Adhyaya 150
Vana ParvaAdhyaya 15041 Verses

Adhyaya 150

Hanūmān’s Embrace, Counsel, and Promise to Amplify Bhīma’s Battle-Roar (Gandhamādana Continuation)

Upa-parva: Saugaṅdhika-āharaṇa / Hanūmad-bhīma-saṃvāda episode (Gandhamādana sequence)

Vaiśaṃpāyana recounts how the vānara (Hanūmān) withdraws his magically augmented form and embraces Bhīmasena, after which Bhīma’s fatigue dissipates and circumstances become favorable. With tears and affectionate speech, Hanūmān instructs Bhīma to return to his camp and to remember him when needed, adding that his presence should not be disclosed. He references the appropriate timing and locale for celestial women released from Kubera’s domain, reinforcing the episode’s setting near Gandhamādana. Hanūmān then invites Bhīma to request a boon grounded in fraternal regard; Bhīma responds with deference, apology, and confidence that the Pāṇḍavas will overcome adversaries through Hanūmān’s radiance. Hanūmān promises concrete battlefield support: when Bhīma roars amid hostile forces, Hanūmān will magnify that roar and, stationed upon the victory-banner, emit terrifying cries that sap enemy vitality. After Hanūmān disappears, Bhīma continues through Gandhamādana, reflecting on Hanūmān’s splendor and Rāma’s greatness, searching the forests and river-lotus landscapes until he sights the great Saugaṅdhika grove and inwardly turns toward Draupadī, the proximate cause of his quest.

Chapter Arc: हनुमान के दिव्य वचनों से अभिभूत भीम, कपीश्वर के चरणों में विनयपूर्वक कहता है कि आज वह धन्य हो गया—ऐसे आर्य को प्रत्यक्ष देखकर उसका जीवन सफल हुआ। → भीम की जिज्ञासा युगों के बदलते धर्म और आचरण पर टिकती है; हनुमान समय-चक्र की कठोरता बताते हैं—कृत, त्रेता, द्वापर और अब कलि में धर्म का स्वरूप और मनुष्यों की शक्ति-प्रकृति बदल जाती है। शास्त्र-भेद और कर्म-मार्गों की बहुलता से प्रजा की प्रवृत्ति राजसी होती जाती है। → हनुमान कलियुग/प्रध्वंसन-काल का निर्णायक चित्र खींचते हैं: सत्य से च्युत होने पर रोग, काम-उपद्रव और दैव-आश्रितता बढ़ती है; युगानुसार भूमि, नदियाँ, पर्वत, सिद्ध, देव, महर्षि—सब काल के साथ रूप बदलते हैं। → हनुमान भीम की जिज्ञासा का सम्यक उत्तर देकर युग-संख्या और युग-धर्म का सार समेटते हैं, और भीम को ‘स्वस्ति’—कल्याण के साथ आगे बढ़ने का संकेत देते हैं: जो पूछा गया, वह कह दिया गया।

Shlokas

Verse 1

#:73:.8 #::3:.7 (0) हि 2 7 एकोनपज्चाशर्दाधिकशततमो< ध्याय: हनुमानजीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन वैशम्पायन उवाच एवमुक्तो महाबाहुर्भीमसेन: प्रतापवान्‌ । प्रणिपत्य ततः प्रीत्या भ्रातरं हृष्टमानस:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! हनुमानजीके ऐसा कहनेपर प्रतापी वीर महाबाहु भीमसेनके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने बड़े प्रेमसे अपने भाई वानरराज हनुमान्‌को प्रणाम करके मधुर वाणीमें कहा--“अहा! आज मेरे समान बड़भागी दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि आज मुझे अपने ज्येष्ठ भ्राताका दर्शन हुआ है

Waiśampāyana berkata: Setelah Hanūmān berkata demikian, Bhīmasena yang bertangan perkasa dan penuh keberanian diliputi sukacita. Dengan hati berseri, ia bersujud memberi hormat kepada saudaranya dengan penuh kasih.

Verse 2

उवाच श्लक्ष्णया वाचा हनूमन्तं कपीश्वरम्‌ । मया धन्यतरो नास्ति यदार्य दृष्टवानहम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! हनुमानजीके ऐसा कहनेपर प्रतापी वीर महाबाहु भीमसेनके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने बड़े प्रेमसे अपने भाई वानरराज हनुमान्‌को प्रणाम करके मधुर वाणीमें कहा--“अहा! आज मेरे समान बड़भागी दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि आज मुझे अपने ज्येष्ठ भ्राताका दर्शन हुआ है

Dengan tutur yang lembut, Bhīma berkata kepada Hanūmān, penguasa para kera: “Wahai mulia, tiada seorang pun lebih beruntung dariku, sebab hari ini aku telah memandangmu.”

