
Phala of Vrata, Niyama, Svādhyāya, Dama, Satya, Brahmacarya, and Service (व्रत-नियम-स्वाध्याय-दम-सत्य-ब्रह्मचर्य-शुश्रूषा-फलप्रश्नः)
Upa-parva: Dharma-Phala Praśna–Uttara (Inquiry into the Fruits of Vows, Discipline, Truth, and Service)
Yudhiṣṭhira opens with a structured inquiry into comparative phala: the outcomes of vows, disciplines, self-study, restraint, Vedic memorization and teaching, giving without receiving, courageous adherence to one’s duty, truthfulness, celibate conduct, and service to parents and teachers. Bhīṣma replies in a sequence that blends pragmatic and soteriological registers. He states that properly undertaken vows yield enduring “worlds” (sanātanāḥ lokāḥ). Niyama bears visible results in the present life, implicitly validated by Yudhiṣṭhira’s own attainments. Svādhyāya yields benefit both here and beyond, culminating in joy in brahmaloka. Dama is elaborated as a superior preservative of merit: the self-controlled are content and effective, obtaining aims without the corrosive effects of anger; anger is said to destroy the value of giving, hence restraint surpasses gift-making when gifts are tainted by hostility. Teaching (adhyāpana) is described as producing imperishable fruit, aligned with correct ritual procedure. The chapter broadens to enumerate multiple modes of “heroism” (śaurya) including sacrifice, truth, discipline, giving, intellect, forgiveness, simplicity, tranquility, study, teaching, and service—each leading to elevated destinations through one’s own karmic fruit. A culminating valuation compares truth with large-scale ritual (aśvamedha), declaring truth superior and cosmically foundational: the sun, fire, wind, and social-religious satisfaction of gods, ancestors, and Brahmins are all grounded in satya. Finally, brahmacarya is praised as a purifier that burns sins, with exemplary ascetic potency; service to parents, guru, and ācārya is affirmed as leading to an excellent station in heaven and avoidance of naraka.
Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं—दानधर्म के विषय में एक प्राचीन इतिहास सुनो: उद्दालक ऋषि और उनके पुत्र नाचिकेत के प्रसंग में स्वयं धर्मराज (यम) के वचन हैं। → उद्दालक यज्ञ-दीक्षा लेकर पुत्र को सेवा-नियम, स्वाध्याय और शुद्ध आचरण में लगाते हैं। कथा का दबाव इस ओर बढ़ता है कि दान केवल ‘देना’ नहीं, बल्कि पात्र-देश-काल, शुद्धता और न्यायार्जित धन से जुड़ा कठोर अनुशासन है; अभाव की स्थिति में कौन-सा दान कैसे किया जाए—यह प्रश्न तीखा होता जाता है। → धर्मराज के निर्णायक उपदेश: ‘धर्म को तुच्छ न समझो; पात्र में, देश-काल के अनुरूप, शुद्ध और न्याय से प्राप्त वस्तु का दान करो; विशेषतः गौ-दान नित्य करो—इसमें संशय न रखो।’ साथ ही अभाव में विकल्प-दान (घृत न हो तो तिलधेनु, तिल न हो तो जलधेनु) का फल-श्रुति देकर दान-मार्ग को अडिग बनाते हैं। → उपदेश का निष्कर्ष स्पष्ट होता है—दान का मूल्य वस्तु की मात्रा से नहीं, शुद्धता, न्यायार्जन, नियमनिष्ठा और विवेकपूर्ण पात्र-चयन से है। वक्ता (कथानक का ‘मैं’) धर्मराज को प्रणाम कर उनकी अनुमति से लौटकर गुरु/भगवत्पाद के चरणों में उपस्थित होता है, और भीष्म इस उपाख्यान को युधिष्ठिर के लिए दानधर्म की कसौटी बना देते हैं।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें नृगका उपाख्यानविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७० ॥। अपन क्रात छा अर: एकसप्ततितमो<् ध्याय: पिताके शापसे नाचिकेतका यमराजके पास जाना और यमराजका नाचिकेतको गोदानकी महिमा बताना युधिछिर उवाच दत्तानां फलसम्प्राप्तिं गवां प्रब्रूहि मेडनघ । विस्तरेण महाबाहो न हि तृप्पामि कथ्यताम्,युधिष्ठिरने पूछा--निष्पाप महाबाहो! गौओंके दानसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह मुझे विस्तारके साथ बताइये। मुझे आपके वचनामृतोंको सुनते-सुनते तृप्ति नहीं होती है, इसलिये अभी और कहिये
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang tanpa dosa, wahai yang berlengan perkasa, jelaskan kepadaku dengan rinci ganjaran yang diperoleh dari menghadiahkan sapi. Aku tak pernah puas hanya dengan mendengarnya; maka katakanlah lebih lanjut.”
Verse 2
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ऋषेरुद्दालकेर्वाक्यं नाचिकेतस्य चो भयो:,भीष्मजीने कहा--राजन्! इस विषयमें विज्ञ पुरुष उद्दालक ऋषि और नाचिकेत दोनोंके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं
Bhīṣma berkata: “Dalam hal ini pula, orang-orang bijak mengemukakan sebuah kisah purba sebagai teladan—yakni dialog antara resi Uddālaka dan Nāciketas, yang memuat ucapan keduanya.”
Verse 3
ऋषिरुद्दालकिर्दीक्षामुपगम्य तत: सुतम् । त्वं मामुपचरस्वेति नाचिकेतमभाषत,एक समय उद्दालक ऋषिने यज्ञकी दीक्षा लेकर अपने पुत्र नाचिकेतसे कहा--“तुम मेरी सेवामें रहो।”
Bhīṣma berkata: Sang resi Uddālaka, setelah menjalani dīkṣā untuk suatu yajña, lalu berkata kepada putranya Nāciketas, “Tinggallah dalam baktimu kepadaku—layani aku.”
Verse 4
समाप्ते नियमे तस्मिन् महर्षि: पुत्रमब्रवीत् | उपस्पर्शनसक्तस्य स्वाध्यायाभिरतस्य च,उस यज्ञका नियम पूरा हो जानेपर महर्षिने अपने पुत्रसे कहा--“बेटा! मैंने समिधा, कुशा, फूल, जलका घड़ा और प्रचुर भोजन-सामग्री (फल-फूल आदि)--इन सबका संग्रह करके नदीके किनारे रख दिया और स्नान तथा वेदपाठ करने लगा। फिर उन सब वस्तुओंको भूलकर मैं यहाँ चला आया। अब तुम जाकर नदीतटसे वह सब सामान यहाँ ले आओ'
Bhīṣma berkata: Setelah laku-aturan itu selesai, sang maharsi berkata kepada putranya, “Anakku, ketika aku tekun dalam penyucian diri dan tenggelam dalam swādhyāya, aku telah mengumpulkan kayu samidh, rumput kuśa, bunga-bunga, sebuah kendi air, serta banyak perbekalan, dan kutaruh di tepi sungai. Lalu aku melupakannya dan datang ke sini. Pergilah sekarang ke tepi sungai dan bawalah seluruhnya kemari.”
