
Yudhiṣṭhira’s Reproof and Vow-Logic: On Dice-Deception, Exile Terms, and the Governance of Anger (Adhyāya 35)
Upa-parva: Forest-Exile Ethical Discourse (Yudhiṣṭhira–Bhīmasena Saṃvāda within Āraṇyaka-parva)
This chapter presents Yudhiṣṭhira’s measured address to Bhīmasena in the aftermath of the dice-game catastrophe. He acknowledges Bhīma’s harsh words as factually grounded and does not censure him for speaking against the injustice, yet he clarifies causal responsibility: Yudhiṣṭhira himself pursued the dice match while seeking to recover the kingdom, and Śakuni—described as expert in deception—engineered the loss through manipulation. Yudhiṣṭhira then moves from attribution to governance: even if one recognizes the opponent’s rigging, anger can destroy a person’s steadiness, and the self is not easily restrained by valor alone once bound by pride and fury. He recalls the public stipulations imposed by Dhṛtarāṣṭra’s son: twelve years of forest dwelling followed by an additional year of concealed living; discovery would reset the term. The discourse shifts into a doctrine of timing (kāla): immediate retaliation is declared infeasible because a vow was made in the Kuru assembly; instead, Bhīma is urged to wait for the ‘ripening’ of outcomes like seed to fruit. Yudhiṣṭhira concludes by elevating satya and dharma above life, wealth, and sovereignty, asserting that truth is the metric by which all other goods are diminished, thereby grounding political recovery in moral credibility rather than impulse.
Chapter Arc: वन के निर्वासन में धैर्य धारण किए युधिष्ठिर को भीमसेन झकझोरता है—‘काल के बंधन में बँधे नश्वर शरीर के लिए कब तक प्रतीक्षा?’ → भीम समय की क्षणभंगुरता का बिंब रचता है—फेन-धर्मा, फल-धर्मा जीवन; निमेष-निमेष आयु का क्षय; मृत्यु शरीर में ही निवास करती है। वह तर्क देता है कि विलंब स्वयं पराजय है और वैर को ‘अयातयित्वा’ छोड़ देना राजधर्म का भार बन जाता है। साथ ही वह अज्ञातवास की व्यावहारिक असंभवता उठाता है—द्रौपदी, भीम, नकुल-सहदेव जैसे विख्यात जन कैसे छिपेंगे? → भीम का निर्णायक आह्वान: ‘मृत्यु तो निश्चित है, इसलिए राज्य और न्याय के लिए अभी उद्योग करो’—और अज्ञातचर्या को ‘मेरु को छिपाने’ जैसी असंभव उपमा देकर युधिष्ठिर की नीति (संधि/प्रतीक्षा/गोपन) पर सीधा प्रहार। → अध्याय का अंत भीम के तर्क-प्रहार के साथ ठहरता है—वह युधिष्ठिर को क्षात्र-कर्तव्य, प्रतिशोध-न्याय और समयोचित कर्म की ओर मोड़ने का प्रयास करता है; निर्णय का भार युधिष्ठिर के विवेक पर छोड़ दिया जाता है। → क्या युधिष्ठिर भीम के उग्र क्षात्र-तर्क को स्वीकार कर तत्काल कर्म (युद्ध/उद्योग) की ओर बढ़ेंगे, या धैर्य, संधि और नियत-काल की नीति पर अडिग रहेंगे?
Verse 1
अप. ऋा- [हुक है आम पजञ्चत्रिशोड्ध्याय: दुःखित भीमसेनका युधिष्ठिरको युद्धके लिये उत्साहित करना भीमसेन उवाच संधि कृत्वैव कालेन ह्ुन्तकेन पतत्त्रिणा । अनन्तेनाप्रमेयेण स्रोतसा सर्वहारिणा,भीमसेन बोले--महाराज! आप फेनके समान नश्वर, फलके समान पतनशील तथा कालके बन्धनमें बँधे हुए मरणधर्मा मनुष्य हैं तो भी आपने सबका अन्त और संहार करनेवाले, बाणके समान वेगवान, अनन्त, अप्रमेय एवं जलस्रोतके समान प्रवाहशील लंबे कालको बीचमें देकर दुर्योधनके साथ सन्धि करके उस कालको अपनी आँखोंके सामने आया हुआ मानते हैं
Bhīmasena berkata: “Wahai Raja, engkau seakan membuat perjanjian dengan Kala—Waktu itu sendiri: laksana burung yang terus terbang, cepat dan tak terbendung; tiada berujung, tak terukur; dan seperti arus sungai yang menyapu serta merenggut segala sesuatu. Namun engkau memperlakukan Kala seolah sudah hadir di depan mata, dan atas anggapan itulah engkau memilih berdamai dengan Duryodhana.”
