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सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का बीज’—शिव-उमा संवाद के माध्यम से जीव के भीतर संकल्प (हठ), श्रद्धा (गुर-वचन-प्रतीति) और काम-निग्रह का उदय। यहाँ कथा-भूमि राम-जन्म से पहले ‘अंतःकरण-शुद्धि’ की तैयारी करती है: देवहित हेतु तप, वर-चयन, और मदन-दहन द्वारा राग का क्षय—जिससे रामकथा-श्रवण/स्मरण के लिए पात्रता बनती है।
ଏହି ଖଣ୍ଡ-ଖଣ୍ଡିତ ଅଂଶ ବାଳକାଣ୍ଡର ‘ଶିବ-ଉମା’ ବୃତ୍ତାନ୍ତରେ କାମ-ବିଜୟ ଓ ବର-ନିଶ୍ଚୟର ନାଟ୍ୟ ରଚେ। ରସ-ବିନ୍ୟାସରେ ଶାନ୍ତ (ଶିବ-ସମାଧି), କରୁଣ (ରତି-ବିଲାପ), ଅଦ୍ଭୁତ (ତ୍ରିଲୋକୀରେ କାମ-ପ୍ରଭାବ), ଓ ରୌଦ୍ର (ତ୍ରିନେତ୍ର-ଉଦ୍ଘାଟନ, ମଦନ-ଦହନ)ର କ୍ରମିକ ଆରୋହ-ଅବରୋହ ଦେଖାଯାଏ। ତୁଳସୀ ଏଠାରେ ଲୋକ-ମାନସ ଭିତରେ କାମ-ଶକ୍ତିକୁ ‘ସମଷ୍ଟି-ସଂସାର’ର ବିକ୍ଷୋଭ ଭାବେ ଦେଖାନ୍ତି—ଯେଉଁଠାରେ ବିବେକ, ବ୍ରହ୍ମଚର୍ଯ୍ୟ, ଜପ, ଯୋଗ, ବୈରାଗ୍ୟ ପରି ସଦ୍ଗୁଣ ମଧ୍ୟ କ୍ଷଣମାତ୍ରକୁ ‘ପଳାଇ’ଯାଆନ୍ତି। ପରେ ଶିବ-ଦର୍ଶନରେ ସମସ୍ତ ଜୀବ ‘ଜିମି ମଦ ଉତରି ଗଏଁ ମତବାରେ’—ଏହି ଉପମା ଅଧ୍ୟାତ୍ମ-ଶାସ୍ତ୍ରୀୟ: ଈଶ୍ୱର-ସ୍ମରଣରେ ବାସନାତ୍ମକ ଉନ୍ମାଦ ଶାନ୍ତ ହୋଇଯାଏ। ସିଦ୍ଧାନ୍ତତଃ ଏହି ପ୍ରସଙ୍ଗ ରାମକଥା ପାଇଁ ଶୁଦ୍ଧ-ଚିତ୍ତର ଭୂମିକା: ଦେବ-କାର୍ଯ୍ୟ, ଗୁରୁ-ବଚନ-ପ୍ରତୀତି, ଓ ଅନଙ୍ଗ (ନିର୍ଦେହ କାମ)ର ସ୍ଥାପନା ଦ୍ୱାରା ରାଗର ନିରାକରଣ—ଯାହାରେ ଆଗକୁ ‘ସଗୁଣ-ରାମ’ର ଲୀଳା-ଭକ୍ତି ସହଜ ହୁଏ।
Verse 163 (दोहा/सोरठा)
तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु। नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु।।81।।
tumha māyā bhagavāna siva sakala jagata pitu mātu | nāi carana sira muni cale puni-puni haraṣata gātu ||81||
“ହେ ଶିବ! ତୁମେ ପ୍ରଭୁ, ତୁମେ ମାୟା ସ୍ୱୟଂ; ସମଗ୍ର ଜଗତର ପିତା ଓ ମାତା ତୁମେ।” ତାଙ୍କ ପାଦପଦ୍ମରେ ଶିର ନମାଇ ଋଷିମୁନିମାନେ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ—ବାରମ୍ବାର ଆନନ୍ଦରେ ତାଙ୍କ ଦେହ ପୁଲକିତ ହେଉଥିଲା।
Verse 164 (चौपाई)
जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए।। बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई।। भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा।। मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना।। तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला।। तेंहि सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते।। अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई।। तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे।।
jāi muninh himavaṃtu paṭhāe. kari binatī girajāhiṃ gṛha lyāe.. bahuri saptariṣi siva pahiṃ jāī. kathā umā kai sakala sunāī.. bhae magana siva sunata sanehā. haraṣi saptariṣi gavane gehā.. manu thira kari taba saṃbhu sujānā. lage karana raghunāyaka dhyānā.. tāraku asura bhayau tehi kālā. bhuja pratāpa bala teja bisālā.. tẽhi saba loka lokapati jīte. bhae deva sukha saṃpati rīte.. ajara amara so jīti na jāī. hāre sura kari bibidha larāī.. taba biraṃci sana jāi pukāre. dekhe bidhi saba deva dukhāre..
