
Sātyaki’s Call for Intervention and Yudhiṣṭhira’s Vow-Bound Restraint (सात्यकिवाक्यं—धर्मराजस्य धैर्यनिश्चयः)
Upa-parva: Tīrthayātrā-upaparva (Pilgrimage and Counsel in Exile)
Sātyaki addresses Balarāma (Rāma) and the Vṛṣṇi circle, arguing that lamentation is untimely and that those with protectors should not remain inactive. He questions why Kṛṣṇa (Janārdana), Balarāma, Pradyumna, Sāmba, Aniruddha, and other Vṛṣṇi heroes would allow the Pāṇḍavas—described as ‘lords of the three worlds’ in capability—to reside in the forest. He proposes immediate mobilization of the Daśārha force and depicts, in martial hyperbole, the capacity of Vāsudeva and the Yādava princes to neutralize the Kaurava leadership and their formations. Vāsudeva responds by accepting the spirit of Sātyaki’s statement yet clarifying that Yudhiṣṭhira will not seek an ‘unwon’ earth by mere force; he will not abandon svadharma for desire, fear, or greed, and the Pāṇḍava coalition remains formidable. Yudhiṣṭhira then affirms that what he must protect most is satya, not kingship; he recognizes mutual understanding with Kṛṣṇa, and states that victory will come when the proper time for valor arrives. He requests the Vṛṣṇi heroes to return, urges vigilance in dharma, and anticipates a future reunion. Vaiśaṃpāyana closes with their formal leave-taking and notes that the king continues visiting tīrthas, proceeding toward a well-watered sacred place and then to Payoṣṇī.
Chapter Arc: बलराम के शोक-विलाप के बीच सात्यकि उन्हें झकझोरते हैं—यह बैठकर रोने का समय नहीं; जो करना है, मिलकर अभी किया जाए। → सात्यकि ‘नाथ’ (सहायक/नेता) के बिना पड़ने वाली विपत्ति का तर्क रखते हैं और कृष्ण-पक्ष की सामर्थ्य का स्मरण कराते हैं—अर्जुनपुत्र अभिमन्यु, साम्ब आदि की रण-क्षमता का उदाहरण देकर बलराम के भीतर उठे संशय को काटते हैं। → कृष्ण की अपराजेयता का घोष—देवताओं सहित समस्त लोकों में कौन है जो कृष्ण के सामने युद्ध में अविषह्य हो? इसी निर्णायक वाक्य-प्रवाह से शोक का जड़त्व टूटता है और कर्तव्य-प्रवृत्ति जागती है। → वायुदेव कृष्ण के कथन की सत्यता की पुष्टि करते हैं—कुरुवृषभ (अर्जुन) अपने भुजबल से अजेय पृथ्वी को न चाहे, यह असंभव है; फिर कृष्ण को विदा कर धर्मराज युधिष्ठिर लोमश सहित भाइयों-बांधवों के साथ विदर्भ-प्रदेश की पुण्य सरिता ‘पयोष्णी’ की ओर तीर्थयात्रा में आगे बढ़ते हैं। → पयोष्णी-तीर्थ पर युधिष्ठिर का निवास और ब्राह्मणों द्वारा स्तुति—आगे इस तीर्थ के माहात्म्य/फल और अगले तीर्थ-क्रम का संकेत।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशती र्थयात्राके प्रसंगमें बलरामवाक्यविषयक एक सौ उतन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ११९ ॥। अप ऋषाज [हुक है आम - इस प्रकारके वृक्षोंको प्रत्यक्ष देखना मृत्युसूचक माना गया है। विशर्त्याधिकशततमो< ध्याय: सात्यकिके शॉौर्यपूर्ण उद्बार तथा युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका अनुमोदन एवं पाण्डवोंका पयोष्णी नदीके तटपर निवास सात्यकिरुवाच न राम काल: परिदेवनाय यदुत्तरं त्वत्र तदेव सर्वे समाचरामो हानतीतकालं युधिष्ठिरो यद्यपि नाह किंचित्
Sātyaki berkata: “Wahai Rāma, ini bukan saat untuk meratap. Apa pun langkah yang tepat dalam keadaan ini, marilah kita semua melaksanakannya bersama. Yudhiṣṭhira, meski tidak berkata apa-apa, bukan orang yang membiarkan saat yang tepat berlalu tanpa bertindak.”