Verse 5
इध्मा दर्भा: सुमनस: कलशश्लातिभोजनम् | विस्मृतं मे तदादाय नदीतीरादिहाव्रज,उस यज्ञका नियम पूरा हो जानेपर महर्षिने अपने पुत्रसे कहा--“बेटा! मैंने समिधा, कुशा, फूल, जलका घड़ा और प्रचुर भोजन-सामग्री (फल-फूल आदि)--इन सबका संग्रह करके नदीके किनारे रख दिया और स्नान तथा वेदपाठ करने लगा। फिर उन सब वस्तुओंको भूलकर मैं यहाँ चला आया। अब तुम जाकर नदीतटसे वह सब सामान यहाँ ले आओ'
Bhishma berkata: “Kayu bakar untuk upacara, rumput darbha, bunga-bunga, sebuah kendi air, dan bekal makanan yang berlimpah—semuanya telah kukumpulkan dan kutinggalkan di tepi sungai ketika aku pergi mandi dan melantunkan Weda. Karena lupa, aku kembali ke sini. Pergilah sekarang ke tepi sungai, ambil semua itu, dan bawalah kemari.”
Verse 6
गत्वानवाप्य तत् सर्व नदीवेगसमाप्लुतम् | न पश्यामि तदित्येवं पितरं सोडब्रवीन्मुनि:,नाचिकेत जब वहाँ गया, तब उसे कुछ न मिला। सारा सामान नदीके वेगमें बह गया था। नाचिकेत मुनि लौट आया और पितासे बोला--'मुझे तो वहाँ वह सब सामान नहीं दिखायी दिया”
Ia pergi ke sana, namun tidak mendapatkan apa pun; semuanya telah tersapu oleh derasnya arus sungai. Sang resi kembali dan berkata kepada ayahnya, “Aku tidak melihat semua itu di sana.”
Verse 7
क्षुत्पिपासाश्रमाविष्टो मुनिरुद्दा लकिस्तदा । यम॑ पश्येति त॑ पुत्रमशपत् स महातपा:,महातपस्वी उद्दालक मुनि उस समय भूख-प्याससे कष्ट पा रहे थे, अतः रुष्ट होकर बोले--'अरे वह सब तुम्हें क्यों दिखायी देगा? जाओ यमराजको देखो।” इस प्रकार उन्होंने उसे शाप दे दिया
Bhishma berkata: Saat itu resi Uddālaka, yang besar tapa-bratanya, diliputi lapar, haus, dan letih. Ia murka lalu mengutuk putranya, berkata, “Mengapa semua itu harus tampak bagimu? Pergilah, pandanglah Yama.”
Verse 8
तथा स पित्राभिहतो वाग्वज्रेण कृताञज्जलि: । प्रसीदेति ब्रुवन्नेव गतसत्त्वोडपतद् भुवि,पिताके वाग्वज़्से पीड़ित हुआ नाचिकेत हाथ जोड़कर बोला--'प्रभो! प्रसन्न होइये।' इतना ही कहते-कहते वह निष्प्राण होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा
Tersambar oleh halilintar kata-kata ayahnya, ia menangkupkan tangan dan memohon, “Berkenanlah, wahai tuan.” Bahkan ketika kata-kata itu masih di bibirnya, daya hidupnya surut, dan ia roboh ke tanah.
Verse 9
नाचिकेतं पिता दृष्टवा पतितं दुःखमूर्च्छित: । कि मया कृतमित्युक्त्वा निपषात महीतले,नाचिकेतको गिरा देख उसके पिता भी दु:खसे मूर्च्छित हो गये और “अरे, यह मैंने क्या कर डाला!” ऐसा कहकर पृथ्वीपर गिर पड़े
Melihat Naciketas tergeletak, ayahnya pun pingsan karena duka; ia berseru, “Apa yang telah kulakukan!” lalu jatuh tersungkur ke tanah.
Verse 10
तस्य दुःखपरीतस्य स्वं पुत्रमनुशोचत: । व्यतीतं तदहःशेषं सा चोग्रा तत्र शर्वरी,दुःखमें डूबे और बारंबार अपने पुत्रके लिये शोक करते हुए ही महर्षिका वह शेष दिन व्यतीत हो गया और भयानक रात्रि भी आकर समाप्त हो गयी
Dilanda duka dan berulang kali meratapi putranya sendiri, sang resi menghabiskan sisa hari itu dalam kesedihan; dan di sana, malam yang mengerikan itu pun datang lalu berlalu.
Verse 11
पित्र्येणा श्रुप्रषातेन नाचिकेत: कुरूद्गवह । प्रास्पन्दच्छयने कौश्ये वृष्टया सस्यमिवाप्लुतम्,कुरुश्रेष्ठ! कुशकी चटाईपर पड़ा हुआ नाचिकेत पिताके आँसुओंकी धारासे भीगकर कुछ हिलने-डुलने लगा, मानो वर्षसे सिंचकर अनाजकी सूखी खेती हरी हो गयी हो
Wahai banteng di antara kaum Kuru, Naciketas yang terbaring di atas alas wol mulai bergerak ketika basah oleh aliran air mata ayahnya—laksana ladang yang kering, setelah diguyur hujan, kembali menghijau.
Verse 12
स पर्यपृच्छत् त॑ पुत्र क्षीणं पर्यागतं पुन: । दिव्यैर्गन्धै: समादिग्ध॑ क्षीणस्वप्नमिवोत्थितम्,महर्षिका वह पुत्र मरकर पुन: लौट आया, मानो नींद टूट जानेसे जाग उठा हो। उसका शरीर दिव्य सुगन्धसे व्याप्त हो रहा था। उस समय उद्दालकने उससे पूछा--
Putra sang resi itu kembali setelah mati, seakan terjaga dari mimpi yang memudar. Tubuhnya dipenuhi keharuman ilahi. Saat itu Uddalaka bertanya kepadanya—
Verse 13
अपि पुत्र जिता लोका: शुभास्ते स्वेन कर्मणा | दिष्ट्या चासि पुन: प्राप्तो न हि ते मानुषं वपु:,बेटा! क्या तुमने अपने कर्मसे शुभ लोकोंपर विजय पायी है? मेरे सौभाग्यसे ही तुम पुनः यहाँ चले आये हो। तुम्हारा यह शरीर मनुष्योंका-सा नहीं है--दिव्य भावको प्राप्त हो गया है”
Anakku! Apakah dengan karmamu engkau telah menaklukkan alam-alam yang mulia? Berkat keberuntunganku engkau kembali lagi ke sini. Tubuhmu ini bukan lagi seperti tubuh manusia—ia telah memperoleh sifat yang ilahi.
Verse 14
प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य पित्रा पृष्टो महात्मना । सतां वार्ता पितुर्मध्ये महर्षीणां न्यवेदयत्,अपने महात्मा पिताके इस प्रकार पूछनेपर परलोककी सब बातोंको प्रत्यक्ष देखनेवाला नाचिकेत महर्षियोंके बीचमें पितासे वहाँका सब वृत्तान्त निवेदन करने लगा--
Ketika ayahnya yang berhati luhur bertanya demikian, Naciketas—yang telah menyaksikan sendiri segala perkara alam baka—di tengah para maharesi mulai menuturkan kepada ayahnya seluruh kisah yang terjadi di sana.
