
Verse 62 (दोहा/सोरठा)
मै पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत। समुझी नहि तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत।।30(क)।। श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़। किमि समुझौं मै जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़।।30(ख)।।
maiṁ puni nija gur sana sunī kathā so sūkara-kheta | samujhī nahi tasi bālapana taba ati raheũṁ acet ||30(k)|| śrotā bakatā gyāna-nidhi kathā rāma kai gūṛha | kimi samujhauṁ maiṁ jīva jaṛa kali mala grasita bimūṛha ||30(kh)||
पुनरपि स्वगुरोर्मुखात् तदेवाख्यानं मया श्रुतं सूकरक्षेत्रे तत्रैव। बाल्ये तु मम तद्ग्रहणं नाभवत्; तदा ह्यहं परमप्रबोधहीन एवावतस्थे॥ श्रोता वक्ता चोभौ ज्ञाननिधी; विषयश्च रामकथा गम्भीरा। कथं खलु मन्दबुद्धिरहं, कलिमलरजसा मोहितो गृहीतः, तां बोधयितुं शक्नुयाम्॥
Verse 63 (चौपाई)
तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा।। भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई।। जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें। तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें।। निज संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी।। बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि।। रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी।। रामकथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई।। सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि।। असुर सेन सम नरक निकंदिनि। साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि।। संत समाज पयोधि रमा सी। बिस्व भार भर अचल छमा सी।। जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी। जीवन मुकुति हेतु जनु कासी।। रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी। तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी।। सिवप्रय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख संपति रासी।। सदगुन सुरगन अंब अदिति सी। रघुबर भगति प्रेम परमिति सी।।
tadapi kahī gur bārahiṃ bāra | samujhi parī kachu mati anusārā || bhāṣā-baddha karabi maiṃ soī | moreṃ mana prabodha jehiṃ hoī || jasa kachu budhi bibeka bala mereṃ | tasa kahihauṃ hiyaṃ hari ke prerēṃ || nija saṃdeha moha bhrama haranī | karauṃ kathā bhava saritā taranī || budha bisrāma sakala jana raṃjanī | rāmakathā kali kaluṣa bibhaṃjanī || rāmakathā kali paṃnaga bharanī | puni bibeka pāvaka kahuṃ aranī || rāmakathā kali kāmada gāī | sujana sajīvanī mūri suhāī || soi basudhātala sudhā taraṃginī | bhaya bhaṃjanī bhrama bheka bhuaṃginī || asura sena sama naraka nikaṃdinī | sādhu bibudha kula hita girinaṃdinī || saṃta samāja payodhi ramā sī | bisva bhāra bhara acala chamā sī || jama gana muhaṃ masi jaga jamunā sī | jīvana mukuti hetu janu kāsī || rāmahi priya pāvani tulasī sī | tulasīdāsa hita hiyaṃ hulasī sī || sivapraya mekala saila sutā sī | sakala siddhi sukha saṃpati rāsī || sadaguna suragana aṃba aditi sī | raghubara bhagati prema paramiti sī ||