Verse 2
सात्यकिने कहा--बलरामजी! यह समय बैठकर विलाप करनेका नहीं है। अब आगे जो कुछ करना है उसीको हम सब लोग मिलकर करें। यद्यपि महाराज युधिष्ठटिर हमसे कुछ नहीं कहते हैं तो भी हमें अब व्यर्थ समय न बिताकर कौरवोंको उचित उत्तर देना चाहिये ।। ये नाथवन्तोडद्य भवन्ति लोके ते नात्मना कर्म समारभन्ते । तेषां तु कार्येषु भवन्ति नाथा: शिब्यादयो राम यथा ययाते:,इस संसारमें जो लोग सनाथ हैं--जिनके बहुत-से सहायक हैं--वे स्वयं कोई कार्य आरम्भ नहीं करते हैं। उनके सभी कार्योंमें वे सहायक एवं सुहृद् ही सहयोगी होते हैं, जैसे ययातिके उद्धार-कार्यमें शिबि आदि उनके नातियोंने योगदान किया था
Balarāma berkata kepada Sātyaki: “Ini bukan saat untuk duduk dan meratap. Apa pun yang harus dilakukan selanjutnya, marilah kita semua memutuskannya bersama dan melaksanakannya. Walau Raja Yudhiṣṭhira tidak mengatakan apa-apa kepada kita, kita tidak boleh membuang waktu; kita harus memberi jawaban yang setimpal kepada para Kaurava. Di dunia ini, mereka yang ‘bernaung’—yang memiliki banyak penolong—tidak memulai pekerjaan seorang diri; dalam urusan mereka, para sekutu dan sahabatlah yang menjadi kekuatan, sebagaimana Śibi dan yang lain, keturunan Yayāti, turut ambil bagian dalam karya pembebasannya.”
Verse 3
येषां तथा राम समारभन्न्ते कार्याणि नाथा: स्वमतेन लोके । ते नाथवन्तः पुरुषप्रवीरा नानाथवत् कृच्छुमवाप्लुवन्ति,बलरामजी! जगतमें जिनके कार्य उनके सहायक अपने ही विचारसे प्रारम्भ करते हैं, वे पुरुषश्रेष्ठ सनाथ माने जाते हैं। वे अनाथकी भाँति कभी कष्टमें नहीं पड़ते
Balarāma berkata: “Wahai Rāma, mereka yang urusannya dimulai oleh para penolongnya atas pertimbangan mereka sendiri, merekalah para kesatria utama yang ‘bernaung’; mereka tidak jatuh ke dalam kesukaran seperti orang yang tak punya penopang.”
Verse 4
कस्मादिमौ रामजनार्दनौ च प्रद्युम्नसाम्बी च मया समेतौ । वसन्त्यरण्ये सहसोदरीयै- स्त्रैलोक्पनाथानभिगम्य पार्था:,आप दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्ण, मेरेसहित ये प्रद्युम्म और साम्ब सब-के-सब मौजूद हैं। इन त्रिभुवनपतियोंसे मिलकर भी ये कुन्तीके पुत्र अभीतक अपने भाइयोंके साथ वनमें क्यों निवास करते हैं?
Balarāma berkata: “Mengapa Rāma (Balarāma) dan Janārdana (Kṛṣṇa), juga Pradyumna dan Sāmba, semuanya berada di sini bersamaku; namun para Pārtha, putra-putra Kuntī, meski telah mendatangi para penguasa tiga dunia, tetap tinggal di hutan bersama saudara-saudara mereka?”
Verse 5
निर्यातु साध्वद्य दशार्हसेना प्रभूतनानायुधचित्रवर्मा | यमक्षयं गच्छतु धार्त॑राष्ट्र: सबान्धवो वृष्णिबलाभिभूत:,उत्तम तो यह है कि आज ही यदुवंशियोंकी सेना नाना प्रकारके प्रचुर अस्त्र-शस्त्र और विचित्र कवच धारण करके युद्धके लिये प्रस्थान करे। धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन वृष्णिवंशियोंके पराक्रमसे पराजित हो बन्धु-बान्धवोंसहित यमलोक चला जाय। बलरामजी! भगवान् श्रीकृष्ण अलग खड़े रहें, केवल आप ही चाहें तो इस समूची पृथ्वीको भी अपनी क्रोधाग्निकी लपटोंमें लपेट सकते हैं। जैसे देवराज इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया था उसी प्रकार आप भी दुर्योधनको उसके सगे-सम्बन्धियों-सहित मार डालिये
Balarāma berkata: “Biarlah hari ini juga pasukan Daśārha (Vṛṣṇi) berangkat—lengkap dengan senjata yang berlimpah dan beraneka ragam, serta mengenakan zirah yang indah berwarna-warni. Biarlah putra Dhṛtarāṣṭra, ditundukkan oleh kekuatan Vṛṣṇi, pergi ke kediaman Yama bersama kaum kerabatnya.”
