Adhyaya 76
Anushasana ParvaAdhyaya 7655 Verses

Adhyaya 76

गोप्रदानगुणाः तथा कपिलागोविधानम् (Merits of Cow-Gift and the Origin-Account of Kapilā Cows)

Upa-parva: Dāna-dharma (Gopradāna Anuśāsana) — Discourse on Cow-Gift Merits

Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira again questions Bhīṣma for a fuller exposition of go-dāna’s merits, expressing that the discourse is ‘nectar-like’ and never satiating to hear. Bhīṣma delineates normative criteria: gifting a gentle, virtuous, young cow, covered/adorned and suitable for use, to a brāhmaṇa is said to release the donor from sins. Conversely, gifting cows that are non-productive (milk lost), debilitated, diseased, angry, or otherwise burdensome is framed as leading to adverse outcomes and as imposing hardship upon the recipient. The chapter then addresses why kapilā (tawny) cows are especially praised: Bhīṣma narrates a cosmogonic etiological account tied to Prajāpati, Surabhi, Soma, and Rudra, explaining the emergence and sanctified status of rohīṇīs/kapilās and their association with sacrificial prosperity. A concluding phalaśruti presents the recitation/understanding of this origin-account as auspicious and merit-bearing. The chapter closes with Yudhiṣṭhira acting on the instruction by donating well-equipped cows (with golden/copper milking vessels) and large numbers as yajña-related dakṣiṇā, oriented toward merit and fame.

Chapter Arc: इन्द्र (शक्र) के प्रश्न के उत्तर में पितामह भीष्म/ब्रह्माजी गो-दान के विषय को उठाते हैं—‘गोप्रदान’ का ऐसा कौन-सा रहस्य है जो लोकों तक का द्वार खोल देता है? → पितामह इन्द्र को बताते हैं कि अनेक प्रकार के लोक हैं जिन्हें इन्द्र भी नहीं देख पाते; पर शुभ कर्म, उत्तम व्रत, और निर्मल मन वाले ऋषि-ब्राह्मण उन्हें प्रत्यक्ष देखते हैं—कभी समाधि में, कभी देह-त्याग के बाद। फिर वे गो-दान के नियम, पात्रता, और भिन्न वर्णों (ब्राह्मण/क्षत्रिय) के लिए फल-भेद का क्रमशः विस्तार करते हैं, जिससे दान का ‘विधि’ पक्ष निर्णायक बन जाता है। → गो-दान की महिमा का शिखर तब आता है जब पितामह स्पष्ट करते हैं कि विधिपूर्वक ‘दोग्ध्री धेनु’ (दूध देने वाली गाय) का दान करने से द्विज को ‘महत् फल’ और ‘शाश्वत’ फल प्राप्त होता है; और यदि क्षत्रिय भी निर्दिष्ट गुणों/व्रतों से युक्त हो तो उसे भी ब्राह्मण-तुल्य फल मिलता है—गो-दान को वर्ण-सीमा से ऊपर उठाकर ‘गुण-धर्म’ के अधीन कर दिया जाता है। → अध्याय का निष्कर्ष यह है कि गो-दान केवल वस्तु-दान नहीं, बल्कि संयम (एक समय भोजन), श्रद्धा, नम्रता (गौ-नमस्कार), और विधि-पालन से संयुक्त साधना है; ऐसा करने वाला दाता गौ-दान के अनुपात में स्थायी पुण्य और उच्च लोक-प्राप्ति का अधिकारी होता है।

Shlokas

Verse 1

पर बछ। है २ >> त्रिसप्ततितमो<ध्याय: ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गोदानकी महिमा बताना पितामह उवाच यो<यं प्रश्नस्त्वया पृष्टो गोप्रदानादिकारित: । नास्ति प्रष्टास्ति लोके5स्मिंस्त्वत्तो5न्यो हि शतक्रतो,ब्रह्माजीने कहा--देवेन्द्र! गोदानके सम्बन्धमें तुमने जो यह प्रश्न उपस्थित किया है, तुम्हारे सिवा इस जगतमें दूसरा कोई ऐसा प्रश्न करनेवाला नहीं है

ពិតាមហ (ព្រះបិតាមហ) បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ ទេវេន្ទ្រ (សតក្រតុ)! សំណួរដែលអ្នកបានសួរ—អំពីការធ្វើទានគោ និងទានធម៌ដែលពាក់ព័ន្ធ—ជាសំណួរដែលកម្រណាស់មានអ្នកសួរនៅក្នុងលោកនេះ។ ពិតប្រាកដណាស់ ក្រៅពីអ្នក មិនមានអ្នកសួរដូចនេះទៀតឡើយ»។

Verse 2

सन्ति नानाविधा लोका यांस्त्वं शक्र न पश्यसि । पश्यामि यानहं लोकानेकपत्न्यक्ष या: स्त्रिय:,शक्र! ऐसे अनेक प्रकारके लोक हैं, जिन्हें तुम नहीं देख पाते हो। मैं उन लोकोंको देखता हूँ और पतित्रता स्त्रियाँ भी उन्हें देख सकती हैं

ភីष្ម បាននិយាយថា៖ «ឱ សក្រក! មានលោកជាច្រើនប្រភេទ ដែលអ្នកមិនអាចមើលឃើញបាន។ ខ្ញុំអាចឃើញលោកទាំងនោះ—ហើយស្ត្រីដែលមានសេចក្តីស្មោះត្រង់មិនប្រែប្រួលចំពោះប្តីតែមួយ ក៏អាចឃើញបានដែរ ឱ សក្រក»។

Verse 3

कर्मभिश्चापि सुशुभै: सुव्रता ऋषयस्तथा । सशरीरा हि तान्‌ यान्ति ब्राह्मणा: शुभबुद्धय:,उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषि तथा शुभ बुद्धिवाले ब्राह्मण अपने शुभकर्मोंके प्रभावसे वहाँ सशरीर चले जाते हैं

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ ដោយអំពើល្អដ៏រុងរឿងរបស់ខ្លួន និងដោយអានុភាពនៃវ្រតៈដែលបានរក្សាដោយល្អ ព្រះឥសីអ្នកមានវិន័យខ្ពង់ខ្ពស់ និងព្រហ្មណ៍អ្នកមានបញ្ញាបរិសុទ្ធប្រកបដោយមង្គល ទៅដល់លោកទាំងនោះបាន សូម្បីតែជាមួយរាងកាយផ្ទាល់។

Verse 4

शरीरन्यासमोक्षेण मनसा निर्मलेन च । स्वप्नभूतांश्व ताललोकान्‌ पश्यन्तीहापि सुव्रता:,श्रेष्ठ च्रतके आचरणमें लगे हुए योगी पुरुष समाधि-अवस्थामें अथवा मृत्युके समय जब शरीरसे सम्बन्ध त्याग देते हैं, तब अपने शुद्ध चित्तके द्वारा स्वप्रकी भाँति दीखनेवाले उन लोकोंका यहाँसे भी दर्शन करते हैं

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ ដោយការលះបង់រាងកាយ (ការដាក់ចោលសម្ពន្ធនៃកាយ) និងដោយចិត្តដែលបានបរិសុទ្ធ អ្នកប្រតិបត្តិមានវ្រតៈ និងគុណធម៌ ឃើញបាន—សូម្បីនៅទីនេះ—លោកទាំងនោះដែលលេចឡើងដូចសុបិន។

Verse 5

ते तु लोका: सहस्राक्ष शृणु यादृग्गुणान्विता: । न तत्र क्रमते कालो न जरा न च पावकः,सहस्राक्ष! वे लोक जैसे गुणोंसे सम्पन्न हैं, उनका वर्णन सुनो। वहाँ काल और बुढ़ापाका आक्रमण नहीं होता। अग्निका भी जोर नहीं चलता

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ សហស្រាក្ស (ឥន្ទ្រ) សូមស្តាប់អំពីលក្ខណៈនៃលោកទាំងនោះ ដែលប្រកបដោយគុណធម៌ដូច្នេះ។ នៅទីនោះ កាលៈមិនរីកចម្រើនមកគ្រប់គ្រងសត្វទេ; មិនមានចាស់ជរា ឬការរលួយ ហើយសូម្បីភ្លើងក៏មិនមានអំណាចឡើយ»។

Verse 6

तथा नास्त्यशुभ॑ किंचिन्न व्याधिस्तत्र न कलम: । यद्‌ यच्च गावो मनसा तस्मिन्‌ वाउछन्ति वासव,वहाँ किसीका किंचिन्मात्र भी अमंगल नहीं होता। उस लोकमें न रोग है न शोक। इन्द्र! वहाँकी गौएँ अपने मनमें जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करती हैं, वे सब उन्हें प्राप्त हो जाती हैं, यह मेरी प्रत्यक्ष देखी हुई बात है। वे जहाँ जाना चाहती हैं जाती हैं; जैसे चलना चाहती हैं चलती हैं और संकल्पमात्रसे सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्तकर उनका उपभोग करती हैं