तथापि गुरोः आज्ञया बहुशः कथितवान्, स्वमत्यनुसारं किञ्चित् बुद्ध्वा। भाषाबद्धां करिष्यामि तामेव, यया मे मनः प्रबुद्धं भवेत्। यावत् मे बुद्धिविवेकबलं वर्तते, तावत् कथयिष्ये हरेर्नियोगेन हृदयात्। स्वसन्देहमोहभ्रमनाशिनीं, भवसरितां तारिणीं कथां करोमि। बुद्धानां विश्रामः सर्वजनरञ्जनी, रामकथा कलिकलुषविभञ्जिका। रामकथा कलिपन्नगहन्त्री, पुनर्विवेकाग्नेररणी च। रामकथा कलौ कामधेनु, सुजनसञ्जीवनी मणिर्मणिः। सा वसुधातले सुधातरङ्गिणी, भयभञ्जनी भ्रममण्डूकभुजङ्गिनी। असुरसेनेव नरकनिकन्दिनी, साधुविबुधकुलहितगिरिनन्दिनी। सन्तसमाजपयोधिर्लक्ष्मीवत्, विश्वभारभरणाचलक्षमावत्। यमगणमुखमसिका जगजमुनावत्, जीवनमुक्तिहेतुः काशीवत्। रामाय प्रिया पावनी तुलसीवत्, तुलसीदासहिताय हृदयहुलसीवत्। शिवप्रिया मेकलाचलसुता नर्मदावत्, सकलसिद्धिसुखसम्पत्तिराशिः। सद्गुणसुरगणाम्बाऽधितिवत्, रघुवरभक्तिप्रेमपरमितिवत्।
Verse 64 (दोहा/सोरठा)
राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु। तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु।।31।।
rāma kathā mandākinī citrakūṭa cita cāru | tulasī subhaga saneha bana siya raghubīra bihāru ||31||
रामकथा मन्दाकिनीव—चित्तं चित्रकूटमिव रमणीयं करोति। तुलसी वदति—धन्यं तद्वनं स्नेहमाधुर्यपूर्णं, यत्र सीता महाबलः रघुवीरश्च क्रीडतः॥
Verse 65 (दोहा/सोरठा)
कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड। दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड।।32(क)।। रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु। सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु।।32(ख)।।
kupatha kutaraka kucāli kali kapaṭa daṁbha pāṣaṇḍa | dahana rāma guna grāma jimi indhana anala pracaṇḍa ||32(ka)|| rāmacarita rākesa kara sarisa sukhada saba kāhu | sajjana kumuda cakora cita hita bisēṣi baṛa lāhu ||32(kha)||
कुपथो विपरीतविवादो दुष्टाचारश्च—कलियुगस्यैव कुटिलसन्ततिः, दम्भपाखण्डमायामयी— श्रीरामगुणसमूहैर्दग्धा भस्मसात् भवन्ति, यथा तीव्राग्निः समिधः पचति॥ रामस्य पुण्यकथा शशिनिभा—सर्वेषां हर्षदायिनी; सज्जनहृदयेषु तु—कुमुदचकोरवत्—विशेषतरं परमानन्दलाभं जनयति॥
Verse 66 (चौपाई)
कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी। जेहि बिधि संकर कहा बखानी।। सो सब हेतु कहब मैं गाई। कथाप्रबंध बिचित्र बनाई।। जेहि यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करैं सुनि सोई।। कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी।। रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं।। नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा।। कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए।। करिअ न संसय अस उर आनी। सुनिअ कथा सारद रति मानी।।
kīnhi prasna jehi bhā̃ti bhavānī | jehi bidhi saṅkara kahā bakhānī || so saba hetu kahaba maĩ gāī | kathāprabandha bicitra banāī || jehi yaha kathā sunī nahĩ hoī | jani ācaraju karaĩ suni soī || kathā alaukika sunahĩ je gyānī | nahĩ ācaraju karahĩ asa jānī || rāmakathā kai miti jaga nāhī̃ | asi pratīti tinh ke mana māhī̃ || nānā bhā̃ti rāma avatārā | rāmāyana sata koṭi apārā || kalpabheda haricarita suhāe | bhā̃ti aneka munīsanha gāe || kari'a na saṃsaya asa ura ānī | suni'a kathā sārad rati mānī ||
यथा भवान्या पृष्टं यथा च शङ्करेणोक्तं व्याख्यातं च, तत्सर्वं हेतुं गायामि कथाप्रबन्धं विचित्रं विधाय। यः पूर्वं न शश्रौ इमां कथां स श्रुत्वा आश्चर्यं मा करोतु। ये ज्ञानिनः अलौकिकीं कथां शृण्वन्ति न ते आश्चर्यं कुर्वन्ति एवं ज्ञात्वा। रामकथायाः परिमाणं जगति नास्ति एषा एव तेषां हृदये प्रतीतिः। नानाप्रकारैः रामावताराः सन्ति रामायणानि शतकोटिशः अपाराणि। कल्पभेदेषु हरिचरितानि सुशोभानि अनेकप्रकारैः मुनीन्द्रैः गीतानि। अतः हृदि धृत्वा संशयं मा कुरुष्व श्रृणु कथां शारदामिव प्रियां मत्वा।
Verse 67 (दोहा/सोरठा)
राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार। सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार।।33।।