Verse 6
त्वं होव कोपात् पृथिवीमपीमां संवेष्टयेस्तिष्ठतु शार्ड्र्धन्चा । स धार्तराष्ट्रं जहि सानुबन्ध॑ वृत्रं यथा देवपतिम॑हिन्द्र:,उत्तम तो यह है कि आज ही यदुवंशियोंकी सेना नाना प्रकारके प्रचुर अस्त्र-शस्त्र और विचित्र कवच धारण करके युद्धके लिये प्रस्थान करे। धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन वृष्णिवंशियोंके पराक्रमसे पराजित हो बन्धु-बान्धवोंसहित यमलोक चला जाय। बलरामजी! भगवान् श्रीकृष्ण अलग खड़े रहें, केवल आप ही चाहें तो इस समूची पृथ्वीको भी अपनी क्रोधाग्निकी लपटोंमें लपेट सकते हैं। जैसे देवराज इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया था उसी प्रकार आप भी दुर्योधनको उसके सगे-सम्बन्धियों-सहित मार डालिये
Balarāma berkata: “Dalam murka, engkau bahkan dapat menyelubungi seluruh bumi ini dengan daya yang menyala—(wahai Śārṅgadhanvā) tetaplah berdiri tenang. Tumbangkan putra Dhṛtarāṣṭra itu beserta para pengikut dan sekutunya, sebagaimana Mahendra, penguasa para dewa, membunuh Vṛtra.”
Verse 7
भ्राता च मे य:ः स सखा गुरुश्न जनार्दनस्यात्मसममश्ष पार्थ: । यदर्थमैच्छन् मनुजा: सुपुत्रं शिष्यं गुरुश्नाप्रतिकूलवादम्,जो मेरे भाई, सखा और गुरु हैं, जो भगवान् श्रीकृष्णके आत्मतुल्य सुहृद् हैं, वे कुन्तीकुमार अर्जुन भी अलग रहें। मनुष्य जिस उद्देश्यसे अच्छे पुत्रकी और गुरु प्रतिकूल न बोलनेवाले शिष्यकी कामना करते हैं, उसे सफल करनेका समय आ गया है
Baladeva berkata: “Pārtha (Arjuna)—yang bagiku adalah saudara, sahabat, dan sesepuh yang patut dihormati, dan yang bagi Janārdana (Kṛṣṇa) semulia dirinya sendiri—hendaknya juga berdiri terpisah demi maksud ini. Kini tibalah saat untuk menunaikan tujuan yang membuat orang mendambakan putra yang luhur dan murid yang tidak membantah gurunya.”
Verse 8
यदर्थमभ्युद्यतमुत्तमं तत् करोति कर्माग्रयमपारणीयम् । तस्यास्त्रवर्षाण्यहमुत्तमास्त्रै- विंहत्य सर्वाणि रणेडभिभूय,जिसके लिये सुयोग्य शिष्य या पुत्र उत्तम अस्त्र-शस्त्र उठाता है तथा युद्धमें श्रेष्ठ एवं अपार पराक्रम कर दिखाता है, उसकी पूर्तिका यही अवसर है। मैं संग्रामभूमिमें अपने उत्तम आयुधोंद्वारा शत्रुओंकी सारी अस्त्र-वर्षाको नष्ट करके उनके समस्त सैनिकोंको परास्त कर दूँगा
Balarāma berkata: “Inilah saat untuk menuntaskan tujuan yang membuat seorang murid atau putra yang layak mengangkat senjata terbaik dan menampilkan perbuatan terdepan dengan keberanian tak terukur. Di medan laga, dengan senjata-senjata utamaku, akan kuhancurkan seluruh hujan senjata musuh; dan setelah menundukkan mereka dalam pertempuran, akan kupukul mundur segenap bala tentaranya.”
Verse 9
कायाच्छिर: सर्पविषाग्निकल्पै: शरोत्तमैरुन्मथितास्मि राम । खड्गेन चाहं निशितेन संख्ये कायाच्छिरस्तस्य बलात् प्रमथ्य,बलरामजी! सर्प, विष एवं अग्निके समान भयंकर उत्तम बाणोंद्वारा शत्रुके सिरको धड़से अलग कर दूँगा, साथ ही उस समरांगणमें शत्रुमण्डलीको मैं बलपूर्वक रौंदकर तीखी तलवारद्वारा उसका मस्तक उड़ा दूँगा
Baladewa berkata: “Wahai Rāma, tubuh dan kepalaku terkoyak dan terguncang oleh anak panah terbaik—mengerikan laksana ular, racun, dan api. Namun di tengah pertempuran, dengan pedangku yang tajam akan kurebut kepalanya dari tubuhnya dengan paksa dan kutebaskan hingga jatuh.”