Verse 15
कुर्वन् भवच्छासनमाशु यातो हाहं विशालां रुचिरप्रभावाम् | वैवस्वतीं प्राप्प सभामपश्यं सहस्रशो योजनहेमभासम्,“पिताजी! मैं आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये यहाँसे तुरन्त प्रस्थित हुआ और मनोहर कान्ति एवं प्रभावसे युक्त विशाल यमपुरीमें पहुँचकर मैंने वहाँकी सभा देखी, जो सुवर्णके समान सुन्दर प्रभासे प्रकाशित हो रही थी। उसका तेज सहस्रों योजन दूरतक फैला हुआ था
Bhishma berkata, “Mematuhi titahmu, aku segera berangkat. Setelah mencapai kota Yama yang luas—indah oleh cahaya dan wibawanya—aku menyaksikan balairung Vaivasvata, berkilau laksana emas, dengan sinar yang menjalar hingga ribuan yojana.”
Verse 16
दृष्टवैव मामभिमुखमापततन्तं देहीति स ह्वासनमादिदेश । वैवस्वतोडर्घ्यादिभिरह णैश्ष भवत्कृते पूजयामास मां सः:,“मुझे सामनेसे आते देख विवस्वानके पुत्र यमने अपने सेवकोंको आज्ञा दी कि “इनके लिये आसन दो।” उन्होंने आपके नाते अर्घ्य आदि पूजनसम्बन्धी उपचारोंसे स्वयं ही मेरा पूजन किया
Bhishma berkata, “Begitu melihatku datang menghadapnya, Vaivasvata Yama, putra Vivasvan, memerintahkan para pelayan, ‘Sediakan tempat duduk baginya.’ Lalu, demi menghormatimu, ia sendiri menyambutku dengan tata cara penerimaan tamu—arghya dan penghormatan lainnya.”
Verse 17
ततस्त्वहं तं शनकैरवोचं वृतः सदस्यैरभिपूज्यमान: । प्राप्तो5स्मि ते विषयं धर्मराज लोकानहों यानहं तान् विधत्स्व,“तब सब सदस्योंसे घिरकर उनके द्वारा पूजित होते हुए मैंने वैवस्वत यमसे धीरेसे कहा --'धर्मराज! मैं आपके राज्यमें आया हूँ; मैं जिन लोकोंमें जानेके योग्य होऊँ, उनमें जानेके लिये मुझे आज्ञा दीजिये"
Kemudian, dikelilingi para tetua sidang dan dimuliakan oleh mereka, aku berkata perlahan kepada Vaivasvata Yama, “Wahai Dharmaraja, aku telah memasuki wilayahmu; tempatkanlah aku pada dunia-dunia yang layak bagiku.”
Verse 18
यमोडब्रवीन्मां न मृतोडसि सौम्य यम॑ पश्येत्याह स त्वां तपस्वी । पिता प्रदीप्ताग्निसमानतेजा न तच्छक्यमनृतं विप्र कर्तुम्,“तब यमराजने मुझसे कहा--“सौम्य! तुम मरे नहीं हो। तुम्हारे तपस्वी पिताने इतना ही कहा था कि तुम यमराजको देखो। विप्रवर! वे तुम्हारे पिता प्रजजलित अग्निके समान तेजस्वी हैं। उनकी बात झूठी नहीं की जा सकती
Bhishma berkata, Yama menuturkan kepadaku, “Wahai yang lembut budi, engkau tidak mati. Ayahmu yang bertapa hanya berkata, ‘Pergilah dan lihat Yama.’ Wahai brahmana, ayahmu bercahaya laksana api yang menyala; ucapannya tak mungkin dibuat tidak benar.”
Verse 19
दृष्टस्ते5हं प्रतिगच्छस्व तात शोचत्यसौ तव देहस्य कर्ता । ददानि कि चापि मन:प्रणीत॑ प्रियातिथेस्तव कामान् वृणीष्व,“तात! तुमने मुझे देख लिया। अब तुम लौट जाओ। तुम्हारे शरीरका निर्माण करनेवाले वे तुम्हारे पिताजी शोकमग्न हो रहे हैं। वत्स! तुम मेरे प्रिय अतिथि हो। तुम्हारा कौन-सा मनोरथ मैं पूर्ण करूँ। तुम्हारी जिस-जिस वस्तुके लिये इच्छा हो, उसे माँग लो”
Bhishma berkata, “Anakku, engkau telah melihatku; kini kembalilah. Ayahmu—pembentuk tubuhmu—tengah diliputi duka. Engkau tamu kesayanganku; pilihlah segala hasrat yang terbit di hatimu. Apa pun yang kau minta, akan kuberikan.”
Verse 20
तेनैवमुक्तस्तमहं प्रत्यवोचं प्राप्तोडस्मि ते विषयं दुर्निवर्त्यम् । इच्छाम्यहं पुण्यकृतां समृद्धान् लोकान द्रष्ठ॑ यदि ते5हं वराह:,“उनके ऐसा कहनेपर मैंने इस प्रकार उत्तर दिया--“भगवन्! मैं आपके उस राज्यमें आ गया हूँ, जहाँसे लौटकर जाना अत्यन्त कठिन है। यदि मैं आपकी दृष्टिमें वर पानेके योग्य होऊँ तो पुण्यात्मा पुरुषोंको मिलनेवाले समृद्धिशाली लोकोंका मैं दर्शन करना चाहता हूँ!
Ketika ia berbicara demikian kepadaku, aku menjawab: “Wahai Tuhan yang mulia, aku telah memasuki wilayah-Mu, yang darinya kembali amatlah sukar. Jika di mata-Mu aku layak menerima anugerah, aku ingin menyaksikan dunia-dunia makmur yang dicapai oleh mereka yang menunaikan kebajikan.”
Verse 21
यान॑ समारोप्य तु मां स देवो वाहैर्युक्त सुप्रभं भानुमत् तत् । संदर्शयामास तदात्मलोकान् सर्वास्तथा पुण्यकृतां द्विजेन्द्र,द्विजेन्द्र! तब यम देवताने वाहनोंसे जुते हुए उत्तम प्रकाशसे युक्त तेजस्वी रथपर मुझे बिठाकर पुण्यात्माओंको प्राप्त होनेवाले अपने यहाँके सभी लोकोंका मुझे दर्शन कराया
Bhīṣma berkata: “Wahai yang terbaik di antara para dwija, kemudian dewa Yama mendudukkanku di atas kereta yang bercahaya, terang benderang laksana matahari, ditarik oleh kuda-kuda; lalu ia memperlihatkan kepadaku seluruh alam miliknya—ranah yang dicapai oleh para pelaku kebajikan.”
Verse 22
अपश्यं तत्र वेश्मानि तैजसानि महात्मनाम् । नानासंस्थानरूपाणि सर्वरत्नमयानि च,“तब मैंने महामनस्वी पुरुषोंको प्राप्त होनेवाले वहाँके तेजोमय भवनोंका दर्शन किया। उनके रूप-रंग और आकार-प्रकार अनेक तरहके थे। उन भवनोंका सब प्रकारके रत्नोंद्वारा निर्माण किया गया था
Di sana aku melihat kediaman-kediaman bercahaya milik para mahātmā: beraneka bentuk dan susunannya, dan semuanya tersusun dari berbagai permata.