rāma ananta ananta guna amita kathā bistāra | suni ācaraju na mānihahiṃ jinh keṃ bimala bicāra ||33||
रामोऽनन्तः, तस्य गुणा अनन्ताः, तस्य पुण्यकथाविस्तारोऽपि प्रमाणातीतः। तां श्रुत्वा येषां विवेकः निर्मलः, ते विस्मयं न यान्ति—यतो हि तेषां मनः प्रसन्नतायां प्रतिष्ठितम्॥
Verse 68 (चौपाई)
एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी।। पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी। करत कथा जेहिं लाग न खोरी।। सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा।। संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा।। नौमी भौम बार मधु मासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।। जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं।। असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिं रघुनायक सेवा।। जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना।।
ehi bidhi saba saṁsaya kari dūrī | sira dhari guru pada paṅkaja dhūrī || puni sabahī binavaüṁ kara jorī | karata kathā jehiṁ lāga na khorī || sādara sivahi nāi aba māthā | barnaüṁ bisada rāma guna gāthā || saṁbata soraha sai ekatīsā | karaüṁ kathā hari pada dhari sīsā || naumī bhauma bāra madhu māsā | avadhapurīṁ yaha carita prakāsā || jehi dina rāma janama śruti gāvahiṁ | tīratha sakala tahāṁ cali āvahiṁ || asura nāga khaga nara muni devā | āi karahiṁ raghunāyaka sevā || janma mahotsava racahiṁ sujānā | karahiṁ rāma kala kīrati gānā ||
एवं सर्वसंशयं दूरीकृत्य गुरोः पादपङ्कजरजः शिरसि धृत्वा। पुनः सर्वान् करौ संयम्य प्रार्थये येषां कथाकरणे लागो न भवेत्। अद्य शिवं नत्वा शिरसा वर्णयामि विशदां रामगुणगाथाम्। संवत्सरे षोडशशते एकत्रिंशे हरिपादौ शिरसि धृत्वा कथां करोमि। नवम्यां भौमवासरे मधुमासे अयोध्यायामिदं चरितं प्रकाशितम्। यस्मिन् दिने रामजन्म श्रुतयो गायन्ति सर्वतीर्थानि तत्र आगच्छन्ति। असुराः नागाः खगाः नराः मुनयः देवाः आगत्य रघुनायकस्य सेवां कुर्वन्ति। जन्ममहोत्सवं रचयन्ति सुजनाः रामस्य कल्याणकीर्तिं गायन्ति।
Verse 69 (दोहा/सोरठा)
मज्जहि सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर। जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर।।34।।
majjahi sajjana bṛnda bahu pāvana sarajū nīra | japahiṃ rāma dhari dhyāna ura sundara syāma sarīra ||34||
बहवः सज्जनसमूहाः सरयूतीर्थस्य पावनसलिले निमज्ज्य स्नानं कुर्वन्ति; ध्याननिष्ठं हृदयं विधाय, रामनाम जपन्ति, तस्य श्यामसुन्दरं मनोहरं रूपं ध्यायन्तः॥
Verse 70 (चौपाई)
दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना।। नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकइ सारद बिमलमति।। राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि।। चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजे तनु नहि संसारा।। सब बिधि पुरी मनोहर जानी। सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी।। बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा। सुनत नसाहिं काम मद दंभा।। रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा।। मन करि विषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौ एहिं सर परई।। रामचरितमानस मुनि भावन। बिरचेउ संभु सुहावन पावन।। त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन। कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन।। रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा।। तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर।। कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई। सादर सुनहु सुजन मन लाई।।
