Adhyaya 186
Vana ParvaAdhyaya 18639 Verses

Adhyaya 186

Yugapramāṇa–Kaliyuga-lakṣaṇa–Pralaya-kathā (Markandeya’s Account of Yugas, Kali Signs, and Dissolution)

Upa-parva: Mārkaṇḍeya–Yugānta–Pralaya Saṃvāda (Discourse on Yugas and Dissolution)

Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira respectfully questions the renowned sage Mārkaṇḍeya, praising his extraordinary longevity and his proximity to Brahmā during cosmic dissolution. Mārkaṇḍeya begins by saluting the eternal Puruṣa (identified through Vaiṣṇava imagery) and outlines the canonical yuga measures: Kṛta (4,000 years) with sandhyā and sandhyāṃśa (each 400), Tretā (3,000) with 300+300, Dvāpara (2,000) with 200+200, and Kali (1,000) with 100+100—forming the 12,000-year cycle (dvādaśasāhasrī). He then describes late-Kali societal inversions and degradations as precursors of dissolution. The pralaya sequence follows: prolonged drought, seven suns drying waters, the saṃvartaka fire and winds consuming realms, then immense clouds flooding the earth for twelve years. In the one-ocean state, Mārkaṇḍeya wanders alone until he sees a divine child on a vast nyagrodha; invited, he enters the child’s mouth and beholds the entire cosmos within the divine body, later emerging and questioning the meaning of this māyā as the deity responds soothingly.

Chapter Arc: मार्कण्डेय ऋषि ब्राह्मण-धर्म की महिमा का प्रसंग उठाते हैं—और बताते हैं कि महात्मा अत्रि धन-प्राप्ति के हेतु एक असाधारण मार्ग चुनते हैं, जिससे धर्म का सूक्ष्म अर्थ प्रकट हो। → अत्रि वन में तप के लिए जाने का निश्चय करते हैं और पत्नी तथा पुत्रों से विचार-विमर्श करते हैं। गृहस्थ-धर्म, अर्थ-प्राप्ति और तपस्या—इन तीनों के बीच उचित मार्ग को लेकर मतभेद/उपदेश का तीखापन उभरता है; ‘तुम परम धर्म नहीं जानते’ जैसे वाक्य (V18) से तनाव तीव्र होता है। → संशय-च्छेदन के लिए सनत्कुमार का आवाहन/उपदेश (V24) और राजधर्म का तेजस्वी प्रतिमान—‘जैसे सूर्य तम का नाश करता है, वैसे राजा अधर्म का’ (V30)—इन वचनों से धर्म का निर्णायक स्वरूप स्पष्ट होता है: ब्राह्मण-धर्म, राजधर्म और यज्ञ-धर्म परस्पर पूरक हैं। → उपदेश से मार्ग निश्चित होता है। अत्रि शीघ्र वैन्य के यज्ञ में जाते हैं, यज्ञायतन में पहुँचकर राजा की स्तुति करते हैं और मंगल-वचनों से सम्मानपूर्वक अर्थ/दान का याचना-प्रसंग साधते हैं (V123)। → अत्रि के स्तवन के बाद यज्ञ-सभा में दान/प्रतिदान और धर्म-प्रतिष्ठा का परिणाम आगे के प्रसंग की ओर संकेत करता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६३ “लोक मिलाकर कुल २४३ श्लोक हैं) गदर #< (9) #::.# #2 5-7 पज्चाशीर्त्याधिकशततमो< ध्याय: ब्राह्मगकी महिमाके विषयमें अत्रिमुनि तथा राजा पृथुकी प्रशंसा मार्कण्डेय उवाच भूय एव महाभाग्यं ब्राह्मणानां निबोध मे । वैन्यो नामेह राजर्षिरश्वमेधाय दीक्षित:,मार्कण्डेयजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणोंका और भी माहात्म्य मुझसे सुनो। पूर्वकालमें वेनके पुत्र राजर्षि पृथुने, जो यहाँ वैन्यके नामसे प्रसिद्ध थे, किसी समय अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा ली

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai raja mulia, dengarkan lagi dariku kemuliaan dan keberuntungan agung para brāhmaṇa. Pada masa lampau, resi-raja Pṛthu—putra Vena, termasyhur di sini dengan nama Vainya—mengambil dikṣā untuk upacara Aśvamedha.”

