Adhyaya 131
Adi ParvaAdhyaya 13188 Verses

Adhyaya 131

Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)

Upa-parva: Vāraṇāvata-gamana (Pāṇḍava-pravāsa) Episode

Vaiśaṃpāyana reports that Duryodhana gradually consolidates key constituencies through material incentives and honorific gestures. Skilled ministers, acting under Dhṛtarāṣṭra’s direction, repeatedly describe Vāraṇāvata as exceptionally delightful and prosperous, emphasizing its festivals, beauty, and abundance. As these reports circulate, a plan forms for the Pāṇḍavas’ travel to Vāraṇāvata. Dhṛtarāṣṭra addresses the Pāṇḍavas, presenting the journey as an opportunity to enjoy the festivities with attendants, distribute gifts to Brahmins and singers, and return happily to Hāstinapura afterward. Yudhiṣṭhira understands Dhṛtarāṣṭra’s intent and acknowledges his own lack of supportive power, yet replies with formal acceptance. He then informs senior figures—Bhīṣma, Vidura, Droṇa, Bāhlika, Somadatta, Kṛpa, and Gāndhārī—stating that they will reside in Vāraṇāvata by the king’s command. The elders respond with auspicious blessings for safe passage and protection from misfortune. After performing customary rites and completing preparations, the Pāṇḍavas depart for Vāraṇāvata, explicitly linked to the pursuit of political security and eventual restoration of status.

Chapter Arc: गौतमगोत्रीय शरद्वान के वंश-प्रसंग से कथा धनुर्वेद और ब्राह्मतेज की पृष्ठभूमि रचती है—और उसी धरातल पर द्रोण–द्रुपद की मित्रता का स्मरण उभरता है। → पंचालराज द्रुपद, द्रोण के प्रेमपूर्ण मित्र-वचनों को सुनकर भी ऐश्वर्य-मद में भर उठता है; क्रोध से भौंहें टेढ़ी, नेत्र रक्त—वह मित्रता की समानता पर प्रश्न उठाता है: ‘जो श्रोत्रिय नहीं, वह श्रोत्रिय का मित्र कैसे? जो राजा नहीं, वह राजा का मित्र कैसे?’ इस अपमान से द्रोण का मन्यु भीतर-भीतर जलने लगता है। → द्रुपद का कटु निषेध—मित्रता को पद-प्रतिष्ठा की कसौटी पर तोलना—द्रोण के भीतर प्रतिशोध का संकल्प पक्का कर देता है; वह समझ लेता है कि अब न्याय/प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना केवल शक्ति-साधना और राजाश्रय से होगी। → द्रोण अपने जीवन को नए लक्ष्य पर मोड़ता है: पुत्र अश्वत्थामा (कृपी से) की प्राप्ति और भविष्य की सिद्धि के लिए वह राजकीय संरक्षण खोजने लगता है; द्रुपद के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर वह उसी ‘प्रिय सखा’ के पास जाने का निश्चय करता है, पर अब भाव मित्रता का नहीं—प्रतिज्ञा का है। → कुमारों से संवाद के बाद द्रोण उन्हें भीष्म के पास भेजने का संकेत देता है—अब प्रश्न यह है कि भीष्म द्रोण को किस रूप में स्वीकार करेंगे: आचार्य, शरणागत, या भविष्य के युद्ध-यंत्र के रूप में?

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माज बक। चॉ-ज:ड: - गौतमगोत्रीय होनेके कारण शरद्वानूको भी गौतम कहा जाता था। - धर्नुर्वेदके चार भेद इस प्रकार हैं--मुक्त, अमुक्त, मुक्तामुक्त तथा मन्त्रमुक्त। छोड़े जानेवाले बाण आदिको "मुक्त! कहते हैं। जिन्हें हाथमें लेकर प्रहार किया जाय, उन खड़्ग आदिको “अमुक्त” कहते हैं। जिस अस्त्रको चलाने और समेटनेकी कला मालूम हो, वह अस्त्र 'मुक्तामुक्तर कहलाता है। जिसे मन्त्र पढ़कर चला तो दिया जाय किंतु उसके उपसंहारकी विधि मालूम न हो, वह अस्त्र 'मन्त्रमुक्त' कहा गया है, शस्त्र, अस्त्र, प्रत्यस्त्र और परमास्त्र--ये भी धरनुर्वेदके चार भेद हैं। इसी प्रकार आदान, संधान, विमोक्ष और संहार--इन चार क्रियाओंके भेदसे भी धनुर्वेदके चार भेद होते हैं। त्रिशर्दाधिकशततमो<्ध्याय: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी बीटा* और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना वैशम्पायन उवाच ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाज: प्रतापवान्‌ | अनब्रवीत्‌ पार्थिवं राजन्‌ सखायं विद्धि मामिह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! प्रतापी द्रोण राजा ट्रपदके यहाँ जाकर उनसे इस प्रकार बोले--'राजन! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं तुम्हारा मित्र द्रोण यहाँ तुमसे मिलनेके लिये आया हूँ

वैशम्पायन उवाच । ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाजः प्रतापवान् । अनब्रवीत् पार्थिवं राजन् सखायं विद्धि मामिह ॥

Verse 2

इत्येवमुक्त: सख्या स प्रीतिपूर्व जनेश्वर: । भारद्वाजेन पाज्चालो नामृष्यत वचो<5स्य तत्‌,मित्र द्रोणके द्वारा इस प्रकार प्रेमपूर्वक कहे जानेपर पंचालदेशके नरेश ट्रपद उनकी इस बातको सह न सके

इत्येवमुक्तः सख्या स प्रीतिपूर्वं जनेश्वरः । भारद्वाजेन पाञ्चालो नामृष्यद्वचस्तदा ॥

Verse 3

सक्रोधामर्षजिद्दय भ्रू: कषघायीकृतलोचन: । ऐश्वर्यमदसम्पन्नो द्रोणं राजाब्रवीदिदम्‌,क्रोध और अमर्षसे उनकी भौंहें टेढ़ी हो गयीं, आँखोंमें लाली छा गयी; धन और ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त होकर वे राजा द्रोणसे यों बोले

सक्रोधामर्षजिद्दर्पः कुटिलीकृतलोचनः । ऐश्वर्यमदसमायुक्तो द्रोणं राजाब्रवीदिदम् ॥

Verse 4

हुपद उवाच अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मनू नातिसमञ्जसा । यन्मां ब्रवीषि प्रसभं॑ सखा ते5हमिति द्विज,द्रपदने कहा--ब्रह्मन! तुम्हारी बुद्धि सर्वथा संस्कारशून्य--अपरिपक्व है। तुम्हारी यह बुद्धि यथार्थ नहीं है। तभी तो तुम धृष्टतापूर्वक मुझसे कह रहे हो कि “राजन! मैं तुम्हारा सखा हूँ

द्रुपद उवाच । अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्राह्मन् नातिसमञ्जसा । यन्मां ब्रवीषि प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज ॥

Verse 5

न हि रज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरै: क्वचित्‌ । सख्यं भवति मन्दात्मन्‌ श्रिया हीनैर्धनच्युतै:,ओ मूढ़! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता नहीं होती

न हि राज्ञामुदीर्णानामेवंभूतैर्नरैः क्वचित् । सख्यं भवति मन्दात्मन् श्रिया हीनैर्धनच्युतैः ॥

Verse 6

सौह्दान्यपि जीर्यन्ते कालेन परिजीर्यत: । सौद्ददं मे त्वया हयासीत्‌ पूर्व सामर्थ्यबन्धनम्‌,समयके अनुसार मनुष्य ज्यों-ज्यों बूढ़ा होता है, त्यों-ही-त्यों उसकी मैत्री भी क्षीण होती चली जाती है। पहले तुम्हारे साथ जो मेरी मित्रता थी, वह सामर्थ्यको लेकर थी--उस समय मैं और तुम दोनों समान शक्तिशाली थे