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «នៅទីនោះ មិនមានអមង្គលសូម្បីតែបន្តិចឡើយ; ក្នុងលោកនោះ មិនមានជំងឺ និងមិនមានទុក្ខព្រួយ។ ឱ វាសវ (ឥន្ទ្រ) អ្វីៗណាដែលគោនៅទីនោះប្រាថ្នានៅក្នុងចិត្ត វត្ថុនោះឯងក៏បានមកដល់ពួកវា—នេះជារឿងដែលខ្ញុំបានឃើញដោយផ្ទាល់។ ពួកវាទៅកន្លែងណាក៏បានតាមចិត្ត ចលនាតាមចិត្ត ហើយដោយសេចក្តីសង្កల్పតែប៉ុណ្ណោះ ក៏ទទួលបាន និងរីករាយនឹងភោគៈទាំងអស់»។

Verse 7

तत्‌ सर्व प्राप्तुवन्ति सम मम प्रत्यक्षदर्शनात्‌ । कामगा: कामचारिण्य: कामात्‌ कामांश्व भुज्जते,वहाँ किसीका किंचिन्मात्र भी अमंगल नहीं होता। उस लोकमें न रोग है न शोक। इन्द्र! वहाँकी गौएँ अपने मनमें जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करती हैं, वे सब उन्हें प्राप्त हो जाती हैं, यह मेरी प्रत्यक्ष देखी हुई बात है। वे जहाँ जाना चाहती हैं जाती हैं; जैसे चलना चाहती हैं चलती हैं और संकल्पमात्रसे सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्तकर उनका उपभोग करती हैं

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «អ្វីៗទាំងនោះ ពួកវាទទួលបានស្មើគ្នា—ខ្ញុំបញ្ជាក់ដោយការមើលឃើញផ្ទាល់របស់ខ្ញុំ។ គោទាំងនោះទៅបានតាមចិត្ត និងប្រព្រឹត្តបានតាមចិត្ត; ដោយសេចក្តីប្រាថ្នាផ្ទាល់ ពួកវាទទួលបានភោគៈដែលប្រាថ្នា ហើយរីករាយនឹងវា។ ក្នុងលោកនោះ មិនមានអមង្គលសូម្បីតែបន្តិច; មិនមានជំងឺ និងមិនមានទុក្ខសោក។ ឱ ឥន្ទ្រ អ្វីៗណាដែលគោទាំងនោះប្រាថ្នានៅក្នុងចិត្ត វត្ថុនោះទាំងអស់ក៏មកដល់ពួកវា—នេះជារឿងដែលខ្ញុំបានឃើញដោយភ្នែកខ្ញុំឯង»។

Verse 8

वाप्य: सरांसि सरितो विविधानि वनानि च | गृहाणि पर्वताश्नैव यावद्द्वव्यं च किंचन,बावड़ी, तालाब, नदियाँ, नाना प्रकारके वन, गृह और पर्वत आदि सभी वस्तुएँ वहाँ उपलब्ध हैं

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «នៅទីនោះមានអណ្តូងជណ្តើរ (stepwells) បឹង ទន្លេ និងព្រៃព្រឹក្សាចម្រុះប្រភេទ; មានផ្ទះ និងភ្នំផងដែរ—ពិតប្រាកដណាស់ អ្វីៗទាំងឡាយដែលជាទ្រព្យធន ឬធនធានមានស្រាប់។ របស់ទាំងនោះសុទ្ធតែមាននៅទីនោះយ៉ាងសម្បូរបែប»។

Verse 9

मनोज्ञं सर्वभूतेभ्य: सर्वतन्त्रं प्रदृश्यत । ईदृशाद्‌ विपुलाल्लोकान्नास्ति लोकस्तथाविध:,गोलोक समस्त प्राणियोंके लिये मनोहर है। वहाँकी प्रत्येक वस्तुपर सबका समान अधिकार देखा जाता है। इतना विशाल दूसरा कोई लोक नहीं है

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «គោលោក (Goloka) បង្ហាញខ្លួនថាជាទីរីករាយចំពោះសត្វមានជីវិតទាំងអស់។ នៅទីនោះ គេឃើញរបៀបរបបសកល ដែលវត្ថុទាំងឡាយត្រូវបានចែករំលែកជាសាធារណៈ មានសិទ្ធិស្មើគ្នាសម្រាប់គ្រប់គ្នា។ មិនមានលោកណាផ្សេងទៀតដែលធំទូលាយ និងល្អឥតប្រៀបដូចអាណាចក្រនោះឡើយ»។

Verse 10

तत्र सर्वसहा: क्षान्ता वत्सला गुरुवर्तिन: । अहंकारैरविरहिता यान्ति शक्र नरोत्तमा:,इन्द्र! जो सब कुछ सहनेवाले, क्षमाशील, दयालु, गुरुजनोंकी आज्ञामें रहनेवाले और अहंकाररहित हैं, वे श्रेष्ठ मनुष्य ही उस लोकमें जाते हैं

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ សក្រក (ឥន្ទ្រ)! នៅក្នុងអាណាចក្រនោះ មានតែបុរសល្អឥតខ្ចោះបំផុតប៉ុណ្ណោះដែលបានទៅដល់—អ្នកដែលអាចទ្រាំទ្រការលំបាកទាំងអស់ មានអត់ធ្មត់ និងអភ័យទោស មានមេត្តាករុណាទន់ភ្លន់ រស់នៅក្រោមការបង្គាប់បញ្ជារបស់មាតាបិតា គ្រូ និងអ្នកចាស់ទុំ ហើយគ្មានអហង្ហារ។ គុណធម៌ទាំងនេះ—not អំណាច ឬឋានៈ—ជាសញ្ញារបស់អ្នកសមស្របសម្រាប់លោកខ្ពស់នោះ»។

Verse 11

यः सर्वमांसानि न भक्षयीत पुमान्‌ सदा भावितो धर्मयुक्त: । मातापित्रोररचिता सत्ययुक्तः शुश्रूषिता ब्राह्मणानामनिन्द्य:,जो सब प्रकारके मांसोंका भोजन त्याग देता है, सदा भगवच्चिन्तनमें लगा रहता है, धर्मपरायण होता है, माता-पिताकी पूजा करता, सत्य बोलता, ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहता, जिसकी कभी निन्दा नहीं होती, जो गौओं और ब्राह्मणोंपर कभी क्रोध नहीं करता, धर्ममें अनुरक्त रहकर गुरुजनोंकी सेवा करता है, जीवनभरके लिये सत्यका व्रत ले लेता है, दानमें प्रवृत्त रहकर किसीके अपराध करनेपर भी उसे क्षमा कर देता है, जिसका स्वभाव मृदुल है, जो जितेन्द्रिय, देवाराधक, सबका आतिथ्य-सत्कार करनेवाला और दयालु है, ऐसे ही गुणोंवाला मनुष्य उस सनातन एवं अविनाशी गोलोकमें जाता है

ភីṣ្មៈ (ជាព្រះបិតាមហា) បានមានព្រះវាចា៖ «បុរសណាដែលបោះបង់ការបរិភោគសាច់គ្រប់ប្រភេទទាំងស្រុង ដែលនៅជានិច្ចជាប់ជាមួយការសមាធិ/ការចងចាំព្រះ និងស្មោះត្រង់ចំពោះធម៌; ដែលគោរពមាតាបិតា ប្រកាន់សច្ចៈ និងបម្រើព្រះព្រាហ្មណ៍—បុរសឥតទោសនោះ ដែលពោរពេញដោយគុណធម៌ទាំងនេះ នឹងទៅដល់គោលោក (Goloka) អស់កល្បជានិច្ច និងមិនរលាយបាត់»។

Verse 12

अक्रोधनो गोषु तथा द्विजेषु धर्मे रतो गुरुशुश्रूषकश्न । यावज्जीवं सत्यवृत्ते रतश्न दाने रतो य: क्षमी चापराधे,जो सब प्रकारके मांसोंका भोजन त्याग देता है, सदा भगवच्चिन्तनमें लगा रहता है, धर्मपरायण होता है, माता-पिताकी पूजा करता, सत्य बोलता, ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहता, जिसकी कभी निन्दा नहीं होती, जो गौओं और ब्राह्मणोंपर कभी क्रोध नहीं करता, धर्ममें अनुरक्त रहकर गुरुजनोंकी सेवा करता है, जीवनभरके लिये सत्यका व्रत ले लेता है, दानमें प्रवृत्त रहकर किसीके अपराध करनेपर भी उसे क्षमा कर देता है, जिसका स्वभाव मृदुल है, जो जितेन्द्रिय, देवाराधक, सबका आतिथ्य-सत्कार करनेवाला और दयालु है, ऐसे ही गुणोंवाला मनुष्य उस सनातन एवं अविनाशी गोलोकमें जाता है

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «អ្នកដែលមិនខឹងចំពោះគោ និងចំពោះទ្វិជ (អ្នកកើតពីរដង) ដែលស្រឡាញ់ធម៌ និងខិតខំបម្រើគ្រូ និងអ្នកចាស់ទុំ; ដែលពេញមួយជីវិតរីករាយក្នុងការប្រព្រឹត្តតាមសច្ចៈ; ដែលស្រឡាញ់ការធ្វើទាន ហើយអភ័យទោសសូម្បីតែពេលត្រូវគេធ្វើខុស—បុគ្គលដូច្នោះ ដែលពោរពេញដោយគុណធម៌ទាំងនេះ នឹងទៅដល់គោលោក (Goloka) អស់កល្បជានិច្ច និងមិនរលាយបាត់»។

