Adhyaya 202
Vana ParvaAdhyaya 20243 Verses

Adhyaya 202

पञ्चमहाभूतगुण-इन्द्रियनिग्रह-उपदेशः | Teaching on the Qualities of the Five Elements and Sense-Control

Upa-parva: Mārkaṇḍeya–Dharmavyādha Saṃvāda (Didactic Discourse on Elements and Sense-Control)

Mārkaṇḍeya introduces the continuation of a Brahmin’s inquiry to the Dharmavyādha, requesting a precise account of the pañca-mahābhūtas and their guṇas. The Dharmavyādha enumerates earth, water, fire, air, and ether, assigning sensory qualities in a graded scheme: earth with five (sound, touch, form, taste, smell), water with four (sound, touch, form, taste), fire with three (sound, touch, form), air with two (sound, touch), and ether with one (sound). He notes these fifteen guṇas as foundational to embodied worlds and indicates that balance supports prosperity, while disequilibrium leads the embodied self to transition to another body in time. The discourse then distinguishes the ‘manifest’ (vyakta) as that produced/known through the senses, and the ‘unmanifest’ (avyakta) as inferred and beyond direct sense-grasp. The chapter pivots to a yoga-oriented ethic: the senses, when released or restrained, are linked to outcomes described as well-being or suffering; indriya-dhāraṇa is presented as the complete method in this frame. Using the chariot analogy—body as chariot, self as controller, senses as horses—the text emphasizes vigilant governance of mind and senses; uncontrolled sense-following carries away discernment like wind driving a boat. Concentrated study and meditation upon these faculties yields a contemplative result (dhyānaja phala).

Chapter Arc: वनवास के बीच धर्मराज युधिष्ठिर दीर्घायु, निष्कल्मष तपस्वी मार्कण्डेय से प्रश्न करते हैं—ऐसे मुनि जिनकी दृष्टि देव-दानव-राक्षस, राजवंश और ऋषिवंश तक फैली है, वे धर्म के गूढ़ प्रसंगों को स्पष्ट करें। → युधिष्ठिर के आग्रह पर मार्कण्डेय ‘धौन्धुमार’ उपाख्यान आरम्भ करते हैं—धुन्धु नामक महासुर लोक-उत्सादन के लिए घोर तप में प्रवृत्त है; उसके उभार से त्रैलोक्य पर संकट की छाया पड़ती है और यह प्रश्न उठता है कि उसे कौन रोकेगा। → विष्णु का वचन/आदेश निर्णायक बनता है—योगबल से समर्थ एक ‘पार्थिवोत्तम’ (राजर्षि) तुम्हारे निर्देश से ‘धुन्धुमार’ बनेगा; विष्णु यह कहकर अंतर्धान हो जाते हैं, और दैवी संकल्प मानव-कर्तव्य में रूपांतरित हो जाता है। → मार्कण्डेय कथा को इस बिंदु तक स्थिर करते हैं कि धुन्धु के विनाश का उपाय दैवी अनुग्रह और तप-तेज से संयुक्त राजधर्म में निहित है—लोक-रक्षा हेतु योग्य पुरुष का उदय निश्चित है। → धुन्धु के घोर तप और उसके वधकर्ता के उदय की घोषणा के बाद अगला प्रश्न खुला रह जाता है—वह राजर्षि कौन है, और किस प्रकार धुन्धु का संहार होगा?

Shlokas

Verse 1

न लक कल > यहाँ जो पिता आदि गुरुजन, सेवक और स्त्रियोंको दिया दान व्यर्थ कहा है, इसका अभिप्राय यह है कि माता-पिता आदि गुरुजनोंकी सेवा करना तथा स्त्री और नौकरोंका पालन-पोषण करना तो मनुष्यका कर्तव्य ही है। अतः उनको देना तो अपने कर्तव्यका ही पालन है, इसलिये वह उनको देना दानकी श्रेणीमें नहीं है। एकाधिकंद्विशततमो<्ध्याय: उत्तड़ककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्‌का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना वैशम्पायन उवाच श्र॒ुत्वा तु राजा राजर्षेरिन्द्रद्यम्नस्य तत्‌ तथा । मार्कण्डेयान्महा भागात्‌ स्वर्गस्य प्रतिपादनम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ महाराज जनमेजय! महाभाग मार्कण्डेय मुनिके मुखसे राजर्षि इन्द्रद्ुम्नको पुनः स्वर्गप्राप्ति होनेका वृत्तान्त (तथा दानमाहात्म्य) सुनकर राजा युधिष्ठिरने पापरहित, दीर्घायु तथा तपोवृद्ध महात्मा मार्कण्डेयसे इस प्रकार पूछा --

