Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
कुमारा ऊचु. मुद्रिकामपि विप्रर्षे शीघ्रमेतां समुद्धर । कुमारोंने कहा--ब्रह्मर्ष! अब आप शीघ्र ही इस अँगूठीको भी निकाल दीजिये ।। ३० १ कल वैशम्पायन उवाच ततः शरं समादाय भरनुद्रोणो महायशा:,वैशम्पायनजी कहते हैं--तब महायशस्वी द्रोणने धनुष-बाण लेकर बाणसे उस अँगूठीको बींध दिया और उसे ऊपर निकाल लिया। शक्तिशाली द्रोणने इस प्रकार कुएँसे बाणसहित अँगूठी निकालकर उन आश्वर्यचकित कुमारोंके हाथमें दे दी; किंतु वे स्वयं तनिक भी विस्मित नहीं हुए। उस अँगूठीको कुएँसे निकाली हुई देखकर उन कुमारोंने द्रोणसे कहा
kumāra ūcuḥ | mudrikām api viprarṣe śīghram etāṃ samuddhara | vaiśampāyana uvāca | tataḥ śaraṃ samādāya dhanur droṇo mahāyaśāḥ | śareṇa mudrikāṃ viddhvā tām ūrdhvaṃ samuddhṛtavān |
कुमारा ऊचुः । मुद्रिकामपि विप्रर्षे शीघ्रमेतां समुद्धर ॥
वैशम्पायन उवाच