Adhyaya 315
Vana ParvaAdhyaya 31550 Verses

Adhyaya 315

Chapter Arc: वन में जल की तीव्र आवश्यकता के बीच युधिष्ठिर नकुल को सरोवर से पानी लाने भेजते हैं—पर वह लौटता नहीं, और मौन वन में अनिष्ट की आहट फैल जाती है। → नकुल के विलम्ब पर सहदेव, फिर अर्जुन, फिर भीम—एक-एक कर उसी दिशा में भेजे जाते हैं। सरोवर-तट पर जल के संकेत (जलाश्रयी वृक्ष, सारसों का कलरव) आशा जगाते हैं, पर प्रत्येक भाई वहाँ पहुँचकर किसी अदृश्य चेतावनी-स्वर को अनसुना कर जल पीता है और अचेत होकर गिर पड़ता है। → अर्जुन दौड़ते हुए आकाशवाणी सुनता है—‘प्रश्नों का उत्तर दिए बिना मत पीओ’—पर वह अवज्ञा कर जल पीता है और तुरंत मूर्छित हो गिर पड़ता है; चारों भाइयों का एक ही सरोवर-तट पर निःशब्द पतन संकट को चरम पर पहुँचा देता है। → इस अध्याय में समाधान नहीं आता; केवल यह स्थापित होता है कि सरोवर पर कोई यक्ष-शक्ति पहरा दे रही है और उसके नियम का उल्लंघन प्राणघातक सिद्ध हो रहा है। → चारों भाई अचेत पड़े हैं; अब युधिष्ठिर स्वयं क्या करेंगे—क्या वे भी जल पीकर गिरेंगे, या यक्ष के प्रश्नों का सामना करेंगे?

Shlokas

Verse 1

हि >> आन (0) हि 7 आम द्वादर्शाधिकत्रिशततमो< ध्याय: पानी लानेके लिये गये हुए नकुल आदि चार भाइयोंका सरोवरके तटपर अचेत होकर गिरना युधिछिर उवाच नापदामस्ति मर्यादा न निमित्तं न कारणम्‌ | धर्मस्तु विभजत्यर्थमुभयो: पुण्यपापयो:,युधिष्ठिर बोले--भैया! आपत्तियोंकी न तो कोई सीमा है, न कोई निमित्त दिखायी देता है और न कोई विशेष कारण ही परिलक्षित होता है। पहलेका किया हुआ पुण्य और पापरूप कर्म ही प्रारब्ध बनकर सुख और दुःखरूप फल बाँटता रहता है

Yudhiṣṭhira berkata: “Saudaraku, malapetaka tak memiliki batas yang tetap; tak tampak pula kesempatan yang jelas, maupun sebab yang khusus. Dharma-lah—menurut pahala dan dosa perbuatan lampau—yang membagi buahnya sebagai bahagia dan derita.”

Verse 2

भीम उवाच प्रातिकाम्यनयत्‌ कृष्णां सभायां प्रेष्यवत्‌ तदा । न मया निहततस्तत्र तेन प्राप्ता: सम संशयम्‌,भीमसेनने कहा--जब प्रातिकामीकी जगह दूत बनकर गया हुआ दु:शासन द्रौपदीको कौरवोंकी सभामें दासीकी भाँति बलपूर्वक खींच ले आया, उस समय मैंने जो उसका वध नहीं कर डाला; इसीके कारण हमलोग ऐसे धर्मसंकटमें पड़े हैं

Bhima berkata: “Ketika Pratikamin, bagaikan pesuruh hina, menyeret Krishna (Draupadi) ke balairung Kaurava seperti seorang budak perempuan, aku tidak membunuhnya saat itu juga. Karena kelalaianku itulah kini kita jatuh ke dalam bimbang dan bahaya dharma yang berat.”

Verse 3

अजुन उवाच वाचस्तीक्ष्णास्थिभेदिन्य: सूतपुत्रेण भाषिता: । अतितीव्रा मया क्षान्तास्तेन प्राप्ता: सम संशयम्‌,अर्जुन बोले--सूतपुत्र कर्णके कहे हुए कठोर अस्थियोंको भी विदीर्ण कर देनेवाले अत्यन्त कड़वे वचन सुनकर भी जो हमने सहन कर लिये; उसीसे आज हम धर्मसंकटकी अवस्थामें आ पहुँचे हैं

Arjuna berkata: “Kata-kata putra Sūta itu tajam—begitu pahit seakan membelah tulang. Namun aku menahan hinaan yang amat pedih itu. Justru karena aku menanggungnya, kini kita terjerumus ke dalam kebimbangan dan dilema dharma yang berat.”