सौहृदान्यपि जीर्यन्ते कालेन परिजीर्यतः । सौहृदं मे त्वया ह्यासीद् पूर्वं सामर्थ्यबन्धनम् ॥

Verse 7

न सख्यमजरं लोके हृदि तिष्ठति कस्यचित्‌ । कालो होन॑ विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत,लोकमें किसी भी मनुष्यके हृदयमें मैत्री अमिट होकर नहीं रहती। समय एक मित्रको दूसरेसे विलग कर देता है अथवा क्रोध मनुष्यको मित्रतासे हटा देता है

न सख्यमजरं लोके हृदि तिष्ठति कस्यचित् । कालो हि विहरति क्रोधो वा एनं हरत्युत ॥

Verse 8

मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सख्यं भवत्वपाकृधि । आसीत्‌ सख्य॑ द्विजश्रेष्ठ त्वया मे5र्थनिबन्धनम्‌,इस प्रकार क्षीण होनेवाली मैत्रीका भरोसा न करो। हम दोनों एक-दूसरेके मित्र थे-- इस भावको हृदयसे निकाल दो। द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि स्वार्थको लेकर हुई थी

मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सख्यं भवत्वपाकृधि । आसीत् सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम् ॥

Verse 9

न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान्‌ विदुष: सखा । न शूरस्य सखा क्लीब: सखिपूर्व किमिष्यते,सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवानका, मूर्ख विद्वान्‌का और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो

न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान् विदुषः सखा । न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्वं किमिष्यते ॥

Verse 10

ययोरेव सम॑ वित्तं ययोरेव सम॑ श्रुतम्‌ । तयोरविवाह: सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयो:,जिनका धन समान है, जिनकी विद्या एक-सी है, उन्हींमें विवाह और मैत्रीका सम्बन्ध हो सकता है। हृष्ट-पुष्ट और दुर्बलमें (धनवान्‌ और निर्धनमें) कभी मित्रता नहीं हो सकती

ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं श्रुतम् । तयोरेव विवाहः सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥

Verse 11

नाश्रोत्रिय: श्रोत्रियस्थ नारथी रथिन: सखा । नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिष्यते,जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय (वेदवेत्ता)-का मित्र नहीं हो सकता। जो रथी नहीं है, वह रथीका सखा नहीं हो सकता। इसी प्रकार जो राजा नहीं है, वह किसी राजाका मित्र कदापि नहीं हो सकता। फिर तुम पुरानी मित्रताका क्‍यों स्मरण करते हो?

नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा । नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते ॥

Verse 12

वैशग्पायन उवाच द्रुपदेनैवमुक्तस्तु भारद्वाज: प्रतापवान्‌ | मुहूर्त चिन्तयित्वा तु मन्युनाभिपरिष्लुत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा द्रुपदके यों कहनेपर प्रतापी द्रोण क्रोधसे जल उठे और दो घड़ीतक गहरी चिन्तामें डूबे रहे। वे बुद्धिमान्‌ तो थे ही, पांचालनरेशसे बदला लेनेके विषयमें मन-ही-मन कुछ निश्चय करके कौरवोंकी राजधानी हस्तिनापुर नगरमें चले गये

वैशम्पायन उवाच—द्रुपदेनैवमुक्तस्तु भारद्वाजः प्रतापवान् । मुहूर्तं चिन्तयित्वा तु मन्युनाभिपरिप्लुतः ॥

Verse 13

स विनिश्ित्य मनसा पाज्चालं प्रति बुद्धिमान्‌ जगाम कुरुमुख्यानां नगरं नागसाह्वयम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा द्रुपदके यों कहनेपर प्रतापी द्रोण क्रोधसे जल उठे और दो घड़ीतक गहरी चिन्तामें डूबे रहे। वे बुद्धिमान्‌ तो थे ही, पांचालनरेशसे बदला लेनेके विषयमें मन-ही-मन कुछ निश्चय करके कौरवोंकी राजधानी हस्तिनापुर नगरमें चले गये

स विनिश्चित्य मनसा पाञ्चालं प्रति बुद्धिमान् । जगाम कुरुमुख्यानां नगरं नागसाह्वयम् ॥

Verse 14

स नागपुरमागम्य गौतमस्य निवेशने । भारद्वाजो5वसत्‌ तत्र प्रच्छन्नं द्विजसत्तम:,हस्तिनापुरमें पहुँचकर द्विजश्रेष्ठ द्रोण गौतमगोत्रीय कृपाचार्यके घरमें गुप्तरूपसे निवास करने लगे

स नागपुरमागम्य गौतमस्य निवेशने । भारद्वाजोऽवसत्तत्र प्रच्छन्नं द्विजसत्तमः ॥

Verse 15

ततो<स्य तनुज: पार्थान्‌ कृपस्यानन्तरं प्रभु: । अस्त्राणि शिक्षयामास नाबुध्यन्त च तं जना:,वहाँ उनके पुत्र शक्तिशाली अभश्व॒त्थामा कृपाचार्यके बाद पाण्डवोंको स्वयं ही अस्त्रविद्याकी शिक्षा देने लगे; किंतु लोग उन्हें पहचान न सके

ततोऽस्य तनुजः पार्थान् कृपस्यानन्तरं प्रभुः । अस्त्राणि शिक्षयामास नाबुध्यन्त च तं जनाः ॥

Verse 16

एवं स तत्र गूढात्मा कंचित्‌ कालमुवास ह । कुमारास्त्वथ निष्क्रम्प समेता गजसाह्दयात्‌,इस प्रकार द्रोणने वहाँ अपने आपको छिपाये रखकर कुछ कालतक निवास किया। तदनन्तर एक दिन कौरव-पाण्डव सभी वीर कुमार हस्तिनापुरसे बाहर निकलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ मिलकर वहाँ गुल्ली-डंडा खेलने लगे। उस समय खेलमें लगे हुए उन कुमारोंकी वह बीटा कुएँमें गिर पड़ी

एवं स तत्र गूढात्मा कञ्चित्कालमुवास ह । कुमारास्त्वथ निष्क्रम्य समेता गजसाह्वयात् ॥

Verse 17

क्रीडन्तो वीटया तत्र वीरा: पर्यचरन्‌ मुदा । पपात कूपे सा वीटा तेषां वै क्रीडतां तदा,इस प्रकार द्रोणने वहाँ अपने आपको छिपाये रखकर कुछ कालतक निवास किया। तदनन्तर एक दिन कौरव-पाण्डव सभी वीर कुमार हस्तिनापुरसे बाहर निकलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ मिलकर वहाँ गुल्ली-डंडा खेलने लगे। उस समय खेलमें लगे हुए उन कुमारोंकी वह बीटा कुएँमें गिर पड़ी

क्रीडन्तो वीटया तत्र वीराः पर्यचरन् मुदा । पपात कूपे सा वीटा तेषां वै क्रीडतां तदा ॥

Verse 18

ततस्ते यत्नमातिष्ठन्‌ वीटामुद्धर्तुमादृता: । नच ते प्रत्यपद्यन्त कर्म वीटोपलब्धये,तब वे उस बीटाको निकालनेके लिये बड़ी तत्परताके साथ प्रयत्नमें लग गये; परंतु उसे प्राप्त करनेका कोई भी उपाय उनके ध्यानमें नहीं आया

ततस्ते यत्नमातिष्ठन् वीटामुद्धर्तुमादृताः । न च ते प्रत्यपद्यन्त कर्म वीटोपलब्धये ॥

Verse 19

ततोडन्योन्यमवैक्षन्त व्रीडयावनतानना: । तस्या योगमविन्दन्तो भृशं चोत्कण्ठिताभवन्‌,इस कारण लज्जासे नतमस्तक होकर वे एक-दूसरेकी ओर देखने लगे। गुल्ली निकालनेका कोई उपाय न मिलनेके कारण वे अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये

