
Bhīmasena’s Discourse on Kāla, Resolve, and the Feasibility of Ajñātavāsa (भीमसेनस्य कालोपदेशः)
Upa-parva: Ajñātavāsa–Saṃkalpa and Kṣātra-Nīti Discourse (Bhīma’s Counsel to Yudhiṣṭhira)
Bhīma speaks to Yudhiṣṭhira, framing time (kāla) as an unbounded, immeasurable current that ‘carries all away’ and steadily reduces life even in a single instant. He argues that waiting itself is costly: the thirteen years of exile are not neutral duration but active depletion leading toward mortality. From this premise he advances a kṣātra-ethical critique of inaction—one who does not settle enmities or act decisively sinks into ruin. Bhīma then intensifies the practical argument: given the brothers’ renown and distinctive presence (including Draupadī), concealed living is structurally difficult, like hiding a mountain or the sun. He warns that adversaries and their allies may deploy covert agents to identify them, producing significant danger. The chapter concludes by urging a firm decision toward enemy-neutralization, asserting that for a kṣatriya, strategic engagement is a principal duty when legitimate order is forcibly disrupted.
Chapter Arc: काम्यकवन की शान्ति में भीमसेन का क्रोध धधक उठता है—वह दुर्योधन पर बलपूर्वक चढ़ाई कर अपमान का प्रतिशोध लेना चाहता है, और युधिष्ठिर को निर्णायक उत्तर देना पड़ता है। → युधिष्ठिर राजधर्म और समय-धर्म का स्मरण कराते हुए भीम को बताते हैं कि धर्म की गति ‘सुदुर्विदा’ है; अकेले बल के मद में उठाया गया युद्ध न केवल असम्भव है, बल्कि विनाशकारी भी—क्योंकि दुर्योधन को मारने से पहले उसके सहायक महावीरों को रण में जीतना पड़ेगा। → युधिष्ठिर भीम के ‘केवलचापल्य’ और ‘बलदर्प’ से उपजे आग्रह को रोकते हुए स्पष्ट करते हैं कि अभी प्रतिज्ञा-पूर्ति का मार्ग अर्जुन के दिव्यास्त्र-लाभ से होकर जाता है; उसी हेतु अर्जुन को इन्द्र और रुद्र की ओर (दिव्यास्त्र-प्राप्ति के लिए) अग्रसर होना चाहिए। → इसी क्रम में व्यास का आगमन होता है; वे युधिष्ठिर को ‘प्रतिस्मृतिविद्या’ प्रदान कर स्मृति, धैर्य और धर्मबुद्धि को स्थिर करते हैं। तत्पश्चात पाण्डव पुनः काम्यकवन में लौटकर मंत्रियों-सेवकों सहित निवास करते हैं, धनुर्वेद का अभ्यास करते हैं, वेदमंत्र सुनते हैं और यथाविधि पितृ-देव- विप्रों के लिए निर्वपन करते हैं। → अर्जुन के दिव्यास्त्र-यात्रा का अगला चरण—इन्द्र-रुद्र से साक्षात्कार और अस्त्र-लाभ—निकट भविष्य में निर्णायक बनकर सामने आता है।
Verse 1
हि >> लय ० () है 7 षट्त्रिशो5ध्याय: युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाना, व्यासजीका आगमन और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृतिविद्याप्रदान तथा पाण्डवोंका पुन: काम्यकवनगमन वैशम्पायन उवाच भीमसेनवच: श्रुत्वा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । निः:श्वस्य पुरुषव्याघ्र: सम्प्रदध्यौ परंतप:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! भीमसेन-की बात सुनकर शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर लम्बी साँस लेकर मन-ही-मन विचार करने लगे --'मैंने राजाओंके धर्म एवं वर्णोके सुनिश्चित सिद्धान्त भी सुने हैं, परंतु जो भविष्य और वर्तमान दोनोंपर दृष्टि रखता है, वही यथार्थदर्शी है
Vaiśampāyana berkata: Mendengar ucapan Bhīmasena, Yudhiṣṭhira putra Kuntī—harimau di antara manusia, penghangus musuh—menarik napas panjang dan mulai merenung dalam batin.
Verse 2
श्रुता मे राजधर्माश्न वर्णानां च विनिश्चया: । आयत्यां च तदात्वे च यः पश्यति स पश्यति,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! भीमसेन-की बात सुनकर शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर लम्बी साँस लेकर मन-ही-मन विचार करने लगे --'मैंने राजाओंके धर्म एवं वर्णोके सुनिश्चित सिद्धान्त भी सुने हैं, परंतु जो भविष्य और वर्तमान दोनोंपर दृष्टि रखता है, वही यथार्थदर्शी है
Aku telah mendengar dharma para raja dan ketetapan yang mapan mengenai tatanan varṇa. Namun hanya dia yang sungguh melihat, yang memandang sekaligus pada masa depan dan pada saat ini—pada yang akan datang dan yang sedang di hadapan.