ମୁନିମାନେ ଯାଇ ହିମବନ୍ତଙ୍କୁ ପଠାଇଲେ, ବିନତୀ କରି ଗିରିଜାଙ୍କୁ ଘରକୁ ଆଣିଲେ। ପୁଣି ସପ୍ତଋଷି ଶିବଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲେ, ଉମାଙ୍କ ସମସ୍ତ କଥା ଶୁଣାଇଲେ। ସ୍ନେହର କଥା ଶୁଣି ଶିବ ମଗ୍ନ ହେଲେ, ସପ୍ତଋଷି ହର୍ଷିତ ହୋଇ ଘରକୁ ଗଲେ। ତାହାପରେ ସୁଜାନ ଶମ୍ଭୁ ମନକୁ ସ୍ଥିର କରି ରଘୁନାୟକଙ୍କ ଧ୍ୟାନ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ। ସେହି ସମୟରେ ତାରକାସୁର ଉତ୍ପନ୍ନ ହେଲା, ଭୁଜପ୍ରତାପ ବଳ ତେଜରେ ବିଶାଳ। ସେ ସମସ୍ତ ଲୋକ ଲୋକପତିଙ୍କୁ ଜିତିଲା, ଦେବତାମାନେ ସୁଖ ସମ୍ପତ୍ତିରୁ ଶୂନ୍ୟ ହେଲେ। ଅଜର ଅମର ସେ ଜିତାଯାଉ ନ ଥିଲା, ଦେବତାମାନେ ବିବିଧ ଯୁଦ୍ଧ କରି ହାରିଗଲେ। ତାହାପରେ ବିରଞ୍ଚିଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ପୁକାରିଲେ, ବିଧି ସମସ୍ତ ଦୁଃଖୀ ଦେବତାଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ।
Verse 165 (दोहा/सोरठा)
सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ। संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ।।82।।
saba sana kahā bujhāi bidhi danuja nidhana taba hoi | saṁbhu śukra saṁbhūta suta ehi jītai rana soi ||82||
ବ୍ରହ୍ମା ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସ୍ପଷ୍ଟ କରି ବୁଝାଇଲେ—ଏହିପରି ହେଲେ ମାତ୍ର ଦାନବବିନାଶ ସିଦ୍ଧ ହେବ। ସେ କହିଲେ, “ଶମ୍ଭୁଙ୍କ ଅଂଶରୁ ଜନ୍ମିତ, ଶୁକ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ର—ସେଇ ଏକମାତ୍ର—ଏହି ଉପାୟରେ ଯୁଦ୍ଧରେ ବିଜୟୀ ହେବ।”
Verse 166 (चौपाई)
मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई।। सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा।। तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी।। जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी।। पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं।। तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई।। एहि बिधि भलेहि देवहित होई। मर अति नीक कहइ सबु कोई।। अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू।।
mora kahā suni karahu upāī | hoihi īsvara karihi sahāī || satīṁ jo tajī daccha makha dehā | janamī jāi himācala gehā || tehiṁ tapu kīnha sambhu pati lāgī | siva samādhi baiṭhe sabu tyāgī || jadapi ahai asamañjasa bhārī | tadapi bāta eka sunahu hamārī || paṭhavahu kāmu jāi siva pāhīṁ | karai chobhu saṅkara mana māhīṁ || taba hama jāi sivahi sira nāī | karavāuba bibāhu bariāī || ehi bidhi bhalehi devahita hoī | mara ati nīka kahai sabu koī || astuti suranha kīnhi ati hetū | pragaṭeu biṣama-bāna jhaṣaketū ||
ମୋର କଥା ଶୁଣି ଉପାୟ କର; ଈଶ୍ୱରଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ନିଶ୍ଚୟ ସାହାଯ୍ୟ କରିବ। ଯିଏ ସତୀ ରୂପେ ଦକ୍ଷଙ୍କ ଯଜ୍ଞରେ ଶରୀର ତ୍ୟାଗ କରିଥିଲେ, ସେ ହିମାଚଳଙ୍କ ଗୃହରେ ପୁନର୍ଜନ୍ମ ନେଲେ। ସେ ତପସ୍ୟା କରିଛନ୍ତି ଓ ଶମ୍ଭୁଙ୍କୁ ପତି ରୂପେ ସ୍ୱୀକାର କରିଛନ୍ତି; ଶିବ ସମାଧିରେ ବସି ସବୁ ତ୍ୟାଗ କରିଛନ୍ତି। ଯଦିଓ ଏହି ଜଟିଳତା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଗଭୀର, ତଥାପି ମୋର ଗୋଟିଏ କଥା ଶୁଣ। କାମଦେବଙ୍କୁ ଶିବଙ୍କ ପାଖକୁ ପଠାଅ; ସେ ଶଙ୍କରଙ୍କ ମନରେ ବିକ୍ଷୋଭ ସୃଷ୍ଟି କରନ୍ତୁ। ତାପରେ ମୁଁ ଯାଇ ଶିବଙ୍କୁ ମସ୍ତକ ନତ କରି ବିବାହ ସମ୍ପନ୍ନ କରାଇବି। ଏହିପରି ଦେବତାଙ୍କ କଲ୍ୟାଣ ହେବ; ଯଦି ସେ ମୃତ୍ୟୁବରଣ କରନ୍ତି, ସମସ୍ତେ କହିବେ ଏହା ଅତ୍ୟନ୍ତ ମଙ୍ଗଳଜନକ। ଏହି ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ଦେବତାମାନେ ସ୍ତୁତି କଲେ ଓ ଭୟଙ୍କର ଧନୁର୍ଦ୍ଧର ଝଷକେତୁ ପ୍ରକଟ ହେଲେ।
Verse 167 (दोहा/सोरठा)