Verse 4

सहदेव उवाच शकुनिस्त्वां यदाजैषीदक्षद्यूतेन भारत । स मया न हतत्तत्र तेन प्राप्ता: सम संशयम्‌,सहदेवने कहा--भारत! जब शकुनिने आपको जूएमें जीत लिया और उस समय मैंने उसे मार नहीं डाला, उसीका यह फल है कि आज हमलोग धर्मसंकटमें पड़ गये हैं

Sahadeva berkata: “Wahai Bhārata, ketika Śakuni mengalahkanmu dalam permainan dadu, aku tidak membunuhnya saat itu. Akibat kelalaianku itulah: hari ini kita jatuh ke dalam krisis dharma, diliputi keraguan dan bahaya besar.”

Verse 5

वैशम्पायन उवाच ततो युधिषछिरो राजा नकुलं वाक्यमब्रवीत्‌ । आरुह्द वृक्ष माद्रेय निरीक्षस्व दिशो दश,वैशम्पायनजी कहते हैं--तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने नकुलसे कहा--“माद्रीनन्दन! किसी वृक्षपर चढ़कर सब दिशाओंमें दृष्टिपात करो। कहीं आस-पास पानी हो, तो देखो अथवा जलके किनारे होनेवाले वृक्षोंपर भी दृष्टि डालो। तात! तुम्हारे ये भाई थके-माँदे और प्यासे हैं!

Vaiśampāyana berkata: Lalu Raja Yudhiṣṭhira berbicara kepada Nakula, “Wahai putra Mādrī, panjatlah sebuah pohon dan amati sepuluh penjuru.”

Verse 6

पानीयमन्तिके पश्य वृक्षांश्चाप्युदकाश्रितान्‌ । एते हि भ्रातर: श्रान्तास्तव तात पिपासिता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने नकुलसे कहा--“माद्रीनन्दन! किसी वृक्षपर चढ़कर सब दिशाओंमें दृष्टिपात करो। कहीं आस-पास पानी हो, तो देखो अथवा जलके किनारे होनेवाले वृक्षोंपर भी दृष्टि डालो। तात! तुम्हारे ये भाई थके-माँदे और प्यासे हैं!

“Carilah air di dekat sini, dan perhatikan pula pepohonan yang tumbuh di tempat berair. Anakku, saudara-saudaramu ini letih dan tersiksa oleh dahaga.”

Verse 7

नकुलस्तु तथेत्युक्त्वा शीघ्रमारुह्म पादपम्‌ । अब्रवीद्‌ भ्रातरं ज्येष्ठमभिवीक्ष्य समन्तत:,तब नकुल “बहुत अच्छा” कहकर शीघ्र ही एक पेड़पर चढ़ गये और चारों ओर दृष्टि डालकर अपने बड़े भाईसे बोले--

Nakula menjawab, “Baik,” lalu segera memanjat sebuah pohon. Setelah meneliti sekeliling, ia berbicara kepada kakak sulungnya.

Verse 8

पश्यामि बहुलान्‌ राजन्‌ वृक्षानुदकसंश्रयान्‌ । सारसानां च निर्हादमत्रोदकमसंशयम्‌,“राजन! मैं ऐसे बहुतेरे वृक्ष देख रहा हूँ, जो जलके किनारे ही होते हैं। सारसोंकी आवाज भी सुनायी देती है; अतः नि:संदेह यहाँ आस-पास ही कोई जलाशय है”

“Wahai Raja, aku melihat banyak pepohonan yang tumbuh dekat air. Aku juga mendengar seruan burung sārasā (bangau); maka tanpa ragu, ada perairan di dekat sini.”

Verse 9

ततोअब्रवीत्‌ सत्यधृतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । गच्छ सौम्य ततः शीघ्र तूणी: पानीयमानय,तब सत्यका पालन करनेवाले कुन्तीनन्दन युधिष्ठटिरने नकुलसे कहा--'सौम्य! शीघ्र जाओ और तरकसोंमें पानी भर लाओ'

Maka Yudhiṣṭhira, putra Kuntī yang teguh memegang kebenaran, berkata: “Wahai yang baik hati, pergilah segera—cepat—dan bawalah air dalam tabung-tabung panah (quiver).”