darasa parasa majjana aru pānā | harai pāpa kaha beda purānā || nadī punīta amita mahimā ati | kahi na sakai sārad bimalamati || rāma dhāmadā purī suhāvani | loka samasta bidita ati pāvani || cāri khāni jaga jīva apārā | avadha taje tanu nahiṁ saṁsārā || saba bidhi purī manohara jānī | sakala siddhiprada maṅgala khānī || bimala kathā kara kīnha araṁbhā | sunata nasāhiṁ kāma mada daṁbhā || rāmacaritamānasa ehi nāmā | sunata śravaṇa pāia biśrāmā || mana kari viṣaya anala bana jarī | hoi sukhī jau ehiṁ sara parī || rāmacaritamānasa muni bhāvana | biraceu saṁbhu suhāvana pāvana || tribidha doṣa dukha dārida dāvana | kali kucāli kuli kaluṣa nasāvana || raci mahesa nija mānasa rākhā | pāi susamau sivā sana bhāṣā || tāteṁ rāmacaritamānasa bara | dhareu nāma hiyaṁ heri haraṣi hara || kahauṁ kathā soi sukhada suhāī | sādara sunahu sujana mana lāī ||
दर्शनं स्पर्शनं स्नानं पानं च पापं हरति इति वेदपुराणानि वदन्ति। नदी पुण्या अमितमहिमा अतीव सारदा विमलमतिरपि वक्तुं न शक्नोति। रामधामदा पुरी सुशोभा सर्वलोकविदिता अतिपावनी। चत्वारः खगाः जगति जीवा अपाराः अयोध्यां त्यक्त्वा शरीरं न संसरन्ति। सर्वथा पुरी मनोहरा ज्ञेया सकलसिद्धिप्रदा मङ्गलखानी। विमलां कथां कृत्वा आरब्धवान् श्रुत्वा काममददम्भाः नश्यन्ति। रामचरितमानसमिदं नाम श्रुत्वा श्रवणेन विश्रामं प्राप्नोति। मनः विषयानलेन वनं दग्धं यदि एतस्मिन् सरसि पतति सुखी भवति। रामचरितमानसं मुनिप्रियं शम्भुना विरचितं सुशोभनं पावनं च। त्रिविधदोषदुखदारिद्र्यदावानलं शमयति कलिकुचालकुलकलुषं नाशयति। महेशः स्वमानसे रचितं स्थापितवान् समयं प्राप्य शिवां सह अभाषत। अतः रामचरितमानसमिति नाम धृतवान् हरः हृदि हर्षं विलोक्य। तामेव कथां वदामि सुखदां सुशोभनां सादरं शृणुत सुजनाः मनसा।
Verse 71 (दोहा/सोरठा)
जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु। अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु।।35।।
jasa mānasa jehi bidhi bhayu jaga pracāra jehi hetu | aba soi kahauṁ prasaṅga saba sumiri umā bṛṣaketu ||35||
अस्य मानसस्य कथं समुत्पत्तिः, केन च कारणेन जगति प्रसारः—तदेव वृत्तान्तं इदानीं वक्ष्यामि, उमां वृषकेतुं (शिवं) च स्मरन्।
Verse 72 (चौपाई)
संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी।। करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी।। सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू।। बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी।। लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी।। प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई।। सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई।। मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन।। भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना।।
Śambhu prasāda sumati hiyaṁ hulasī. Rāmacaritamānasa kabi Tulasī.. Karai manohara mati anuhārī. Sujana sucita suni lehu sudhārī.. Sumati bhūmi thala hṛdaya agādhū. Beda purāna udadhi ghana sādhū.. Baraṣahiṁ Rāma sujasa bara bārī. Madhura manohara maṅgalakārī.. Līlā saguṇa jo kahahiṁ bakhānī. Soi svacchatā karai mala-hānī.. Prema bhagati jo barani na jāī. Soi madhuratā su-sītalatāī.. So jala sukṛta sāli hita hoī. Rāma bhagata jana jīvana soī.. Medhā mahi-gata so jala pāvana. Sakili śravaṇa maga caleu suhāvana.. Bhareu su-mānasa su-thala thirānā. Sukhada sīta ruci cāru cirānā..