सुरन्ह कहीं निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार। संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार।।83।।
suranhaṁ kahīṁ nija bipati saba suni mana kīnha bicāra | sambhu birodha na kusala mohi bihasi kahe’u asa māra ||83||
ଦେବମାନଙ୍କ ଗୁପ୍ତ ଦୁଃଖ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଶୁଣି ସେ ହୃଦୟମଧ୍ୟରେ ଚିନ୍ତା କଲେ। ପଛେ ହସି କହିଲେ—“ଶମ୍ଭୁଙ୍କ ବିରୋଧରେ ଦାଁଡ଼ିବାରେ ମୋର କୌଣସି ମଙ୍ଗଳ ନାହିଁ।”
Verse 168 (चौपाई)
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा।। पर हित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहिं तेही।। अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई। सुमन धनुष कर सहित सहाई।। चलत मार अस हृदयँ बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा।। तब आपन प्रभाउ बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा।। कोपेउ जबहि बारिचरकेतू। छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू।। ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना। धीरज धरम ग्यान बिग्याना।। सदाचार जप जोग बिरागा। सभय बिबेक कटकु सब भागा।।
tadapi karaba maiṁ kāju tumhārā | śruti kaha parama dharama upakārā || para hita lāgi tajai jo dehī | santata santa prasaṁsahiṁ tehī || asa kahi caleu sabahi siru nāī | sumana dhanuṣa kara sahita sahāī || calata māra asa hṛdayaṁ bicārā | siva birodha dhruva maranu hamārā || taba āpana prabhāu bistārā | nija basa kīnha sakala saṁsārā || kopeu jabahi bāricaraketū | chana mahuṁ miṭe sakala śruti setū || brahmacarja brata saṁjama nānā | dhīraja dharama gyāna bigyānā || sadācāra japa joga birāgā | sabhaya bibeka kaṭaku saba bhāgā ||
ତଥାପି ମୁଁ ତୁମ୍ଭର କାର୍ଯ୍ୟ ସମ୍ପନ୍ନ କରିବି; ବେଦରେ ପରମ ଧର୍ମ ପରୋପକାର ବୋଲି କୁହାଯାଇଛି। ଯିଏ ଅନ୍ୟର ହିତ ପାଇଁ ନିଜ ଶରୀର ତ୍ୟାଗ କରନ୍ତି, ସନ୍ଥମାନେ ସର୍ବଦା ତାଙ୍କର ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତି। ଏପରି କହି ସେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ମସ୍ତକ ନତ କରି ପୁଷ୍ପ ଓ ଧନୁ ହାତରେ ଧରି ସାହାଯ୍ୟକାରୀ ରୂପେ ଯାତ୍ରା କଲେ। ଯାଉଥିବା ସମୟରେ ହୃଦୟରେ ଚିନ୍ତା କଲେ: ଶିବଙ୍କ ବିରୋଧ କଲେ ଆମର ମୃତ୍ୟୁ ନିଶ୍ଚିତ। ତାପରେ ସେ ନିଜ ପ୍ରଭାବ ବିସ୍ତାର କରି ସମଗ୍ର ସଂସାରକୁ ବଶ କଲେ। ଯେତେବେଳେ ବାରିଚରକେତୁ କ୍ରୋଧିତ ହେଲେ, କ୍ଷଣମାତ୍ରରେ ସମସ୍ତ ବୈଦିକ ସେତୁ ନଷ୍ଟ ହେଲା। ବ୍ରହ୍ମଚର୍ଯ୍ୟ, ବ୍ରତ, ଅନେକ ସଂଯମ; ଧୈର୍ଯ୍ୟ, ଧର୍ମ, ଜ୍ଞାନ ଓ ବିଜ୍ଞାନ, ସଦାଚାର, ଜପ, ଯୋଗ ଓ ବୈରାଗ୍ୟ, ଭୟଜନିତ ବିବେକର ସମସ୍ତ ସେନା ପଳାୟନ କଲା।
Verse 169 (छंद)
भागेउ बिबेक सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे। सदग्रंथ पर्बत कंदरन्हि महुँ जाइ तेहि अवसर दुरे।। होनिहार का करतार को रखवार जग खरभरु परा। दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुँ कोपि कर धनु सरु धरा।।
bhāgeu bibeka sahāya sahita so subhaṭa sañjuga mahi mure | sad-grantha parbata kandaranhi mahũ jāi tehi avasara dure || honihāra kā karatāra ko rakhavāra jaga kharabharu parā | dui mātha kehi ratinātha jehi kahũ kopi kara dhanu saru dharā ||
ବିବେକ ତାହାର ସହାୟକ ସହିତ ପଳାୟନ କଲା; ସେହି ବୀର ଯୋଦ୍ଧା ଯୁଦ୍ଧଭୂମିରେ ମୃତ୍ୟୁବରଣ କଲା। ଶୁଭ ଗ୍ରନ୍ଥମାନେ ପର୍ବତ ଓ ଗୁହା ସଦୃଶ ସେହି ସମୟରେ ଲୁଚି ଗଲେ। ଯେତେବେଳେ ନିୟତି ଘଟିବାକୁ ଥାଏ, କିଏ ସ୍ରଷ୍ଟାଙ୍କ ରକ୍ଷକ ହୋଇ ପାରେ? ସମଗ୍ର ଜଗତ ବିପର୍ଯ୍ୟସ୍ତ ହୋଇଗଲା। କିଏ ସେହି ଦ୍ୱିମସ୍ତକ କାମଦେବଙ୍କୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରିପାରିବ, ଯିଏ କ୍ରୋଧରେ ଧନୁ ଓ ବାଣ ଧରିଥିଲେ?
