सोपान-प्रथम: ‘भक्ति का जन्म’ और ‘श्रद्धा का संस्कार’। बालकाण्ड में जगत्-व्यवस्था (विधि), गुरु-वाक्य, और कथा-श्रवण की पात्रता निर्मित होती है। शिव–पार्वती संवाद के माध्यम से साधक के भीतर संशय→विश्वास, भय→समर्पण, और लोक-लज्जा→ईश-लीला-बोध का रूपांतरण होता है—यही मुक्ति-सीढ़ी का प्रथम पायदान है।
ଏହି ଖଣ୍ଡ-ପ୍ରସଙ୍ଗର ପ୍ରଧାନ ରସ ‘ହାସ୍ୟ’ ଓ ‘ଅଦ୍ଭୁତ’ ସହ ‘କରୁଣ’ର ସଂଯୋଗ—ହାସ୍ୟ ଭବାନୀଙ୍କ ସୂକ୍ଷ୍ମ ବିଡମ୍ବନାରେ, ଅଦ୍ଭୁତ ଶିବ-ବରାତର ବିକଟ-ଭବ୍ୟତାରେ, ଓ କରୁଣ ମୈନାଙ୍କ ମାତୃ-ଭୟ ଓ ଲୋକ-ଲଜ୍ଜାରେ। ତୁଳସୀଦାସ ଏଠାରେ ଲୋକ-ମନର ସହଜ ପ୍ରତିକ୍ରିୟା (ଭୟ/ହାସ/ବିସ୍ମୟ)କୁ ସାଧନା-ଶାସ୍ତ୍ରରେ ରୂପାନ୍ତର କରନ୍ତି: ଯେ ଦୃଶ୍ୟ ଅସଙ୍ଗତ ଲାଗେ, ସେଇ ଈଶ-ଲୀଳାର ‘ସତ୍ୟ’। ନାରଦଙ୍କ ଉପଦେଶ ‘ସ୍ମୃତି-ଇତିହାସ’ (ସତୀ-ପ୍ରସଙ୍ଗ) ଯୋଡ଼ି ପାର୍ବତୀଙ୍କୁ ଜଗଦମ୍ବା-ତତ୍ତ୍ୱରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ କରେ—ଏହା ଶୈବ-ବୈଷ୍ଣବ ସମନ୍ୱୟର ସଙ୍କେତ ମଧ୍ୟ, କାରଣ ବିବାହ-ଲୀଳାରେ ବିଷ୍ଣୁ, ବ୍ରହ୍ମା, ଦେବ-ସମାଜ ଓ ଶିବ-ଗଣ ସମାନ ଭାବେ ସହଭାଗୀ। ସୋପାନ-ତର୍କରେ ଏହି ଚରଣ ସାଧକଙ୍କୁ ‘ରୂପ-ବିରୋଧ’ (ବିକଟ ବେଶ)ରୁ ଉପରକୁ ଉଠାଇ ‘ତତ୍ତ୍ୱ-ଦର୍ଶନ’ (ଶକ୍ତି-ଶିବ-ଅର୍ଧାଙ୍ଗ) ଦିଗକୁ ନେଇଯାଏ।
ଚୌପାଈ 90.1-4
सुनि बोलीं मुसकाइ भवानी।उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी।।
तुम्हरें जान कामु अब जारा।अब लगि संभु रहे सबिकारा।।
हमरें जान सदा सिव जोगी।अज अनवद्य अकाम अभोगी।।
जौं मैं सिव सेये अस जानी।प्रीति समेत कर्म मन बानी।।
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा।करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा।।
तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा।सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा।।
तात अनल कर सहज सुभाऊ।हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ।।
गएँ समीप सो अवसि नसाई।असि मन्मथ महेस की नाई।।
suni bolīṁ musakāi bhavānī |ucita kahehu munibar bigyānī ||
tumhareṁ jān kāmu aba jārā |aba lagi saṁbhu rahe sabikārā ||
hamareṁ jān sadā siva jogī |aja anavadya akāma abhogī ||
jauṁ maiṁ siva seyeṁ asa jānī |prīti sameta karma mana bānī ||
tau hamāra pana sunahu munīsā |karihahiṁ satya kṛpānidhi īsā ||
tumha jo kahā hari jāreu mārā |soi ati baṛa abibeku tumhārā ||
tāta anala kara sahaja subhāū |him tehi nikaṭa jāi nahiṁ kāū ||
gaēṁ samīpa so avasi nasāī |asi manmatha mahesa kī nāī ||
ଏହି କଥା ଶୁଣି ଭବାନୀ ମୁଚୁକି ହସି କହିଲେ, "ହେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜ୍ଞାନୀ ମୁନି, ଆପଣ ଉପଯୁକ୍ତ କଥା କହିଛନ୍ତି। ଆପଣଙ୍କ ବୁଝରେ ଶମ୍ଭୁ ଏବେ କାମକୁ ଦଗ୍ଧ କରିଛନ୍ତି, ଏବଂ ଏ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସେ କାମର ବଶୀଭୂତ ଥିଲେ। କିନ୍ତୁ ମୋର ଜାଣିବା ଅନୁସାରେ ଶିବ ସଦା ଏକ ଯୋଗୀ, ଅଜନ୍ମା, ନିଷ୍କଳଙ୍କ, ନିରାକାଙ୍କ୍ଷ ଏବଂ ଭୋଗ-ରହିତ। ଯଦି ତାଙ୍କୁ ଏପରି ଜାଣି ମୁଁ ପ୍ରେମସହ କର୍ମ, ମନ ଓ ବାକ୍ୟ ଦ୍ୱାରା ଶିବଙ୍କ ସେବା କରିଛି, ତେବେ ହେ ମୁନିଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଶୁଣନ୍ତୁ: କୃପାର ଭଣ୍ଡାଗାର ଈଶ୍ୱର ମୋର ପ୍ରତିଜ୍ଞା ସତ୍ୟ କରିବେ। ଆପଣ ଯାହା କହିଲେ ଯେ ହର କାମକୁ ଦଗ୍ଧ କରିଛନ୍ତି, ତାହା ଆପଣଙ୍କ ପକ୍ଷରୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବଡ଼ ଅବିବେକ। ହେ ତାତ, ଅଗ୍ନିର ଏହି ସ୍ୱାଭାବିକ ଧର୍ମ ଯେ ତୁଷାର କେବେ ତା' ନିକଟକୁ ଯାଇ ପାରିବ ନାହିଁ। ଯଦି କେହି ନିକଟକୁ ଯାଏ ତେବେ ତାହାର ଅବଶ୍ୟ ନାଶ ହେବ। ମହେଶଙ୍କ ନିକଟରେ ମନ୍ମଥର ଏପରି ହୋଇଥିଲା।
ଦୋହା 90
हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास॥
चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास॥90॥
hiyaṁ haraṣe muni bacana suni dekhi prīti bisvāsa |cale bhavānihi nāi sira gae himācala pāsa ||90||
ମୁନିମାନେ ତାଙ୍କ ବାକ୍ୟ ଶୁଣି ଏବଂ ପ୍ରେମ ଓ ବିଶ୍ୱାସ ଦେଖି ହୃଦୟରେ ଆନନ୍ଦିତ ହେଲେ। ଭବାନୀଙ୍କୁ ମସ୍ତକ ନତ କରି ସେମାନେ ବାହାରି ହିମାଚଳଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲେ।
ଚୌପାଈ 91.1-4
सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा।मदन दहन सुनि अति दुखु पावा।।
बहुरि कहेउ रति कर बरदाना।सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना।।