Verse 10

नकुलस्तु तथेत्युक्त्वा भ्रातुर्ज्येछ्सल्थ शासनात्‌ । प्राद्रवद्‌ यत्र पानीयं शीघ्रं चैवान्वपद्यत,नकुल “बहुत अच्छा” कहकर बड़े भाईकी आज्ञासे शीघ्रतापूर्वक गये और जहाँ जलाशय था, वहाँ तुरंत पहुँच गये

Nakula menjawab, “Baik,” lalu menaati perintah kakak sulungnya. Ia bergegas menuju tempat air berada dan segera sampai di sumber air itu.

Verse 11

स दृष्टवा विमल तोयं सारसै: परिवारितम्‌ । पातुकामस्ततो वाचमन्तरिक्षात्‌ स शुश्रुवे

Melihat air yang bening, dikelilingi burung sārasas, dan hendak meminumnya, Nakula pun mendengar sebuah suara dari angkasa.

Verse 12

वहाँ सारसोंसे घिरे हुए जलाशयका स्वच्छ जल देखकर नकुलको उसे पीनेकी इच्छा हुई। इतनेमें ही आकाशसे उनके कानोंमें एक स्पष्ट वाणी सुनायी दी ।। यक्ष उवाच मा तात साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा तु माद्रेय ततः पिब हरस्व च,यक्ष बोला--तात! तुम इस सरोवरका पानी पीनेका साहस न करो। इसपर पहलेसे ही मेरा अधिकार हो चुका है। माद्रीकुमार! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर पानी पीओ और ले भी जाओ

Yakṣa berkata: “Wahai anak, jangan bertindak gegabah. Telaga ini telah lebih dahulu menjadi milikku. O putra Mādrī, jawablah pertanyaanku terlebih dahulu; barulah engkau boleh minum dan membawa airnya.”

Verse 13

अनादृत्य तु तद्‌ वाक्यं नकुलः सुपिपासितः । अपिबच्छीतलं तोय॑ं पीत्वा च निपपात ह,नकुलकी प्यास बहुत बढ़ गयी थी। उन्होंने यक्षेके कथनकी अवहेलना करके वहाँका शीतल जल पी लिया। पीते ही वे अचेत होकर गिर पड़े

Namun Nakula, yang sangat kehausan, mengabaikan kata-kata itu. Ia meminum air yang sejuk; begitu selesai minum, ia pun roboh tak sadarkan diri.

Verse 14

चिरायमाणे नकुले कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । अब्रवीद्‌ भ्रातरं वीर॑ं सहदेवमरिंदमम्‌,नकुलके लौटनेमें जब अधिक विलम्ब हो गया, तब कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने अपने शत्रुहन्ता वीर भ्राता सहदेवसे कहा--

Ketika Nakula lama tidak kembali, Yudhiṣṭhira putra Kuntī berkata kepada saudaranya yang gagah, Sahadeva, penakluk musuh—

Verse 15

भ्राता हि चिरयातो न: सहदेव तवाग्रज: । तथैवानय सोदर्य पानीयं च त्वमानय,“सहदेव! हमारे अनुज और तुम्हारे अग्रज भ्राता नकुलको यहाँसे गये बहुत देर हो गयी। तुम जाकर अपने सहोदर भाईको बुला लाओ और पानी भी ले आओ'

“Sahadeva, adik kita—kakakmu Nakula—telah lama pergi dari sini. Pergilah, bawa saudaramu kandung kemari, dan bawakan pula air.”

Verse 16

सहदेवस्तथेत्यक्त्वा तां दिशं प्रत्यपद्यत । ददर्श च हतं भूमौ भ्रातरं नकुलं तदा,तब सहदेव “बहुत अच्छा” कहकर उसी दिशाकी ओर चल दिये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा, भाई नकुल पृथ्वीपर मरे पड़े हैं

Sahadeva menjawab, “Baik,” lalu berangkat ke arah itu. Setibanya di sana, ia melihat saudaranya Nakula tergeletak mati di tanah.