Verse 170 (दोहा/सोरठा)
जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम। ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम।।84।।
je sajīva jaga acara cara nāri puruṣa asa nāma | te nija nija marajāda taji bhae sakala basa kāma ||84||
ଜଗତର ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ—ଚଳ ଓ ଅଚଳ, ନାରୀ ଓ ପୁରୁଷ—ଏପରି ନାମ ଶୁଣି ନିଜ-ନିଜ ମର୍ଯ୍ୟାଦା-ସୀମା ଛାଡ଼ିଦେଲେ; ସମସ୍ତେ କାମନାର ବଶରେ ପଡ଼ିଗଲେ।
Verse 171 (चौपाई)
सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा।। नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाई। संगम करहिं तलाव तलाई।। जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी।। पसु पच्छी नभ जल थलचारी। भए कामबस समय बिसारी।। मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका।। देव दनुज नर किंनर ब्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला।। इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी। सदा काम के चेरे जानी।। सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस भए बियोगी।।
sab ke hṛdayaṁ madana abhilāṣā | latā nihāri navahiṁ taru sākhā || nadīṁ umagi aṁbudhi kahuṁ dhāī | saṅgama karahiṁ talāva talāī || jahaṁ asi dasā jaṛanha kai baranī | ko kahi sakai sacetana karanī || pasu pacchī nabha-jala-thala-cārī | bhae kāmabasa samaya bisārī || madana-aṁdha byākula saba lokā | nisi dinu nahiṁ avalokahiṁ kokā || deva danuja nara kiṁnara byālā | preta pisāca bhūta betālā || inha kai dasā na kaheuṁ bakhānī | sadā kāma ke cere jānī || siddha birakta mahāmuni jogī | tepi kāmabasa bhae biyogī ||
ସମସ୍ତଙ୍କ ହୃଦୟରେ ମଦନଙ୍କ ଅଭିଳାଷ ଜାଗ୍ରତ ହେଲା; ଲତାମାନେ ନୂତନ ଶାଖାମାନଙ୍କୁ ଦେଖି ଆକର୍ଷିତ ହେଲେ। ନଦୀମାନେ ଉର୍ଦ୍ଧ୍ୱମୁଖୀ ହୋଇ ସମୁଦ୍ର ଆଡକୁ ଗଲେ; ପୋଖରୀ ଓ ତାଲାବମାନେ ସଙ୍ଗମ ଖୋଜିଲେ। ଯେତେବେଳେ ଜଡ଼ପଦାର୍ଥମାନଙ୍କର ଏପରି ଅବସ୍ଥା, ଚେତନ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ବିବରଣୀ କିଏ ଦେଇପାରିବ? ପଶୁ, ପକ୍ଷୀ, ଆକାଶ, ଜଳ ଓ ଭୂମିରେ ବିଚରଣକାରୀ ସମସ୍ତେ କାମବଶ ହୋଇ ସମୟ ଓ ସୀମା ଭୁଲିଗଲେ। ମଦନଙ୍କ ଅନ୍ଧତ୍ୱରେ ସମଗ୍ର ଜଗତ ବ୍ୟାକୁଳ ହେଲା; ରାତି ଦିନ କୌଣସି କୋକିଳକୁ ଦେଖି ରହିପାରୁନଥିଲେ। ଦେବତା, ଦାନବ, ମନୁଷ୍ୟ, କିନ୍ନର ଓ ସର୍ପମାନେ; ପ୍ରେତ, ପିଶାଚ, ଭୂତ ଓ ବେତାଳମାନେ ସେମାନଙ୍କ ଅବସ୍ଥା ମୁଁ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିନାହିଁ, ସେମାନଙ୍କୁ ସର୍ବଦା କାମଙ୍କ ଦାସ ଜାଣି। ସିଦ୍ଧ, ବୈରାଗୀ, ମହାମୁନି ଓ ଯୋଗୀମାନେ ମଧ୍ୟ କାମବଶ ହୋଇ ବିୟୋଗୀ ହେଲେ।
Verse 172 (छंद)
भए कामबस जोगीस तापस पावँरन्हि की को कहै। dekhahiṁ carācara nārimaya je brahmamaya dekhat rahe।। abala bilokahiṁ puruṣamaya jagu puruṣa saba abalāmaẏaṁ। dui daṁḍa bhari brahmāṁḍa bhitara kāmakṛta kautuka ayaṁ।।
bhae kāmabasa jogīsa tāpasa pāvaṁranhi kī ko kahai. dekhahiṁ carācara nārimaya je brahmamaya dekhata rahe.. abalā bilokahiṁ puruṣamaya jagu puruṣa saba abalāmayaṁ. dui daṁḍa bhari brahmāṁḍa bhitara kāmakṛta kautuka ayaṁ..
ଯୋଗୀଶ୍ୱର ଓ କଠୋର ତପସ୍ୱୀମାନେ ମଧ୍ୟ କାମବଶ ହେଲେ, ତାଙ୍କର ଦୟନୀୟ ଅବସ୍ଥା କିଏ କହିପାରିବ? ଯେଉଁମାନେ ଚରାଚର ଜଗତକୁ ବ୍ରହ୍ମମୟ ଦେଖୁଥିଲେ, ବର୍ତ୍ତମାନ ସେଥିରେ କେବଳ ନାରୀ ଦେଖୁଛନ୍ତି। ନାରୀମାନେ ଜଗତକୁ ପୁରୁଷମୟ ଦେଖୁଛନ୍ତି; ପୁରୁଷମାନେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ନାରୀମୟ ଦେଖୁଛନ୍ତି। ଦୁଇ ଦଣ୍ଡ ସମୟ ପାଇଁ ବ୍ରହ୍ମାଣ୍ଡ ମଧ୍ୟରେ କାମକୃତ ଏହି ଅଦ୍ଭୁତ ଦୃଶ୍ୟ ଦେଖାଦେଲା।
Verse 173 (दोहा/सोरठा)
धरी न काहूँ धिर सबके मन मनसिज हरे। जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ।।85।।
dharī na kāhū̃ dhira sabake mana manasija hare | je rākhe raghubīra te ubare tehi kāla mahũ ||85||
କେହି ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଧରିପାରିଲେ ନାହିଁ; ମନୋଜ (କାମଦେବ) ସମସ୍ତଙ୍କ ହୃଦୟ ହରିନେଲେ। ସେଇ ଭୟଙ୍କର କ୍ଷଣରେ ଯାହାକୁ ରଘୁବୀର ରକ୍ଷା କଲେ, ସେମାନେ ମାତ୍ର ରକ୍ଷିତ ହେଲେ।
Verse 174 (चौपाई)
उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ।। सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू। भयउ जथाथिति सबु संसारू।। भए तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गएँ मतवारे।। रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना।। फिरत लाज कछु करि नहिं जाई। मरनु ठानि मन रचेसि उपाई।। प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित नव तरु राजि बिराजा।। बन उपबन बापिका तड़ागा। परम सुभग सब दिसा बिभागा।। जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा।।
ubhay gharī asa kautuka bhayū. jau lagi kāmu saṁbhu pahiṁ gayū.. sivahi biloki sasaṅkeu mārū. bhayau jathāthiti sabu saṁsārū.. bhae turata saba jīva sukhāre. jimi mada utari gaeṁ mata-vāre.. rudrahi dekhi madana bhaya mānā. durādharṣa durgama bhagavānā.. phirata lāja kachu kari nahiṁ jāī. maranu ṭhāni mana racēsi upāī.. pragaṭēsi turata rucira ritu-rājā. kusumita nava taru rāji birājā.. bana upa-bana bāpikā taṛāgā. parama subhaga saba disā bibhāgā.. jahāṁ tahāṁ janu umagata anurāgā. dekhi muehuṁ mana manasija jāgā..