Verse 2
प्रत्यक्ष मन्यसे काल॑ मर्त्य: सन् कालबन्धन: । फेनधर्मा महाराज फलधर्मा तथैव च,भीमसेन बोले--महाराज! आप फेनके समान नश्वर, फलके समान पतनशील तथा कालके बन्धनमें बँधे हुए मरणधर्मा मनुष्य हैं तो भी आपने सबका अन्त और संहार करनेवाले, बाणके समान वेगवान, अनन्त, अप्रमेय एवं जलस्रोतके समान प्रवाहशील लंबे कालको बीचमें देकर दुर्योधनके साथ सन्धि करके उस कालको अपनी आँखोंके सामने आया हुआ मानते हैं
Bhīmasena berkata: “Wahai Raja agung, engkau ini fana dan terikat oleh Kala—rapuh seperti buih dan pasti jatuh seperti buah; namun engkau memperlakukan Kala seakan-akan hadir nyata di depan mata.”
Verse 3
निमेषादपि कौन्तेय यस्यायुरपचीयते । सूच्येवाञ्जनचूर्णस्य किमिति प्रतिपालयेत्,किंतु कुन्तीकुमार! सलाईसे थोड़ा-थोड़ा करके उठाये जानेवाले अंजनचूर्ण (सुरमे)-की भाँति एक-एक निमेषमें जिसकी आयु क्षीण हो रही है, वह क्षणभंगुर मानव समयकी प्रतीक्षा क्या कर सकता है?
Wahai Kaurteya, bila usia seseorang menyusut pada tiap kedipan—seperti serbuk anjana yang terambil sedikit demi sedikit oleh ujung jarum—mengapa manusia yang serba sekejap itu masih menunggu-nunggu waktu?
Verse 4
यो नूनममितायु: स्वादथवापि प्रमाणवित् । स काल वै प्रतीक्षेत सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान्,अवश्य ही जिसकी आयुकी कोई माप नहीं है अथवा जो आयुकी निश्चित संख्याको जानता है तथा जिसने सब कुछ प्रत्यक्ष देख लिया है। वही समयकी प्रतीक्षा कर सकता है
Hanya orang yang benar-benar berusia tak terukur—atau yang mengetahui dengan pasti ukuran umur hidupnya—dan yang telah menyaksikan segala sesuatu secara langsung, barulah pantas menunggu ‘waktu yang tepat’.
Verse 5
प्रतीक्ष्म्माण: कालो न: समा राजंस्त्रयोदश | आयुषो<5पचयं कृत्वा मरणायोपनेष्यति,राजन! तेरह वर्षोतक हमें जिसकी प्रतीक्षा करनी है, वह काल हमारी आयुको क्षीण करके हम सबको मृत्युके निकट पहुँचा देगा
Wahai Raja, tiga belas tahun yang harus kita tunggu itu tidak akan berlalu tanpa akibat: Kala akan mengikis usia kita sedikit demi sedikit dan membawa kita semua semakin dekat kepada kematian.
Verse 6
शरीरिणां हि मरणं शरीरे नित्यमाश्रितम् । प्रागेव मरणात् तस्माद् राज्यायैव घटामहे,देहधारीकी मृत्यु सदा उसके शरीरमें ही निवास करती है, अतः मृत्युके पहले ही हमें राज्य-प्राप्तिके लिये चेष्टा करनी चाहिये
Bagi makhluk berjasad, maut senantiasa bersemayam di dalam tubuh itu sendiri; maka sebelum maut menimpa kita, kita harus berjuang—bahkan hanya berjuang—demi memperoleh kerajaan.