Verse 2

तमत्रिर्गन्तुमारेभे वित्तार्थमिति नः श्रुतम्‌ । भूयो<र्थ नानुरुध्यत्‌ स धर्मव्यक्तिनिदर्शनात्‌,उन दिनों महात्मा अत्रिने धन माँगनेकी इच्छासे उनके पास जानेका विचार किया, यह बात हमारे सुननेमें आयी है; परंतु ऐसा करनेसे उनको अपना धर्मात्मापन प्रकट करना पड़ता। इसलिये फिर उन्होंने धनके लिये अनुरोध नहीं किया

Kami mendengar bahwa resi Atri bersiap pergi kepadanya dengan maksud memperoleh harta. Namun, karena permintaan semacam itu akan tampak sebagai pertunjukan kebajikannya sendiri, ia tidak mendesak lagi untuk meminta kekayaan.

Verse 3

स विचिन्त्य महातेजा वनमेवान्वरोचयत्‌ | धर्मपत्नीं समाहूय पुत्रांश्रेदमुवाच ह,महातेजस्वी अत्रिने मन-ही-मन कुछ सोच-विचारकर (तपस्याके लिये) वनमें ही जानेका निश्चय किया और अपनी धर्मपत्नी तथा पुत्रोंको बुलाकर इस प्रकार कहा --

Setelah merenung, sang bercahaya perkasa itu memilih hutan semata sebagai jalan hidupnya (untuk tapa). Ia memanggil istri yang sah dan putra-putranya, lalu berkata kepada mereka demikian.

Verse 4

प्राप्स्पयाम: फलमत्यन्तं बहुलं निरुपद्रवम्‌ । अरण्यगमन्‌ क्षिप्रं रोचतां वो गुणाधिकम्‌,“हमलोग वनमें रहकर (तपद्दारा) धर्मका बहुत अधिक उपद्रवशून्य फल पा सकते हैं। अतः शीघ्र वनमें चलनेका विचार तुम सब लोगोंको रुचिकर होना चाहिये; क्योंकि ग्राम्य- जीवनकी अपेक्षा वनमें रहना अधिक लाभप्रद है”

“Dengan tinggal di hutan dan menjalankan tapa, kita akan memperoleh buah dharma yang amat luhur—melimpah dan bebas dari gangguan. Karena itu, hendaklah gagasan untuk segera pergi ke hutan menyenangkan bagi kalian semua; sebab hidup di rimba lebih berfaedah daripada hidup yang terikat pada desa.”

Verse 5

त॑ भार्या प्रत्युवाचाथ धर्ममेवानुतन्वती । वैन्यं गत्वा महात्मानमर्थयस्व धनं बहु,अत्रिकी पत्नी भी धर्मका ही अनुसरण करनेवाली थी। उसने यज्ञ-यागादिके रूपमें धर्मके ही विस्तारपर दृष्टि रखकर पतिको उत्तर दिया--'प्राणनाथ! आप धर्मात्मा राजा वैन्यके पास जाकर अधिक धनकी याचना कीजिये

Lalu istrinya—yang senantiasa bertekad menegakkan dan meluaskan dharma—menjawab: “Pergilah kepada Raja Vainya yang berhati luhur dan mohonlah kekayaan yang berlimpah.”

Verse 6

स ते दास्यति राजर्षियजमानोडर्थितो धनम्‌ । तत आदाय विष्रषषे प्रतिगृह्य धनं बहु,वे राजर्षि इन दिनों यज्ञ कर रहे हैं, अत: इस अवसरपर यदि आप उनसे माँगेंगे तो वे आपको अधिक धन देंगे। ब्रह्मर्ष! वहाँसे प्रचुर धन लाकर भरण-पोषण करनेयोग्य इन पुत्रोंको बाँट दीजिये; फिर इच्छानुसार वनको चलिये। धर्मज्ञ महात्माओंने यही परम धर्म बताया है!

Mārkaṇḍeya berkata: “Sang resi-raja itu kini bertindak sebagai yajamāna dalam yajña; bila diminta, ia akan memberimu harta. Maka, wahai brahmarṣi, terimalah kekayaan yang berlimpah darinya; bawalah pulang, bagikan kepada putra-putramu yang patut dipelihara, lalu pergilah ke hutan sesuai kehendakmu. Para mahātma yang mengetahui dharma menyatakan inilah jalan kebajikan yang tertinggi.”

Verse 7

भृत्यान्‌ सुतान्‌ संविभज्य ततो व्रज यथेप्सितम्‌ । एष वै परमो धर्मों धर्मविद्धिरुदाहृत:,वे राजर्षि इन दिनों यज्ञ कर रहे हैं, अत: इस अवसरपर यदि आप उनसे माँगेंगे तो वे आपको अधिक धन देंगे। ब्रह्मर्ष! वहाँसे प्रचुर धन लाकर भरण-पोषण करनेयोग्य इन पुत्रोंको बाँट दीजिये; फिर इच्छानुसार वनको चलिये। धर्मज्ञ महात्माओंने यही परम धर्म बताया है!