Verse 10
ततो<स्य सर्वाननुगान् हनिष्ये दुर्योधन चापि कुरूँश्व॒ सर्वान् आत्तायुधं मामिह रौहिणेय पश्यन्तु भैमा युधि जातहर्षा:,तदनन्तर उसके समस्त सेवकोंसहित दुर्योधन और समस्त कौरवोंको भी मार डालूँगा। रोहिणीनन्दन! युद्धमें भयानक पराक्रम दिखानेवाले योद्धा हर्ष और उत्साहमें भरकर आज मुझे हाथमें अस्त्र लिये पूर्वोक्त पराक्रम करते हुए प्रत्यक्ष देखें
“Sesudah itu akan kubunuh semua pengikutnya, dan Duryodhana juga—bahkan seluruh kaum Kuru. Wahai putra Rohiṇī, biarlah para kesatria laksana Bhīma ini, yang bergelora semangatnya di medan laga, menyaksikan aku di sini dengan senjata di tangan.”
Verse 11
निघ्नन्तमेक॑ कुरुयो धमुख्या- नग्निं महाकक्षमिवान्तकाले । प्रद्युम्नमुक्तान् निशितान् न शक्ता: सोढुं कृपद्रोणविकर्णकर्णा:,जैसे प्रलयकालीन अग्नि सूखे घासकी राशिको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार मैं अकेला ही कौरवदलके प्रधान वीरोंका संहार कर डालूँगा और ऐसा करते हुए सब लोग मुझे प्रत्यक्ष देखेंगे। प्रद्युम्मके छोड़े हुए तीखे बाणोंको सहन करनेकी शक्ति कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, विकर्ण और कर्ण--किसीमें नहीं है
Seperti kobaran dahsyat pada akhir zaman yang melalap tumpukan rumput kering hingga jadi abu, demikianlah aku seorang diri akan menumbangkan para kesatria terkemuka dari bala Kuru. Dan anak panah Pradyumna yang setajam silet itu—Kṛpa, Droṇa, Vikarṇa, maupun Karṇa—tak seorang pun sanggup menahannya.
Verse 12
जानामि वीर्य च जयात्मजस्य कार्ष्णिर्भवत्येष यथा रणस्थ: । साम्ब: ससूतं सरथं भुजाभ्यां दुःशासन शास्तु बलात् प्रमथ्य,मैं अर्जुनकुमार अभिमन्युके भी पराक्रमको जानता हूँ। वह समरभूमिमें खड़ा होनेपर साक्षात् श्रीकृष्णनन्दन प्रद्युम्मके ही समान जान पड़ता है। वीरवर साम्ब बलपूर्वक शत्रुसेनको मथकर अपनी दोनों भुजाओंसे रथ और सारथिसहित दुःशासनका दमन करें
“Aku mengetahui keberanian putra Jayā; ketika ia berdiri di medan laga, ia tampak laksana keturunan Kṛṣṇa sendiri. Dan biarlah Sāmba yang gagah, dengan kekuatan semata, menggempur bala musuh dan menundukkan Duḥśāsana—merengkuhnya dengan kedua lengan, beserta kusir dan keretanya.”
Verse 13
न विद्यते जाम्बवतीसुतस्य रणे विषदह्ां हि रणोत्कटस्य । एतेन बालेन हि शम्बरस्य दैत्यस्य सैन्यं सहसा प्रणुन्नम्,जाम्बवतीनन्दन साम्ब रणभूमिमें बड़े प्रचण्ड पराक्रमशाली बन जाते हैं। उस समय इनके लिये कुछ भी असहा नहीं है। इन्होंने बाल्यावस्थामें ही सहसा शम्बरासुरकी सेनाको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था
Baladewa berkata: “Bagi putra Jāmbavatī—yang garang dalam hiruk-pikuk pertempuran—tak ada tempat bagi putus asa di medan perang. Bahkan ketika masih kanak-kanak, dialah yang dengan seketika memukul porak-poranda bala tentara raksasa Śambara.”
Verse 14
वृत्तोरुरत्यायतपीनबाहु- रेतेन संख्ये निहतो<श्वचक्र: । को नाम साम्बस्य महारथस्य रणे समक्ष रथमभ्युदीयात्,इनकी जाँघें गोल हैं, भुजाएँ लंबी और मोटी हैं; इन्होंने युद्धमें अश्वारोहियोंकी कितनी ही सेनाओंका संहार किया है। भला, संग्रामभूमिमें महारथी साम्बके रथके सम्मुख कौन आ सकता है?
Baladewa berkata: “Dengan paha yang bulat dan lengan yang panjang lagi perkasa, ia telah menghancurkan formasi-formasi pasukan berkuda dalam himpitan pertempuran. Siapakah di medan perang yang sanggup maju menghadang kereta Sāmba, sang mahāratha?”
