Adhyaya 147
Anushasana ParvaAdhyaya 14765 Verses

Adhyaya 147

Pratyakṣa–Āgama–Ācāra: Doubt, Proof, and the Practice of Dharma (प्रत्यक्ष–आगम–आचारविचारः)

Upa-parva: Pramāṇa–Ācāra–Dharma Vicāra (Epistemic Inquiry on Dharma)

Vaiśaṃpāyana reports that after Kṛṣṇa’s preceding remarks, Yudhiṣṭhira again questions Bhīṣma about dharma-determination: whether perception (pratyakṣa) or transmitted authority (āgama) is causal/decisive in arriving at a conclusion. Bhīṣma asserts that doubt is easy but decisive certainty is difficult because the domain contains vast seen-and-heard materials that generate competing views. He critiques those who absolutize perception and declare non-existence or uncertainty as final, characterizing such conclusions as immature when detached from disciplined inquiry. He suggests that if one insists on a single “cause,” it is attainable only through sustained, methodical effort over long time, implying the limits of quick reasoning. Yudhiṣṭhira then frames the triad—Veda/śruti, perception, and ācāra—as pramāṇas and asks how dharma can be one if proofs are three. Bhīṣma answers that dharma is one, expressed in three modes, and instructs Yudhiṣṭhira to follow the stated threefold path without corrosive over-argumentation. He distills a practical ethical core—ahiṃsā, satya, akrodha, and dāna—as sanātana-dharma, and advises reverence toward learned brāhmaṇas as guides, while warning against those who manufacture disputes by treating non-proof as proof.

Chapter Arc: पार्वती जिज्ञासा करती हैं—हे शंकर! जो नियमपूर्वक वानप्रस्थ-व्रत धारण कर पवित्र देशों में रहते हैं, उनके पुण्य-विधान और फल क्या हैं? → महादेव वानप्रस्थ-धर्म की कठोरता और सूक्ष्म मर्यादाएँ खोलते हैं—एकाग्रता, शौच, त्रेताग्नि-शरण, यज्ञपात्रों की सादगी, सर्वभूत-दया, और ‘स्वशरीरोपजीविषु’—अपने ही शरीर को तपाकर जीवन-यापन। साथ ही, विविध व्रत-मार्गों के भिन्न-भिन्न लोक-फल (इन्द्रलोक, वरुणलोक आदि) का संकेत देकर साधक के सामने विकल्पों का भार रख देते हैं। → धर्म का शिखर-निष्कर्ष उभरता है—‘सर्वभूतानुकम्पी’ और ‘सर्वभूतार्जवव्रत’ वही है जो वास्तव में धर्म से युक्त है; और जो सब कुछ त्यागकर दीक्षा ले ‘वीराध्वान’ (वीरों का पथ/कठोर तप-मार्ग) पकड़ता है, उसके लिए सनातन लोक सुनिश्चित हैं। → शिव व्रतों के फल को क्रमबद्ध करते हैं—दीक्षा, शुचिता, संयम, नियत आहार/अनशन, वेदी-शयन आदि से दिव्य भोग, विमान-गमन, इन्द्रलोक में निरामय आनंद; और कुछ विशेष दीक्षाओं में देह-त्याग से विशिष्ट लोक (स्वर्ग, वरुणलोक) की प्राप्ति। संदेश स्पष्ट होता है: फल-भेद कर्म-भेद से है, पर धर्म का मूल करुणा और सरलता है। → पार्वती के प्रश्न का विस्तार स्वाभाविक बनता है—इन विविध लोक-फलों में ‘श्रेष्ठ’ कौन-सा है, और क्या फल-आकांक्षा स्वयं व्रत की शुद्धि को घटाती है?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०६३ “लोक मिलाकर कुल २२१३ “लोक हैं) न#फ्जमआा न (0) आफजअत+- > यहाँ आचार्य नीलकण्ठके मतमें श्मशान शब्दसे काशीका महाश्मशान ही गृहीत होता है। इसीलिये वहाँ शवके दर्शनसे शिवके दर्शनका फल माना जाता है। - कुछ लोग दूध पीनेके समय बछड़ोंके मुँहमें लगे हुए फेनको ही वह अमृत मानते हैं, उसीका पान करनेवाले उनके मतमें फेनप हैं। आचार्य नीलकण्ठ अन्नके अग्रभाग (रसोईसे निकाले गये अग्राशन) को फेन और उसका उपयोग करनेवालेको फेनप कहते हैं। ३- जो भोजनके पश्चात्‌ पात्रको धो-पोंछकर रख देते हैं, दूसरे दिनके लिये कुछ भी नहीं बचाते हैं, उन्हें सम्प्रक्षाल कहते हैं। २- पत्थरसे फोड़कर खानेवालेको अभ्मकुट्ट कहते हैं। ३- जो दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेते हैं अर्थात्‌ अन्नको ओखलीमें न कूटकर दाँतोंसे ही चबाकर खाते हैं वे दन्तोलूखलिक कहलाते हैं। द्विचत्वारिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा उमोवाच देशेषु रमणीयेषु नदीनां निर्डरिषु च । स्रवन्तीनां निकुण्जेषु पर्वतेषु वनेषु च,पार्वतीने कहा--भगवन्‌! नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले एकाग्रचित्त वानप्रस्थी महात्मा नदियोंके रमणीय तटप्रदेशोंमें, झरनोंमें, सरिताओंके तटवर्ती निकुंजोंमें, पर्वतोंपर, वनोंमें और फल-मूलसे सम्पन्न पवित्र स्थानोंमें निवास करते हैं