“Setelah terlebih dahulu membagikan bagian yang semestinya kepada para pelayan dan putra-putramu, berangkatlah kemudian sesuai kehendakmu. Inilah dharma tertinggi, demikian dinyatakan para ahli dharma.”

Verse 8

अत्रिर॒वाच कथितो मे महाभागे गौतमेन महात्मना । वैन्यो धर्मार्थसंयुक्त: सत्यव्रतसमन्वित:,अत्रि बोले--महाभागे! महात्मा गौतमने मुझसे कहा है कि “वेनपुत्र राजा पृथु धर्म और अर्थके साधनमें संलग्न रहते हैं। वे सत्यव्रती हैं!

Atri berkata: “Wahai wanita mulia, Mahātma Gautama telah memberitahuku: Raja Pṛthu, putra Vena—yakni Vainya—senantiasa menempuh dharma dan artha, serta teguh dalam ikrar kebenaran.”

Verse 9

द्वेष्टार: किंतु नः सन्ति वसन्तस्तत्र वै द्विजा: | यथा मे गौतम: प्राह ततो न व्यवसाम्यहम्‌,परंतु एक बात विचारणीय है। वहाँ उनके यज्ञमें जितने ब्राह्मण रहते हैं, वे सभी मुझसे द्वेष रखते हैं, यही बात गौतमने भी कही है। इसीलिये मैं वहाँ जानेका विचार नहीं कर रहा हूँ

“Namun di sana ada para dvija yang memendam kebencian kepada kita—demikian kata Gautama kepadaku. Karena itu aku belum dapat menetapkan diri untuk pergi ke sana.”

Verse 10

तत्र सम वाचं कल्याणीं धर्मकामार्थसंहिताम्‌ । मयोक्तामन्यथा ब्रूयुस्ततस्ते वै निरर्थिकाम्‌,यदि मैं वहाँ जाकर धर्म, अर्थ और कामसे युता कल्याणमयी वाणी भी बोलूँगा तो वे उसे धर्म और अर्थके विपरीत ही बतायेंगे; निरर्थक सिद्ध करेंगे

Di sana, sekalipun aku mengucapkan ujaran yang seimbang dan membawa berkah—yang berlandaskan dharma, artha, dan kāma—mereka akan memelintirnya menjadi lain; dan dengan demikian, sungguh, mereka akan menjadikan ucapanku sia-sia dan tanpa daya.

Verse 11

गमिष्यामि महाप्राज्ञे रोचते मे वचस्तव । गाश्च मे दास्यते वैन्य: प्रभूतं चार्थसंचयम्‌,तथापि महाप्राज्ञे! मैं वहाँ अवश्य जाऊँगा, मुझे तुम्हारी बात ठीक जँचती है। राजा पृथु मुझे बहुत-सी गौएँ तो देंगे ही, पर्याप्त धन भी देंगे

Wahai mahāprājña, aku pasti akan pergi ke sana; kata-katamu berkenan di hatiku dan tampak tepat. Raja Vainya (Pṛthu) akan menganugerahkan kepadaku banyak sapi, dan juga timbunan kekayaan yang melimpah.

Verse 13

अत्रिर॒वाच राजन्‌ धन्यस्त्वमीशश्व भुवि त्वं प्रथमो नूप:,अत्रि बोले--राजन! तुम इस भूतलके सर्वप्रथम राजा हो; अतः धन्य हो, सब प्रकारके ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो

Atri berkata: “Wahai Raja, engkau sungguh diberkahi. Di bumi ini engkau adalah penguasa, yang terdepan di antara para raja; maka engkau beruntung dan dianugerahi segala macam kemakmuran serta kewibawaan.”

Verse 14

स्तुवन्ति त्वां मुनिगणास्त्वदन्यो नास्ति धर्मवित्‌ | तमब्रवीदृषि: क्रुद्धो वचनं वै महातपा:,महर्षिंगण तुम्हारी स्तुति करते हैं। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नरेश धर्मका ज्ञाता नहीं है। उनकी यह बात सुनकर महातपस्वी गौतम मुनिने कुपित होकर कहा

Para resi memujimu dan berkata bahwa selain engkau tiada seorang pun yang mengetahui dharma. Mendengar sanjungan itu, sang resi agung yang bertapa keras menjadi murka dan menyampaikan jawabannya.

