
Arjuna’s Account of Tapas and the Kirāta Test; Revelation of Maheśvara and the Grant of the Pāśupata-Astra
Upa-parva: Kairāta (Kirāta) Episode — Arjuna’s Tapas and the Pāśupata-Astra Bestowal
Vaiśaṃpāyana reports that after Indra’s departure, Arjuna reunites with his brothers and Draupadī and honors Yudhiṣṭhira. Yudhiṣṭhira, emotionally moved, asks Arjuna to explain how time passed in heaven, how the celestial weapons were obtained, and how Indra and Rudra were satisfied. Arjuna begins a structured report: following Yudhiṣṭhira’s instruction, he departs for austerity, reaches Bhṛgutunga, and meets a brāhmaṇa on the path who encourages perseverance and predicts a vision of the lord of gods. Arjuna undertakes escalating tapas—subsisting on roots and fruits, then water, then fasting, then standing with uplifted arms—until a boar-like being appears, followed by a formidable kirāta accompanied by women. A dispute over the hunt becomes a strategic engagement: arrows and multiple astras are deployed, yet the kirāta neutralizes or absorbs them, including the Brahmāstra, leading to direct hand-to-hand struggle and Arjuna’s exhaustion. The kirāta vanishes and reappears in divine form as Maheśvara (Pinākadhṛk), accompanied by Umā, declaring satisfaction. Śiva returns Arjuna’s bow and inexhaustible quivers and offers a boon. Arjuna requests knowledge of divine weapons; Śiva grants the Pāśupata weapon, with explicit restrictions: it is not to be used against humans except under extreme compulsion and as a countermeasure to overwhelming astric opposition. With permission, Arjuna remains seated; the deity disappears, concluding the chapter’s instructional frame on merit, testing, and controlled power.
Chapter Arc: यक्षों के स्वामी धनद (कुबेर) युधिष्ठिर को धैर्य और नीति का उपदेश देकर सान्त्वना देते हैं—मानो वनवास के अंधकार में राज्य-धर्म का दीपक जल उठता हो। → कुबेर कृतयुग/सत्ययुग के आदर्श मनुष्यों और आदर्श क्षत्रिय के गुण गिनाते हैं—धृति, दक्षता, देश-काल-ज्ञान, धर्म-विधान-बोध—और इसके विपरीत अज्ञान, अकाल-ज्ञान और कर्म-विभाग न जानने के विनाशकारी परिणाम बताते हैं। साथ ही पाण्डवों के लिए अलका में सत्कार, भोजन-पान और सेवकों की व्यवस्था का आश्वासन देकर उनके वर्तमान कष्ट और भविष्य की आशा को आमने-सामने रख देते हैं। → धर्म-राज्य का सार-वाक्य उभरता है: जो क्षत्रिय धैर्यवान, देश-काल-ज्ञ और धर्म-विधान-विद् है वही पृथ्वी को चिरकाल प्रशासित कर सकता है; और जो कर्म-विभाग व समय नहीं जानता, वह इह-पर दोनों में नष्ट होता है—यह उपदेश युधिष्ठिर के लिए राजधर्म का निर्णायक मानदण्ड बन जाता है। → वैशम्पायन के अनुसार कुबेर के वचन सुनकर पाण्डव हर्षित होते हैं; कुबेर उन्हें भय-शोक से रहित होकर आगे के आश्रम-गमन/व्रत-काल (कृष्णपक्ष) का निर्देश देते हैं और अलका-लोक की दिव्य संगति (गन्धर्व-यक्ष-किन्नर) का संकेत देकर आश्वस्त करते हैं। → कुबेर के निर्देशानुसार पाण्डव अब किस आश्रम-क्रम और किस अनुशासन में आगे बढ़ेंगे—और यह दिव्य संरक्षण उनके आगामी वन-प्रसंगों को कैसे मोड़ेगा?
Verse 1
हि न () हि २ आम द्विषष्ट्याधिकशततमो< ध्याय: कुबेरका युधिष्ठिर आदिको उपदेश और सान्त्वना देकर अपने भवनको प्रस्थान धनद उवाच युधिष्ठिर धृतिर्दाक्ष्य देशकालपराक्रमा: । लोकततन्त्रविधानानामेष पञ्चविधो विधि:,कुबेर बोले--युधिष्ठिर! धैर्य, दक्षता, देश, काल और पराक्रम--ये पाँच लौकिक कार्योंकी सिद्धिके हेतु हैं
Dhanada (Kubera) berkata: “Yudhiṣṭhira, keteguhan hati, kecakapan, tempat yang tepat, waktu yang tepat, dan daya upaya yang tegas—lima inilah tata cara yang menata dan menyukseskan urusan dunia.”