Verse 7
यो न याति प्रसंख्यानमस्पष्टो भूमिवर्धन: । अयातयित्वा वैराणि सोडवसीदति गौरिव,जिसका प्रभाव छिपा हुआ है, वह भूमिके लिये भाररूप ही है, क्योंकि वह जनसाधारणमें ख्याति नहीं प्राप्त कर सकता। वह वैरका प्रतिशोध न लेनेके कारण बैलकी भाँति दुःख उठाता रहता है
Orang yang kekuatannya tak tampak dan gagal meraih kemasyhuran di hadapan khalayak hanyalah beban bagi bumi; dan bila ia tidak menuntaskan permusuhan—tidak menagih pembalasan yang semestinya—ia merana dalam sengsara, laksana lembu yang dipaksa memikul kuk.
Verse 8
यो न यातयते वैरमल्पसत्त्वोद्यम: पुमान् | अफलं जन्म तस्याहं मन्ये दुर्जातजायिन:,जिसका बल और उद्यम बहुत कम है, जो वैरका बदला नहीं ले सकता, उस पुरुषका जन्म अत्यन्त घृणित है। मैं तो उसके जन्मको निष्फल मानता हूँ
Seorang lelaki yang lemah daya dan kecil upayanya, yang tak mampu membalas permusuhan—kelahirannya, menurutku, sia-sia; ia laksana orang yang terlahir hina.
Verse 9
हैरण्यौ भवतो बाहू श्रुतिर्भवति पार्थिवी । हत्वा द्विषन्तं संग्रामे भुडुक्ष्य बाहुजितं वसु,महाराज! आपकी दोनों भुजाएँ सुवर्णकी अधिकारिणी हैं। आपकी कीर्ति राजा पृथुके समान है। आप युद्धमें शत्रुका संहार करके अपने बाहुबलसे उपार्जित धनका उपभोग कीजिये
Wahai Maharaja, kedua lenganmu layak bagi emas—pantas meraih dan memanggul kemakmuran raja; kemasyhuranmu laksana Raja Pṛthu. Setelah menewaskan musuh yang memusuhi di medan laga, nikmatilah harta yang dimenangkan oleh kekuatan lenganmu sendiri.
Verse 10
हत्वा वै पुरुषो राजन् निकर्तारमरिंदम । अद्वाय नरकं गच्छेत् स्वर्गंणास्य स सम्मित:,शत्रुदमन नरेश! यदि मनुष्य अपनेको धोखा देनेवाले शत्रुका वध करके तुरंत ही नरकमें पड़ जाय तो उसके लिये वह नरक भी स्वर्गके तुल्य है
Wahai Raja, penakluk musuh—jika seseorang, setelah membunuh musuh licik yang hendak menjatuhkannya, seketika jatuh ke neraka, maka baginya neraka itu pun akan terhitung sebagai surga.
Verse 11
अमर्षसे जो संताप होता है, वह आगसे भी बढ़कर जलानेवाला है। जिससे संतप्त होकर मुझे न तो रातमें नींद आती है और न दिनमें
Bhimasena berkata: “Panas derita yang lahir dari amarah tersinggung lebih membakar daripada api. Disiksa olehnya, aku tak menemukan tidur di malam hari, dan tak pula ketenteraman di siang hari.”
Verse 12
अयं च पार्थो बीभत्सुर्वरिष्ठो ज्याविकर्षणे | आस्ते परमसंतप्तो नूनं सिंह इवाशये,ये हमारे भाई अर्जुन धनुषकी प्रत्यंचा खींचनेमें सबसे श्रेष्ठ हैं; परंतु ये भी निश्चय ही अपनी मगुफामें दुःखी होकर बैठे हुए सिंहकी भाँति सदा अत्यन्त संतप्त होते रहते हैं
Dan inilah Partha—Bibhatsu—yang paling unggul dalam menarik tali busur; namun ia duduk dalam duka yang dalam, laksana singa di sarangnya.