Verse 15

गौतम उवाच मैवमत्रे पुनर्ब्रूया न ते प्रज्ञा समाहिता । अत्र नः प्रथमं स्थाता महेन्द्रो वै प्रजापति:,गौतम बोलें--अत्रे! फिर कभी ऐसी बात मुँहसे न निकालना। तुम्हारी बुद्धि एकाग्र नहीं है। यहाँ हमारे प्रथम प्रजापतिके रूपमें साक्षात्‌ इन्द्र उपस्थित हैं

Gautama berkata: “Atri, jangan sekali-kali engkau mengucapkan hal seperti itu lagi. Kebijaksanaanmu tidak terkumpul dan tidak mantap. Lihatlah, di sini di tengah kita berdiri Mahendra sendiri—Indra—sebagai Prajāpati yang utama.”

Verse 16

अथात्रिरपि राजेन्द्र गौतम॑ प्रत्यभाषत । अयमेव विधाता हि यथैवेन्द्र: प्रजापति: । त्वमेव मुहासे मोहाजन्न प्रज्ञानं तवास्ति ह,राजेन्द्र! तब अत्रिने भी गौतमको उत्तर देते हुए कहा--'मुने! ये पृथु ही विधाता हैं, ये ही प्रजापति इन्द्रके समान हैं। तुम्हीं मोहसे मोहित हो रहे हो; तुम्हें उत्तम बुद्धि नहीं प्राप्त है!

Lalu Atri pun berbicara kepada Gautama: “Wahai raja, Pṛthu inilah sesungguhnya Sang Penetap—laksana Indra, laksana Prajāpati. Tetapi engkaulah yang sedang diperdaya oleh kebingungan; kejernihan budi sejati tidak ada padamu.”

Verse 17

गौतम उवाच जानामि नाहं मुहयामि त्वमेवात्र विमुहते । स्तौषि त्वं दर्शनप्रेप्सू राजानं जनसंसदि,गौतम बोले--मैं नहीं मोहमें पड़ा हूँ, तुम्हीं यहाँ आकर मोहित हो रहे हो। मैं खूब समझता हूँ, तुम राजासे मिलनेकी इच्छा लेकर ही भरी सभामें स्वार्थवश उनकी स्तुति कर रहे हो

Gautama berkata: “Aku mengerti; aku tidak tersesat. Engkaulah yang, setelah datang ke sini, jatuh dalam kebingungan. Demi mengharap perjumpaan, engkau memuji raja di hadapan sidang rakyat—didorong kepentinganmu sendiri.”

Verse 18

न वेत्थ परमं धर्म न चावैषि प्रयोजनम्‌ । बालस्त्वमसि मूढश्न वृद्ध: केनापि हेतुना,उत्तम धर्मका तुम्हें बिलकुल ज्ञान नहीं है। तुम धर्मका प्रयोजन भी नहीं समझते हो। मेरी दृष्टिमें तुम मूढ हो, बालक हो; किसी विशेष कारणसे बूढ़े बने हुए हो अर्थात्‌ केवल अवस्थासे बूढ़े हो

Gautama berkata: “Engkau tidak mengetahui dharma yang tertinggi, dan tidak pula memahami tujuannya. Dalam pandanganku engkau bodoh—masih seperti anak; engkau menjadi ‘tua’ hanya karena suatu sebab kebetulan, tua semata dalam tahun, bukan dalam kebijaksanaan.”

Verse 19

विवदन्तौ तथा तौ तु मुनीनां दर्शने स्थितौ । ये तस्य यज्ञे संवृत्तास्तेडपृच्छन्त कथं त्विमौ,मुनियोंके सामने खड़े होकर जब वे दोनों इस प्रकार विवाद कर रहे थे, उस समय उन्हें देखकर जिनका यज्ञमें पहलेसे वरण हो चुका था, वे ब्राह्मण पूछने लगे--'ये दोनों कैसे लड़ रहे हैं?

Ketika keduanya berdiri di hadapan para resi dan berdebat demikian, para brahmana yang telah lebih dahulu ditetapkan untuk yajña itu mulai bertanya: “Mengapa dua orang ini bertengkar seperti ini?”

Verse 20

प्रवेश: केन दत्तो5यमुभयोर्वैन्यसंसदि । उच्चै: समभिभाषन्तौ केन कार्येण घिष्ठितौ

“Siapa yang memberi orang ini izin masuk ke dalam sidang keturunan Vena? Dan untuk urusan apa keduanya datang ke sini, berbicara lantang dan bersikap begitu mendesak?”