शम्भोः प्रसादेन सुमतिः हृदि प्रफुल्लते रामचरितमानसं कविः तुलसी विरचयति। मनोहरं मतिमनुसृत्य सुजनाः सुचिताः श्रुत्वा सुधारन्ताम्। सुमतिः भूमिः हृदयं चागाधं वेदपुराणानि उदधयः साधवः घनाः। रामसुयशः वरं वारिधारां मधुरं मनोहरं मङ्गलकारि वर्षयन्ति। लीलासगुणाः ये वदन्ति व्याख्यान्ति ते एव स्वच्छतां कुर्वन्ति मलं हन्ति। प्रेमभक्तिः या वर्णयितुं न शक्यते सा एव मधुरता सुशीतलता च। तत् जलं सुकृतसालिहितं भवति रामभक्तजनजीवनं तत् एव। मेधायां मह्यां गतं तत् पावनं जलं सर्वेषां श्रवणमार्गं सुशोभनं करोति। सुमानसं सुस्थलं स्थिरं पूरितवान् सुखदं शीतलं रुचिकरं चिरकालम्।
Verse 73 (दोहा/सोरठा)
सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि। तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि।।36।।
suṭhi sundara saṃbāda bara birace buddhi bicāri | tei ehi pāvana subhaga sara ghāṭa manohara cāri ||36||
विवेकयुक्तया बुद्ध्या मया सुन्दराः श्रेष्ठाश्च संवादाः विरचिताः; तस्मादस्मिन् पुण्ये मङ्गलमये च सरसि चत्वारः रम्याः घाटाः प्रतिष्ठापिताः।
Verse 74 (दोहा/सोरठा)
पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु। माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु।।37।।
pulaka bāṭikā bāga bana sukha su-bihaṅga bihāru | mālī sumana saneha jala sīñcata locana cāru ||37||
हर्षरोमाञ्चितं वनं उपवनं गुह्यकाननं च आनन्दराज्यं बभूव, यत्र रम्याः खगाः क्रीडासुखेन विचेरुः। मालीव कामः नेत्रजलस्य सुन्दरार्द्रतया कुसुमानि सिञ्चन् इव।
Verse 75 (चौपाई)
जे गावहिं यह चरित सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे।। सदा सुनहिं सादर नर नारी। तेइ सुरबर मानस अधिकारी।। अति खल जे बिषई बग कागा। एहिं सर निकट न जाहिं अभागा।। संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना।। तेहि कारन आवत हियँ हारे। कामी काक बलाक बिचारे।। आवत एहिं सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई।। कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला।। गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला।। बन बहु बिषम मोह मद माना। नदीं कुतर्क भयंकर नाना।।
je gāvahiṃ yaha carita saṁbhāre | tei ehi tāla catura rakhavāre || sadā sunahiṃ sādara nara nārī | tei surabara mānasa adhikārī || ati khala je biṣaī baga kāgā | ehiṃ sara nikaṭa na jāhiṃ abhāgā || saṃbuka bheka sevāra samānā | ihāṁ na biṣaya kathā rasa nānā || tehi kārana āvata hiyaṁ hāre | kāmī kāka balāka bicāre || āvata ehiṃ sara ati kaṭhināī | rāma kṛpā binu āi na jāī || kaṭhina kusaṅga kupantha karālā | tinh ke bacana bāgha hari byālā || gṛha kāraja nānā jañjālā | te ati durgama saila bisālā || bana bahu biṣama moha mada mānā | nadīṃ kutarka bhayaṅkara nānā ||
ये इमं चरितं सम्यक् गायन्ति ते एव एतस्य तालस्य चत्वारः कुशलाः रक्षकाः। नरनार्यः सदा सादरं ये शृण्वन्ति ते एव सुरवरमानसस्य अधिकारिणः। अतिखलाः विषयासक्ताः बककाकप्रकृतयः अभागिनः एतस्मिन् सरे समीपं न आगच्छन्ति। शम्बूकभेकसेवारसमानाः इह विषयकथारसं न प्राप्नुवन्ति। अतः कामिनः काकबलाकाः हृदि श्रान्ताः आगच्छन्ति। एतस्मिन् सरे आगमनं अतिकठिनं रामकृपया विना न आगन्तुं शक्यते। कठिनं कुसङ्गं कुपन्थं च घोरं तेषां वचनानि व्याघ्रहरिव्यालाः। गृहकार्याणि नानाजञ्जालानि तानि अतिदुर्गमानि विशालानि शैलानि। वनानि बहूनि विषमानि मोहमदमानानि नद्यः कुतर्काः भयङ्कराः नानाः।