Verse 15
यथा प्रविश्यान्तरमन्तकस्य काले मनुष्यो न विनिष्क्रमेत | तथा प्रविश्यान्तरमस्य संख्ये को नाम जीवन पुनरात्रजेत,जैसे अन्तकाल आनेपर यमराजकी भुजाओंमें पड़ा हुआ मनुष्य कदापि वहाँसे निकल नहीं सकता, उसी प्रकार रणक्षेत्रमें वीरवर साम्बके वशमें आया हुआ कौन ऐसा योद्धा होगा, जो पुनः जीवित लौट सके
Balarāma berkata: “Seperti halnya ketika saat terakhir tiba, seorang manusia yang jatuh ke dalam pelukan Antaka (Maut) takkan pernah dapat keluar darinya, demikian pula—di medan laga—siapa gerangan prajurit yang, setelah masuk ke dalam genggaman pahlawan ini, masih dapat kembali hidup?”
Verse 16
द्रोणं च भीष्मं च महारथौ तौ सुतैर्वृत॑ चाप्पथ सोमदत्तम् । सर्वाणि सैन्यानि च वासुदेव: प्रधक्ष्यते सायकवल्लिजालै:,वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण चाहें तो अपने बाणरूपी अग्निकी लपटोंसे द्रोण और भीष्म--इन दोनों प्रसिद्ध महारथियोंको, पुत्रोंसहित सोमदत्तको तथा सारी कौरवसेनाको भी भस्म कर डालेंगे
Baladeva berkata: “Bila Śrī Kṛṣṇa, putra Vasudeva, berkehendak, ia dapat membakar hingga menjadi abu dengan jala nyala panahnya: Droṇa dan Bhīṣma—dua mahāratha termasyhur itu—beserta Somadatta yang dikelilingi putra-putranya, bahkan seluruh bala tentara. Namun yang ditunjukkan di sini bukan semata kuasa, melainkan kuasa yang ditahan demi dharma.”
Verse 17
कि नाम लोकेष्वविषह्ाुमस्ति कृष्णस्य सर्वेषु सदेवकेषु । आत्तायुथस्योत्तमबाणपाणे- श्रक्रायुधस्याप्रतिमस्य युद्धे,देवताओंसहित सम्पूर्ण लोकोंमें कौन-सी ऐसी वस्तु है, जो हाथोंमें हथियार, उत्तम बाण तथा चक्र धारण करके युद्धमें अनुपम पराक्रम प्रकट करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके लिये असहा हो
Baladeva berkata: “Apa gerangan di seluruh jagat—bahkan bersama para dewa—yang tak tertanggungkan atau mustahil bagi Kṛṣṇa? Mengangkat senjata, menggenggam panah-panah terbaik, dan mengayunkan cakra laksana senjata Śakra (Indra), ia tiada banding dalam perang.”
Verse 18
ततोडनिरुद्धो5प्यसिचर्मपाणि- महीमिमां धार्तराष्ट्रविसंज्ञै: । ह्वतोत्तमाड्रैन्निहतै: करोतु कीर्णा कुशैवेदिमिवाध्वरेषु,ढाल-तलवार लिये हुए वीरवर अनिरुद्ध भी, जैसे यज्ञोंमें कुशाओंद्वारा यज्ञकी वेदी ढक दी जाती है, उसी प्रकार युद्धमें सिर कटाकर मरे और अचेत पड़े हुए धृतराष्ट्रपुत्रोंद्ारा इस भूमिको ढक दें। गद, उल्मुक, बाहुक, भानु, नीथ, युद्धमें शूरवीर कुमार निशठ तथा रणभूमिमें प्रचण्ड पराक्रमी सारण और चारुदेष्ण--ये सब लोग अपने कुलके अनुरूप पराक्रम प्रकट करें
Kemudian biarlah Aniruddha pun—dengan pedang dan perisai di tangan—menutupi bumi ini dengan putra-putra Dhṛtarāṣṭra yang tergeletak tak sadar, kepala mereka ditebas dalam pertempuran, sebagaimana dalam upacara adhvara altar ditaburi dan diselubungi rumput kuśa.
Verse 19
गदोल्मुकौ बाहुकभानुनीथा: शूरश्न संख्ये निशठ: कुमार: । रणोत्कटौ सारणचारुदेष्णौ कुलोचितं विप्रथयन्तु कर्म,ढाल-तलवार लिये हुए वीरवर अनिरुद्ध भी, जैसे यज्ञोंमें कुशाओंद्वारा यज्ञकी वेदी ढक दी जाती है, उसी प्रकार युद्धमें सिर कटाकर मरे और अचेत पड़े हुए धृतराष्ट्रपुत्रोंद्ारा इस भूमिको ढक दें। गद, उल्मुक, बाहुक, भानु, नीथ, युद्धमें शूरवीर कुमार निशठ तथा रणभूमिमें प्रचण्ड पराक्रमी सारण और चारुदेष्ण--ये सब लोग अपने कुलके अनुरूप पराक्रम प्रकट करें
Baladewa bersabda: “Biarlah Gada dan Ulmuka, juga Bāhuka, Bhānu, dan Nītha; biarlah pemuda gagah Niśaṭha di tengah gelora pertempuran; dan Sāraṇa serta Cārudeṣṇa yang garang di himpitan perang—masing-masing menampakkan laku kepahlawanan yang layak bagi garis keturunannya.”