Verse 3
धर्मस्य जानमानो<हं गतिमग्रयां सुदुर्विदाम् । कथं बलात् करिष्यामि मेरोरिव विमर्दनम्,“धर्मकी श्रेष्ठ गति अत्यन्त दुर्बोध है, उसे जानता हुआ भी मैं कैसे बलपूर्वक मेरु पर्वतके समान महान् उस धर्मका मर्दन करूँगा”
Walau aku mengetahui bahwa jalan tertinggi Dharma amat sukar dipahami, bagaimana mungkin aku dengan paksaan hendak menghancurkan Dharma itu—seperti mencoba menggiling Gunung Meru sendiri?
Verse 4
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा विनिश्चित्येतिकृत्यताम् । भीमसेनमिदं वाक्यमपदान्तरमब्रवीत्,इस प्रकार दो घड़ीतक विचार करनेके पश्चात् अपनेको क्या करना है, इसका निश्चय करके युधिष्ठिरने भीमसेनसे अविलम्ब यह बात कही
Setelah merenung sejenak dan menetapkan dengan pasti apa yang harus dilakukan, Yudhiṣṭhira segera menyampaikan kata-kata ini kepada Bhīmasena—tanpa menunda dan tanpa menyimpang ke hal lain.
Verse 5
युधिछिर उवाच एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत । इदमन्यत् समादत्स्व वाच्यं मे वाक्यकोविद,युधिष्ठिर बोले--महाबाहु भरतकुलतिलक वाक्यविशारद भीम! तुम जैसा कह रहे हो, वह ठीक है, तथापि मेरी यह दूसरी बात भी मानो
Yudhiṣṭhira berkata: “Benar demikian, wahai yang berlengan perkasa, keturunan Bharata—sebagaimana engkau katakan. Namun terimalah pula satu hal lain dariku, wahai Bhīma yang mahir bertutur; inilah yang harus kukatakan.”
Verse 6
महापापानि कर्माणि यानि केवलसाहसात् । आरभ्यन्ते भीमसेन व्यथन्ते तानि भारत,भरतनन्दन भीमसेन! जो महान् पापमय कर्म केवल साहसके भरोसे आरम्भ किये जाते हैं, वे सभी कष्टदायक होते हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Bhīmasena, keturunan Bharata, perbuatan yang sangat berdosa—bila dimulai hanya dengan mengandalkan nekat semata—pasti berujung pada derita.”
Verse 7
सुमन्त्रिते सुविक्रान्ते सुकृते सुविचारिते । सिध्यन्त्यर्था महाबाहो दैवं चात्र प्रदक्षिणम्,महाबाहो! अच्छी तरहसे सलाह और विचार करके पूरा पराक्रम प्रकट करते हुए सुन्दररूपसे जो कार्य किये जाते हैं, वे सफल होते हैं और उसमें दैव भी अनुकूल हो जाता है
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang berlengan perkasa, bila suatu usaha diputuskan dengan nasihat yang baik, dijalankan dengan keberanian, dikerjakan dengan benar, dan dipertimbangkan dengan saksama, tujuannya tercapai; bahkan takdir pun menjadi berpihak.”
Verse 8
यत् तु केवलचापल्याद् बलदर्पोत्थित: स्वयम् । आरब्धव्यमिदं कार्य मन्यसे शृणु तत्र मे,तुम स्वयं बलके घमण्डसे उन्मत्त हो जो केवल चपलतावश स्वयं इस युद्धरूपी कार्यको अभी आरम्भ करनेके योग्य मान रहे हो, उसके विषयमें मेरी बात सुनो
Namun jika semata karena ketergesa-gesaan—pikiranmu digerakkan oleh kesombongan atas kekuatan—engkau sendiri mengira bahwa tugas ini, perang ini, harus segera dimulai, maka dengarkanlah apa yang hendak kukatakan tentangnya.
Verse 9
भूरिश्रवा: शलश्वैव जलसंधश्च वीर्यवान् | भीष्मो द्रोणश्व कर्णश्न द्रोणपुत्रश्न वीर्यवान्,भूरिश्रवा, शल, पराक्रमी जलसंध, भीष्म, द्रोण, कर्ण, बलवान् अश्व॒त्थामा तथा सदाके आततायी दुर्योधन आदि दुर्धर्ष धृतराष्ट्रपत्न--ये सभी अस्त्र-विद्याके ज्ञाता हैं एवं हमने जिन राजाओं तथा भूमिपालोंको युद्धमें कष्ट पहुँचाया है, वे सभी कौरवपक्षमें मिल गये हैं और उधर ही उनका स्नेह हो गया है
Yudhiṣṭhira berkata: “Bhūriśravas, Śala, dan Jalasaṃdha yang gagah; Bhīṣma, Droṇa, Karṇa, serta putra Droṇa, Aśvatthāmā—mereka semua adalah kesatria yang sukar ditandingi, mahir dalam ilmu senjata dan perang. Lagi pula, para raja dan penguasa yang dahulu pernah kita sakiti dalam pertempuran kini telah bergabung ke pihak Kaurava; kasih dan keberpihakan mereka beralih kepada Duryodhana, sehingga kubu itu kian sulit ditaklukkan.”