Verse 17

भ्रातृशोकाभिसंतप्तस्तृषया च प्रपीडित: । अभिदुद्राव पानीयं ततो वागभ्यभाषत

Terbakar oleh duka atas saudara-saudaranya dan tersiksa oleh dahaga, ia bergegas menuju air; saat itu juga terdengar sebuah suara.

Verse 18

भाईके शोकसे उनका हृदय संतप्त हो उठा। साथ ही प्याससे भी वे बहुत कष्ट पा रहे थे; अतः पानीकी ओर दौड़े। उसी समय आकाशवाणी बोल उठी-- ।। मा तात साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा यथाकामं पिबस्व च हरस्व च,“तात! पानी पीनेका साहस न करो। यहाँ पहलेसे ही मेरा अधिकार हो चुका है। तुम पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर इच्छानुसार जल पीओ और साथ ले भी जाओ”

Suara gaib berkata: “Anakku, jangan bertindak gegabah. Air ini telah lebih dahulu menjadi milikku. Jawablah pertanyaanku terlebih dahulu; kemudian minumlah sesukamu—dan bawalah pula jika kau kehendaki.”

Verse 19

अनादृत्य तु तद्‌ वाक्‍्यं सहदेव: पिपासित: । अपिबच्छीतलं तोय॑ं पीत्वा च निपपात ह,प्यासे सहदेव उस वचनकी अवहेलना करके वहाँका ठंडा जल पीने लगे एवं पीते ही अचेत होकर गिर पड़े

Namun Sahadewa, tersiksa oleh dahaga, mengabaikan peringatan itu. Ia meminum air yang sejuk di sana, dan seketika setelah meneguknya ia roboh tak sadarkan diri.

Verse 20

अथाब्रवीत्‌ स विजयं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । भ्रातरी ते चिरगतौ बीभत्सो शत्रुकर्शन,तदनन्तर कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने अर्जुनसे कहा--“शत्रुनाशन बीभत्सो! तुम्हारे दोनों भाइयोंको गये बहुत देर हो गयी

Lalu Yudhisthira, putra Kunti, berkata kepada Vijaya (Arjuna): “Wahai Bibhatsu, penakluk musuh—kedua saudaramu telah pergi terlalu lama.”

Verse 21

तौ चैवानय भद्र ते पानीयं च त्वमानय । त्वं हि नस्तात सर्वेषां द:खितानामपाश्रय:,“तुम्हारा कल्याण हो। तुम उन दोनोंको बुला लाओ और साथ ही पानी भी ले आओ। तात! तुम्हीं हम सब दुःखी बन्धुओंके सहारे हो”

“Semoga kebaikan menyertaimu. Bawalah kedua orang itu kemari, dan bawakan pula air. Anakku, engkaulah satu-satunya tumpuan bagi kami semua, para kerabat yang berduka.”

Verse 22

एवमुक्तो गुडाकेश: प्रगृह्म सशरं धनु: । आमुक्तखड््‌गो मेधावी तत्‌ सर: प्रत्यपद्यत,युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर निद्राविजयी बुद्धिमान्‌ अर्जुन धनुष-बाण और खड़्ग लिये उस सरोवरके तटपर गये

Mendengar demikian, Gudakesha (Arjuna) yang bijaksana—penakluk tidur—mengangkat busurnya beserta anak panah, menyandang pedang, lalu menuju ke telaga itu.

Verse 23

ततः पुरुषशार्दूली पानीयहरणे गतौ । तौ ददर्श हतौ तत्र भ्रातरौ श्वेतवाहन:,श्वेतवाहन अर्जुनने जल लानेके लिये गये हुए उन दोनों पुरुषसिंह भाइयोंको वहाँ मरे हुए देखा

Kemudian Svetavahana (Arjuna), ketika pergi mengambil air, melihat di sana kedua saudaranya yang laksana singa itu tergeletak terbunuh.

Verse 24

प्रसुप्ताविव तौ दृष्टवा नरसिंह: सुदु:खित: । धनुरुद्यम्य कौन्तेयो व्यलोकयत तद्‌ वनम्‌,दोनोंको प्रगाढ़ निद्रामें सोये हुएकी भाँति देखकर मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी अर्जुनको बहुत दुःख हुआ। उन्होंने धनुष उठाकर उस वनका अच्छी तरह निरीक्षण किया

Melihat keduanya terbaring seakan-akan dalam tidur yang sangat lelap, sang singa di antara manusia—Arjuna putra Kuntī—diliputi duka yang mendalam. Ia mengangkat busurnya dan meneliti hutan itu dengan saksama.