Verse 20
सवृष्णि भोजान्धकयो धमुख्या समागता सात्वतशूरसेना । हत्वा रणे तान् धृतराष्ट्रपुत्रा- ल्लोके यश: स्फीतमुपाकरोतु,यदुवंशियोंकी शौर्यपूर्ण सेना, जिसमें वृष्णि, भोज और अन्धकवंशी योद्धाओंकी प्रधानता है, आक्रमण करके युद्धमें धृतराष्ट्रपत्रोंको मार डाले और संसारमें अपने उज्ज्वल यशका विस्तार करे
Balarāma bersabda: “Semoga pasukan perkasa kaum Yādawa—dengan Vṛṣṇi, Bhoja, dan Andhaka sebagai yang terdepan—berkumpul, menewaskan putra-putra Dhṛtarāṣṭra di medan laga, dan menyebarkan kemasyhuran mereka yang cemerlang ke seluruh dunia.”
Verse 21
ततो<भिमन्यु: पृथिवीं प्रशास्तु यावद् व्रतं धर्मभृतां वरिष्ठ: । युधिष्ठिर: पारयते महात्मा द्यूते यथोक्त कुरुसत्तमेन,धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महात्मा युधिष्ठिस जबतक अपने उस व्रतको, जिसे इन कुरुकुलभूषणने जूएके समय प्रतिज्ञापूर्वक स्वीकार किया था, पूर्ण न कर लें, तबतक अभिमन्यु इस पृथ्वीका शासन करे
Kemudian (Balarāma berkata): “Biarlah Abhimanyu memerintah bumi ini sampai Yudhiṣṭhira yang berhati luhur—terdepan di antara para penegak dharma—menyelesaikan sepenuhnya sumpah yang ia ikrarkan, sebagaimana dinyatakan oleh yang terbaik di antara kaum Kuru pada saat permainan dadu.”
Verse 22
अस्मप्प्रमुक्तिविशिखैर्जितारि- स्ततो महीं भोक्ष्यति धर्मराज: । निर्धार्तराष्ट्रां हतसूतपुत्रा- मेतद्धि नः कृत्यतमं यशस्यथम्,तदनन्तर अपना व्रत समाप्त करके हमारे द्वारा छोड़े हुए बाणोंसे ही शत्रुओंपर विजय पाकर धर्मराज युधिष्ठिर इस पृथ्वीका राज्य भोगेंगे। उस समयतक यह पृथ्वी धृतराष्ट्रके पुत्रोंसे रहित हो जायगी और सूतपुत्र कर्ण भी मर जायगा। यदि ऐसा हुआ तो यह हमारे लिये महान् यशोवर्धक कार्य होगा
Balarāma bersabda: “Sesudah menuntaskan sumpahnya, Dharmarāja akan menaklukkan musuh-musuhnya dengan anak panah yang dilepaskan oleh kita sendiri, lalu menikmati kedaulatan atas bumi ini. Pada saat itu bumi akan bersih dari putra-putra Dhṛtarāṣṭra, dan Karṇa, putra sais kereta, pun telah gugur. Jika demikian terjadi, itulah bagi kita perbuatan yang paling patut—yang sangat menambah kemasyhuran.”
Verse 23
वायुदेव उवाच असंशयं माधव सत्यमेतद् गृह्नीम ते वाक्यमदीनसत्त्व । स्वाभ्यां भुजाभ्यामजितां तु भूमिं नेच्छेत् कुरूणामृषभ: कथंचित्,भगवान् श्रीकृष्ण बोले--उदारहृदय मधुकुलभूषण सात्यके! तुम्हारी यह बात सत्य है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। हम तुम्हारे इन वचनोंको स्वीकार करते हैं; परंतु ये कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर किसी भी ऐसी भूमिको किसी तरह लेना नहीं चाहेंगे, जिसे इन्होंने अपनी भुजाओंद्वारा न जीता हो
Vāyudeva berkata: “Wahai Mādhava, ini tanpa ragu adalah benar. Wahai yang berjiwa tak gentar, aku menerima kata-katamu. Namun, banteng di antara kaum Kuru itu takkan pernah, dalam keadaan apa pun, menghendaki tanah yang belum ia menangkan dengan kekuatan lengannya sendiri.”