Verse 3

अनुग्रहो मे सुमहांस्तृप्तिश्न तव दर्शनात्‌ । एकं तु कृतमिच्छामि त्वयाद्य प्रियमात्मन:

“Sungguh besar anugerahmu bagiku, dan hanya dengan memandangmu aku telah merasa puas. Namun hari ini aku masih memohon satu kebaikan lagi darimu—sesuatu yang amat kuinginkan.”

Verse 4

“आर्य! आपने मुझपर बड़ी कृपा की है। आपके दर्शनसे मुझे बड़ा सुख मिला है। अब मैं पुन: आपके द्वारा अपना एक और प्रिय कार्य पूर्ण करना चाहता हूँ ।। यत्‌ ते तदा55सीत्‌ प्लवत: सागरं मकरालयम्‌ । रूपमप्रतिमं वीर तदिच्छामि निरीक्षितुम्‌,“वीरवर! मकरालय समुद्रको लाँघते समय आपने जो अनुपम रूप धारण किया था, उसका दर्शन करनेकी मुझे बड़ी इच्छा हो रही है। उसे देखनेसे मुझे संतोष तो होगा ही, आपकी बातपर श्रद्धा भी हो जायगी।” भीमसेनके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी हनुमानजीने हँसकर कहा--

Bhīmasena berkata, “Wahai yang mulia, engkau telah menunjukkan belas kasih yang besar kepadaku; memandangmu membuat hatiku dipenuhi sukacita. Kini aku ingin menuntaskan satu maksud lain yang amat kuinginkan melalui dirimu. O pahlawan, ketika engkau melompati samudra—kediaman para makara—engkau mengambil wujud yang tiada banding. Aku rindu menyaksikan wujud itu. Dengan melihatnya aku akan puas, dan keyakinanku pada ucapanmu pun akan teguh.”

Verse 5

एवं तुष्टो भविष्यामि श्रद्धास्यामि च ते वच: । एवमुक्त: स तेजस्वी प्रहस्य हरिरब्रवीत्‌,“वीरवर! मकरालय समुद्रको लाँघते समय आपने जो अनुपम रूप धारण किया था, उसका दर्शन करनेकी मुझे बड़ी इच्छा हो रही है। उसे देखनेसे मुझे संतोष तो होगा ही, आपकी बातपर श्रद्धा भी हो जायगी।” भीमसेनके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी हनुमानजीने हँसकर कहा--

“Dengan demikian aku akan puas, dan aku pun akan menaruh iman pada ucapanmu.” Setelah berkata begitu, Hari (Hanumān) yang bercahaya itu tersenyum lalu menjawab—

Verse 6

न तच्छक्यं त्वया द्रष्टं रूपं नान्‍येन केनचित्‌ । कालावस्था तदा हान्या वर्तते सा न साम्प्रतम्‌,'भैया! तुम उस स्वरूपको नहीं देख सकते, कोई दूसरा मनुष्य भी उसे नहीं देख सकता। उस समयकी अवस्था कुछ और ही थी, अब वह नहीं है

“Saudaraku, wujud itu tak dapat kau lihat—dan tak seorang manusia pun dapat melihatnya. Keadaan waktu pada saat itu berbeda; keadaan itu kini telah berlalu.”

Verse 7

अन्य: कृतयुगे कालस्त्रेतायां द्वापरे पर: । अयं प्रध्वंसन: कालो नाद्य तद्‌ रूपमस्ति मे,'सत्ययुगका समय दूसरा था तथा त्रेता और द्वापरका दूसरा ही है। यह काल सभी वस्तुओंको नष्ट करनेवाला है। अब मेरा वह रूप है ही नहीं। पृथ्वी, नदी, वृक्ष, पर्वत, सिद्ध, देवता और महर्षि--ये सभी कालका अनुसरण करते हैं। प्रत्येक युगके अनुसार सभी वस्तुओंके शरीर, बल और प्रभावमें न्यूनाधिकता होती रहती है। अतः कुरुश्रेष्ठ] तुम उस स्वरूपको देखनेका आग्रह न करो। मैं भी युगका अनुसरण करता हूँ; क्योंकि कालका उल्लंघन करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है”

“Waktu pada Kṛta-yuga berbeda, pada Tretā berbeda, dan pada Dvāpara pun berbeda lagi. Waktu yang sekarang ini bersifat memusnahkan; kini aku tak lagi memiliki wujud yang dahulu itu.”