Verse 21

ततः परमधर्मात्मा काश्यप: सर्वधर्मवित्‌ । विवादिनावनुप्राप्ती तावुभौ प्रत्यवेदयत्‌

Kemudian Kāśyapa—yang amat saleh dan sepenuhnya memahami dharma—begitu kedua pihak yang berselisih itu tiba, menegur keduanya dan membuka jalan bagi pemeriksaan yang adil serta penyelesaian yang dipandu dharma.

Verse 22

“किसने इन दोनोंको महाराज पृथुके यज्ञमण्डपमें घुसने दिया है? ये दोनों जोर-जोरसे बातें करते और झगड़ते यहाँ किस कामसे खड़े हैं? उस समय परम धर्मात्मा एवं सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता कणादने सब सदस्योंको बताया कि ये दोनों किसी विषयको लेकर परस्पर विवाद कर रहे हैं और उसीके निर्णयके लिये यहाँ आये हैं" ।। अथाब्रवीत्‌ सदस्यांस्तु गौतमो मुनिसत्तमान्‌ | आवयोव्यद्वितं प्रश्न शूणुत द्विजसत्तमा:,तब गौतमने सदस्यरूपसे बैठे हुए उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा--*श्रेष्ठ ब्राह्मणो! हम दोनोंके प्रश्षको आपलोग सुनें। अत्रिने राजा पृथुकी विधाता कहा है। इस बातको लेकर हम दोनोंमें महान्‌ संशय एवं विवाद उपस्थित हो गया है।” यह सुनकर वे महात्मा मुनि उक्त संशयका निवारण करनेके लिये तुरंत ही धर्मज्ञ सनत्कुमारजीके पास दौड़े गये। उन महातपस्वीने इनकी सब बातें यथार्थरूपसे सुनकर उनसे यह धर्म एवं अर्थयुक्त वचन कहा --

Lalu Gautama berbicara kepada para resi utama yang duduk sebagai anggota sidang: “Wahai Brahmana terbaik, dengarkan pertanyaan yang timbul di antara kami berdua. Atri menyatakan bahwa Raja Pṛthu adalah ‘Vidhātā’ (Sang Penetap/Pengatur). Karena hal ini, timbul keraguan besar dan perselisihan di antara kami.” Mendengar itu, para resi agung segera bergegas menemui Sanatkumāra, sang pemaham dharma, agar keraguan itu diputus. Setelah mendengar semuanya dengan saksama, sang pertapa agung menjawab dengan ujaran yang selaras dengan dharma dan pertimbangan yang tepat.

Verse 23

वैन्यं विधातेत्याहात्रिरत्र नौ संशयो महान्‌ | श्रुत्वैव तु महात्मानो मुनयो<शभ्यद्रवन्‌ द्रुतम्‌,तब गौतमने सदस्यरूपसे बैठे हुए उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा--*श्रेष्ठ ब्राह्मणो! हम दोनोंके प्रश्षको आपलोग सुनें। अत्रिने राजा पृथुकी विधाता कहा है। इस बातको लेकर हम दोनोंमें महान्‌ संशय एवं विवाद उपस्थित हो गया है।” यह सुनकर वे महात्मा मुनि उक्त संशयका निवारण करनेके लिये तुरंत ही धर्मज्ञ सनत्कुमारजीके पास दौड़े गये। उन महातपस्वीने इनकी सब बातें यथार्थरूपसे सुनकर उनसे यह धर्म एवं अर्थयुक्त वचन कहा --

Gautama berkata: “Atri menyatakan bahwa Vainya (Pṛthu) adalah ‘Vidhātṛ’. Inilah yang menimbulkan keraguan besar di antara kami berdua.” Mendengarnya, para resi agung segera bergegas pergi.

Verse 24

सनत्कुमारं धर्मज्ञ संशयच्छेदनाय वै | स च तेषां वच: श्रुत्वा यथातत्त्वं महातपा: । प्रत्युवाचाथ तानेवं धर्मार्थसहितं वच:,तब गौतमने सदस्यरूपसे बैठे हुए उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा--*श्रेष्ठ ब्राह्मणो! हम दोनोंके प्रश्षको आपलोग सुनें। अत्रिने राजा पृथुकी विधाता कहा है। इस बातको लेकर हम दोनोंमें महान्‌ संशय एवं विवाद उपस्थित हो गया है।” यह सुनकर वे महात्मा मुनि उक्त संशयका निवारण करनेके लिये तुरंत ही धर्मज्ञ सनत्कुमारजीके पास दौड़े गये। उन महातपस्वीने इनकी सब बातें यथार्थरूपसे सुनकर उनसे यह धर्म एवं अर्थयुक्त वचन कहा --

Untuk memutus keraguan, mereka mendatangi Sanatkumāra, sang pemaham dharma. Pertapa agung itu mendengar ucapan mereka sebagaimana adanya, lalu menjawab dengan pernyataan yang selaras dengan dharma dan kemaslahatan.