Verse 2
धृतिमन्तश्न दक्षाश्न स्वे स्वे कर्मणि भारत । पराक्रमविधानज्ञा नरा कृतयुगे5डभवन्,भारत! सत्ययुगमें सब मनुष्य धैर्यवान, अपने-अपने कार्यमें कुशल तथा पराक्रमविधिके ज्ञाता थे
Wahai Bhārata, pada Yuga Kṛta (Satya), manusia-manusia teguh dan terkendali, mahir dalam tugas masing-masing, serta mengetahui tata cara keberanian dan upaya yang benar.
Verse 3
धृतिमान् देशकालज्ञ: सर्वधर्मविधानवित् | क्षत्रिय: क्षत्रियश्रेष्ठ प्रशास्ति पृथिवीं चिरम्,क्षत्रियश्रेष्ठ! जो क्षत्रिय धैर्यवान, देश-कालको समझनेवाला तथा सम्पूर्ण धर्मोके विधानका ज्ञाता है, वह दीर्घकालतक इस पृथ्वीका शासन कर सकता है
Wahai yang terbaik di antara para kṣatriya, kṣatriya yang teguh, memahami tempat dan waktu, serta mengetahui seluruh ketetapan dharma, mampu memerintah bumi untuk waktu yang lama.
Verse 4
य एवं वर्तते पार्थ पुरुष: सर्वकर्मसु । स लोके लभते वीर यशः प्रेत्य च सद्गतिम्,वीर पार्थ! जो पुरुष इसी प्रकार सब कर्मामें प्रवृत्त होता है, वह लोकमें सुयश और परलोकमें उत्तम गति पाता है। देश-कालके अन्तरपर दृष्टि रखनेवाले वृत्रासुर-विनाशक इन्द्रने वसुओंसहित पराक्रम करके स्वर्गका राज्य प्राप्त किया है
Wahai Pārtha yang gagah, orang yang bertindak demikian dalam segala perbuatannya memperoleh nama baik di dunia ini, dan setelah wafat mencapai tujuan yang mulia.
Verse 5
देशकालान्तरप्रेप्सु: कृत्वा शक्र: पराक्रमम् । सम्प्राप्तस्त्रिदिवे राज्यं वृत्रहा वसुभि: सह,वीर पार्थ! जो पुरुष इसी प्रकार सब कर्मामें प्रवृत्त होता है, वह लोकमें सुयश और परलोकमें उत्तम गति पाता है। देश-कालके अन्तरपर दृष्टि रखनेवाले वृत्रासुर-विनाशक इन्द्रने वसुओंसहित पराक्रम करके स्वर्गका राज्य प्राप्त किया है
Dengan mempertimbangkan perbedaan tempat dan waktu, Śakra (Indra), pembunuh Vṛtra, menampakkan keberaniannya dan bersama para Vasu meraih kedaulatan di dunia surga. Demikian pula, wahai Pārtha yang gagah, seorang yang dengan pertimbangan bijak menunaikan segala kewajiban memperoleh nama harum di dunia ini dan jalan yang lebih luhur di alam berikutnya.
Verse 6
यस्तु केवलसंरम्भात् प्रपातं न निरीक्षते । पापात्मा पापबुद्धिर्य: पापमेवानुवर्तते,जो केवल क्रोधके वशीभूत हो अपने पतनको नहीं देखता है, वह पापबुद्धि पापात्मा पुरुष पापका ही अनुसरण करता है
Ia yang digerakkan semata oleh dorongan buta dan amarah, tanpa menengok ke jurang kejatuhannya sendiri—orang yang berdosa dalam pikiran dan berdosa dalam tabiat—pada akhirnya hanya mengikuti dosa.
Verse 7
कर्मणामविभागज्ञ: प्रेत्य चेह विनश्यति । अकालज्ञ: सुदुर्मेधा: कार्याणामविशेषवित्,जो कर्मोंके विभागको नहीं जानता, समयको नहीं पहचानता और कार्योंके वैशिष्ट्यूको नहीं समझता है, वह खोटी बुद्धिवाला मनुष्य इहलोक तथा परलोकमें भी नष्ट ही होता है
Seseorang yang tidak memahami pembedaan yang tepat di antara tindakan—yang tidak mengenali waktu yang semestinya, dan tidak mampu menilai apa yang khas atau tepat dalam suatu tugas—orang yang sesat akalnya itu binasa, baik di dunia ini maupun setelah mati.