Verse 10
धार्तराष्ट्रा दुराधर्षा दुर्योधनपुरोगमा: । सर्व एव कृतास्त्राश्न सततं चाततायिन:,भूरिश्रवा, शल, पराक्रमी जलसंध, भीष्म, द्रोण, कर्ण, बलवान् अश्व॒त्थामा तथा सदाके आततायी दुर्योधन आदि दुर्धर्ष धृतराष्ट्रपत्न--ये सभी अस्त्र-विद्याके ज्ञाता हैं एवं हमने जिन राजाओं तथा भूमिपालोंको युद्धमें कष्ट पहुँचाया है, वे सभी कौरवपक्षमें मिल गये हैं और उधर ही उनका स्नेह हो गया है
Yudhiṣṭhira berkata: “Putra-putra Dhṛtarāṣṭra, dengan Duryodhana sebagai pemimpin, sukar diserang. Mereka semua terlatih dalam ilmu senjata dan senantiasa condong pada penyerbuan. Bhūriśravas, Śala, Jalasandha yang gagah, Bhīṣma, Droṇa, Karṇa, dan Aśvatthāmā yang perkasa—bersama Duryodhana dan yang lain—adalah penyerang yang terus-menerus dan amat menggentarkan. Lagi pula, para raja dan penguasa negeri yang dahulu pernah kita susahkan dalam perang kini telah berpihak kepada Kaurava; kasih dan kesetiaan mereka pun beralih ke sana.”
Verse 11
राजान: पार्थिवाश्वैव येडस्माभिरुपतापिता: । संश्रिता: कौरवं पक्ष जातस्नेहाश्न तं प्रति,भूरिश्रवा, शल, पराक्रमी जलसंध, भीष्म, द्रोण, कर्ण, बलवान् अश्व॒त्थामा तथा सदाके आततायी दुर्योधन आदि दुर्धर्ष धृतराष्ट्रपत्न--ये सभी अस्त्र-विद्याके ज्ञाता हैं एवं हमने जिन राजाओं तथा भूमिपालोंको युद्धमें कष्ट पहुँचाया है, वे सभी कौरवपक्षमें मिल गये हैं और उधर ही उनका स्नेह हो गया है
Yudhiṣṭhira berkata: “Para raja dan penguasa yang dahulu kita sakiti dan kita ganggu kini berlindung di pihak Kaurava; kasih mereka pun beralih kepada mereka. Bersama mereka berdiri para kesatria yang menggentarkan—Bhūriśravas, Śala, Jalasandha yang gagah, Bhīṣma, Droṇa, Karṇa, dan Aśvatthāmā yang perkasa—dan juga Duryodhana serta para penyerbu lain yang sukar ditaklukkan, beserta putra-putra Dhṛtarāṣṭra. Mereka semua adalah ahli ilmu senjata. Sungguh, para raja dan pelindung bumi yang pernah kita buat menderita dalam perang kini semuanya bergabung dengan faksi Kaurava, dan kesetiaan mereka menetap di sana.”
Verse 12
दुर्योधनहिते युक्ता न तथास्मासु भारत । पूर्णकोशा बलोपेता: प्रयतिष्यन्ति संगरे,भारत! वे दुर्योधनके हितमें ही संलग्न होंगे; हमलोगोंके प्रति उनका वैसा सद्धाव नहीं हो सकता। उनका खजाना भरा-पूरा है और वे सैनिक-शक्तिसे भी सम्पन्न हैं, अतः वे युद्ध छिड़नेपर हमारे विरुद्ध ही प्रयत्न करेंगे
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Bhārata, mereka berpaut pada kepentingan Duryodhana, bukan kepada kita dengan niat baik yang sama. Perbendaharaan mereka penuh dan mereka ditopang kekuatan bala; maka ketika perang pecah, mereka akan berusaha melawan kita.”
Verse 13
सर्वे कौरवसैन्यस्य सपुत्रामात्यसैनिका: । संविभक्ता हि मात्राभिभोगिरपि च सर्वश:,मन्त्रियों और पुत्रोंके सहित कौरवसेनाके सभी सैनिकोंको दुर्योधनकी ओरसे पूरे वेतन और सब प्रकारकी उपभोग-सामग्रीका वितरण किया गया है
Yudhiṣṭhira berkata: “Seluruh prajurit pasukan Kaurava—bersama para putra raja dan para menteri—telah dipenuhi haknya. Dari pihak Duryodhana, upah penuh serta segala macam perbekalan dan kenikmatan telah dibagikan menurut ukuran yang semestinya.”