Verse 13

मृदुर्दान्तो देवपरायण श्नव सर्वातिथिश्वापि तथा दयावान्‌ | ईदृग्गुणो मानवस्तं प्रयाति लोकं गवां शाश्वृतं चाव्ययं च,जो सब प्रकारके मांसोंका भोजन त्याग देता है, सदा भगवच्चिन्तनमें लगा रहता है, धर्मपरायण होता है, माता-पिताकी पूजा करता, सत्य बोलता, ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहता, जिसकी कभी निन्दा नहीं होती, जो गौओं और ब्राह्मणोंपर कभी क्रोध नहीं करता, धर्ममें अनुरक्त रहकर गुरुजनोंकी सेवा करता है, जीवनभरके लिये सत्यका व्रत ले लेता है, दानमें प्रवृत्त रहकर किसीके अपराध करनेपर भी उसे क्षमा कर देता है, जिसका स्वभाव मृदुल है, जो जितेन्द्रिय, देवाराधक, सबका आतिथ्य-सत्कार करनेवाला और दयालु है, ऐसे ही गुणोंवाला मनुष्य उस सनातन एवं अविनाशी गोलोकमें जाता है

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ ស្តាប់ចុះ ឱ អ្នកដែលស្រឡាញ់ការបម្រើទេវតា—មនុស្សណាដែលមានចរិតទន់ភ្លន់ សង្រួមអារម្មណ៍ ប្រាកដក្នុងការគោរពបូជាទេវតា ទទួលភ្ញៀវទាំងអស់ដោយកិត្តិយស និងមានមេត្តាករុណា—មនុស្សដែលប្រកបដោយគុណធម៌ដូច្នេះ នឹងទៅដល់លោកនៃគោ (Goloka) ដែលជានិច្ច និងមិនរលាយបាត់។

Verse 14

न पारदारी पश्यति लोकमेतं न वै गुरुध्नो न मृषा सम्प्रलापी । सदा प्रवादी ब्राह्मणेष्वात्तवैरो दोषैरेतैर्यश्व युक्तो दुरात्मा,परस्त्रीगामी, गुरुहत्यारा, असत्यवादी, सदा बकवाद करनेवाला, ब्राह्मणोंसे वैर बाँध रखनेवाला, मित्रद्रोही, ठग, कृतघ्न, शठ, कुटिल, धर्मद्रेषी और ब्रह्महत्यारा--इन सब दोषोंसे युक्त दुरात्मा मनुष्य कभी मनसे भी गोलोकका दर्शन नहीं पा सकता; क्योंकि वहाँ पुण्यात्माओंका निवास है

ពិតាមហៈបានមានព្រះវាចា៖ អ្នកណាដែលលួចលាក់ប្រពន្ធរបស់អ្នកដទៃ មិនអាចឃើញលោកនោះបានឡើយ; អ្នកសម្លាប់គ្រូក៏ដូចគ្នា; អ្នកនិយាយកុហក និងបោកបញ្ឆោតក៏ដូចគ្នា។ អ្នកដែលស្ទើរតែជាប់ជានិច្ចក្នុងពាក្យបង្ខូចកេរ្តិ៍ យកសត្រូវជាមួយព្រាហ្មណ៍ ហើយត្រូវបានចងក្រងដោយកំហុសទាំងនេះ—មនុស្សចិត្តអាក្រក់ដូច្នេះ មិនអាចទៅដល់អាណាចក្រដ៏បរិសុទ្ធនោះបានទេ ព្រោះទីនោះជាទីស្នាក់នៅរបស់អ្នកសុចរិត។

Verse 15

न मित्रधुडनैकृतिक: कृतघ्नः शठो<नृजुर्धर्मविद्वेषकश्न । न ब्रह्महा मनसापि प्रपश्येद्‌ गवां लोकं पुण्यकृतां निवासम्‌,परस्त्रीगामी, गुरुहत्यारा, असत्यवादी, सदा बकवाद करनेवाला, ब्राह्मणोंसे वैर बाँध रखनेवाला, मित्रद्रोही, ठग, कृतघ्न, शठ, कुटिल, धर्मद्रेषी और ब्रह्महत्यारा--इन सब दोषोंसे युक्त दुरात्मा मनुष्य कभी मनसे भी गोलोकका दर्शन नहीं पा सकता; क्योंकि वहाँ पुण्यात्माओंका निवास है

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ អ្នកក្បត់មិត្ត មិនស្មោះត្រង់ អកតញ្ញូ បោកបញ្ឆោត កោងកាច និងស្អប់ធម៌—សូម្បីតែអ្នកសម្លាប់ព្រាហ្មណ៍—ក៏មិនអាចសូម្បីតែក្នុងចិត្ត ឃើញលោកនៃគោ (Goloka) ដែលជាទីស្នាក់នៅរបស់អ្នកធ្វើបុណ្យបានឡើយ។

Verse 16

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं निपुणेन सुरेश्वर । गोप्रदानरतानां तु फलं शृणु शतक्रतो,सुरेश्वर! शतक्रतो! यह सब मैंने तुम्हें विशेषरूपसे गोलोकका माहात्म्य बताया है। अब गोदान करनेवालोंको जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃទេវតា ខ្ញុំបានពន្យល់អស់ទាំងនេះដល់អ្នកដោយលម្អិត និងដោយភាពច្បាស់លាស់។ ឥឡូវនេះ ឱ Śatakratu ស្តាប់អំពីផលដែលកើតឡើងចំពោះអ្នកដែលរីករាយក្នុងការបរិច្ចាគគោ។

Verse 17

दायाद्यलब्धैरर्थ्यों गा: क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । धर्मार्जितान्‌ धनै: क्रीतान्‌ स लोकानाप्लुते5क्षयान्‌,जो पुरुष अपनी पैतृक सम्पत्तिसे प्राप्त हुए धनके द्वारा गौएँ खरीदकर उनका दान करता है, वह उस धनसे धर्मपूर्वक उपार्जित हुए अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है

មនុស្សណា ប្រើទ្រព្យដែលបានមកពីមរតកបុព្វបុរស ដើម្បីទិញគោ ហើយបរិច្ចាគវា នោះគេនឹងបានទៅដល់លោកអមតៈ មិនអស់សព្វ—លោកដែលទទួលបានដោយទ្រព្យដែលរកបានតាមធម៌។

Verse 18

यो वै द्यूते धनं जित्वा गा: क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । स दिव्यमयुतं शक्र वर्षाणां फलमश्लुते,शक्र! जो जूएमें धन जीतकर उसके द्वारा गायोंको खरीदता है और उनका दान करता है, वह दस हजार दिव्य वर्षोतक उसके पुण्यफलका उपभोग करता है

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ សក្រហ៍ (ឥន្ទ្រា) អ្នកណាឈ្នះទ្រព្យដោយល្បែងស៊ីសង ហើយយកទ្រព្យនោះទៅទិញគោ រួចបរិច្ចាគជាទាន—អ្នកនោះរីករាយនឹងផលបុណ្យនៃកិច្ចនោះអស់ដប់ពាន់ឆ្នាំទេវៈ»។

Verse 19

दायाद्याद्‌ या: सम वै गावो न्यायपूर्वैरुपार्जिता: । प्रदद्यात्‌ ता: प्रदातृणां सम्भवन्त्यपि च श्रुवा:,जो पैतृक-सम्पत्तिसे न्यायपूर्वक प्राप्त की हुई गौओंका दान करता है, ऐसे दाताओंके लिये वे गौएँ अक्षय फल देनेवाली हो जाती हैं

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «គោទាំងឡាយណាដែលបានទទួលដោយយុត្តិធម៌—ដូចជាភាគស្របច្បាប់ពីមរតក—បើបុរសម្នាក់បរិច្ចាគគោទាំងនោះជាទាន នោះសម្រាប់អ្នកឧបត្ថម្ភនោះ គោទាំងនោះក្លាយជាផលបុណ្យអចិន្ត្រៃយ៍ មិនសាបសូន្យ ដូចដែលបានឮក្នុងប្រពៃណីសាស្ត្រ»។

Verse 20

प्रतिगृहा तु यो दद्याद्‌ गा: संशुद्धेन चेतसा । तस्यापीहाक्षयाल्लोंकान्‌ ध्रुवान्‌ विद्धि शचीपते,शचीपते! जो पुरुष दानमें गौएँ लेकर फिर शुद्ध हृदयसे उनका दान कर देता है, उसे भी यहाँ अक्षय एवं अटल लोकोंकी प्राप्ति होती है--यह निश्चितरूपसे समझ लो

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «បុរសណាដែលទទួលគោជាទាន ហើយបន្ទាប់មកបរិច្ចាគគោទាំងនោះវិញដោយចិត្តបរិសុទ្ធ—ចូរដឹងជាក់ថា ឱ ព្រះប្តីនៃសចី (ឥន្ទ្រា) អ្នកនោះក៏ទទួលបានលោកអចិន្ត្រៃយ៍ និងមាំមួននៅបរលោកដែរ»។