Verse 8

भूमिर्नद्यो नगा: शैला: सिद्धा देवा महर्षय: । कालं॑ समनुवर्तन्ते यथा भावा युगे युगे,'सत्ययुगका समय दूसरा था तथा त्रेता और द्वापरका दूसरा ही है। यह काल सभी वस्तुओंको नष्ट करनेवाला है। अब मेरा वह रूप है ही नहीं। पृथ्वी, नदी, वृक्ष, पर्वत, सिद्ध, देवता और महर्षि--ये सभी कालका अनुसरण करते हैं। प्रत्येक युगके अनुसार सभी वस्तुओंके शरीर, बल और प्रभावमें न्यूनाधिकता होती रहती है। अतः कुरुश्रेष्ठ] तुम उस स्वरूपको देखनेका आग्रह न करो। मैं भी युगका अनुसरण करता हूँ; क्योंकि कालका उल्लंघन करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है”

“Bumi, sungai-sungai, gunung-gunung dan puncak-puncak batu, para Siddha, para dewa, dan para maharṣi—semuanya mengikuti arus Waktu, sebagaimana keadaan berubah dari yuga ke yuga.”

Verse 9

बलवर्ष्मप्रभावा हि प्रहीयन्त्युद्धवन्ति च । तदलं बत तदू रूपं द्रष्ट कुरुकुलोद्वह । युगं समनुवर्तामि कालो हि दुरतिक्रम:,'सत्ययुगका समय दूसरा था तथा त्रेता और द्वापरका दूसरा ही है। यह काल सभी वस्तुओंको नष्ट करनेवाला है। अब मेरा वह रूप है ही नहीं। पृथ्वी, नदी, वृक्ष, पर्वत, सिद्ध, देवता और महर्षि--ये सभी कालका अनुसरण करते हैं। प्रत्येक युगके अनुसार सभी वस्तुओंके शरीर, बल और प्रभावमें न्यूनाधिकता होती रहती है। अतः कुरुश्रेष्ठ] तुम उस स्वरूपको देखनेका आग्रह न करो। मैं भी युगका अनुसरण करता हूँ; क्योंकि कालका उल्लंघन करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है”

Waiśampāyana berkata: “Sesungguhnya, kekuatan tubuh, perawakan, dan daya pengaruh berkurang—dan kadang meningkat—menurut yuga. Karena itu, wahai yang termulia dari wangsa Kuru, jangan memaksa untuk melihat wujudku yang dahulu. Aku pun melangkah seiring yuga, sebab Waktu (Kāla) amat sukar dilampaui oleh siapa pun.”

Verse 10

भीम उवाच युगसंख्यां समाचक्ष्व आचारं च युगे युगे । धर्मकामार्थभावांश्ष कर्मवीर्ये भवाभवौ,भीमसेनने कहा--कपिप्रवर! आप मुझे युगोंकी संख्या बताइये और प्रत्येक युगमें जो आचार, धर्म, अर्थ एवं कामके तत्त्व, शुभाशुभ कर्म, उन कर्मोकी शक्ति तथा उत्पत्ति और विनाशादि भाव होते हैं, उनका भी वर्णन कीजिये

Bhima berkata: “Wahai yang termulia di antara para kera, jelaskan kepadaku jumlah dan urutan yuga-yuga, serta tata laku yang berlaku pada tiap yuga. Terangkan pula kecenderungan terhadap dharma, artha, dan kāma; perbuatan baik dan buruk, daya dari perbuatan itu, serta bagaimana makhluk dan keadaan muncul dan lenyap.”

Verse 11

हनूमानुवाच कृतं नाम युगं तात यत्र धर्म: सनातन: । कृतमेव न कर्तव्यं तस्मिन्‌ काले युगोत्तमे,हनुमानजी बोले--तात! सबसे पहला कृतयुग है। उसमें सनातनधर्मकी पूर्ण स्थिति रहती है। उसका कृतयुग नाम इसलिये पड़ा है कि उस उत्तम युगके लोग अपना सब कर्तव्यकर्म सम्पन्न ही कर लेते थे। उनके लिये कुछ करना शेष नहीं रहता था (अतः “कृतम्‌ एव सर्व शुभं यस्मिन्‌ युगे” इस व्युत्पत्तिक अनुसार वह “कृतयुग” कहलाया)

Hanuman berkata: “Anakku, zaman yang paling awal disebut Kṛta Yuga; di sana Dharma yang abadi berdiri dalam kekuatan penuhnya. Pada yuga yang luhur itu, segala yang seharusnya dilakukan telah ‘kṛta’—telah tuntas; tiada kewajiban yang tersisa. Karena itulah ia dinamai Kṛta, ‘zaman yang telah selesai’.”