हृदयँ बिचारि संभु प्रभुताई।सादर मुनिबर लिए बोलाई।।
सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई।बेगि बेदबिधि लगन धराई।।
पत्री सप्तरिषिन्ह सोइ दीन्ही।गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही।।
जाइ बिधिहि दीन्हि सो पाती।बाचत प्रीति न हृदयँ समाती।।
लगन बाचि अज सबहि सुनाई।हरषे मुनि सब सुर समुदाई।।
सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे।मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे।।
sabu prasaṅgu giripatihi sunāvā |madana-dahana suni ati dukhu pāvā ||
bahuri kaheu rati-kara baradānā |suni himavaṁta bahuta sukhu mānā ||
hṛdayaṁ bicāri sambhu prabhutāī |sādara munibara liye bolāī ||
sudinu sunakhatu sugharī socāī |begi beda-bidhi lagana dharāī ||
patrī saptar̥ṣinih soi dīnhī |gahi pada binaya himācala kīnhī ||
jāi bidhihi dīnhi so pātī |bācata prīti na hṛdayaṁ samātī ||
lagana bāci aja sabahi sunāī |haraṣe muni saba sura samudāī ||
sumana br̥ṣṭi nabha bājana bāje |maṅgala kalasa dasahuṁ disi sāje ||
ମୁନିମାନେ ପର୍ବତପତିଙ୍କୁ ସମସ୍ତ ବୃତ୍ତାନ୍ତ ଶୁଣାଇଲେ। ମଦନ ଦହନ ଶୁଣି ସେ ଅତିଶୟ ଦୁଃଖ ପାଇଲେ। ତାହା ପରେ ରତିର ବରଦାନ କଥା କହିଲେ। ଶୁଣି ହିମବନ୍ତ ବହୁ ସୁଖ ଅନୁଭବ କଲେ। ହୃଦୟରେ ସମ୍ଭୁଙ୍କ ପ୍ରଭୁତ୍ୱ ବିଚାରି, ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ମୁନିବରମାନଙ୍କୁ ଡାକି ନେଲେ। ଶୁଭ ଦିନ, ଶୁଭ ନକ୍ଷତ୍ର ଓ ଶୁଭ ଲଗ୍ନ ବାଛି, ଶୀଘ୍ର ବେଦବିଧି ଅନୁସାରେ ଲଗ୍ନ ଧରାଇଲେ। ସେହି ପତ୍ର ସପ୍ତର୍ଷିମାନଙ୍କୁ ଦେଲେ। ପଦ ଧରି ହିମାଚଳ ବିନୟରେ ପ୍ରାର୍ଥନା କଲେ। ଯାଇ ବିଧିଙ୍କୁ ସେହି ପତ୍ର ଦେଲେ। ପଢ଼ିବାକୁ ପଢ଼ିବାକୁ ହୃଦୟର ପ୍ରେମ ସମାଉବାକୁ ପାରିଲା ନାହିଁ। ଅଜ ଲଗ୍ନ ପଢ଼ି ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଶୁଣାଇଲେ। ମୁନି ଓ ସମସ୍ତ ଦେବସମୂହ ଆନନ୍ଦିତ ହେଲେ। ଆକାଶରୁ ପୁଷ୍ପବୃଷ୍ଟି ହେଲା, ବାଜନା ବାଜିଲା। ଦଶ ଦିଗରେ ମଙ୍ଗଳ କଳସ ସଜାଇଲେ।
ଦୋହା 91
लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान।होहि सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान।।91।।
lage saṁvāran sakala sura bāhana bibidha bimāna |hohi saguna maṅgala subhada karahiṁ apacharā gāna ||91||
ସମସ୍ତ ଦେବତାଙ୍କ ନିଜ ନିଜର ବିବିଧ ବାହନ ଓ ବିମାନ ସଜାଇବାକୁ ଲାଗିଲେ। ମଙ୍ଗଳମୟ ଶୁଭ ଶକୁନ ପ୍ରକଟ ହେଲା ଏବଂ ଅପ୍ସରାମାନେ ଗୀତ ଗାଇବାକୁ ଲାଗିଲେ।
ଚୌପାଈ 92.1-4
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा।जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा।।
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला।तन बिभूति पट केहरि छाला।।
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा।नयन तीनि उपबीत भुजंगा।।
गरल कंठ उर नर सिर माला।असिव बेष सिवधाम कृपाला।।
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा।चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा।।
देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं।बर लायक दुलहिनि जग नाहीं।।
बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता।चढ़ि चढ़ि बाहन चले बराता।।
सुर समाज सब भाँति अनूपा।नहिं बरात दूलह अनुरूपा।।
sivahi sambhu-gana karahiṁ siṅgārā |jaṭā mukuṭ ahi mauru saṁvārā ||
kuṇḍala kaṅkana pahire byālā |tana bibhūti paṭ kehari chālā ||
sasi lalāṭa suṁdara sira gaṅgā |nayana tīni upabīta bhujaṅgā ||
garala kaṇṭha ura nara sira mālā |asiva beṣa sivadhāma kṛpālā ||
kara trisūla aru ḍamaru birājā |cale basahaṁ caṛhi bājahiṁ bājā ||
dekhi sivahi sura-triya musukāhīṁ |bara lāyaka dulahini jaga nāhīṁ ||
biṣṇu birañci ādi sura-bhrātā |caṛhi-caṛhi bāhana cale barātā ||
sura samāja saba bhāṁti anūpā |nahiṁ barāta dūlaha anurūpā ||