Verse 13
अमर्षजो हि संताप: पावकाद दीप्तिमत्तर: । येनाहमभिसंतप्तो न नक्त न दिवा शये,योडयमेको5भिमनुते सर्वान् लोके धनुर्भुतः । सो<यमात्मजमूष्माणं महाहस्तीव यच्छति जो अकेले ही संसारके समस्त धनुर्धर वीरोंका सामना कर सकते हैं, वे ही अर्जुन महान् गजराजकी भाँति अपने मानसिक क्रोधजनित संतापको किसी प्रकार रोक रहे हैं
Bhima berkata: “Derita membara yang lahir dari amarah tersinggung lebih menyala daripada api. Olehnya aku terbakar sehingga tak dapat tidur, baik malam maupun siang. Namun dia—yang seorang diri menganggap mampu menghadapi semua kesatria pemanah di dunia—Arjuna itu, laksana gajah perkasa, entah bagaimana menahan panas murka di dalam dirinya.”
Verse 14
नकुल: सहदेवश्व वृद्धा माता च वीरसू: । तवैव प्रियमिच्छन्त आसते जडमूकवत्,नकुल, सहदेव तथा वीरपुत्रोंको जन्म देनेवाली हमारी बूढ़ी माता कुन्ती--ये सब-के- सब आपका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर ही मूर्खों और गूँगोंकी भाँति चुप रहते हैं
Nakula, Sahadeva, dan ibu kita yang telah lanjut usia—sang ibu para pahlawan—semuanya diam laksana orang beku dan bisu, semata-mata karena ingin melakukan apa yang menyenangkan hatimu.
Verse 15
सर्वे ते प्रियमिच्छन्ति बान्धवा: सह सृञज्जयै: । अहमेकश्न् संतप्तो माता च प्रतिविन्ध्यत:,आपके सभी बन्धु-बान्धव और सूंजयवंशी योद्धा भी आपका प्रिय करना चाहते हैं। केवल हम दो व्यक्तियोंको ही विशेष कष्ट है। एक तो मैं संतप्त होता हूँ और दूसरी प्रतिविन्ध्यकी माता द्रौपदी
Semua kerabatmu, bersama para kesatria Srijaya, ingin melakukan apa yang menyenangkanmu. Namun derita yang paling berat hanya menimpa kami berdua: aku yang terbakar oleh gelora itu, dan Draupadi—ibu Prativindhya.
Verse 16
प्रियमेव तु सर्वेषां यद् ब्रवीम्युत किंचन । सर्वे हि व्यसन प्राप्ता: सर्वे युद्धाभिनन्दिन:,मैं जो कुछ कहता हूँ, वह सबको प्रिय है। हम सब लोग संकटमें पड़े हैं और सभी युद्धका अभिनन्दन करते हैं
Bhīmasena berkata: “Apa pun sedikit yang kukatakan, kuucapkan agar berkenan bagi semua. Sebab kita semua telah ditimpa malapetaka, dan kita semua menyambut kemungkinan perang.”
Verse 17
नात: पापीयसी काचिदापदू राजन् भविष्यति । यन्ञो नीचैरल्पबलै राज्यमाच्छिद्य भुज्यते,राजन्! इससे बढ़कर अत्यन्त दुःखदायिनी विपत्ति और क्या होगी कि नीच और दुर्बल शत्रु हम बलवानोंका राज्य छीनकर उसका उपभोग कर रहे हैं
Bhīma berkata: “Wahai Raja, tiada malapetaka yang lebih pedih daripada ini: orang-orang hina dan lemah telah merampas kerajaan dan kini menikmatinya. Bagi kita yang kuat, inilah nasib paling pahit.”
Verse 18
शीलदोषाद् घृणाविष्ट आनृशंस्यात् परंतप । क्लेशांस्तितिक्षसे राजन् नान्य: कश्चिचत् प्रशंसति,परंतप युधिष्ठिर! आप शील-स्वभावके दोष और कोमलतासे एवं दयाभावसे युक्त होनेके कारण इतने क्लेश सह रहे हैं, परंतु महाराज! इसके लिये आपकी कोई प्रशंसा नहीं करता है
Bhīma berkata: “Wahai penakluk musuh, karena cela dalam watakmu sendiri—ditundukkan oleh kelembutan dan digerakkan oleh belas kasih—engkau menanggung kesusahan ini. Namun, wahai Raja, tiada seorang pun memujimu karena menahan derita demikian.”