Waiśampāyana berkata: Setelah mendengar dari resi Mārkaṇḍeya yang amat mulia kisah bagaimana rājarsi Indradyumna kembali meraih surga, Raja Yudhiṣṭhira—yang ingin memahami hakikat pahala dan dharma dalam memberi—lalu mengajukan pertanyaan kepada Mārkaṇḍeya, sang resi tanpa noda, panjang umur, dan kaya tapa.

Verse 2

युधिष्ठिरो महाराज पप्रच्छ भरतर्षभ । मार्कण्डेयं तपोवृद्ध दीर्घायुषमकल्मषम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ महाराज जनमेजय! महाभाग मार्कण्डेय मुनिके मुखसे राजर्षि इन्द्रद्ुम्नको पुनः स्वर्गप्राप्ति होनेका वृत्तान्त (तथा दानमाहात्म्य) सुनकर राजा युधिष्ठिरने पापरहित, दीर्घायु तथा तपोवृद्ध महात्मा मार्कण्डेयसे इस प्रकार पूछा --

Waiśampāyana berkata: Raja Yudhiṣṭhira, yang termulia di antara keturunan Bharata, bertanya kepada resi Mārkaṇḍeya—yang agung karena tapa, panjang umur, dan tanpa cela dosa.

Verse 3

विदितास्तव धर्मज्ञ देवदानवराक्षसा: | राजवंशाक्ष विविधा ऋषिवंशाशक्ष शाश्वता:,“धर्मज्ञ मुने! आप देवता, दानव तथा राक्षसोंको भी अच्छी तरह जानते हैं। आपको नाना प्रकारके राजवंशों तथा ऋषियोंकी सनातन वंशपरम्पराका भी ज्ञान है

Waiśampāyana berkata: “Wahai yang mengetahui dharma! Para dewa, Dānava, dan Rākṣasa telah engkau kenal benar. Berbagai garis keturunan raja, serta silsilah para resi yang abadi pun engkau ketahui.”

Verse 4

न ते>स्त्यविदितं किज्चिदस्मिल्लोके द्विजोत्तम । कथां वेत्सि मुने दिव्यां मनुष्योरगरक्षसाम्‌

Waiśampāyana berkata: “Wahai yang terbaik di antara para dwija, tiada sesuatu pun di dunia ini yang tidak engkau ketahui. Wahai resi, bagaimana engkau mengetahui kisah-kisah menakjubkan tentang manusia, ular-nāga, dan rākṣasa?”

Verse 5

देवगन्धर्वयक्षाणां किन्नराप्सरसां तथा । द्विजश्रेष्ठ॒ इस लोकमें कोई ऐसी वस्तु नहीं जो आपसे अज्ञात हो। मुने! आप मनुष्य, नाग, राक्षस, देवता, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा अप्सराओंकी भी दिव्य कथाएँ जानते हैं ।। ४ हे || इदमिच्छाम्यहं श्रीतुं तत््वेन द्विजसत्तम,“विप्रवर! अब मैं यथार्थरूपसे यह सुनना चाहता हूँ कि इक्ष्वाकुवंशमें जो कुवलाश्व नामसे विख्यात विजयी राजा हो गये हैं, वे क्‍यों नाम बदलकर “धुन्धुमार' कहलाने लगे?

Engkau pun mengetahui kisah-kisah para dewa, gandharva, yakṣa, kinnara, dan apsaras. Karena itu, wahai yang utama di antara para brāhmaṇa, aku ingin mendengarnya sebagaimana adanya: dalam garis Ikṣvāku, mengapa raja penakluk yang termasyhur sebagai Kuvalāśva kemudian dikenal dengan nama baru, ‘Dhundhumāra’?

