
Ādi-parva Adhyāya 3 — Janamejaya’s Rite, Dhaumya’s Parīkṣā, and Uttanka’s Kuṇḍala Quest (सर्पसत्रप्रस्तावना–गुरुपरीक्षा–उत्तङ्कोपाख्यान)
Upa-parva: Pauloma–Āstīka / Sarpa-satra Prastāvanā (Frame Episodes)
The chapter opens with Sūta describing King Janamejaya performing a prolonged sacrificial observance at Kurukṣetra with his brothers. A dog (Saramā’s son) is struck by the brothers; Saramā confronts the king and warns of an unseen fear, prompting Janamejaya to seek a priest to pacify wrongdoing. The narrative then shifts to exempla of discipleship under Ṛṣi Āyoda-Dhaumya: Āruṇi (later named Uddālaka) blocks a breached field bund by placing his body in the gap, earning blessing and learning; Upamanyu, tasked with guarding cows, is progressively restricted from food sources (alms, second-round alms, milk, foam), becomes blinded after eating arka leaves, falls into a well, praises the Aśvins, and is restored—his integrity affirmed by refusing to eat without informing his guru. Veda, another disciple, gains excellence through long, patient service. The chapter then narrates Uttanka’s service under Veda: he refuses an improper request during the teacher’s absence, later seeks guru-dakṣiṇā, and is directed to obtain Queen’s kuṇḍalas from King Pauṣya. Takṣaka attempts to seize the ornaments; Uttanka follows into Nāga-loka, encounters symbolic cosmic imagery (weaving women, wheel, person, horse), receives aid, retrieves the kuṇḍalas in time, and returns. Finally, Uttanka reaches Hastināpura, informs Janamejaya that Takṣaka killed Parīkṣit, and urges a serpent-sacrifice as a lawful retaliatory rite, inflaming the king’s resolve.
Chapter Arc: जनमेजय के बाल-हृदय में चोट की आग धधकती है—भाइयों से पिटकर वह रोता हुआ माँ के पास आता है, और माँ का प्रश्न कथा के द्वार पर पहली कुंडी बनता है: “किसने मारा?” → उसी धारा में कथा गुरु-शिष्य परंपरा की ओर मुड़ती है—धौम्य के आश्रम में शिष्य-धर्म की कठोर परीक्षा, आरुणि का आदेश-पालन और फिर उपमन्यु तथा उत्तंक का प्रवेश। उत्तंक गुरु-आज्ञा के पालन में आश्रम-जीवन अपनाता है; आश्रम की स्त्रियाँ उसे बुलाती हैं, और कर्तव्य तथा प्रलोभन/दबाव के बीच उसकी परीक्षा का संकेत उभरता है। आगे पौष्य के साथ संवाद में क्रोध, शाप और असंयम की छाया पड़ती है—‘मन्यु’ अभी शांत नहीं हुआ, यह वाक्य कथा को काँटों-भरी भूमि जैसा बना देता है। → उत्तंक के निकट जनमेजय अपने पिता की स्वर्गगति का वृत्तांत सुनकर शोक में डूब जाता है—राजा का हृदय-विदारण क्षण, जहाँ निजी दुःख राजधर्म के निर्णयों पर भारी पड़ने लगता है। साथ ही उत्तंक के दर्शन-रूपक (द्वादशार चक्र, उसे घुमाते छह कुमार, रहस्यमय पुरुष और अश्व) समय-चक्र और नियति का विराट संकेत बनकर कथा को दार्शनिक ऊँचाई पर पहुँचा देता है। → अध्याय का अंत किसी युद्ध-निर्णय पर नहीं, बल्कि बीज-रोपण पर टिकता है—गुरु-भक्ति, शाप-क्रोध की असंयत शक्ति, और राजा के शोक से जन्म लेने वाली प्रतिशोध-प्रवृत्ति। चक्र-रूपक यह भी कहता है कि घटनाएँ केवल व्यक्ति-इच्छा से नहीं, काल के घूमते पहिये से संचालित हैं। → जनमेजय का शोक किस दिशा में बदलेगा—धैर्य और धर्म में, या प्रतिशोध और विनाश में? उत्तंक के रहस्य-दर्शन का अर्थ खुलने को अभी शेष है।
Verse 1
८-52 अर अं ४-4 ३. अधिक नीचा-ऊँचा होना
Sauti disse: Janamejaya, filho de Parikshit, realizava em Kurukshetra uma longa sessão sacrificial juntamente com seus irmãos. Ele tinha três irmãos—Shrutasena, Ugrasena e Bhimasena. Enquanto estavam sentados e empenhados naquele rito, Sārameya, filho de Saramā—a cadela divina—chegou ali.
Verse 2
इस प्रकार श्रीमह्माभारत आदिपर्वके अन्तर्गत पर्वसंग्रहपर्वमें दूसरा अध्याय पूरा हुआ
Atingido pelos irmãos de Janamejaya, o cão—choramingando e a ganir—foi até sua mãe em busca de refúgio.
Verse 3
त॑ माता रोरूयमाणमुवाच । कि रोदिषि केनास्यभिहत इति,बार-बार रोते हुए अपने उस पुत्रसे माताने पूछा--“बेटा! क्यों रोता है? किसने तुझे मारा है?' इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि पौष्यपर्वणि तृतीयो5ध्याय:
Vendo-o chorar repetidas vezes, sua mãe disse: “Meu filho, por que choras? Por quem foste golpeado?”
Verse 4
स एवमुक्तो मातरं प्रत्युवाच जनमेजयस्य भ्रातृभिरभिहतोडस्मीति,माताके इस प्रकार पूछनेपर उसने उत्तर दिया--'माँ! मुझे जनमेजयके भाइयोंने मारा है!
Assim interpelado, respondeu à mãe: “Mãe, fui golpeado pelos irmãos de Janamejaya.”
Verse 5
त॑ माता प्रत्युवाच व्यक्त त्वया तत्रापराद्धं येनास्यभिहत इति,तब माता उससे बोली--“बेटा! अवश्य ही तूने उनका कोई प्रकटरूपमें अपराध किया होगा, जिसके कारण उन्होंने तुझे मारा है”
Então a mãe respondeu: “Meu filho, certamente cometeste ali alguma falta evidente; por isso te golpearam.”
Verse 6
स तां पुनरुवाच नापराध्यामि किंचिचन्नावेक्षे हवींषि नावलिह इति,तब उसने मातासे पुनः इस प्रकार कहा--“मैंने कोई अपराध नहीं किया है। न तो उनके हविष्यकी ओर देखा और न उसे चाटा ही है”
Ele tornou a dizer à mãe: “Não cometi falta alguma. Não olhei para as oblações do sacrifício (havisya), nem as lambi.”
Verse 7
तच्छुत्वा तस्य माता सरमा पुत्रदुःखार्ता तत् सत्रमुपागच्छद् यत्र स जनमेजय: सह भ्रातृभिदर्दीर्घ-सत्रमुपास्ते
Ao ouvir isso, sua mãe Saramā, tomada pela dor do sofrimento do filho, foi à sessão sacrificial (satra), onde Janamejaya, com seus irmãos, realizava um prolongado sacrifício de soma.
Verse 8
स तया क्ुद्धया तत्रोक्तो<यं मे पुत्रो न किंचिदपराध्यति नावेक्षते हवींषि नावलेढि किमर्थमभिहत इति
Então Saramā, inflamada de ira, falou ali: «Este meu filho não cometeu ofensa alguma contra vós. Não olhou para as oblações do sacrifício, nem as lambeu. Por que razão, então, foi golpeado?»
Verse 9
न किज्चिदुक्तवन्तस्ते सा तानुवाच यस्मादयमभिहतो5नपकारी तस्मादद्ष्टं त्वां भयमागमिष्यतीति
Eles nada responderam. Então Saramā lhes disse: «Porque feristes aquele que não fez mal, um temor imprevisto virá sobre vós.»
Verse 10
जनमेजय एवमुक्तो देवशुन्या सरमया भृशं सम्भ्रान्तो विषण्णश्वासीत्,देवताओंकी कुतिया सरमाके इस प्रकार शाप देनेपर जनमेजयको बड़ी घबराहट हुई और वे बहुत दुःखी हो गये
Quando Janamejaya foi assim interpelado por Saramā —a cadela divina—, ficou grandemente alarmado e caiu em profunda tristeza.
Verse 11
स तस्मिन् सत्रे समाप्ते हास्तिनपुरं प्रत्येत्य पुरोहितमनुरूपमन्विच्छमान: परं यत्नमकरोदू यो मे पापकृत्यां शमयेदिति
Quando aquela sessão sacrificial terminou, ele voltou a Hāstinapura e empenhou-se ao máximo em buscar um sacerdote adequado, com o propósito: «Quem poderá apaziguar a consequência pecaminosa —como uma maldição— que eu contraí?»
Verse 12
स कदाचिन्मृगयां गतः पारीक्षितों जनमेजय: कम्मिंश्वित्ु स्वविषय आश्रममपश्यत्
Certa vez, Janamejaya —filho de Parīkṣit— saiu para caçar. Enquanto vagava dentro do seu próprio domínio, avistou um eremitério, existente numa região do seu reino.
Verse 13
तत्र कश्चिदृषिरासांचक्रे श्रुतश्रवा नाम | तस्य तपस्यभिरत: पुत्र आस्ते सोमश्रवा नाम
Ali, um sábio chamado Śrutaśravā havia estabelecido o seu eremitério. Tinha um filho chamado Somaśravā, que permanecia constantemente devotado às austeridades e à prática espiritual disciplinada.
Verse 14
तस्य तं॑ पुत्रमभिगम्य जनमेजय: पारीक्षित: पौरोहित्याय वत्रे,परीक्षितकुमार जनमेजयने महर्षि श्रुतश्रवाके पास जाकर उनके पुत्र सोमश्रवाका पुरोहितपदके लिये वरण किया
Aproximando-se do filho do sábio, o rei Janamejaya, filho de Parikshit, escolheu-o para servir como seu sacerdote real. Assim, Janamejaya foi ao grande vidente Śrutaśravā e nomeou seu filho Somaśravā para o ofício de purohita.
Verse 15
स नमस्कृत्य तमृषिमुवाच भगवन्नयं तव पुत्रो मम पुरोहितो$स्त्विति,राजाने पहले महर्षिको नमस्कार करके कहा--“भगवन्! आपके ये पुत्र सोमश्रवा मेरे पुरोहित हों!
Depois de se curvar respeitosamente diante daquele sábio, o rei disse: “Venerável senhor, que este teu filho seja o meu sacerdote de família.”
Verse 16
स एवमुक्त: प्रत्युवाच जनमेजयं भो जनमेजय पुत्रो5यं मम सर्प्या जातो महातपस्वी स्वाध्याय-सम्पन्नो मत्तपोवीर्यसम्भूतो मच्छुक्रे पीतवत्यास्तस्या: कुक्षौ जात:
Assim interpelado, respondeu a Janamejaya: “Ó Janamejaya, este filho meu nasceu de uma serpente fêmea. É um grande asceta, consumado no estudo sagrado, e foi gerado pela potência das minhas austeridades. Certa vez uma serpente fêmea bebeu o meu sêmen; por isso ele nasceu em seu ventre.”
Verse 17
समर्थो5यं भवत: सर्वा: पापकृत्या: शमयितु-मन्तरेण महादेवकृत्याम्,यह तुम्हारी सम्पूर्ण पापकृत्याओं (शापजनित उपद्रवों)-का निवारण करनेमें समर्थ है। केवल भगवान् शंकरकी कृत्याको यह नहीं टाल सकता
Disse o rei: “Este é capaz de apaziguar todos os atos nocivos nascidos do pecado que te afligem—os males oriundos de maldições—exceto a kṛtyā destrutiva posta em movimento por Mahādeva. Pode afastar qualquer outra calamidade desse tipo, mas não pode evitar o que foi feito por Śaṅkara.”
Verse 18
अस्य त्वेकमुपांशुब्रतं यदेनं कश्रिद् ब्राह्मण: कंचिदर्थमभियाचेत् तं तस्मै दद्यादयं यद्येतदुत्सहसे ततो नयस्वैनमिति
Rama disse: “Este possui um único voto, não declarado: se algum brâmane vier a ele e lhe pedir algum objeto ou auxílio, ele certamente dará ao suplicante aquilo que deseja. Se és capaz de suportar—e ainda apoiar ativamente—essa obrigação generosa, então leva-o contigo.”
Verse 19
तेनैवमुक्तो जनमेजयस्तं प्रत्युवाच भगवंस्तत् तथा भविष्यतीति,श्रुतश्रवाके ऐसा कहनेपर जनमेजयने उत्तर दिया--“भगवन्! सब कुछ उनकी रुचिके अनुसार ही होगा”
Assim interpelado, o rei Janamejaya respondeu: “Venerável senhor, assim será de fato; tudo seguirá conforme a tua intenção.”
Verse 20
स त॑ पुरोहितमुपादायोपावृत्तों भ्रातूनुवाच मयायं वृत उपाध्यायो यदयं ब्रूयात् तत् कार्यमविचारयद्/िर्भवद्धिरिति । तेनैवमुक्ता भ्रातरस्तस्य तथा चक्कु: | स तथा भ्रातृन् संदिश्य तक्षशिलां प्रत्यभिप्रतस्थे त॑ च देशं वशे स्थापयामास
Então, levando consigo o sacerdote da família, voltou-se e disse aos irmãos: “Nomeei este homem como nosso preceptor. Tudo o que ele ordenar deve ser cumprido por vós sem hesitação nem contestação.” Assim instruídos, os irmãos obedeceram com exatidão às determinações do sacerdote. E o rei Janamejaya, depois de lhes dar tais ordens, partiu para Takṣaśilā, marchou contra ela e trouxe aquela região sob o seu domínio.