Verse 14
दुर्योधनेन ते वीरा मानिताश्व विशेषतः । प्राणांस्त्यक्ष्यन्ति संग्रामे इति मे निश्चिता मति:ः,इतना ही नहीं, दुर्योधनने उन वीरोंका विशेष आदर-सत्कार भी किया है। अतः मेरा यह विश्वास है कि वे उसके लिये संग्राममें (हँसते-हँसते) प्राण दे देंगे
Yudhiṣṭhira berkata: “Para pahlawan itu telah dihormati dan dimuliakan secara khusus oleh Duryodhana. Karena itu aku yakin sepenuhnya: demi dirinya, mereka akan menyerahkan nyawa mereka di medan laga.”
Verse 15
समा यद्यपि भीष्मस्य वृत्तिरस्मासु तेषु च द्रोणस्प च महाबाहो कृपस्य च महात्मन:,महाबाहो! यद्यपि पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण तथा महामना कृपाचार्यका आन्तरिक स्नेह धृतराष्ट्रके पुत्रों तथा हमलोगोंपर एक-सा ही है, तथापि वे राजा दुर्योधनका दिया हुआ अन्न खाते हैं, अतः उसका ऋण अवश्य चुकायेंगे, ऐसा मुझे प्रतीत होता है। युद्ध छिड़नेपर वे भी दुर्योधनके पक्षसे ही लड़कर अपने दुस्त्यज प्राणोंका भी परित्याग कर देंगे
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang berlengan perkasa, meskipun sikap Bhīṣma terhadap kami dan terhadap mereka sama—demikian pula Droṇa dan Kṛpa yang berhati luhur—namun mereka hidup dari santapan yang dianugerahkan Raja Duryodhana. Karena itu, menurutku mereka pasti akan membayar hutang budi itu. Ketika perang meletus, mereka akan bertempur di pihak Duryodhana dan, terikat oleh kewajiban itu, bahkan akan melepaskan nyawa yang begitu sukar ditinggalkan.”
Verse 16
अवश्यं राजपिण्डस्तैन्विंश्य इति मे मति: । तस्मात् त्यक्ष्यन्ति संग्रामे प्राणानपि सुदुस्त्यजान्,महाबाहो! यद्यपि पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण तथा महामना कृपाचार्यका आन्तरिक स्नेह धृतराष्ट्रके पुत्रों तथा हमलोगोंपर एक-सा ही है, तथापि वे राजा दुर्योधनका दिया हुआ अन्न खाते हैं, अतः उसका ऋण अवश्य चुकायेंगे, ऐसा मुझे प्रतीत होता है। युद्ध छिड़नेपर वे भी दुर्योधनके पक्षसे ही लड़कर अपने दुस्त्यज प्राणोंका भी परित्याग कर देंगे
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang berlengan perkasa, menurut keyakinanku, mereka yang hidup dari anugerah santapan sang raja pasti harus membalasnya. Karena itu, ketika pertempuran pecah, mereka akan melepaskan bahkan nyawa yang paling sukar diserahkan. Sebab meskipun Bhīṣma, Droṇa, dan Kṛpa yang mulia menyimpan kasih batin yang sama kepada putra-putra Dhṛtarāṣṭra maupun kepada kita, mereka tetap makan dari pemberian Raja Duryodhana; maka demi menunaikan hutang budi itu, mereka akan bertempur di pihak Duryodhana dan, bila perlu, menyerahkan hidup mereka.”
Verse 17
सर्वे दिव्यास्त्रविद्वांस: सर्वे धर्मपरायणा: । अजेयाश्रैति मे बुद्धिरपि देवैः सवासवै:,वे सब-के-सब दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता और धर्मपरायण हैं। मेरी बुद्धिमें तो यहाँतक आता है कि इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता भी उन्हें परास्त नहीं कर सकते
Yudhiṣṭhira berkata: “Mereka semua adalah ahli senjata-senjata surgawi, dan semuanya teguh berpegang pada dharma. Pemahamanku sampai pada kesimpulan bahwa mereka tak terkalahkan—bahkan oleh para dewa, Indra sekalipun.”
Verse 18
अमर्षी नित्यसंरब्धस्तत्र कर्णो महारथ: । सर्वस्त्रिविदनाधृष्यो हाुभेद्यकवचावृत:,उस पक्षमें महारथी कर्ण भी है, जो हमारे प्रति सदा अमर्ष और क्रोधसे भरा रहता है। वह सब अस्त्रोंका ज्ञाता, अजेय तथा अभेद्य कवचसे सुरक्षित है
Yudhiṣṭhira berkata: “Di pihak itu berdiri pula Karṇa, sang kesatria kereta agung—selalu menyimpan dendam dan senantiasa menyala oleh amarah terhadap kita. Ia mengetahui setiap senjata, tak tersentuh dalam pertempuran, dan terlindungi oleh baju zirah yang tak tertembus.”