ଶିବଙ୍କ ଅନୁଚରମାନେ ଶିବଙ୍କୁ ସଜାଇବାକୁ ଆରମ୍ଭ କଲେ। ଜଟାର ମୁକୁଟ ଏବଂ ଏକ ସାପକୁ ତାଙ୍କ ବରର ମୁକୁଟ ରୂପେ ସଜାଇଲେ। ସେ ସାପର କୁଣ୍ଡଳ ଓ କଙ୍କଣ ପିନ୍ଧିଲେ। ତାଙ୍କ ଶରୀର ଭସ୍ମରେ ମାଖା, ଏବଂ ବସ୍ତ୍ର ସିଂହର ଚମଡା। ଲଲାଟରେ ଚନ୍ଦ୍ର, ସୁନ୍ଦର ମସ୍ତକରେ ଗଙ୍ଗା। ତିନି ନୟନ, ଏବଂ ସାପ ତାଙ୍କ ଉପବୀତ। କଣ୍ଠରେ ବିଷ, ବକ୍ଷରେ ନରମୁଣ୍ଡର ମାଳ। ଅଶୁଭ ବେଶ, ତଥାପି ସେ କୃପାଳୁ ଶିବ, ଶିବଧାମ। ହାତରେ ତ୍ରିଶୂଳ ଓ ଡମରୁ ଶୋଭା ପାଇଲା। ସେ ବୃଷଭରେ ଚଢ଼ି ବାହାରିଲେ, ଏବଂ ବାଦ୍ୟଯନ୍ତ୍ର ବାଜିଲା। ଶିବଙ୍କୁ ଦେଖି ଦେବପତ୍ନୀମାନେ ହସିଲେ। ଜଗତରେ ଏପରି ବରର ଯୋଗ୍ୟ କୌଣସି କନ୍ୟା ନାହିଁ। ବିଷ୍ଣୁ, ବ୍ରହ୍ମା ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଦେବଗଣ ନିଜ ନିଜ ବାହନରେ ଚଢ଼ି ବରାତ ରୂପେ ଚାଲିଲେ। ଦେବସମାଜ ସର୍ବପ୍ରକାରେ ଅନୁପମ, କିନ୍ତୁ ବରାତ ବରର ଅନୁରୂପ ନଥିଲା।
ଦୋହା 92
बिष्नु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज।बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित समाज।।92।।
biṣṇu kahā asa bihasi taba boli sakala disirāja |bilaga bilaga hoi calahu saba nija nija sahita samāja ||92||
ତା'ପରେ ବିଷ୍ଣୁ ହସି ସମସ୍ତ ଦିଗପାଳଙ୍କୁ ଡାକି ଏପରି କହିଲେ: ତୁମ୍ଭେମାନେ ସମସ୍ତ ଅଲଗା ଅଲଗା ହୋଇ ନିଜ ନିଜ ସମାଜ ସହିତ ଚାଲିଯାଅ।
ଚୌପାଈ 93.1-4
बर अनुहारि बरात न भाई।हँसी करैहहु पर पुर जाई।।
बिष्नु बचन सुनि सुर मुसकाने।निज निज सेन सहित बिलगाने।।
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं।हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं।।
अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे।भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे।।
सिव अनुसासन सुनि सब आए।प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए।।
नाना बाहन नाना बेषा।बिहसे सिव समाज निज देखा।।
कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू।बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू।।
बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना।रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना।।
bara anuhāri barāta na bhāī |hãsī karaihhū para pura jāī ||
biṣṇu bacana suni sura musakāne |nija nija sena sahita bilagāne ||
manahī̃ mana mahesu musukāhī̃ |hari ke biṅgya bacana nahĩ jāhī̃ ||
ati priya bacana sunata priya kere |bhṛṅgihi preri sakala gana ṭere ||
siva anusāsana suni saba āe |prabhu pada jalaja sīsa tinha nāe ||
nānā bāhana nānā beṣā |bihase siva samāja nija dekhā ||
kou mukhahīna bipula mukha kāhū |binu pada kara kou bahu pada bāhū ||
bipula nayana kou nayana bihīnā |riṣṭapuṣṭa kou ati tanakhīnā ||
ଏହା ବରର ଉପଯୁକ୍ତ ବରାତ ନୁହେଁ, ଭାଇମାନେ। ଅନ୍ୟର ନଗରକୁ ଗଲେ ତୁମେ ହସିର ପାତ୍ର ହେବ। ବିଷ୍ଣୁଙ୍କ କଥା ଶୁଣି ଦେବତାମାନେ ମୁଚକି ହସିଲେ ଏବଂ ନିଜ ନିଜ ସେନାସହ ପୃଥକଭାବେ ଚାଲିଗଲେ। ମହେଶ ମନରେ ମୁଚକି ହସିଲେ; ହରିଙ୍କ ବ୍ୟଙ୍ଗୋକ୍ତି ତାଙ୍କ ନିକଟରୁ ଅଗୋଚର ରହିଲା ନାହିଁ। ପ୍ରିୟଙ୍କ ଅତି ପ୍ରିୟ ବଚନ ଶୁଣି ସେ ଭୃଙ୍ଗିଙ୍କୁ ପ୍ରେରଣ କରି ସମସ୍ତ ଗଣଙ୍କୁ ଡାକିଲେ। ଶିବଙ୍କ ଆଦେଶ ଶୁଣି ସମସ୍ତେ ଆସିଲେ ଏବଂ ପ୍ରଭୁଙ୍କ ପଦ୍ମପଦରେ ନିଜ ମସ୍ତକ ନତ କଲେ। ନାନା ବାହନ ଓ ନାନା ବେଶରେ ସେମାନେ ଆସିଲେ; ଶିବ ନିଜ ସମାଜ ଦେଖି ହସିଲେ। କେହି ମୁଖହୀନ, କେହି ବହୁମୁଖ; କେହି ପଦ-ହସ୍ତହୀନ, କେହି ବହୁପଦ ଓ ବହୁବାହୁ। କେହି ବହୁନୟନ, କେହି ନୟନହୀନ; କେହି ଅତି ସ୍ଥୂଳ ଓ ବଳିଷ୍ଠ, କେହି ଅତି କୃଶକାୟ।
ଛନ୍ଦ 93
तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें।।
खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै।बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै।।
tana khīna kou ati pīna pāvana kou apāvana gati dhareṃ |bhūṣana karāla kapāla kara saba sadya sonita tana bhareṃ ||
khara svāna suara sṛkāla mukha gana beṣa aganita ko ganai |bahu jinsa preta pisāca jogi jamāta baranata nahiṃ banai ||
କାହାର ଦେହ ଶୀର୍ଣ, କେତେକ ଅତି ସ୍ଥୂଳ; କେତେକ ପବିତ୍ର ଆକୃତି ଧାରଣ କରିଛନ୍ତି, କେତେକ ଅପବିତ୍ର। ସେମାନଙ୍କର ଭୂଷଣ ଭୟଙ୍କର, ହାତରେ ଖପୁରି ଧରି, ଆଉ ସମସ୍ତଙ୍କ ଦେହ ତାଜା ରକ୍ତରେ ପୂର୍ଣ। କାହାର ମୁହଁ ଗାଧା, କୁକୁର, ଘୁଆ ଓ ଶିଆଳର; ସେମାନଙ୍କର ଅଗଣିତ ରୂପ ଓ ବେଶ କିଏ ଗଣିବ? ବହୁ ପ୍ରକାରର ପ୍ରେତ, ପିଶାଚ ଓ ଯୋଗୀଙ୍କ ଦଳ; ସମଗ୍ର ସମାବେଶ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିହେବ ନାହିଁ।
ସୋରଠା 93
नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब।देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि।।93।।
nāca-hiṃ gāva-hiṃ gīta parama taraṅgī bhūta saba.dekhata ati biparīta bola-hiṃ bacana bicitra bidhi..93..