Verse 19
श्रोत्रियस्थेव ते राजन् मन्दकस्याविपक्षित: । अनुवाकहता बुद्धिर्नैषा तत्त्वार्थदर्शिनी,राजन! आपकी बुद्धि अर्थज्ञानसे रहित वेदोंके अक्षरमात्रको रटनेवाले मन्दबुद्धि श्रोत्रियकी तरह केवल गुरुकी वाणीका अनुसरण करनेके कारण नष्ट हो गयी है। यह तात्विक अर्थको समझने या समझानेवाली नहीं है
Bhīmasena berkata: “Wahai Raja, pengertianmu laksana seorang śrotriya yang tumpul—belum matang dan tak pernah diuji. Karena hanya mengikuti ucapan guru, akalmu terpukul oleh hafalan belaka; ia tidak melihat, dan tidak pula mampu menyampaikan, makna sejati kenyataan.”
Verse 20
घृणी ब्राह्मणरूपो$सि कथं क्षत्रे5भ्यजाय था: । अस्यां हि योनौ जायन्ते प्रायश: क्रूरबुद्धयः,आप दयालु ब्राह्मणरूप हैं। पता नहीं, क्षत्रियकुलमें कैसे आपका जन्म हो गया; क्योंकि क्षत्रिय योनिमें तो प्राय: क्रूर बुद्धिके ही पुरुष उत्पन्न होते हैं
Bhīmasena berkata: “Engkau penuh welas asih dan bahkan berwujud laksana seorang brāhmaṇa. Bagaimana mungkin engkau terlahir di kalangan kṣatriya? Sebab dalam garis keturunan ini, umumnya lahir lelaki yang berakal keras dan kejam.”
Verse 21
अश्रौषीस्त्वं राजधर्मान् यथा वै मनुरब्रवीत् । क्ररान् निकृतिसम्पन्नान् विहितानशमात्मकान्,बुद्धया वीर्येण संयुक्त: श्रुेतेनाभिजनेन च । महाराज! आपने राजधर्मका वर्णन तो सुना ही होगा, जैसा मनुजीने कहा है। फिर क्रूर, मायावी, हमारे हितके विपरीत आचरण करनेवाले तथा अशान्तचित्तवाले दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रोंका अपराध आप क्यों क्षमा करते हैं? पुरुषसिंह! आप बुद्धि, पराक्रम, शास्त्रज्ञान तथा उत्तम कुलसे सम्पन्न होकर भी जहाँ कुछ काम करना है, वहाँ अजगरकी भाँति चुपचाप क्यों बैठे हैं?
Bhima berkata: “Wahai Maharaja, engkau tentu telah mendengar dharma para raja sebagaimana Manu menegaskannya. Lalu mengapa engkau mengampuni pelanggaran putra-putra Dhritarashtra—mereka yang kejam, mahir tipu daya, bertindak berlawanan dengan kesejahteraan kita, dan berjiwa gelisah? Wahai singa di antara manusia, meski engkau dianugerahi kebijaksanaan, keberanian, pengetahuan sastra suci, dan keluhuran darah, mengapa pada saat tindakan tegas diperlukan engkau duduk membisu laksana ular piton?”
Verse 22
धार्तराष्ट्रानू महाराज क्षमसे किं दुरात्मन: । कर्तव्ये पुरुषव्याप्र किमास्से पीठसर्पवत्
Bhimasena berkata: “Wahai Maharaja, mengapa engkau terus mengampuni putra-putra Dhritarashtra yang berhati jahat itu? Wahai harimau di antara manusia, ketika kewajiban menuntut tindakan, mengapa engkau duduk tak bergerak—laksana ular yang melingkar di atas tempatnya?”
Verse 23
तृणानां मुष्टिनेकेन हिमवन्तं च पर्वतम्
“Dengan satu kepalan saja aku dapat meremukkan sehelai rumput—bahkan mengguncang Gunung Himavan!” Demikian Bhimasena menggelegar, menyatakan kedahsyatan kekuatan lengannya.