Verse 8
वृथा55चारसमारम्भ: प्रेत्य चेह विनश्यति । साहसे वर्तमानानां निकृतीनां दुरात्मनाम्,साहसके कार्योंमें लगे हुए ठग एवं दुरात्मा पुरुषोंके उत्तम कर्मोंका अनुष्ठान इस लोक और परलोकमें भी व्यर्थ नष्टप्राय ही है
Setiap usaha yang bermula dari perilaku sia-sia atau tidak benar akan binasa—baik di dunia ini maupun setelah mati. Bagi orang-orang penipu dan berhati jahat yang terus bergelimang dalam kekerasan nekat, bahkan tindakan yang tampak sebagai ‘kebajikan’ pun menjadi hampa, runtuh tanpa hasil di kehidupan ini dan di kehidupan berikutnya.
Verse 9
सर्वसामर्थ्यलिप्सूनां पापो भवति निश्चय: । अधर्मज्ञोडवलिप्तश्न बालबुद्धिरमर्षण:
Di antara mereka yang mendambakan kekuasaan dan kemampuan sepenuhnya, tekad yang berdosa niscaya muncul. Orang demikian tidak memahami dharma, mabuk oleh kesombongan, kekanak-kanakan dalam pertimbangan, dan tidak tahan dibatasi atau ditegur.
Verse 10
आर्डटिषेणस्य राजर्षे: प्राप्प भूयस्त्वमाश्रमम्
Dhanada berkata: “Setelah sekali lagi mencapai pertapaan resi-raja Ārḍatiṣeṇa, hampirilah beliau kembali.”
Verse 11
महाबाहु नरश्रेष्ठ! वहाँ अलकानिवासी यक्ष तथा इस पर्वतपर रहनेवाले सभी प्राणी मेरी आज्ञाके अनुसार गन्धर्वों और किन्नरोंके साथ सदा इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसहित तुम्हारी रक्षा करेंगे
Dhanada berkata: “Wahai yang berlengan perkasa, manusia terbaik! Para Yakṣa penghuni Alakā dan semua makhluk yang tinggal di gunung ini akan—atas perintahku—bersama para Gandharva dan Kinnara, serta ditemani para Brahmana utama ini, senantiasa melindungimu.”
Verse 12
मन्नियुक्ता मनुष्येन्द्र सर्वे च गिरिवासिन: । रक्षिष्यन्ति महाबाहो सहित द्विजसत्तमै:,महाबाहु नरश्रेष्ठ! वहाँ अलकानिवासी यक्ष तथा इस पर्वतपर रहनेवाले सभी प्राणी मेरी आज्ञाके अनुसार गन्धर्वों और किन्नरोंके साथ सदा इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसहित तुम्हारी रक्षा करेंगे
Kubera berkata: “Wahai penguasa di antara manusia, semua penghuni gunung ini, yang bertindak di bawah perintahku, akan melindungimu, wahai yang berlengan perkasa—bersama para dwija yang utama.”
Verse 13
साहसादनुसम्प्राप्त: प्रतिबुध्य: वृकोदर: । वार्यतां साध्वयं राजंस्त्वया धर्मभूृतां वर,धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेश! भीमसेन यहाँ दुःसाहस-पूर्वक आये हैं, यह बात समझाकर इन्हें अच्छी तरह मना कर दो (जिससे ये पुनः कोई अपराध न कर बैठें)
Vṛkodara (Bhīma), yang tersulut oleh keberanian nekat, telah datang ke sini. Wahai Raja, yang terbaik di antara para penegak dharma, engkau harus menahannya dengan tegas dan menasihatinya dengan baik.
Verse 14
अतः परं च वो राजन द्रक्ष्यन्ति वनगोचरा: । उपस्थास्यथन्ति वो राजन् रक्षिष्यन्ते च व: सदा,राजन्! अबसे इस वनमें रहनेवाले सब यक्ष तुमलोगोंकी देख-भाल करेंगे, तुम्हारी सेवामें उपस्थित होंगे और सदा तुम सब लोगोंके संरक्षणमें तत्पर रहेंगे
Mulai saat ini, wahai Raja, para Yakṣa yang bergerak di rimba ini akan mengawasi kalian. Mereka akan hadir melayani, dan senantiasa bersiaga melindungi kalian.