Verse 24
न होष कामाजन्न भयान्न लोभाद् युधिष्ठटिरो जातु जह्यात् स्वधर्मम् भीमार्जुनौ चातिरथौ यमौ च तथैव कृष्णा द्रुपदात्मजेयम्,कामना, भय अथवा लोभ किसी भी कारणसे युधिष्ठिर अपना धर्म कदापि नहीं छोड़ सकते। उसी तरह अतिरथी वीर भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा यह द्रुपदकुमारी कृष्णा भी अपना धर्म नहीं छोड़ सकती
Vāyu berkata: “Bukan karena hasrat, bukan karena takut, dan bukan karena loba, Yudhiṣṭhira akan pernah meninggalkan svadharmanya. Demikian pula Bhīma dan Arjuna—para atiratha—bersama kedua putra Mādrī, serta Kṛṣṇā putri Drupada, tidak akan menyimpang dari jalan dharma mereka.”
Verse 25
उभौ हि युद्धे5प्रतिमौ पृथिव्यां वृकोदरश्रैव धनंजयश्न । कस्मान्न कृत्स्नां पृथिवीं प्रशासे- न्माद्रीसुताभ्यां च पुरस्कृतोडयम्,भीमसेन और अर्जन--ये दोनों वीर युद्धमें इस पृथ्वीपर अपना सानी नहीं रखते। इनसे और दोनों माद्रीकुमारोंसे संयुक्त होनेपर ये युधिष्ठिर सारी पृथ्वीका शासन कैसे नहीं कर सकते?
Vāyu berkata: “Di bumi ini, dalam peperangan, Vṛkodara (Bhīma) dan Dhanaṃjaya (Arjuna) keduanya tiada banding. Bila dua putra Mādrī pun mendampingi, mengapa Yudhiṣṭhira tidak mampu memerintah seluruh bumi?”
Verse 26
यदा तु पञ्चालपतिर्महात्मा सकेकयश्षेदिपतिर्वयं च । युध्येम विक्रम्य रणे समेता- स्तदैव सर्वे रिपवो हि न स्यु:,जब महात्मा पांचालराज, केकय, चेदिराज और हम सब लोग एक साथ होकर रणमें पराक्रम दिखायेंगे, उसी समय हमारे सारे शत्रुओंका अस्तित्व मिट जायगा
Namun ketika sang mahatma, penguasa Pañcāla, bersama raja Kaikaya, penguasa Cedi, dan kami semua bersatu serta menunjukkan keberanian di medan perang, pada saat itu juga semua musuh akan lenyap dari keberadaan.
Verse 27
युधिछिर उवाच नेदं चित्र माधव यद् ब्रवीषि सत्य॑ तु मे रक्ष्यतमं न राज्यम् । कृष्णस्तु मां वेद यथावदेक: कृष्णं च वेदाहमथो यथावत्,युधिष्ठिरने कहा--सात्यके! तुम जो कुछ कह रहे हो वह तुम्हारे-जैसे वीरके लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, परंतु मेरे लिये सत्यकी रक्षा ही प्रधान है, राज्यकी प्राप्ति नहीं। केवल श्रीकृष्ण ही मुझे अच्छी तरह जानते हैं और मैं भी कृष्णके स्वरूपको यथार्थ-रूपसे जानता हूँ
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Mādhava, apa yang kau ucapkan bukanlah hal yang mengherankan bagi pahlawan sepertimu. Namun bagiku, bukan kerajaan yang utama, melainkan penjagaan atas satya. Hanya Kṛṣṇa yang sungguh mengenalku sebagaimana adanya, dan aku pun mengenal hakikat Kṛṣṇa sebagaimana adanya.”
Verse 28
यदैव काल पुरुषप्रवीरो वेत्स्यत्ययं माधव विक्रमस्य । तदा रणे त्वं च शिनिप्रवीर सुयोधनं जेष्यसि केशवश्व,शिनिवंशके प्रधान वीर माधव! ये पुरुषरत्न श्रीकृष्ण जभी पराक्रम दिखानेका अवसर आया समझेंगे, तभी तुम और भगवान् केशव मिलकर युद्धमें दुर्योधनको जीत सकोगे
Wahai Mādhava, ketika sang Kāla—yang termulia di antara para lelaki—mengenali saat bagi vikrama, maka di medan perang engkau, pahlawan utama wangsa Śini, bersama Keśava akan menaklukkan Suyodhana.