ଉଭୟ ପକ୍ଷରେ ସେହି ସ୍ୱଳ୍ପ ସମୟ ପାଇଁ ଏପରି ଅଦ୍ଭୁତ ଦୃଶ୍ୟ ହେଲା ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ କାମଦେବ ଶମ୍ଭୁଙ୍କ ପାଖରେ ପହଞ୍ଚିଲେ। ଶିବଙ୍କୁ ଦେଖି ମାର ଚିନ୍ତିତ ହେଲେ, ନିଜ ନାଶର ଭୟରେ; ସମଗ୍ର ସଂସାର ସ୍ୱାଭାବିକ ଅବସ୍ଥାକୁ ଫେରିଗଲା। ସଙ୍ଗେ ସଙ୍ଗେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ସୁଖୀ ହେଲେ, ଯେପରି ମଦ୍ୟପମାନେ ମଦ ଉତ୍ତାର ହେଲେ ସୁସ୍ଥ ହୁଅନ୍ତି। ରୁଦ୍ରଙ୍କୁ ଦେଖି ମଦନ ଭୟ ସ୍ୱୀକାର କଲେ, ତିନି ଲୋକ କମ୍ପିତ ହେଲା। ଲଜ୍ଜିତ ହୋଇ ସେ ଘୁରିବୁଲିଲେ, କିଛି କରିପାରିଲେ ନାହିଁ; ମୃତ୍ୟୁ ନିଶ୍ଚୟ କରି ମନରେ ଉପାୟ ଭାବିଲେ। ତୁରନ୍ତ ସେ ସୁନ୍ଦର ଋତୁରାଜ ବସନ୍ତକୁ ପ୍ରକଟ କଲେ; ନୂତନ ବୃକ୍ଷମାନେ ପୁଷ୍ପବିକଶିତ ହୋଇ ଶୋଭାଯମାନ ହେଲେ। ବନ, ଉପବନ, କୂପ ଓ ତାଲାବମାନେ ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୁନ୍ଦର ଦେଖାଗଲେ। ଏଠାରେ ସେଠାରେ ଯେପରି ପ୍ରେମ ଉର୍ଦ୍ଧ୍ୱମୁଖୀ ହେଉଛି; ମୃତ୍ୟୁଶଯ୍ୟାରେ ଥିବା ଲୋକଙ୍କ ମନରେ ମଧ୍ୟ ଏହା ଦେଖି କାମ ଜାଗ୍ରତ ହେଲା।
Verse 175 (छंद)
जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही। सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही।। बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा। कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा।।
jāgai manobhava muehũ mana bana subhagatā na parai kahī. sītala sugandha su-manda māruta madana anala sakhā sahī.. bikase saranhi bahu kañja guñjata puñja mañjula madhukarā. kalahansa pika suka sarasa rava kari gāna nācahiṁ apacharā..
ମୃତ ବୋଲି ଭାବିଲେ ମଧ୍ୟ ମନୋଭବ ପୁନର୍ବାର ଜାଗ୍ରତ ହୁଅନ୍ତି; ବନର ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟର କେଉଁଠି ତୁଳନା ନାହିଁ। ଶୀତଳ, ସୁଗନ୍ଧିତ, ମନ୍ଦ ବାୟୁ ପ୍ରକୃତରେ ସେହି କାମାଗ୍ନିର ସାଥୀ ଅଟନ୍ତି। ଅନେକ ହ୍ରଦରେ କମଳ ଫୁଟିଉଠେ ଓ ମଧୁର ଭ୍ରମର ମଣ୍ଡଳୀ ଗୁଞ୍ଜରିତ ହୁଅନ୍ତି। ହଂସ, କୋକିଳ ଓ ଶୁକପକ୍ଷୀ ମଧୁର ସ୍ୱରରେ ଗାନ କରନ୍ତି ଓ ଅପ୍ସରାମାନେ ନୃତ୍ୟ କରୁଥିବା ପରି ଲାଗେ।
Verse 176 (दोहा/सोरठा)
सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत। चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत।।86।।
sakala kalā kari koṭi bidhi hāreu sena sameta | calī na acala samādhi siva kopeu hṛdayaniketa ||86||
ସମସ୍ତ କଳା ଓ ଅସଙ୍ଖ୍ୟ ଉପାୟ ଲାଗାଇଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ସେନା ସହିତ ପରାଜିତ ହେଲା। ଶିବଙ୍କ ଅଚଳ ସମାଧି ତିଳମାତ୍ର ମଧ୍ୟ ଡୋଳିଲା ନାହିଁ; ଏବଂ ହୃଦୟେଶ୍ୱର କ୍ରୋଧିତ ହେଲେ।
Verse 177 (चौपाई)
देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा।। सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने।। छाड़े बिषम बिसिख उर लागे। छुटि समाधि संभु तब जागे।। भयउ ईस मन छोभु बिसेषी। नयन उघारि सकल दिसि देखी।। सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका।। तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवत कामु भयउ जरि छारा।। हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर सुखारी।। समुझि कामसुखु सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी।।
dekhi rasāla biṭapa bara sākhā | tehi para caṛheu madanu mana mākhā || sumana cāpa nija sara sandhāne | ati risa tāki śravana lagi tāne || chāṛe biṣama bisikha ura lāge | chuṭi samādhi sambhu taba jāge || bhayu īsa mana chobhu biseṣī | nayana ughāri sakala disi dekhī || saurabha pallava madanu bilokā | bhayu kopu kampeu trailokā || taba sivã tīsara nayana ughārā | citavata kāmu bhayu jari chārā || hāhākāra bhayu jaga bhārī | ḍarape sura bhae asura sukhārī || samujhi kāma-sukhu socahĩ bhogī | bhae akaṇṭaka sādhaka jogī ||