Verse 15
तथैव चाज्नपानानि स्वादूनि च बहूनि च । आहरिष्यन्ति मत्प्रेष्या: सदा व: पुरुषर्षभा:,पुरुषरत्न पाण्डवो! इसी प्रकार हमारे सेवक तुम्हारे लिये वहाँ सदा स्वादिष्ट अन्न-पान प्रचुर मात्रामें प्रस्तुत करते रहेंगे
Demikian pula, wahai para insan terbaik! Para pelayanku akan senantiasa membawakan bagi kalian beraneka ragam makanan dan minuman yang lezat, dalam kelimpahan.
Verse 16
यथा जिष्णुर्महेन्द्रस्य यथा वायोरव॑कोदर: । धर्मस्य त्वं यथा तात योगोत्पन्नो निज: सुत:,तात युधिष्ठिर! जैसे अर्जुन देवराज इन्द्रके, भीमसेन वायुदेवके और तुम धर्मराजके योगबलसे उत्पन्न किये हुए निजी पुत्र होनेके कारण उनके द्वारा रक्षणीय हो तथा ये दोनों आत्मबलसम्पन्न नकुल-सहदेव जैसे दोनों अश्विनीकुमारोंसे उत्पन्न होनेके कारण उनके पालनीय हैं, उसी प्रकार यहाँ मेरे लिये भी तुम सब लोग रक्षणीय हो
Dhanada berkata: “Wahai anakku Yudhiṣṭhira! Sebagaimana Jiṣṇu (Arjuna) dilindungi oleh Mahendra (Indra), dan Avakodara (Bhīma) oleh Vāyu, demikian pula engkau—putra sejati Dharma yang lahir melalui daya yoga—patut dilindungi olehnya. Dan kedua saudara kembar yang berhati kuat ini, Nakula dan Sahadeva, karena terlahir dari pasangan Aśvin, patut dipelihara oleh mereka. Maka di sini kalian semua pun akan kulindungi.”
Verse 17
आत्मज्ञावात्मसम्पन्नौ यमौ चोभौ यथाशद्रिनो: । रक्ष्यास्तद्वन्ममापीह यूयं सर्वे युधिष्ठिर,तात युधिष्ठिर! जैसे अर्जुन देवराज इन्द्रके, भीमसेन वायुदेवके और तुम धर्मराजके योगबलसे उत्पन्न किये हुए निजी पुत्र होनेके कारण उनके द्वारा रक्षणीय हो तथा ये दोनों आत्मबलसम्पन्न नकुल-सहदेव जैसे दोनों अश्विनीकुमारोंसे उत्पन्न होनेके कारण उनके पालनीय हैं, उसी प्रकार यहाँ मेरे लिये भी तुम सब लोग रक्षणीय हो
Dhanada berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira! Kedua saudara kembar itu, yang berbekal pengetahuan diri dan kekuatan batin, patut dilindungi sebagaimana Aśvin kembar melindungi milik mereka. Demikian pula, di sini kalian semua pun patut kulindungi.”
Verse 18
अर्थतत्त्वविधानज्ञ: सर्वधर्मविधानवित् | भीमसेनादवरज: फाल्गुन: कुशली दिवि,अर्थतत्त्वकी विधिके ज्ञाता और सम्पूर्ण धर्मोके विधानमें कुशल अर्जुन, जो भीमसेनसे छोटे हैं, इस समय कुशलपूर्वक स्वर्गलोकमें विराज रहे हैं
Dhanada berkata: “Phalguna (Arjuna), adik Bhimasena, mahir dalam kaidah-kaidah artha dan penerapannya, serta memahami ketetapan segala dharma. Kini ia berdiam dengan selamat di alam surga.”
Verse 19
या: काशक्षन मता लोके स्वर्ग्या: परमसम्पद: । जन्मप्रभृति ता: सर्वाः स्थितास्तात धनंजये,तात! संसारमें जो कोई भी स्वर्गीय श्रेष्ठ सम्पत्तियाँ मानी गयी हैं, वे सब अर्जुनमें जन्मकालसे ही स्थित हैं
Dhanada berkata: “Wahai anakku, Dhanañjaya! Segala keunggulan tertinggi yang di dunia ini dipandang sebagai kemakmuran surgawi—semuanya telah bersemayam dalam dirimu sejak kelahiran.”
