Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
संस्मरन् संगमं चैव वचन चैव तस्य तत् | ततो द्रुपदमागम्य सखिपूर्वमहं प्रभो,उस समय मुझे द्रुपदकी मैत्री और उनकी कही हुई पूर्वोक्त बातोंका बारंबार स्मरण हो आता था। तदनन्तर अपने पहलेके सखा द्रुपदके पास पहुँचकर मैंने कहा--“नरश्रेष्ठ! मुझ अपने मित्रको पहचानो तो सही।' प्रभो! मैं ट्रपदके पास पहुँचनेपर उनसे मित्रकी ही भाँति मिला
saṃsmaran saṅgamaṃ caiva vacanaṃ caiva tasya tat | tato drupadam āgamya sakhipūrvam ahaṃ prabho |
संस्मरन् संगमं चैव वचनं चैव तस्य तत् । ततो द्रुपदमागम्य सखिपूर्वमहं प्रभो ॥
वैशम्पायन उवाच