Verse 25

नापश्यत्‌ तत्र किज्चित्‌ स भूतमस्मिन्‌ महावने । सव्यसाची ततः श्रान्त: पानीयं सो5भ्यधावत,जब उस विशाल वनमें उन्हें कोई भी हिंसक प्राणी नहीं दिखायी दिया, तब सव्यसाची अर्जुन थककर पानीकी ओर दौड़े

Di hutan yang luas itu ia tidak melihat makhluk apa pun. Maka Savyasācī Arjuna, yang telah letih, bergegas menuju air.

Verse 26

अभिधावंस्ततो वाक्यमन्तरिक्षात्‌ स शुश्रुवे । किमासीदसि पानीयं नैतच्छक्यं बलात्‌ त्वया,दौड़ते समय उन्हें आकाशकी ओरसे आती हुई वाणी सुनायी दी--“कुन्तीनन्दन! क्‍यों पानीके निकट जा रहे हो? तुम जबरदस्ती यह जल नहीं पी सकते। भारत! यदि मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे सको, तो यहाँका पानी पीओ और साथ ले भी जाओ'

Saat ia berlari, ia mendengar suara dari angkasa: “Wahai putra Kuntī, mengapa engkau bergegas menuju air? Air ini tak dapat kau minum dengan paksa.”

Verse 27

कौन्तेय यदि प्रश्नांस्तान्‌ मयोक्तान्‌ प्रतिपत्स्यसे । ततः पास्यसि पानीयं हरिष्यसि च भारत,दौड़ते समय उन्हें आकाशकी ओरसे आती हुई वाणी सुनायी दी--“कुन्तीनन्दन! क्‍यों पानीके निकट जा रहे हो? तुम जबरदस्ती यह जल नहीं पी सकते। भारत! यदि मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे सको, तो यहाँका पानी पीओ और साथ ले भी जाओ'

“Wahai putra Kuntī, bila engkau dapat menjawab pertanyaan-pertanyaan yang kuajukan dengan benar, barulah engkau boleh minum air ini; wahai Bhārata, bahkan boleh pula membawanya pergi.”

Verse 28

वारितस्त्वब्रवीत्‌ पार्थो दृश्यमानो निवारय । यावद्‌ बाणैविंनिर्भिन्न: पुनर्नैंवं वदिष्यसि,इस प्रकार रोके जानेपर अर्जुनने कहा--“जरा सामने आकर रोको। सामने आते ही बाणोंसे टुकड़े-टुकड़े हो जानेपर फिर तुम इस प्रकार नहीं बोल पाओगे”

Ketika dihalangi demikian, Pārtha berkata, “Jika hendak menghentikanku, tampakkanlah dirimu dan cegahlah. Setelah kau tercerai-berai oleh anak panahku, kau takkan dapat berkata seperti ini lagi.”

Verse 29

एवमुक्त्वा ततः पार्थ: शरैरस्त्रानुमन्त्रितै: । प्रववर्ष दिश: कृत्स्ना: शब्दवेधं च दर्शयन्‌,ऐसा कहकर अर्जुनने अपनी शब्दवेध-कलाका परिचय देते हुए दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंकी सब ओर झड़ी लगा दी

Setelah berkata demikian, Pārtha (Arjuna) pun—sambil memperlihatkan kemahirannya dalam menembak berdasarkan bunyi—menghujani segala penjuru dengan anak panah yang telah diberkahi mantra-mantra senjata suci; suatu ketangkasan yang tertata, bukan kekerasan membabi buta.

Verse 30

कर्णिनालीकनाराचानुत्सूजन्‌ भरतर्षभ । स त्वमोघानिषून्‌ मुक्‍्त्वा तृष्णयाभिप्रपीडित:

Yakṣa berkata: “Wahai yang termulia di antara keturunan Bharata, engkau melepaskan anak panah berduri—nālika dan nārāca. Namun meski dihimpit dahaga, engkau telah melontarkan hujan anak panah yang tak pernah meleset.”