ततोऽन्योन्यमवैक्षन्त व्रीडयावनताननाः । तस्या योगमविन्दन्तो भृशं चोत्कण्ठिताभवन् ॥

Verse 20

ते5पश्यन्‌ ब्राह्मणं श्याममापन्नं पलितं कृशम्‌ । कृत्यवन्तमदूरस्थमग्निहोत्रपुरस्कृतम्‌,इसी समय उन्होंने एक श्याम वर्णके ब्राह्मणको थोड़ी ही दूरपर बैठे देखा, जो अग्निहोत्र करके किसी प्रयोजनसे वहाँ रुके हुए थे। वे आपत्तिग्रस्त जान पड़ते थे। उनके सिरके बाल सफेद हो गये थे और शरीर अत्यन्त दुर्बल था

तेऽपश्यन् ब्राह्मणं श्याममापन्नं पलितं कृशम् । कृत्यवन्तमदूरस्थमग्निहोत्रपुरस्कृतम् ॥

Verse 21

उन महात्मा ब्राह्मगको देखकर वे सभी कुमार उनके पास गये और उन्हें घेरकर खड़े हो गये। उनका उत्साह भंग हो गया था। कोई काम करनेकी इच्छा नहीं होती थी। मनमें भारी निराशा भर गयी थी

तं महात्मानमालोक्य ब्राह्मणं ते कुमारकाः । उपेत्य पर्यवस्थाय निरुत्साहा बभूविरे ॥ न च किञ्चित्कर्तुमिच्छा मनसि व्यथिता ह्यभूत् । निराशा गुरुतरिका तेषां चेतसि जज्ञिरे ॥

Verse 22

अथ द्रोण: कुमारांस्तान्‌ दृष्टवा कृत्यवतस्तदा । प्रहस्य मन्दं पैशल्यादभ्यभाषत वीर्यवान्‌,तदनन्तर पराक्रमी द्रोण यह देखकर कि इन कुमारोंका अभीष्ट कार्य पूर्ण नहीं हुआ है “-ये उसी प्रयोजनसे मेरे पास आये हैं, उस समय मन्द मुसकराहटके साथ बड़े कौशलसे बोले--

अथ द्रोणः कुमारांस्तान् दृष्ट्वा कृत्यवतस्तदा । प्रहस्य मन्दं पैशल्यादभ्यभाषत वीर्यवान् ॥

Verse 23

अहो वो धिग्‌ बल क्षात्रं धिगेतां व: कृतास्त्राताम्‌ । भरतस्यान्वये जाता ये वीटां नाधिगच्छत,“अहो! तुमलोगोंके क्षत्रिययलको धिक्कार है और तुमलोगोंकी इस अस्त्र-विद्या- विषयक निपुणताको भी धिक्‍कार है; क्योंकि तुमलोग भरतवंशमें जन्म लेकर भी कुएँमें गिरी हुई गुल्लीको नहीं निकाल पाते

अहो वो धिग्बलं क्षात्रं धिगेतां वः कृतास्त्रताम् । भरतस्यान्वये जाता ये वीटां नाधिगच्छथ ॥

Verse 24

वीटां च मुद्रिकां चैव हाहमेतदपि द्वयम्‌ । उद्धरेयमिषीकाभिशर्भोजन मे प्रदीयताम्‌,“देखो, मैं तुम्हारी गुल्ली और अपनी इस आअँगूठी दोनोंको सींकोंसे निकाल सकता हूँ। तुमलोग मेरी जीविकाकी व्यवस्था करो”

वीटां च मुद्रिकां चैव हाहमेतदपि द्वयम् । उद्धरेयमिषीकाभिरर्भोजनं मे प्रदीयताम् ॥

Verse 25

एवमुक्‍्त्वा कुमारांस्तान्‌ द्रोण: स्वाडुलिवेष्टनम्‌ । कूपे निरुदके तस्मिन्नपातयदरिंदम:,उन कुमारोंसे यों कहकर शत्रुओंका दमन करनेवाले द्रोणने उस निर्जल कुएँमें अपनी अँगूठी डाल दी

एवमुक्त्वा कुमारांस्तान् द्रोणः स्वाङ्गुलिवेष्टनम् । कूपे निरुदके तस्मिन्नपातयदरिंदमः ॥

Verse 26

युधिछिर उवाच कृपस्यानुमते ब्रह्मन्‌ भिक्षामाप्तुहि शाश्वतीम्‌

युधिष्ठिर उवाच । कृपस्यानुमते ब्रह्मन् भिक्षामाप्तुमिह शाश्वतीम् ॥

Verse 27

द्रोण उवाच एषा मुष्टिरिषीकाणां मयास्त्रेणाभिमन्त्रिता,द्रोण बोले--ये मुदट्ठीभर सींकें हैं, जिन्हें मैंने अस्त्र-मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित किया है

द्रोण उवाच । एषा मुष्टिरिषीकाणां मयास्त्रेणाभिमन्त्रिता ॥

Verse 28

अस्या वीर्य निरीक्षध्वं यदन्यस्य न विद्यते । भेत्स्यामीषीकया वीटां तामिषीकां तथान्यया,तुमलोग इसका बल देखो, जो दूसरेमें नहीं है। मैं पहले एक सींकसे उस गुल्लीको बींध दूँगा; फिर दूसरी सींकसे उस पहली सींकको बींधूँगा

अस्या वीर्यं निरीक्षध्वं यदन्यस्य न विद्यते । भेत्स्यामीषीकया वीटां तामिषीकां तथान्यया ॥

Verse 29

वैशम्पायन उवाच ततो यथोक्तं द्रोणेन तत्‌ सर्व कृतमज्जसा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर द्रोणने जैसा कहा था, वह सब कुछ अनायास ही कर दिखाया

वैशम्पायन उवाच । ततो यथोक्तं द्रोणेन तत् सर्वं कृतमज्जसा ॥

Verse 30

तददवेक्ष्य कुमारास्ते विस्मयोत्फुल्ललोचना: । आश्चर्यमिदमत्यन्तमिति मत्वा वचो<ब्रुवन्‌,यह अद्भुत कार्य देखकर उन कुमारोंके नेत्र आश्वर्यसे खिल उठे। इसे अत्यन्त आश्चर्य मानकर वे इस प्रकार बोले

तद् अवेक्ष्य कुमारास्ते विस्मयोत्फुल्ललोचनाः । आश्चर्यम् इदमत्यन्तम् इति मत्वा वचोऽब्रुवन् ॥

Verse 31

कुमारा ऊचु. मुद्रिकामपि विप्रर्षे शीघ्रमेतां समुद्धर । कुमारोंने कहा--ब्रह्मर्ष! अब आप शीघ्र ही इस अँगूठीको भी निकाल दीजिये ।। ३० १ कल वैशम्पायन उवाच ततः शरं समादाय भरनुद्रोणो महायशा:,वैशम्पायनजी कहते हैं--तब महायशस्वी द्रोणने धनुष-बाण लेकर बाणसे उस अँगूठीको बींध दिया और उसे ऊपर निकाल लिया। शक्तिशाली द्रोणने इस प्रकार कुएँसे बाणसहित अँगूठी निकालकर उन आश्वर्यचकित कुमारोंके हाथमें दे दी; किंतु वे स्वयं तनिक भी विस्मित नहीं हुए। उस अँगूठीको कुएँसे निकाली हुई देखकर उन कुमारोंने द्रोणसे कहा