Verse 21

जन्मप्रभृति सत्यं च यो ब्रूयान्नियतेन्द्रिय: । गुरुद्धविजसह: क्षान्तस्तस्य गोभि: समा गति:,जो जन्मसे ही सदा सत्य बोलता, इन्द्रियोंको काबूमें रखता, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंकी कठोर बातोंको भी सह लेता और क्षमाशील होता है, उसकी गौओंके समान गति होती है। अर्थात्‌ वह गोलोकमें जाता है

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «អ្នកណាតាំងពីកំណើតមកនិយាយតែសច្ចៈ គ្រប់គ្រងអារម្មណ៍ទាំងឡាយ អត់ធ្មត់ទ្រាំសូម្បីពាក្យរឹងរូសរបស់មនុស្សចាស់ទុំ និងព្រាហ្មណ៍ ហើយមានចិត្តអភ័យទោស—អ្នកនោះមានគតិដូចគោទាំងឡាយ; នោះគឺទៅដល់លោកគោ (គោលោក)»។

Verse 22

न जातु ब्राह्मणो वाच्यो यदवाच्यं शचीपते । मनसा गोधु न द्रुह्ेद्‌ गोवृत्तिगोंडनुकल्पक:,शचीपते शक्र! ब्राह्मणके प्रति कभी कुवाच्य नहीं बोलना चाहिये और गौओंके प्रति कभी मनसे भी द्रोहका भाव नहीं रखना चाहिये। जो ब्राह्मण गौओंके समान वृत्तिसे रहता है और गौओंके लिये घास आदिकी व्यवस्था करता है, साथ ही सत्य और धर्ममें तत्पर रहता है, उसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन सुनो। वह यदि एक गौका भी दान करे तो उसे एक हजार गोदानके समान फल मिलता है

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ព្រះប្តីនៃសចី (ឥន្ទ្រា) មិនគួរនិយាយពាក្យមិនសមរម្យចំពោះព្រាហ្មណ៍ឡើយ; ហើយក៏មិនគួរមានចិត្តអាក្រក់ចំពោះគោទាំងឡាយ សូម្បីតែក្នុងគំនិតផង។ ព្រាហ្មណ៍ម្នាក់ដែលរស់នៅដោយជីវិតសាមញ្ញ មិនបង្កហិង្សា ដូចគោ; ដែលរៀបចំស្មៅ និងចំណីសម្រាប់គោ; ហើយឧស្សាហ៍ក្នុងសច្ចៈ និងធម៌—ចូរស្តាប់ផលដែលគាត់ទទួល។ បើគាត់បរិច្ចាគគោតែមួយក្បាល ក៏បានផលបុណ្យស្មើនឹងការបរិច្ចាគគោមួយពាន់ក្បាល»។

Verse 23

सत्ये धर्मे च निरतस्तस्य शक्र फलं शृणु । गोसहस्रेण समिता तस्य थेनुर्भवत्युत,शचीपते शक्र! ब्राह्मणके प्रति कभी कुवाच्य नहीं बोलना चाहिये और गौओंके प्रति कभी मनसे भी द्रोहका भाव नहीं रखना चाहिये। जो ब्राह्मण गौओंके समान वृत्तिसे रहता है और गौओंके लिये घास आदिकी व्यवस्था करता है, साथ ही सत्य और धर्ममें तत्पर रहता है, उसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन सुनो। वह यदि एक गौका भी दान करे तो उसे एक हजार गोदानके समान फल मिलता है

ពិតាមហា បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ សក្រណ៍ (ឥន្ទ្រា) ចូរស្តាប់ផលដែលកើតឡើងចំពោះអ្នកដែលឧស្សាហ៍នៅក្នុងសច្ចៈ និងធម៌។ សូម្បីតែគោមួយក្បាលដែលអ្នកដូច្នោះបរិច្ចាគ ក៏ក្លាយជាបុណ្យស្មើនឹងការបរិច្ចាគគោមួយពាន់ក្បាល។ ឱ សក្រណ៍ ព្រះអម្ចាស់នៃសចី—មិនគួរនិយាយពាក្យរឹងរ៉ឹងចំពោះព្រាហ្មណ៍ឡើយ ហើយមិនគួរគិតចិត្តអាក្រក់ ឬមានសត្រូវចំពោះគោសូម្បីតែក្នុងចិត្ត។ អ្នកណាដែលរស់ដោយជីវិតដូចគោ—ទន់ភ្លន់ មិនបង្កអន្តរាយ ជួយចិញ្ចឹមអ្នកដទៃ—រៀបចំស្មៅ និងការថែទាំសម្រាប់គោ ហើយឈរមាំក្នុងសច្ចៈ និងធម៌ នោះទទួលបានផលដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់នេះ»។

Verse 24

क्षत्रियस्य गुणैरेतैरपि तुल्यफलं शृणु । तस्यापि द्विजतुल्या गौर्भवतीति विनिश्चय:,यदि क्षत्रिय भी इन गुणोंसे युक्त होता है तो उसे भी ब्राह्मणके समान ही (गोदानका) फल मिलता है। इस बातको अच्छी तरह सुन लो। उसकी (दान दी हुई) गौ भी ब्राह्मणकी गौके तुल्य ही फल देनेवाली होती है। यह धर्मात्माओंका निश्चय है

ភីෂ្មៈ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ចូរស្តាប់ទៀតផង៖ បើក្សត្រីយ៍មានគុណធម៌ដូចគ្នានេះ គាត់ក៏ទទួលបានផលស្មើគ្នាដែរ។ ពួកធម្មាត្មា បានសន្និដ្ឋានយ៉ាងមាំមួនថា សូម្បីតែគោដែលគាត់បរិច្ចាគ ក៏ផ្តល់បុណ្យស្មើនឹងការបរិច្ចាគរបស់ព្រាហ្មណ៍»។

Verse 25

वैश्यस्यैते यदि गुणास्तस्य पठचशतं भवेत्‌ । शूद्रस्यापि विनीतस्य चतुर्भागफलं स्मृतम्‌,यदि वैश्यमें भी उपर्युक्त गुण हों तो उसे भी एक गोदान करनेपर ब्राह्मणकी अपेक्षा (आधे भाग) पाँच सौ गौओंके दानका फल मिलता है और विनयशील शूद्रको ब्राह्मणके चौथाई भाग अर्थात्‌ ढाई सौ गौओंके दानका फल प्राप्त होता है

ភីෂ្មៈ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «បើវៃശ്യៈមានគុណធម៌ដូចនេះ ផលបុណ្យត្រូវរាប់ជាប្រាំរយ (គោ) ទោះបីសកម្មភាពខាងក្រៅគ្រាន់តែបរិច្ចាគគោមួយក្បាលក៏ដោយ។ ហើយសម្រាប់សូទ្រៈដែលមានវិន័យ និងទន់ភ្លន់ ផលត្រូវចងចាំថា ជាចំណែកមួយភាគបួន—ស្មើនឹងគោពីររយហាសិបក្បាល។ គោលបំណងគឺថា គុណធម៌របស់អ្នកបរិច្ចាគ—ការគ្រប់គ្រងខ្លួន ការទាបទន់ និងការប្រព្រឹត្តត្រឹមត្រូវ—ធ្វើឲ្យតម្លៃវិញ្ញាណនៃទាន លើសពីមាត្រដ្ឋានវត្ថុ»។

Verse 26

एतच्चैनं यो<नुतिछेत युक्तः सत्ये रतो गुरुशुश्रूषया च । दक्ष: क्षान्तो देवतार्थी प्रशान्तः शुचिर्बुद्धो धर्मशीलोडनहंवाक्‌ू

ភីෂ្មៈ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «អ្នកណាដែលមានវិន័យ ហើយប្រព្រឹត្តតាមនេះ—រីករាយក្នុងសច្ចៈ និងឧស្សាហ៍បម្រើគ្រូ—មានសមត្ថភាព អត់ធ្មត់ ប្រាថ្នាការបូជាទេវតា ស្ងប់ស្ងាត់ក្នុងចិត្ត បរិសុទ្ធ មានប្រាជ្ញា តាំងខ្លួនក្នុងធម៌ និងមិនមានពាក្យសម្តីអួតអាងខ្លួន—អ្នកនោះហើយជាអ្នកបង្កប់នូវចរិតដែលបានបង្រៀននៅទីនេះ»។

Verse 27

नित्यं दद्यादेकभक्त: सदा च सत्ये स्थितो गुरुशुश्रूषिता च,इन्द्र! जो सदा एक समय भोजन करके नित्य गोदान करता है, सत्यमें स्थित होता है, गुरुकी सेवा और वेदोंका स्वाध्याय करता है, जिसके मनमें गौओंके प्रति भक्ति है, जो गौओंका दान देकर प्रसन्न होता है तथा जन्मसे ही गौओंको प्रणाम करता है, उसको मिलनेवाले इस फलका वर्णन सुनो