Verse 21
एतस्मिन्नन्तरे कश्चिदृषिर्धोम्यो नामायोदस्तस्य शिष्यास्त्रयो बभूवुरुपमन्युरारुणिवेंदश्वेति
Entretanto, vivia um rishi chamado Dhaumya, célebre como Ayoda. Tinha três discípulos—Upamanyu, Āruṇi e Vedaśva. (Aqui começa o episódio que ilustra como um discípulo deve cumprir a ordem do guru.)
Verse 22
स एकं शिष्यमारुणिं पाज्चाल्यं प्रेषयामास गच्छ केदारखण्डं बधानेति,एक दिन उपाध्यायने अपने एक शिष्य पांचालदेशवासी आरुणिको खेतपर भेजा और कहा--“वत्स! जाओ, क्यारियोंकी टूटी हुई मेड़ बाँध दो”
Certo dia, ele enviou um único discípulo—Āruṇi, do país de Pāñcāla—dizendo: “Vai e repara o dique rompido dos talhões do campo.”
Verse 23
स॒उपाध्यायेन संदिष्ट आरुणि: पाज्चाल्यस्तत्र गत्वा तत् केदारखण्डं बद्धूं नाशकत् | स क्लिश्यमानोडपश्यदुपायं भवत्वेवं करिष्यामि
Por ordem de seu mestre, Āruṇi, o jovem da terra dos Pāñcālas, foi até lá para amarrar e reforçar o dique do talhão de arroz, mas não conseguiu firmá-lo. Enquanto lutava e se extenuava na tentativa, de súbito percebeu um meio de cumprir a tarefa e decidiu no íntimo: “Assim seja — é isto que farei.”
Verse 24
स तत्र संविवेश केदारखण्डे शयाने च तथा तस्मिंस्तदुदकं तस्थौ,वह क्यारीकी टूटी हुई मेड़की जगह स्वयं ही लेट गया। उसके लेट जानेपर वहाँका बहता हुआ जल रुक गया
Então ele se deitou ali mesmo, na abertura do dique do campo; e, assim que se deitou naquele ponto, a água que ali corria deteve-se.
Verse 25
ततः कदाचिदुपाध्याय आयोदो धौम्य: शिष्यानपृच्छत् क्व आरुणि: पाज्चाल्यो गत इति,फिर कुछ कालके पश्चात् उपाध्याय आयोदधौम्यने अपने शिष्योंसे पूछा --'पांचालनिवासी आरुणि कहाँ चला गया?”
Então, algum tempo depois, o preceptor Ayoda Dhaumya perguntou a seus discípulos: “Para onde foi Āruṇi, o jovem dos Pāñcālas?”
Verse 26
ते त॑ प्रत्यूचुर्भगवंस्त्वयैव प्रेषितो गच्छ केदारखण्डं बधानेति | स एवमुक्तस्ताज्कछिष्यान् प्रत्युवाच तस्मात् तत्र सर्वे गच्छामो यत्र स गत इति
Eles responderam: “Venerável senhor, foste tu mesmo quem o enviaste, dizendo: ‘Vai e repara o dique rompido do campo.’” Ao ouvirem isso, o mestre lhes disse: “Então vamos todos até lá — para onde quer que ele tenha ido.”
Verse 27
स तत्र गत्वा तस्याह्वानाय शब्द चकार | भो आरुणे पाज्चाल्य क्वासि वत्सैहीति,वहाँ जाकर उपाध्यायने उसे आनेके लिये आवाज दी--'पांचालनिवासी आरुणि! कहाँ हो वत्स! यहाँ आओ”
Tendo chegado ali, ergueu a voz para chamá-lo: “Ó Āruṇi dos Pāñcālas, onde estás, meu filho? Vem aqui.”
Verse 28
स॒तच्छुत्वा आरुणिरुपाध्यायवाक्यं तस्मात् केदारखण्डातू सहसोत्थाय तमुपाध्यायमुपतस्थे,उपाध्यायका यह वचन सुनकर आरुणि पांचाल सहसा उस क्यारीकी मेड़से उठा और उपाध्यायके समीप आकर खड़ा हो गया
Ao ouvir as palavras de seu mestre, Āruṇi ergueu-se imediatamente daquele trecho do arrozal e foi ao encontro de seu preceptor, permanecendo de pé diante dele com atenção e prontidão—mostrando obediência célere e respeito disciplinado ao comando do guru.
Verse 29
प्रोवाच चैनमयमस्म्यत्र केदारखण्डे नि:सरमाणमुदकमवारणीयं संरोद्धूं संविष्टो भगवच्छब्दं श्रुत्वैव सहसा विदार्य केदारखण्डं भवन्तमुपस्थित:
Ele falou com reverência: “Venerável senhor, sou eu. Neste talhão do campo eu mesmo me deitei para conter a água irrefreável que escapava pela barreira rompida. Mas, no instante em que ouvi o vosso chamado sagrado, rompi de súbito o limite do terreno e vim pôr-me de pé diante de vós.”
Verse 30
तदभिवादये भगवन्न्तमाज्ञापयतु भवान् कमर्थ करवाणीति,“मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ, आप आज्ञा दीजिये, मैं कौन-सा कार्य करूँ?”
“Venerável senhor, prostro-me a vossos pés. Ordenai-me, por favor: que tarefa devo empreender?”
Verse 31
स॒ एवमुक्त उपाध्याय: प्रत्युवाच यस्मादू् भवान् केदारखण्डं विदार्योत्थितस्तस्मादुद्दालक एव नाम्ना भवान् भविष्यतीत्युपाध्यायेनानुगृहीत:
Tendo sido assim interpelado, o mestre respondeu: “Já que te ergueste depois de fender o dique desse talhão, por isso serás conhecido pelo nome de Uddālaka.” Assim o preceptor agraciou Āruṇika, conferindo-lhe um nome que memorializava seu ato árduo e diligente.
Verse 32
यस्माच्च त्वया मद्बचनमनुष्ठितं तस्माच्छेयो&वाप्स्यसि । सर्वे च ते वेदा: प्रतिभास्यन्ति सर्वाणि च धर्मशास्त्राणीति
E acrescentou: “Já que executaste a minha instrução, alcançarás o que é verdadeiramente auspicioso. E todos os Vedas, bem como cada tratado de dharma, brilharão com clareza dentro do teu entendimento.”
Verse 33
स॒ एवमुक्त उपाध्यायेनेष्टं देश जगाम । अथापर: शिष्यस्तस्यैवायोदस्य धौम्यस्योपमन्युर्नाम
Assim interpelado e abençoado por seu mestre, Āruṇi—tendo cumprido a sua tarefa—partiu para o lugar que desejava. Então a narrativa volta-se para outro discípulo do mesmo preceptor, Ayoda-Dhaumya: um estudante chamado Upamanyu.
Verse 34
त॑ चोपाध्याय: प्रेषषामास वत्सोपमन्यो गा रक्षस्वेति,उसे उपाध्यायने आदेश दिया--“वत्स उपमन्यु! तुम गौओंकी रक्षा करो”
Então o mestre o despachou com esta instrução: “Meu filho Upamanyu, vai e guarda as vacas.” O episódio enquadra o treino do discípulo na obediência, na humildade e no serviço disciplinado ao mestre (guru-sevā), como fundamento do saber e do caráter.
Verse 35
स॒ उपाध्यायवचनादरक्षद् गाः;: स चाहनि गा रक्षित्वा दिवसक्षये गुरुगृहमागम्योपाध्यायस्याग्रत: स्थित्वा नमश्नक्रे
Em obediência à palavra do mestre, Upamanyu passou a guardar as vacas. Depois de vigiá-las durante o dia, ao cair da tarde voltava à casa do guru; de pé diante dele, prestava-lhe reverência com uma saudação.
Verse 36
तमुपाध्याय: पीवानमपश्यदुवाच चैनं वत्सोपमन्यो केन वृत्ति कल्पयसि पीवानसि दृढमिति
Vendo que Upamanyu se tornara notavelmente bem nutrido, o mestre lhe disse: “Meu filho Upamanyu, por que meio provês o teu sustento? Estás realmente forte e robusto.”
Verse 37
स उपाध्यायं प्रत्युवाच भो भैक्ष्यैण वृत्ति कल्पयामीति,उसने उपाध्यायसे कहा--'गुरुदेव! मैं भिक्षासे जीवन-निर्वाह करता हूँ”
Ele respondeu ao mestre: “Venerável senhor, eu provêjo meu sustento vivendo de esmolas.”
Verse 38
तमुपाध्याय: प्रत्युवाच मय्यनिवेद्य भैक्ष्यं नोपयोक्तव्यमिति | स तयथेत्युक्त्वा भैक्ष्यं चरित्वोपाध्यायाय न्यवेदयत्
O mestre respondeu: “Não deves consumir o alimento de esmolas sem antes oferecê-lo a mim.” Ao ouvir isso, Upamanyu disse: “Assim seja”, aceitou a instrução, saiu para recolher esmolas e, daí em diante, apresentava ao mestre tudo o que obtinha.
Verse 39
स तस्मादुपाध्याय: सर्वमेव भैक्ष्यमगृह्नात्ू | स तथेत्युक्त्वा पुनररक्षद् गा: । अहनि रक्षित्वा निशामुखे गुरुकुलमागम्य गुरोरग्रत: स्थित्वा नमश्नक्रे
Assim, o mestre tomou para si toda a esmola recolhida. Upamanyu, dizendo “Assim seja”, voltou à sua rotina anterior e continuou a guardar as vacas. Depois de vigiá-las durante o dia, ao cair da tarde retornou à casa do guru; de pé diante dele, prestou-lhe respeitosa saudação.
Verse 40
तमुपाध्यायस्तथापि पीवानमेव दृष्टवोवाच वत्सोपमन्यो सर्वमशेषतस्ते भैक्ष्यं गृह्नामि केनेदानीं वृत्ति कल्पयसीति
Ainda assim, vendo que Upamanyu continuava bem nutrido como antes, o mestre perguntou: “Meu filho Upamanyu, eu tomo todas as tuas esmolas sem deixar nada. Por que meio, então, consegues agora manter a tua subsistência?”
Verse 41
स एवमुक्त उपाध्यायं प्रत्युवाच भगवते निवेद्य पूर्वमपरं चरामि तेन वृत्तिं कल्पयामीति
Assim interpelado, respondeu ao mestre: “Venerável senhor, depois de primeiro oferecer-vos as esmolas que obtive, saio novamente para buscar uma segunda porção para mim; com isso sustento a minha subsistência.”
Verse 42
तमुपाध्याय: प्रत्युवाच नैषा न्याय्या गुरुवृत्तिरन्येषामपि भैक्ष्योपजीविनां वृत्त्युपरोधं करोषि इत्येवं वर्तमानो लुब्धोडसीति
O mestre respondeu: “Esse não é um meio de subsistência justo nem louvável para quem vive sob um preceptor. Agindo assim, também obstruis o sustento de outros—daqueles que vivem de esmolas. Procedendo desse modo, mostras-te ganancioso; portanto, não deves sair novamente para pedir.”
Verse 43
स तथेत्युक्त्वा गा अरक्षत् । रक्षित्वा च पुनरुपाध्यायगृहमागम्योपा ध्यायस्याग्रत: स्थित्वा नमश्षक्रे
Dizendo: “Assim seja”, ele aceitou a instrução e guardou as vacas. Depois de protegê-las, voltou novamente à casa do mestre; de pé diante do seu preceptor, ofereceu-lhe reverente saudação.
Verse 44
तमुपाध्यायस्तथापि पीवानमेव दृष्टवा पुनरुवाच वत्सोपमन्यो अहं ते सर्व भैक्ष्यं गृह्नामि न चान्यच्चरसि पीवानसि भृशं केन वृत्ति कल्पयसीति
Ainda assim, o mestre, vendo-o ainda bem nutrido, falou de novo: “Meu filho Upamanyu, eu tomo todas as esmolas que obténs, e tu não sais a mendigar uma segunda vez; mesmo assim estás extraordinariamente robusto. Por que meios, então, manténs o teu sustento?”
Verse 45
स एवमुक्तस्तमुपाध्यायं प्रत्युवाच भो एतासां गवां पयसा वृत्ति कल्पयामीति । तमुवाचोपाध्यायो नैतन्न्याय्यं पय उपयोक्तुं भवतो मया नाभ्यनुज्ञातमिति
Assim interpelado, respondeu ao mestre: “Senhor, sustento-me com o leite destas vacas.” Então o mestre lhe disse: “Isso não é apropriado. Eu não te concedi permissão para consumir leite; portanto, usar o leite das vacas é impróprio para ti.”
Verse 46
स तयथेति प्रतिज्ञाय गा रक्षित्वा पुनरुपाध्यायगृहमेत्य गुरोरग्रत: स्थित्वा नमश्षुक्रे
Upamanyu prometeu: “Assim seja”, e fez ainda o voto de não beber leite, continuando, porém, a guardar o gado como antes. Certo dia, depois de levar os animais a pastar, voltou à casa do mestre e, de pé diante dele, ofereceu-lhe respeitosa saudação.