Verse 29
प्रतिप्रयान्त्वद्य दशार्हवीरा दृष्टोडस्मि नाथैर्नरलोकनाथी: । धर्मेडप्रमादं कुरुताप्रमेया द्रष्टास्मि भूय: सुखिन: समेतान्,अब ये यदुवंशी वीर द्वारकाको लौट जायँ। आपलोग मेरे नाथ या सहायक तो हैं ही, सम्पूर्ण मनुष्य-लोकके भी रक्षक हैं, आपलोगोंसे मिलना हो गया, यह बड़े आनन्दकी बात है। अनुपम शक्तिशाली वीरो! आपलोग धर्मपालनकी ओरसे सदा सावधानी रखें। मैं पुनः आप सभी सुखी मित्रोंको एकत्र हुआ देखूँगा
Wahai para pahlawan Daśārha, berangkatlah kembali hari ini. Aku berbahagia telah melihat kalian—pelindungku, bahkan penjaga seluruh dunia manusia. Pertemuan ini memberiku sukacita besar. Wahai para kesatria yang perkasa tiada terukur, tetaplah senantiasa waspada dalam menjalankan dan melindungi dharma. Semoga kelak aku dapat melihat kalian semua lagi, bahagia, berkumpul sebagai sahabat.
Verse 30
तेडन्योन्यमामन्त्रय तथाभिवाद्य वृद्धान् परिष्वज्य शिशुंश्व॒ सर्वान् । यदुप्रवीरा: स्वगृहाणि जग्मु- स््ते चापि तीर्थान्यनुसंविचेरु:,तत्पश्चात् वे यादव-पाण्डव वीर एक दूसरेकी अनुमति ले, वृद्धोंको प्रणाम करके, बालकोंको हृदयसे लगाकर तथा अन्य सबसे यथायोग्य मिलकर अपने अभीष्ट स्थानको चल दिये। यादववीर अपने घर गये और पाण्डवलोग पूर्ववत् तीर्थोंमें विचरने लगे
Sesudah itu mereka saling berpamitan, memberi hormat kepada para tua-tua, memeluk anak-anak dengan kasih yang tulus, dan menyapa yang lain sebagaimana patutnya, lalu berangkat menuju tujuan masing-masing. Para pahlawan Yadu kembali ke rumah mereka, sedangkan para Pāṇḍava, seperti sebelumnya, melanjutkan pengembaraan dari tirtha ke tirtha.
Verse 31
विसृज्य कृष्णं त्वथ धर्मराजो विदर्भराजोपचितां सुतीर्थाम् जगाम पुण्यां सरितं पयोष्णीं सभ्रातृभृत्य: सह लोमशेन,श्रीकृष्णको विदा करके धर्मराज युधिष्ठिर लोमशजी, भाइयों और सेवकोंके साथ विदर्भनरेशद्वारा पूजित, उत्तम तीर्थोंवाली पुण्य नदी पयोष्णीके तटपर गये
Setelah melepas Śrī Kṛṣṇa, Dharmarāja Yudhiṣṭhira bersama Lomasa, saudara-saudara, dan para pengiringnya pergi ke tepi sungai suci Payoṣṇī—yang dipuja oleh raja Vidarbha dan kaya akan tirtha-tirtha utama.
Verse 32
सुतेन सोमेन विमिश्रतोयां पय: पयोष्णीं प्रति सो5ध्युवास । द्विजातिमुख्यैर्मुदितैर्महात्मा संस्तूयमान: स्तुतिभिर्वराभि:,उसके जलमें यज्ञसम्बन्धी सोमरस मिला हुआ था। पयोष्णीके तटपर जा उन्होंने उसका जल पीकर वहाँ निवास किया। उस समय प्रसन्नतासे भरे हुए श्रेष्ठ द्विज उत्तम स्तुतियोंद्वारा उन महात्मा नरेशकी स्तुति कर रहे थे
Air sungai itu bercampur Soma, minuman persembahan dalam yajña. Setelah tiba di tepi Payoṣṇī, ia meminum airnya dan menetap di sana. Saat itu para dvija terkemuka, bersukacita dalam hati, melantunkan pujian dengan kidung-kidung terbaik bagi sang raja berhati luhur.
Verse 120
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां यादवगमने विंशत्यधिकशततमो<ध्याय:
Demikianlah dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, dalam bagian Tīrthayātrā Parva, pada kisah ziarah suci Lomasa dan episode keberangkatan para Yādava, berakhirlah bab ke-120.
Whether immediate, capability-backed intervention is justified, or whether adherence to satya and the exile agreement must override expedient retaliation despite strategic advantage.
Ethical legitimacy depends not only on power but on timing and vow fidelity; dharma is upheld by disciplined restraint, with action reserved for the proper moment (kāla) rather than impulse.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-point is conveyed narratively through Yudhiṣṭhira’s prioritization of satya over sovereignty and the framing of pilgrimage continuation as dharma-in-practice.