Verse 19
अनिर्जित्य रणे सवनितान् पुरुषसत्तमान् । अशक्यो हासहायेन हन्तुं दुर्योधनस्त्वया,इन समस्त वीर पुरुषोंको युद्धमें परास्त किये बिना तुम अकेले दुर्योधनको नहीं मार सकते
Yudhiṣṭhira berkata: “Tanpa terlebih dahulu menaklukkan di medan perang para kesatria utama itu beserta bala tentaranya, engkau—seorang diri dan tanpa sekutu—tak mungkin membunuh Duryodhana.”
Verse 20
न निद्रामधिगच्छामि चिन्तयानो वृकोदर । अतिसर्वान् धनुग्राहान् सूतपुत्रस्य लाघवम्,वृकोदर! सूतपुत्र कर्णके हाथोंकी फुर्ती समस्त धनुर्धरोंसे बढ़-चढ़कर है। उसका स्मरण करके मुझे अच्छी तरह नींद नहीं आती है
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Vṛkodara, aku tak dapat meraih tidur; pikiranku terus memutar kelincahan putra Sūta itu. Kecekatan Karṇa melampaui semua pemanah; mengingat kegesitannya, istirahat pun tak datang kepadaku.”
Verse 21
वैशम्पायन उवाच एतद् वचनमाज्ञाय भीमसेनो>त्यमर्षण: । बभूव विमनास्त्रस्तो न चैवोवाच किंचन,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! युधिष्ठदिरका यह वचन सुनकर अत्यन्त क्रोधी भीमसेन उदास और शंकायुक्त हो गये। फिर उनके मुँहसे कोई बात नहीं निकली
Vaiśampāyana berkata: Setelah memahami kata-kata itu, Bhīmasena—yang tak tahan penghinaan—menjadi murung dan diliputi kecemasan; batinnya terguncang, dan ia sama sekali tidak berkata apa-apa.
Verse 22
तयो: संवदतोरेव॑ तदा पाण्डवर्योर्द्वयो: । आजगाम महायोगी व्यास: सत्यवतीसुत:,दोनों पाण्डवोंमें इस प्रकार बातचीत हो ही रही थी कि महायोगी सत्यवतीनन्दन व्यास वहाँ आ पहुँचे
Ketika dua Pāṇḍava terkemuka itu masih bercakap-cakap, datanglah Mahāyogin Vyāsa, putra Satyavatī, ke tempat itu.
Verse 23
सो$5भिगम्य यथान्यायं पाण्डवै: प्रतिपूजित: । युधिष्ठटिरमिदं वाक्यमुवाच वदतां वर:,पाण्डवोंने उठकर उनकी अगवानी की और यथायोग्य पूजन किया। तत्पश्चात् वक्ताओंमें श्रेष्ठ व्यासजी युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले--
Setelah mendekat dengan semestinya, ia disambut dan dihormati oleh para Pāṇḍava sesuai tata. Lalu Vyāsa—yang utama di antara para penutur—berkata demikian kepada Yudhiṣṭhira.
Verse 24
व्यास उवाच युधिष्ठिर महाबाहो वेझि ते हृदयस्थितम् । मनीषया ततः क्षिप्रमागतो5स्मि नरर्षभ,व्यासजीने कहा--नरश्रेष्ठ महाबाहु युधिष्छिर! मैं ध्यानके द्वारा तुम्हारे मनका भाव जान चुका हूँ। इसलिये शीघ्रतापूर्वक यहाँ आया हूँ
Vyāsa berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira yang berlengan perkasa, wahai insan utama, aku mengetahui apa yang menetap di hatimu. Dengan daya wawasanku aku memahaminya; sebab itu aku datang kemari dengan segera.”
Verse 25
भीष्माद् द्रोणात् कृपात् कर्णाद द्रोणपुत्राच्च भारत । दुर्योधनान्नपसुतात् तथा दुःशासनादपि,शत्रुहन्ता भारत! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन और दुःशासनसे भी जो तुम्हारे मनमें भय समा गया है, उसे मैं शास्त्रीय उपायसे नष्ट कर दूँगा
Vyāsa berkata: “Wahai Bhārata, rasa takut yang telah memasuki benakmu—terhadap Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, Karṇa, putra Droṇa (Aśvatthāmā), juga putra Dhṛtarāṣṭra, Duryodhana, serta Duḥśāsana—akan kuhapus dengan upaya yang disahkan oleh śāstra.”
Verse 26
यत् ते भयममित्रघ्न हृदि सम्परिवर्तते । तत् ते5हं नाशयिष्यामि विधिदृष्टेन कर्मणा,शत्रुहन्ता भारत! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन और दुःशासनसे भी जो तुम्हारे मनमें भय समा गया है, उसे मैं शास्त्रीय उपायसे नष्ट कर दूँगा
Wahai penumpas musuh, apa pun rasa takut yang berputar dalam hatimu, akan kuhancurkan bagimu melalui tindakan yang ditetapkan oleh aturan suci.