कुमारा ऊचुः । मुद्रिकामपि विप्रर्षे शीघ्रमेतां समुद्धर ॥

Verse 32

शरेण विद्‌ृध्वा मुद्रां तामूर्ध्वमावाहयत्‌ प्रभु: । सशरं समुपादाय कूपादड्जुलिवेष्टनम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--तब महायशस्वी द्रोणने धनुष-बाण लेकर बाणसे उस अँगूठीको बींध दिया और उसे ऊपर निकाल लिया। शक्तिशाली द्रोणने इस प्रकार कुएँसे बाणसहित अँगूठी निकालकर उन आश्वर्यचकित कुमारोंके हाथमें दे दी; किंतु वे स्वयं तनिक भी विस्मित नहीं हुए। उस अँगूठीको कुएँसे निकाली हुई देखकर उन कुमारोंने द्रोणसे कहा

शरेण विद्ध्वा मुद्रां तामूर्ध्वमावाहयत् प्रभुः । सशरं समुपादाय कूपादङ्गुलिवेष्टनम् ॥

Verse 33

ददौ तत: कुमाराणां विस्मितानामविस्मित: । मुद्रिकामुद्धूतां दृष्टवा तमाहुस्ते कुमारका:,वैशम्पायनजी कहते हैं--तब महायशस्वी द्रोणने धनुष-बाण लेकर बाणसे उस अँगूठीको बींध दिया और उसे ऊपर निकाल लिया। शक्तिशाली द्रोणने इस प्रकार कुएँसे बाणसहित अँगूठी निकालकर उन आश्वर्यचकित कुमारोंके हाथमें दे दी; किंतु वे स्वयं तनिक भी विस्मित नहीं हुए। उस अँगूठीको कुएँसे निकाली हुई देखकर उन कुमारोंने द्रोणसे कहा

ददौ ततः कुमाराणां विस्मितानामविस्मितः । मुद्रिकामुद्धृतां दृष्ट्वा तमाहुस्ते कुमारकाः ॥

Verse 34

कुमारा ऊचु: अभिवादयामहे ब्रह्मन्‌ नैतदन्येषु विद्यते । को5सि कस्यासि जानीमो वयं कि करवामहे,कुमार बोले--ब्रह्मन! हम आपको प्रणाम करते हैं। यह अस्त्र-कौशल दूसरे किसीमें नहीं है। आप कौन हैं, किसके पुत्र हैं--यह हम जानना हैं। बताइये, हमलोग आपकी कया सेवा करें?

कुमारा ऊचुः । अभिवादयामहे ब्रह्मन् नैतदन्येषु विद्यते । कोऽसि कस्यासि जानीमो वयं किं करवामहे ॥

Verse 35

द्रोण उदाच आचक्षध्वं च भीष्माय रूपेण च गुणैश्व माम्‌

द्रोण उवाच—आचक्षध्वं च भीष्माय माम्, रूपेण च गुणैश्च।

Verse 36

वैशम्पायन उवाच तथेत्युक्त्वा च गत्वा च भीष्ममूचु: कुमारका:,वैशम्पायनजी कहते हैं--“बहुत अच्छा” कहकर वे कुमार भीष्मजीके पास गये और ब्राह्यणकी सच्ची बातों तथा उनके उस अद्भुत पराक्रमको भी उन्होंने भीष्मजीसे कह सुनाया। कुमारोंकी बातें सुनकर भीष्मजी समझ गये कि वे आचार्य द्रोण हैं

वैशम्पायन उवाच—तथेत्युक्त्वा च गत्वा च भीष्ममूचुः कुमारकाः। ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तस्य चाद्भुतं पराक्रमम्। तेषां वचः श्रुत्वा भीष्मो द्रोणमाचार्यं प्रत्यजानात्॥

Verse 37

ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तच्च कर्म तथाविधम्‌ | भीष्म: श्रुत्वा कुमाराणां द्रोणं तं प्रत्यजानत,वैशम्पायनजी कहते हैं--“बहुत अच्छा” कहकर वे कुमार भीष्मजीके पास गये और ब्राह्यणकी सच्ची बातों तथा उनके उस अद्भुत पराक्रमको भी उन्होंने भीष्मजीसे कह सुनाया। कुमारोंकी बातें सुनकर भीष्मजी समझ गये कि वे आचार्य द्रोण हैं

ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तच्च कर्म तथाविधम्। भीष्मः श्रुत्वा कुमाराणां द्रोणं तं प्रत्यजानत्॥

Verse 38

युक्तरूप: स हि गुरुरित्येवमनुचिन्त्य च | अथैनमानीय तदा स्वयमेव सुसत्कृतम्‌,फिर यह सोचकर कि द्रोणाचार्य ही इन कुमारोंके उपयुक्त गुरु हो सकते हैं, भीष्मजी स्वयं ही आकर उन्हें सत्कारपूर्वक घर ले गये। वहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मने बड़ी बुद्धिमत्ताके साथ द्रोणाचार्यसे उनके आगमनका कारण पूछा और द्रोणने वह सब कारण इस प्रकार निवेदन किया

युक्तरूपः स हि गुरुरित्येवमनुचिन्त्य च। अथैनमानाय तदा स्वयमेव सुसत्कृतम्॥

Verse 39

परिपप्रच्छ निपुणं भीष्म: शस्त्रभृतां वर: | हेतुमागमने तच्च द्रोण: सर्व न्यवेदयत्‌,फिर यह सोचकर कि द्रोणाचार्य ही इन कुमारोंके उपयुक्त गुरु हो सकते हैं, भीष्मजी स्वयं ही आकर उन्हें सत्कारपूर्वक घर ले गये। वहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मने बड़ी बुद्धिमत्ताके साथ द्रोणाचार्यसे उनके आगमनका कारण पूछा और द्रोणने वह सब कारण इस प्रकार निवेदन किया

परिपप्रच्छ निपुणं भीष्मः शस्त्रभृतां वरः। हेतुमागमने तच्च द्रोणः सर्वं न्यवेदयत्॥

Verse 40

द्रोण उदाच महर्षेरग्निवेशस्य सकाशमहमच्युत । अन्त्रार्थमगमं पूर्व धनुर्वेदजिघृक्षया,द्रोणाचार्यने कहा--अपनी प्रतिज्ञासे कभी च्युत न होनेवाले भीष्मजी! पहलेकी बात है, मैं अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा तथा धरनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये महर्षि अग्निवेशके समीप गया था

द्रोण उवाच—अच्युतप्रतिज्ञ भीष्म! पूर्वं कदाचिदहं धनुर्वेदविद्यां शस्त्रास्त्रशिक्षां च जिघृक्षन् महर्षेरग्निवेशस्य सकाशमगच्छम्।

Verse 41

ब्रह्मचारी विनीतात्मा जटिलो बहुला: समा: । अवसं सुचिरं तत्र गुरुशुश्रूषणे रत:,वहाँ मैं विनीत हृदयसे ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए सिरपर जटा धारण किये बहुत वर्षोतक रहा। गुरुकी सेवामें निरन्तर संलग्न रहकर मैंने दीर्घकालतक उनके आश्रममें निवास किया

ब्रह्मचारी विनीतात्मा जटिलो बहुलाः समाः। अवसं सुचिरं तत्र गुरुशुश्रूषणे रतः॥

Verse 42

पाज्चालो राजपुत्रश्न यज्ञसेनो महाबल: । इष्वस्त्रहेतोर्न्यवसत्‌ तस्मिन्नेव गुरौ प्रभु:,उन दिनों पंचालराजकुमार महाबली यज्ञसेन ट्रुपद भी, जो बड़े शक्तिशाली थे, धनुर्वेदकी शिक्षा पानेके लिये उन्हीं गुरुदेव अग्निवेशके समीप रहते थे

पाञ्चालो राजपुत्रश्च यज्ञसेनो महाबलः। इष्वस्त्रहेतोर्न्यवसत्तस्मिन्नेव गुरौ प्रभुः॥

Verse 43

स मे तत्र सखा चासीदुपकारी प्रियश्न मे । तेनाहं सह संगम्य वर्तयन्‌ सुचिरं प्रभो,वे उस गुरुकुलमें मेरे बड़े ही उपकारी और प्रिय मित्र थे। प्रभो! उनके साथ मिल- जुलकर मैं बहुत दिनोंतक आश्रममें रहा