ភីષ្មៈ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ ឥន្ទ្រា! ចូរស្តាប់ការពិពណ៌នាអំពីផលដែលកើតចំពោះអ្នកដែលរស់ដោយភាពសាមញ្ញមានវិន័យ—បរិភោគអាហារតែម្តងក្នុងមួយថ្ងៃ—បរិច្ចាគគោជាទានរៀងរាល់ថ្ងៃ ឈរមាំក្នុងសច្ចៈ បម្រើគ្រូដោយក្តីគោរព សិក្សាវេដៈ មានសេចក្តីស្រឡាញ់គោនៅក្នុងចិត្ត រីករាយក្នុងការបរិច្ចាគគោ ហើយតាំងពីកំណើតក៏គោរពបង្គំគោ។ ចូរស្តាប់ឥឡូវនេះ នូវផលដែលជីវិតនៃសច្ចៈ ការបម្រើ ការសិក្សា និងទានដ៏សប្បុរស នាំមក»។

Verse 28

वेदाध्यायी गोषु यो भक्तिमांश्व नित्यं दत्त्वा योडभिनन्देत गाश्न । आजातितो यश्षु गवां नमेत इदं फलं शक्र निबोध तस्य,इन्द्र! जो सदा एक समय भोजन करके नित्य गोदान करता है, सत्यमें स्थित होता है, गुरुकी सेवा और वेदोंका स्वाध्याय करता है, जिसके मनमें गौओंके प्रति भक्ति है, जो गौओंका दान देकर प्रसन्न होता है तथा जन्मसे ही गौओंको प्रणाम करता है, उसको मिलनेवाले इस फलका वर्णन सुनो

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ សក្រយ៍ ឱ ព្រះឥន្ទ្រា—សូមទ្រង់យល់ដឹងអំពីផលបុណ្យដែលកើតមានចំពោះបុគ្គលនោះ ដែលសិក្សាវេទៈ មានភក្តីចំពោះគោ ហើយបានឧទ្ទិសគោជាទានជាប្រចាំ រីករាយក្នុងទាននោះ; ហើយតាំងពីកំណើតក៏គោរពកោតខ្លាចដោយកោតសរសើរចំពោះគោ។ សូមទ្រង់ស្តាប់ឥឡូវនេះអំពីរង្វាន់នៃជីវិតដែលមានវិន័យក្នុងទាន ការគោរព និងការសិក្សាព្រះវេទៈ។»

Verse 29

यत्‌ स्यादिष्ट्वा राजसूये फल तु यत्‌ स्यादिष्ट्वा बहुना काउचनेन । एतत्‌ तुल्यं फलमप्याहुरग्रयं सर्वे सन्तस्त्वृषयो ये च सिद्धा:,राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है तथा बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणा देकर यज्ञ करनेसे जो फल मिलता है, उपर्युक्त मनुष्य भी उसके समान ही उत्तम फलका भागी होता है। यह सभी सिद्ध-संत-महात्मा एवं ऋषियोंका कथन है

ពិតាមហៈបានមានព្រះវាចា៖ «ផលបុណ្យដែលទទួលបានដោយការប្រព្រឹត្តយញ្ញៈរាជសូយៈ និងផលបុណ្យដែលទទួលបានដោយការប្រព្រឹត្តយញ្ញៈជាមួយទានមាសជាច្រើន—បុគ្គលនោះទទួលបានរង្វាន់ស្មើគ្នា ហើយជារង្វាន់ដ៏ប្រសើរបំផុត។ នេះជាព្រះវាចារបស់សន្តបុរសទាំងអស់—ទាំងឥសី និងសិទ្ធៈដែលបានដល់ភាពពេញលេញ និងដឹងច្បាស់អំពីយញ្ញៈ និងផលរបស់វា។»

Verse 30

योअग्रं भक्त किंचिदप्राश्य दद्याद्‌ गोभ्यो नित्यं गोव्रती सत्यवादी । शान्तो5लुब्धो गोसहस्रस्य पुण्यं संवत्सरेणाप्लुयात्‌ सत्यशील:,जो गोसेवाका व्रत लेकर प्रतिदिन भोजनसे पहले गौओंको गोग्रास अर्पण करता है तथा शान्त एवं निर्लोभ होकर सदा सत्यका पालन करता रहता है, वह सत्य-शील पुरुष प्रतिवर्ष एक सहस्र गोदान करनेके पुण्यका भागी होता है

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «អ្នកណាដែលមុនពេលបរិភោគអាហាររបស់ខ្លួន សូមឧទ្ទិសចំណែកតិចមួយជារៀងរាល់ថ្ងៃជាអាហារសម្រាប់គោ—រស់នៅក្នុងវ្រតៈថែរក្សាគោ និយាយតែសច្ចៈ ស្ងប់ស្ងាត់ និងមិនលោភ—បុរសដែលមានសច្ចៈជាគ្រឹះនោះ ក្នុងរយៈពេលមួយឆ្នាំ ទទួលបានបុណ្យស្មើនឹងការឧទ្ទិសគោមួយពាន់ក្បាល។»

Verse 31

यदेकभक्तमश्रीयाद्‌ दद्यादेकं गवां च यत्‌ । दशवर्षाण्यनन्तानि गोव्रती गो&$नुकम्पक:,जो गोसेवाका व्रत लेनेवाला पुरुष गौओंपर दया करता और प्रतिदिन एक समय भोजन करके एक समयका अपना भोजन गौओंको दे देता है, इस प्रकार दस वर्षोतक गोसेवामें तत्पर रहनेवाले पुरुषको अनन्त सुख प्राप्त होते हैं

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «បើបុរសម្នាក់យកវិន័យបរិភោគតែម្តងក្នុងមួយថ្ងៃ ហើយពីអាហារតែម្តងនោះ ឧទ្ទិសចំណែកមួយដល់គោ—ជាអ្នកកាន់វ្រតៈថែរក្សាគោ និងមានមេត្តាចំពោះសត្វគោ—ដោយឧស្សាហ៍បម្រើបែបនេះអស់ដប់ឆ្នាំ គាត់ទទួលបានសុខសាន្តអនន្ត។»

Verse 32

एकेनैव च भक्तेन य: क्रीत्वा गां प्रयच्छति । यावन्ति तस्या रोमाणि सम्भवन्ति शतक्रतो

ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «បើបុគ្គលណាម្នាក់ទិញគោមួយក្បាល ហើយបន្ទាប់មកឧទ្ទិសវាជាទាន ដោយសេចក្តីភក្តីស្មោះសុទ្ធ ទោះតែម្តង—ឱ សតក្រតុ (ព្រះឥន្ទ្រា)—ចំនួនផលល្អដែលកើតមាន (ដល់អ្នកឧទ្ទិស) មានច្រើនប៉ុន្មាន ក៏ស្មើនឹងចំនួនរោមលើគោនោះប៉ុណ្ណោះ។»

Verse 33

ब्राह्मणस्य फल हीदं क्षत्रियस्य तु वै शूणु,यह ब्राह्मणके लिये फल बताया गया। अब क्षत्रियको मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो। यदि क्षत्रिय इसी प्रकार पाँच वर्षोतक गौकी आराधना करे तो उसे वही फल प्राप्त होता है। उससे आधे समयमें वैश्यको और उससे भी आधे समयमें शूद्रकों उसी फलकी प्राप्ति बतायी गयी है

ភីෂ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «នេះជាផលបុណ្យដែលបានកំណត់សម្រាប់ព្រាហ្មណ៍; ឥឡូវ ចូរស្តាប់អំពីផលសម្រាប់ក្សត្រីយៈ។ ប្រសិនបើក្សត្រីយៈបូជានិងបម្រើគោដូចគ្នានេះអស់រយៈពេលប្រាំឆ្នាំ គាត់នឹងទទួលបានផលដូចគ្នានោះ។ វៃស្យៈត្រូវបាននិយាយថាទទួលបានក្នុងពាក់កណ្តាលពេលនោះ ហើយសូទ្រៈទទួលបានក្នុងពាក់កណ្តាលនៃពេលវៃស្យៈទៀត»។

Verse 34

पज्चवार्षिकमेवं तु क्षत्रियस्य फल स्मृतम्‌ । ततोडर्धेन तु वैश्यस्य शूद्रो वैश्यार्धत: स्मृत:,यह ब्राह्मणके लिये फल बताया गया। अब क्षत्रियको मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो। यदि क्षत्रिय इसी प्रकार पाँच वर्षोतक गौकी आराधना करे तो उसे वही फल प्राप्त होता है। उससे आधे समयमें वैश्यको और उससे भी आधे समयमें शूद्रकों उसी फलकी प्राप्ति बतायी गयी है

ភីෂ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «ដូច្នេះ ផលនៃវត្តនេះសម្រាប់ក្សត្រីយៈ ត្រូវបានចងចាំថា (ត្រូវការ) រយៈពេលប្រាំឆ្នាំ។ វៃស្យៈទទួលបានលទ្ធផលដូចគ្នានោះក្នុងពាក់កណ្តាលពេល ហើយសូទ្រៈត្រូវបាននិយាយថាទទួលបានក្នុងពាក់កណ្តាលនៃពេលវៃស្យៈ»។