Verse 25

सनत्कुमार उवाच ब्रह्म क्षत्रेण सहित क्षत्रं च ब्रह्मणा सह । संयुक्तौ दहत: शत्रून्‌ वनानीवाग्निमारुती,सनत्कुमार बोले--ब्राह्मण क्षत्रियसे और क्षत्रिय ब्राह्मणसे संयुक्त हो जायेँ तो वे दोनों मिलकर शत्रुओंको उसी प्रकार दग्ध कर डालते हैं, जैसे अग्नि और वायु परस्पर सहयोगी होकर कितने ही वनोंको भस्म कर डालते हैं। राजा धर्मरूपसे विख्यात है। वही प्रजापति, इन्द्र, शुक्राचार्य, धाता और बृहस्पति भी है

Sanatkumāra berkata: “Bila wibawa rohani brahmana bersatu dengan kekuatan pemerintahan kṣatriya, dan kṣatriya pun berpaut pada brahmana, maka keduanya bersama-sama membakar musuh—laksana api dan angin yang bersekutu melalap rimba.”

Verse 26

राजा वै प्रथितो धर्म: प्रजानां पतिरेव च । स एव शक्र: शुक्रश्न स धाता च बृहस्पति:,सनत्कुमार बोले--ब्राह्मण क्षत्रियसे और क्षत्रिय ब्राह्मणसे संयुक्त हो जायेँ तो वे दोनों मिलकर शत्रुओंको उसी प्रकार दग्ध कर डालते हैं, जैसे अग्नि और वायु परस्पर सहयोगी होकर कितने ही वनोंको भस्म कर डालते हैं। राजा धर्मरूपसे विख्यात है। वही प्रजापति, इन्द्र, शुक्राचार्य, धाता और बृहस्पति भी है

Sanatkumāra bersabda: “Raja termasyhur sebagai Dharma itu sendiri; dialah tuan dan pelindung sejati bagi rakyat. Dalam dirinya terhimpun daya Prajāpati, Śakra (Indra), Śukra, Dhātā, dan Bṛhaspati.”

Verse 27

प्रजापतिर्विराट्‌ सम्राट्‌ क्षत्रियो भूपतिर्नप: । य एशि: स्तूयते शब्दै: कस्तं नार्चितुमहति,जिस राजाकी प्रजापति, विराट, सम्राट, क्षत्रिय, भूषपति, नृप आदि शब्दोंद्वारा स्तुति की जाती है, उसकी पूजा कौन नहीं करेगा? पुरायोनि (प्रथम कारण), युधाजित्‌ (संग्रामविजयी), अभिया (रक्षाके लिये सर्वत्र गमन करनेवाला), मुदित (प्रसन्न), भव (ईश्वर), स्वर्णेता (स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला), सहजित्‌ (तत्काल विजय करनेवाला) तथा बश्रु (विष्णु)--इन नामोंद्वारा राजाका वर्णन किया जाता है। राजा सत्यका कारण, प्राचीन बातोंको जाननेवाला तथा सत्यधर्ममें प्रवृत्ति करानेवाला है। अधर्मसे डरे हुए ऋषियोंने अपना ब्राह्मबल भी क्षत्रियोंमें स्थापित कर दिया था

Sanatkumāra bersabda: “Raja itu dipuji dengan gelar ‘Prajāpati’, ‘Virāṭ’, ‘Samrāṭ’, ‘Kṣatriya’, ‘Bhūpati’, dan ‘Nṛpa’. Siapakah yang tidak akan memandangnya layak dihormati?”