Verse 12

न तत्र धर्मा: सीदन्ति क्षीयन्ते न च वै प्रजा: । ततः कृतयुगं नाम कालेन गुणतां गतम्‌,उस समय धर्मका हास नहीं होता था। प्रजाका अर्थात्‌ (माता-पिताके रहते हुए) संतानका नाश नहीं होता था। तदनन्तर कालक्रमसे उसमें गौणता आ गयी

Pada yuga itu, dharma tidak merosot dan rakyat pun tidak melemah; anak-anak tidak binasa selagi ayah-ibu masih hidup. Namun kemudian, seiring berjalannya Kāla, zaman yang bernama Kṛta Yuga itu kehilangan keunggulan penuhnya dan menjadi sekunder dalam mutu.

Verse 13

देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगा: । नासन्‌ कृतयुगे तात तदा न क्रयविक्रय:,तात! कृतयुगमें देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग नहीं थे, अर्थात्‌ ये परस्पर भेद-भाव नहीं रखते थे। उस समय क्रय-विक्रयका व्यवहार भी नहीं था

Anakku, pada Kṛta Yuga tidak ada pembedaan seperti dewa, dānava, gandharva, yakṣa, rākṣasa, maupun nāga; tiada pemisahan dan permusuhan antargolongan. Pada masa itu, praktik jual-beli pun tidak ada.

Verse 14

न सामकरग्यजुर्वर्णा: क्रिया नासीच्च मानवी | अभिध्याय फल तत्र धर्म: संन्यास एव च,ऋतक्‌, साम और यजुर्वेदके मन्त्रवर्णोका पृथक्‌-पृथक्‌ विभाग नहीं था। कोई मानवी क्रिया (कृषि आदि) भी नहीं होती थी। उस समय चिन्तन करनेमात्रसे सबको अभीष्ट फलकी प्राप्ति हो जाती थी। सत्ययुगमें एक ही धर्म था, स्वार्थका त्याग

Bhima berkata: “Pada zaman itu tidak ada penggolongan terpisah bagi mantra-mantra Ṛk, Sāman, dan Yajus, dan tidak ada pula pekerjaan manusia seperti bercocok tanam. Hanya dengan berniat dan merenung, orang memperoleh hasil yang diinginkan. Pada Yuga Kṛta (Satya) hanya ada satu dharma—saṃnyāsa, yakni melepaskan kepentingan diri.”

Verse 15

न तस्मिन्‌ युगसंसर्गे व्याधयो नेन्द्रियक्षय: । नासूया नापि रुदितं न दर्पो नापि वैकृतम्‌,उस युगमें बीमारी नहीं होती थी। इन्द्रियोंमें भी क्षीणता नहीं आने पाती थी। कोई किसीके गुणोंमें दोष-दर्शन नहीं करता था। किसीको दुःखसे रोना नहीं पड़ता था और न किसीमें घमंड था; तथा न कोई अन्य विकार ही होता था

Bhima berkata: “Pada zaman itu, selaras dengan watak yuga, tidak ada penyakit dan tidak ada kemunduran indra. Tidak ada iri dengki, dan tidak ada kebiasaan mencari-cari cela pada kebajikan orang lain. Tak seorang pun menangis karena duka; tidak ada kesombongan, dan tidak timbul penyimpangan moral maupun jasmani lainnya.”

Verse 16

न विग्रह: कुतस्तन्द्री न द्वेघो न च पैशुनम्‌ न भयं नापि संतापो न चेष्या न च मत्सर:,कहीं लड़ाई-झगड़ा नहीं था, आलसी भी नहीं थे। द्वेष, चुगली, भय, संताप, ईर्ष्या और मात्सर्य भी नहीं था-

Bhima berkata: “Tidak ada pertengkaran atau perselisihan sama sekali; dari mana mungkin timbul kemalasan? Tidak ada kebencian dan tidak ada fitnah. Tidak ada rasa takut, tidak ada kepedihan batin; tidak ada cemburu dan tidak ada iri dengki.”

Verse 17

ततः परमकं ब्रह्म सा गतियोंगिनां परा । आत्मा च सर्वभूतानां शुक्लो नारायणस्तदा,उस समय योगियोंके परम आश्रय और सम्पूर्ण भूतोंकी अन्तरात्मा परब्रह्मस्वरूप भगवान्‌ नारायणका वर्ण शुक्ल था

Pada saat itu Nārāyaṇa—wujud Brahman Tertinggi, tumpuan dan tujuan akhir para yogin, serta Ātman yang bersemayam dalam semua makhluk—tampak berwarna putih cemerlang, memancarkan kejernihan yang suci.