Verse 47
तमुपाध्याय: पीवानमेव दृष्टवोवाच वत्सोपमन्यो भैक्ष्यं नाश्नासि न चान्यच्चरसि पयो न पिबसि पीवानसि भृशं केनेदानीं वृत्ति कल्पयसीति
Vendo Upamanyu ainda robusto e bem nutrido, o mestre perguntou: “Meu filho Upamanyu, tu não comes o alimento de esmola, nem sais a mendigar de novo, e não bebes o leite das vacas — e, no entanto, estás extraordinariamente bem alimentado. Com que, então, te sustentas agora?”
Verse 48
स एवमुक्त उपाध्यायं प्रत्युवाच भो: फेनं पिबामि यमिमे वत्सा मातृणां स्तनात् पिबन्त उद्गिरन्ति
Assim interpelado, respondeu ao mestre: “Senhor, eu bebo a espuma que estes bezerros cospem enquanto mamam o leite das tetas de suas mães.”
Verse 49
तमुपाध्याय: प्रत्युवाच--एते त्वदनुकम्पया गुणवन्तो वत्सा: प्रभूततरं फेनमुद्गिरन्ति । तदेषामपि वत्सानां वृत्त्युपरोधं करोष्येवं वर्तमान: | फेनमपि भवान् न पातुमर्हतीति । स तथेति प्रतिश्रुत्य पुनररक्षद् गा:
O mestre respondeu: “Estes bezerros são dotados de boas qualidades; por compaixão por ti, regurgitam ainda mais espuma. Mas, vivendo assim—bebendo essa espuma—tu estás a obstruir o sustento desses bezerros. Portanto, a partir de hoje, não deves beber nem mesmo a espuma.” Upamanyu disse: “Assim seja”, prometeu não bebê-la e voltou a guardar as vacas como antes.
Verse 50
तथा प्रतिषिद्धो भैक्ष्यं नाश्नाति न चान्यच्चरति पयो न पिबति फेन॑ नोपयुद्धक्ते । स कदाचिदरणप्ये क्षुधार्तोंडर्कपत्राण्यभक्षयत्
Assim, depois de proibido, Upamanyu não comeu o alimento de esmola, nem voltou a mendigar; não bebeu leite de vaca e não fez uso da espuma dos bezerros. Vivendo na fome, certa vez na floresta, atormentado pela inanição, mastigou e comeu folhas da planta arka.
Verse 51
स तैरर्कपन्रैर्भक्षितै: क्षारतिक्तकदुरूक्षैस्तीक्षणविपाकैश्नक्षुष्युपहतो5न्धो बभूव । ततः सो<न्धोडपि चड्क्रम्यमाण: कूपे पपात
Aquelas folhas de arka, salgadas, amargas, pungentes e ásperas, de efeito final agudo e ardente, feriram a visão de Upamanyu, e ele ficou cego. Depois, embora cego, continuou a vaguear, e nesse estado caiu num poço.
Verse 52
अथ तस्मिन्ननागच्छति सूर्य चास्ताचलावलम्बिनि उपाध्याय: शिष्यानवोचत्-- नायात्युपमन्युस्त ऊचुर्वनं गतो गा रक्षितुमिति
Quando Upamanyu ainda não voltava e o sol já se inclinava para a montanha do ocidente, o mestre disse aos discípulos: “Upamanyu não veio.” Eles responderam: “Foi à floresta guardar as vacas.”
Verse 53
तानाह उपाध्यायो मयोपमन्यु: सर्वतः प्रतिषिद्धः स नियतं कुपितस्ततो नागच्छति चिरं ततो<न्वेष्य इत्येवमुक्त्वा शिष्यै: सार्थमरण्यं गत्वा तस्याद्वानाय शब्दं चकार भो उपमन्यो क्वासि वत्सैहीति
O mestre disse: “Eu fechei todos os meios de sustento de Upamanyu; ele certamente se ofendeu. Por isso, mesmo depois de tanto tempo, não veio. Portanto, devemos ir procurá-lo.” Tendo dito isso, foi com os discípulos à floresta e bradou em alta voz para chamá-lo: “Ho, Upamanyu! Onde estás, meu filho? Vem aqui!”
Verse 54
स॒ उपाध्यायवचनं श्रु॒त्वा प्रत्युवाचोच्चैरयमस्मिन्ू कूपे पतितो5हमिति तमुपाध्याय: प्रत्युवाच कथ॑ं त्वमस्मिन् कूपे पतित इति
Ao ouvir as palavras do mestre, respondeu em voz alta: “Senhor, caí neste poço.” Então o mestre lhe perguntou: “Meu filho, como caíste neste poço?”
Verse 55
स उपाध्यायं प्रत्युवाच--अर्कपत्राणि भक्षयित्वान्धीभूतो5स्म्यत: कूपे पतित इति,उसने उपाध्यायको उत्तर दिया--'भगवन्! मैं आकके पत्ते खाकर अन्धा हो गया हूँ; इसीलिये कुएँमें गिर गया”
Ele respondeu ao mestre: “Senhor, depois de comer as folhas da planta arka, fiquei cego; por isso caí no poço.”
Verse 56
तमुपाध्याय: प्रत्युवाच--अश्विनौ स्तुहि । तौ देवभिषजोौ त्वां चक्षुष्मन्तं कर्ताराविति । स एवमुक्त उपाध्यायेनोपमन्युरश्विनौ स्तोतुमुपचक्रमे देवावश्चिनौ वाम्भिऋग्भि:
O mestre respondeu: “Louva os Aśvins. Esses dois são os médicos dos deuses; eles restaurarão a tua visão.” Assim instruído por seu preceptor, Upamanyu começou a entoar hinos às divindades gêmeas Aśvin com versos sagrados do Ṛgveda.
Verse 57
प्रपूर्वगौ पूर्वजी चित्रभानू गिरा वा55शंसामि तपसा हानन्तौ । दिव्यौ सुपर्णा विरजौ विमाना- वधिक्षिपन्तौ भुवनानि विश्वा
Upamanyu entoou: “Ó Aśvinīkumāras! Vós existíeis antes mesmo da criação; sois os ancestrais primordiais, radiantes como o fogo em chamas. Com minha voz e com minha austeridade eu vos louvo, pois sois sem fim. De forma divina, moveis-vos juntos como duas belas aves aladas—imaculados, livres de paixão e de orgulho—espalhando bem-estar e saúde por todos os mundos.”
Verse 58
हिरण्मयौ शकुनी साम्परायौ नासत्यदस्रौ सुनसौ वै जयन्तौ । शुक्ल वयन्तौ तरसा सुवेमा- वधिव्ययन्तावसितं विवस्वत:
Rāma disse: “Vós dois sois como aves douradas, belas, dotadas dos meios para o progresso bem-aventurado para além desta vida. Sois Nāsatya e Dasra—sempre vitoriosos, de traços claros e agradáveis. Como filhos de Vivasvān (o Sol), permaneceis na própria forma solar, tecendo velozmente o ano como uma veste, com os fios escuros da noite e os fios luminosos do dia; e, por essa ordem tecida, conduzis os seres pelos caminhos auspiciosos chamados Devayāna e Pitṛyāna.”
Verse 59
ग्रस्तां सुपर्णस्य बलेन वर्तिका- ममुज्चतामश्विनौ सौभगाय । तावत् सुवृत्तावनमन्त मायया वसत्तमा गा अरुणा उदावहन्
Uma codorniz, tomada pela força de Suparṇa (Garuḍa), foi libertada pelos gêmeos Aśvin para que alcançasse boa fortuna. Contudo, enquanto os seres se curvarem sob o encanto de Māyā, os mais iludidos serão levados pela corrente avermelhada da paixão e do apego, permanecendo presos e julgando-se confinados ao corpo. O verso aponta que a libertação é desfazer o domínio do Tempo por meio do verdadeiro conhecimento, e que o cativeiro é a rendição da mente aos objetos dos sentidos.
Verse 60
षष्टिक्ष गावस्त्रिशताक्ष धेनव एकं वत्सं सुवते तं दुहन्ति । नानागोष्ठा विहिता एकदोहना- स्तावश्विनौ दुहतो घर्ममुक्थ्यम्
Rāma disse: “Há trezentas e sessenta vacas leiteiras—marcadas por trezentos (e sessenta) ‘olhos’, isto é, os dias—que concedem frutos desejados. Todas dão à luz um único bezerro e o nutrem com o leite. Esse bezerro é ao mesmo tempo gerador e destruidor. O buscador toma esse bezerro como meio e ‘ordenha’ dessas vacas os frutos dos atos prescritos pelas escrituras, embora estejam em muitos currais e destinados a ritos diversos; na verdade, a ordenha é uma. E o verdadeiro ‘leite’ a extrair de todos esses atos também é um: a aspiração ao conhecimento verdadeiro. Sois vós dois, os gêmeos Aśvin, que ordenhais a excelente oblação aquecedora (gharma) e o hino de louvor.”
Verse 61
हे अश्विनीकुमारो! इस कालचक्रकी एकमात्र संवत्सर ही नाभि है
Rāma disse: “Ó Aśvinīkumāras! Nesta roda do Tempo, o único ano é o cubo. Sobre ele repousam setecentos e vinte raios—noites e dias juntos—ligados aos doze meses que servem de suportes da borda. Ó Aśvinīkumāras! Esta roda do Tempo, imperecível e tecida de ilusão, gira sem uma borda fixa, move-se por um curso imprevisível e continuamente traz destruição aos seres deste mundo e do outro.”
Verse 62
एकं॑ चक्र वर्तते द्वादशारं षण्णाभिमेकाक्षमृतस्य धारणम् | यस्मिन् देवा अधि विश्वे विषक्ता- स्तावश्चिनौ मुज्चतं मा विषीदतम्
Rāma disse: “Uma única roda do Tempo continua a girar—de doze raios, com seis cubos e um só eixo—sustentando a ordem cósmica. Nela estão postos e atados todos os deuses que presidem ao tempo. Ó Aśvinīkumāras, libertai-me desta roda; não me deixeis afundar no desespero, pois aqui sou gravemente afligido pelos sofrimentos do nascimento e de tudo o mais.”
Verse 63
अश्विनाविन्दुममृतं वृत्त भूयौ तिरोधत्तामश्चिनौ दासपत्नी । हित्वा गिरिमश्रचिनौ गा मुदा चरन्तौ तद्वृष्टिमल्वा प्रस्थितो बलस्य
Rāma disse: “Ó Aśvinī-kumāras! Em vós abunda a reta conduta. Pelo fulgor de vossa própria boa fama, ofuscais até a lua, o amṛta—néctar da imortalidade—e o brilho das águas. Deixando para trás o Monte Meru, agora percorreis a terra com alegria. É precisamente para derramar júbilo e força que vós, dois irmãos, partis durante o dia.”
Verse 64
युवां दिशो जनयथो दशाग्रे समान मूर्थ्नि रथयानं वियन्ति । तासां यातमृषयोअनुप्रयान्ति देवा मनुष्या: क्षितिमाचरन्ति
Rāma disse: “No próprio início da criação, vós dois fazeis surgir e dais a conhecer as dez direções. Na ‘cabeça’ dessas direções—na região intermediária do céu—revelais o curso do Sol, que viaja em seu carro e ilumina a todos por igual, e também dais a conhecer os grandes elementos, como o espaço. Vendo o movimento do Sol por essas direções, os sábios seguem o seu caminho; e deuses e humanos, cada qual segundo a esfera que lhe foi destinada, habitam e atuam em seus respectivos reinos.”
Verse 65
युवां वर्णान् विकुरुथो विश्वरूपां- स्तेडधिक्षियन्ते भुवनानि विश्वा | ते भानवो5प्यनुसूता श्चरन्ति देवा मनुष्या: क्षितिमाचरन्ति
Rāma disse: “Vós dois, Aśvinī-kumāras, ao mesclar muitas cores e formas, preparais remédios de toda espécie—ervas que sustentam o mundo inteiro. Essas plantas curativas e radiantes, como se nascessem de vós e por vós fossem guiadas, movem-se em vossa companhia e seguem o vosso curso. Deuses, humanos e outros seres, cada qual em sua esfera própria—no céu ou sobre a terra—vivem desses remédios que amparam a vida e deles participam.”
Verse 66
तौ नासत्यावद्चिनौ वां महे5हं स्रजं च यां बिभूथ: पुष्करस्य । तौ नासत्यावमृतावृतावृधा- वृते देवास्तत्प्रपदे न सूते
Rāma disse: “Vós dois sois famosos pelo nome Nāsatya. Eu vos presto culto, e também à grinalda de lótus que trazeis. Embora imortais, sois aqueles que nutrem e expandem o ṛta—o ordenamento eterno da verdade. Sem o vosso auxílio, nem mesmo os deuses conseguem alcançar essa Verdade primordial.”
Verse 67
मुखेन गर्भ लभेतां युवानौ गतासुरेतत् प्रपदेन सूते । सद्यो जातो मातरमत्ति गर्भ- स्तावश्विनौ मुज्चथो जीवसे गा:
Rāma disse: “No princípio, o jovem casal recebe o embrião pela boca—o alimento torna-se primeiro a semente da vida. Depois, no homem transforma-se em sêmen e na mulher em essência menstrual, e disso se forma o corpo inerte. Assim que a criança nasce, o ser encarnado bebe de imediato o leite da mãe. Ó Aśvinī-kumāras, vós libertais os seres vivos presos à existência mundana ao concederdes o verdadeiro conhecimento; portanto, para o sustento da minha vida, libertai também de doença a minha faculdade da visão.”