ସମସ୍ତ ଭୂତ ପରମ ଆନନ୍ଦରେ ନାଚନ୍ତି ଓ ଗୀତ ଗାନ୍ତି। ସେମାନେ ଦେଖିବାକୁ ଅତି ବିଚିତ୍ର ଏବଂ ବିଚିତ୍ର ପ୍ରକାରର ବଚନ କହନ୍ତି।
ଚୌପାଈ 94.1-4
जस दूलहु तसि बनी बराता।कौतुक बिबिध होहिं मग जाता।।
इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना।अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना।।
सैल सकल जहँ लगि जग माहीं।लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं।।
बन सागर सब नदीं तलावा।हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा।।
कामरूप सुंदर तन धारी।सहित समाज सहित बर नारी।।
गए सकल तुहिनाचल गेहा।गावहिं मंगल सहित सनेहा।।
प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए।जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए।।
पुर सोभा अवलोकि सुहाई।लागइ लघु बिरंचि निपुनाई।।
jasa dūlahu tasi banī barātā |kautuka bibidha hohiṁ maga jātā ||
ihāṁ himācala raceu bitānā |ati bicitra nahiṁ jāi bakhānā ||
saila sakala jahaṁ lagi jaga māhīṁ |laghu bisāla nahiṁ barani sirāhīṁ ||
bana sāgara saba nadīṁ talāvā |himagiri saba kahuṁ nevata paṭhāvā ||
kāmarūpa sundara tana dhārī |sahita samāja sahita bara nārī ||
gae sakala tuhinācala gehā |gāvahiṁ maṅgala sahita sanehā ||
prathamahiṁ giri bahu gṛha saṁvarāe |jathāyogu tahaṁ tahaṁ saba chāe ||
pura sobhā avaloki suhāī |lāgai laghu birañci nipunāī ||
ଯେମିତି ବର ଥିଲେ, ସେମିତି ବରାତ ଗଢ଼ିଉଠିଲା, ଏବଂ ଯାତ୍ରାପଥରେ ନାନା ବିଚିତ୍ର ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ଘଟିଲା। ଏଠାରେ ହିମାଚଳ ଏକ ମଣ୍ଡପ ସଜାଇଲେ, ଯାହା ଅତି ବିଚିତ୍ର, ବର୍ଣ୍ଣନା କରିହେବ ନାହିଁ। ଜଗତରେ ଯେତେ ପର୍ବତ ଅଛି, ଛୋଟ ବଡ଼ ସବୁ ଗଣନା ଓ ବର୍ଣ୍ଣନାରେ ଅତୀତ। ବନ, ସାଗର, ସବୁ ନଦୀ ଓ ସରୋବର, ହିମଗିରି ସମସ୍ତଙ୍କୁ ନିମନ୍ତ୍ରଣ ପଠାଇଲେ। କାମରୂପ ସୁନ୍ଦର ଦେହ ଧାରଣ କରି, ସ୍ୱଜାତି ସମାଜ ଓ ସୁନ୍ଦରୀ ନାରୀମାନଙ୍କ ସହିତ। ସମସ୍ତେ ତୁହିନାଚଳର ଗୃହକୁ ଗଲେ, ସ୍ନେହସହ ମଙ୍ଗଳ ଗୀତ ଗାଇ ଗାଇ। ପ୍ରଥମେ ପର୍ବତରାଜ ଅନେକ ଗୃହ ସଜାଇଲେ, ଏବଂ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ସର୍ବତ୍ର ସବୁକିଛି ସଜାଇ ଦେଲେ। ନଗରର ସୁନ୍ଦର ଶୋଭା ଦେଖି, ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ନିପୁଣତା ମଧ୍ୟ ତୁଚ୍ଛ ଲାଗିଲା।
ଛନ୍ଦ 94
लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही।बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही।।
मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं।बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं।।
laghu lāga bidhi kī nipunatā avaloki pura sobhā sahī |bana bāga kūpa taṛāga saritā subhaga saba saka ko kahī ||
maṅgala bipula torana patākā ketu gṛha gṛha sohahīṃ |banitā puruṣa sundara catura chabi dekhi muni mana mohahīṃ ||
ନଗରର ଶୋଭା ଅବଲୋକନ କରି ବିଧିଙ୍କ ନିପୁଣତା ମଧ୍ୟ ତୁଚ୍ଛ ମନେ ହେଲା। ବନ, ଉଦ୍ୟାନ, କୂପ, ପୁଷ୍କରିଣୀ ଓ ନଦୀ, ସମସ୍ତ ସୁନ୍ଦର, ସେମାନଙ୍କୁ କିଏ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିପାରିବ? ପ୍ରଚୁର ମଙ୍ଗଳଜନକ ବସ୍ତୁ, ତୋରଣ, ପତାକା ଓ କେତନରେ ଗୃହେ ଗୃହେ ସୁଶୋଭିତ ହୋଇଛି। ସୁନ୍ଦର ଓ ଚତୁର ନାରୀ ଓ ପୁରୁଷଙ୍କ ଛବି ଦେଖି ମୁନିମାନଙ୍କ ମନ ମଧ୍ୟ ମୋହିତ ହୁଏ।
ଦୋହା 94
जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ।रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ।।94।।
jagadambā jahã avatari so puru barani ki jāi |ṛddhi siddhi sampatti sukha nita nūtana adhikāi ||94||
ଯେଉଁ ନଗରୀରେ ଜଗଦମ୍ବା ଅବତରଣ କରିଥିଲେ, ସେହି ନଗରୀର ବର୍ଣ୍ଣନା କି କରାଯାଇ ପାରେ? ସେଠାରେ ଋଦ୍ଧି, ସିଦ୍ଧି, ସମ୍ପତ୍ତି ଓ ସୁଖ ପ୍ରତିଦିନ ନୂତନ ନୂତନ କରି ବୃଦ୍ଧି ପାଉଥିଲା।
ଚୌପାଈ 95.1-4
नगर निकट बरात सुनि आई।पुर खरभरु सोभा अधिकाई।।
करि बनाव सजि बाहन नाना।चले लेन सादर अगवाना।।
हियँ हरषे सुर सेन निहारी।हरिहि देखि अति भए सुखारी।।
सिव समाज जब देखन लागे।बिडरि चले बाहन सब भागे।।
धरि धीरजु तहँ रहे सयाने।बालक सब लै जीव पराने।।