Verse 18

ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्राश्न॒ कृतलक्षणा: । कृते युगे समभवन्‌ स्वकर्मनिरता: प्रजा:,ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी शम-दम आदि स्वभावसिद्ध शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थे। सत्ययुगमें समस्त प्रजा अपने-अपने कर्तव्यकर्मोंमें तत्पर रहती थी

Bhima berkata: “Pada Yuga Kṛta (Satya), brāhmaṇa, kṣatriya, vaiśya, dan śūdra—semuanya memiliki tanda-tanda kebajikan yang semestinya, seperti pengendalian diri dan ketenangan batin. Pada masa itu seluruh rakyat tekun pada kewajiban masing-masing, setia pada kerja yang ditetapkan bagi kedudukannya.”

Verse 19

समाश्रयं समाचारं समज्ञानं च केवलम्‌ । तदा हि समकर्माणो वर्णा धर्मानवाप्तुवन्‌,उस समय परब्रह्म परमात्मा ही सबके एकमात्र आश्रय थे। उन्हींकी प्राप्तिके लिये सदाचारका पालन किया जाता था। सब लोग एक परमात्माका ही ज्ञान प्राप्त करते थे। सभी वर्णोके मनुष्य परब्रह्म परमात्माके उद्देश्यसे ही समस्त सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते थे और इस प्रकार उन्हें उत्तम धर्म-फलकी प्राप्ति होती थी

Bhima berkata: “Pada zaman purba itu, Brahman Tertinggi semata menjadi satu-satunya perlindungan bagi semua. Demi mencapai-Nya, manusia menegakkan tata laku yang benar; mereka mencari hanya pengetahuan tunggal, tak terbagi, tentang Yang Mahatinggi. Maka orang-orang dari segala varṇa, menjalankan kewajiban mereka dengan jiwa yang seimbang dan selaras, memperoleh buah-buah dharma.”

Verse 20

एकदेवसदायुक्ता एकमन्त्रविधिक्रिया: । पृथग्धर्मास्त्विकवेदा धर्ममेकमनुव्रता:

Mereka berbakti kepada satu Tuhan saja, dan melaksanakan ritus menurut satu mantra serta satu tata cara yang ditetapkan. Walau kewajiban adat mereka tampak beragam, mereka mengikuti satu Weda dan teguh berpegang pada satu Dharma.

Verse 21

सब लोग सदा एक परमात्मदेवमें ही चित्त लगाये रहते थे। सब लोग एक परमात्माके ही नामका जप और उन्हींकी सेवा-पूजा किया करते थे। सबके वर्णाश्रमानुसार पृथक्‌- पृथक्‌ धर्म होनेपर भी वे एकमात्र वेदको ही माननेवाले थे और एक ही सनातनधर्मके अनुयायी थे ।। चातुराश्रम्ययुक्तेन कर्मणा कालयोगिना । अकामफलसंयोगातृ प्राप्रुवन्ति परां गतिम्‌,सत्ययुगके लोग समय-समयपर किये जानेवाले चार आश्रमसम्बन्धी सत्कर्मोंका अनुष्ठान करके कर्म-फलकी कामना और आसक्ति न होनेके कारण परम गति प्राप्त कर लेते थे

Bhima berkata: “Pada Satya Yuga, manusia menambatkan batin mereka teguh pada satu Tuhan Yang Mahatinggi. Mereka senantiasa melantunkan nama-Nya serta bertekun dalam pelayanan dan pemujaan kepada-Nya. Walau kewajiban berbeda menurut varṇa dan āśrama, mereka mengakui satu Weda saja dan mengikuti satu dharma yang kekal. Dengan melaksanakan, pada waktunya, kebajikan yang ditetapkan bagi keempat āśrama, dan karena bebas dari hasrat serta keterikatan pada buah perbuatan, mereka mencapai keadaan tertinggi.”

Verse 22

आत्मयोगसमायुक्तो धर्मोड्यं कृतलक्षण: । कृते युगे चतुष्पादश्चातुर्वण्यस्य शाश्वत:,चित्तवृत्तियोंको परमात्मामें स्थापित करके उनके साथ एकताकी प्राप्ति करानेवाला यह योग नामक धर्म सत्ययुगका सूचक है। सत्ययुगमें चारों वर्णोका यह सनातन धर्म चारों चरणोंसे सम्पन्न--सम्पूर्ण रूपसे विद्यमान था

Bhima berkata: “Dharma ini, yang berciri disiplin yoga—yang menegakkan gerak-gerik batin pada Sang Diri Tertinggi hingga tercapai penyatuan—adalah tanda Kṛta (Satya) Yuga. Pada zaman itu, tatanan kekal empat varṇa berdiri utuh, bertumpu pada keempat ‘kaki’-nya (sempurna dalam segala segi).”