Verse 35

यश्चात्मविक्रयं कृत्वा गा: क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । यावत्‌ संदर्शयेद्‌ गां वै स तावत्‌ फलमश्लुते,जो अपने आपको बेचकर भी गायको खरीदकर उसका दान करता है, वह ब्रह्माण्डमें जबतक गोजातिकी सत्ता देखता है, तबतक उस दानका अक्षय फल भोगता रहता है

ភីෂ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «សូម្បីតែអ្នកណាម្នាក់ដែលលក់ខ្លួនឯងទៅជាទាសករ ក៏បើគាត់ទិញគោហើយបរិច្ចាគវា គាត់នឹងសោយផលបុណ្យមិនរលាយនៃទាននោះ ដរាបណាគាត់នៅតែឃើញការមានស្ថិតិរបស់ពូជគោក្នុងសកលលោក»។

Verse 36

रोग्णि रोग्णि महाभाग लोकाश्षास्या5क्षया:स्मृता: । संग्रामेष्वर्जयित्वा तु यो वै गा: सम्प्रयच्छति । आत्मविक्रयतुल्यास्ता: शाश्वता विद्धि कौशिक,महाभाग इन्द्र! गौओंके रोम-रोममें अक्षय लोकोंकी स्थिति मानी गयी है। जो संग्राममें गौओंको जीतकर उनका दान कर देता है, उनके लिये वे गौएँ स्वयं अपनेको बेचकर लेकर दी हुई गौओंके समान अक्षय फल देनेवाली होती हैं--इस बातको तुम जान लो

ភីෂ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ អ្នកមានភាគ្យធំ! គេបានចងចាំថា ក្នុងរោមរោមនីមួយៗនៃគោ មានលោកអមតៈ មិនរលាយ ស្ថិតនៅ។ ដូច្នេះ អ្នកណាដែលឈ្នះគោក្នុងសង្គ្រាម ហើយបន្ទាប់មកបរិច្ចាគវា—គោទាំងនោះក្លាយជាសម្រាប់គាត់ ដូចគោដែលបានទទួលមកដោយការលក់ខ្លួនឯង ហើយវាបង្កើតផលបុណ្យអស់កល្ប មិនខ្សោយ។ ចូរដឹងដូច្នេះ ឱ កៅសិក!»

Verse 37

अभावे यो गवां दद्यात्‌ तिलधेनुं यतव्रत: । दुर्गात्‌ स तारितो थेन्वा क्षीरनद्यां प्रमोदते,जो संयम और नियमका पालन करनेवाला पुरुष गौओंके अभावमें तिलधेनुका दान करता है, वह उस धेनुकी सहायता पाकर दुर्गम संकटसे पार हो जाता है तथा दूधकी धारा बहानेवाली नदीके तटपर रहकर आनन्द भोगता है

ភីෂ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ «បុរសអ្នកមានការគ្រប់គ្រងខ្លួន និងស្មោះត្រង់ចំពោះវត្តព្រហ្មចរិយៈ បើនៅពេលខ្វះគោពិត មកបរិច្ចាគ ‘គោសេសាម’ (tiladhenu) នោះ ដោយអានុភាពនៃទាននោះ គាត់ត្រូវបានជួយឲ្យឆ្លងផុតគ្រោះថ្នាក់ដ៏លំបាក ហើយបន្ទាប់មករីករាយនៅលើច្រាំងទន្លេដែលហូរទឹកដោះ»។

Verse 38

न त्वेवासां दानमात्र प्रशस्तं पात्र कालो गोविशेषो विधिकश्ष । कालज्ञानं विप्र गवान्तरं हि दुःखं ज्ञातुं पावकादित्यभूतम्‌,केवल गौओंका दानमात्र कर देना प्रशंसाकी बात नहीं है; उसके लिये उत्तम पात्र, उत्तम समय, विशिष्ट गौ, विधि और कालका ज्ञान आवश्यक है। विप्रवर! गौओंमें जो परस्पर तारतम्य है, उसको तथा अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी पात्रको जानना बहुत ही कठिन है

ពិតមិនមែនថា ការបរិច្ចាគគោតែប៉ុណ្ណោះជារឿងគួរសរសើរទេ។ សម្រាប់ទាននោះ ត្រូវពិចារណាអ្នកទទួលដែលសមស្រប ពេលវេលាដែលសមស្រប គោដែលមានគុណលក្ខណៈពិសេស និងវិធីធ្វើត្រឹមត្រូវ—រួមទាំងការយល់ដឹងអំពីកាលៈទេសៈយ៉ាងច្បាស់។ ឱ ព្រាហ្មណ៍! ការដឹងពីកម្រិតខុសគ្នារវាងគោទាំងឡាយ និងការស្គាល់អ្នកទទួលដែលភ្លឺរលោងដូចភ្លើង និងព្រះអាទិត្យ នោះពិតជាលំបាកណាស់។

Verse 39

स्वाध्यायाब्यं शुद्धयोनिं प्रशान्तं वैतानस्थं पापभीरुं बहुज्ञम्‌ | गोषु क्षान्तं नातितीक्ष्णं शरण्यं वृत्तिग्लानं तादृशं पात्रमाहु:,जो वेदोंके स्वाध्यायसे सम्पन्न, शुद्ध कुलमें उत्पन्न, शान्तस्वभाव, यज्ञपरायण, पापभीरु और बहुज्ञ है, जो गौओंके प्रति क्षमाभाव रखता है, जिसका स्वभाव अत्यन्त तीखा नहीं है, जो गौओंकी रक्षा करनेमें समर्थ और जीविकासे रहित है, ऐसे ब्राह्मणको गोदानका उत्तम पात्र बताया गया है

ភីષ្មបាននិយាយថា៖ «ពួកគេប្រកាសថា អ្នកទទួលសមស្របសម្រាប់ទានគោ គឺព្រាហ្មណ៍ដែលសម្បូរដោយការសិក្សាវេទៈ កើតក្នុងវង្សសុទ្ធ មានចិត្តស្ងប់ ស្មោះត្រង់ចំពោះប្រពៃណីយញ្ញវេទៈ ខ្លាចបាប និងមានចំណេះដឹងទូលំទូលាយ; ដែលមានភាពអត់ធ្មត់ និងទន់ភ្លន់ចំពោះគោ មិនរឹងរ៉ៃដោយសភាពធម្មជាតិ អាចផ្តល់ជម្រក និងការពារ ហើយមិនជាប់ពាក់ព័ន្ធនឹងការរកស៊ីលោកិយ។ មនុស្សដូច្នេះហៅថា ជាភាជន៍សមរម្យសម្រាប់ go-dāna។»

Verse 40

वृत्तिग्लाने सीदति चातिमात्रं कृष्यर्थ वा होम्यहेतो: प्रसूते: । गुर्वर्थ वा बालसंवृद्धये वा धेनुं दद्याद्‌ देशकालेडविशिष्टे,जिसकी जीविका क्षीण हो गयी हो तथा जो अत्यन्त कष्ट पा रहा हो, ऐसे ब्राह्मणको सामान्य देश-कालमें भी दूध देनेवाली गायका दान करना चाहिये। इसके सिवा खेतीके लिये, होम-सामग्रीके लिये, प्रसूता स्त्रीके पोषणके लिये, गुरुदक्षिणाके लिये अथवा शिशु- पालनके लिये सामान्य देश-कालमें भी दुधारू गायका दान करना उचित है

ភីષ្មបាននិយាយថា៖ ទោះបីមិនមានកាលៈទេសៈពិសេសណាមួយក៏ដោយ គួរបរិច្ចាគគោទឹកដោះមួយក្បាលដល់ព្រាហ្មណ៍ដែលជីវភាពបានធ្លាក់ចុះ ហើយកំពុងទទួលទុក្ខលំបាកយ៉ាងខ្លាំង។ ដូចគ្នានេះផងដែរ ទោះនៅក្នុងលក្ខខណ្ឌធម្មតា ក៏សមរម្យក្នុងការបរិច្ចាគគោទឹកដោះ នៅពេលត្រូវការសម្រាប់កសិកម្ម សម្រាប់សម្ភារៈប្រើក្នុងពិធីហោម/យញ្ញ សម្រាប់ចិញ្ចឹមស្ត្រីទើបសម្រាលកូន សម្រាប់គ្រូទក្ខិណា ឬសម្រាប់ការចិញ្ចឹមកុមារ។

Verse 41

अन्तर्ज्ाता: सक्रयज्ञानलब्धा: प्राणै: क्रीतास्तेजसा यौतकाश्न । कृच्छोत्सृष्टा: पोषणाभ्यागताश्न द्वारैरेतैगोविशेषा: प्रशस्ता:,गर्भिणी, खरीदकर लायी हुई, ज्ञान या विद्याके बलसे प्राप्त की हुई, दूसरे प्राणियोंके बदलेमें लायी हुई अथवा युद्धमें पराक्रम प्रकट करके प्राप्त की हुई, दहेजमें मिली हुई, पालनमें कष्ट समझकर स्वामीके द्वारा परित्यक्त हुई तथा पालन-पोषणके लिये अपने पास आयी हुई विशिष्ट गौएँ इन उपर्युक्त कारणोंसे ही दानके लिये प्रशंसनीय मानी गयी हैं