Verse 6

कुवलाश्च इति ख्यात इक्ष्वाकुरपराजित: । कथं नामविपर्यासाद्‌ धुन्धुमारत्वमागत:,“विप्रवर! अब मैं यथार्थरूपसे यह सुनना चाहता हूँ कि इक्ष्वाकुवंशमें जो कुवलाश्व नामसे विख्यात विजयी राजा हो गये हैं, वे क्‍यों नाम बदलकर “धुन्धुमार' कहलाने लगे?

Waiśampāyana berkata: “Bagaimanakah raja tak terkalahkan dari wangsa Ikṣvāku, yang termasyhur dengan nama Kuvalāśva, dapat—karena perubahan nama—dikenal sebagai Dhundhumāra?”

Verse 7

एतदिच्छामि तत्त्वेन ज्ञातुं भार्गवसत्तम । विपर्यस्तं यथा नाम कुवलाश्वस्य धीमत:,'भगुश्रेष्ठ! बुद्धिमान्‌ राजा कुवलाश्वके इस नाम-परिवर्तनका यथार्थ कारण मैं जानना चाहता हूँ

Wahai yang terbaik di antara para Bhārgava, aku ingin mengetahui dengan sebenar-benarnya bagaimana nama raja bijaksana Kuvalāśva dapat berubah; katakanlah sebab yang sesungguhnya di balik perubahan itu.

Verse 8

वैशम्पायन उवाच युधिष्ठिरेणैवमुक्तो मार्कण्डेयो महामुनि: । धौन्धुमारमुपाख्यानं कथयामास भारत,वैशम्पायनजीने कहा--भारत! धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर महामुनि मार्कण्डेयने धुन्धुमारकी कथा प्रारम्भ की

Waiśampāyana berkata: “Wahai Bhārata, ketika Yudhiṣṭhira berkata demikian, mahāmuni Mārkaṇḍeya pun mulai menuturkan kisah-legendawi tentang Dhaundhumāra.”

Verse 9

मार्कण्डेय उवाच हन्त ते कथयिष्यामि शूणु राजन्‌ युधिष्छिर । धर्मिष्ठमिदमाख्यानं॑ धुन्धुमारस्य तच्छृुणु,मार्कण्डेयजी बोले--राजा युधिष्ठिर! सुनो। धुन्धुमारका आख्यान धर्ममय है। अब इसका वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो

Mārkaṇḍeya berkata: “Baiklah, akan kuceritakan kepadamu. Dengarkan, wahai Raja Yudhiṣṭhira. Kisah Dhundhumāra ini teguh berlandaskan dharma; dengarkanlah dengan saksama.”

Verse 10

यथा स राजा इक्ष्वाकु: कुवलाश्वो महीपति: । धुन्धुमारत्वमगमत्‌ तच्छृणुष्व महीपते,महाराज! इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्व जिस प्रकार धुन्धुमार नामसे विख्यात हुए, वह सब श्रवण करो

Wahai Maharaja, dengarkanlah bagaimana Kuvalāśva, penguasa bumi dari wangsa Ikṣvāku, sampai dikenal dengan nama Dhundhumāra.

Verse 11

महर्षिविश्रुतस्तात उत्तड़क इति भारत । मरुधन्वसु रम्येषु आश्रमस्तस्य कौरव,भरतनन्दन! कुरुकुलरत्न! महर्षि उत्तड़कका नाम बहुत प्रसिद्ध है। तात! मरुके रमणीय प्रदेशमें उनका आश्रम है

Wahai putra Bharata, permata wangsa Kuru! Di antara para maharṣi termasyhur seorang resi bernama Uttaṅka. Anakku, pertapaannya berada di hamparan indah wilayah gurun Maru-dhanvan.

Verse 12

उत्तड़कस्तु महाराज तपो5तप्यत्‌ सुदुश्चरम्‌ । आरिराधयिषुर्विष्णुं बहून्‌ वर्षमणान्‌ विभु:,महाराज! प्रभावशाली उत्तड़कने भगवान्‌ विष्णुकी आराधनाकी इच्छासे बहुत वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तपस्या की थी

Wahai Maharaja! Uttaṅka yang perkasa, demi meraih perkenan Dewa Viṣṇu, menjalani tapa yang amat berat selama bertahun-tahun lamanya.