स मे तत्र सखा चासीदुपकारी प्रियश्च मे। तेनाहं सह संगम्य वर्तयन् सुचिरं प्रभो॥

Verse 44

बाल्यात्‌ प्रभृति कौरव्य सहाध्ययनमेव च । स मे सखा सदा तत्र प्रियवादी प्रियंकर:,बचपनसे ही हम दोनोंका अध्ययन साथ-साथ चलता था। द्रुपद वहाँ मेरे घनिष्ठ मित्र थे। वे सदा मुझसे प्रिय वचन बोलते और मेरा प्रिय कार्य करते थे

बाल्यात् प्रभृति कौरव्य सहाध्ययनमेव च। स मे सखा सदा तत्र प्रियवादी प्रियंकरः॥

Verse 45

अब्रवीदिति मां भीष्म वचन प्रीतिवर्धनम्‌ अहं प्रियतमः पुत्र: पितुद्रोण महात्मन:,भीष्मजी! वे एक दिन मुझसे मेरी प्रसन्नताको बढ़ानेवाली यह बात बोले--'द्रोण! मैं अपने महात्मा पिताका अत्यन्त प्रिय पुत्र हूँ

वैशम्पायन उवाच—भीष्म! स कदाचिन्मम प्रीतिवर्धनं वचनमब्रवीत्—‘द्रोण! अहं महात्मनः पितुः प्रियतमः पुत्रः।’

Verse 46

अभिषेक्ष्यति मां राज्ये स पाड्चालो यदा तदा । त्वद्धोग्यं भविता तात सखे सत्येन ते शपे,“तात! जब पांचालनरेश मुझे राज्यपर अभिषिक्त करेंगे, उस समय मेरा राज्य तुम्हारे उपभोगमें आयेगा। सखे! मैं सत्यकी सौगंध खाकर कहता हूँ--मेरे भोग, वैभव और सुख सब तुम्हारे अधीन होंगे।' यों कहकर वे अस्त्रविद्यामें निपुण हो मुझसे सम्मानित होकर अपने देशको लौट गये

वैशम्पायन उवाच—यदा तदा पाञ्चालो नृपतिः मां राज्येऽभिषेक्ष्यति, तदा तात! मम राज्यं तव भोग्यं भविष्यति। सखे! सत्येन ते शपे—मम भोगाः श्रीश्च सुखानि च सर्वाणि त्वदधीनानि भविष्यन्ति।

Verse 47

मम भोगाश्च वित्त च त्वदधीनं सुखानि च । एवमुक्‍्त्वाथ वबच्राज कृतास्त्र: पूजितो मया,“तात! जब पांचालनरेश मुझे राज्यपर अभिषिक्त करेंगे, उस समय मेरा राज्य तुम्हारे उपभोगमें आयेगा। सखे! मैं सत्यकी सौगंध खाकर कहता हूँ--मेरे भोग, वैभव और सुख सब तुम्हारे अधीन होंगे।' यों कहकर वे अस्त्रविद्यामें निपुण हो मुझसे सम्मानित होकर अपने देशको लौट गये

वैशम्पायन उवाच—मम भोगाश्च वित्तं च सुखानि च त्वदधीनानि। एवमुक्त्वा स राजपुत्रः कृतास्त्रः मया पूजितः स्वदेशं प्रत्यावर्तत।

Verse 48

तच्च वाक्यमहं नित्यं मनसा धारयंस्तदा । सो<हं पितृनियोगेन पुत्रलोभाद्‌ यशस्विनीम्‌,उनकी उस समय कही हुई इस बातको मैं अपने मनमें सदा याद रखता था। कुछ दिनोंके बाद पितरोंकी प्रेरणासे मैंने पुत्र-प्राप्तिके लोभसे परम बुद्धिमती, महान्‌ व्रतका पालन करनेवाली, अन्निहोत्र, सत्र तथा शम-दमके पालनमें मेरे साथ सदा संलग्न रहनेवाली शरद्वानकी पुत्री यशस्विनी कृपीसे, जिसके केश बहुत बड़े नहीं थे, विवाह किया

वैशम्पायन उवाच—तच्च वाक्यं तदा नित्यं मनसा धारयामि स्म। अथाहं पितृनियोगेन पुत्रलोभात् यशस्विनीं शरद्वतः दुहितरं कृपीं नातिकेशीं महाप्रज्ञां महाव्रताम् उपयेमे। सा चाग्निहोत्रे सत्रेषु शमदमे च मया सह सततं रता बभूव।

Verse 49

नातिकेशीं महाप्रज्ञामुपयेमे महाव्रताम्‌ । अन्निहोत्रे च सत्रे च दमे च सततं रताम्‌,उनकी उस समय कही हुई इस बातको मैं अपने मनमें सदा याद रखता था। कुछ दिनोंके बाद पितरोंकी प्रेरणासे मैंने पुत्र-प्राप्तिके लोभसे परम बुद्धिमती, महान्‌ व्रतका पालन करनेवाली, अन्निहोत्र, सत्र तथा शम-दमके पालनमें मेरे साथ सदा संलग्न रहनेवाली शरद्वानकी पुत्री यशस्विनी कृपीसे, जिसके केश बहुत बड़े नहीं थे, विवाह किया

वैशम्पायन उवाच—नातिकेशीं महाप्रज्ञां महाव्रताम् उपयेमे, या चाग्निहोत्रे सत्रेषु दमे च सततं रता।

Verse 50

अलभद्‌ गौतमी पुत्रमश्चत्थामानमौरसम्‌ । भीमविक्रमकर्माणमादित्यसमतेजसम्‌,उस गौतमी कृपीने मुझसे मेरे औरस पुत्र अश्वत्थामाको प्राप्त किया, जो सूर्यके समान तेजस्वी तथा भयंकर पराक्रम एवं पुरुषार्थ करनेवाला है

अलभद् गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमौरसम् । भीमविक्रमकर्माणमादित्यसमतेजसम् ॥

Verse 51

पुत्रेण तेन प्रीतो5हं भरद्वाजो मया यथा । गोक्षीरं पिबतो दृष्टवा धनिनस्तत्र पुत्रकान्‌ अश्वत्थामारुदद्‌ बालस्तन्मे संदेहयद्‌ दिश:,उस पुत्रसे मुझे उतनी ही प्रसन्नता हुई, जितनी मुझसे मेरे पिता भरद्वाजको हुई थी। एक दिनकी बात है, गोधनके धनी ऋषिकुमार गायका दूध पी रहे थे। उन्हें देखकर मेरा छोटा बच्चा अश्वत्थामा भी बाल-स्वभावके कारण दूध पीनेके लिये मचल उठा और रोने लगा। इससे मेरी आँखोंके सामने अँधेरा छा गया--मुझे दिशाओंके पहचाननेमें भी संशय होने लगा

पुत्रेण तेन प्रीतोऽहं भरद्वाजो मया यथा । गोक्षीरं पिबतो दृष्ट्वा धनिनस्तत्र पुत्रकान् । अश्वत्थामारुदद् बालस्तन्मे संदेहयद्दिशः ॥

Verse 52

न सनातको<5वसीदेत वर्तमान: स्वकर्मसु । इति संचिन्त्य मनसा तं॑ देशं बहुशो भ्रमन्‌,मैंने मन-ही-मन सोचा, यदि मैं किसी कम गायवाले ब्राह्मणसे गाय माँगता हूँ तो कहीं ऐसा न हो कि वह अपने अग्निहोत्र आदि कर्मोंमें लगा हुआ स्नातक गोदुग्धके बिना कष्टमें पड़ जाय; अतः जिसके पास बहुत-सी गौएँ हों, उसीसे धर्मानुकूल विशुद्ध दान लेनेकी इच्छा रखकर मैंने उस देशमें कई बार भ्रमण किया। गंगानन्दन! एक देशसे दूसरे देशमें घूमनेपर भी मुझे दूध देनेवाली कोई गाय न मिल सकी