Verse 28

पुरायोनिर्युधाजिच्च अभिया मुदितो भव: । स्वर्णेता सहजिद्‌ बश्रुरिति राजाभिधीयते,जिस राजाकी प्रजापति, विराट, सम्राट, क्षत्रिय, भूषपति, नृप आदि शब्दोंद्वारा स्तुति की जाती है, उसकी पूजा कौन नहीं करेगा? पुरायोनि (प्रथम कारण), युधाजित्‌ (संग्रामविजयी), अभिया (रक्षाके लिये सर्वत्र गमन करनेवाला), मुदित (प्रसन्न), भव (ईश्वर), स्वर्णेता (स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला), सहजित्‌ (तत्काल विजय करनेवाला) तथा बश्रु (विष्णु)--इन नामोंद्वारा राजाका वर्णन किया जाता है। राजा सत्यका कारण, प्राचीन बातोंको जाननेवाला तथा सत्यधर्ममें प्रवृत्ति करानेवाला है। अधर्मसे डरे हुए ऋषियोंने अपना ब्राह्मबल भी क्षत्रियोंमें स्थापित कर दिया था

Sanatkumāra bersabda: “Raja juga disebut dengan nama-nama luhur: ‘Purāyoni’ (Sumber Purba), ‘Yudhājit’ (Penakluk perang), ‘Abhiyā’ (pelindung yang bergerak ke segala arah), ‘Mudita’ (yang bersukacita), ‘Bhava’ (Tuan), ‘Svarṇetā’ (penganugerahi surga), ‘Sahajit’ (penakluk seketika), dan ‘Baśru’ (Viṣṇu).”

Verse 29

सत्ययोनि: पुराविच्च सत्यधर्मप्रवर्तक: । अधमददृषयो भीता बल क्षत्रे समादधन्‌,जिस राजाकी प्रजापति, विराट, सम्राट, क्षत्रिय, भूषपति, नृप आदि शब्दोंद्वारा स्तुति की जाती है, उसकी पूजा कौन नहीं करेगा? पुरायोनि (प्रथम कारण), युधाजित्‌ (संग्रामविजयी), अभिया (रक्षाके लिये सर्वत्र गमन करनेवाला), मुदित (प्रसन्न), भव (ईश्वर), स्वर्णेता (स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला), सहजित्‌ (तत्काल विजय करनेवाला) तथा बश्रु (विष्णु)--इन नामोंद्वारा राजाका वर्णन किया जाता है। राजा सत्यका कारण, प्राचीन बातोंको जाननेवाला तथा सत्यधर्ममें प्रवृत्ति करानेवाला है। अधर्मसे डरे हुए ऋषियोंने अपना ब्राह्मबल भी क्षत्रियोंमें स्थापित कर दिया था

Sanatkumāra bersabda: “Raja adalah sumber kebenaran, mengetahui adat purba, dan menggerakkan laku dharma yang berlandas kebenaran. Para resi, gentar melihat adharma, bahkan menempatkan daya brahmana mereka pada tatanan kṣatriya.”

Verse 30

आदित्यो दिवि देवेषु तमो नुदति तेजसा । तथैव नृपतिर्भूमावधर्मनुदते भूशम्‌,जैसे देवलोकमें सूर्य अपने तेजसे सम्पूर्ण अन्धकारका नाश करता है, उसी प्रकार राजा इस पृथ्वीपर रहकर अधर्मोंको सर्वथा हटा देता है

Sanatkumāra bersabda: “Sebagaimana Āditya (Surya) di surga menghalau kegelapan dengan sinarnya, demikian pula nṛpati di bumi dengan tegas menyingkirkan adharma.”

Verse 31

ततो राज्ञ: प्रधानत्वं शास्त्रप्रामाण्यदर्शनात्‌ । उत्तर: सिद्धयते पक्षो येन राजेति भाषितम्‌,अतः शास्त्र-प्रमाणपर दृष्टिपात करनेसे राजाकी प्रधानता सूचित होती है। इसलिये जिसने राजाको प्रजापति बतलाया है, उसीका पक्ष उत्कृष्ट सिद्ध होता है

Maka, ketika kewibawaan śāstra tampak nyata, keutamaan sang raja pun ditegakkan. Karena itu, pandangan yang lebih kuat terbukti ialah pendirian orang yang menyatakan, “dialah yang disebut raja.”

Verse 32

मार्कण्डेय उवाच ततः स राजा संहृष्ट: सिद्धे पक्षे महामना: । तमत्रिमब्रवीत्‌ प्रीत: पूर्व येनाभिसंस्तुत:

Mārkaṇḍeya berkata: Lalu sang raja, bersukacita dan berhati luhur karena perkaranya telah terbukti, berbicara dengan penuh kasih kepada Atri—resilah yang dahulu memuji dan menyanjungnya.