Verse 23

एतत्‌ कृतयुगं नाम त्रैगुण्यपरिवर्जितम्‌ त्रेतामपि निबोध त्वं यस्मिन्‌ सत्र प्रवर्तते

Bhima berkata: “Inilah yang disebut Kṛta (Satya) Yuga—bebas dari pengaruh tiga guṇa. Pahamilah pula Tretā Yuga, ketika satra (ritus-ritus kurban) mulai dijalankan secara nyata.”

Verse 24

यह तीनों गुणोंसे रहित सत्ययुगका वर्णन हुआ। अब त्रेताका वर्णन सुनो, जिसमें यज्ञ- कर्मका आरम्भ होता है ।। पादेन हसते धर्मों रक्ततां याति चाच्युत: । सत्यप्रवृत्ताश्न नरा: क्रियाधर्मपरायणा:,उस समय धर्मके एक चरणका हास हो जाता है और भगवान्‌ अच्युतका स्वरूप लाल वर्णका हो जाता है। लोग सत्यमें तत्पर रहते हैं। शास्त्रोक्त यज्ञक्रिया तथा धर्मके पालनमें परायण रहते हैं

Demikianlah Satya Yuga, yang bebas dari tiga guṇa, telah digambarkan. Kini dengarkan uraian tentang Tretā Yuga, ketika pelaksanaan yajña mulai berlangsung. Pada zaman itu, Dharma berkurang satu perempat, dan wujud Tuhan Yang Tak-Binasā, Acyuta, mengambil rona merah. Manusia tetap berpegang pada kebenaran, tekun menjalankan yajña menurut śāstra serta menunaikan kewajiban dharma.

Verse 25

ततो यज्ञा: प्रवर्तन्ते धर्माक्ष विविधा: क्रिया: । त्रेतायां भावसंकल्पा: क्रियादानफलोपगा:,त्रेतायुगमें ही यज्ञ, धर्म तथा नाना प्रकारके सत्कर्म आरम्भ होते हैं। लोगोंको अपनी भावना तथा संकल्पके अनुसार वेदोक्त कर्म तथा दान आदिके द्वारा अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है

Kemudian, pada Tretā Yuga, yajña, dharma, dan beragam laku kebajikan mulai berjalan. Sesuai dengan niat dan tekad batin masing-masing, manusia memperoleh buah yang diinginkan melalui karma yang diajarkan Veda serta melalui dāna (derma) dan amalan lainnya.

Verse 26

प्रचलन्ति न वै धर्मात्‌ तपोदानपरायणा: । स्वधर्मस्था: क्रियावन्तो नरास्त्रेतायुगे5डभवन्‌,त्रेतायुगके मनुष्य तप और दानमें तत्पर रहकर अपने धर्मसे कभी विचलित नहीं होते थे। सभी स्वधर्मपरायण तथा क्रियावान्‌ थे

Pada Tretā Yuga, mereka yang tekun dalam tapa dan dāna tidak pernah menyimpang dari dharma. Mereka teguh dalam svadharma masing-masing dan giat melaksanakan karya-karya yang ditetapkan.

Verse 27

द्वापरे च युगे धर्मो द्विभागोन: प्रवर्तते । विष्णुवैं पीततां याति चतुर्धा वेद एव च,द्वापरमें हमारे धर्मके दो ही चरण रह जाते हैं, उस समय भगवान्‌ विष्णुका स्वरूप पीले वर्णका हो जाता है और वेद (ऋक्‌, यजुः, साम और अथर्व--इन) चार भागोंमें बँट जाता है

Pada Dvāpara Yuga, dharma berjalan dengan tinggal dua bagian saja. Saat itu Viṣṇu mengambil wujud berwarna kuning, dan Veda yang satu terpecah menjadi empat: Ṛg, Yajus, Sāman, dan Atharvan.

Verse 28

ततो<न्‍्ये च चतुर्वेदास्त्रिवेदाश्व॒ तथापरे । दविवेदाश्वैकवेदाश्वाप्पनचश्व॒ तथापरे,उस समय कुछ द्विज चार वेदोंके ज्ञाता, कुछ तीन वेदोंके विद्वान, कुछ दो ही वेदोंके जानकार, कुछ एक ही वेदके पण्डित और कुछ वेदकी ऋचाओं के ज्ञानसे सर्वथा शून्य होते हैं

Kemudian ada yang lain: sebagian dvija mengetahui keempat Veda; sebagian menguasai tiga; sebagian mengetahui dua; sebagian hanya satu; dan sebagian lagi sama sekali kosong dari pengetahuan tentang ṛcā-ṛcā Veda.