न सनातकोऽवसीदेत वर्तमानः स्वकर्मसु । इति संचिन्त्य मनसा तं देशं बहुशो भ्रमन् ॥

Verse 53

विशुद्धमिच्छन्‌ गाड़ेय धर्मोपेतं प्रतिग्रहम्‌ अन्तादन्तं परिक्रम्य नाध्यगच्छ॑ पयस्विनीम्‌,मैंने मन-ही-मन सोचा, यदि मैं किसी कम गायवाले ब्राह्मणसे गाय माँगता हूँ तो कहीं ऐसा न हो कि वह अपने अग्निहोत्र आदि कर्मोंमें लगा हुआ स्नातक गोदुग्धके बिना कष्टमें पड़ जाय; अतः जिसके पास बहुत-सी गौएँ हों, उसीसे धर्मानुकूल विशुद्ध दान लेनेकी इच्छा रखकर मैंने उस देशमें कई बार भ्रमण किया। गंगानन्दन! एक देशसे दूसरे देशमें घूमनेपर भी मुझे दूध देनेवाली कोई गाय न मिल सकी

विशुद्धमिच्छन् गाड़ेय धर्मोपेतं प्रतिग्रहम् । अन्तादन्तं परिक्रम्य नाध्यगच्छं पयस्विनीम् ॥

Verse 54

अथ पिष्टोदकेनैनं लोभयन्ति कुमारका: । पीत्वा पिष्टरसं बाल: क्षीरं॑ पीत॑ मयापि च,मैं लौटकर आया तो देखता हूँ कि छोटे-छोटे बालक आटेके पानीसे अभश्वत्थामाको ललचा रहे हैं और वह अज्ञानमोहित बालक उस आटेके जलको ही पीकर मारे हर्षके फ़ूला नहीं समाता तथा यह कहता हुआ उठकर नाच रहा है कि "मैंने दूध पी लिया'। कुरुनन्दन! बालकोंसे घिरे हुए अपने पुत्रको इस प्रकार नाचते और उसकी हँसी उड़ायी जाती देख मेरे मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उस समय कुछ लोग इस प्रकार कह रहे थे, 'इस धनहीन द्रोणको धिक्‍्कार है, जो धनका उपार्जन नहीं करता

अथ पिष्टोदकेनैनं लोभयन्ति कुमारकाः । पीत्वा पिष्टरसं बालः क्षीरं पीतमयापि च ॥

Verse 55

ननर्तोत्थाय कौरव्य हृष्टो बाल्याद्‌ विमोहित: । त॑ दृष्टवा नृत्यमानं तु बालै: परिवृतं सुतम्‌,मैं लौटकर आया तो देखता हूँ कि छोटे-छोटे बालक आटेके पानीसे अभश्वत्थामाको ललचा रहे हैं और वह अज्ञानमोहित बालक उस आटेके जलको ही पीकर मारे हर्षके फ़ूला नहीं समाता तथा यह कहता हुआ उठकर नाच रहा है कि "मैंने दूध पी लिया'। कुरुनन्दन! बालकोंसे घिरे हुए अपने पुत्रको इस प्रकार नाचते और उसकी हँसी उड़ायी जाती देख मेरे मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उस समय कुछ लोग इस प्रकार कह रहे थे, 'इस धनहीन द्रोणको धिक्‍्कार है, जो धनका उपार्जन नहीं करता

वैशम्पायन उवाच—कौरव्य, बाल्यविमोहितः स हृष्टः समुत्थाय ननर्त। तं सुतं बालैः परिवृतं नृत्यमानं दृष्ट्वा, तैश्च हास्यतां नीतं, मम हृदयं महता शोकविषादेन समाविष्टम्।

Verse 56

हास्यतामुपसम्प्राप्तं कश्मलं तत्र मे5भवत्‌ । द्रोणं धिगस्त्वधनिनं यो धनं नाधिगच्छति,मैं लौटकर आया तो देखता हूँ कि छोटे-छोटे बालक आटेके पानीसे अभश्वत्थामाको ललचा रहे हैं और वह अज्ञानमोहित बालक उस आटेके जलको ही पीकर मारे हर्षके फ़ूला नहीं समाता तथा यह कहता हुआ उठकर नाच रहा है कि "मैंने दूध पी लिया'। कुरुनन्दन! बालकोंसे घिरे हुए अपने पुत्रको इस प्रकार नाचते और उसकी हँसी उड़ायी जाती देख मेरे मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उस समय कुछ लोग इस प्रकार कह रहे थे, 'इस धनहीन द्रोणको धिक्‍्कार है, जो धनका उपार्जन नहीं करता

तत्र हास्यतामुपसम्प्राप्तं सुतं दृष्ट्वा मे कश्मलं समभवत्। केचिदपि तत्रैवं वदन्ति स्म—“धिग् द्रोणम् अधनिनं, यो धनं नाधिगच्छति।”

Verse 57

पिष्टोदक॑ सुतो यस्य पीत्वा क्षीरस्य तृष्णया । नृत्यति सम मुदाविष्ट: क्षीरं पीत॑ मयाप्युत

पिष्टोदकसुतो यस्य पीत्वा क्षीरं तृष्णया । नृत्यति समुदाविष्टः “क्षीरं पीतं मयाप्युत” ॥

Verse 58

इति सम्भाषतां वाचं श्रुत्वा मे बुद्धिरच्यवत्‌ । आत्मानं चात्मना गर्हन्‌ मनसेदं व्यचिन्तयम्‌

इति सम्भाषतां वाचं श्रुत्वा मे बुद्धिरच्यवत् । आत्मानं चात्मना गर्हन् मनसेदं व्यचिन्तयम् ॥

Verse 59

अपि चाह ं पुरा विप्रैर्वर्जितो गर्हितो वसे । परोपसेवां पापिष्ठां न च कुर्या धनेप्सया

अपि चाहं पुरा विप्रैर्वर्जितो गर्हितो वसे । परोपसेवां पापिष्ठां न च कुर्या धनेप्सया ॥

Verse 60

“जिसका बेटा दूधकी लालसासे आटा मिला हुआ जल पीकर आनन्दमग्न हो यह कहता हुआ नाच रहा है कि “मैंने भी दूध पी लिया।” इस प्रकारकी बातें करनेवाले लोगोंकी आवाज मेरे कानोंमें पड़ी तो मेरी बुद्धि स्थिर न रह सकी। मैं स्वयं ही अपने-आपकी निन्दा करता हुआ मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगा--“मुझे दरिद्र जानकर पहलेसे ही ब्राह्मणोंने मेरा साथ छोड़ दिया। मैं धनाभावके कारण निन्दित होकर उपवास भले ही कर लूँगा, परंतु धनके लोभसे दूसरोंकी सेवा, जो अत्यन्त पापपूर्ण कर्म है, कदापि नहीं कर सकता” || ५७ “7५९ || इति मत्वा प्रियं पुत्र भीष्मादाय ततो हाहम्‌ । पूर्वस्नेहानुरागित्वात्‌ू सदार: सौमकि गत:,भीष्मजी! ऐसा निश्चय करके मैं अपने प्रिय पुत्र और पत्नीको साथ लेकर पहलेके स्नेह और अनुरागके कारण राजा ट्रुपदके यहाँ गया

इति मत्वा प्रियं पुत्रं भीष्ममादाय ततोऽहम् । पूर्वस्नेहानुरागित्वात् सदारः सौमकिं गतः ॥ दरिद्रत्वेन निन्दितोऽहं क्षुधितोऽपि व्रतं चरेयम्; धनलोभात् परसेवा तु महापापेति मे मतिः ॥