Verse 27
तच्छुत्वा धृतिमास्थाय कर्मणा प्रतिपादय । प्रतिपाद्य तु राजेन्द्र ततः क्षिप्रं ज्वरं जहि,राजेन्द्र! उस उपायको सुनकर धैर्यपूर्वक प्रयत्नद्वारा उसका अनुष्ठान करो। उसका अनुष्ठान करके शीघ्र ही अपनी मानसिक चिन्ताका परित्याग कर दो
Wahai raja terbaik, setelah mendengar nasihat itu, teguhkan dirimu dengan ketabahan dan laksanakan dengan tindakan yang sungguh-sungguh. Setelah selesai, segeralah menanggalkan demam kegelisahan dari batinmu.
Verse 28
तत एकान्तमुन्नीय पाराशर्यों युधिष्ठिरम् । अब्रवीदुपपन्नार्थमिदं वाक्यविशारद:,तदनन्तर प्रवचनकुशल पराशरनन्दन व्यासजी युधिष्ठिरको एकान्तमें ले गये और उनसे यह युक्तियुक्त वचन बोले--
Kemudian Pārāśarya (Vyāsa) membawa Yudhiṣṭhira ke tempat yang sunyi; sang resi yang mahir bertutur itu menyampaikan kata-kata yang tepat dan bernalar.
Verse 29
श्रेयसस्ते पर: काल: प्राप्तो भरतसत्तम । येनाभिभविता शत्रून् रणे पार्थो धनुर्धर:,“भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे कल्याणका सर्वश्रेष्ठ समय आया है, जिससे धनुर्धर अर्जुन युद्धमें शत्रुओंको पराजित कर देंगे
Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, saat tertinggi bagi kesejahteraanmu telah tiba; dengannya sang pemanah Pārtha (Arjuna) akan menundukkan musuh-musuh di medan perang.
Verse 30
गृहाणेमां मया प्रोक्तां सिद्धि मूर्तिमतीमिव । विद्यां प्रतिस्मृतिं नाम प्रपन्नाय ब्रवीमि ते,“मेरी दी हुई इस प्रतिस्मृति नामक विद्याको ग्रहण करो, जो मूर्तिमती सिद्धिके समान है। तुम मेरे शरणागत हो, इसलिये मैं तुम्हें इस विद्याका उपदेश करता हूँ
Terimalah pengetahuan yang telah kuajarkan ini—bernama Pratismṛti—laksana siddhi yang berwujud nyata. Karena engkau datang berlindung kepadaku, maka ajaran ini kusampaikan kepadamu.
Verse 31
यामवाप्य महाबाहुरर्जुन: साधयिष्यति । अस्त्रहेतोरममहिन्द्रं च रुद्रे चैवाभिगच्छतु,“जिसे तुमसे पाकर महाबाहु अर्जुन अपना सब कार्य सिद्ध करेंगे। पाण्डुनन्दन! ये अर्जुन दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिके लिये देवराज इन्द्र, रुद्र, वरुण, कुबेर तथा धर्मराजके पास जायँँ। ये अपनी तपस्या और पराक्रमसे देवताओंको प्रत्यक्ष देखनेमें समर्थ होंगे
Setelah memperoleh itu, Arjuna yang berlengan perkasa akan menuntaskan segala tujuannya. Demi mendapatkan senjata-senjata ilahi, hendaklah ia mendatangi tuanku yang agung, Indra, dan juga Rudra.
Verse 32
वरुणं च कुबेरं च धर्मराजं च पाण्डव । शक्तो होष सुरान् द्रष्टं तपसा विक्रमेण च,“जिसे तुमसे पाकर महाबाहु अर्जुन अपना सब कार्य सिद्ध करेंगे। पाण्डुनन्दन! ये अर्जुन दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिके लिये देवराज इन्द्र, रुद्र, वरुण, कुबेर तथा धर्मराजके पास जायँँ। ये अपनी तपस्या और पराक्रमसे देवताओंको प्रत्यक्ष देखनेमें समर्थ होंगे
Wahai Pāṇḍava, dengan kekuatan tapa dan keberanianmu engkau akan sanggup menyaksikan para dewa—Varuṇa, Kubera, dan Dharmarāja—secara langsung.
Verse 33
ऋषिरेष महातेजा नारायणसहायवान् । पुराण: शाश्वतो देवस्त्वजेयो जिष्णुरच्युत:,“भगवान् नारायण जिनके सखा हैं, वे पुरातन महर्षि महातेजस्वी नर ही अर्जुन हैं। सनातन देव, अजेय, विजयशील तथा अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले हैं। महाबाहु अर्जुन इन्द्र, रुद्र तथा अन्य लोकपालोंसे दिव्यास्त्र प्राप्त करके महान् कार्य करेंगे
Sang resi yang bercahaya agung ini memiliki Nārāyaṇa sebagai sekutu. Ia purba dan kekal, laksana dewa—tak terkalahkan, senantiasa berjaya, dan tak pernah menyimpang dari batas dharmanya.