Verse 31

यक्ष उवाच कि विघातेन ते पार्थ प्रश्नानुकत्वा ततः पिब

Yakṣa berkata: “Wahai Pārtha, apa gunanya pertikaian ini bagimu? Jawablah pertanyaan-pertanyaanku terlebih dahulu; barulah minum.”

Verse 32

एवमुक्तस्तत: पार्थ: सव्यसाची धनंजय:

Maka, setelah disapa demikian, Pārtha—Arjuna yang termasyhur sebagai Savyasācī dan Dhanañjaya—menjawab; sebab ujian kini bukan lagi soal kekuatan, melainkan kejernihan budi, pengendalian diri, dan dharma.

Verse 33

अथाब्रवीद्‌ भीमसेन कुन्तीपुत्रो युधिछ्ठिर:

Kemudian Yudhiṣṭhira, putra Kuntī, berbicara kepada Bhīmasena. Di tengah ujian Yakṣa, sang kakak menoleh kepada Bhīma—seakan menandai bahwa dharma harus ditegakkan bukan dengan tenaga yang meledak-ledak, melainkan dengan tutur yang tertata dan keputusan yang benar.

Verse 34

नकुल: सहदेवश्न बीभत्सुश्च॒ परंतप । चिरं गतास्तोयहेतोर्न चागच्छन्ति भारत

Yakṣa berkata: “Wahai Parantapa, Nakula dan Sahadeva, juga Bībhatsu (Arjuna), telah lama pergi mencari air; namun, wahai Bhārata, mereka belum juga kembali.”

Verse 35

तांश्वैवानय भद्ठरें ते पानीयं च त्वमानय । तब कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भीमसेनसे कहा--“परंतप! भरतनन्दन! नकुल, सहदेव और अर्जुनको पानीके लिये गये बहुत देर हो गयी। वे अभीतक नहीं आ रहे हैं। तुम्हारा कल्याण हो। तुम जाकर उन्हें बुला लाओ और पानी भी ले आओ” ।। ३३-३४ $ ।। भीमसेनस्तथेत्युक्त्वा त॑ देशं प्रत्यपद्यत

Yakṣa berkata: “Bawalah mereka kemari segera; semoga kebaikan menyertaimu. Dan engkau sendiri bawalah air.” Mendengar itu, Bhīmasena menjawab, “Baik,” lalu berangkat menuju tempat itu.

Verse 36

यत्र ते पुरुषव्याप्रा भ्रातरोडस्थ निपातिता: । तान्‌ दृष्टवा दु:खितो भीमस्तृषया च प्रपीडित:

Yakṣa berkata: “Di tempat saudara-saudaramu—para kesatria perkasa—delapan orang itu tergeletak jatuh, Bhīma melihat mereka lalu diliputi duka, dan pada saat yang sama disiksa oleh dahaga.”

Verse 37

तब भीमसेन “बहुत अच्छा” कहकर उस स्थान-पर गये, जहाँ वे पुरुषसिंह तीनों भाई पृथ्वीपर पड़े थे। उन्हें उस अवस्थामें देखकर भीमसेनको बड़ा दुःख हुआ। इधर प्यास भी उन्हें बहुत कष्ट दे रही थी ।। अमन्यत महाबाहु: कर्म तद्‌ यक्षरक्षसाम्‌ स चिन्तयामास तदा योद्धव्यं ध्रुवमद्य वै

Setibanya di sana, Bhīma yang berlengan perkasa melihat ketiga saudara laksana singa itu tergeletak di bumi. Melihat keadaan mereka, ia dilanda duka, sementara dahaga pun menekannya. Ia mengira ini perbuatan Yakṣa atau Rākṣasa, lalu berpikir: “Hari ini, pertempuran pasti tak terelakkan.”

Verse 38

पास्यामि तावत्‌ पानीयमिति पार्थो वृकोदर: । ततो<भ्यधावत्‌ पानीयं पिपासु: पुरुषर्षभ:

“Aku akan melihat air terlebih dahulu,” kata Vṛkodara (Bhīma). Lalu sang banteng di antara manusia itu, dilanda dahaga, bergegas menuju air.