Verse 61

अभिफषिक्तं तु श्र॒ुत्वैव कृतार्थो5स्मीति चिन्तयन्‌ । प्रियं सखायं सुप्रीतो राज्यस्थं समुपागमम्‌,मैंने सुन रखा था कि ट्रुपदका राज्याभिषेक हो चुका है, अतः मैं मन-ही-मन अपनेको कृतार्थ मानने लगा और बड़ी प्रसन्नताके साथ राज्यसिंहासनपर बैठे हुए अपने प्रिय सखाके समीप गया

अभिषिक्तं तु श्रुत्वैव कृतार्थोऽस्मीति चिन्तयन् । प्रियं सखायं सुप्रीतो राज्यस्थं समुपागमम् ॥

Verse 62

संस्मरन्‌ संगमं चैव वचन चैव तस्य तत्‌ | ततो द्रुपदमागम्य सखिपूर्वमहं प्रभो,उस समय मुझे द्रुपदकी मैत्री और उनकी कही हुई पूर्वोक्त बातोंका बारंबार स्मरण हो आता था। तदनन्तर अपने पहलेके सखा द्रुपदके पास पहुँचकर मैंने कहा--“नरश्रेष्ठ! मुझ अपने मित्रको पहचानो तो सही।' प्रभो! मैं ट्रपदके पास पहुँचनेपर उनसे मित्रकी ही भाँति मिला

संस्मरन् संगमं चैव वचनं चैव तस्य तत् । ततो द्रुपदमागम्य सखिपूर्वमहं प्रभो ॥

Verse 63

अब्रुवं पुरुषव्यात्र सखायं विद्धि मामिति । उपस्थितस्तु द्रुपदं सखिवच्चास्मि संगत:,उस समय मुझे द्रुपदकी मैत्री और उनकी कही हुई पूर्वोक्त बातोंका बारंबार स्मरण हो आता था। तदनन्तर अपने पहलेके सखा द्रुपदके पास पहुँचकर मैंने कहा--“नरश्रेष्ठ! मुझ अपने मित्रको पहचानो तो सही।' प्रभो! मैं ट्रपदके पास पहुँचनेपर उनसे मित्रकी ही भाँति मिला

अब्रुवं पुरुषव्याघ्र सखायं विद्धि मामिति । उपस्थितस्तु द्रुपदं सखिवच्चास्मि संगतः ॥

Verse 64

स मां निराकारमिव प्रहसन्निदमब्रवीत्‌ | अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मनू नातिसमञज्जसा,परंतु द्रपदने मुझे नीच मनुष्यके समान समझकर उपहास करते हुए इस प्रकार कहा --ब्राह्मण! तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त असंगत एवं अशुद्ध है

स मां निराकारमिव प्रहसन्निदमब्रवीत् । अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्राह्मन् नातिसमञ्जसा ॥

Verse 65

यदात्थ मां त्वं प्रसभं सखा ते5हमिति द्विज । संगतानीह जीर्यन्ति कालेन परिजीर्यत:,“तभी तो तुम मुझसे यह कहनेकी धृष्टता कर रहे हो कि “राजन! मैं तुम्हारा सखा हूँ!” समयके अनुसार मनुष्य ज्यों-ज्यों बूढ़ा होता है, त्यों-त्यों उसकी मैत्री भी क्षीण होती चली जाती है

यदात्थ मां त्वं प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज । संगतानीह जीर्यन्ति कालेन परिजीर्यतः ॥

Verse 66

सौद्दं मे त्वया हयासीत्‌ पूर्व सामर्थ्यबन्धनम्‌ । नाक्रोत्रिय: श्रोत्रियस्थ नारथी रथिन: सखा,“पहले तुम्हारे साथ मेरी जो मित्रता थी, वह सामर्थ्यको लेकर थी--उस समय हम दोनोंकी शक्ति समान थी (किंतु अब वैसी बात नहीं है)। जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय (वेदवेत्ता)-का, जो रथी नहीं है, वह रथीका सखा नहीं हो सकता

सौहृदं मे त्वया ह्यासीद् पूर्वं सामर्थ्यबन्धनम् । नाक्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा ॥

Verse 67

साम्याद्धि सख्यं भवति वैषम्यात्रोपपद्यते | न सख्यमजरं लोके विद्यते जातु कस्यचित्‌,सब बातोंमें समानता होनेसे ही मित्रता होती है। विषमता होनेपर मैत्रीका होना असम्भव है। फिर लोकमें कभी किसीकी मैत्री अजर-अमर नहीं होती

साम्याद्धि सख्यं भवति वैषम्यात्र नोपपद्यते । न सख्यमजरं लोके विद्यते जातु कस्यचित् ॥

Verse 68

कालो वैनं विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत । मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सत्यं भवत्वपाकृधि,“समय एक मित्रको दूसरेसे विलग कर देता है अथवा क्रोध मनुष्यको मित्रतासे हटा देता है। इस प्रकार क्षीण होनेवाली मैत्रीकी उपासना (भरोसा) न करो। हम दोनों एक- दूसरेके मित्र थे, इस भावको हृदयसे निकाल दो”

कालो वैनं विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत । मा एवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सत्यं भवत्वपाकृधि ॥

Verse 69

आसीत्‌ सख्य॑ द्विजश्रेष्ठ त्वया मे5र्थनिबन्धनम्‌ । न हानाढ्य: सखाढ्यस्य नाविद्वान्‌ विदुष: सखा,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्‌का, मूर्ख विद्वान्‌कां और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्‍यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है

आसीत् सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम् । न हानाढ्यः सखाढ्यस्य नाविद्वान् विदुषः सखा ॥

Verse 70

न शूरस्य सखा क्लीब: सखिपूर्व किमिष्यते । न हि राज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरै: क्वचित्‌,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्‌का, मूर्ख विद्वान्‌कां और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्‍यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है

वैशम्पायन उवाच— न शूरस्य सखा क्लीबः; सखिपूर्वं किमिष्यते? न हि राज्ञामुदीर्णानामेवंभूतैर्नरैः क्वचित्, द्विजश्रेष्ठ। यत् त्वया स्मार्यते सख्यं, तत् पूर्वं केवलं स्वार्थसङ्गतमेव; न तदद्य धर्मतोऽधिगम्यते। अश्रोत्रियो न श्रोत्रियस्य, नारथी रथिनः, नाराजाऽपि राज्ञः सखा भवितुमर्हति। अतः जीर्णां सख्यस्मृतिं मां किमर्थं स्मारयसि?

Verse 71

सख्यं भवति मन्दात्मन्‌ श्रियाहीनैर्धनच्युतै: । नाश्रोत्रिय: श्रोत्रियस्थ नारथी रथिन: सखा,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्‌का, मूर्ख विद्वान्‌कां और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्‍यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है

वैशम्पायन उवाच— सख्यं न भवति मन्दात्मन् श्रियाहीनैर्धनच्युतैः। नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य, नारथी रथिनः सखा, द्विजश्रेष्ठ। जीर्णं सख्यं पुरा जातं न समं धार्यते पुनः; असमानस्थितौ सख्यं न स्थिरं भवति कर्हिचित्।

Verse 72

नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिष्यते । अहं त्वया न जानामि राज्यार्थे संविदं कृताम्‌,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्‌का, मूर्ख विद्वान्‌कां और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्‍यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है

वैशम्पायन उवाच— नाराजा पार्थिवस्यापि सखा; सखिपूर्वं किमिष्यते? अहं त्वया न जानामि राज्यार्थे संविदं कृताम्, द्विजश्रेष्ठ। दरिद्रो न धनिनः सखा, मूढो न पण्डितस्य, क्लीबो न शूरस्य; कथं नु महान्तो राजानो भवद्विधैः श्रीहीनैर्धनहीनैश्च सख्यं कुर्युः? नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य, नारथी रथिनः, नाराजाऽपि राज्ञः सखा। जीर्णां सख्यस्मृतिं मां किमर्थं स्मारयसि? राज्यार्थे त्वया सह मया काचित् प्रतिज्ञा कृताऽसीदिति मे न स्मर्यते।