Verse 13

तस्य प्रीत: स भगवान्‌ साक्षाद्‌ दर्शनमेयिवान्‌ | दृष्टवैव चर्षि: प्रह्वस्तं तुष्टाव विविधै: स्तवै:,उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवानने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उनका दर्शन पाते ही महर्षि नम्नतासे झुक गये और नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करने लगे

Karena puas oleh tapanya, Sang Bhagavān sendiri menampakkan diri dan memberi darśana. Begitu melihat-Nya, sang maharṣi menunduk penuh takzim dan memuji-Nya dengan berbagai stotra.

Verse 14

उत्तडुक उवाच त्वया देव प्रजा: सर्वा: ससुरासुरमानवा: । स्थावराणि च भूतानि जड़मानि तथैव च,उत्तड़क बोले--देव! देवता, असुर, मनुष्य आदि सारी प्रजा आपसे ही उत्पन्न हुई है। समस्त स्थावर-जंगम प्राणियोंकी सृष्टि भी आपने ही की है

Uttaṅka berkata: “Wahai Dewa, seluruh makhluk—para dewa, asura, dan manusia—lahir melalui-Mu. Segala yang diam maupun bergerak, seluruh makhluk hidup, adalah ciptaan-Mu.”

Verse 15

ब्रह्म वेदाश्न वेद्यं च त्वया सृष्टं महाद्युते । शिरस्ते गगन देव नेत्र शशिदिवाकरौ,महातेजस्वी परमेश्वर! ब्रह्मा, वेद और जाननेयोग्य सभी वस्तुएँ आपने ही उत्पन्न की हैं। देव! आकाश आपका मस्तक है। चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं। वायु श्वास है तथा अग्नि आपका तेज है। अच्युत! सम्पूर्ण दिशाएँ आपकी भुजाएँ और महासागर आपका कुक्षिस्थान है। देव! मधुसूदन! पर्वत आपके ऊरु और अन्तरिक्ष-लोक आपकी नाभि है। पृथ्वीदेवी आपके चरण तथा ओषधियाँ रोएँ हैं

Wahai Tuhan yang bercahaya agung! Engkaulah yang menciptakan Brahmā, Weda, dan segala yang dapat diketahui. Wahai Dewa, langit adalah kepala-Mu; bulan dan matahari adalah mata-Mu.

Verse 16

निःश्वास: पवनश्चापि तेजोडग्निश्व तवाच्युत । बाहवस्ते दिश: सर्वा: कुक्षिश्नापि महार्णव:,महातेजस्वी परमेश्वर! ब्रह्मा, वेद और जाननेयोग्य सभी वस्तुएँ आपने ही उत्पन्न की हैं। देव! आकाश आपका मस्तक है। चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं। वायु श्वास है तथा अग्नि आपका तेज है। अच्युत! सम्पूर्ण दिशाएँ आपकी भुजाएँ और महासागर आपका कुक्षिस्थान है। देव! मधुसूदन! पर्वत आपके ऊरु और अन्तरिक्ष-लोक आपकी नाभि है। पृथ्वीदेवी आपके चरण तथा ओषधियाँ रोएँ हैं

Uttanka berkata: “Wahai Acyuta, napas-Mu adalah angin; sinar-keagungan-Mu adalah api. Segala penjuru adalah lengan-Mu, dan samudra raya adalah perut-Mu. Wahai Tuhan Mahabercahaya, Penguasa Tertinggi—Brahmā, Weda, dan segala yang dapat diketahui, semuanya Engkau-lah yang melahirkannya. Wahai Dewa, langit adalah kepala-Mu; bulan dan matahari adalah mata-Mu. Gunung-gunung adalah paha-Mu dan ruang antara adalah pusar-Mu. Dewi Bumi adalah kaki-Mu, dan tumbuh-tumbuhan obat adalah rambut pada tubuh-Mu.”