गएँ भवन पूछहिं पितु माता।कहहिं बचन भय कंपित गाता।।
कहिअ काह कहि जाइ न बाता।जम कर धार किधौं बरिआता।।
बरु बौराह बसहँ असवारा।ब्याल कपाल बिभूषन छारा।।
nagara nikaṭa barāta suni āī |pura kharabharu sobhā adhikāī ||
kari banāva saji bāhana nānā |cale lena sādara agavānā ||
hiyaṁ haraṣe sura sena nihārī |harihi dekhi ati bhae sukhārī ||
siva samāja jaba dekhana lāge |biḍari cale bāhana saba bhāge ||
dhari dhīraju tahaṁ rahe sayāne |bālaka saba lai jīva parāne ||
gaẽ bhavana pūchahiṁ pitu mātā |kahahiṁ bacana bhaya kaṁpita gātā ||
kahi-a kāha kahi jāi na bātā |jama kara dhāra kidhauṁ bariātā ||
baru baurāha basahaṁ asavārā |byāla kapāla bibhūṣana chārā ||
ବରାତ ନଗର ନିକଟକୁ ଆସିବା ଶୁଣି ନଗରରେ ହଲଚଲ ପଡିଲ, ଶୋଭା ବଢିଲ। ନିଜକୁ ସଜାଇ ବିବିଧ ବାହନ ସଜାଇ ସାଦରରେ ଆଗବାନ କରିବାକୁ ଗଲେ। ଦେବସେନା ଦେଖି ହୃଦୟରେ ଆନନ୍ଦିତ ହେଲେ, ହରିଙ୍କୁ ଦେଖି ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୁଖୀ ହେଲେ। କିନ୍ତୁ ଶିବଙ୍କ ସମାଜ ଦେଖିବାକୁ ଆରମ୍ଭ କଲେ ଭୟରେ ସମସ୍ତ ବାହନ ପଳାଇଗଲେ। ସିଆଣୀମାନେ ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଧରି ସେଠାରେ ରହିଲେ, ବାଳକମାନେ ପ୍ରାଣ ନେଇ ପଳାଇଗଲେ। ଘରକୁ ଯାଇ ପିତାମାତା ପଚାରିଲେ, ସେମାନେ ଭୟରେ ଦେହ କମ୍ପାଇ କଥା କହିଲେ। କଣ କହିବା, କଥାଟି କହିହୁଏ ନାହିଁ, ଏ ଯମଙ୍କ ସେନା କି ବରାତ? ବର ଜଣେ ପାଗଳ, ବଳଦରେ ଚଢି, ସାପ ଓ ଖପୁରି ଅଳଙ୍କାର, ଦେହରେ ଛାଇ ଲେପ।
ଛନ୍ଦ 95
तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा।सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा।।
जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही।देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही।।
tana chāra byāla kapāla bhūṣana nagana jaṭila bhayaṅkarā |saṅga bhūta preta pisāca jogini bikaṭa mukha rajanīcarā ||
jo jiata rahihi barāta dekhata pun̐ya baṛa tehi kara sahī |dekhihi so umā bibāhu ghara-ghara bāta asi larikanha kahī ||
ତାଙ୍କ ଦେହ ଭସ୍ମରେ ଆବୃତ, ସାପ ଓ ଖପୁରିରେ ଭୂଷିତ; ସେ ନଗ୍ନ, ଜଟାଧାରୀ, ଭୟଙ୍କର। ତାଙ୍କ ସହ ଭୂତ, ପ୍ରେତ, ପିଶାଚ, ଯୋଗିନୀ ଓ ଭୟଙ୍କର ମୁଖର ରାତ୍ରିଚର ରାକ୍ଷସ। ଏହି ବରଯାତ୍ରା ଦେଖି ଯେ ବଞ୍ଚି ରହିବ, ତାହାର ପୁଣ୍ୟ ସତେ ମହାନ; ସେହି ବ୍ୟକ୍ତି ହିଁ ଉମାଙ୍କ ବିବାହ ଦେଖିବ। ଏପରି କଥା ପିଲାମାନେ ଘରେ ଘରେ କହୁଥିଲେ।
ଦୋହା 95
समुझि महेस समाज सब जननि जनक मुसुकाहिं।बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु डरु नाहिं।।95।।
samujhi mahesa samāja saba janani janaka musukāhiṁ |bāla bujhāe bibidha bidhi niḍara hohu ḍaru nāhiṁ ||95||
ତାହା ମହେଶଙ୍କ ସମାଜ ବୁଝି ମାତା-ପିତାମାନେ ମୁସୁକି ହସିଲେ। ସେମାନେ ବିବିଧ ଉପାୟରେ ବାଳକମାନଙ୍କୁ ବୁଝାଇ କହିଲେ, ନିର୍ଭୟ ହୁଅ, ଭୟ ନାହିଁ।
ଚୌପାଈ 96.1-4
लै अगवान बरातहि आए।दिए सबहि जनवास सुहाए।।
मैनाँ सुभ आरती सँवारी।संग सुमंगल गावहिं नारी।।
कंचन थार सोह बर पानी।परिछन चली हरहि हरषानी।।
बिकट बेष रुद्रहि जब देखा।अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा।।
भागि भवन पैठीं अति त्रासा।गए महेसु जहाँ जनवासा।।
मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी।लीन्ही बोलि गिरीसकुमारी।।
अधिक सनेहँ गोद बैठारी।स्याम सरोज नयन भरे बारी।।
जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा।तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा।।
lai agavāna barātahi āe.die sabahi janavāsa suhāe..
mainā̃ subha āratī sãvārī.saṅga sumaṅgala gāvahi nārī..
kañcana thāra soha bara pānī.parichana calī harahi haraṣānī..
bikaṭa beṣa rudrahi jaba dekhā.abalanh ura bhaya bhayau biseṣā..
bhāgi bhavana paiṭhī̃ ati trāsā.gae mahesu jahā̃ janavāsā..
mainā hṛdayã bhayau dukhu bhārī.līnhī boli girīsakumārī..
adhika sanehã goda baiṭhārī.syāma saroja nayana bhare bārī..
jehĩ bidhi tumhahi rūpu asa dīnhā.tehĩ jaṛa baru bāura kasa kīnhā..