Verse 68
स्तोतुं न शकनोमि गुणैर्भवन्तौ चक्षुविहीन: पथि सम्प्रमोह: । दुर्गेडहहमस्मिन् पतितो5स्मि कूपे युवां शरण्यौ शरणं प्रपद्ये
Rama disse: “Não sou capaz de louvar-vos a ambos como convém, ainda que eu enumere as vossas virtudes. Neste momento tornei-me como alguém sem visão e perco-me no caminho; por isso caí neste poço de difícil escape. Vós dois sois protetores dos que buscam refúgio — assim, ó Aśvinīkumāras, a vós me entrego em busca de abrigo.”
Verse 69
इत्येवं तेनाभिष्टतावश्वचिनावाजग्मतुराहतुश्चैनं प्रीतौ स्व एब ते5पूपो5शानैनमिति
Assim, quando ele os louvou desse modo, os dois gêmeos Aśvin vieram até ali e, satisfeitos com ele, disseram: “Upamanyu, estamos grandemente contentes contigo. Aqui está um pūpa (um bolo doce) para teu alimento — come-o.”
Verse 70
स एवमुक्तः प्रत्युवाच नानृतमूचतुर्भगवन्ती न त्वहमेतमपूपमुपयोक्तुमुत्सहे गुरवेडनिवेद्येति
Assim interpelado, Upamanyu respondeu: “Veneráveis, não dissestes mentira. Contudo, não ouso consumir este bolo doce sem antes informar meu mestre.”
Verse 71
ततस्तमश्रिनावूचतु:--आवाभ्यां पुरस्ताद् भवत उपाध्यायेनैवमेवाभिष्टृता भ्यामपूपो दत्त उपयुक्त: स तेनानिवेद्य गुरवे त्वमपि तथैव कुरुष्व यथा कृतमुपाध्यायेनेति
Então os dois Aśvins lhe disseram: “Filho, outrora teu mestre também nos louvou exatamente assim. Naquele tempo lhe demos um bolo, e ele o usou sem antes informar ou oferecê-lo ao seu próprio guru. Tu também deves fazer exatamente como teu mestre fez.”
Verse 72
स एवमुक्तः प्रत्युवाच--एतत् प्रत्यनुनये भवन्तावश्विनौ नोत्सहेडहमनिवेद्य गुरवे5पूपमुपयोक्तुमिति
Ao ouvir isso, Upamanyu respondeu: “Quanto a isso, eu vos suplico, ó Aśvins. Não posso consumir este pūpa sem antes informar meu mestre.”
Verse 73
तमश्विनावाहतु: प्रीतो स्वस्तवानया गुरुभक्त्या उपाध्यायस्य ते कार्ष्णायसा दन्ता भवतोडपि हिरण्मया भविष्यन्ति चक्षुष्मांश्ष॒ भविष्यसीति श्रेयक्षावाप्स्पसीति
Satisfeitos, os gêmeos Aśvin disseram: “Por este ato auspicioso de devoção ao teu mestre, ficamos imensamente contentes. Os dentes do teu preceptor, que são como ferro escuro, tornar-se-ão dourados; e tu também recuperarás a visão clara. Assim alcançarás bem-estar e bom augúrio.”
Verse 74
स एवमुक्तोउश्विभ्यां लब्धचक्षुरुपाध्यायसकाशमागम्याभ्यवादयत्,अश्विनीकुमारोंक ऐसा कहनेपर उपमन्युको आँखें मिल गयीं और उसने उपाध्यायके समीप आकर उन्हें प्रणाम किया
Assim instruído, Upamanyu —tendo recuperado a visão pelos gêmeos Aśvin— foi ao encontro de seu mestre, aproximou-se com respeito e ofereceu-lhe reverentes saudações.
Verse 75
आचचक्षे च स चास्य प्रीतिमान् बभूव,तथा सब बातें गुरुजीसे कह सुनायीं। उपाध्याय उसके ऊपर बड़े प्रसन्न हुए
Ele relatou tudo por inteiro, exatamente como havia acontecido; ao ouvir esse relato fiel, o coração do mestre se aqueceu de aprovação e ele ficou muito satisfeito com ele.
Verse 76
आह चैन यथाश्विनावाहतुस्तथा त्वं श्रेयोडवाप्स्यसि,और उससे बोले--'जैसा अभश्विनीकुमारोंने कहा है, उसी प्रकार तुम कल्याणके भागी होओगे
Rāma disse-lhe: “Assim como falaram os gêmeos Aśvin, assim também tu alcançarás śreyas — o verdadeiro bem-estar e o bem auspicioso.”
Verse 77
सर्वे च ते वेदा: प्रतिभास्यन्ति सर्वाणि च धर्मशास्त्राणीति । एषा तस्यापि परीक्षोपमन्यो:
Rāma disse: “Todos os Vedas brilharão com clareza em teu entendimento, e também todos os tratados sobre o dharma (dharmaśāstra).” Assim se apresenta a prova (parīkṣā) de Upamanyu.
Verse 78
अथापर: शिष्यस्तस्यैवायोदस्य धौम्यस्य वेदो नाम तमुपाध्याय: समादिदेश वत्स वेद इहास्यतां तावन्न्मम गृहे कंचित् काल॑ शुश्रूषुणा च भविततव्यं श्रेयस्ते भविष्यतीति
Então, outro discípulo daquele mesmo mestre Āyoda-Dhaumya, chamado Veda, foi instruído por seu preceptor: “Meu querido Veda, permanece aqui em minha casa por algum tempo. Deves manter-te atento no serviço e na obediência; isso te trará o verdadeiro bem-estar.”
Verse 79
स तथेत्युक्त्वा गुरुकुले दीर्घकालं गुरुशुश्रूषणपरो 5वसदू गौरिव नित्यं गुरुणा धूर्ष नियोज्यमान: शीतोष्ण क्षुत्तृष्णादुःखसह: सर्वत्राप्रतिकूलस्तस्य महता कालेन गुरु: परितोष॑ जगाम
Dizendo: “Assim seja”, permaneceu por longo tempo na casa do mestre, inteiramente dedicado ao serviço do preceptor. Como um boi, o guru o fazia carregar continuamente pesados fardos; ainda assim, ele suportou frio e calor, fome e sede, e outras agruras, mantendo-se sempre dócil e sem resistência em qualquer circunstância. Depois de muito tempo, o mestre ficou plenamente satisfeito com ele.
Verse 80
तत्परितोषाच्च श्रेय: सर्वज्ञतां चावाप | एषा तस्यापि परीक्षा वेदस्य,गुरुके संतोषसे वेदने श्रेय तथा सर्वज्ञता प्राप्त कर ली। इस प्रकार यह वेदकी परीक्षाका वृत्तान्त कहा गया
Por essa satisfação (do guru), ele alcançou o verdadeiro bem e também a onisciência. Esta foi a prova de Veda: ao agradar ao mestre no gurukula, obtém-se o bem supremo e um conhecimento abrangente. Assim se narra o relato do exame de Veda.
Verse 81
स उपाध्यायेनानुज्ञातः समावृतस्तस्माद् गुरुकुलवासाद गृहाश्रमं प्रत्यपद्यत । तस्यापि स्वगृहे वसतस्त्रय: शिष्या बभूवु: स शिष्यान् न किंचिदुवाच कर्म वा क्रियतां गुरुशुश्रूषा चेति । दुःखाभिज्ञो हि गुरुकुलवासस्य शिष्यान् परिक्लेशेन योजयितुं नेयेष
Com a permissão do mestre, concluiu seus estudos e, após deixar a residência do preceptor, entrou na etapa de vida do chefe de família. Mesmo vivendo em sua própria casa, teve três discípulos. Contudo, não lhes deu ordens como: “Fazei este trabalho” ou “Dedicai-vos ao serviço do mestre”. Pois conhecia, por experiência, as durezas da vida na casa do guru e, por isso, não desejava sobrecarregar seus alunos com tarefas penosas.
Verse 82
अथ कम्मिंश्वित् काले वेदं ब्राह्मणं जनमेजय: पौष्यश्न क्षत्रियावुपेत्य वरयित्वोपाध्यायं चक्रतु:ः
Certa vez, o brâmane sábio Veda foi procurado por dois kshatriyas, Janamejaya e Pauṣya. Tendo-o escolhido, fizeram-no seu preceptor. Mais tarde, em uma ocasião, o mestre Veda preparou-se para sair em dever ligado aos assuntos sacrificiais de seu patrono. Designou seu discípulo chamado Uttanka para os ritos diários, como o Agnihotra, e lhe disse: “Meu filho Uttanka, se na minha ausência faltar algo em minha casa, deves suprir e completar—este é o meu desejo.” Dada a ordem, o mestre Veda partiu.
Verse 83
स कदाचिद् याज्यकार्येणाभिप्रस्थित उत्तड़कनामानं शिष्यं नियोजयामास
Certa vez, quando o mestre estava prestes a partir para cumprir um dever sacrificial em favor de seu patrono, designou seu discípulo chamado Uttaṅka para ficar encarregado. Disse-lhe: “Meu filho Uttaṅka! Em minha casa, na minha ausência, se algo vier a faltar, tu deves suprir a falta; esse é o meu desejo.” Tendo assim ordenado, o mestre Veda partiu.
Verse 84
भो यत् किंचिदस्मदगृहे परिहीयते तदिच्छाम्यहमपरिहीयमानं भवता क्रियमाणमिति स एवं प्रतिसंदिश्योत्तड़क॑ वेद: प्रवासं जगाम
O mestre Veda disse: “Escuta: se em minha casa qualquer coisa diminuir ou vier a faltar, desejo que não permaneça em falta; cabe a ti providenciar e pôr tudo em ordem.” Tendo assim instruído Uttaṅka, o mestre brâmane Veda partiu em viagem.
Verse 85
अथोत्तड़्क: शुश्रूषुर्गुकुनियोगमनुतिष्ठमानो गुरुकुले वसति सम । स तत्र वसमान उपाध्यायस्त्रीभि: सहिताभिराहूयोक्त:
Então Uttaṅka, desejoso de servir e cumprindo fielmente as ordens do mestre, continuou a viver na casa do guru. Enquanto ali residia, foi chamado pela esposa do preceptor (junto com outras mulheres) e foi-lhe dito—
Verse 86
उत्तंक गुरुकी आज्ञाका पालन करते हुए सेवापरायण हो गुरुके घरमें रहने लगे। वहाँ रहते समय उन्हें उपाध्यायके आश्रयमें रहनेवाली सब स्त्रियोंने मिलकर बुलाया और कहा -- ८५ ॥।।
As mulheres que viviam sob a proteção do preceptor chamaram Uttaṅka e disseram: “A esposa do teu mestre está em sua estação fértil, e o mestre está ausente. Faz com que esta estação não se perca; ela está aflita por isso.”
Verse 87
एवमुक्तस्ता: स्त्रिय: प्रत्युवाच न मया स्त्रीणां वचनादिदमकार्य करणीयम् । न हाहमुपाध्यायेन संदिष्टोडकार्यमपि त्वया कार्यमिति
Ao ouvirem-no, Uttaṅka respondeu às mulheres: “Não posso, apenas por ordem de mulheres, cometer um ato impróprio e censurável. Meu mestre não me instruiu: ‘Mesmo o que não deve ser feito, tu deves fazê-lo.’”
Verse 88
तस्य पुनरुपाध्याय: कालान्तरेण गृहमाजगाम तस्मात् प्रवासात् | स तु तद् वृत्तं तस्याशेषमुपलभ्य प्रीतिमानभूत्
Depois de algum tempo, seu mestre voltou para casa após aquele período de permanência longe. Ao chegar, soube por inteiro tudo o que havia acontecido, e esse conhecimento o encheu de profunda satisfação—sinal de aprovação da conduta do discípulo e da bem-sucedida conclusão do dever confiado.
Verse 89
उवाच चैनं वत्सोत्तड़क कि ते प्रियं करवाणीति । धर्मतो हि शुश्रूषितो5स्मि भवता तेन प्रीति: परस्परेण नौ संवृद्धा तदनुजाने भवन्तं सर्वानिव कामानवाप्स्यसि गम्यतामिति
E disse-lhe: “Querido Uttanka, que serviço desejas que eu faça por ti? Tu me serviste de acordo com o dharma; por isso o afeto mútuo entre nós cresceu. Agora te concedo licença—volta para casa. Alcançarás todos os fins que desejas; vai.”
Verse 90
स एवमुक्त: प्रत्युवाच किं ते प्रियं करवाणीति, एवमाहु:,गुरुके ऐसा कहनेपर उत्तंक बोले--“भगवन्! मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? वृद्ध पुरुष कहते भी हैं
Tendo sido assim interpelado, respondeu por sua vez: “Venerável mestre, que serviço querido devo eu fazer por ti?” Pois assim dizem os anciãos: às palavras do guru deve-se responder com prontidão para servir e retribuir o ensinamento por meio de atos respeitosos.
Verse 91
यश्चाधर्मेण वै ब्रूयाद् यश्चाधर्मेण पृच्छति । तयोरन्यतर:ः प्रैति विद्वेषं चाधिगच्छति
Aquele que fala (ou ensina) contra o dharma, e aquele que pergunta (ou estuda) contra o dharma—entre esses dois, um (seja o mestre ou o discípulo) vai à ruína e também cai na inimizade. O verso adverte que o ensino e a indagação devem estar alicerçados na retidão; caso contrário, a relação e seus frutos tornam-se destrutivos.
