Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
यदात्थ मां त्वं प्रसभं सखा ते5हमिति द्विज । संगतानीह जीर्यन्ति कालेन परिजीर्यत:,“तभी तो तुम मुझसे यह कहनेकी धृष्टता कर रहे हो कि “राजन! मैं तुम्हारा सखा हूँ!” समयके अनुसार मनुष्य ज्यों-ज्यों बूढ़ा होता है, त्यों-त्यों उसकी मैत्री भी क्षीण होती चली जाती है
यदात्थ मां त्वं प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज । संगतानीह जीर्यन्ति कालेन परिजीर्यतः ॥
वैशम्पायन उवाच