Verse 23
चन्द्रमण्डलशु भ्राणि किडुकिणीजालवन्ति च । अनेकशतभौमानि सान्तर्जलवनानि च,“कोई चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल थे। किन्हींपर क्षुद्रघंटियोंसे युक्त झालरें लगी थीं। उनमें सैकड़ों कक्षाएँ और मंजिलें थीं। उनके भीतर जलाशय और वन-उपवन सुशोभित थे। कितनोंका प्रकाश नीलमणिमय सूर्यके समान था। कितने ही चाँदी और सोनेके बने हुए थे। दिन्हीं-किन्हीं भवनोंके रंग प्रातःकालीन सूर्यके समान लाल थे। उनमेंसे कुछ विमान या भवन तो स्थावर थे और कुछ इच्छानुसार विचरनेवाले थे
Sebagian istana berkilau putih laksana cakram bulan; sebagian dihiasi jalinan rumbai yang bertabur lonceng-lonceng kecil. Banyak yang memiliki ratusan ruang dan tingkat; dan di dalamnya tampak telaga-telaga serta rimba dan taman yang elok.
Verse 24
वैदूर्यार्फप्रकाशानि रूप्यरुक्ममयानि च । तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च,“कोई चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल थे। किन्हींपर क्षुद्रघंटियोंसे युक्त झालरें लगी थीं। उनमें सैकड़ों कक्षाएँ और मंजिलें थीं। उनके भीतर जलाशय और वन-उपवन सुशोभित थे। कितनोंका प्रकाश नीलमणिमय सूर्यके समान था। कितने ही चाँदी और सोनेके बने हुए थे। दिन्हीं-किन्हीं भवनोंके रंग प्रातःकालीन सूर्यके समान लाल थे। उनमेंसे कुछ विमान या भवन तो स्थावर थे और कुछ इच्छानुसार विचरनेवाले थे
Sebagian vimāna memancarkan sinar laksana vaidūrya dan matahari; sebagian dibuat dari perak dan emas. Sebagian bersemu merah seperti matahari muda di ufuk pagi. Di antaranya ada yang tetap di tempat, dan ada pula yang bergerak menurut kehendak.
Verse 25
भक्ष्यभोज्यमयान् शैलान् वासांसि शयनानि च । सर्वकामफलांश्वैव वृक्षान् भवनसंस्थितान्,“उन भवनोंमें भक्ष्य और भोज्य पदार्थोंके पर्वत खड़े थे। वस्त्रों और शय्याओंके ढेर लगे थे तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाले बहुत-से वृक्ष उन गृहोंकी सीमाके भीतर लहलहा रहे थे
Di dalam istana-istana itu berdiri timbunan makanan dan hidangan lezat setinggi gunung; pakaian dan ranjang pun bertumpuk-tumpuk. Dan di dalam batas kediaman itu tumbuh subur banyak pohon yang menganugerahkan segala buah yang diinginkan hati.
Verse 26
नद्यो वीथ्य: सभा वाप्यो दीर्घिकाश्वैव सर्वश: । घोषवन्ति च यानानि युक्तान्यथ सहस्रश:,“उन दिव्य लोकोंमें बहुत-सी नदियाँ, गलियाँ, सभाभवन, बावड़ियाँ, तालाब और जोतकर तैयार खड़े हुए घोषयुक्त सहस्रों रथ मैंने सब ओर देखे थे
Di dunia-dunia yang bercahaya itu, di segala penjuru kulihat sungai-sungai, jalan-jalan lebar, balai pertemuan, sumur dan waduk, serta kolam-kolam panjang. Aku juga melihat ribuan demi ribuan kendaraan—terpasang dan siap—bergema dengan bunyi pertanda mujur.
Verse 27
क्षीरस्रवा वै सरितो गिरीश्व सर्पिस्तथा विमलं चापि तोयम् । वैवस्वतस्यानुमतांश्न देशा- नदृष्टपूर्वान् सुबहूनपश्यम्,“मैंने दूध बहानेवाली नदियाँ, पर्वत, घी और निर्मल जल भी देखे तथा यमराजकी अनुमतिसे और भी बहुत-से पहलेके न देखे हुए प्रदेशोंका दर्शन किया
Aku melihat sungai-sungai yang mengalirkan susu, gunung-gunung, juga ghee, serta air yang bening tanpa cela. Dan dengan izin Vaivasvata (Yama), aku menyaksikan banyak wilayah yang belum pernah kulihat sebelumnya.
Verse 28
सर्वान् दृष्टवा तदहं धर्मराज- मवोचं वै प्रभविष्णुं पुराणम् क्षीरस्यैता: सर्पिषश्नैव नद्य: शश्वत्सत्रोता: कस्य भोज्या: प्रदिष्टा:,“उन सबको देखकर मैंने प्रभावशाली पुरातन देवता धर्मराजसे कहा--'प्रभो! ये जो घी और दूधकी नदियाँ बहती रहती हैं, जिनका स्रोत कभी सूखता नहीं है, किनके उपभोगमें आती हैं--इन्हें किनका भोजन नियत किया गया है?”
Setelah melihat semuanya, aku berkata kepada Dharmaraja yang purba dan berwibawa: “Wahai Tuan, sungai-sungai susu dan ghee ini mengalir tanpa henti, sumbernya tak pernah kering—siapakah yang ditetapkan untuk menikmatinya sebagai santapan?”
Verse 29
यमोअब्रवीद् विद्धि भोज्यास्त्वमेता ये दातार: साधवो गोरसानाम् | अन्ये लोका: शाश्वृता वीतशोकै: समाकीर्णा गोप्रदाने रतानाम्,“यमराजने कहा--“ब्रह्मन! तुम इन नदियोंको उन श्रेष्ठ पुरुषोंका भोजन समझो, जो गोरस दान करनेवाले हैं। जो गोदानमें तत्पर हैं, उन पुण्यात्माओंके लिये दूसरे भी सनातन लोक विद्यमान हैं, जिनमें दुःख-शोकसे रहित पुण्यात्मा भरे पड़े हैं
Yama berkata: “Wahai Brahmana, ketahuilah bahwa sungai-sungai ini adalah santapan bagi orang-orang saleh yang mendermakan hasil susu sapi. Bagi mereka yang tekun dalam dana sapi, ada pula dunia-dunia lain yang kekal—bebas dari duka dan nestapa—dipenuhi para bajik.”
Verse 30
न त्वेतासां दानमात्र प्रशस्तं पात्र कालो गोविशेषो विधिक्ष । ज्ञात्वा देयं विप्र गवान्तरं हि दुःखं ज्ञातुं पावकादित्यभूतम्,“विप्रवर! केवल इनका दानमात्र ही प्रशस्त नहीं है; सुपात्र ब्राह्मण, उत्तम समय, विशिष्ट गौ तथा दानकी सर्वोत्तम विधि--इन सब बातोंको जानकर ही गोदान करना चाहिये। गौओंका आपसमें जो तारतम्य है, उसे जानना बहुत कठिन काम है और अग्नि एवं सूर्यके समान तेजस्वी पात्रको पहचानना भी सरल नहीं है
Bhishma berkata: “Wahai Brahmana terbaik, bukan semata-mata tindakan memberi sapi-sapi ini yang dipuji. Gōdāna hendaknya dilakukan setelah memahami kelayakan penerima, waktu yang tepat, keunggulan khas sapi, serta tata cara pemberian yang terbaik. Sebab perbedaan tingkat di antara sapi-sapi itu sukar dikenali, dan tidak mudah pula mengenali penerima yang bercahaya laksana Api dan Surya.”