Verse 17

ऊरू ते पर्वता देव खं नाभिममधुसूदन । पादौ ते पृथिवी देवी रोमाण्योषधयस्तथा,महातेजस्वी परमेश्वर! ब्रह्मा, वेद और जाननेयोग्य सभी वस्तुएँ आपने ही उत्पन्न की हैं। देव! आकाश आपका मस्तक है। चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं। वायु श्वास है तथा अग्नि आपका तेज है। अच्युत! सम्पूर्ण दिशाएँ आपकी भुजाएँ और महासागर आपका कुक्षिस्थान है। देव! मधुसूदन! पर्वत आपके ऊरु और अन्तरिक्ष-लोक आपकी नाभि है। पृथ्वीदेवी आपके चरण तथा ओषधियाँ रोएँ हैं

Uttanka berkata: “Wahai Dewa, wahai Madhusūdana—paha-Mu adalah gunung-gunung, dan ruang antara adalah pusar-Mu. Dewi Bumi adalah kaki-Mu, dan tumbuh-tumbuhan obat adalah rambut pada tubuh-Mu. Wahai Tuhan Mahabercahaya, Penguasa Tertinggi: Brahmā, Weda, dan segala yang dapat diketahui, semuanya Engkau-lah yang melahirkannya. Langit adalah kepala-Mu; bulan dan matahari adalah mata-Mu; angin adalah napas-Mu, dan api adalah kemegahan-Mu. Wahai Acyuta, segala penjuru adalah lengan-Mu, dan samudra raya adalah perut-Mu.”

Verse 18

इन्द्रसोमाग्निवरुणा देवासुरमहोरगा: । प्रह्दास्त्वामुपतिष्ठन्ति स्तुवन्तो विविध: स्तवै:,भगवन! इन्द्र, सोम, अग्नि, वरुण देवता, असुर और बड़े-बड़े नाग--ये सब आपके सामने नतमस्तक हो नाना प्रकारके स्तोत्र पढ़कर आपकी स्तुति करते हुए आपको हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं

Wahai Bhagavān! Indra, Soma, Agni, Varuṇa—para dewa itu; juga para asura dan nāga perkasa—bersama Prahlāda dan yang lainnya—datang menghadap-Mu, memuji-Mu dengan beragam kidung pujian.

Verse 19

त्वया व्याप्तानि सर्वाणि भूतानि भुवनेश्वर । योगिन: सुमहावीर्या: स्तुवन्ति त्वां महर्षय:,भुवनेश्वर! आपने सम्पूर्ण भूतोंको व्याप्त कर रखा है। महान्‌ शक्तिशाली योगी और महर्षि आपका स्तवन करते हैं

Uttanka berkata: “Wahai Penguasa jagat, seluruh makhluk di alam semesta ini Engkau-lah yang meresapi. Para yogin yang perkasa dan para resi agung memuji-Mu.”

Verse 20

त्वयि तुष्टे जगत्‌ स्वास्थ्यं त्वयि क्रुद्धे महद्‌ भयम्‌ । भयानामपनेतासि त्वमेक: पुरुषोत्तम,पुरुषोत्तम! आपके संतुष्ट होनेपर ही संसार स्वस्थ एवं सुखी होता है और आपके कुपित होनेपर इसे महान्‌ भयका सामना करना पड़ता है। एकमात्र आप ही सम्पूर्ण भयका निवारण करनेवाले हैं

Uttanka berkata: “Wahai Purushottama, bila Engkau berkenan, dunia menjadi utuh—sehat, teguh, dan tenteram; bila Engkau murka, ia diliputi ketakutan besar. Engkau seoranglah penghapus segala ketakutan.”

Verse 21

देवानां मानुषाणां च सर्वभूतसुखावह: । त्रिभिविक्रमणैर्देव त्रयो लोकास्त्वया हृता:,देव! आप देवताओं, मनुष्यों तथा सम्पूर्ण भूतोंको सुख पहुँचानेवाले हैं। आपने तीन पगोंद्वारा ही (बलिके हाथसे) तीनों लोक (दानद्वारा) हरण कर लिये थे

Uttanka berkata: “Wahai Dewa, engkau pembawa kebahagiaan bagi para dewa, manusia, dan segenap makhluk. Dengan hanya tiga langkah—berlandaskan dana (pemberian) Bali—engkau pernah mengambil alih tiga dunia.”

Verse 22

असुराणां समृद्धानां विनाशश्व त्वया कृत: । तव विक्रमणैदेवा निर्वाणमगमन्‌ परम्‌,आपने समृद्धिशाली असुरोंका संहार किया है। आपके ही पराक्रमसे देवता परम सुख- शान्तिके भागी हुए हैं

Engkau telah membinasakan para Asura yang makmur. Oleh daya keberanianmu, para dewa mencapai kedamaian tertinggi—bebas dari gentar dan tegak kembali dalam tatanan yang semestinya.