Verse 92
सो5हमनुज्ञातो भवतेच्छामीष्टं गुर्वर्थमुपहर्तुमिति । तेनैवमुक्त उपाध्याय: प्रत्युवाच वत्सोत्तड़क उष्यतां तावदिति
Rāma disse: “Agora que obtive tua permissão, desejo oferecer o dom devido ao meu mestre, como guru-dakṣiṇā.” Tendo ele falado assim, o preceptor respondeu: “Meu filho Uttanka, permanece aqui por mais alguns dias.” A passagem realça a prontidão do discípulo em cumprir a guru-dakṣiṇā como dever de gratidão e disciplina, e a orientação ponderada do mestre—pois o dharma não é apenas ânsia de dar, mas também obediência paciente à instrução correta.
Verse 93
स कदाचिदुपाध्यायमाहोत्तड़क आज्ञापयतु भवान् कि ते प्रियमुपाहरामि गुर्वर्थमिति
Certa vez, dirigiu-se ao mestre: «Venerável, ordenai-me. Que oferenda estimada devo trazer-vos como guru-dakṣiṇā, a dádiva devida ao mestre?»
Verse 94
तमुपाध्याय: प्रत्युवाच वत्सोत्तड़क बहुशो मां चोदयसि गुर्वर्थमुपाहरामीति तद् गच्छैनां प्रविश्योपाध्यायानीं पृष्छ किमुपाहरामीति
O mestre respondeu: «Meu caro Uttanka, repetidas vezes me instas dizendo: “Que devo trazer como guru-dakṣiṇā?” Portanto, entra na casa e pergunta à minha esposa: “Que devo oferecer como guru-dakṣiṇā?” O que ela te disser—traze-o.»
Verse 95
“वे जो बतावें वही वस्तु उन्हें भेंट करो।' स एवमुक्त उपाध्यायेनोपाध्यायानीमपृच्छद् भगवत्युपाध्यायेनास्म्यनुज्ञातो गृहं गन्तुमिच्छामीष्टं ते गुर्वर्थमुपहत्यानूणो गन्तुमिति
«O que ela te disser, oferece exatamente isso.» Assim instruído pelo mestre, Uttanka aproximou-se da esposa do mestre e disse: «Venerável senhora, meu mestre permitiu-me voltar para casa. Contudo, desejo partir somente depois de oferecer, como guru-dakṣiṇā, algo que vós desejeis, para que eu me vá livre de dívida. Ordenai-me: que devo trazer como o devido ao mestre?»
Verse 96
अत: आप जाज्ञा दें; मैं गुरुदक्षिणाके रूपमें कौन-सी वस्तु ला दूँ।” सैवमुक्तोपाध्यायानी तमुत्तड़्कं प्रत्युवाच गच्छ पौष्यं प्रति राजानं कुण्डले भिक्षितुं तस्य क्षत्रियया पिनद्धे
«Então ordenai-me: que objeto devo trazer como guru-dakṣiṇā?» Ao ouvir Uttanka, a esposa do preceptor respondeu: «Vai ao rei Pauṣya e pede-lhe o par de brincos que está preso às orelhas de sua rainha kṣatriya.»
Verse 97
ते आनयस्व चतुर्थेडहनि पुण्यकं भविता ताभ्यामाबद्धाभ्यां शोभमाना ब्राह्मणान् परिवेष्टमिच्छामि । तत् सम्पादयस्व
«Traz esses brincos depressa. No quarto dia realizar-se-á a sagrada observância de Puṇyaka; nesse dia desejo enfeitar-me com eles e, assim adornada, servir alimento aos brâmanes. Portanto, cumpre este meu desejo. Agindo assim, o teu bem-estar se seguirá; de outro modo, como poderia o bem ser alcançado?»
Verse 98
स॒ एवमुक्तस्तया प्रातिष्ठतोत्तड़ुक: स पथि गच्छन्नपश्यदृषभमतिप्रमाणं तमधिरूढं च पुरुषमतिप्रमाणमेव स पुरुष उत्तड़कमभ्यभाषत
Assim interpelado por ela, Uttaṅka partiu. Enquanto seguia pela estrada, viu um touro de tamanho extraordinário e, sobre ele, um homem de estatura igualmente imensa. Esse homem então falou a Uttaṅka—pondo em movimento a virada seguinte dos acontecimentos e provando o discernimento e a firmeza do viajante na busca de seu dever.
Verse 99
भो उत्तड़कैतत् पुरीषमस्य ऋषभस्य भक्षयस्वेति स एवमुक्तो नैच्छत्,“उत्तंक! तुम इस बैलका गोबर खा लो।' किंतु उसके ऐसा कहनेपर भी उत्तंकको वह गोबर खानेकी इच्छा नहीं हुई
Rāma disse: “Ó Uttaṅka, come este esterco deste touro.” Ainda assim, mesmo após ser-lhe dito desse modo, Uttaṅka não consentiu — não sentiu qualquer disposição para comê-lo. O episódio evidencia a tensão moral entre obedecer a uma instrução e o senso interior de pureza e conveniência, pondo à prova o discernimento (viveka) juntamente com o dever (dharma).
Verse 100
तमाह पुरुषो भूयो भक्षयस्वोत्तड़क मा विचारयोपाध्यायेनापि ते भक्षितं पूर्वमिति,तब वह पुरुष फिर उनसे बोला--“उत्तंक! खा लो, विचार न करो। तुम्हारे उपाध्यायने भी पहले इसे खाया था”
Então o homem tornou a falar-lhe: “Uttaṅka, come — não ponderes. Até o teu mestre já comeu isto antes.” A observação pretende afastar a hesitação de Uttaṅka apelando ao precedente e à obediência, pressionando-o a agir sem pensar demais no que parece questionável.
Verse 101
स एवमुक्तो बाढमित्युक्त्वा तदा तद् वृषभस्य मूत्र पुरीषं च भक्षयित्वोत्तड़कः सम्भ्रमादुत्थित एवाप उपस्पृश्य प्रतस्थे
Assim interpelado, Uttaṅka respondeu: “Muito bem”, e obedeceu. Então consumiu a urina e o esterco do touro; e, por estar com pressa, realizou o ācamana (o rito de purificação ao sorver água) ainda de pé, e seguiu viagem. O episódio ressalta a tensão entre a impureza exterior e a obediência interior a uma instrução superior, quando um ato difícil é assumido em nome de um voto de dever e do propósito moral maior da busca.
Verse 102
यत्र स॒ क्षत्रियः पौष्यस्तमुपेत्यासीनमपश्यदुत्तड़क: । स उत्तड़कस्तमुपेत्याशीर्भिरभिनन्द्योवाच
Chegando ao lugar onde residia o rei kṣatriya Pauṣya, Uttaṅka viu-o sentado em seu trono. Aproximou-se e saudou-o com bênçãos e palavras respeitosas, buscando conquistar-lhe a boa vontade antes de expor o pedido—exemplo de conduta apropriada ao dirigir-se à autoridade e iniciar uma solicitação com cortesia.
Verse 103
अर्थी भवन्तमुपागतो5स्मीति स एनमभिवाद्योवाच भगवन् पौष्य: खल्वहं किं करवाणीति
“Vim a ti como suplicante”, disse ele. O rei saudou-o com respeito e respondeu: “Venerável senhor, sou de fato Pauṣya, teu servidor — dize, que devo fazer por ti?”
Verse 104
तमुवाच गुर्वर्थ कुण्डलयोरथ्थेनाभ्यागतोडस्मीति । ये वै ते क्षत्रियया पिनद्धे कुण्डले ते भवान् दातुमर्हतीति
Uttaṅka disse a Pauṣya: “Ó rei, vim buscar, como gurudakṣiṇā —a oferenda devida ao mestre—, um par de brincos. Os mesmos brincos que tua rainha kṣatriya está usando: esses dois deves dá-los a mim. É um feito digno de ti.”
Verse 105
त॑ प्रत्युवाच पौष्य: प्रविश्यान्तः:पुरं क्षत्रिया याच्यतामिति | स तेनैवमुक्तः प्रविश्यान्त:पुरं क्षत्रियां नापश्यत्
Pauṣya respondeu: “Entra nos aposentos internos e pede os brincos à rainha.” Assim instruído pelo rei, Uttaṅka entrou no palácio interior; contudo, não viu ali a kṣatriyā, a rainha.
Verse 106
स पौष्यं पुनरुवाच न युक्त भवताहमनृतेनोपचरितुं न हि तेडन्तःपुरे क्षत्रिया सन्निहिता नैनां पश्यामि
Uttaṅka voltou a falar ao rei Pauṣya: “Não é próprio de ti lidar comigo por meio de falsidade para me apaziguar. Nos teus aposentos internos não há nenhuma dama kṣatriya; não a vejo ali.”
Verse 107
स एवमुक्त: पौष्य: क्षणमात्र विमृश्योत्तड्कं प्रत्युवाच नियतं भवानुच्छिष्ट: समर तावन्न हि सा क्षत्रिया उच्छिष्टेनाशुचिना शकक््या द्रष्टं पतिव्रतात्वात्ू सैषा नाशुचेर्दर्शनमुपैतीति
Assim interpelado, o rei Pauṣya refletiu por um instante e respondeu a Uttaṅka: “Certamente estás em estado de impureza ritual, pois ainda não purificaste a boca após comer; lembra-te disso. Minha rainha kṣatriya, por ser pativratā —devotada ao esposo—, não pode ser vista por quem está ‘ucchiṣṭa’ e, portanto, impuro. Porque estás impuro, ela não entra no teu campo de visão.”
Verse 108
अथैवमुक्त उत्तड़क: स्मृत्वोवाचास्ति खलु मयोत्थितेनोपस्पृष्टं गच्छतां चेति । तं पौष्य: प्रत्युवाच--एष ते व्यतिक्रमो नोत्थितेनोपस्पृष्ट भवतीति शीघ्रं गच्छता चेति
Ao ser advertido assim, Uttanka lembrou-se de algo e disse: “De fato, há uma falta em mim: durante a viagem realizei o ācamana em pé, e ainda por cima enquanto caminhava.” Pauṣya respondeu: “Eis a tua transgressão, ó brāhmaṇa. O ācamana feito em pé, e feito caminhando apressadamente, é como se não tivesse sido feito.”
Verse 109
अथोत्तड़कस्तं तथेत्युक्त्वा प्राइ़मुख उपविश्य सुप्रक्षालितपाणिपादवदनो निःशब्दाभिरफेनाभिरनुष्णाभि्वद्गताभिरद्धिस्त्रि.. पीत्वा द्विः परिमृज्य खान्यद्धिरुपस्पृश्य चान्त:पुरं प्रविवेश
Então Uttadaka, tendo respondido “Assim seja”, sentou-se voltado para o leste depois de lavar cuidadosamente mãos, pés e rosto. Em silêncio realizou o ācamana três vezes com água fresca—sem espuma e sem ruído—sorvendo-a até a região do coração. Limpou a boca duas vezes com a base do polegar, tocou as aberturas dos sentidos (como olhos e narinas) com os dedos molhados e então entrou nos aposentos internos.
Verse 110
ततस्तां क्षत्रियामपश्यत्
Então ele viu a dama kṣatriya. No instante em que avistou Uttanka, ela se ergueu para saudá-lo, inclinou-se com respeito e disse: “Sede bem-vindo, venerável senhor. Ordenai—que devo fazer em serviço?”
Verse 111
स तामुवाचैते कुण्डले गुर्वर्थ मे भिक्षिते दातुरमहसीति । सा प्रीता तेन तस्य सद्भावेन पात्रमयमनतिक्रमणीयश्नेति मत्वा ते कुण्डलेडवमुच्यास्मै प्रायच्छदाह तक्षको नागराज: सुभशं प्रार्थयत्यप्रमत्तो नेतुमरहसीति
Ele lhe disse: “Estes dois brincos eu os pedi em nome do meu mestre; deveis dá-los a mim.” A rainha, satisfeita com sua sincera devoção e boa intenção, julgou-o digno e entendeu que não devia deixá-lo partir desapontado. Ela mesma retirou os brincos e lhos entregou, advertindo: “Ó brāhmaṇa, o rei das serpentes, Takṣaka, busca estes brincos com grande empenho; portanto deves levá-los com vigilância.”
Verse 112
स एवमुक्तस्तां क्षत्रियां प्रत्युवाच भगवति सुनिर्वता भव । न मां शक्तस्तक्षको नागराजो धर्षयितुमिति
Assim interpelado, respondeu àquela dama kṣatriya: “Ó senhora venerável, ficai inteiramente tranquila. Takṣaka, rei das serpentes, não é capaz de me subjugar nem de me intimidar.”
Verse 113
स एवमुक्त्वा तां क्षत्रियामामन्त्रय पौष्पसकाशमागच्छत् । आह चैनं भो: पौष्य प्रीतो5स्मीति तमुत्तड्क॑ पौष्य: प्रत्युवाच
Tendo dito isso, Uttanka despediu-se da dama kshatriya e foi ao encontro do rei Pauṣya. Dirigindo-se a ele com respeito, disse: «Ó Pauṣya, estou satisfeito». Ao ouvir tais palavras, o rei Pauṣya respondeu a Uttanka.