Verse 31
स्वाध्यायवान् यो5तिमात्र॑ तपस्वी वैतानस्थो ब्राह्मण: पात्रमासाम् | कृच्छोत्सृष्टा: पोषणाभ्यागताश्न द्वारैरेतैगोविशेषा: प्रशस्ता:,जो ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायसे सम्पन्न, अत्यन्त तपस्वी तथा यज्ञके अनुष्ठानमें लगा हुआ हो, वही इन गौओंके दानका सर्वोत्तम पात्र है। इनके सिवा जो ब्राह्मण कृच्छुव्रतसे मुक्त हुए हों और परिवारकी पुष्टिके लिये गोदानके प्रार्थी होकर आये हों, वे भी दानके उत्तम पात्र हैं। इन सुयोग्य पात्रोंको निमित्त बनाकर दानमें दी गयी श्रेष्ठ गौएँ उत्तम मानी गयी हैं
Bhishma berkata: “Brahmana yang tekun dalam svādhyāya Weda, sangat bertapa, dan giat melaksanakan ritus yajña Veda (vaitāna), dialah penerima utama bagi dana sapi ini. Selain dia, para Brahmana yang telah menuntaskan laku berat ‘kṛcchra’ dan datang memohon penopang bagi pemeliharaan rumah tangga mereka pun layak menerimanya. Bila penerima yang demikian dijadikan alasan (nimitta) bagi pemberian, maka sapi-sapi unggul yang didanakan itu sungguh patut dipuji.”
Verse 32
तिस्त्रो रात्र्यस्त्वद्धिरुपोष्य भूमौ तृप्ता गावस्तर्पिति भ्य: प्रदेया: । वत्सै: प्रीता: सुप्रजा: सोपचारा- स्त्र्यहं दत्त्वा गोरसैर्वर्तितव्यम्,“तीन राततक उपवासपूर्वक केवल जल पीकर धरतीपर शयन करे। तत्पश्चात् खिला- पिलाकर तृप्त की हुई गौओंका भोजन आदिसे संतुष्ट किये हुए ब्राह्मणोंको दान करे। वे गौएँ बछड़ोंके साथ रहकर प्रसन्न हों, सुन्दर बच्चे देनेवाली हों तथा अन्यान्य आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त हों। ऐसी गौओंका दान करके तीन दिनोंतक केवल गोरसका आहार करके रहना चाहिये
Bhishma berkata: “Selama tiga malam hendaknya seseorang berpuasa, hanya minum air dan tidur di tanah. Setelah itu, ia harus mendanakan sapi-sapi yang telah diberi makan hingga puas—bersama anak-anaknya—kepada para Brahmana yang telah dihormati dan dipuaskan dengan jamuan serta pelayanan yang layak. Sapi-sapi itu hendaknya jinak dan senang bersama anaknya, mampu menghasilkan keturunan yang baik, serta disertai perlengkapan dan perawatan yang diperlukan. Setelah memberi demikian, ia hendaknya hidup tiga hari hanya dengan gōrasa (hasil olahan susu) sebagai santapan.”
Verse 33
दत्त्वा धेनुं सुव्रतां कांस्यदोहां कल्याणवत्सामपलायिनीं च । यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- स्तावद् वर्षाण्यश्रुते स्वर्गलोकम्,“उत्तम शील-स्वभाववाली, भले बछड़ेवाली और भागकर न जानेवाली दुधारू गायका कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करके उस गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोतक दाता स्वर्गलोकका सुख भोगता है
Bhishma berkata: “Dengan mendanakan seekor dhenu yang berperilaku luhur—disertai bejana perah dari perunggu—yang memiliki anak yang baik, tidak suka kabur, dan berlimpah susu, sang pemberi menikmati surga selama bertahun-tahun sebanyak helai rambut pada tubuh sapi itu.”
Verse 34
तथानड्वाहं ब्राह्मुणेभ्य: प्रदाय दान्तं धुर्य बलवन्तं युवानम् । कुलानुजीव्यं वीर्यवन्तं बृहन्तं भुड्क्ते लोकान् सम्मितान् थेनुदस्य,“इसी प्रकार जो शिक्षा देकर काबूमें किये हुए, बोझ ढोनेमें समर्थ, बलवान, जवान, कृषक-समुदायकी जीविका चलानेयोग्य, पराक्रमी और विशाल डील-डौलवाले बैलका ब्राह्मणोंको दान देता है, वह दुधारू गायका दान करनेवालेके तुल्य ही उत्तम लोकोंका उपभोग करता है
Bhishma berkata: “Demikian pula, siapa yang mendanakan kepada para Brahmana seekor lembu jantan yang terlatih baik—jinak, layak dipasang pada kuk, kuat dan muda, sanggup menopang penghidupan keluarga-keluarga tani, gagah dan bertubuh besar—ia menikmati alam-alam mulia yang setara dengan pemberi seekor sapi perah.”
Verse 35
गोषु क्षान्तं गोशरण्यं कृतज्ञं वृत्तिग्लानं तादृशं पात्रमाहु: । वद्धे ग्लाने सम्भ्रमे वा महार्थे कृष्यर्थ वा होम्यहेतो: प्रसूत्याम्
Bhishma berkata: “Mereka menyebut sebagai penerima yang sungguh layak orang yang sabar dan lembut terhadap sapi, yang memberi perlindungan dan naungan bagi sapi, yang tahu berterima kasih, dan yang terhimpit karena kekurangan penghidupan. Orang demikian patut ditopang ketika ia terbelenggu, ketika ia melemah, ketika bahaya mendadak menimpanya, ketika kebutuhan besar muncul, ketika sarana diperlukan untuk pertanian, ketika bekal dibutuhkan untuk persembahan homa, atau pada saat persalinan.”
Verse 36
गुर्वर्थ वा बालपुष्ट्याभिषंगां गां वै दातुं देशकालो<विशिष्ट: । अन्तर्ज्ाता: सक्रयज्ञानलब्धा: प्राणक्रीता निर्जिता यौतकाश्ष
Bhishma berkata: “Dalam urusan guru, atau karena kasih sayang demi gizi dan kesejahteraan anak-anak, memberi seekor sapi menjadi sangat tepat bila tempat dan waktunya dijaga dengan semestinya. Sapi itu dapat berupa yang lahir di dalam kawanan sendiri, yang diperoleh lewat pembelian yang sah disertai pengetahuan kepemilikan, yang didapat dengan harga nyawa (melalui kesukaran yang amat berat), yang diraih lewat kemenangan, atau yang diterima sebagai yautaka (hadiah perkawinan/mas kawin).”