Verse 34
अस्त्राणीन्द्राच्च रुद्राच्च लोकपालेभ्य एव च | समादाय महाबाहुर्महत् कर्म करिष्यति,“भगवान् नारायण जिनके सखा हैं, वे पुरातन महर्षि महातेजस्वी नर ही अर्जुन हैं। सनातन देव, अजेय, विजयशील तथा अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले हैं। महाबाहु अर्जुन इन्द्र, रुद्र तथा अन्य लोकपालोंसे दिव्यास्त्र प्राप्त करके महान् कार्य करेंगे
Arjuna yang berlengan perkasa akan menghimpun senjata-senjata dari Indra, dari Rudra, dan dari para penjaga dunia lainnya, lalu menunaikan suatu karya besar.
Verse 35
वनादस्माच्च कौन्तेय वनमन्यद् विचिन्त्यताम् । निवासार्थाय यत् युक्त भवेद् व: पृथिवीपते,“कुन्तीकुमार! पृथिवीपते! अब तुम अपने निवासके लिये इस वनसे किसी दूसरे वनमें, जो तुम्हारे लिये उपयोगी हो, जानेकी बात सोचो
Vyāsa berkata: “Wahai putra Kuntī, wahai penguasa bumi! Kini pertimbangkanlah untuk meninggalkan hutan ini dan mencari hutan lain yang layak bagi tempat tinggalmu. Pilihlah tempat yang sungguh memenuhi kebutuhanmu, agar masa pembuanganmu berjalan dengan aman, terkendali, dan teguh.”
Verse 36
एकत्र चिरवासो हि न प्रीतिजननो भवेत् । तापसानां च सर्वेषां भवेदुद्वेशकारक:,“एक ही स्थानपर अधिक दिनोंतक रहना प्राय: रुचिकर नहीं होता। इसके सिवा, यहाँ तुम्हारा चिरनिवास समस्त तपस्वी महात्माओंके लिये तपमें विघ्न पड़नेके कारण उद्वेगकारक होगा इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि काम्यकवनगमने षट्त्रिंशो5ध्याय:
Vyāsa berkata: “Tinggal terlalu lama di satu tempat jarang menjadi sumber kegembiraan yang berkelanjutan. Lagi pula, keberadaanmu yang berkepanjangan di sini akan mengusik para pertapa, sebab dapat menghalangi tapa-brata mereka.”
Verse 37
मृगाणामुपयोगश्व वीरुदौषधिसंक्षय: । बिभर्षि च बहून् विप्रान् वेदवेदाड्गपारगान्,'यहाँके हिंसक पशुओंके उपयोग--मारनेका काम हो चुका है तथा तुम बहुत-से वेद- वेदांगोंके पारगामी विद्वान् ब्राह्गोंका भरण-पोषण करते हो (और हवन करते हो), इसलिये यहाँ लता-गुल्म और ओषधियोंका क्षय हो गया है”
Vyāsa berkata: “Di sini pemanfaatan satwa liar telah banyak terjadi (mereka diburu untuk keperluan), dan engkau menanggung banyak Brahmana terpelajar yang menguasai Weda serta Wedāṅga, sambil menyelenggarakan upacara korban. Karena itu, sulur, semak, dan tumbuhan obat di wilayah ini telah menyusut.”
Verse 38
वैशम्पायन उवाच एवमुकक््त्वा प्रपन्नाय शुचये भगवान् प्रभु: । प्रोवाच लोकतत्त्वज्ञो योगी विद्यामनुत्तमाम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर लोकतत्त्वके ज्ञाता एवं शक्तिशाली योगी परम बुद्धिमान् सत्यवतीनन्दन भगवान् व्यासजीने अपनी शरणमें आये हुए पवित्र धर्मराज युधिष्ठिरको उस अत्युत्तम विद्याका उपदेश किया और कुन्तीकुमारकी अनुमति लेकर फिर वहीं अन्तर्धान हो गये
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya! Setelah berkata demikian, Bhagavān Vyāsa—sang yogin perkasa yang memahami hakikat dunia—memberi ajaran pengetahuan yang tiada banding kepada Yudhiṣṭhira yang suci, yang telah berlindung kepadanya.”
Verse 39
धर्मराजाय धीमान् स व्यास: सत्यवतीसुतः । अनुज्ञाय च कौन्तेयं तत्रैवान्तरधीयत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर लोकतत्त्वके ज्ञाता एवं शक्तिशाली योगी परम बुद्धिमान् सत्यवतीनन्दन भगवान् व्यासजीने अपनी शरणमें आये हुए पवित्र धर्मराज युधिष्ठिरको उस अत्युत्तम विद्याका उपदेश किया और कुन्तीकुमारकी अनुमति लेकर फिर वहीं अन्तर्धान हो गये
Vaiśampāyana berkata: “Vyāsa yang bijaksana, putra Satyavatī, setelah menasihati Dharma-rāja Yudhiṣṭhira dan berpamitan dengan persetujuan putra Kuntī, lenyap dari tempat itu juga.”