Verse 24
अज्ञातचर्या गूढेन पृथिव्यां विश्रुतेन च
“Dengan menjalani laku penyamaran secara tersembunyi, namun tetap termasyhur di seluruh bumi…”
Verse 25
दिवीव पार्थ सूर्येण न शक््याचरितुं त्वया । पार्थ! आप इस भूमण्डलमें विख्यात हैं, जैसे सूर्य आकाशमें छिपकर नहीं रह सकते, उसी प्रकार आप भी कहीं छिपे रहकर अज्ञातवासका नियम नहीं पूरा कर सकते ।। २४६ || बृहच्छाल इवानूपे शाखापुष्पपलाशवान्
Bhimasena berkata: “Wahai Partha, engkau tak mungkin hidup dalam penyamaran—sebagaimana matahari tak dapat tersembunyi di langit. Engkau termasyhur di seluruh penjuru bumi; karena itu, bersembunyi di suatu tempat untuk menuntaskan laku hidup tanpa dikenal tidaklah mungkin bagimu. Seperti pohon śāla yang besar berdiri di tanah rawa, sarat dahan, bunga, dan daun—demikian pula engkau pasti akan tampak dan dikenali.”
Verse 26
इमौ च सिंहसंकाशौ भ्रातरी सहितौ शिशू
Bhīmasena berkata: “Keduanya ini laksana anak singa—dua saudara yang selalu bersama—namun masih belaka kanak-kanak.”
Verse 27
पुण्यकीर्ती राजपुत्री द्रौपदी वीरसूरियम्
Bhīmasena berkata: “Draupadī, putri raja, termasyhur karena kebajikannya; ia laksana sumber cahaya bagi daya kepahlawanan.”
Verse 28
मां चापि राजज्जानन्ति हयाकुमारमिमा: प्रजा:
Wahai Raja, rakyat ini pun mengenal diriku dengan nama Hayakumāra.
Verse 29
तथैव बहवो<स्माभी राष्ट्र भ्यो विप्रवासिता:,राजन! इसके सिवा एक बात और है, हमलोगोंने भी बहुत-से राजाओं तथा राजकुमारोंको उनके राज्यसे निकाल दिया है। वे सब आकर राजा धुतराष्ट्रसे मिल गये होंगे, हमने जिनको राज्यसे वंचित किया अथवा निकाला है, वे कदापि हमारे प्रति शान्तभाव नहीं धारण कर सकते
Bhīma berkata: “Demikian pula, wahai Raja, banyak orang telah kami usir ke pembuangan dari negeri-negeri mereka. Dan ada satu hal lagi: kami pun telah menyingkirkan banyak raja dan pangeran dari kerajaannya sendiri. Mereka semua barangkali telah pergi bergabung dengan Raja Dhṛtarāṣṭra. Mereka yang kami rampas kedaulatannya atau kami usir, takkan pernah sungguh-sungguh menyimpan ketenteraman hati terhadap kami.”
Verse 30
राजानो राजपूत्राश्न धृतराष्ट्रमनुव्रता: । न हि ते5प्युपशाम्यन्ति निकृता वा निराकृता:,राजन! इसके सिवा एक बात और है, हमलोगोंने भी बहुत-से राजाओं तथा राजकुमारोंको उनके राज्यसे निकाल दिया है। वे सब आकर राजा धुतराष्ट्रसे मिल गये होंगे, हमने जिनको राज्यसे वंचित किया अथवा निकाला है, वे कदापि हमारे प्रति शान्तभाव नहीं धारण कर सकते
Bhīma berkata: “Raja-raja dan para pangeran yang setia mengikuti Dhṛtarāṣṭra pun ada di sana. Mereka yang telah kami tipu atau kami singkirkan, takkan juga menjadi tenang terhadap kami.”
Verse 31
अवश्यं तैर्निकर्तव्यमस्माकं तत्तप्रियैषिभि: । तेअप्यस्मासु प्रयुञ्जीरन् प्रच्छन्नान् सुबहूंश्षरान् । आचक्षीरंश्न नो ज्ञात्वा ततः स्यात् सुमहत् भयम्,अवश्य ही दुर्योधनका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर वे राजालोग भी हमलोगोंको धोखा देना उचित समझकर हमलोगोंकी खोज करनेके लिये बहुत-से छिपे हुए गुप्तचर नियुक्त करेंगे और पता लग जानेपर निश्चय ही दुर्योधनको सूचित कर देंगे। उस दशामें हमलोगोंपर बड़ा भारी भय उपस्थित हो जायगा
Bhīma berkata: “Para raja itu, demi meraih perkenan Duryodhana, pasti menganggap pantas untuk memperdaya kita. Mereka pun akan menempatkan banyak mata-mata yang tersembunyi untuk mengincar kita; dan setelah mengetahui tempat persembunyian kita, mereka akan melaporkannya kepada Duryodhana. Dalam keadaan demikian, bahaya yang amat besar niscaya menimpa kita.”