Verse 29

एवं शास्त्रेषु भिन्नेषु बहुधा नीयते क्रिया । तपोदानप्रवृत्ता च राजसी भवति प्रजा,इस प्रकार भिन्न-भिन्न शास्त्रोंके होनेसे उनके बताये हुए कर्मोमें भी अनेक भेद हो जाते हैं तथा प्रजा तप और दान--इन दो ही धर्मोमें प्रवृत होकर राजसी हो जाती है

Ketika ajaran-ajaran śāstra terpecah dan saling menyimpang, laku yang ditetapkan pun terseret ke banyak arah. Maka rakyat, terutama bergiat pada tapa dan dana semata, menjadi dikuasai watak rājasa.

Verse 30

एकवेदस्य चाज्ञानाद्‌ वेदास्ते बहव: कृता: । सत्त्वस्य चेह विश्रंशात्‌ सत्ये कश्चिदवस्थित:,द्वापरमें सम्पूर्ण एक वेदका भी ज्ञान न होनेसे वेदके बहुत-से विभाग कर लिये गये हैं। इस युगमें सात्त्विक बुद्धिका क्षय होनेसे कोई विरला ही सत्यमें स्थित होता है

Karena Veda yang satu tidak dipahami sepenuhnya, ia pun dibagi menjadi banyak Veda. Dan pada zaman ini, ketika kejernihan sattva merosot, hanya orang yang sangat jarang tetap teguh dalam kebenaran.

Verse 31

सत्यात्‌ प्रच्यवमानानां व्याधयो बहवो5भवन्‌ । कामाश्षोपद्रवाश्वैव तदा वै दैवकारिता:,सत्यसे भ्रष्ट होनेके कारण द्वापरके लोगोंमें अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न हो जाते हैं। उनके मनमें अनेक प्रकारकी कामनाएँ पैदा होती हैं और वे बहुत-से दैवी उपद्रवोंसे भी पीड़ित हो जाते हैं

Karena menyimpang dari kebenaran, pada manusia di zaman Dvāpara timbul banyak penyakit. Berbagai hasrat pun bangkit dalam batin mereka, dan mereka juga ditimpa gangguan-gangguan yang bersifat ilahi.

Verse 32

यैर््यमाना: सुभृशं तपस्तप्यन्ति मानवा: । कामकामा: स्वर्गकामा यज्ञांस्तन्वन्ति चापरे,उन सबसे अत्यन्त पीड़ित होकर लोग तप करने लगते हैं। कुछ लोग भोग और स्वर्गकी कामनासे यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं

Ditekan oleh penderitaan itu, manusia menempuh tapa yang sangat berat. Yang lain, menginginkan kenikmatan dan mendambakan surga, menyelenggarakan yajña dengan besar-besaran.

Verse 33

एवं द्वापरमासाद्य प्रजा: क्षीयन्त्यधर्मत: । पादेनैकेन कौन्तेय धर्म: कलियुगे स्थित:,इस प्रकार द्वापरयुगके आनेपर अधर्मके कारण प्रजा क्षीण होने लगती है। (तत्पश्चात्‌ कलियुगका आगमन होता है।) कुन्तीनन्दन! कलियुगमें धर्म एक ही चरणसे स्थित होता है

Demikianlah, ketika zaman Dvāpara tiba, karena adharma rakyat mulai menyusut dan merosot. Lalu datanglah zaman Kali; wahai putra Kuntī, pada Kali dharma berdiri hanya pada satu kaki saja.

Verse 34

तामसं युगमासाद्य कृष्णो भवति केशव: । वेदाचारा: प्रशाम्यन्ति धर्मयज्ञक्रियास्तथा,इस तमोगुणी युगको पाकर भगवान्‌ विष्णुके श्रीविग्रहका रंग काला हो जाता है। वैदिक सदाचार, धर्म तथा यज्ञ-कर्म नष्ट हो जाते हैं

Ketika suatu zaman yang gelap dan tamasik tiba, Keśava (Viṣṇu) disebut menjadi ‘Kṛṣṇa’—berwarna gelap. Pada masa itu, tata laku baik menurut Weda meredup; demikian pula dharma serta upacara yajña dan kewajiban-kewajiban suci ikut merosot.

