महाबाहु भीमसेनने मन-ही-मन यह निश्चय किया कि “यह यक्षों तथा राक्षस्रोंका काम है।' फिर उन्होंने सोचा; “आज निश्चय ही मुझे शत्रुके साथ युद्ध करना पड़ेगा, अतः पहले जल तो पी लूँ।” ऐसा निश्चय करके प्यासे नरश्रेष्ठ कुन्तीकुमार भीमसेन जलकी ओर दौड़े ।। यक्ष उवाच मा तात साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च,यक्ष बोला--तात! पानी पीनेका साहस न करना। इस जलपर पहलेसे ही मेरा अधिकार स्थापित हो चुका है। कुन्तीकुमार! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर पानी पीओ और ले भी जाओ
yakṣa uvāca | mā tāta sāhasaṁ kārṣīr mamāyaṁ pūrva-parigrahaḥ | praśnān uktvā tu kaunteya tataḥ piba harasva ca ||
Yaksha berkata, “Anakku, jangan bertindak gegabah. Air ini telah lebih dahulu menjadi milikku. Wahai putra Kunti, jawab dahulu pertanyaanku; barulah engkau boleh minum—bahkan membawanya pergi.”
यक्ष उवाच