ଆମ୍ବଗଛର ଏକ ସୁନ୍ଦର ଡାଳ ଦେଖି, କାମଦେବ ମନର ମହୁର ଭ୍ରମର ସଦୃଶ ସେଥିରେ ଚଢ଼ିଗଲେ। ସେ ପୁଷ୍ପଧନୁରେ ନିଜ ବାଣ ସଜାଇ କ୍ରୋଧରେ କାନ ପାଖରେ ଟାଣି ଧରିଲେ। ସେ ଭୟଙ୍କର ବାଣ ଛାଡ଼ିଲେ; ତାହା ହୃଦୟରେ ଲାଗିଲା। ଶମ୍ଭୁଙ୍କ ସମାଧି ଭଗ୍ନ ହେଲା ଓ ସେ ଜାଗ୍ରତ ହେଲେ। ଭଗବାନଙ୍କ ମନରେ ବିଶେଷ ବିକ୍ଷୋଭ ହେଲା; ଆଖି ଖୋଲି ସମସ୍ତ ଦିଗ ଦେଖିଲେ। ସୁଗନ୍ଧ ଓ କୋମଳ ପତ୍ର ମଧ୍ୟରେ କାମଦେବଙ୍କୁ ଦେଖି କ୍ରୋଧ ଜ୍ୱଳିତ ହେଲା ଓ ତ୍ରୈଲୋକ୍ୟ କମ୍ପିତ ହେଲା। ତାପରେ ଶିବ ତୃତୀୟ ନେତ୍ର ଖୋଲିଲେ; କାମଦେବଙ୍କୁ ଦୃଷ୍ଟିପାତ କରିବା ମାତ୍ରେ ସେ ଭସ୍ମ ହୋଇଗଲେ। ସମଗ୍ର ଜଗତରେ ମହାକୋଳାହଳ ହେଲା; ଦେବତାମାନେ ଭୟଭୀତ ହେଲେ ଓ ଅସୁରମାନେ ଆନନ୍ଦିତ ହେଲେ। କାମସୁଖର ସ୍ୱଭାବ ବୁଝି ଭୋଗୀମାନେ ଚିନ୍ତା କଲେ; ସାଧକ ଯୋଗୀମାନେ କଣ୍ଟକମୁକ୍ତ ହେଲେ।
Verse 178 (छंद)
जोगि अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई। रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई। अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही। प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही।।
jogi akaṇṭaka bhae pati gati sunata rati muruchita bhaī | rodati badati bahu bhā̃ti karuṇā karati śaṅkara pahĩ gaī | ati prema kari binatī bibidha bidhi jori kara sanmukha rahī | prabhu āsutoṣa kṛpāla śiva abalā nirakhi bole sahī ||
ଯୋଗୀ ଅକଣ୍ଟକ ହେଲେ ଶୁଣି ରତି ମୂର୍ଚ୍ଛିତ ହେଲେ। କାନ୍ଦୁଛନ୍ତି ଓ ଅନେକ ପ୍ରକାରେ କରୁଣା କରୁଥିବା ସେ ଶଙ୍କରଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲେ। ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରେମରେ ବିବିଧ ପ୍ରକାରେ ପ୍ରାର୍ଥନା କରି ହାତ ଜୋଡ଼ି ସାମ୍ନାରେ ଠିଆ ହେଲେ। କୃପାଳୁ ପ୍ରଭୁ ଆସୁତୋଷ ଶିବ ସେହି ଅବଳାଙ୍କୁ ଦେଖି ଉପଯୁକ୍ତ କଥା କହିଲେ।
Verse 179 (दोहा/सोरठा)
अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु। बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु।।87।।
aba te rati tava nātha kara hoihi nāmu anaṅgu | binu bapu byāpihi sabahi puni sunu nija milana prasaṅgu ||87||
ଏହିଠାରୁ, ହେ ରତି, ତୋର ପତିଙ୍କ ହାତରେ ସେ ‘ଅନଙ୍ଗ’ ହେବ—ଦେହ ଶୂନ୍ୟ, କେବଳ ନାମମାତ୍ର। ତଥାପି ଦେହହୀନ ହୋଇ ସେ ପୁନଃ ସମସ୍ତେ ଭିତରେ ବ୍ୟାପି ଚଳିବ; ଏବେ ଶୁଣ, ତାହାର ନିଜ ଭାଗ୍ୟଲିଖିତ ପୁନର୍ମିଳନର ଅବସର।
Verse 180 (चौपाई)
जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा।। कृष्न तनय होइहि पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न मोरा।। रति गवनी सुनि संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी।। देवन्ह समाचार सब पाए। ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए।। सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता। गए जहाँ सिव कृपानिकेता।। पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा। भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा।। बोले कृपासिंधु बृषकेतू। कहहु अमर आए केहि हेतू।। कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी। तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी।।
jaba jadubaṁsa kṛsna avatārā | hoihi harana mahā mahibhārā || kṛsna tanaya hoihi pati torā | bacanu anyathā hoi na morā || rati gavanī suni saṅkara bānī | kathā apara aba kahauṁ bakhānī || devanha samācāra saba pāe | brahmādika baikuṇṭha sidhāe || saba sura biṣnu birañci sametā | gae jahāṁ siva kṛpāniketā || pṛthaka pṛthaka tinh kīnhi prasaṁsā | bhae prasanna caṁdra avataṁsā || bole kṛpāsiṁdhu bṛṣaketū | kahahu amara āe kehi hetū || kaha bidhi tumha prabhu aṁtarajāmī | tadapi bhagati basa binavauṁ svāmī ||