ភីષ្មបាននិយាយថា៖ គោដែលមានតម្លៃពិសេស ត្រូវបានសរសើរថាសមស្របសម្រាប់ទាន នៅពេលវាមកដល់ម្ចាស់តាមមធ្យោបាយដែលទទួលស្គាល់ទាំងនេះ—កើតក្នុងគ្រួសាររបស់ខ្លួន បានមកពីពិធីយញ្ញ ឬដោយអំណាចនៃការសិក្សា បានទទួលជំនួសជីវិតរបស់ខ្លួន ឈ្នះដោយវីរភាពក្នុងសង្គ្រាម ទទួលជាដំណែងអាពាហ៍ពិពាហ៍ បានដោះលែងដោយម្ចាស់ដែលឃើញថាការថែទាំជាបន្ទុក ឬគោដែលមកសុំអាហារ និងការការពារ។ ដើមកំណើតបែបនេះធ្វើឲ្យទានមានសេចក្តីសមរម្យតាមធម៌ ព្រោះសិទ្ធិរបស់អ្នកឲ្យច្បាស់លាស់ ហើយការធ្វើនោះគាំទ្រសុខុមាលភាព មិនមែនបង្កហានិភ័យ។

Verse 42

बलान्विता: शीलवयोपपन्ना: सर्वा: प्रशंसन्ते सुगन्धवत्य: । यथा हि गंगा सरितां वरिष्ठा तथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा

ភីષ្មបាននិយាយថា៖ «គោទាំងអស់នេះ—មានកម្លាំង មានសីលធម៌ល្អ និងស្ថិតក្នុងវ័យក្មេងពេញលេញ—ត្រូវបានសរសើរថាមានក្លិនក្រអូប និងល្អឥតខ្ចោះ។ ដូចដែលទន្លេគង្គាជាទន្លេឧត្តមក្នុងចំណោមទន្លេទាំងឡាយ ដូច្នេះដែរ គោ ‘កពិលា’ គឺឧត្តមបំផុតក្នុងចំណោមគោអរជុនីទាំងឡាយ។»

Verse 43

हृष्ट-पुष्ट, सीधी-सादी, जवान और उत्तम गन्धवाली सभी गौएँ प्रशंसनीय मानी गयी हैं। जैसे गंगा सब नदियोंमें श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कपिला गौ सब गौआओंमें उत्तम है ।। तिस्नरो रात्रीस्त्वद्धिरुपोष्य भूमौ तृप्ता गावस्तर्पिति भ्य: प्रदेया: । वत्सैः पुष्टे: क्षीरपैः सुप्रचारा- स्त्र्यहं दत्त्वा गोरसैर्वर्तितव्यम्‌,(गोदानकी विधि इस प्रकार है--) दाता तीन राततक उपवास करके केवल पानीके आधारपर रहे, पृथ्वीपर शयन करे और गौओंको घास-भूसा खिलाकर पूर्ण तृप्त करे। तत्पश्चात्‌ ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे संतुष्ट करके उन्हें वे गौएँ दे। उन गौओंके साथ दूध पीनेवाले हृष्ट-पुष्ट बछड़े भी होने चाहिये तथा वैसी ही स्फूर्तियुक्त गौएँ भी हों। गोदान करनेके पश्चात्‌ तीन दिनोंतक केवल गोरस पीकर रहना चाहिये

ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឲ្យអ្នកបរិច្ចាគអត់អាហារបីរាត្រី ដោយអាស្រ័យតែទឹកប៉ុណ្ណោះ ហើយដេកលើដី។ បន្ទាប់ពីឲ្យគោទាំងឡាយស៊ីស្មៅ និងចំណីគោរហូតឆ្អែតពេញលេញ ហើយបានបំពេញចិត្តព្រះព្រាហ្មណ៍ដោយអាហារ និងការគោរពតាមគួរ រួចទើបប្រគេនគោទាំងនោះជាទាន។ គោគួរតែសុភាពរាបសារ និងមានកម្លាំងល្អ មានកូនគោរឹងមាំដែលនៅផឹកទឹកដោះ។ ក្រោយពីទានគោហើយ អ្នកបរិច្ចាគគួររស់បីថ្ងៃដោយទទួលតែផលិតផលទឹកដោះ (គោរស) ប៉ុណ្ណោះ»។

Verse 44

दत्त्वा धेनुं सुव्रतां साधुदोहां कल्याणवत्सामपलायिनीं च । यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- स्तावन्ति वर्षाणि भवन्त्यमुत्र,जो गौ सीधी-सूधी हो, सुगमतासे अच्छी तरह दूध दुहा लेती हो, जिसका बछड़ा भी सुन्दर हो तथा जो बन्धन तुड़ाकर भागनेवाली न हो, ऐसी गौका दान करनेसे उसके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोतक दाता परलोकमें सुख भोगता है

ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «បើមនុស្សម្នាក់បរិច្ចាគគោមួយដែលមានវិន័យល្អ សុភាពរាបសារ ទឹកដោះងាយដោះ និងដោះបានល្អ មានកូនគោស្រស់ស្អាត ហើយមិនរត់គេចបំបែកខ្សែចងទេ នោះចំនួនរោមលើរាងកាយគោមានប៉ុន្មាន ឆ្នាំនៅលោកបរលោក អ្នកបរិច្ចាគនឹងរីករាយសុខសាន្តប៉ុន្នោះ»។

Verse 45

तथानड्वाहं ब्राह्मणाय प्रदाय धुर्य युवानं बलिनं विनीतम्‌ । हलस्य वोढारमनन्तवीर्य॑ प्राप्रोति लोकान्‌ दशधेनुदस्य,जो मनुष्य ब्राह्मणको बोझ उठानेमें समर्थ, जवान, बलिष्ठ, विनीत--सीधा-सादा, हल खींचनेवाला और अधिक शक्तिशाली बैल दान करता है, वह दस धेनु दान करनेवालेके लोकोंमें जाता है

ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «អ្នកណាបរិច្ចាគដល់ព្រះព្រាហ្មណ៍នូវគោឈ្មោលសម្រាប់ទាញរទេះឬទាញនង្គ័ល ដែលសមស្របនឹងការងារ ជាវ័យក្មេង មាំមួន បានហ្វឹកហាត់ល្អ និងសុភាពរាបសារ ជាអ្នកទាញនង្គ័លមានកម្លាំងខ្លាំង—អ្នកនោះនឹងទៅដល់លោកសុភមង្គលដូចអ្នកដែលបានទានគោទឹកដោះដប់ក្បាល។ គោលបំណងនៃធម៌នេះបង្ហាញថា តម្លៃសីលធម៌នៃទានស្ថិតនៅលើប្រយោជន៍ពិត និងភាពសមស្របសម្រាប់ជីវភាព និងការងារធម៌របស់អ្នកទទួល មិនមែនស្ថិតតែចំនួនប៉ុណ្ណោះទេ»។

Verse 46

कान्तारे ब्राह्मणान्‌ गाश्न यः परित्राति कौशिक । क्षणेन विप्रमुच्येत तस्य पुण्यफलं शृणु,इन्द्र! जो दुर्गम वनमें फँसे हुए ब्राह्मण और गौओंका उद्धार करता है, वह एक ही क्षणमें समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा उसे जिस पुण्यफलकी प्राप्ति होती है, वह भी सुन लो

ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ កೌśិក (ឥន្ទ្រ) អ្នកណាដែលសង្គ្រោះព្រះព្រាហ្មណ៍ និងគោទាំងឡាយដែលជាប់គាំងនៅក្នុងព្រៃដ៏លំបាក នោះក្នុងមួយភ្លែតតែប៉ុណ្ណោះ គេរួចផុតពីបាបទាំងស្រុង។ ចូរស្តាប់ផ្លែបុណ្យដែលគេទទួលបាននោះ»។

Verse 47

अश्वमेधक्रतोस्तुल्यं फलं भवति शाश्वतम्‌ । मृत्युकाले सहस्राक्ष यां वृत्तिमनुकाड्क्षते,सहस्राक्ष! उसे अश्वमेध यज्ञके समान अक्षय फल सुलभ होता है। वह मृत्युकालमें जिस स्थितिकी आकांक्षा करता है, उसे भी पा लेता है

ភីṣ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ សហស្រាក្ស (ឥន្ទ្រ) គេបានទទួលផលអចិន្ត្រៃយ៍ ស្មើនឹងផលនៃយज्ञអશ્વមេធ។ ហើយនៅពេលមរណកាល ស្ថានភាពណាដែលគេប្រាថ្នា គេក៏បានសម្រេចស្ថានភាពនោះដែរ»។

Verse 48

लोकान्‌ बहुविधान्‌ दिव्यान्‌ यच्चास्य हृदि वर्तते । तत्‌ सर्व समवाप्रोति कर्मणैतेन मानव:,नाना प्रकारके दिव्य लोक तथा उसके हृदयमें जो-जो कामना होती है, वह सब कुछ मनुष्य उपर्युक्त सत्कर्मके प्रभावसे प्राप्त कर लेता है