Verse 114
भगवंश्विरेण पात्रमासाद्यते भवांश्व गुणवानतिथिस्तदिच्छे श्राद्धं कर्तु क्रियतां क्षण इति
Rāma disse: «Venerável senhor, após muito tempo encontrou-se um recebedor verdadeiramente digno. Já que chegastes como hóspede virtuoso, desejo realizar um śrāddha. Concedei-me um instante.»
Verse 115
तमुत्तड़क: प्रत्युवाच कृतक्षण एवास्मि शीघ्रमिच्छामि यथोपपन्नमन्नमुपस्कृतं भवतेति स तथेत्युक्त्वा यथोपपन्नेनान्नेनेने भोजयामास
Uttaṅka respondeu: «O tempo combinado já me foi concedido; ainda assim, desejo presteza. Mandai trazer o alimento que houver em vossa casa, puro e devidamente preparado.» O rei disse: «Assim seja», e então o alimentou com o que já estava pronto.
Verse 116
अथोत्तड़क: सकेशं शीतमन्नं दृष्टवा अशुच्येतदिति मत्वा तं पौष्यमुवाच यस्मान्मे5शुच्यन्नं ददासि तस्मादन्धो भविष्यसीति
Então Uttaṅka, vendo que a comida tinha um cabelo e já estava fria, concluiu: «Isto é impuro.» E disse ao rei Pauṣya: «Já que me deste alimento impuro, ficarás cego.»
Verse 117
त॑ पौष्य: प्रत्युवाच यस्मात्त्वमप्यदुष्टमन्नं दूषयसि तस्मात्त्वमनपत्यो भविष्यसीति तमुत्तड़क: प्रत्युवाच
O rei Pauṣya respondeu em retorno: «Já que condenas como impuro até o alimento que não o é, ficarás sem descendência.» Então Uttaṅka lhe replicou.
Verse 118
न युक्त भवतान्नमशुचि दत्त्वा प्रतिशापं दातुं तस्मादन्नमेव प्रत्यक्षीकुरु । ततः पौष्यस्तदन्नमशुचि दृष्टवा तस्याशुचिभावमपरोक्षयामास
Rama disse: “Não é correto que ofereças alimento impuro e depois, em troca, profiras uma contra-maldição. Portanto, examina primeiro o próprio alimento, diretamente.” Então Pauṣya, vendo que o alimento era de fato impuro, tornou evidente a causa de sua impureza e disse: “Ó rei, nunca é justo oferecer comida imunda e depois retribuir com uma maldição; por isso, olha primeiro para o alimento.” Em seguida, Pauṣya, tendo observado a impureza da comida, apurou a razão de sua contaminação.
Verse 119
अथ तदन्नं मुक्तकेश्या स्त्रिया यत् कृतमनुष्णं सकेशं चाशुच्येतदिति मत्वा तमृषिमुत्तड़क॑ प्रसादयामास
Então, considerando que a comida fora preparada por uma mulher de cabelos soltos, e que por isso um fio de cabelo nela caíra e, além disso, por ter sido feita há algum tempo, esfriara, o rei a julgou impura. Com tal conclusão, procurou apaziguar o sábio Uttaṅka e falou em tom conciliador—não por desrespeito, mas por zelo da pureza ritual e da devida correção.
Verse 120
भगवजन्नेतदज्ञानादन्न॑ं सकेशमुपाहतं शीतं तत् क्षामये भवन्तं न भवेयमन्ध इति तमुत्तड़क: प्रत्युवाच
Rama disse: “Venerável senhor, por ignorância trouxe-vos alimento em que há cabelos e que já se tornou frio. Por esta falta peço-vos perdão. Concedei-me tal graça que eu não venha a ficar cego.” Assim interpelado, Uttaṅka respondeu ao rei—(e a narrativa prossegue).
Verse 121
न मृषा ब्रवीमि भूत्वा त्वमन्धो न चिरादनन्धो भविष्यसीति | ममापि शापो भवता दत्तो न भवेदिति
Rāma disse: “Não falo em vão. Ficarás cego, mas não por muito; antes que muitos dias passem, estarás livre desse mal. Agora, ó rei, esforça-te também para que a maldição que pronunciaste não venha a ter efeito sobre mim.”
Verse 122
त॑ पौष्य: प्रत्युवाच न चाहं शक्तः शापं प्रत्यादातुं न हि मे मन्युरद्याप्युपशमं गच्छति कि चैतद् भवता न ज्ञायते यथा--
Pauṣya respondeu: “Não sou capaz de retirar a maldição; minha ira ainda não se aquietou. E acaso não sabes como é?—” (Ele está prestes a explicar as diferenças de temperamento entre as ordens: o coração do brâmane é macio, embora sua fala possa cortar; já a fala do kṣatriya pode ser branda, embora seu coração possa ser duro).
Verse 123
नवनीतं ह्ृदयं ब्राह्मणस्य वाचि क्षुरो निहितस्तीक्षणधार: । तदुभयमेतद्ू विपरीत क्षत्रियस्य वाड्नवनीतं हृदयं तीक्ष्णधारम् | इति
“O coração de um brāhmaṇa é como manteiga fresca—macio e pronto a derreter—mas em sua fala repousa uma lâmina de barbear, de fio agudo. Num kṣatriya, porém, essas duas coisas se invertem: sua palavra é macia como manteiga, e seu coração é cortante como a lâmina.” Na narrativa, esse contraste é invocado para explicar por que uma maldição proferida na ira é difícil de retirar: pode haver brandura por dentro, mas as palavras ferem com força decisiva e irreversível.
Verse 124
तदेवं गते न शक्तो5हं तीक्षणहृदयत्वात् तं शापमन्यथा कर्तु गम्यतामिति । तमुत्तड़क: प्रत्युवाच भवताहमन्नस्याशुचिभावमालक्ष्य प्रत्यनुनीत: प्राक् च तेडभिहितम्
Rama disse: “Tendo as coisas chegado a este ponto, não posso—pela dureza do meu coração—alterar aquela maldição. Portanto, parte.” Uttanka respondeu: “Ó rei! Quando percebeste a impureza do alimento, procuraste apaziguar-me com súplicas; contudo, antes declararas: ‘Estás chamando impuro um alimento puro; por isso, que fiques sem descendência.’ Agora que o defeito do alimento foi provado, essa maldição não pode, com justiça, recair sobre mim.”
Verse 125
यस्माददुष्टमन्नं दूषयसि तस्मादनपत्यो भविष्यसीति । दुष्टे चान्ने नैष मम शापो भविष्यतीति
Rama disse: “Já que estás condenando alimento que não está maculado, por isso ficarás sem descendência.” Mas quando se verificou que o alimento estava, de fato, maculado, acrescentou: “No caso de alimento maculado, esta maldição minha não surtirá efeito.” O episódio moldura uma tensão moral: um juízo apressado atrai uma consequência severa, mas a verdade, uma vez estabelecida, limita a legitimidade da maldição e restaura o equilíbrio ético.
Verse 126
साधयामस्तावदित्युक्त्वा प्रातिष्ठतोत्तड़कस्ते कुण्डले गृहीत्वा सो5पश्यदथ पथि नग्नं क्षपषणकमागच्छन्तं मुहुर्मुहुर्दश्यमानमदृश्यमानं च
Dizendo: “Por ora, cumpramos o nosso intento”, Uttanka partiu, levando os dois brincos. No caminho, viu então um asceta nu, do tipo kṣapaṇaka, aproximando-se por trás—aparecendo repetidas vezes e, em seguida, sumindo da vista. O episódio ressalta como uma missão reta pode ser provada por aparências enganosas e como é necessária vigilância para resguardar o que foi confiado.
Verse 127
अथोत्तड़कस्ते कुण्डले संन्यस्य भूमावुदकार्थ प्रचक्रमे । एतस्मिन्नन्तरे स क्षपणकस्त्वरमाण उपसृत्य ते कुण्डले गृहीत्वा प्राद्रवत्
Então Uttanka pousou os dois brincos no chão e começou a cumprir seus ritos de água. Nesse mesmo intervalo, um mendicante (kṣapaṇaka), apressando-se, aproximou-se, tomou os brincos e saiu correndo. O episódio ressalta o perigo ético da negligência: até uma tarefa justa, se feita sem vigilância e discernimento, pode abrir a porta à perda e ao erro alheio.
Verse 128
तमुत्तड़को5भिसृत्य कृतोदककार्य: शुचि: प्रयतो नमो देवेभ्यो गुरुभ्यश्न कृत्वा महता जवेन तमन्वयात्
Uttanka concluiu os deveres ligados à água—o banho, a oferenda de água (tarpaṇa) e outros ritos—e, purificado e recolhido, prestou reverência aos deuses e aos seus mestres. Em seguida saiu da água e, com grande ímpeto, pôs-se a perseguir aquele asceta mendicante.
Verse 129
तस्य तक्षको दृढ्मासन्न: स तं जग्राह गृहीतमात्र: स तद्रूपं विहाय तक्षकस्वरूपं कृत्वा सहसा धरण्यां विवृतं महाबिलं॑ प्रविवेश
Takṣaka chegou muito perto dele. No instante em que foi agarrado, abandonou o disfarce e, assumindo sua forma verdadeira de serpente, Takṣaka, lançou-se de súbito numa vasta abertura que se escancarou na terra.
Verse 130
प्रविश्य च नागलोकं॑ स्वभवनमगच्छत् । अथोत्तड्कस्तस्या: क्षत्रियाया वचः स्मृत्वा तं तक्षकमन्वगच्छत्
Ao entrar na abertura, ele chegou ao reino dos Nāgas e foi para a sua própria morada. Então Uttanka, lembrando-se das palavras daquela senhora kṣatriya, perseguiu Takṣaka até o mundo dos Nāgas.
Verse 131
स तद् बिलं दण्डकाछ्लेन चखान न चाशकत् । तं क्लिश्यमानमिन्द्रोडपश्यत् स वजन प्रेषयामास
Ele começou a cavar aquela toca com um bastão de madeira, mas não conseguiu. Indra viu-o lutar em aflição e, para ajudá-lo, enviou o seu Vajra, o raio.
Verse 132
गच्छास्य ब्राह्मणस्य साहाय्यं कुरुष्वेति । अथ वज्ं दण्डकाष्ठमनुप्रविश्य तद् बिलमदारयत्
Indra disse ao Vajra: “Vai e presta auxílio a este brāhmaṇa.” Então o Vajra entrou na madeira do bastão e fendeu aquela toca, abrindo uma passagem para baixo.
Verse 133
तमुत्तड़को5नुविवेश तेनैव बिलेन प्रविश्य च तं नागलोकमपर्यन्तमनेकविधप्रासादहर्म्यवलभीनिर्यूहशतसंकुलमुच्चावचक्रीडा श्चर्य स्थानावकीर्णमपश्यत्
Uttaṅka entrou por aquela mesma toca; avançando para dentro pelo mesmo corredor, contemplou o reino dos Nāgas—sem limites em sua vastidão—apinhado de centenas de construções: templos e palácios de muitos tipos, salões elevados com beirais inclinados e galerias salientes, e incontáveis entradas. Estava repleto de recintos de recreio maravilhosos, de todo tamanho e variedade. Ali ele louvou as serpentes em versos: “Vitória às serpentes cujo rei é Airāvata—que resplandecem no campo de batalha e, como nuvens de chuva impelidas por relâmpago e vento, derramam uma chuva ininterrupta de flechas.”
Verse 134
स तत्र नागांस्तानस्तुवदेभि: श्लोकै:-- य ऐरावतराजान: सर्पा: समितिशोभना: । क्षरन्त इव जीमूता: सविद्युत्पवनेरिता:
Ali ele louvou aqueles Nāgas com estes versos: “Vitória às serpentes cujo rei é Airāvata—serpentes que brilham no choque da batalha e que, como nuvens de chuva impelidas por relâmpago e vento, derramam uma chuva ininterrupta (de flechas).”
Verse 135
सुरूपा बहुरूपाश्च तथा कल्माषकुण्डला: । आदित्यवन्नाकपृष्ठे रेजुरैरावतोद्धवा:
“Muitos entre as hostes de serpentes nascidas na linhagem de Airāvata eram belos de forma e múltiplos em aparência. Usando brincos malhados e maravilhosos, brilhavam no firmamento como o Sol, radiante nas alturas do céu.”
Verse 136
बहूनि नागवेश्मानि गज्जायास्तीर उत्तरे । तत्रस्थानपि संस्तौमि महतः पन्नगानहम्,गंगाजीके उत्तर तटपर बहुत-से नागोंके घर हैं, वहाँ रहनेवाले बड़े-बड़े सर्पोकी भी मैं स्तुति करता हूँ
“Na margem norte do Gaṅgā há muitas moradas dos Nāgas. Eu também ofereço louvor às grandes serpentes que ali residem.”
Verse 137
इच्छेत् को<र्काशुसेनायां चर्तुमैरावतं विना । शतान्यशीतिरष्टी च सहस्राणि च विंशति:
Rāma disse: “Quem, sem Airāvata, poderia sequer desejar mover-se no exército abrasador do Sol? Vinte e oito mil serpentes vão até lá como as rédeas dos cavalos do Sol.”