ଅଭ୍ୟର୍ଥନାକାରୀମାନେ ବରାତ ନେଇ ଆସିଲେ, ଏବଂ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ମନୋରମ ଅତିଥିଶାଳା ଦେଲେ। ମୈନା ଶୁଭ ଆରତୀ ସଜାଇଲେ, ଏବଂ ନାରୀମାନେ ତାଙ୍କ ସହିତ ମଙ୍ଗଳଗୀତ ଗାଇଲେ। ସୁନା ଥାଳି ହାତରେ ଶୋଭା ପାଉଥିଲା, ମୈନା ଆନନ୍ଦରେ ହରଙ୍କୁ ଅଭ୍ୟର୍ଥନା କରିବାକୁ ଗଲେ। କିନ୍ତୁ ନାରୀମାନେ ରୁଦ୍ରଙ୍କ ଭୟଙ୍କର ବେଶ ଦେଖି ହୃଦୟରେ ବିଶେଷ ଭୟ ପାଇଲେ। ଭୟରେ ପଳାଇ ଘରକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ, ଆଉ ମହେଶ ଅତିଥିଶାଳାକୁ ଗଲେ। ମୈନାଙ୍କ ହୃଦୟରେ ବହୁତ ଦୁଃଖ ହେଲା, ସେ ଗିରିରାଜକନ୍ୟାଙ୍କୁ ଡାକି ନିଲେ। ଅଧିକ ସ୍ନେହରେ କୋଳିରେ ବସାଇଲେ, ତାଙ୍କ ଶ୍ୟାମ ପଦ୍ମନୟନ ଅଶ୍ରୁରେ ଭରିଗଲା। "ଯିଏ ତୁମକୁ ଏପରି ରୂପ ଦେଲେ, ସେହି ମୂର୍ଖ କିପରି ତୁମ ବରକୁ ପାଗଳ କଲେ?"
ଛନ୍ଦ 96
कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई।।
तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।घरु जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं।।
kasa kīnha baru baurāha bidhi jehiṃ tumhahi suṃdaratā daī |jo phalu cahi-a sura-taruhin so barabasa babūrahim̃ lāgaī ||
tumha sahita giri teṃ girauṃ pāvaka jarauṃ jala-nidhi mahuṃ parauṃ |gharu jāu apajasu hou jaga jīvata bibāhu na hauṃ karauṃ ||
ବିଧାତା ଯାହାକୁ ଏମିତି ସୁନ୍ଦର ରୂପ ଦେଇଛନ୍ତି, ତାହାଙ୍କ ପାଇଁ କିପରି ଜଣେ ଉନ୍ମାଦକୁ ବର କଲେ? କଳ୍ପବୃକ୍ଷରୁ ଯେଉଁ ଫଳ ମିଳିବା ଉଚିତ, ତାହା ବଳପୂର୍ବକ ବାବୁଲ ଗଛରେ ଲଗାଇ ଦିଆଗଲା। ତୋ' ସହିତ ପର୍ବତରୁ ଖସି ପଡ଼ିବି, ଅଗ୍ନିରେ ଜଳିବି, ସମୁଦ୍ରରେ ବିଦ୍ଧ ହେବି। ମୋର ଘର ଯାଉ, ଜଗତରେ ଅପଯଶ ବିରାଉ, କିନ୍ତୁ ଯେତିକି ବଞ୍ଚି ଅଛି ଏହି ବିବାହ କରିବି ନାହିଁ।
ଦୋହା 96
भई बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि।करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि।।96।।
bhaī bikala abalā sakala dukhita dekhi girināri |kari bilāpu rodati badati sutā sanehu sãbhāri ||96||
ପର୍ବତରାଜପତ୍ନୀଙ୍କୁ ଦୁଃଖିତ ଦେଖି ସମସ୍ତ ନାରୀମାନେ ବ୍ୟାକୁଳ ହୋଇଗଲେ। କନ୍ୟା ପ୍ରତି ସ୍ନେହ ସମ୍ଭାରି ସେ ବିଳାପ କଲେ, କାନ୍ଦିଲେ ଏବଂ କହିଲେ।
ଚୌପାଈ 97.1-4
नारद कर मैं काह बिगारा।भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा।।
अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा।बौरे बरहि लगि तपु कीन्हा।।
साचेहुँ उन्ह के मोह न माया।उदासीन धनु धामु न जाया।।
पर घर घालक लाज न भीरा।बाझँ कि जान प्रसव कैं पीरा।।
जननिहि बिकल बिलोकि भवानी।बोली जुत बिबेक मृदु बानी।।
अस बिचारि सोचहि मति माता।सो न टरइ जो रचइ बिधाता।।
करम लिखा जौ बाउर नाहू।तौ कत दोसु लगाइअ काहू।।
तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका।मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका।।
nārada kari maiṁ kāhu bigārā |bhavanu mora jinha basata ujārā ||
a sa upadesu umāhi jinha dīnhā |baure barahi lagi tapu kīnhā ||
sācehuṁ unha ke moha na māyā |udāsīna dhanu dhāmu na jāyā ||
para-ghara ghālaka lāja na bhīrā |bājhaṁ ki jāna prasava kaiṁ pīrā ||
jananihi bikala biloki bhavānī |bolī juta bibeka mṛdu bānī ||
a sa bicāri socahi mati mātā |so na ṭarai jo racai bidhātā ||
karama likhā jau bāura nāhū |tau kata dosu lagāia kāhū ||
tumha sana miṭahiṁ ki bidhi ke aṅkā |mātu byartha jani lehu kalaṅkā ||
ନାରଦଙ୍କ ପାଖରେ ମୁଁ କଣ ଅନିଷ୍ଟ କଲି, ଯିଏ ମୋର ବାସସ୍ଥାନ ଭବନ ଉଜାଡ଼ କରିଦେଲେ? ସେ ଉମାଙ୍କୁ ଏପରି ଉପଦେଶ ଦେଲେ ଯେ ସେ ଜଣେ ଉନ୍ମାଦ ବରଙ୍କ ନିମନ୍ତେ ତପସ୍ୟା କଲେ। ସତରେ ସେମାନଙ୍କର ନ ମୋହ, ନ ମାୟା; ସେମାନେ ଉଦାସୀନ, ଧନ-ଧାମ-ପତ୍ନୀ କିଛି ନାହିଁ। ଅନ୍ୟର ଘର ନଷ୍ଟ କରନ୍ତି, ଆଉ ଲାଜ-ଭୟ ନାହିଁ। ବନ୍ଧ୍ୟା ନାରୀ କି ପ୍ରସବର ଯନ୍ତ୍ରଣା ବୁଝେ? ମାତାଙ୍କୁ ବିହ୍ୱଳ ଦେଖି ଭବାନୀ ବିବେକ-ଯୁକ୍ତ କୋମଳ ବାଣୀରେ କଥା କହିଲେ। ମାତା, ଏହିପରି ଭାବି ମନରେ ଦୁଃଖ କର ନାହିଁ: ବିଧାତା ଯାହା ରଚନା କରନ୍ତି, ତାହା ଟଳେ ନାହିଁ। ଯଦି କର୍ମରେ ଲେଖା ଅଛି ଯେ ମୋର ବର ଉନ୍ମାଦ, ତେବେ କାହାର ଉପରେ ଦୋଷ କାହିଁକି ଲଗାଯିବ? ବିଧାତାଙ୍କ ଲେଖା ଅଙ୍କ କି ତୋମା ଦ୍ୱାରା ମିଟିବ? ମାତା, ବୃଥା କଳଙ୍କ ଗ୍ରହଣ କର ନାହିଁ।
ଛନ୍ଦ 97
जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं॥
दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं॥॥
सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं॥
बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं॥
jani lehu mātu kalaṅku karunā pariharahu avasara nahīṃ |dukhu sukhu jo likhā lilāra hamareṃ jāba jahã pāuba tahīṃ ||