Verse 73

एकरात्र तु ते ब्रह्मन्‌ काम॑ दास्यामि भोजनम्‌ | एवमुक्तस्त्वहं तेन सदार: प्रस्थितस्तदा,“ब्रह्मन! तुम्हारी इच्छा हो तो मैं तुम्हें एक रातके लिये अच्छी तरह भोजन दे सकता ' राजा ट्रुपदके यों कहनेपर मैं पत्नी और पुत्रके साथ वहाँसे चल दिया

वैशम्पायन उवाच— “एकरात्रं तु ते ब्रह्मन् कामं दास्यामि भोजनम्।” एवमुक्तस्त्वहं तेन सदारः सुतसंयुतः प्रस्थितस्तदा, तस्यातिथिधर्मं प्रतिगृह्य।

Verse 74

तां प्रतिज्ञां प्रतिज्ञाय यां कर्तास्म्यचिरादिव । द्रुपदेनैवमुक्तो5हं मनन्‍्युनाभिपरिप्लुत:,चलते समय मैंने एक प्रतिज्ञा की थी, जिसे शीघ्र पूर्ण करूँगा। ट्रुपदके द्वारा जो इस प्रकार तिरस्कारपूर्ण वचन मेरे प्रति कहा गया है, उसके कारण मैं क्षोभसे अत्यन्त व्याकुल हो रहा हूँ

तां प्रतिज्ञां प्रतिज्ञाय यां कर्तास्म्यचिरादिव, द्रुपदेनैवमुक्तोऽहं मन्युना परिप्लुतः। तस्य तिरस्कारवचनस्य दंशेन क्षोभेण चाभिभूयमानः, प्रतिकाराय मे निश्चयः सुदृढोऽभवत्।

Verse 75

अभ्यागच्छ॑ कुरून्‌ भीष्म शिष्यैरर्थी गुणान्वितै: । ततो<हं भवतः काम॑ संवर्धयितुमागत:

अभ्यागच्छ कुरून् भीष्म शिष्यैरर्थी गुणान्वितैः । ततोऽहं भवतः कामं संवर्धयितुमागतः ॥

Verse 76

हूँ वैशग्पायन उवाच एवमुक्तस्तदा भीष्मो भारद्वाजमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--द्रोणाचार्यके यों कहनेपर भीष्मने उनसे कहा

वैशम्पायन उवाच । एवमुक्तस्तदा भीष्मो भारद्वाजमभाषत ॥

Verse 77

भीष्म उवाच अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय । भुड्क्ष्य भोगान्‌ भृशं प्रीत: पूज्यमान: कुरुक्षये,भीष्मजी बोले--विप्रवर! अब आप अपने धनुषकी डोरी उतार दीजिये और यहाँ रहकर राजकुमारोंको धरनुर्वेद एवं अस्त्र-शस्त्रोंकी अच्छी शिक्षा दीजिये। कौरवोंके घरमें सदा सम्मानित रहकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ मनोवांछित भोगोंका उपभोग कीजिये

भीष्म उवाच । अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय । भुङ्क्ष्व भोगान् भृशं प्रीतः पूज्यमानः कुरुक्षये ॥

Verse 78

कुरूणामस्ति यद्‌ वित्तं राज्यं चेद॑ सराष्ट्रकम्‌ । त्वमेव परमो राजा सर्वे च कुरवस्तव,कौरवोंके पास जो धन, राज्य-वैभव तथा राष्ट्र है, उसके आप ही सबसे बड़े राजा हैं। समस्त कौरव आपके अधीन हैं

कुरूणामस्ति यद् वित्तं राज्यं चेदं सराष्ट्रकम् । त्वमेव परमो राजा सर्वे च कुरवस्तव ॥

Verse 79

यच्च ते प्रार्थितं ब्रह्मन्‌ कृतं तदिति चिन्त्यताम्‌ । दिष्ट्या प्राप्तोडसि विप्रर्षे महान्‌ मेडनुग्रह: कृत:,ब्रह्म! आपने जो माँग की है, उसे पूर्ण हुई समझिये। ब्रह्मर्ष] आप आये, यह हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है। आपने यहाँ पधारकर मुझपर महान्‌ अनुग्रह किया है

यच्च ते प्रार्थितं ब्रह्मन् कृतं तदिति चिन्त्यताम् । दिष्ट्या प्राप्तोऽसि विप्रर्षे महान् मेऽनुग्रहः कृतः ॥

Verse 129

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपव॑के अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र- विद्याकी प्राप्तिविषयक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणस्य परशुरामात् अस्त्रविद्याप्राप्तिवर्णने एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः समाप्तः।

Verse 130

इति श्रीमहा भारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मद्रोणसमागमे त्रिंशयधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपव॑के अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्य-द्रोण-समागमविषयक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मद्रोणसमागमे त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः समाप्तः।

Verse 231

ते तं दृष्टवा महात्मानमुपगम्य कुमारका: । भग्नोत्साहक्रियात्मानो ब्राह्मुणं पर्यवारयन्‌

ते तं दृष्ट्वा महात्मानमुपगम्य कुमारकाः । भग्नोत्साहक्रियात्मानो ब्राह्मणं पर्यवारयन् ॥

Verse 253

ततोअब्रवीत्‌ तदा द्रोणं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । उस समय कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने द्रोणसे कहा

ततोऽब्रवीत्तदा द्रोणं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।

Verse 263

एवमुक्त: प्रत्युवाच प्रहस्य भरतानिदम्‌ | युधिष्ठिर बोले--ब्रह्मन! आप कृपाचार्यकी अनुमति ले सदा यहीं रहकर भिक्षा प्राप्त करें। उनके यों कहनेपर द्रोणने हँसकर उन भरतवंशी राजकुमारोंसे कहा

एवमुक्तः प्रत्युवाच प्रहस्य भरतानिदम् ।

Verse 283

तामन्यया समायोगे वीटाया ग्रहणं मम । इसी प्रकार दूसरीको तीसरीसे बींधते हुए अनेक सींकोंका संयोग होनेपर मुझे गुल्ली मिल जायगी

तामन्यया समायोगे वीटाया ग्रहणं मम ।

Verse 753

इदं नागपुर रम्यं ब्रूहि किं करवाणि ते । भीष्मजी! मैं गुणवान्‌ शिष्योंके द्वारा अपने अभीष्टकी सिद्धि चाहता हुआ आपके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये पंचालदेशसे कुरुराज्यके भीतर इस रमणीय हस्तिनापुर नगरमें आया हूँ। बताइये, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?

इदं नागपुर रम्यं ब्रूहि किं करवाणि ते ।

Verse 3436

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्ततो द्रोण: प्रत्युवाच कुमारकान्‌ । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुमारोंके इस प्रकार पूछनेपर द्रोणने उनसे कहा

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्ततो द्रोणः प्रत्युवाच कुमारकान् ।

Verse 3536

स एव सुमहातेजा: साम्प्रतं प्रतिपत्स्यते । द्रोण बोले--तुम सब लोग भीष्मजीके पास जाकर मेरे रूप और गुणोंका परिचय दो। वे महातेजस्वी भीष्मजी ही मुझे इस समय पहचान सकते हैं

स एव सुमहातेजाः साम्प्रतं प्रतिपत्स्यते ।

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira faces the tension between obedience to the reigning authority and prudent self-protection; he recognizes strategic risk but chooses formal compliance due to limited institutional support.

The chapter illustrates dharma in governance as situational: ethical action may require restraint and procedural correctness even when motives around a directive appear ambiguous or politically charged.

No explicit phalaśruti is stated here; the passage functions as narrative causality, emphasizing how ritual propriety, public messaging, and courtly consent can advance consequential political outcomes.