ଯେବେ ଯାଦବବଂଶରେ କୃଷ୍ଣ ଅବତାର ହେବେ, ପୃଥିବୀର ମହାଭାର ହରଣ ହେବ। କୃଷ୍ଣଙ୍କ ପୁତ୍ର ତୁମ୍ଭର ପତି ହେବେ; ମୋର ବଚନ ଅନ୍ୟଥା ହେବ ନାହିଁ। ରତି ବିଦାୟ ନେଲେ; ଶଙ୍କରଙ୍କ ବାଣୀ ଶୁଣି ମୁଁ ବର୍ତ୍ତମାନ ଅନ୍ୟ କଥା ବର୍ଣ୍ଣନା କରୁଛି। ସମସ୍ତ ଦେବତା ସମାଚାର ପାଇଲେ; ବ୍ରହ୍ମାଦି ବୈକୁଣ୍ଠକୁ ଗଲେ। ସମସ୍ତ ସୁର, ବିଷ୍ଣୁ ଓ ବ୍ରହ୍ମା ସମେତ ଶିବଙ୍କ କୃପାନିକେତନକୁ ଗଲେ। ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ସେମାନେ ପ୍ରଶଂସା କଲେ; ଚନ୍ଦ୍ରାବତଂସୀ ଭଗବାନ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ। କୃପାସିନ୍ଧୁ ବୃଷକେତୁ କହିଲେ: ହେ ଅମରଗଣ, କେଉଁ ହେତୁରେ ଆସିଛ କୁହ ବ୍ରହ୍ମା କହିଲେ: ଆପଣ ପ୍ରଭୁ ଅନ୍ତର୍ଯାମୀ; ତଥାପି ଭକ୍ତିବଶତଃ ମୁଁ ପ୍ରାର୍ଥନା କରୁଛି, ହେ ସ୍ୱାମୀ।
Verse 181 (दोहा/सोरठा)
सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु। निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु।।88।।
sakala suranha ke hṛdayaṁ asa saṅkara parama uchāhu | nija nayananhi dekhā chahahiṁ nātha tumhāra bibāhu ||88||
ହେ ଶଙ୍କର! ସମସ୍ତ ଦେବତାଙ୍କ ହୃଦୟରେ ଏମିତି ଅପାର ଆନନ୍ଦ ଉଦିତ ହେଲା—ହେ ପ୍ରଭୁ! ନିଜ ଚକ୍ଷୁରେ ଆପଣଙ୍କ ବିବାହ ଦର୍ଶନ କରିବାକୁ ସେମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆକୁଳ ହେଲେ।
Verse 182 (चौपाई)
यह उत्सव देखिअ भरि लोचन। सोइ कछु करहु मदन मद मोचन॥ कामु जारि रति कहुँ बरु दीन्हा। कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा॥ सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ॥ पारबतीं तपु कीन्ह अपारा। करहु तासु अब अंगीकारा॥ सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी॥ तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि सुमन जय जय सुर साई॥ अवसरु जानि सप्तरिषि आए। तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए॥ प्रथम गए जहँ रही भवानी। बोले मधुर बचन छल सानी॥
yaha utsava dekhi'a bhari locana | soi kachu karahu madana mada mocana || kāmu jāri rati kahũ baru dīnhā | kṛpāsiṅdhu yaha ati bhala kīnhā || sāsati kari puni karahĩ pasāū | nātha prabhunha kara sahaja subhāū || pārabatī̃ tapu kīnha apārā | karahu tāsu aba aṅgīkārā || suni bidhi binaya samujhi prabhu bānī | aise'i hou kahā sukhu mānī || taba devan̐ha duṃdubhī̃ bajā'ī̃ | baraṣi sumana jaya jaya sura sā'ī || avasaru jāni saptar̥ṣi ā'e | turatahĩ bidhi giribhavana paṭhā'e || prathama ga'e jahã rahī bhavānī | bole madhura bacana chala sānī ||
ଏହି ଉତ୍ସବକୁ ପୂର୍ଣ୍ଣ ନୟନରେ ଦେଖନ୍ତୁ; ହେ ମଦନଙ୍କ ଅହଙ୍କାର ନାଶକ, କିଛି କରନ୍ତୁ। ଆପଣ କାମଦେବଙ୍କୁ ଦହନ କରି ରତିଙ୍କୁ ବର ଦେଇଥିଲେ - ହେ କୃପାସିନ୍ଧୁ, ଏହା ଅତ୍ୟନ୍ତ ମଙ୍ଗଳମୟ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଲା। ପ୍ରଥମେ ଶାସ୍ତି ଦେଇ ପୁଣି ଅନୁଗ୍ରହ କରନ୍ତି - ହେ ନାଥ, ପ୍ରଭୁଙ୍କ ସ୍ୱାଭାବିକ ସ୍ୱଭାବ ଏପରି। ପାର୍ବତୀ ଅପାର ତପସ୍ୟା କରିଛନ୍ତି; ଏବେ ତାଙ୍କୁ ଅଙ୍ଗୀକାର କରନ୍ତୁ। ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ବିନୟ ଶୁଣି ପ୍ରଭୁଙ୍କ ଇଚ୍ଛା ବୁଝି ସେ ସମ୍ମତ ହେଲେ ଓ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ କହିଲେ, 'ତାହା ହେଉ।' ତା'ପରେ ଦେବତାମାନେ ଦୁନ୍ଦୁଭୀ ବାଜାଇଲେ ଓ ପୁଷ୍ପବୃଷ୍ଟି କରି 'ଜୟ! ଜୟ! ହେ ସୁରପତି!' ବୋଲି ଡାକିଲେ। ସମୟ ଜାଣି ସପ୍ତର୍ଷିମାନେ ଆସିଲେ; ବ୍ରହ୍ମା ସଙ୍ଗେ ସଙ୍ଗେ ସେମାନଙ୍କୁ ଗିରିରାଜଙ୍କ ଗୃହକୁ ପଠାଇଲେ। ପ୍ରଥମେ ସେମାନେ ଯେଉଁଠାରେ ଭବାନୀ ବାସ କରନ୍ତି ସେଠାକୁ ଗଲେ ଓ ମଧୁର ବଚନ କହିଲେ, ଯାହାରେ କୌଶଳ ମିଶ୍ରିତ ଥିଲା।
Verse 183 (दोहा/सोरठा)
कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस॥ अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस॥89॥
kahā hamāra na sunehu taba nārada keṃ upadesa. aba bhā jhūṭha tumhāra pana jāreu kāmu mahes..89..