suni umā bacana binīta komala sakala abalā sochahīṃ |bahu bhā̃ti bidhihi lagāi dūṣana nayana bāri bimochahīṃ ||
ହେ ମାତା, ଏହି କଳଙ୍କ ନିଜ ଉପରେ ନେବ ନାହିଁ, ଦୟା ତ୍ୟାଗ କର, ଏବେ ତାହାର ଅବସର ନାହିଁ। ମୋର ଲଲାଟରେ ଯେଉଁ ଦୁଃଖ ବା ସୁଖ ଲେଖା ଅଛି, ଯେଉଁଠାରେ ପାଇବି ସେଠାକୁ ଯାଇ ତାହା ଗ୍ରହଣ କରିବି। ଉମାଙ୍କ ବିନୀତ କୋମଳ ବଚନ ଶୁଣି ସମସ୍ତ ଅବଳା ନାରୀମାନେ ଶୋକରେ ଆଚ୍ଛନ୍ନ ହେଲେ। ସେମାନେ ନାନାଭାବେ ବିଧିଙ୍କୁ ଦୋଷ ଦେଇ ନୟନରୁ ଅଶ୍ରୁ ବିମୋଚନ କଲେ।
ଦୋହା 97
तेहि अवसर नारद सहित अरु रिषि सप्त समेत।समाचार सुनि तुहिनगिरि गवने तुरत निकेत।।97।।
tehi avasara nārada sahita aru ṛṣi sapta sameta |samācāra suni tuhina-giri gavane turata niketa ||97||
ସେହି ଅବସରରେ ନାରଦ ଏବଂ ସପ୍ତର୍ଷିମାନଙ୍କ ସହିତ ଏକତ୍ର ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ, ଏବଂ ତୁଷାରାଚ୍ଛାଦିତ ପର୍ବତର ଅଧିପତି ହିମାଳୟ ସମ୍ବାଦ ଶୁଣି ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ନିଜ ଗୃହକୁ ଗଲେ।
ଚୌପାଈ 98.1-4
तब नारद सबहि समुझावा।पूरुब कथाप्रसंगु सुनावा।।
मयना सत्य सुनहु मम बानी।जगदंबा तव सुता भवानी।।
अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि।सदा संभु अरधंग निवासिनि।।
जग संभव पालन लय कारिनि।निज इच्छा लीला बपु धारिनि।।
जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई।नामु सती सुंदर तनु पाई।।
तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं।कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं।।
एक बार आवत सिव संगा।देखेउ रघुकुल कमल पतंगा।।
भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा।भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा।।
taba nārada sabahi samujhāvā |pūruba kathā-prasaṅgu sunāvā ||
maynā satya sunahu mama bānī |jagadambā tava sutā bhavānī ||
ajā anādi sakti abināsini |sadā sambhu aradhaṅga nivāsini ||
jaga sambhava pālana laya kārini |nija icchā līlā bapu dhārini ||
janamīṁ prathama daccha gṛha jāī |nāmu satī sundara tanu pāī ||
tahāṁhuṁ satī saṅkarahi bibāhīṁ |kathā prasiddha sakala jaga māhīṁ ||
eka bāra āvata siva saṅgā |dekheu raghukula kamala pataṅgā ||
bhayu mohu siva kahā na kīnhā |bhrama basa beṣu sīya kara līnhā ||
ତା'ପରେ ନାରଦ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଲେ, ଏବଂ ପୂର୍ବକାଳର କାହାଣୀ ଶୁଣାଇଲେ। "ମୟନା, ମୋର ସତ୍ୟ କଥା ଶୁଣ: ତୋର କନ୍ୟା ଭବାନୀ ଜଗଦମ୍ବା। ସେ ଅଜନ୍ମା, ଅନାଦି, ଅବିନାଶୀ ଶକ୍ତି, ସଦା ଶମ୍ଭୁର ଅର୍ଧାଙ୍ଗରେ ବାସ କରନ୍ତି। ସେ ଜଗତର ସୃଷ୍ଟି, ପାଳନ ଓ ଲୟ କରନ୍ତି, ଏବଂ ନିଜ ଇଚ୍ଛାରେ ଲୀଳାରେ ଦେହ ଧାରଣ କରନ୍ତି। ପ୍ରଥମେ ଦକ୍ଷର ଗୃହରେ ଜନ୍ମ ନେଇ ସୁନ୍ଦର ଦେହ ପାଇଲେ, ତାଙ୍କ ନାମ ସତୀ। ସେଠାରେ ମଧ୍ୟ ସତୀ ଶଙ୍କରଙ୍କ ସହ ବିବାହ ହେଲେ, ଏବଂ ସେହି କାହାଣୀ ସମଗ୍ର ଜଗତରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ। ଥରେ ଶିବଙ୍କ ସହ ଆସିବା ବେଳେ ସେ ରଘୁକୁଳ-କମଳର ସୂର୍ଯ୍ୟ ରାମଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ। ତାଙ୍କର ମୋହ ହେଲା, ଶିବ ଯାହା କହିଥିଲେ ତାହା କଲେ ନାହିଁ; ଭ୍ରମର ବଶରେ ସୀତାର ବେଶ ଧାରଣ କଲେ।
ଛନ୍ଦ 98
सिय बेषु सती जो कीन्ह तेहि अपराध संकर परिहरीं।हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं।।
अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया।अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकर प्रिया।।
siya beṣu satī jo kīnha tehi aparādha saṅkara pariharīṁ |hari birahaṁ jāi bahori pitu keṁ jagya jogānala jarīṁ ||
aba janami tumhare bhavana nija pati lāgi dāruna tapu kiyā |asa jāni saṁsaya tajahu girijā sarbadā saṅkara priyā ||
ସୀତାର ବେଶ ସତୀ ଯେ ଧାରଣ କରିଥିଲେ, ସେହି ଅପରାଧରେ ଶଙ୍କର ତାଙ୍କୁ ପରିତ୍ୟାଗ କରିଥିଲେ। ହରଙ୍କ ବିରହରେ ସେ ପିତାଙ୍କ ଯଜ୍ଞକୁ ଯାଇ ଯୋଗାଗ୍ନିରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇଥିଲେ। ଏବେ ତୋମାର ଘରେ ଜନ୍ମ ନେଇ ନିଜ ପତି ପାଇଁ ସେ ଭୟଙ୍କର ତପସ୍ୟା କରିଛନ୍ତି। ଏହା ଜାଣି ସନ୍ଦେହ ତ୍ୟାଗ କର, ଗିରିଜା ସର୍ବଦା ଶଙ୍କରଙ୍କ ପ୍ରିୟା।
ଦୋହା 98
सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद।छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह संबाद।।98।।
suni nārada ke bacana taba saba kara miṭā biṣāda |chana mahũ byāpeu sakala pura ghara-ghara yaha saṃbāda ||98||