Verse 33

यस्मात्‌ पूर्व मनुष्येषु ज्यायांसं मामिहाब्रवी: । सर्वदेवैश्व विप्रर्षे सम्मितं श्रेष्ठमेव च

“Sebab dahulu, di antara manusia, engkau menyapaku di sini sebagai yang lebih tua dan lebih unggul; dan wahai resi brahmana, engkau pun menyatakan bahwa aku disetujui oleh semua dewa dan sungguh yang terbaik.”

Verse 34

तस्मात्‌ तेऊहं प्रदास्यामि विविध वसु भूरि च । दासीसहसं श्यामानां सुवस्त्राणामलंकृतम्‌

“Karena itu akan kuanugerahkan kepadamu harta yang berlimpah dan beraneka ragam; juga seribu dayang—berkulit gelap, berpakaian indah, dan berhias perhiasan.”

Verse 35

दशकोटीर्हिरिण्यस्य रुक्मभारांस्तथा दश । एतद्‌ ददामि वितप्रर्षे सर्वज्ञस्त्वं मतो हि मे

Mārkaṇḍeya berkata: “Sepuluh krore emas, dan demikian pula sepuluh beban emas murni—semua ini kuberikan kepadamu, wahai resi Vitapa. Sebab menurut penilaianku engkau sungguh mahatahu.”

Verse 36

३२--३५ ।। तदत्रिन्यायतः सर्व प्रतिगृह्मा भिसत्कृत: । प्रत्युज्जगाम तेजस्वी गृहानेव माहतपा:,तब महान्‌ तपस्वी और तेजस्वी अत्रि मुनि राजासे समादृत हो न्यायपूर्वक मिले हुए उस सम्पूर्ण धनको लेकर अपने घरको चले गये

Maka pertapa agung Atri—yang bercahaya dan dimuliakan dengan hormat yang semestinya—menerima seluruh harta itu menurut adat dan keadilan yang benar, lalu kembali menuju kediamannya sendiri.

Verse 37

प्रदाय च धन प्रीत: पुत्रेभ्य: प्रयतात्मवान्‌ । तप: समभिसंधाय वनमेवान्वपद्यत,फिर मनपर संयम रखनेवाले वे महामुनि पुत्रोंको प्रसन्नतापूर्वक वह सारा धन बाँटकर तपस्याका शुभ संकल्प मनमें लेकर वनमें ही चले गये

Kemudian sang resi agung yang mengekang diri itu, dengan gembira membagikan seluruh harta tersebut kepada putra-putranya; dan setelah meneguhkan tekad suci untuk bertapa, ia pun mengundurkan diri ke hutan.

Verse 123

एवमुक्त्वा जगामाशु वैन्ययज्ञं महातपा: । गत्वा च यज्ञायतनमत्रिस्तुष्टाव तं नूपम्‌ १२ ।। वाक्यैर्मड्गलसंयुक्तैे: पूजयानो<ब्रवीद्‌ वच: । ऐसा कहकर महातपस्वी अत्रि शीघ्र ही राजा पृथुके यज्ञमें गये। यज्ञमण्डपमें पहुँचकर उन्होंने उस राजाका मांगलिक वचनोंद्वारा स्‍्तवन किया और उनका समादर करते हुए इस प्रकार कहा

Setelah berkata demikian, pertapa agung Atri segera pergi ke yajña Vainya. Sesampainya di tempat upacara, ia memuji sang raja dengan kata-kata yang membawa berkah; lalu, sambil menghormatinya dengan penghormatan yang patut, ia berbicara demikian.

Verse 184

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें ब्राह्मणमाहात्म्यवर्णणविषयक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-184, yang menguraikan kemuliaan brāhmaṇa, dalam subbagian Markandeya-Samāsya pada Vana Parva dari Śrī Mahābhārata.

Verse 185

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणमाहात्म्ये पज्चाशीत्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मणमाहात्म्यविषयक एक सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian, dalam Śrī Mahābhārata pada Vana Parva—khususnya subbagian Markandeya-Samāsya—berakhir bab ke-185 tentang kemuliaan brāhmaṇa.

Frequently Asked Questions

The chapter frames a governance-and-conduct dilemma under historical pessimism: how to sustain truthful, disciplined action when time itself (Kali) appears to normalize deception, role-confusion, and institutional decay.

Ethics is anchored in a larger ontology of kāla and the divine: social disorder is contextualized within cyclic time, while the ‘world within the divine body’ motif teaches humility about perception and steadiness in dharma despite impermanence.

No explicit phalaśruti formula appears in the provided passage; the meta-function is archival and instructional—positioning yuga knowledge and pralaya imagery as interpretive tools for understanding dharma, suffering, and cosmic order.