Verse 76 (दोहा/सोरठा)
जे श्रद्धा संबल रहित नहि संतन्ह कर साथ। तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ।।38।।
je śraddhā sambala rahita nahiṁ santanha kara sātha | tinha kahuṁ mānasa agama ati jinhahi na priya raghunātha ||38||
ये श्रद्धाधारविहीनाः सन्तसङ्गं च न कुर्वन्ति—तेषां कृते मानसं परमदुर्लभं; येषां च रघुनाथे न प्रीतिरेव, तेषामपि।
Verse 77 (चौपाई)
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नींद जुड़ाई होई।। जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा।। करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना।। जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा।। सकल बिघ्न ब्यापहि नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही।। सोइ सादर सर मज्जनु करई। महा घोर त्रयताप न जरई।। ते नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह के राम चरन भल भाऊ।। जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई।। अस मानस मानस चख चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही।। भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू।। चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो।। सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला।। नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि।।
jauṁ kari kasṭa jāi puni koī | jātahiṁ nīṁda juṛāī hoī || jaṛatā jāṛa biṣama ura lāgā | gaehuṁ na majjana pāva abhāgā || kari na jāi sara majjanu pānā | phiri āvai sameta abhimānā || jauṁ bahori kou pūchana āvā | sara niṁdā kari tāhi bujhāvā || sakala bighna byāpahi nahiṁ tehī | rāma su-kṛpā̃ bilokahiṁ jehī || soi sādara sara majjanu karaī | mahā ghora traya-tāpa na jaraī || tē nara yaha sara tajahiṁ na kāū | jinha ke rāma carana bhala bhāū || jo nahāi caha ehiṁ sara bhāī | so sat-saṅga karau mana lāī || asa mānasa mānasa cakha cāhī | bhai kavi buddhi bimala avagāhī || bhayau hṛdayaṁ ānaṁda ucchāhū | umageu prema pramoda prabāhū || calī subhaga kabitā saritā so | rāma bimala jasa jala bharitā so || sarajū nāma sumaṅgala mūlā | loka beda mata maṁjula kūlā || nadī punīta su-mānasa naṁdinī | kali-mala tṛna taru mūla nikaṁdinī ||
यः कष्टेन आगच्छति तस्मिन् एव क्षणे निद्रा जृम्भा भवति। जडता जाड्यं विषमं हृदि लगति अभागी स्नानं न प्राप्नोति। सरे स्नानं पानं च कर्तुं न शक्नोति अभिमानेन सह पुनरागच्छति। पुनः कश्चित् पृच्छन् आगच्छति सरः निन्दां कृत्वा तं बोधयति। सर्वे विघ्नाः तं न स्पृशन्ति यं रामः सुकृपया विलोकयति। सः सादरं सरे स्नानं करोति महाघोरत्रितापेन न दह्यते। ते नराः एतत् सरं न त्यजन्ति येषां रामचरणयोः भावः भलः। यः एतस्मिन् सरे स्नातुमिच्छति भ्रातः सः सत्सङ्गं मनसा करोतु। एवं मानसं मानसः आस्वादयितुमिच्छति कविबुद्धिः विमलामवगाहां प्राप्तवती। हृदये आनन्दोच्छासः सञ्जातः प्रेमप्रमोदप्रवाहाः उन्मग्नाः। सुभगा कवितासरित् चलिता रामविमलजसा जलेन पूरिता। सरज्विति नाम सुमङ्गलमूलं लोकवेदमतानि मञ्जुलकूलानि। नदी पुण्या सुमानसनन्दिनी कलिमलतृणतरुमूलनाशिनी।
Verse 78 (दोहा/सोरठा)
श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल। संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल।।39।।