ମୋର ପରାମର୍ଶ କାହିଁକି ମାନିଲ ନାହିଁ—ସେତେବେଳେ ନାରଦଙ୍କ ଉପଦେଶ କାହିଁକି ଶୁଣିଲ ନାହିଁ? ଏବେ ତୋର ପ୍ରତିଜ୍ଞା ମିଥ୍ୟା ପ୍ରମାଣିତ ହେଲା; ମହେଶ କାମଦେବଙ୍କୁ ଭସ୍ମ କରିଦେଲେ।
Verse 184 (चौपाई)
सुनि बोलीं मुसकाइ भवानी। उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी।। तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा।। हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी।। जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म मन बानी।। तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा।। तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा। सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा।। तात अनल कर सहज सुभाऊ। हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ।। गएँ समीप सो अवसि नसाई। असि मन्मथ महेस की नाई।।
suni bolīṁ musakāi bhavānī | ucita kahehu munibar bigyānī || tumhareṁ jān kāmu aba jārā | aba lagi saṁbhu rahe sabikārā || hamareṁ jān sadā siva jogī | aja anavadya akāma abhogī || jauṁ maiṁ siva seyeṁ asa jānī | prīti sameta karma mana bānī || tau hamāra pana sunahu munīsā | karihahiṁ satya kṛpānidhi īsā || tumha jo kahā hari jāreu mārā | soi ati baṛa abibeku tumhārā || tāta anala kara sahaja subhāū | him tehi nikaṭa jāi nahiṁ kāū || gaēṁ samīpa so avasi nasāī | asi manmatha mahesa kī nāī ||
ଶୁଣି ଭବାନୀ ହସି କହିଲେ: 'ହେ ମୁନିଶ୍ରେଷ୍ଠ, ହେ ଜ୍ଞାନୀ, ଆପଣ ଉଚିତ କହିଛନ୍ତି। ଆପଣଙ୍କ ମତରେ କାମଦେବ ଏବେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇଛନ୍ତି ଓ ଶମ୍ଭୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିକାରରହିତ ରହିଛନ୍ତି। ମୋର ଜ୍ଞାନରେ ଶିବ ସର୍ବଦା ଯୋଗୀ - ଅଜନ୍ମା, ନିର୍ଦୋଷ, ନିଷ୍କାମ, ଭୋଗରହିତ। ଯଦି ଏପରି ଜାଣି ମଧ୍ୟ ମୁଁ ପ୍ରେମପୂର୍ବକ କର୍ମ, ମନ ଓ ବାଣୀରେ ଶିବଙ୍କ ସେବା କରେ, ତେବେ ହେ ମୁନିଶ୍ରେଷ୍ଠ, ମୋର ପ୍ରତିଜ୍ଞା ଶୁଣନ୍ତୁ: କୃପାନିଧି ଈଶ୍ୱର ନିଶ୍ଚୟ ତାହା ସତ୍ୟ କରିବେ। କିନ୍ତୁ ଆପଣ କହିଥିବା କଥା ଯେ ହରି କାମଦେବଙ୍କୁ ଦଗ୍ଧ ଓ ମାରିଛନ୍ତି - ଏହା ଆପଣଙ୍କର ଅତ୍ୟନ୍ତ ଅବିବେକ। ହେ ତାତ, ଅଗ୍ନିର ସ୍ୱାଭାବିକ ଗୁଣ ଦହନ; ତାହାର ନିକଟରେ ବରଫ ଯାଇ ପାରେ ନାହିଁ। ଯଦି ସମୀପରେ ଯାଏ, ତେବେ ନିଶ୍ଚୟ ଗଲିଯିବ - ମନ୍ମଥଙ୍କ ସହିତ ମହେଶଙ୍କର ମଧ୍ୟ ସେହିପରି ଥିଲା।'
Verse 185 (दोहा/सोरठा)
हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास॥ चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास॥90॥
hiyaṁ haraṣe muni bacana suni dekhi prīti bisvāsa | cale bhavānihi nāi sira gae himācala pāsa ||90||
ମୁନିଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ସେମାନଙ୍କ ହୃଦୟ ଆନନ୍ଦରେ ପୂରିଗଲା; କାରଣ ସେମାନେ ତାଙ୍କର ସ୍ନେହ ଓ ଦୃଢ଼ ଭରସାକୁ ଅନୁଭବ କଲେ। ଶିର ନମାଇ ପ୍ରଣାମ କରି ସେମାନେ ଯାତ୍ରା କଲେ ଏବଂ ହିମାଚଳ (ହିମାଳୟ ଧାମ) ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।
Verse 186 (दोहा/सोरठा)
लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान। होहि सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान।।91।।
lage saṁvāran sakala sura bāhana bibidha bimāna | hohi saguna maṅgala subhada karahiṁ apacharā gāna ||91||
ସମସ୍ତ ଦେବତା ନିଜ-ନିଜ ବାହନ ଓ ନାନା ପ୍ରକାର ଦିବ୍ୟ ବିମାନକୁ ସଜାଇବାରେ ଲାଗିଗଲେ। ଶୁଭ ଓ ମଙ୍ଗଳମୟ ନିମିତ୍ତ ପ୍ରକଟ ହେଲା, ଏବଂ ଅପ୍ସରାମାନେ ଆଶୀର୍ବାଦର ଗୀତ ଗାଇଲେ।
परंपरागत मान्यता में यह प्रसंग ‘काम-विकार-शमन’ और ‘गुर-वचन-श्रद्धा’ की पुष्टि करता है: शिव-उमा संवाद का पाठ/श्रवण मन को स्थिर करता, तप-भाव जगाता और राम-भक्ति के लिए अंतःकरण को पात्र बनाता है—विशेषतः मदन-जन्य चंचलता, आसक्ति और अविवेक में शांति देता है।
सामान्य मानस-पारायण परंपरा में यहाँ ‘श्रीराम’ नाम-स्मरण/राम-नाम-जप को संपुट-रूप में जोड़ा जाता है (जैसे प्रत्येक दोहा/खंड के बाद ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’). कुछ शिव-उपासक परंपराओं में ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप भी सहचर रूप से चलता है, पर मानस-केन्द्रित संपुट प्रायः राम-नाम ही माना जाता है।
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