Verse 37
जो गौओंके प्रति क्षमाशील, उनकी रक्षा करनेमें समर्थ, कृतज्ञ और आजीविकासे रहित है, ऐसे ब्राह्मणको गोदानका उत्तम पात्र बताया गया है। जो बूढ़ा हो, रोगी होनेके कारण पथ्य-भोजन चाहता हो, दुर्भिक्ष आदिके कारण घबराया हो, किसी महान् यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला हो या जिसके लिये खेतीकी आवश्यकता आ पड़ी हो, होमके लिये हविष्य प्राप्त करनेकी इच्छा हो अथवा घरमें स्त्रीके बच्चा पैदा होनेवाला हो अथवा गुरुके लिये दक्षिणा देनी हो अथवा बालककी पुष्टिके लिये गोदुग्धकी आवश्यकता आ पड़ी हो, ऐसे व्यक्तियोंको ऐसे अवसरोंपर गोदानके लिये सामान्य देश-काल माना गया है (ऐसे समयमें देश-कालका विचार नहीं करना चाहिये)। जिन गौओंका विशेष भेद जाना हुआ हो, जो खरीदकर लायी गयी हों अथवा ज्ञानके पुरस्काररूपसे प्राप्त हुई हों अथवा प्राणियोंके अदला-बदलीसे खरीदी गयी हों या जीतकर लायी गयी हों अथवा दहेजमें मिली हों, ऐसी गौएँ दानके लिये उत्तम मानी गयी हैं” ।। नाचिकेत उवाच श्रुत्वा वैवस्वतवचस्तमहं पुनरब्रुवम् अभावे गोप्रदातृणां कथं लोकान् हि गच्छति
Orang yang sabar terhadap sapi, mampu melindungi sapi, tahu berterima kasih, dan hidup tanpa penghidupan—brahmana seperti itulah yang disebut penerima terbaik bagi go-dana. Bila ia tua, bila sakit dan memerlukan makanan pantangan yang sesuai, bila gelisah karena paceklik, bila sedang menyelenggarakan yajña agung, atau bila membutuhkan sarana untuk bertani; bila ia menghendaki havis untuk homa; bila di rumahnya seorang perempuan mendekati persalinan; bila ia harus memberi dakṣiṇā kepada guru; atau bila demi pertumbuhan anak diperlukan susu sapi—pada saat-saat demikian, pemberian sapi dianggap wajar tanpa memperhitungkan batas tempat dan waktu. Sapi yang identitasnya jelas, yang dibeli secara sah, yang diperoleh sebagai ganjaran pengetahuan, yang didapat dengan menukar nyawa (melalui kesukaran yang amat berat), yang diraih lewat kemenangan, atau yang diterima sebagai yautaka (hadiah perkawinan/mas kawin)—semuanya dipandang unggul untuk didanakan. Naciketas berkata: “Setelah mendengar sabda Vaivasvata (Yama), aku bertanya lagi: ‘Jika tiada para pemberi sapi, bagaimana manusia dapat mencapai dunia-dunia itu?’”
Verse 38
नाचिकेत कहता है--वैवस्वत यमकी बात सुनकर मैंने पुनः उनसे पूछा--“भगवन्! यदि अभाववश गोदान न किया जा सके तो गोदान करनेवालोंको ही मिलनेवाले लोकोंमें मनुष्य कैसे जा सकता है?” ।। ततोडब्रवीद् यमो धीमान् गोप्रदानपरां गतिम् । गोप्रदानानुकल्पं तु गामृते सन्ति गोप्रदा:,तदनन्तर बुद्धिमान् यमराजने गोदानसम्बन्धी गति तथा गोदानके समान फल देनेवाले दानका वर्णन किया, जिसके अनुसार बिना गायके भी लोग गोदान करनेवाले हो सकते हैं?
Naciketas berkata: Setelah mendengar sabda Vaivasvata Yama, aku bertanya lagi, “Wahai Bhagavan, bila karena kekurangan seseorang tak mampu melakukan go-dāna, bagaimana ia dapat mencapai dunia-dunia yang dicapai para pemberi sapi?” Maka Yama yang bijaksana menjelaskan jalan tertinggi kebajikan terkait pemberian sapi, dan juga menerangkan suatu bentuk pemberian pengganti (anukalpa) yang memberi buah setara—sehingga, meski tanpa sapi, orang dapat disebut ‘pemberi sapi’ melalui sedekah pengganti itu.
Verse 39
अलाभे यो गवां दद्याद् घृतधेनुं यतव्रत: । तस्यैता घृतवाहिन्यः भरन्ते वत्सला इव,“जो गौओंके अभावमें संयम-नियमसे युक्त हो घृतधेनुका दान करता है, उसके लिये ये घृतवाहिनी नदियाँ वत्सला गौओंकी भाँति घृत बहाती हैं
Ketika sapi tidak tersedia, bila seorang yang berdisiplin dan teguh dalam laku-janji mempersembahkan ‘sapi-mentega’ (ghṛta-dhenu) sebagai dana, maka baginya sungai-sungai yang mengalirkan ghee ini memancarkan kelimpahan—laksana induk sapi yang penuh kasih mengalirkan susu bagi anaknya.
Verse 40
घृतालाभे तु यो दद्यात् तिलधेनुं यतव्रत: । स दुर्गात् तारितो थेन्वा क्षीरनद्यां प्रमोदते,'घीके अभावमें जो व्रत-नियमसे युक्त हो तिलमयी धेनुका दान करता है, वह उस धेनुके द्वारा संकटसे उद्धार पाकर दूधकी नदीमें आनन्दित होता है
Bila ghee tidak tersedia, orang yang teguh dalam laku dan kaul, bila mempersembahkan ‘sapi’ yang dibentuk dari wijen, maka oleh pahala anugerah sapi itu ia diselamatkan dari mara bahaya dan bersukacita di sungai susu surgawi.
Verse 41
तिलालाभे तु यो दद्याज्जलधेनुं यतव्रत: । स कामप्रवहां शीतां नदीमेतामुपाश्ुते,“तिलके अभावमें जो व्रतशील एवं नियमनिष्ठ होकर जलमयी धेनुका दान करता है, वह अभीष्ट वस्तुओंको बहानेवाली इस शीतल नदीके निकट रहकर सुख भोगता है!
Bila wijen tidak tersedia, orang yang berkaul dan berdisiplin yang mempersembahkan ‘sapi-air’ (dana air dalam wujud simbolik sapi) akan menikmati sungai yang sejuk ini—yang mengalirkan segala yang diinginkan—dengan tinggal di dekatnya.
Verse 42
एवमेतानि मे तत्र धर्मराजो न्यदर्शयत् | दृष्टवा च परमं हर्षमवापमहमच्युत,धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले पूज्य पिताजी! इस प्रकार धर्मराजने मुझे वहाँ ये सब स्थान दिखाये। वह सब देखकर मुझे बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ
Wahai ayah yang mulia, yang tak pernah menyimpang dari dharma! Demikianlah, di alam itu Raja Dharma memperlihatkan kepadaku semua tempat tersebut. Setelah melihatnya, aku dipenuhi sukacita tertinggi.
Verse 43
निवेदये चाहमिमं प्रियं ते क्रतुर्महानल्पधनप्रचार: । प्राप्तो मया तात स मत्प्रसूत: प्रपत्स्थते वेदविधिप्रवृत्त:,तात! मैं आपके लिये यह प्रिय वृत्तान्त निवेदन करता हूँ कि मैंने वहाँ थोड़े-से ही धनसे सिद्ध होनेवाला यह गोदानरूप महान् यज्ञ प्राप्त किया है। वह यहाँ वेदविधिके अनुसार मुझसे प्रकट होकर सर्वत्र प्रचलित होगा
Wahai ayah! Kuberitakan kepadamu kabar yang menyenangkan ini: di sana aku memperoleh upacara kurban agung itu (yajña berupa dana-sapi), yang dapat diselesaikan dengan harta yang tidak besar. Ia akan tampak melalui diriku, berjalan menurut tata Veda, dan kelak menjadi laku yang mapan di mana-mana.