Verse 40
युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा तद् ब्रह्म मनसा यत: । धारयामास मेधावी काले काले सदाभ्यसन्,धर्मात्मा मेधावी संयतचित्त युधिष्ठिरने उस वेदोक्त मन्त्रको ममससे धारण किया और समय-समयपर सदा उसका अभ्यास करने लगे
Yudhiṣṭhira yang teguh dalam dharma mengekang dan mengarahkan batinnya, lalu menyimpan mantra suci Weda itu di dalam diri. Bijaksana dan berpengendalian diri, ia mengulanginya terus-menerus pada waktu-waktu yang semestinya.
Verse 41
स व्यासवाक्यमुदितो वनाद् द्वैतवनात् ततः । ययौ सरस्वतीकूले काम्यक॑ं नाम काननम्,तदनन्तर वे व्यासजीकी आज्ञासे प्रसन्नतापूर्वक द्वैतववनसे काम्यकवनमें चले गये, जो सरस्वतीके तटपर सुशोभित है
Gembira oleh kata-kata Vyāsa, ia pun meninggalkan hutan Dvaitavana dan pergi ke rimba bernama Kāmyaka di tepi Sungai Sarasvatī.
Verse 42
तमन्वयुर्महाराज शिक्षाक्षरविशारदा: । ब्राह्मणास्तपसा युक्ता देवेन्द्रमूषणो यथा,महाराज! जैसे महर्षिगण देवराज इन्द्रका अनुसरण करते हैं, वैसे ही वेदादि शास्त्रोंकी शिक्षा तथा अक्षर ब्रह्मतत्त्वके ज्ञानमें निपुण बहुत-से तपस्वी ब्राह्मण राजा युधिष्ठिरके साथ उस वनमें गये
Wahai Raja agung, banyak Brahmana—teguh dalam tapa, mahir dalam ajaran Śikṣā dan ilmu aksara—mengiringinya, sebagaimana para ṛṣi dahulu mengikuti Devendra (Indra).
Verse 43
ततः काम्यकमासाद्य पुनस्ते भरतर्षभ । न्यविशन्त महात्मान: सामात्या: सपरिच्छदा:,भरतश्रेष्ठ) वहाँसे काम्यकवनमें आकर मन्त्रियों और सेवकोंसहित वे महात्मा पाण्डव पुनः वहीं बस गये
Kemudian, wahai yang terbaik di antara Bharata, setelah mencapai hutan Kāmyaka, para insan agung itu menetap kembali di sana—bersama para menteri, para pelayan, dan segala perlengkapan yang diperlukan.
Verse 44
तत्र ते न्यवसन् राजन् किंचित् कालं मनस्विनः । धनुर्वेदपरा वीरा: शृण्वन्तो वेदमुत्तमम्,राजन! वहाँ धनुर्वेदके अभ्यासमें तत्पर हो उत्तम वेदमन्त्रोंका उद्घोष सुनते हुए उन मनस्वी पाण्डवोंने कुछ कालतक निवास किया
Wahai Raja, di sana para pahlawan berhati teguh itu tinggal untuk beberapa waktu—tekun dalam latihan Dhanurveda dan menyimak lantunan kidung-kidung Weda yang luhur.
Verse 45
चरन्तो मृगयां नित्यं शुद्धैर्बाणै्मगार्थिन: । पितृदैवतविप्रेभ्यो निर्वपन्तो यथाविधि,वे प्रतेदिन हिंसक पशुओंको मारनेके लिये शुद्ध (शास्त्रानुकूल) बाणोंद्वारा शिकार खेलते थे एवं शास्त्रकी विधिके अनुसार नित्य पितरों तथा देवताओंको अपना-अपना भाग देते थे अर्थात् नित्य श्राद्ध और नित्य होम करते थे
Mereka setiap hari menekuni perburuan, mencari buruan dengan anak panah yang murni—yakni yang disahkan oleh śāstra. Dan sesuai tata upacara yang ditetapkan, mereka dengan teratur mempersembahkan bagian yang semestinya kepada para Pitṛ, para dewa, dan para brāhmaṇa—demikianlah mereka tetap menjalankan śrāddha harian dan homa harian meski hidupnya melibatkan kekerasan terhadap hewan.
The dilemma is whether restraint and delay remain ethical when they enable ongoing injustice—Bhīma frames prolonged passivity as complicity with loss of rightful order and as a failure of kṣatriya responsibility.
Time is not merely a backdrop but an active force that diminishes life and options; therefore, ethical action must be timely, reality-based (pratyakṣa), and proportionate to persistent threats.
No explicit phalaśruti is presented here; the chapter functions as pragmatic-ethical counsel within the exile narrative, emphasizing interpretive themes (kāla, duty, risk) rather than promising ritual or recitational benefits.