Verse 20
दमो दान बल बुद्धि्नीर्धतिस्तेज उत्तमम् । एतान्यपि महासत्त्वे स्थितान्यमिततेजसि,अमित तेजस्वी और महान् सत्त्वशाली अर्जुनमें दम (इन्द्रिय-संयम), दान, बल, बुद्धि, लज्जा, धैर्य तथा उत्तम तेज--ये सभी सदगुण विद्यमान हैं
Dhanada berkata: “Pengendalian diri, kedermawanan, kekuatan, kecerdasan, rasa malu yang luhur, keteguhan hati, dan sinar kemuliaan tertinggi—semua kebajikan ini pun teguh bersemayam dalam diri Arjuna, yang berhati agung dan bercahaya tak terukur.”
Verse 21
न मोहात् कुरुते जिष्णु: कर्म पाण्डव गर्हितम् । न पार्थस्य मृषोक्तानि कथयन्ति नरा नृषु,पाण्डुनन्दन! तुम्हारे भाई अर्जुन कभी मोहवश निन्दित कर्म नहीं करते। मनुष्य आपसमें कभी अर्जुनके मिथ्याभाषणकी चर्चा नहीं करते हैं
Dhanada berkata: “Jiṣṇu (Arjuna) tidak pernah, karena delusi, melakukan perbuatan yang akan dicela di antara para Pāṇḍava. Dan orang-orang pun tidak saling membicarakan adanya kata-kata dusta yang pernah diucapkan Pārtha. Wahai putra Pāṇḍu, tindak-tanduknya tanpa cela dan ucapannya dipercaya.”
Verse 22
स देवपितृगन्धर्वै: कुरूणां कीर्तिवर्धन: । मानित: कुरुते5स्त्राणि शक्रसझनि भारत,भारत! कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले अर्जुन इन्द्रभवनमें देवताओं, पितरों तथा गन्धर्वोंसे सम्मानित हो अस्त्रविद्याका अभ्यास करते हैं
Kubera berkata: “Wahai Bhārata, Arjuna—yang menambah kemasyhuran para Kuru—berdiam di istana surgawi Indra. Dihormati oleh para dewa, para Pitṛ, dan para Gandharva, ia tekun berlatih serta menyempurnakan ilmu senjata-senjata ilahi.”
Verse 23
योडसौ सर्वान् महीपालान् धर्मेण वशमानयत् | स शान्तनुर्महातेजा: पितुस्तव पितामह:,पार्थ! जिन्होंने सब राजाओंको धर्मपूर्वक अपने अधीन कर लिया था, वे महातेजस्वी, महापराक्रमी तथा सदाचारपरायण महाराज शान्तनु, जो तुम्हारे पिताके पितामह थे, स्वर्गलोकमें कुरुकुलधुरीण गाण्डीवधारी अर्जुनसे बहुत प्रसन्न रहते हैं
Dhanada berkata: “Wahai Pārtha, raja Śāntanu yang perkasa dan bercahaya—kakekmu, ayah dari ayahmu—dialah yang menundukkan semua penguasa bumi ke dalam kekuasaannya melalui jalan dharma.”
Verse 24
प्रीयते पार्थ पार्थेन दिवि गाण्डीवधन्चना । सम्यक् चासौ महावीर्य: कुलधुर्येण पार्थिव:,पार्थ! जिन्होंने सब राजाओंको धर्मपूर्वक अपने अधीन कर लिया था, वे महातेजस्वी, महापराक्रमी तथा सदाचारपरायण महाराज शान्तनु, जो तुम्हारे पिताके पितामह थे, स्वर्गलोकमें कुरुकुलधुरीण गाण्डीवधारी अर्जुनसे बहुत प्रसन्न रहते हैं
Dhanada berkata: “Wahai Pārtha, di surga raja yang berdaya-perkasa—penopang utama dharma keluarganya—sangat bersukacita atas Pārtha Arjuna, sang pemegang Gāṇḍīva. Ia berkenan kepadamu dengan sepantasnya, sebab kekuatanmu berpadu dengan dharma dan dengan pemeliharaan kewajiban garis keturunanmu.”