ନାରଦଙ୍କ କଥା ଶୁଣି ତତେ ସମସ୍ତଙ୍କର ଦୁଃଖ ଦୂର ହେଲା, ଆଉ କ୍ଷଣକରେ ଏହି ସମ୍ବାଦ ସାରା ନଗରରେ ଘରେ ଘରେ ବ୍ୟାପିଗଲା।
ଚୌପାଈ 99.1-4
तब मयना हिमवंतु अनंदे।पुनि पुनि पारबती पद बंदे।।
नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने।नगर लोग सब अति हरषाने।।
लगे होन पुर मंगलगाना।सजे सबहि हाटक घट नाना।।
भाँति अनेक भई जेवराना।सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा।।
सो जेवनार कि जाइ बखानी।बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी।।
सादर बोले सकल बराती।बिष्नु बिरंचि देव सब जाती।।
बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा।लागे परुसन निपुन सुआरा।।
नारिबृंद सुर जेवँत जानी।लगीं देन गारीं मृदु बानी।।
taba mainā himavantu anaṁde |puni puni pārabatī pada baṁde ||
nāri puruṣa sisu jubā sayāne |nagara loga saba ati haraṣāne ||
lage hona pura maṁgala-gānā |saje sabahi hāṭaka ghaṭa nānā ||
bhāṁti aneka bhaī jevar-ānā |sūpa-sāstra jasa kachu byavahārā ||
so jevanāra ki jāi bakhānī |basahiṁ bhavana jehiṁ mātu bhavānī ||
sādara bole sakala barātī |biṣṇu biraṁci deva saba jātī ||
bibidha pāṁti baiṭhī jevanārā |lāge parusana nipuna suārā ||
nāribṛṁda sur jevaṁta jānī |lagīṁ dena gārīṁ mṛdu bānī ||
ତଦନନ୍ତର ମୟନା ଓ ହିମବନ୍ତ ଆନନ୍ଦରେ ଆପ୍ଲୁତ ହେଲେ, ଏବଂ ବାରମ୍ବାର ପାର୍ବତୀଙ୍କ ଚରଣରେ ପ୍ରଣାମ କଲେ। ନାରୀ, ପୁରୁଷ, ଶିଶୁ, ଯୁବକ ଓ ବୃଦ୍ଧ, ନଗରର ସମସ୍ତ ଲୋକ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆନନ୍ଦିତ ହେଲେ। ନଗରରେ ମଙ୍ଗଳଗାନ ଗାଇବା ଆରମ୍ଭ ହେଲା, ଏବଂ ସମସ୍ତେ ନାନା ପ୍ରକାରର ସୁବର୍ଣ୍ଣ ପାତ୍ର ସଜାଇ ରଖିଲେ। ନାନା ପ୍ରକାରେ ଭୋଜର ଆୟୋଜନ ହେଲା, ଯେପରି ଶୁପଶାସ୍ତ୍ରରେ ଯାହା ଯାହା ବିଧାନ ଅଛି। ସେହି ଭୋଜର ବର୍ଣ୍ଣନା କିପରି କରାଯାଇପାରେ, ଯେଉଁ ଭବନରେ ମାତା ଭବାନୀ ନିଜେ ବାସ କରନ୍ତି? ସମସ୍ତ ବରାତୀଙ୍କୁ ସମ୍ମାନର ସହ ଆମନ୍ତ୍ରଣ କରାଗଲା: ବିଷ୍ଣୁ, ବ୍ରହ୍ମା, ଏବଂ ସମସ୍ତ ଶ୍ରେଣୀର ଦେବତାଗଣ। ବିବିଧ ଶାରୀରେ ବସି ଭୋଜ କଲେ, ଏବଂ ଦକ୍ଷ ସୁଆରାମାନେ ପରିବେଶନ ଆରମ୍ଭ କଲେ। ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ଭୋଜନ କରୁଥିବା ଦେଖି ନାରୀଗଣ କୋମଳ ବାକ୍ୟରେ ତାଙ୍କୁ ବିଦ୍ରୂପ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
ଛନ୍ଦ 99
गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं।भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं।।
जेवँत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो।अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहँ जाको रह्यो।।
gārīṁ madhura svara dehiṁ sundari biṅgya bacana sunāvahīṁ |bhojanu karahiṁ sura ati bilaṁbu binodu suni sacu pāvahīṁ ||
jevaṁta jo baḍhyo anaṁdu so mukha koṭihūṁ na parai kahyo |acavāṁi dīnhe pāna gavane bāsa jahaṁ jāko rahyo ||
ସୁନ୍ଦରୀ ନାରୀମାନେ ମଧୁର ସ୍ୱରରେ ବ୍ୟଙ୍ଗଗୀତ ଗାଇଲେ ଏବଂ ପରିହାସମୂଳକ ବଚନ ଶୁଣାଇଲେ। ଦେବତାମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିଳମ୍ବରେ ଭୋଜନ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ ଏବଂ ସେହି ଆନନ୍ଦମୟ କୋଳାହଳ ଶୁଣି ପ୍ରକୃତ ଆନନ୍ଦ ପାଇଲେ। ଭୋଜନ କରିବା ସମୟରେ ଯେତେ ଆନନ୍ଦ ବଢିଲା, ତାହା କୋଟି ମୁଖରେ କହିବାକୁ ପଡେ ନାହିଁ। ଆଚମନ ଜଳ ଓ ପାନ ଦିଆଯାଇଲା, ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯେଉଁଠାରେ ତାହାର ବାସସ୍ଥାନ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ଥିଲା ସେଠାକୁ ଗଲେ।
ଦୋହା 99
बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ।समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ।।99।।
bahuri muninh himavanta kahũ lagana sunāī āi |samaya biloki bibāha kara paṭhae deva bolāi ||99||
ତାପରେ ମୁନିମାନେ ଆସି ହିମବନ୍ତଙ୍କ ପାଖରେ ବିବାହର ଲଗ୍ନ ଜଣାଇଲେ। ସମୟ ଦେଖି ସେ ବିବାହ କରି ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ଡାକି ପଠାଇଲେ।
परंपरा में शिव-पार्वती विवाह-प्रसंग का पाठ ‘गृह-मंगल’, ‘विवाह-विघ्न-निवारण’, तथा मन के भय/संशय-क्षय हेतु फलदायी माना जाता है; विशेषतः दोहा 98 के ‘अजा-अनादि शक्ति’ उपदेश से श्रद्धा स्थिर होती है।
सामान्यतः ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन’ जैसे नाम-संपुट चलन में हैं; शिव-प्रसंग में कई पाठ-परंपराएँ ‘ॐ नमः शिवाय’/‘जय गिरिजापति दीनदयाला’ को भी संपुट-रूप में जोड़ती हैं (स्थानीय संप्रदायानुसार)।
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