Verse 138
सर्पाणां प्रग्रहा यान्ति धृतराष्ट्रो यदैजति । ये चैनमुपसर्पन्ति ये च दूरपथं गता:
Quando Dhṛtarāṣṭra (a serpente) avança em serviço de acompanhamento, hostes de serpentes tornam-se as rédeas. Algumas se aproximam e o seguem de perto, enquanto outras percorrem caminhos distantes. A passagem evoca uma visão de ordem cósmica: até seres formidáveis como os nāgas assumem papéis disciplinados no séquito do Sol, sugerindo que o poder encontra seu devido lugar quando se alinha a um princípio superior, sustentador.
Verse 139
अहमैरावतज्येष्ठ भ्रातृभ्योडकरवं नम: । यस्य वास: कुरुक्षेत्रे खाण्डवे चाभवत् पुरा
Rāma disse: “Ofereço minhas reverências aos irmãos mais velhos de Airāvata; àquele cuja morada, outrora, foi em Kurukṣetra e também na floresta de Khāṇḍava.”
Verse 140
त॑ नागराजमस्तौषं कुण्डलार्थाय तक्षकम् | तक्षवश्चाश्वसेनश्व नित्यं सहचरावुभौ
Rāma disse: “Para obter os brincos divinos, louvo Takṣaka, rei das serpentes. Takṣaka e Aśvasena são companheiros constantes, movendo-se sempre juntos.”
Verse 141
कुरुक्षेत्र च वसतां नदीमिक्षुमतीमनु । जघन्यजस्तक्षकस्य श्रुतसेनेति य: श्रुत:ः
Rāma disse: “Eu me inclino diante de Śrutasena, célebre como o irmão mais novo de Takṣaka, que habitou em Kurukṣetra ao longo do rio Ikṣumatī. Nesta lembrança, o orador honra a linhagem dos Nāgas enraizada numa geografia sagrada, apresentando como virtudes o parentesco, a precedência dos mais velhos e a aspiração disciplinada.”
Verse 142
अवसद् यो महद्युम्नि प्रार्थयन् नागमुख्यताम् । करवाणि सदा चाहं नमस्तस्मै महात्मने
Rāma disse: “Ó tu de grande esplendor, ofereço continuamente reverência àquele ser de alma elevada que empreendeu severas austeridades, buscando o posto supremo entre os Nāgas. Que eu possa sempre prestar-lhe homenagem.”
Verse 143
एवं स्तुत्वा स विप्रर्षिरुत्तड़को भुजगोत्तमान् | नैव ते कुण्डले लेभे ततश्चिन्तामुपागमत्
Tendo assim louvado aquelas serpentes excelsas, o brahmarṣi Uttaṅka ainda não obteve o par de brincos. Então foi tomado por ansiosa preocupação — sua mente voltou-se ao dever assumido e ao temor de falhar em sua obrigação.
Verse 144
एवं स्तुवन्नपि नागान् यदा ते कुण्डले नालभत तदापश्यत् स्त्रियौ तन्त्रे अधिरोप्य सुवेमे पर्ट वयन्त्यौ । तस्मिंस्तन्त्रे कृष्णा: सिताश्न तन्तवश्नक्र चापश्यद् द्वादशारं षड्भि: कुमारै: परिवर्त्यमानं पुरुषं चापश्यदश्वंं च दर्शनीयम्
Mesmo continuando a louvar os Nāgas, como não conseguia obter o par de brincos, ele então viu duas mulheres tecendo um tecido num tear primoroso. Na urdidura, percebeu fios de dois tipos — negros e brancos — e viu também uma roda de doze raios, girada por seis jovens. Ali ainda avistou uma Pessoa nobre e, com ela, um cavalo formoso. Então Uttaṅka os louvou com versos semelhantes a mantras.
Verse 145
स तान् सर्वास्तुष्टाव एभिममन्त्रवदेव श्लोकै:
Ele os louvou a todos com versos que eram como mantras.
Verse 146
त्रीण्यर्पितान्यत्र शतानि मध्ये षष्टिश्व नित्यं चरति ध्रुवेडस्मिन् । चक्रे चतुर्विशतिपर्वयोगे षड् वै कुमारा: परिवर्तयन्ति
Rāma disse: “Dentro desta roda do Tempo, firme e imperecível, que se move sem cessar, há trezentos e sessenta raios. Unida por vinte e quatro ‘juntas’ (divisões), esta roda é girada repetidas vezes por seis potências juvenis.”
Verse 147
तन्त्रं चेद॑ विश्वरूपे युवत्यौ वयतस्तन्तून् सतत वर्तयन्त्यौ । कृष्णान् सितांश्वैव विवर्तयन्त्यौ भूतान्यजस््रं भुवनानि चैव
Se alguém contempla o tear cósmico: duas jovens donzelas — as potências sempre móveis do Tempo — sem cessar puxam e fazem girar os fios, negros e brancos, tecendo o tecido do enredamento mundano. Por seu movimento incessante, todos os seres e todos os mundos são continuamente postos em marcha e governados.
Verse 148
वज्स्य भर्ता भुवनस्य गोप्ता वृत्रस्थ हन्ता नमुचेर्निहन्ता । कृष्णे वसानो वसने महात्मा सत्यानृते यो विविनक्ति लोके
Rama disse: “Eu me inclino diante de Purandara (Indra)—o portador do vajra, protetor dos mundos, matador de Vṛtra e destruidor de Namuci; o grande de alma, vestido de trajes escuros, que no mundo distingue a verdade da falsidade.”
Verse 149
यो वाजिन गर्भमपां पुराणं वैश्वानरं वाहनमभ्युपैति । नमोअस्तु तस्मै जगदी श्चराय लोकत्रयेशाय पुरन्दराय
Rama disse: “Homenagem a esse Purandara—Senhor do universo e governante dos três mundos—que se aproxima e monta como seu veículo o antigo Vaiśvānara, o ‘embrião’ nascido das águas, na forma de um corcel. A esse soberano protetor dos mundos eu me inclino.”
Verse 150
ततः स एन पुरुष: प्राह प्रीतो5स्मि तेडहमनेन स्तोत्रेण कि ते प्रियं करवाणीति स तमुवाच
Então aquele ser misterioso, satisfeito, disse: “Ó brâmane! Estou muito contente contigo por causa deste hino de louvor. Dize: que desejo teu, tão caro, devo realizar?” Ao ouvir isso, Uttanka respondeu, pronto para declarar a dádiva que buscava.
Verse 151
नागा मे वशमीयुरिति स चैन पुरुष: पुनर॒ुवाच एतमश्वमपाने धमस्वेति,“सब नाग मेरे अधीन हो जायँ"--उनके ऐसा कहनेपर वह पुरुष पुनः उत्तंकसे बोला --“इस घोड़ेकी गुदामें फूँक मारो”
Quando ele disse: “Que os Nāgas se submetam ao meu poder”, aquele homem tornou a falar a Uttanka: “Sopra no ânus deste cavalo.”
Verse 152
ततो<श्वस्यापानमधमत् ततो<श्वाद्धम्यमानात् सर्वस््रोतो भ्य: पावकार्चिष: सधूमा निष्पेतु:
Então ele soprou no apāna do cavalo (a abertura anal). E, enquanto o cavalo era assim soprado, labaredas de fogo—acompanhadas de fumaça—irromperam de todos os canais e aberturas do seu corpo.
Verse 153
ताभिनागलोक उपधूपितेड्थ सम्भ्रान्तस्तक्षकोड्ग्नेस्तेजोभयाद्ू_ विषण्ण: कुण्डले गृहीत्वा सहसा भवनान्निष्क्रम्योत्तड़कमुवाच
Quando todo o reino dos Nāgas ficou sufocado pela fumaça, Takṣaka foi tomado pelo pânico. Aflito pelo medo das chamas ardentes, apanhou o par de brincos e, saindo às pressas de sua morada, dirigiu-se a Uttanka.
Verse 154
इमे कुण्डले गृह्नातु भवानिति स ते प्रतिजग्राहोत्तड़क: प्रतिगृह्दा च कुण्डलेडचिन्तयत्,“ब्रह्म! आप ये दोनों कुण्डल ग्रहण कीजिये।” उत्तंकने उन कुण्डलोंको ले लिया। कुण्डल लेकर वे सोचने लगे--
Ele disse: “Por favor, aceite estes dois brincos.” Então Uttanka os recebeu; e, tendo-os agora em sua posse, começou a refletir—sobre o que deveria ser feito em seguida.
Verse 155
अद्य तत् पुण्यकमुपाध्यायान्या दूरं चाहमभ्यागत: स कथं सम्भावयेयमिति तत एन॑ चिन्तयानमेव स पुरुष उवाच
Uttanka pensou: “Hoje é a observância auspiciosa da esposa do meu mestre, e eu vim de muito longe. Numa situação assim, como poderei honrá-la devidamente com estes brincos?” Enquanto permanecia imerso nessa reflexão ansiosa, aquele homem lhe falou.
Verse 156
उत्तड़क एनमेवाश्वमधिरोह वत्वां क्षणेनैवोपाध्यायकुलं प्रापयिष्पतीति,“उत्तंक! इसी घोड़ेपर चढ़ जाओ। यह तुम्हें क्षणभरमें उपाध्यायके घर पहुँचा देगा”
Aquele homem disse: “Uttanka, monta neste mesmo cavalo. Num instante ele te levará à casa do teu mestre.”
Verse 157
स तथेत्युक्त्वा तमश्वमधिरुह्य प्रत्याजगामोपाध्यायकुलमुपाध्यायानी च स्नाता केशानावापयन्त्युपविष्टोत्तड़को नागच्छतीति शापायास्य मनो दथे
Dizendo “Assim seja”, Uttanka montou aquele cavalo e, de imediato, retornou à casa do seu mestre. Enquanto isso, a esposa do mestre, após banhar-se, sentou-se e começou a arrumar os cabelos. Pensando: “Uttanka ainda não chegou”, inclinou o coração a amaldiçoar o discípulo.
Verse 158
अथ तस्मिन्नन्तरे स उत्तड़कः: प्रविश्य उपाध्यायकुलमुपाध्यायानीम भ्यवादयत् ते चास्यै कुण्डले प्रायच्छत् सा चैन प्रत्युवाच
Enquanto isso, Uttaṅka entrou na casa de seu mestre e saudou respeitosamente a esposa do preceptor. Em seguida, apresentou-lhe o par de brincos. Tendo-os recebido, a esposa do mestre dirigiu-se a Uttaṅka—assinalando o momento em que sua diligente incumbência se cumpre, e em que o peso moral passa ao que ela irá instruir ou exigir a seguir.
Verse 159
उत्तड़क देशे काले<भ्यागत: स्वागतं ते वत्स त्वमनागसि मया न शप्तः श्रेयस्तवोपस्थितं सिद्धिमाप्रुहीति
Ela disse: “Uttaṅka, chegaste ao lugar e ao tempo oportunos. Meu filho, sê bem-vindo. Ainda bem que não te amaldiçoei sem que tivesses culpa. O teu bem-estar já se apresenta: alcança a realização.”
Verse 160
अथोत्तड़क उपाध्यायमभ्यवादयत् । तमुपाध्याय: प्रत्युवाच वत्सोत्तड़क स्वागतं ते किं चिरं कृतमिति
Em seguida, Uttaṅka saudou respeitosamente o seu mestre. O mestre respondeu: “Meu filho Uttaṅka, sê bem-vindo. Por que demoraste tanto?” Depois disso, Uttaṅka prostrou-se aos pés do mestre. O mestre lhe disse: “Querido Uttaṅka, és bem-vindo—por que atrasaste o teu retorno?”
Verse 161
तमुत्तड़क उपाध्यायं प्रत्युवाच भोस्तक्षकेण मे नागराजेन विघ्न: कृतो5स्मिन् कर्मणि तेनास्मि नागलोक॑ गत:
Ele respondeu ao mestre: “Senhor, o rei das serpentes Takṣaka criou um impedimento nesta minha tarefa; por isso fui ao reino dos Nāgas.”
Verse 162
तत्र च मया दृष्टे स्त्रियां तन्त्रेडथिरोप्य पर्ट वयन्त्यौ तस्मिंश्न कृष्णा: सिताश्न तनन््तव: कि तत्
“Lá eu vi duas mulheres tecendo um pano, depois de disporem os fios num tear. Naquele tear havia fios negros e fios brancos. Que significava aquilo?”
Verse 163
तत्र च मया चक्र दृष्ट द्वादशारं षट् चैनं कुमारा: परिवर्तयन्ति तदपि किम् । पुरुषश्चापि मया दृष्ट: स चापि कः । अभश्वश्लातिप्रमाणो दृष्ट: स चापि क:
Ali também vi uma roda de doze raios, e seis jovens a faziam girar—o que era aquilo? Vi também um homem ali—quem era ele? E vi um cavalo de tamanho imenso—quem era aquele?
Verse 164
पथि गच्छता च मया ऋषभो दृष्टस्तं च पुरुषो5धिरूढस्तेनास्मि सोपचारमुक्त उत्तड़कास्य ऋषभस्य पुरीषं भक्षय उपाध्यायेनापि ते भक्षितमिति
Enquanto eu seguia pela estrada, vi um touro, e um homem montado sobre ele. O cavaleiro falou-me com cortesia insistente e disse: “Uttaṅka, come o esterco deste touro. O teu próprio mestre já o comeu antes.”