Verse 25
पितृन् देवानृषीन् विप्रान् पूजयित्वा महातपा: । सप्त मुख्यान् महामेधानाहरद् यमुनां प्रति,महातपस्वी शान्तनुने देवताओं, पितरों, ऋषियों तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करके यमुना- तटपर सात बड़े-बड़े अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान किया था। राजन! वे तुम्हारे प्रपितामह राजाधिराज शान्तनु स्वर्गलोकको जीतकर उसीमें निवास करते हैं। उन्होंने मुझसे तुम्हारी कुशल पूछी थी
Dhanada berkata: “Pertapa agung itu, setelah menghormati para Pitri, para dewa, para resi, dan para brahmana sesuai tata, menyelenggarakan tujuh Aśvamedha yang utama dan mahaagung di tepi Sungai Yamunā. Wahai raja, Śāntanu—prapitamaha-mu, sang raja di atas para raja—telah menaklukkan alam surga dan bersemayam di sana. Dialah yang menanyakan kepadaku kabar keselamatanmu.”
Verse 26
अधिराज: स राजंस्त्वां शान्तनु: प्रपितामह: । स्वर्गजिच्छक्रलोकस्थ: कुशलं परिपृच्छति,महातपस्वी शान्तनुने देवताओं, पितरों, ऋषियों तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करके यमुना- तटपर सात बड़े-बड़े अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान किया था। राजन! वे तुम्हारे प्रपितामह राजाधिराज शान्तनु स्वर्गलोकको जीतकर उसीमें निवास करते हैं। उन्होंने मुझसे तुम्हारी कुशल पूछी थी
Dhanada berkata: “Wahai raja, prapitamaha-mu, sang maharaja Śāntanu, setelah menaklukkan surga kini bersemayam di dunia Śakra (Indra) dan menanyakan kesejahteraanmu. Pertapa agung itu telah memuliakan para dewa, para leluhur, para resi, dan para brahmana, lalu menyelenggarakan tujuh Aśvamedha yang mahaagung di tepi Yamunā. Setelah memenangkan alam surga, ia tinggal di sana; dialah yang menanyakan kepadaku kabar baik tentang dirimu.”
Verse 27
वैशम्पायन उवाच एतच्छुत्वा तु वचन धनदेन प्रभाषितम् । पाण्डवाश्व ततस्तेन वभूवु: सम्प्रहर्षिता:
Vaiśampāyana berkata: Mendengar kata-kata yang diucapkan Dhanada (Kubera) itu, para Pāṇḍava di sana pun dipenuhi sukacita yang besar.
Verse 28
ततः शक्ति गदां खड््गं धनुश्च॒ भरतर्षभ: । प्राध्वं कृत्वा नमश्नक्रे कुबेराय वृकोदर:
Kemudian Vṛkodara (Bhīma), yang terbaik di antara keturunan Bharata, menyingkirkan tombak, gada, pedang, dan busurnya; lalu dengan sikap hormat yang semestinya ia bersujud kepada Kubera.
Verse 29
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुबेरकी कही हुई ये बातें सुनकर पाण्डवोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। तदनन्तर भरतकुल-भूषण भीमसेनने उठायी हुई शक्ति गदा, खड्ग और धनुषको नीचे करके कुबेरको नमस्कार किया ।। ततोडब्रवीद् धनाध्यक्ष: शरण्य: शरणागतम् । मानहा भव शत्रूणां सुहृदां नन्दिवर्धन:,तब शरण देनेवाले धनाध्यक्ष कुबेरने अपनी शरणमें आये हुए भीमसेनसे कहा --'पाण्डुनन्दन! तुम शत्रुओंका मान मर्दन और सुहृदोंका आनन्द वर्धन करनेवाले बनो
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya, mendengar kata-kata Kubera itu, para Pāṇḍava sangat bersukacita. Lalu Bhīmasena, perhiasan wangsa Bharata, menurunkan senjata yang semula terangkat—tombak, gada, pedang, dan busur—seraya bersujud kepada Kubera. Maka Kubera, penguasa kekayaan dan pelindung para pemohon suaka, berkata kepada Bhīma yang datang berlindung: ‘Wahai putra Pāṇḍu, jadilah peremuk keangkuhan musuh-musuhmu dan penambah sukacita sahabat-sahabatmu.’”
Verse 30
स्वेषु वेश्मसु रम्येषु वसतामित्रतापना: । कामान्न परिहास्यन्ति यक्षा वो भरतर्षभा:,'शत्रुओंको संताप देनेवाले भरतकुलभूषण पाण्डवो! तुम सब लोग अपने रमणीय आश्रमोंमें निवास करो। यक्षलोग तुम्हारी अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्तिमें बाधा नहीं डालेंगे
Waiśampāyana berkata: “Wahai para pahlawan laksana banteng dari wangsa Bharata, penebar derita bagi musuh—tinggallah dengan tenteram di kediaman kalian yang elok. Para Yakṣa tidak akan menghalangi kalian memperoleh apa yang kalian dambakan.”