Verse 39

महाबाहु भीमसेनने मन-ही-मन यह निश्चय किया कि “यह यक्षों तथा राक्षस्रोंका काम है।' फिर उन्होंने सोचा; “आज निश्चय ही मुझे शत्रुके साथ युद्ध करना पड़ेगा, अतः पहले जल तो पी लूँ।” ऐसा निश्चय करके प्यासे नरश्रेष्ठ कुन्तीकुमार भीमसेन जलकी ओर दौड़े ।। यक्ष उवाच मा तात साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च,यक्ष बोला--तात! पानी पीनेका साहस न करना। इस जलपर पहलेसे ही मेरा अधिकार स्थापित हो चुका है। कुन्तीकुमार! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर पानी पीओ और ले भी जाओ

Yaksha berkata, “Anakku, jangan bertindak gegabah. Air ini telah lebih dahulu menjadi milikku. Wahai putra Kunti, jawab dahulu pertanyaanku; barulah engkau boleh minum—bahkan membawanya pergi.”

Verse 40

एवमुक्तस्तदा भीमो यक्षेणामिततेजसा । अनुक्त्वैव तु तान्‌ प्रश्नान्‌ पीत्वैव निपपात ह,अमिततेजस्वी यक्षके ऐसा कहनेपर भी भीमसेन उन प्रश्नोंका उत्तर दिये बिना ही जल पीने लगे और पीते ही मूर्च्छिंत होकर गिर पड़े

Walau telah diperingatkan oleh Yaksha yang bercahaya tak terukur, Bhima tetap meminum air itu tanpa menjawab pertanyaan-pertanyaan tersebut; dan seketika setelah minum, ia roboh tak sadarkan diri.

Verse 41

ततः कुन्तीसुतो राजा प्रचिन्त्य पुरुषर्षभ: । समुत्थाय महाबाहुर्दहुमानेन चेतसा,तदनन्तर कुन्तीपुत्र पुरुषरत्न महाबाहु राजा युधिष्ठिर बहुत देरतक सोच-विचार करके उठे और जलते हुए हृदयसे उन्होंने उस विशाल वनमें प्रवेश किया, जहाँ मनुष्योंकी आवाजतक नहीं सुनायी देती थी। वहाँ रुरु मृग, वराह तथा पक्षियोंके समुदाय ही निवास करते थे

Kemudian sang raja, putra Kunti—yang utama di antara manusia—merenung lama. Ia bangkit, Yudhisthira yang berlengan perkasa, dengan batin yang seakan terbakar, lalu melangkah maju.

Verse 42

व्यपेतजननिर्घोष॑ प्रविवेश महावनम्‌ । रुरुभिश्न वराहैश्व पक्षिभिश्न निषेवितम्‌,तदनन्तर कुन्तीपुत्र पुरुषरत्न महाबाहु राजा युधिष्ठिर बहुत देरतक सोच-विचार करके उठे और जलते हुए हृदयसे उन्होंने उस विशाल वनमें प्रवेश किया, जहाँ मनुष्योंकी आवाजतक नहीं सुनायी देती थी। वहाँ रुरु मृग, वराह तथा पक्षियोंके समुदाय ही निवास करते थे

Ia memasuki rimba besar yang telah sunyi dari hiruk suara manusia; yang menghuni hanyalah rusa ruru, babi hutan, dan kawanan burung.

Verse 43

नीलभास्वरवर्णश्न॒ पादपैरुपशोभितम्‌ | भ्रमरैरुपगीतं च पक्षिभिश्न महायशा:,नीले रंगके चमकीले वृक्ष उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे। भ्रमरोंके गुंजन और विहंगोंके कलरवसे वह वनप्रान्त शब्दायमान हो रहा था

Wahai yang termasyhur, rimba itu dihiasi pepohonan berkilau dengan rona biru pekat; dan seluruh kawasan bergema oleh dengung nyanyian lebah serta kicau burung-burung.

Verse 44

स गच्छन्‌ कानने तस्मिन्‌ हेमजालपरिष्कृतम्‌ । ददर्श तत्‌ सर: श्रीमान्‌ विश्वकर्मकृतं यथा,महायशस्वी श्रीमान्‌ युधिष्ठिरने उस वनमें विचरण करते हुए उस सरोवरको देखा, जो सुनहरे रंगके कुसुमकेसरोंसे विभूषित था। जान पड़ता था; साक्षात्‌ विश्वकर्माने ही उसका निर्माण किया है

Ketika berjalan di rimba itu, Yudhiṣṭhira yang termasyhur melihat sebuah telaga yang dihias laksana jala emas; seakan-akan karya Viśvakarmā sendiri.