Verse 32
अस्माभिरुषिता: सम्यगूवने मासास्त्रयोदश । परिमाणेन तान् पश्य तावत: परिवत्सरान्,हमने अबतक वनमें ठीक-ठीक तेरह महीने व्यतीत कर लिये हैं, आप इन्हींको परिमाणमें तेरह वर्ष समझ लीजिये
Bhīmasena berkata: “Kami sungguh telah tinggal di hutan selama tiga belas bulan. Maka, menurut perhitungan, anggaplah bulan-bulan itu setara dengan tiga belas tahun.”
Verse 33
अस्ति मास: प्रतिनिधिर्यथा प्राहुर्मनीषिण: । पूतिकामिव सोमस्य तथेदं क्रियतामिति,मनीषी पुरुषोंका कहना है कि मास संवत्सरका प्रतिनिधि है। जैसे पूतिका सोमलताके स्थानपर यज्ञमें काम देती है, उसी प्रकार आप इन तेरह मासोंको ही तेरह वर्षोंका प्रतिनिधि स्वीकार कर लीजिये
Orang bijak berkata: bulan dapat menjadi wakil bagi tahun. Seperti dalam yajña, tanaman pūtikā dapat menggantikan soma-latā, demikian pula terimalah tiga belas bulan ini sebagai wakil dari tiga belas tahun.
Verse 34
अथवानडुहे राजन् साधवे साधुवाहिने | सौहित्यदानादेतस्मादेनस: प्रतिमुच्यते,राजन्! अथवा अच्छी तरह बोझ ढोनेवाले उत्तम बैलको भरपेट भोजन दे देनेपर इस पापसे आपको छुटकारा मिल सकता है
Atau, wahai Raja: dengan memberi makan hingga kenyang seekor lembu jantan yang baik—lembut perangainya dan terlatih memikul beban—engkau dapat terbebas dari dosa ini; itulah penebusan yang patut.
Verse 35
तस्माच्छत्रुवधे राजन् क्रियतां निश्चयस्त्वया । क्षत्रियस्य हि सर्वस्य नान््यो धर्मोडस्ति संयुगात्,अतः महाराज! आप शत्रुओंका वध करनेका निश्चय कीजिये; क्योंकि समस्त क्षत्रियोंके लिये युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि भीमवाक्ये पज्चत्रिंशो ध्याय: ।। ३५ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपव्वके अन्तर्गत अजुनाभिगमनपर्वमें भीमवाक्यविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Karena itu, wahai Raja, teguhkanlah tekad untuk membinasakan musuh. Sebab bagi setiap kṣatriya, tiada dharma yang lebih tinggi daripada gelanggang perang.
Verse 226
बुद्धया वीर्येण संयुक्त: श्रुेतेनाभिजनेन च । महाराज! आपने राजधर्मका वर्णन तो सुना ही होगा, जैसा मनुजीने कहा है। फिर क्रूर, मायावी, हमारे हितके विपरीत आचरण करनेवाले तथा अशान्तचित्तवाले दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रोंका अपराध आप क्यों क्षमा करते हैं? पुरुषसिंह! आप बुद्धि, पराक्रम, शास्त्रज्ञान तथा उत्तम कुलसे सम्पन्न होकर भी जहाँ कुछ काम करना है, वहाँ अजगरकी भाँति चुपचाप क्यों बैठे हैं?
Bhima berkata— “Wahai Maharaja! Engkau dianugerahi kebijaksanaan dan keberanian, ditopang oleh pengetahuan suci serta keluhuran garis keturunan. Ajaran tentang dharma raja sebagaimana dinyatakan Manu tentu telah engkau dengar. Lalu mengapa engkau mengampuni pelanggaran putra-putra Dhritarashtra—orang-orang kejam dan licik, bertindak berlawanan dengan kemaslahatan kami, gelisah batinnya, dan jahat hatinya? Wahai singa di antara manusia! Walau engkau memiliki pertimbangan, keperkasaan, pengetahuan sastra, dan asal-usul mulia, mengapa engkau duduk membisu laksana ular piton ketika ada tugas yang harus ditunaikan?”