Verse 23

पराभूताश्र दैत्येन्द्रास्त्वयि क्रुद्धे महाद्युते | त्वं हि कर्ता विकर्ता च भूतानामिह सर्वश:

Wahai Yang Mahabercahaya, bila engkau murka, para raja Daitya pun ditundukkan. Sebab di dunia ini engkaulah, dalam segala cara, pencipta sekaligus pemusnah semua makhluk.

Verse 24

एवं स्तुतो हृषीकेश उत्तड़केन महात्मना

Demikianlah, setelah dipuji oleh Uttanka yang berhati luhur, Hṛṣīkeśa (Kṛṣṇa) menerima kidung bhakti itu.

Verse 25

उत्तड्ुक उवाच पर्याप्तो मे वरो होष यदहं दृष्टवान्‌ हरिम्‌

Uttanka berkata: “Wahai Hōṣa, anugerah itu sudah cukup bagiku, sebab aku telah memandang Hari.”

Verse 26

विष्णुरुवाच प्रीतस्तेडहमलौल्येन भकक्‍त्या तव च सत्तम

Viṣṇu bersabda: “Wahai yang terbaik di antara orang-orang berbudi, Aku berkenan kepadamu—oleh karena engkau bebas dari ketamakan dan karena baktimu.”

Verse 27

मार्कण्डेय उवाच एवं स छन्‍्द्यमानस्तु वरेण हरिणा तदा

Mārkaṇḍeya bersabda: “Demikianlah pada saat itu ia—terdorong dan terperdaya oleh anugerah yang ditawarkan sang rusa—tertarik maju, tekadnya dibentuk oleh bujukan ganjaran yang dijanjikan.”

Verse 28

यदि मे भगवन्‌ प्रीत: पुण्डरीकनिभेक्षण,“भगवन्‌! कमलनयन! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मेरी बुद्धि सदा धर्म, सत्य और इन्द्रियनिग्रहमें लगी रहे। मेरे स्वामी! आपके भजनका मेरा अभ्यास सदा बना रहे"

Mārkaṇḍeya bersabda: “Wahai Bhagavān, Yang Bermata Teratai—jika Engkau berkenan kepadaku, maka biarlah pengertianku senantiasa teguh pada dharma dan kebenaran, serta pada pengekangan indria. Wahai Tuhanku, semoga laku bhajan dan ingatanku kepada-Mu tak pernah terputus.”

Verse 29

धर्मे सत्ये दमे चैव बुद्धिर्भवतु मे सदा । अभ्यासश्न भवेद्‌ भक्त्या त्वयि नित्यं ममेश्वर,“भगवन्‌! कमलनयन! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मेरी बुद्धि सदा धर्म, सत्य और इन्द्रियनिग्रहमें लगी रहे। मेरे स्वामी! आपके भजनका मेरा अभ्यास सदा बना रहे"

Semoga pengertianku senantiasa teguh pada dharma, kebenaran, dan pengendalian diri; dan wahai Tuhanku, semoga laku pemujaanku kepada-Mu, dengan bhakti, berlangsung tanpa henti.

Verse 30

श्रीभगवानुवाच सर्वमेतद्धि भविता मत्प्रसादात्‌ तव द्विज । प्रतिभास्यति योगश्न येन युक्तो दिवौकसाम्‌

Sang Bhagavān bersabda: “Semua itu sungguh akan terjadi bagimu, wahai brahmana, oleh anugerah-Ku. Dan laku yoga itu pun akan menjadi terang bagimu—dengan itu, bila engkau diperlengkapi olehnya, engkau akan mencapai keadaan para dewa.”

Verse 31

उत्सादनार्थ लोकानां धुन्धुर्नाम महासुर:

Mārkaṇḍeya berkata: “Untuk membinasakan dunia-dunia, ada seorang asura perkasa bernama Dhundhu.”

