Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
स मे तत्र सखा चासीदुपकारी प्रियश्न मे । तेनाहं सह संगम्य वर्तयन् सुचिरं प्रभो,वे उस गुरुकुलमें मेरे बड़े ही उपकारी और प्रिय मित्र थे। प्रभो! उनके साथ मिल- जुलकर मैं बहुत दिनोंतक आश्रममें रहा
sa me tatra sakhā cāsīd upakārī priyaś ca me | tenāhaṃ saha saṅgamya vartayan suciraṃ prabho ||
स मे तत्र सखा चासीदुपकारी प्रियश्च मे। तेनाहं सह संगम्य वर्तयन् सुचिरं प्रभो॥
वैशम्पायन उवाच