Verse 44
शापो हायं भवतोअनुग्रहाय प्राप्तो मया यत्र दृष्टो यमो वै | दानव्युष्टिं तत्र दृष्टवा महात्मन् निःसंदिग्धान् दानधर्माश्चिरिष्ये,आपके द्वारा मुझे जो शाप मिला, वह वास्तवमें मुझपर अनुग्रहके लिये ही प्राप्त हुआ था, जिससे मैंने यमलोकमें जाकर वहाँ यमराजको देखा। महात्मन्! वहाँ दानके फलको प्रत्यक्ष देखकर मैं संदेहरहित दानधर्मोका अनुष्ठान करूँगा
Wahai yang berhati luhur! Kutukan yang engkau berikan kepadaku sesungguhnya menjadi anugerah; karenanya aku sampai ke alam Yama dan melihat Yama sendiri. Setelah menyaksikan nyata buah dari dana di sana, aku akan menjalankan kewajiban-kewajiban sedekah tanpa keraguan.
Verse 45
इदं च मामब्रवीद् धर्मराज: पुन: पुन: सम्प्रहृष्टो महर्षे । दानेन यः प्रयतो5भूत् सदैव विशेषतो गोप्रदानं च कुर्यात्,महर्षे! धर्मराजने बारंबार प्रसन्न होकर मुझसे यह भी कहा था कि “जो लोग दानसे सदा पवित्र होना चाहें" वे विशेषरूपसे गोदान करें
Wahai resi agung! Dharmarāja, dengan hati yang bersukacita, berulang-ulang berkata kepadaku: “Barang siapa ingin senantiasa disucikan melalui perbuatan memberi, hendaknya terutama melakukan go-dāna, persembahan sedekah berupa sapi.”
Verse 46
शुद्धों हार्थो नावमन्यस्व धर्मान् पात्रे देयं देशकालोपपन्ने । तस्माद् गावस्ते नित्यमेव प्रदेया मा भूच्च ते संशय: कश्चिदत्र,“मुनिकुमार! धर्म निर्दोष विषय है। तुम धर्मकी अवहेलना न करना। उत्तम देश, काल प्राप्त होनेपर सुपात्रको दान देते रहना चाहिये। अतः तुम्हें सदा ही गोदान करना उचित है। इस विषयमें तुम्हारे भीतर कोई संदेह नहीं होना चाहिये
“Kekayaan yang diperoleh dan dipakai dengan benar itu suci; maka jangan meremehkan dharma. Bila tempat dan waktu yang tepat hadir, berdermalah kepada penerima yang layak. Karena itu, engkau patut memberi sapi secara teratur tanpa lalai; jangan ada keraguan dalam hatimu tentang hal ini.”
Verse 47
एता: पुरा हाददन्नित्यमेव शान्तात्मानो दानपथे निविष्टा: तपांस्युग्राण्यप्रतिशड्कमाना- स्ते वै दान॑ प्रददुश्चैव शक्त्या,'पूर्वकालमें शान्तचित्तवाले पुरुषोंने दानके मार्ममें स्थित हो नित्य ही गौओंका दान किया था। वे अपनी उग्र तपस्याके विषयमें संदेह न रखते हुए भी यथाशक्ति दान देते ही रहते थे
Pada masa lampau, orang-orang yang berhati tenteram, teguh menapaki jalan dana, senantiasa menganugerahkan sapi-sapi ini sebagai sedekah. Sekalipun mereka menjalani tapa yang keras tanpa ragu terhadap laku asketisnya, mereka tetap memberi derma sesuai kemampuan.
Verse 48
काले च शक््त्या मत्सरं वर्जयित्वा शुद्धात्मान: श्रद्धिन: पुण्यशीला: । दत्त्वा गा वै लोकममुं प्रपन्ना देदीप्यन्ते पुण्यशीलास्तु नाके,'कितने ही शुद्धचित्त, श्रद्धालु एवं पुण्यात्मा पुरुष ईर्ष्याका त्याग करके समयपर यथाशक्ति गोदान करके परलोकमें पहुँचकर अपने पुण्यमय शील-स्वभावके कारण स्वर्गलोकमें प्रकाशित होते हैं
Mereka yang pada waktu yang tepat dan sesuai kemampuan, menanggalkan iri hati, berhati suci, teguh dalam śraddhā, dan berpegang pada laku kebajikan—setelah memberi sapi sebagai dana, mereka mencapai alam seberang. Di surga mereka bersinar, direngkuh kemuliaan dari jasa dan watak bajik.
Verse 49
एतद् दानं न्यायलब्धं द्विजेभ्य: पात्रे दत्त प्रापणीयं परीक्ष्य । काम्याष्टम्या वर्तितव्यं दशाहं रसैर्गवां शकृता प्रस्नवैर्वा,“न्यायपूर्वक उपार्जित किये हुए इस गोधनका ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये तथा पात्रकी परीक्षा करके सुपात्रको दी हुई गाय उसके घर पहुँचा देना चाहिये और किसी भी शुभ अष्टमीसे आरम्भ करके दस दिनोंतक मनुष्यको गोरस, गोबर अथवा गोमूत्रका आहार करके रहना चाहिये
Dana ini—ternak yang diperoleh dengan cara yang benar—hendaknya diberikan kepada kaum dvija (Brahmana). Setelah menilai kelayakan penerima, sapi yang diberikan kepada yang sungguh patut harus diantarkan dengan semestinya sampai ke rumahnya. Selanjutnya, mulai dari aṣṭamī yang dianggap mujur, hendaknya menjalani laku disiplin selama sepuluh hari dengan menyantap hasil sapi—susu dan sari-sarinya—atau (bila demikian ketentuannya) dengan cow-dung atau cow-urine.
Verse 50
देवव्रती स्याद् वृषभप्रदानै- वेंदावाप्तिगोयुगस्य प्रदाने । तीर्थावाप्तिगों प्रयुक्तप्रदाने पापोत्सर्ग: कपिलाया: प्रदाने,“एक बैलका दान करनेसे मनुष्य देवताओंका सेवक होता है। दो बैलोंका दान करनेपर उसे वेद-विद्याकी प्राप्ति होती है। उन बैलोंसे जुते हुए छकड़ेका दान करनेसे तीर्थसेवनका फल प्राप्त होता है और कपिला गायके दानसे समस्त पापोंका परित्याग हो जाता है
Naciketa berkata: “Dengan mendermakan seekor banteng, seseorang menjadi tekun dalam pelayanan kepada para dewa. Dengan mendermakan sepasang banteng, ia memperoleh akses pada pengetahuan Weda. Dengan mendermakan sebuah kereta yang ditarik oleh banteng-banteng itu, ia meraih pahala ziarah ke tempat-tempat suci. Dan dengan mendermakan seekor sapi kapilā (berwarna cokelat kemerahan), ia menanggalkan dosa-dosa.”
Verse 51
गामप्येकां कपिलां सम्प्रदाय न्यायोपेतां कलुषाद् विप्रमुच्येत् । गवां रसात् परम॑ नास्ति किंचिद् गवां प्रदानं सुमहद् वदन्ति,“मनुष्य न्यायतः प्राप्त हुई एक भी कपिला गायका दान करके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। गोरससे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है; इसीलिये विद्वान् पुरुष गोदानको महादान बतलाते हैं
Naciketa berkata: “Bahkan dengan mendermakan seekor sapi kapilā saja—yang diperoleh secara sah dan diberikan dengan cara yang adil—seseorang terbebas dari kenajisan (dosa). Tiada yang lebih unggul daripada hasil sapi (susu dan olahannya); karena itu orang bijak menyebut sedekah sapi sebagai derma yang amat agung.”