Verse 32

राजा हि वीर्यवांस्तात इक्ष्वाकुरपराजित:,तात! इक्ष्वाकुकुलमें बृहदश्व नामसे प्रसिद्ध एक महापराक्रमी और किसीसे पराजित न होनेवाले राजा उत्पन्न होंगे। उनका पवित्र और जितेन्द्रिय पुत्र कुवलाश्वके नामसे विख्यात होगा

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai anakku, dalam wangsa Ikṣvāku akan lahir seorang raja bernama Bṛhadaśva—termashyur karena keberanian besar dan tak terkalahkan oleh musuh mana pun. Putranya, suci perilakunya dan menguasai indria, akan dikenal dengan nama Kuvalāśva.”

Verse 33

बृहदश्च इति ख्यातो भविष्यति महीपति: । तस्य पुत्र: शुचिर्दान्त: कुवलाश्व इति श्रुतः,तात! इक्ष्वाकुकुलमें बृहदश्व नामसे प्रसिद्ध एक महापराक्रमी और किसीसे पराजित न होनेवाले राजा उत्पन्न होंगे। उनका पवित्र और जितेन्द्रिय पुत्र कुवलाश्वके नामसे विख्यात होगा

Seorang raja akan termasyhur dengan nama Bṛhadaśva. Putranya, suci dan mampu mengekang indria, akan dikenal sebagai Kuvalāśva.

Verse 34

स योगबलमास्थाय मामकं पार्थिवोत्तम: । शासनात्‌ तव विद्रर्षे धुन्धुमारो भविष्यति । एवमुक्‍त्वा तु त॑ विप्रं विष्णुरन्तरधीयत,ब्रह्मर्षे! तुम्हारे आदेशसे वे नृपश्रेष्ठ कुवलाश्व ही मेरे योगबलका आश्रय लेकर धुन्धु राक्षसका वध करेंगे और लोकमें धुन्धुमार नामसे विख्यात होंगे। उत्तड़कसे ऐसा कहकर भगवान्‌ विष्णु अन्तर्धान हो गये

“Wahai brahmarsi, raja utama itu akan berlindung pada kekuatan yogaku; atas perintahmu ia akan membunuh raksasa Dhundhu dan di dunia termasyhur dengan nama ‘Dhundhumāra’.” Setelah berkata demikian kepada sang resi, Bhagavān Viṣṇu pun lenyap dari pandangan.

Verse 200

इस प्रकार श्रीमह्या भारत वनप्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें दानमाहात्म्यविषयक दो सौवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-200 Vana Parva dalam Śrī Mahābhārata, pada bagian Markandeya-samāsya, yang membahas kemuliaan dāna (derma).

Verse 233

आराधयित्वा त्वां देवा: सुखमेधन्ति सर्वश: । महाद्युते! आपके रुष्ट होनेसे ही दैत्यराज देवताओंके सामने पराजित हो जाते हैं। आप इस जगतके सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि तथा संहार करनेवाले हैं। प्रभो! आपकी आराधना करके ही सम्पूर्ण देवता सुख एवं समृद्धि-लाभ करते हैं

Wahai Yang Bercahaya Agung! Dengan memuja-Mu, para dewa memperoleh kebahagiaan dan kemakmuran di segala penjuru. Bila Engkau murka, raja-raja asura pun kalah di hadapan para dewa. Engkaulah pencipta dan pemusnah seluruh makhluk di jagat raya ini. Wahai Tuhan, melalui pemujaan kepada-Mu sajalah para dewa meraih sukacita dan kesejahteraan.

Verse 243

उत्तड़कमब्रवीद्‌ विष्णु: प्रीतस्ते5हं वरं वृणु । महात्मा उत्तड़कके इस प्रकार स्तुति करनेपर सम्पूर्ण इन्द्रियोंके प्रेरक भगवान्‌ विष्णुने उनसे कहा--'सहर्ष! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई वर माँगो”

Ketika Uttaḍaka memuji demikian, Bhagavān Viṣṇu—penggerak segala indra—berkata kepadanya: “Dengan sukacita kukatakan, Aku sangat berkenan kepadamu. Mintalah suatu anugerah.”