Verse 165
ततस्तस्य वचनान्मया तदृषभस्य पुरीषमुपयुक्ते स चापि कः । तदेतद् भवतोपदिष्टमिच्छेयं श्रोतुं किं तदिति । स तेनैवमुक्त उपाध्याय: प्रत्युवाच
Então, a mando daquele homem, comi o esterco daquele touro. Quem eram, na verdade, aquele touro e aquele homem? Desejo ouvir da tua própria boca, como me instruíste, o que tudo isso significava. Tendo ele falado assim, o mestre respondeu—
Verse 166
ये ते स्त्रियौ धाता विधाता च ये च ते कृष्णा: सितास्तन्तवस्ते रातज्यहनी । यदपि तच्चक्रं द्वादशारं षड़् वै कुमारा: परिवर्तयन्ति तेडपि षड़् ऋतव: द्वादशारा द्वादश मासा: संवत्सरश्षक्रम्
Rāma disse: “As duas mulheres que viste são Dhātā e Vidhātā, os ordenadores cósmicos. Os fios negros e brancos são a Noite e o Dia. A roda de doze raios, que seis jovens faziam girar, é o ciclo das seis estações; seus doze raios são os doze meses. Essa roda é o próprio Ano (Saṃvatsara), o grande giro pelo qual se medem o tempo e o dharma.”
Verse 167
यः पुरुष: स पर्जन्यो यो<श्वः सोडग्निर्य ऋषभस्त्वया पथि गच्छता दृष्ट: स ऐरावतो नागराट्
Rāma disse: “O homem que viste era Parjanya (Indra) disfarçado; o cavalo era Agni; e o touro que notaste na estrada enquanto viajavas era Airāvata, rei dos Nāga. Assim, o que parecia comum era, na verdade, divino—pois o mundo muitas vezes prova e guia os viajantes por formas ocultas.”
Verse 168
यश्नैनमधिरूढ: पुरुष: स चेन्द्रो यदपि ते भक्षितं तस्य ऋषभस्य पुरीषं तदमृतं तेन खल्वसि तस्मिन् नागभवने न व्यापन्नस्त्वम्
Rama disse: “O homem que montava aquele touro era o próprio Indra. E o esterco daquele touro que tu comeste era, na verdade, amrita. É por causa dessa substância semelhante ao néctar que, mesmo ao chegares à morada dos Nāgas, não pereceste.”
Verse 169
स हि भगवानिन्द्रो मम सखा त्वदनुक्रोशादि-ममनुग्रहं कृतवान् । तस्मात् कुण्डले गृहीत्वा पुनरागतोडसि
“Pois o bem-aventurado Indra é meu amigo; por compaixão para convosco, concedeu-me seu favor. Por isso, tendo tomado o par de brincos, voltastes aqui novamente.”
Verse 170
तत् सौम्य गम्यतामनुजाने भवन्तं श्रेयोडवाप्स्यसीति । स उपाध्यायेनानुज्ञातो भगवानुत्तड़कः: क्रुद्धस्तक्षकं प्रतिचिकीर्षमाणो हास्तिनपुरं प्रतस्थे
“Meu caro, podes ir agora; concedo-te licença. Alcançarás o que é verdadeiramente auspicioso.” Assim, autorizado por seu mestre, o venerável Uttanka—enfurecido contra Takṣaka e decidido à retaliação—partiu para Hāstinapura.
Verse 171
स हास्तिनपुरं प्राप्प न चिराद् विप्रसत्तम: । समागच्छत राजानमुत्तड़को जनमेजयम्,हस्तिनापुरमें शीघ्र पहुँचकर विप्रवर उत्तंक राजा जनमेजयसे मिले
Em pouco tempo, Uttanka, o mais eminente dos brāhmaṇas, chegou a Hāstināpura e apresentou-se ao rei Janamejaya.
Verse 172
पुरा तक्षशिलासंस्थ॑ं निवृत्तमपराजितम् । सम्यग्विजयिन दृष्टवा समन्तान्मन्त्रिभिवृतम्
Outrora, o rei Janamejaya fora a Takṣaśilā e retornara invicto. Uttanka viu o rei, plenamente bem-sucedido em sua campanha, cercado por seus ministros de todos os lados. Primeiro, segundo o decoro devido, ofereceu-lhe bênçãos ligadas à vitória; depois, no momento oportuno, dirigiu-se a ele com palavras bem escolhidas.
Verse 173
तस्मै जयाशिष: पूर्व यथान्यायं प्रयुज्य सः । उवाचैनं वच: काले शब्दसम्पन्नया गिरा
Tendo primeiro, na forma devida e conforme à conveniência, oferecido bênçãos de vitória, então, no momento oportuno, dirigiu-se a ele com palavras ornadas por expressões bem escolhidas. (No contexto: Uttaṅka, ao ver o rei Janamejaya—cercado de ministros e já de volta de Takṣaśilā com êxito completo—primeiro concede a bênção costumeira e depois inicia sua mensagem.)
Verse 174
उत्तड्ुक उवाच अन्यस्मिन् करणीये तु कार्ये पार्थिवसत्तम | बाल्यादिवान्यदेव त्वं कुरुषे नृपसत्तम
Uttaṅka disse: “Ó melhor dos reis! Quando há outro dever que de fato deve ser cumprido, tu—por ignorância infantil—estás a fazer outra coisa, ó soberano excelso.”
Verse 175
सौतिर्वाच एवमुक्तस्तु विप्रेण स राजा जनमेजय: । अर्चयित्वा यथान्यायं प्रत्युवाच द्विजोत्तमम्
Sauti (Ugraśravas) disse: Assim interpelado pelo brāhmaṇa, o rei Janamejaya—depois de honrá-lo devidamente segundo a regra—respondeu àquele mais eminente entre os duas-vezes-nascidos.
Verse 176
जनमेजय उवाच आसां प्रजानां परिपालनेन स्वं क्षत्रधर्म परिपालयामि । प्रत्रुहि मे किं करणीयमद्य येनासि कार्येण समागतस्त्वम्
Janamejaya disse: “Ó brāhmaṇa! Ao proteger estes súditos, cumpro o meu dever de kṣatriya. Dize-me: que é o que devo fazer hoje? Com que propósito vieste aqui?”
Verse 177
सौतिर्वाच स एवमुक्तस्तु नृपोत्तमेन द्विजोत्तम: पुण्यकृतां वरिष्ठ: । उवाच राजानमदीनसत्त्व॑ स्वमेव कार्य नृपते कुरुष्व
Sauti disse: Assim inquirido pelo melhor dos reis, aquele brāhmaṇa eminente—o primeiro entre os que praticam o mérito—falou ao rei de ânimo intrépido: “Ó rei, esta tarefa não é minha; é tua, e somente tua. Deves realizá-la.”
Verse 178
उत्तड़क उवाच तक्षकेण महीन्द्रेन्द्र येन ते हिंसित: पिता । तस्मै प्रतिकुरुष्व त्वं पन्नगाय दुरात्मने
Uttaṅka disse: «Ó melhor dos reis! Foi Takṣaka quem fez mal a teu pai. Portanto, deves exigir retribuição dessa serpente perversa.» Assim, Uttaṅka impele o soberano à vingança, apresentando-a como dever régio diante de uma injúria grave—mas o apelo também suscita a tensão ética entre justiça e ira retaliatória.
Verse 179
कार्यकाल हि मन्ये5हं विधिदृष्टस्थ कर्मण: । तद्गच्छापचितिं राजन् पितुस्तस्य महात्मन:
Uttaṅka disse: «Entendo que este é o momento próprio para agir—o rito prescrito nas ordenanças sagradas. Portanto, ó rei, vai e exige a devida retribuição pela morte de teu nobre pai.»
Verse 180
तेन हानपराधी स दष्टो दुष्टान्तरात्मना । पज्चत्वमगमद् राजा वज्राहत इव द्रुम:
Embora estivesse livre de qualquer culpa, o rei foi mordido por aquela serpente de íntima perversidade; e o soberano encontrou a morte de imediato, como uma árvore derrubada por um raio. A passagem ressalta o poder trágico da malícia e a vulnerabilidade até do inocente quando o adharma assume forma violenta.
Verse 181
बलदर्पसमुत्सिक्तस्तक्षक: पन्नगाधम: । अकार्य कृतवान् पापो यो5दशत् पितरं तव,सर्पोमें अधम तक्षक अपने बलके घमण्डसे उन्मत्त रहता है। उस पापीने यह बड़ा भारी अनुचित कर्म किया जो आपके पिताको डँस लिया
Uttanka disse: «Takṣaka—o mais vil entre as serpentes—embriagou-se de arrogância nascida de sua força. Esse pecador cometeu um grave erro: mordeu teu pai.» A afirmação enquadra o ato não apenas como injúria, mas como transgressão ética movida pelo orgulho, intensificando a urgência moral por reparação.
Verse 182
राजर्षिवंशगोप्तारममरप्रतिमं नृपम् । यियासुं काश्यपं चैव न्यवर्तयत पापकृत्
Aquele rei—guardião da linhagem dos reis-ṛṣi e radiante como os deuses—deveria ser protegido pelo brāhmaṇa chamado Kāśyapa, que vinha a caminho dele. Mas o malfeitor pecaminoso fez Kāśyapa voltar, obstruindo o auxílio que poderia preservar o rei e o dharma da dinastia.
Verse 183
होतुमर्हसि तं पापं ज्वलिते हव्यवाहने । सर्पसत्रे महाराज त्वरितं तद् विधीयताम्
Uttanka disse: “Ó rei, deves oferecer esse pecador como oblação no fogo em chamas. Que se empreenda o sacrifício das serpentes, e que este ato seja realizado sem demora.”
Verse 184
एवं पितुश्चापचितिं कृतवांस्त्वं भविष्यसि । मम प्रियं च सुमहत् कृतं राजन् भविष्यति
“Fazendo isso, terás pago a dívida de retribuição pela morte de teu pai, e também se cumprirá um desejo meu muito querido, ó rei. Ó governante que protege toda a terra, Takṣaka é extremamente perverso. Ó grande rei sem mácula, eu ia realizar uma tarefa para meu mestre, e esse vilão nela causou um grave impedimento.”
Verse 185
कर्मण: पृथिवीपाल मम येन दुरात्मना | विघ्न: कृतो महाराज गुर्वर्थ चरतोडनघ
Uttanka disse: “Ó protetor da terra, ó grande rei, foi aquele perverso quem me causou um impedimento enquanto eu estava empenhado numa tarefa para meu mestre—ó governante sem pecado—(é contra ele que busco reparação).”
Verse 186
सौतिर्वाच एतच्छुत्वा तु नृपतिस्तक्षकाय चुकोप ह । उत्तड़कवाक्यहविषा दीप्तोडग्नि्हविषा यथा
Sauti disse: “Ó sábios, ao ouvir esse relato, o rei Janamejaya inflamou-se de ira contra Takṣaka. As palavras de Uttanka foram como uma oblação de ghee derramada no fogo: assim como tal oferta faz a chama erguer-se mais alta, do mesmo modo a cólera do rei se acendeu ainda mais.”
Verse 187
अपृच्छत् स तदा राजा मन्त्रिणस्तान् सुदु:ःखित: । उत्तड़कस्यैव सांनिध्ये पितु: स्वर्गगतिं प्रति,उस समय राजा जनमेजयने अत्यन्त दुःखी होकर उत्तंकके निकट ही मन्त्रियोंसे पिताके स्वर्गगमनका समाचार पूछा
Então o rei Janamejaya, tomado de profunda tristeza, perguntou a seus ministros—enquanto Uttanka permanecia ali perto—sobre o relato da partida de seu pai para o céu.
Verse 188
तदैव हि स राजेन्द्रो दुःखशोकाप्लुतो5 भवत् | यदैव वृत्तं पितरमुत्तड़कादशूणोत् तदा,उत्तंकके मुखसे जिस समय उन्होंने पिताके मरनेकी बात सुनी, उसी समय वे महाराज दुःख और शोकमें डूब गये
Naquele exato momento, o rei—subjugado pela dor e pelo luto—foi lançado numa angústia profunda; pois, assim que ouviu de Uttadaka a notícia da morte de seu pai, seu coração foi golpeado pela perda. A passagem ressalta a força natural do vínculo filial e o peso ético de ouvir e suportar uma verdade dolorosa.
Verse 631
एकां नाभि सप्तशता अरा:ः श्रिता: प्रधिष्वन्या विंशतिरपिंता अरा: । अनेमि चक्र परिवर्तते5जरं मायाश्विनौ समनक्ति चर्षणी
Rāma disse: “É uma roda maravilhosa: tem um único cubo; nela estão assentados setecentos raios, e mais vinte raios também se acham fixos em sua borda. Essa roda sem aro gira sem envelhecer. Dois cavalos, mestres em tecer ilusões, a puxam, e os de discernimento contemplam o seu movimento.” Nessa imagem, o ensinamento aponta para o curso incessante do tempo e do processo mundano—vasto, intricado e aparentemente autossustentado—exortando o ouvinte a cultivar discernimento, em vez de ser levado pelas aparências.
The chapter repeatedly tests whether duty is followed without opportunism: harming the blameless (Saramā’s son), consuming resources without authorization (Upamanyu), and pursuing ends (guru-dakṣiṇā/retaliation) while maintaining purity, consent, and procedural dharma.
Ethical authority arises from restraint and correct method: loyalty to the guru, disciplined appetite, truthfulness, and lawful remediation of harm are portrayed as stabilizers of both personal character and royal policy.
Rather than a formal phalaśruti, the chapter embeds meta-validation through blessings and outcomes: the guru’s assurances (learning and welfare), the Aśvins’ restoration, and narrative causality that frames ritual action (sarpa-satra) as a consequential response within the epic’s moral architecture.
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