śrotā tribidha samāja pura grāma nagara duhum̐ kūla | sant-sabhā anupama avadha sakala su-maṅgala mūla ||39||
श्रोतृसमाजः त्रिविधः आसीत्—नगरग्रामजनाः, पुरजनपल्लिजनाश्च, उभयवंशसम्भवाश्च। अनुपमायामवध्यां सन्तसमाजः सर्वमङ्गलानां मूलस्रोत एव आसीत्।
Verse 79 (चौपाई)
रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई।। सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन।। जुग बिच भगति देवधुनि धारा। सोहति सहित सुबिरति बिचारा।। त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरुप सिंधु समुहानी।। मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन करिही।। बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा।। उमा महेस बिबाह बराती। ते जलचर अगनित बहुभाँती।। रघुबर जनम अनंद बधाई। भवँर तरंग मनोहरताई।।
rāma-bhagati sura-saritahi jāī | milī su-kīrati sarajū suhāī || s-anuja rāma samara jasu pāvana | mileu mahā-nadu sona suhāvana || juga bica bhagati deva-dhunī dhārā | sohati sahita su-birati bicārā || tri-bidha tāpa trāsaka timu-hānī | rāma-sarūpa sindhu sumuhānī || mānasa mūla milī sura-sarihī | sunata su-jana mana pāvana karihī || bica bica kathā bicitra bibhāgā | janu sari tīra tīra bana bāgā || umā mahesa bibāha barātī | te jalacara aganita bahu-bhā̃tī || raghubara janama anaṃda badhāī | bhavãra taraṅga manoharatāī ||
रामभक्तिः सुरसरितां प्रति गच्छति सुकीर्तिसरज्वा सुशोभनया मिलति। सानुजरामसमरयशः पावनेन महानदा सोण्ना सुशोभनया मिलति। युगान्तरे भक्तिदेवधुनिधारा सुविरतिविचारया सह शोभते। त्रिविधतापत्रासकत्रिमुखानि रामस्वरूपसिन्धुसमुहानि। मानसमूले सुरसरिता मिलिता श्रुत्वा सुजनमनः पावनं करिष्यति। मध्ये मध्ये कथाविभागाः विचित्राः सरित्तीरेषु वनबागाः इव। उमामहेशविवाहबरातयः ते जलचराः अगणिताः बहुभेदाः। रघुवरजन्म आनन्दवधाई भ्रमरतरङ्गमनोहरताः।
Verse 80 (दोहा/सोरठा)
बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग। नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारिबिहंग।।40।।
bālacarita cahu bandhu ke banaja bipula bahuraṅga | nṛpa rānī parijana sukṛta madhukara bāribihiṅga ||40||
चतुर्भ्रातॄणां बाललीलाः बहुवर्णमहापद्मं इव। राजा राण्यश्च सर्वं च अन्तःपुरं—पूर्वपुण्यप्रभावात्—भृङ्गाः जलपक्षिणश्च इव, तस्मिन् आनन्दामृतसरसि पिबन्तः क्रीडन्तश्च।
Verse 81 (चौपाई)
सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई।। नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका।। सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई।। घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी।। सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू।। कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं।। राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा।। काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी।।
sīya svayaṃbara kathā suhāī | sarita suhāvani so chabi chāī || nadī nāva paṭu prasna anekā | kevaṭa kusala utara saba bibekā || suni anukathana paraspara hoī | pathika samāja soha sari soī || ghora dhāra bhṛgunātha risānī | ghāṭa subaddha rāma bara bānī || sānuj rāma bibāha uchāhū | so subha umaga sukhada saba kāhū || kahata sunata haraṣahiṃ pulakāhīṃ | te sukṛtī mana mudita nahāhīṃ || rāma tilaka hita maṅgala sājā | paraba joga janu jure samājā || kāī kumati kekai केरī | parī jāsu phala bipati ghanerī ||