Verse 52
गावो लोकांस्तारयन्ति क्षरन्त्यो गावश्षान्नं संजनयन्ति लोके । यस्तं जानन्न गवां हार्दमेति स वै गन्ता निरयं पापचेता:,गौएँ दूध देकर सम्पूर्ण लोकोंका भूखके कष्टसे उद्धार करती हैं। ये लोकमें सबके लिये अन्न पैदा करती हैं। इस बातको जानकर भी जो गौओंके प्रति सौहार्दका भाव नहीं रखता, वह पापात्मा मनुष्य नरकमें पड़ता है
Sapi-sapi, dengan mengalirkan susu, menyelamatkan dunia dari derita kelaparan; dan di dunia ini pula mereka menumbuhkan pangan dan pemeliharaan bagi semua. Mengetahui hal itu, siapa pun yang tetap tidak menumbuhkan hati yang bersahabat kepada sapi—ia, yang berniat dosa, menuju neraka.
Verse 53
यैस्तद् दत्तं गोसहस््रं शतं वा दशार्थ वा दश वा साधुवत्सम् | अप्येका वै साधवे ब्राह्म॒णाय सास्यामुष्मिन् पुण्यतीर्था नदी वै,“जो मनुष्य किसी श्रेष्ठ ब्राह्यणको सहस्र, शत, दस अथवा पाँच गौओंका उनके अच्छे बछड़ोंसहित दान करता है अथवा एक ही गाय देता है, उसके लिये वह गौ परलोकमें पवित्र तीर्थोवाली नदी बन जाती है
Naciketa berkata: “Bagi orang yang mendermakan seribu sapi, atau seratus, atau sepuluh (menurut kemampuan), atau bahkan seekor sapi saja—masing-masing dengan anak yang baik—kepada seorang brāhmaṇa yang layak, sapi itu sendiri di alam berikutnya menjadi sungai yang memiliki titian-titian suci, tempat penyeberangan yang menyucikan.”
Verse 54
प्राप्त्या पुष्टया लोकसंरक्षणेन गावस्तुल्या: सूर्यपादै: पृथिव्याम् शब्दश्नैक: संततिश्नोपभोगा- स्तस्माद् गोद: सूर्य इवावभाति,'प्राप्ति, पुष्टि तथा लोकरक्षा करनेके द्वारा गौएँ इस पृथ्वीपर सूर्यकी किरणोंके समान मानी गयी हैं। एक ही “गो” शब्द धेनु और सूर्य-किरणोंका बोधक है। गौओंसे ही संतति और उपभोग प्राप्त होते हैं; अतः गोदान करनेवाला मनुष्य किरणोंका दान करनेवाले सूर्यके ही समान माना जाता है
Karena menganugerahkan kemakmuran, pemeliharaan, dan perlindungan dunia, sapi dipandang di bumi ini sebanding dengan sinar matahari. Satu kata “go” menunjuk baik sapi maupun seberkas cahaya surya. Dari sapi lahir keturunan serta sarana kenikmatan dan penghidupan; karena itu, pemberi sedekah sapi bersinar laksana matahari sendiri, seakan-akan menganugerahkan sinar-sinar.
Verse 55
गुरुं शिष्यो वरयेद् गोप्रदाने स वै गन्ता नियतं स्वर्गमेव । विधिज्ञानां सुमहान् धर्म एष विधिं ह्याद्यं विधय: संविशन्ति,“शिष्य जब गोदान करने लगे, तब उसे ग्रहण करनेके लिये गुरुको चुने। यदि गुरुने वह गोदान स्वीकार कर लिया तो शिष्य निश्चय ही स्वर्गलोकमें जाता है। विधिके जाननेवाले पुरुषोंके लिये यह गोदान महान् धर्म है। अन्य सब विधियाँ इस आदि विधिमें ही अन्तर्भूत हो जाती हैं
Ketika seorang murid hendak mempersembahkan anugerah seekor sapi, hendaklah ia memilih guru yang layak untuk menerimanya. Bila sang guru menerima persembahan sapi itu, sang murid niscaya mencapai surga. Bagi mereka yang memahami tata laku suci, gōdāna ini adalah dharma yang amat agung; sesungguhnya segala upacara yang ditetapkan berhimpun dalam ketetapan purba ini.
Verse 56
इदं दान॑ न््यायलब्धं द्विजेभ्य: पात्रे दत्त्वा प्रापयेथा: परीक्ष्य । त्वय्याशंसन्त्यमरा मानवाश्नर वयं चापि प्रसृते पुण्यशीले,“तुम न््यायके अनुसार गोधन प्राप्त करके पात्रकी परीक्षा करनेके पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उनका दान कर देना और दी हुई वस्तुको ब्राह्मणके घर पहुँचा देना। तुम पुण्यात्मा और पुण्यकार्यमें प्रवृत्त रहनेवाले हो; अतः देवता, मनुष्य तथा हमलोग तुमसे धर्मकी ही आशा रखते हैं'
Peroleh anugerah ini dengan cara yang benar, lalu—setelah menilai siapa penerima yang pantas—berikanlah kepada para dvija (brahmana), dan pastikan apa yang telah diberikan benar-benar sampai ke rumah brahmana itu. Engkau berbudi luhur dan teguh dalam perbuatan bajik; karena itu para dewa, manusia, dan kami pun menaruh harap kepadamu hanya akan dharma.
Verse 57
इत्युक्तोडहं धर्मराजं द्विजर्षे धर्मात्मानं शिरसाभिप्रणम्य । अनुज्ञातस्तेन वैवस्वतेन प्रत्यागमं भगवत्पादमूलम्,ब्रह्मर्ष! धर्मराजके ऐसा कहनेपर मैंने उन धर्मात्मा देवताको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और फिर उनकी आज्ञा लेकर मैं आपके चरणोंके समीप लौट आया
Wahai dwijarṣi! Setelah Dharmarāja berkata demikian, aku menundukkan kepala dan bersujud hormat kepada dewa yang berjiwa dharma itu; lalu, dengan izin Vaivasvata Yama, aku kembali ke hadapan telapak kaki muliamu.
Verse 73
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि यमवाक््यं नाम एकसप्ततितमो<ध्याय:
Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Anuśāsana Parva—di bagian tentang dharma pemberian—berakhirlah bab ketujuh puluh satu yang berjudul “Wacana Yama.”
Yudhiṣṭhira asks for a comparative account of the fruits of multiple disciplines—vows, rules, study, restraint, Vedic practice, giving, truthfulness, celibacy, and service—seeking a ranked understanding of merit and its outcomes.
Bhīṣma frames dama as merit-preserving and often superior to dāna when giving is compromised by anger; anger is described as destroying the value of the act, while self-control stabilizes both conduct and its results.
Yes: it explicitly elevates satya above even large-scale ritual comparison (aśvamedha), presenting truth as cosmically foundational and as a decisive basis for auspicious post-mortem states (svarga/brahmaloka).