Verse 236
छन्नमिच्छसि कौन्तेय यो<स्मात् संवर्तुमिच्छसि । कुन्तीनन्दन! आप अज्ञातवासके समय जो हम-लोगोंको छिपाकर रखना चाहते हैं, इससे जान पड़ता है कि आप एक मुट्ठी तिनकेसे हिमालय पर्वतको ढक देना चाहते हैं
Bhima berkata— “Wahai putra Kunti! Apa yang hendak kau sembunyikan, dari jalan itulah engkau justru ingin berpaling. Wahai Kunti-nandana! Pada masa hidup menyamar, engkau ingin menyembunyikan kami; namun itu seakan-akan engkau berniat menutupi Pegunungan Himalaya hanya dengan segenggam jerami.”
Verse 253
हस्ती श्वेत इवाज्ञात: कथं जिष्णुश्नरिष्यति । जहाँ जलकी अधिकता हो, ऐसे प्रदेशमें शाखा, पुष्प और पत्तोंसे सुशोभित विशाल शालवृक्षके समान अथवा श्वेत गजराज ऐरावतके सदृश ये अर्जुन कहीं भी अज्ञात कैसे रह सकेंगे?
Bhimasena berkata— “Bagaikan gajah putih, bagaimana Jiṣṇu (Arjuna) dapat tetap tak dikenal? Di negeri mana pun—terlebih yang kaya air—ia akan tampak menonjol, laksana pohon śāla raksasa yang elok oleh dahan, bunga, dan daun, atau laksana Airāvata, raja gajah yang putih. Maka bagaimana mungkin Arjuna berjalan tanpa dikenali?”
Verse 266
नकुल: सहदेवश्न कथं पार्थ चरिष्यत: । कुन्तीकुमार! ये दोनों भाई बालक नकुल-सहदेव सिंहके समान पराक्रमी हैं। ये दोनों कैसे छिपकर विचर सकेंगे?
Bhimasena berkata— “Wahai Pārtha! Bagaimana Nakula dan Sahadeva akan dapat bergerak ke sana kemari? Wahai putra Kunti! Kedua adik itu—Nakula dan Sahadeva—berani laksana singa. Bagaimana mungkin mereka berkeliaran sambil tetap tersembunyi?”
Verse 283
नाज्ञातचर्या पश्यामि मेरोरिव निगूहनम् | महाराज! मुझे भी प्रजावर्गके बच्चेतक पहचानते हैं, जैसे मेरुपर्वतको छिपाना असम्भव है, उसी प्रकार मुझे अपनी अज्ञातचर्या भी सम्भव नहीं दिखायी देती
Bhimasena berkata— “Wahai Maharaja! Aku tidak melihat bagaimana hidup dalam penyamaran mungkin bagiku—menyembunyikannya sama seperti mencoba menyembunyikan Gunung Meru. Bahkan rakyat jelata, sampai anak-anak sekalipun, mengenaliku. Sebagaimana Meru tak dapat disembunyikan, demikian pula hidup incognito tidak tampak mungkin bagiku.”
Verse 2736
विश्रुता कथमज्ञाता कृष्णा पार्थ चरिष्यति । पार्थ! यह वीरजननी पवित्रकीर्ति राजकुमारी द्रौपदी सारे संसारमें विख्यात है। भला, यह अज्ञातवासके नियम कैसे निभा सकेगी
Bhīmasena berkata: “Wahai Pārtha! Bagaimana mungkin Kṛṣṇā (Draupadī) yang termasyhur di seluruh dunia hidup sebagai orang tak dikenal? Putri raja Draupadī ini—ibu para kesatria, berkemasyhuran suci tanpa cela—terkenal di segenap jagat. Maka bagaimana ia dapat menaati aturan keras hidup menyamar?”
The dilemma is whether to answer injustice with immediate forceful retaliation or to preserve legitimacy by honoring a publicly accepted covenant of exile; Yudhiṣṭhira prioritizes vow-consistency over impulse.
Anger undermines discernment and steadiness; ethical action requires mastery of timing (kāla) and fidelity to truth (satya), even when such restraint postpones rightful claims.
No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-logic is normative rather than promissory—truth is presented as a supreme value against which life, wealth, and kingship are measured.