Verse 31
शीघ्रमेव गुडाकेश: कृतास्त्र: पुनरेष्यति । साक्षान्मघवता सृष्ट: सम्प्राप्स्यति धनंजय:,“निद्राविजयी अर्जुन अस्त्रविद्या सीखकर साक्षात् इन्द्रके भेजनेपर शीघ्र ही यहाँ आवेंगे और तुम सब लोगोंसे मिलेंगे”
Waiśampāyana berkata: “Guḍākeśa (Arjuna), setelah menguasai senjata-senjata surgawi, akan segera kembali lagi. Dhanañjaya, yang diutus langsung oleh Maghavat (Indra), akan datang ke sini dan bergabung kembali dengan kalian semua.”
Verse 32
एवमुत्तमकर्माणमनुशिष्य युधिष्ठटिरम् । श्वेतं गिरिवरश्रेष्ठ प्रययौं गुह्ुकाधिप:,इस प्रकार उत्तम कर्म करनेवाले युधिष्ठिरको उपदेश देकर यक्षराज कुबेर गिरिश्रेष्ठ कैलासको चले गये
Waiśampāyana berkata: “Setelah demikian menasihati Yudhiṣṭhira—yang teguh dalam laku dharma tertinggi—penguasa para Guhyaka, Kubera, berangkat menuju Śveta, gunung termulia (Kailāsa).”
Verse 33
त॑ परिस्तोमसंकीर्ण्नानारत्नवि भूषितै: । यानैरनुययुर्यक्षा राक्षसाश्व॒ सहस्रश:,उनके पीछे सहस्रों यक्ष और राक्षस भी अपने-अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो चल दिये। उनके वे वाहन नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे और उनकी पीठपर बहुरंगे कम्बल आदि कसे हुए थे
Kemudian, beribu-ribu Yakṣa dan Rākṣasa mengikuti di belakang, masing-masing menaiki kendaraannya. Kendaraan-kendaraan itu dihiasi aneka permata dan dipasangi penutup bermotif berwarna-warni, menampakkan kemegahan iring-iringan mereka.
Verse 34
पक्षिणामिव निर्घोष: कुबेरसदनं प्रति । बभूव परमाश्चानामैरावतपथे यथा,जैसे इन्द्रपुरीके मार्गपपर चलनेवाले विविध वाहनोंका कोलाहल सुनायी पड़ता है, उसी प्रकार कुबेरभवनके प्रति यात्रा करनेवाले उत्तम अश्वोंका शब्द ऐसा जान पड़ता था, मानो पक्षी उड़ रहे हों
Saat mereka bergerak menuju kediaman Kubera, derap dan gemuruh kuda-kuda terbaik terdengar laksana kicau burung yang terbang—sebagaimana di jalan Airāvata menuju kota Indra, hiruk-pikuk berbagai kendaraan agung terdengar menggema.
Verse 35
ते जम्मुस्तूर्णमणाकाशं धनाधिपतिवाजिन: । प्रकर्षन्त इवा भ्राणि पिबन्त इव मारुतम्,धनाध्यक्ष कुबेरके वे घोड़े अपने साथ बादलोंको खींचते और वायुको पीते हुए-से तीत्र गतिसे आकाशमें उड़ चले
Waiśampāyana berkata: Kuda-kuda Kubera, Sang Penguasa Kekayaan, melesat ke angkasa terbuka secepat Jambha. Seolah-olah mereka menyeret awan dan, seakan-akan, meneguk angin—demikian dahsyat lajunya—sambil membawa Sang Dhanādhipati melaju di langit.
Verse 36
ततस्तानि शरीराणि गतसत्त्वानि रक्षसाम् | अपाकृष्यन्त शैलाग्रादू धनाधिपतिशासनात्,तदनन्तर कुबेरकी आज्ञासे राक्षसोंके वे निर्जीव शरीर उस पर्वतशिखरसे दूर हटा दिये गये
Kemudian, atas perintah Kubera, Sang Penguasa Kekayaan, tubuh-tubuh para rākṣasa yang telah kehilangan nyawa itu diseret pergi dari puncak gunung.