ដោយអานุភាពនៃកុសលកម្មដ៏សុចរិតនេះ មនុស្សម្នាក់អាចសម្រេចបាននូវលោកសួគ៌ដ៏ទេវីយ៍ជាច្រើនប្រភេទ ហើយបំណងណាដែលស្ថិតនៅក្នុងបេះដូងរបស់គាត់—គាត់ក៏ទទួលបានទាំងអស់នោះដែរ។

Verse 49

गोभिश्व समनुज्ञात: सर्वत्र च महीयते । यस्त्वेतेनैव कल्पेन गां वनेष्वनुगच्छति,इतना ही नहीं, वह गौओंसे अनुगृहीत होकर सर्वत्र पूजित होता है। शतक्रतो! जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे वनमें रहकर गौओंका अनुसरण करता है तथा निःस्पृह, संयमी और पवित्र होकर घास-पत्ते एवं गोबर खाता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह मनमें कोई कामना न होनेपर मेरे लोकमें देवताओंके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता है। अथवा उसकी जहाँ इच्छा होती है, उन्हीं लोकोंमें चला जाता है

ភីष្មៈបានមានពាក្យថា៖ «ដោយបានទទួលព្រះគុណ និងការអនុម័តពីគោ មនុស្សនោះត្រូវបានគេគោរពបូជាទូទាំងទីកន្លែង។ ប៉ុន្តែអ្នកណាដែលប្រកាន់វិន័យនេះឯង រស់នៅក្នុងព្រៃ ហើយដើរតាមគោ—គ្មានក្តីលោភ សម្របសម្រួលខ្លួន និងបរិសុទ្ធ—ចិញ្ចឹមជីវិតដោយស្មៅ ស្លឹកឈើ ទោះដល់លាមកគោក៏ដោយ នោះពេលចិត្តគ្មានបំណងសល់ទៀត គាត់រស់នៅដោយសេចក្តីរីករាយក្នុងលោករបស់ខ្ញុំជាមួយទេវតា; ឬមិនដូច្នោះទេ គាត់ទៅកាន់លោកណាដែលគាត់ប្រាថ្នា។»

Verse 50

तृणगोमयपर्णाशी निःस्पूृहो नियत: शुचि: । अकामं तेन वस्तव्यं मुदितेन शतक्रतो,इतना ही नहीं, वह गौओंसे अनुगृहीत होकर सर्वत्र पूजित होता है। शतक्रतो! जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे वनमें रहकर गौओंका अनुसरण करता है तथा निःस्पृह, संयमी और पवित्र होकर घास-पत्ते एवं गोबर खाता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह मनमें कोई कामना न होनेपर मेरे लोकमें देवताओंके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता है। अथवा उसकी जहाँ इच्छा होती है, उन्हीं लोकोंमें चला जाता है

ភីष្មៈបានមានពាក្យថា៖ «ឱ សតក្រತು! សូមឲ្យគាត់រស់នៅដោយចិត្តពេញចិត្ត ការពារខ្លួន និងបរិសុទ្ធ ដោយបរិភោគស្មៅ លាមកគោ និងស្លឹកឈើ។ រស់នៅដូច្នេះដោយគ្មានបំណង គាត់សម្រេចបានលោករបស់ខ្ញុំ ហើយរស់នៅដោយសេចក្តីរីករាយក្នុងចំណោមទេវតា; ឬមិនដូច្នោះទេ គាត់ទៅកាន់លោកណាដែលគាត់ប្រាថ្នា។»

Verse 51

मम लोके सुरै: सार्थ लोके यत्रापि चेच्छति,इतना ही नहीं, वह गौओंसे अनुगृहीत होकर सर्वत्र पूजित होता है। शतक्रतो! जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे वनमें रहकर गौओंका अनुसरण करता है तथा निःस्पृह, संयमी और पवित्र होकर घास-पत्ते एवं गोबर खाता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह मनमें कोई कामना न होनेपर मेरे लोकमें देवताओंके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता है। अथवा उसकी जहाँ इच्छा होती है, उन्हीं लोकोंमें चला जाता है

ភីष្មៈបានមានពាក្យថា៖ «ក្នុងលោករបស់ខ្ញុំ គាត់រស់នៅដោយសេចក្តីរីករាយជាមួយទេវតា។ ឱ សតក្រತು (ឥន្ទ្រ)! មនុស្សណាដែលប្រកាន់វិន័យដូចបាននិយាយ រស់នៅក្នុងព្រៃ ដើរតាមគោ ហើយនៅតែគ្មានបំណង សម្របសម្រួលខ្លួន និងបរិសុទ្ធ—ចិញ្ចឹមជីវិតដោយស្មៅ ស្លឹកឈើ និងលាមកគោ—ពេលចិត្តគ្មានក្តីលោភសល់ទៀត គាត់សម្រេចបានលោករបស់ខ្ញុំ ហើយរស់នៅទីនោះដោយសុខសាន្ត; ឬមិនដូច្នោះទេ ទៅកាន់លោកណាដែលគាត់ប្រាថ្នា ក៏អាចទៅបាន។»

Verse 72

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपरव्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानसम्बन्धी बहतत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

ដូច្នេះ បញ្ចប់ជំពូកទី៧២ ស្តីអំពីការបរិច្ចាគគោ ក្នុងបរិវេណ «ធម៌នៃការបរិច្ចាគ» នៃ អនុសាសនបរវៈ ក្នុងមហាភារតដ៏បរិសុទ្ធ។

Verse 73

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पितामहेन्द्रसंवादे त्रिसप्ततितमो<5ध्याय:

ដូច្នេះ ក្នុង «មហាភារត» ដ៏បរិសុទ្ធ នៅក្នុង «អនុសាសនបវ៌» ជាពិសេសក្នុងផ្នែក «ធម្មៈនៃការទាន» ការសន្ទនារវាង ពិតាមហៈ (ភីෂ្ម) និង ព្រះឥន្ទ្រ បានបញ្ចប់ ហើយជំពូកទី៧៣ ក៏បានបញ្ចប់ដែរ។

Verse 263

महत्‌ फल प्राप्यते स द्विजाय दत्त्वा दोग्ध्रीं विधिनानेन धेनुम्‌ । जो पुरुष सदा सावधान रहकर इस उपर्युक्त धर्मका पालन करता है तथा जो सत्यवादी, गुरुसेवापरायण, दक्ष, क्षमाशील, देवभक्त, शान्तचित्त, पवित्र, ज्ञानवान्‌, धर्मात्मा और अहंकारशून्य होता है, वह यदि पूर्वोक्त विधिसे ब्राह्मणको दूध देनेवाली गायका दान करे तो उसे महान्‌ फलकी प्राप्ति होती है

ភីષ្មបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ អ្នកណាដែលអនុវត្តពិធីតាមវិធីដែលបានកំណត់នេះ ហើយប្រគេនគោទឹកដោះ (គោបំបៅ) ដល់ព្រះព្រាហ្មណ៍ នោះទទួលបានបុណ្យផលដ៏ធំ។ បុរសដែលតែងតែប្រុងប្រយ័ត្នរក្សាធម្មៈដូចបានពោល—និយាយសច្ចៈ សេវាគ្រូដោយស្មោះត្រង់ មានសមត្ថភាព អត់ធ្មត់ ស្រឡាញ់ទេវតា ចិត្តស្ងប់ សុចរិត ប្រាជ្ញា មានធម៌ និងគ្មានអហង្គារ—បើគាត់បរិច្ចាគគោទឹកដោះដល់ព្រះព្រាហ្មណ៍តាមវិធីនោះ នឹងទទួលបានផលដ៏មហិមា។

Verse 323

तावत्‌ प्रदानात्‌ स गवां फलमाप्रोति शाश्वतम्‌ । शतक्रतो! जो एक समय भोजन करके दूसरे समयके बचाये हुए भोजनसे गाय खरीदकर उसका दान करता है, वह उस गौके जितने रोएँ होते हैं, उतने गौओंके दानका अक्षय फल पाता है

ភីષ្មបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ ឱ សតក្រតុ (ឥន្ទ្រ) អ្នកណាដែលបរិច្ចាគគោ នឹងទទួលបានផលដ៏អស់កល្បជានិច្ច។ សូម្បីតែអ្នកដែលបរិភោគម្តង ហើយយកអាហារដែលសន្សំពីម្តងបន្ទាប់ទៅទិញគោ រួចបរិច្ចាគវា ក៏ទទួលបានបុណ្យផលមិនរលាយ ស្មើនឹងការទានគោចំនួនប៉ុន្មានដែលស្មើនឹងចំនួនរោមលើរាងកាយគោនោះ។

Frequently Asked Questions

Whether a gift remains meritorious if it transfers hardship to the recipient; the chapter treats burdensome donations (diseased, non-productive, or coercively obtained cows) as ethically defective despite being labeled ‘charity.’

Give what is fit, useful, and respectfully prepared; merit is linked to the recipient’s benefit and the donor’s responsible intention, not to the donor’s convenience in disposing of unwanted property.

Yes. The chapter states that reciting/knowing the auspicious account of cows’ origin and status is purifying and conducive to well-being and prosperity, functioning as a textual warrant for the discourse’s ritual-ethical authority.