Verse 35

ईतयो व्याधयस्तन्द्री दोषा: क्रोधादयस्तथा । उपद्रवा: प्रवर्तन्ते आधय: क्षुद्धयं तथा,ईति, व्याधि, आलस्य, क्रोध आदि दोष, मानसिक रोग तथा भूख-प्यासका भय--ये सभी उपद्रव बढ़ जाते हैं

Pada masa itu, wabah dan malapetaka, penyakit, kelesuan, serta cela seperti amarah mulai meningkat; berbagai gangguan pun merebak; demikian pula derita batin, dan sengsara karena lapar dan haus meluas.

Verse 36

युगेष्वावर्तमानेषु धर्मो व्यावर्तते पुन: । धर्मे व्यावर्तमाने तु लोको व्यावर्तते पुन:,युगोंके परिवर्तन होनेपर आनेवाले युगोंके अनुसार धर्मका भी हास होता जाता है। इस प्रकार धर्मके क्षीण होनेसे लोक (की सुख-सुविधा)-का भी क्षय होने लगता है

Ketika yuga-yuga berputar dan silih berganti, dharma pun kembali menyimpang—merosot sesuai watak zaman yang datang. Dan bila dharma demikian merosot, dunia pun kembali merosot: tatanan dan kesejahteraannya ikut menyusut.

Verse 37

लोके क्षीणे क्षयं यान्ति भावा लोकप्रवर्तका: । युगक्षयकृता धर्माः प्रार्थनानि विकुर्वते,लोकके क्षीण होनेपर उसके प्रवर्तक भावोंका भी क्षय हो जाता है। युग-क्षयजनित धर्म मनुष्यकी अभीष्ट कामनाओंके विपरीत फल देते हैं

Ketika dunia merosot, dorongan dan watak yang menggerakkan masyarakat pun ikut layu. Dan dharma yang terbentuk oleh kemerosotan suatu zaman membelokkan doa serta harapan manusia—memberi hasil yang berlawanan dengan yang dicari.

Verse 38

एतत्‌ कलियुगं नाम अचिराद्‌ यत्‌ प्रवर्तते । युगानुवर्तनं त्वेतत्‌ कुर्वन्ति चिरजीविन:,यह कलियुगका वर्णन किया गया, जो शीघ्र ही आनेवाला है। चिरजीवीलोग भी इस प्रकार युगका अनुसरण करते हैं

Inilah yang disebut zaman Kali, yang akan segera berlaku. Bahkan makhluk-makhluk berumur panjang pun mengikuti pergiliran yuga-yuga dengan cara yang sama.

Verse 39

यच्च ते मत्परिज्ञाने कौतूहलमरिंदम । अनर्थकेषु को भाव: पुरुषस्य विजानतः,शत्रुदमन! तुम्हें मेरे पुरातन स्वरूपको देखने या जाननेके लिये जो कौतूहल हुआ है, वह ठीक नहीं है। किसी भी समझदार मनुष्यका निरर्थक विषयोंके लिये आग्रह क्‍यों होना चाहिये?

Wahai penakluk musuh! Rasa ingin tahumu untuk mengenali wujudku yang dahulu, yang purba itu, tidaklah patut. Bagi seorang yang arif dan memahami apa yang sungguh bernilai, mengapa harus ada keterikatan pada hal-hal yang pada akhirnya sia-sia?

Verse 40

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । युगसंख्यां महाबाहो स्वस्ति प्राप्तुहि गम्यताम्‌,महाबाहो! तुमने युगोंकी संख्याके विषयमें मुझसे जो प्रश्न किया है, उसके उत्तरमें मैंने यह सब बातें बतायी हैं। तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम लौट जाओ

Wahai yang berlengan perkasa! Segala yang engkau tanyakan tentang perhitungan jumlah yuga telah kujelaskan sepenuhnya. Semoga keselamatan menyertaimu—kini berangkatlah dan lanjutkan perjalananmu.

Verse 149

इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कदलीषण्डे हनुमद्धीमसंवादे एकोनपञ्चाशदधिकशततमो<ध्याय:

Demikian berakhir bab ke-149 dari Vana Parva dalam Śrī Mahābhārata, pada bagian Tīrtha-yātrā Parva—kisah ziarah suci Lomaśa—berlatar di rimba Kadali, dalam dialog Hanumān dan Bhīma.

Frequently Asked Questions

The tension is between capability and propriety: Bhīma’s potential for immediate violent resolution versus the dharmic requirement to act with restraint, confidentiality, and correct timing under guidance from a revered elder-figure.

Strength attains legitimacy when governed by humility and relational duty; true aid is not merely physical power but disciplined counsel that aligns action with situational dharma and long-term purpose.

No formal phalaśruti appears in this unit; its meta-function is narrative and ethical—authorizing Bhīma’s confidence through Hanūmān’s conditional support and reinforcing the epic’s theme that dharmic success is mediated by restraint and right alliances.