Verse 45

उपेतं नलिनीजालै: सिन्धुवारै: सवेतसै: । केतकै: करवीरैश्नव पिप्पलैश्वैव संवृतम्‌ । (ततो धर्मसुतः श्रीमान्‌ भ्रातृदर्शनलालस: ।) श्रमार्तस्तदुपागम्य सरो दृष्टवाथ विस्मित:,उस सरोवरका जल कमलकी बेलोंसे आच्छादित हो रहा था और उसके चारों किनारोंपर सिंदुवार, बेंत, केवड़े, करवीर तथा पीपलके वृक्ष उसे घेरे हुए थे। उस समय भाइयोंसे मिलनेके लिये उत्सुक श्रीमान्‌ धर्मनन्दन युधिष्ठिर थकावटसे पीड़ित हो उस सरोवरपर आये और वहाँकी अवस्था देखकर बड़े विस्मित हुए

Air telaga itu tertutup oleh rimbun sulur-sulur teratai; di sekelilingnya berdiri semak sindhuvāra, pohon vetasa, ketaka, karavīra, dan pippala yang mengepungnya dari segala arah. Lalu putra Dharma, Yudhiṣṭhira yang mulia—rindu bertemu saudara-saudaranya—datang ke sana dalam letih yang berat; melihat telaga itu, ia pun tertegun dalam keheranan.

Verse 306

अनेकैरिषुसड्घातैरन्तरिक्षे ववर्ष ह । भरतश्रेष्ठ जनमेजय! अर्जुन उस समय कर्णि, नालीक तथा नाराच आदि बाणोंकी वर्षा कर रहे थे। प्याससे पीड़ित हुए अर्जुनने कितने ही अमोघ बाणोंका प्रयोग करके आकाशमें भी कई बार बाण-समूहकी वर्षा की

Wahai Janamejaya, yang terbaik di antara Bharata! Saat itu Arjuna menurunkan hujan anak panah—karṇī, nālīka, nārāca, dan lainnya—dalam gelombang yang tak terhitung, seakan mengguyur angkasa. Meski tersiksa oleh dahaga, ia memakai banyak panah yang tak pernah meleset, dan berulang kali membuat langit sendiri dipenuhi curahan gugus-gugus panah.

Verse 311

इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें मृगका अनुसंधानविषयक तीन सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-311 dalam Vana Parva Mahābhārata, pada bagian Āraṇeya, yang mengisahkan penelusuran dan pengejaran seekor rusa.

Verse 316

अनुक्त्वा च पिबन प्रश्नान्‌ पीत्वैव न भविष्यसि । यक्ष बोला--पार्थ! इस प्रकार प्राणियोंपर आघात करनेसे क्या लाभ? पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, फिर जल पीओ। यदि तुम प्रश्नोंका उत्तर दिये बिना ही यहाँका जल पीओगे, तो पीते ही मर जाओगे

Yakṣa berkata: “Wahai Pārtha! Jika engkau minum tanpa menjawab pertanyaanku, engkau takkan hidup setelah meneguknya. Apa guna menyerang makhluk hidup dengan cara demikian? Jawablah pertanyaanku terlebih dahulu, barulah minum air ini. Jika engkau minum tanpa menjawab, seketika itu juga engkau akan mati.”

Verse 323

अवज्ञायैव तां वाचं पीत्वैव निपपात ह । उसके ऐसा कहनेपर कुन्तीपुत्र सव्यसाची धनंजय उसके वचनोंकी अवहेलना करके जल पीने लगे और पीते ही अचेत होकर गिर पड़े

Mengabaikan peringatan Yakṣa, putra Kuntī, Savyasācī Dhanañjaya, tetap meminum air itu; dan begitu air itu menyentuhnya, seketika ia roboh tak sadarkan diri.

Verse 3312

इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि नकुलादिपतने द्वादशाधिकत्रिशततमो<5ध्याय:

Demikianlah berakhir bab ke-324 (dengan dua belas tambahan) dalam Vana Parva Śrī Mahābhārata, pada bagian Āraṇeya, mengenai jatuhnya Nakula dan yang lainnya.