सीतास्वयंवरकथा सुशोभा सरिता सुशोभनी छब्या छायिता। नद्या नौकापटुः प्रश्नान् अनेकान् केवटः कुशलः सविवेकमुत्तराणि ददाति। अनुकथनं श्रुत्वा परस्परं भवति पथिकसमाजः सरसि सोऽपि शोभते। घोरधारा भृगुनाथरोषिणी घाटः सुबद्धः रामवरवाण्या। सानुजरामविवाहोच्छासः सः शुभउन्मगः सुखदः सर्वेषाम्। कथयन्तः शृण्वन्तः हर्षपुलकाः ते सुकृतिनः मनसा मुदिताः स्नान्ति। रामतिलकहितं मङ्गलसाजः पर्वयोगः जनु जुरेसमाजः। काईकुमतिः कैकेय्याः परिता यस्य फलं विपत्तिः घनीभूता।
मुख्य शिक्षा ‘श्रद्धा + सत्संग’ है: कथा का अधिकार बाह्य पाण्डित्य से नहीं, गुरु-कृपा, शुद्ध जिज्ञासा, और राम-प्रियता से बनता है। श्रवण-मार्ग को साधना घोषित किया गया है—कथा-जल से पाप-धुलाई, कथा-अग्नि से कुतर्क/अहं-दाह, कथा-चन्द्र से मन-शीतलता और प्रसाद। परम्परा-श्रवण (शिव-प्रेरित, याज्ञवल्क्य-वक्तृ, भरद्वाज-श्रोता) बताती है कि भक्ति ‘संवाद’ और ‘विनय’ से पुष्ट होती है। निर्गुण-सगुण समन्वय का संकेत: तत्त्व-गम्भीरता शिव-आश्रित, पर फल रघुनाथ-भक्ति—नाम, गुण, लीला के प्रति एकाग्र प्रेम; यही आगे की कथा-लीला के लिए साधक को पात्र बनाता है।
यह अंश बालकाण्ड के आरम्भिक ‘भूमिका-सोपान’ का घनत्व रखता है: तुलसी गुरु-श्रवण की परम्परा बताते हुए कथा-प्रवाह को प्रामाणिक संवाद-श्रृंखला में बाँधते हैं (शिव से लेकर भरद्वाज तक)। भाव-रसा में शान्त और अद्भुत का संयोग है—कथा की अनन्तता (राम अनंत, अनंत गुन) और श्रोता-योग्यता का विवेक। ‘मानस-सर’ रूपक यहाँ केंद्रीय है: चौपाइयों को पुरइन, दोहा-सोरठा को कमल, अर्थ को पराग, और सत्संग को बसंत-ऋतु बताकर पाठक को बतलाया जाता है कि यह ग्रन्थ ‘सोपान’ है—जल की तरह मल-हारी, अग्नि की तरह कुतर्क-दहन, चन्द्र की तरह शीतल-आनन्ददायी। सिद्धान्ततः यह खंड निर्गुण-सगुण समन्वय की भूमि बनाता है: शिव-प्रेरित कथा, पर लक्ष्य रघुनाथ-भक्ति। अतः बालकाण्ड का यह भाग साधक को ‘श्रवण-मार्ग’ पर स्थापित कर आगे के लीला-वर्णन हेतु पात्र बनाता है।
आरम्भ में ‘शान्त-रस’ का स्थिर आधार—साधक को कथा-प्रवेश की मर्यादा, अधिकार और विनय का बोध। फिर ‘अद्भुत-रस’ का उदय—रामकथा की अनन्तता, गुणों की अपारता, और परम्परा-प्रमाण (संवाद-श्रृंखला) का विस्मय। मध्य में ‘श्रद्धा-रस’ (भक्ति-प्रधान शान्त) गाढ़ा होता है—सत्संग, गुरु-कृपा, शुद्ध जिज्ञासा से पात्रता बनती है। अंत की ओर ‘प्रसाद/आनन्द’—मानस-सर में अवगाहन का आश्वासन: कथा जल की तरह मल-हारी, अग्नि की तरह कुतर्क-दाहक, चन्द्र की तरह शीतल-आनन्ददायी; श्रोता के भीतर विवेक-जागरण और हृदय-शुद्धि की प्रतिज्ञा।
परम्परानुसार यह भूमिका-खण्ड ‘अधिकार-निर्माण’ करता है: श्रद्धा-सत्संग सहित श्रवण से कलि-कलुष, कुतर्क, काम-मद-दंभ का शमन; मन में विवेक-जागरण; और रामनाम/रामध्यान में रुचि स्थिर होती है—‘श्रवन पाइअ बिश्रामा’ का फल।
सामान्य सत्संग-परम्परा में ‘राम’ नाम-संकीर्तन/नामा-स्मरण (जैसे ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’) या ‘राम नाम’ का जप-सम्पुट जोड़ा जाता है; विशेषतः ‘रामचरितमानस’ की भूमिका में ‘राम-नाम’ को ही सार्वभौम सम्पुट माना जाता है।
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