Verse 253

पुरुष शाश्व॒तं दिव्यं स्रष्टारं जगत: प्रभुम्‌ । उत्तड़कने कहा--भगवन्‌! समस्त संसारकी सृष्टि करनेवाले दिव्य सनातन पुरुष आप सर्वशक्तिमान्‌ श्रीहरिका जो मुझे दर्शन मिला, यही मेरे लिये सबसे महान्‌ वर है

Uttaḍaka berkata: “Wahai Bhagavān—Pribadi Ilahi yang kekal, Pencipta seluruh jagat dan Penguasa tertinggi—wahai Śrī Hari Yang Mahakuasa! Darśana-Mu yang kini kuperoleh inilah anugerah terbesar bagiku.”

Verse 266

अवश्यं हि त्वया ब्रह्मन्‌ मत्तो ग्राह्मो वरो द्विज । भगवान्‌ विष्णु बोले--सज्जनशिरोमणे! मैं तुम्हारी लोभशून्यता एवं उत्तम भक्तिसे तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। ब्रह्मन! तुम्हें मुझसे कोई वर अवश्य लेना चाहिये

Bhagavān Viṣṇu bersabda: “Wahai permata mahkota di antara orang saleh! Aku sangat berkenan karena engkau bebas dari loba dan memiliki bhakti yang luhur. Maka, wahai Brahmana, mintalah dengan pasti suatu anugerah dariku.”

Verse 303

त्रयाणामपि लोकानां महत्‌ कार्य करिष्यसि । श्रीभगवान्‌ बोले--ब्रह्मन! मेरी कृपासे यह सब कुछ तुम्हें प्राप्त हो जायगा। इसके सिवा तुम्हारे हृदयमें उस योगविद्याका प्रकाश होगा जिससे युक्त होकर तुम देवताओं तथा तीनों लोकोंका महान्‌ कार्य सिद्ध कर सकोगे

Bhagavān bersabda: “Wahai Brahmana, oleh anugerah-Ku semua itu akan engkau peroleh. Lagi pula, di dalam hatimu akan menyala terang yoga-vidyā; dengan terang itu engkau akan menuntaskan karya agung bagi para dewa dan bagi ketiga dunia.”

Verse 313

तपस्यति तपो घोरं शृणु यस्तं हनिष्यति । विप्रवर! धुन्धु नामसे प्रसिद्ध एक महान्‌ असुर है, जो तीनों लोकोंका संहार करनेके लिये घोर तपस्या कर रहा है। जो वीर उस महान्‌ असुरका वध करेगा, उसका परिचय देता हूँ, सुनो

Mārkaṇḍeya berkata: “Ia sedang menjalankan tapa yang mengerikan—dengarkan, siapa yang akan menewaskannya. Wahai brahmana terbaik, ada seorang asura perkasa, termasyhur dengan nama Dhundhu, yang melakukan pertapaan berat demi memusnahkan tiga dunia. Dengarkan: akan kukatakan jati diri sang pahlawan yang akan membinasakan raksasa besar itu.”

Verse 2031

इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने एकाधिकद्विशततमो<ध्याय:

Demikianlah, dalam Mahābhārata yang mulia, pada Vana Parva—dalam bagian yang berkaitan dengan Mārkaṇḍeya—pada kisah Dhundhumāra, berakhirlah bab ke-202.

Verse 2736

उत्तड़क: प्राञ्जलियरतव्रे वरं भरतसत्तम । मार्कण्डेयजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ इस प्रकार भगवान्‌ विष्णुके द्वारा वर लेनेके लिये आग्रह होनेपर उत्तड्कने हाथ जोड़कर इस प्रकार वर माँगा

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, ketika Bhagavān Viṣṇu mendesak Uttanka agar memilih sebuah anugerah, Uttanka—dengan kedua tangan terkatup penuh hormat—memohon anugerah demikian.”

Frequently Asked Questions

The risk is cognitive and ethical drift: when mind follows roaming senses, discernment is ‘carried away,’ producing error and harmful outcomes; disciplined restraint is prescribed as prevention.

Cosmology and ethics are linked: understanding element-qualities and the manifest/unmanifest distinction supports a practice of indriya-dhāraṇa, presented as the operative basis of tapas and stable well-being.

A direct phalaśruti formula is not stated; however, the chapter explicitly frames a result: regulated senses lead to siddhi-like stability and ‘dhyānaja phala’ (a meditation-born outcome), while unregulated engagement leads to doṣa (fault) and suffering.