Verse 37
तेषां हि शापकाल: स कृतो5गस्त्येन धीमता । समरे निहतास्तस्माच्छापस्यान्तो5भवत् तदा,बुद्धिमान् अगस्त्यने यक्षोंके लिये शापकी वही अवधि निश्चित की थी। जब वे युद्धमें मारे गये तब उनके शापका अन्त हो गया। महामना पाण्डव अपने उन आश्रमोंमें सम्पूर्ण राक्षसोंसे पूजित एवं उद्वेगशून्य होकर सुखसे रात्रि व्यतीत करने लगे
Waiśampāyana berkata: “Bagi mereka, masa kutukan telah ditetapkan oleh resi Agastya yang bijaksana. Maka ketika mereka tewas dalam pertempuran, pada saat itu juga kutukan itu berakhir.”
Verse 38
पाण्डवाश्नव महात्मानस्तेषु वेश्मसु तां क्षपाम् सुखमूषुर्गतोद्वेगा: पूजिता: सर्वराक्षसै:,बुद्धिमान् अगस्त्यने यक्षोंके लिये शापकी वही अवधि निश्चित की थी। जब वे युद्धमें मारे गये तब उनके शापका अन्त हो गया। महामना पाण्डव अपने उन आश्रमोंमें सम्पूर्ण राक्षसोंसे पूजित एवं उद्वेगशून्य होकर सुखसे रात्रि व्यतीत करने लगे
Waiśampāyana berkata: Para Pāṇḍava yang berhati agung, dimuliakan oleh semua rākṣasa dan bebas dari kegelisahan, melewatkan malam itu dengan tenteram di kediaman-kediaman tersebut.
Verse 96
निर्भयो भीमसेनो<यं तं शाधि पुरुषर्षभ । सब प्रकारकी (सांसारिक) सामर्थ्यके इच्छुक मनुष्योंका निश्चय पापपूर्ण होता है। पुरुषरत्न युधिष्ठिर! ये भीमसेन धर्मको नहीं जानते, इन्हें अपने बलका बड़ा अभिमान है इनकी बुद्धि अभी बालकोंकी-सी है तथा ये अत्यन्त क्रोधी और निर्भय हैं, अतः तुम इन्हें उपदेश देकर काबूमें रखो
Dhanada berkata: “Bhīmasena ini tak mengenal takut; ajarilah dan kendalikan dia, wahai banteng di antara manusia. Tekad orang yang menginginkan segala macam kuasa duniawi cenderung menuju dosa. Wahai permata di antara manusia, Yudhiṣṭhira—Bhīma tidak sungguh memahami dharma; ia sangat bangga akan kekuatannya. Pertimbangannya masih seperti anak-anak, dan ia amat pemarah serta tanpa rasa takut. Maka nasihatilah dia dan jagalah agar tetap terkendali.”
Verse 103
तामिस्र॑ प्रथमं पक्षं वीतशोकभयो वस । नरेश्वर! अब पुनः तुम यहाँसे राजर्षि आर्डिषेणके आश्रमपर जाकर कृष्णपक्षभर शोक और भयसे रहित होकर रहो
Dhanada berkata: “Wahai raja! Tinggallah terlebih dahulu sepanjang paruh gelap (kṛṣṇa-pakṣa) dengan bebas dari duka dan takut. Lalu, wahai penguasa manusia, berangkatlah dari sini ke pertapaan rajarṣi Ārdiṣeṇaka, dan menetaplah di sana selama seluruh paruh gelap itu, kembali tanpa kesedihan maupun gentar.”
Verse 131
अलका: सह गन्धर्वर्यक्षाश्ष॒ सह किन्नरैः
Alakā dihuni bersama para Gandharva, Yakṣa, dan Kinnara.
Verse 162
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि कुबेरवाक्ये द्विषष्ट्यधिकशततमो<ध्याय:
Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva—bagian Yakṣa-yuddha-parva—berakhirlah bab ke-162, yang dikenal sehubungan dengan sabda Kubera.
The chapter frames the tension between acquiring overwhelming capability and remaining ethically constrained: Arjuna seeks astric knowledge, while the narrative insists that such power must be limited by necessity, proportionality, and explicit prohibitions.
Qualification precedes empowerment: tapas, steadiness under provocation, and humility before legitimate authority are depicted as prerequisites for receiving and responsibly holding exceptional means.
Rather than a formal phalaśruti, the chapter embeds normative meta-guidance through Śiva’s conditions on the Pāśupata-astra, functioning as an internal commentary on the ethical governance of knowledge and force within the epic.