Umā berkata: “Wahai Tuhan, para vānaprastha yang berhati agung—teguh pikirannya dan disiplin menunaikan laku tapa serta kaul—berdiam di wilayah-wilayah yang elok: di tepi sungai yang menenteramkan, di lembah dan dekat air terjun, di rimbunan semak di sepanjang aliran sungai, di pegunungan, dan di hutan. Demi menegakkan dharma, mereka memilih tempat-tempat suci yang kaya buah-buahan dan umbi-umbian.”

Verse 2

देशेषु च पवित्रेषु फलवत्सु समाहिता: । मूलवत्सु च मेध्येषु वसन्ति नियतव्रता:,पार्वतीने कहा--भगवन्‌! नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले एकाग्रचित्त वानप्रस्थी महात्मा नदियोंके रमणीय तटप्रदेशोंमें, झरनोंमें, सरिताओंके तटवर्ती निकुंजोंमें, पर्वतोंपर, वनोंमें और फल-मूलसे सम्पन्न पवित्र स्थानोंमें निवास करते हैं

Mereka yang berkaul teguh itu, dengan konsentrasi yang terhimpun, tinggal di wilayah-wilayah suci—yang kaya buah-buahan dan umbi-umbian, serta menyucikan batin.

Verse 3

तेषामपि विधिं पुण्यं श्रोतुमिच्छामि शड्कर । वानप्रस्थेषु देवेश स्वशरीरोपजीविषु,कल्याणकारी देवेश्वर! वानप्रस्थी महात्मा अपने शरीरको ही कष्ट पहुँचाकर जीवन- निर्वाह करते हैं; अतः उनके पालन करनेयोग्य जो पवित्र कर्तव्य या नियम है, उसीको मैं सुनना चाहती हूँ

Wahai Śaṅkara, wahai Penguasa para dewa! Aku ingin mendengar pula tata laku yang suci bagi para vānaprastha yang menafkahi hidupnya dengan menanggung laku prihatin pada tubuhnya sendiri.

Verse 4

श्रीमहेश्वर उवाच वानप्रस्थेषु यो धर्मस्तं मे शूणु समाहिता । श्रुत्वा चैकमना देवि धर्मबुद्धिपरा भव,भगवान्‌ _महेश्वरने कहा--देवि! (गृहस्थ एवं) वानप्रस्थोंका जो धर्म है, उसको मुझसे एकाग्रचित्त होकर सुनो और सुनकर एकचित्त हो अपनी बुद्धिको धर्ममें लगाओ

Śrī Maheśvara bersabda: “Wahai Devī, dengarkan dengan pikiran yang terhimpun dharma bagi para vānaprastha dariku. Setelah mendengarnya, jadilah satu-tekad dan tegakkan buddhi-mu pada dharma.”

Verse 5

संसिद्धिर्नियमै: सद्धिर्वनवासमुपागतै: । वानप्रस्थैरिदं कर्म कर्तव्यं शूणु यादूशम्‌,नियमोंका पालन करके सिद्ध हुए वनवासी साधु वानप्रस्थोंको यह कर्म करना चाहिये। कैसा कर्म? यह बताता हूँ, सुनो

Kesempurnaan diraih melalui disiplin oleh para saleh yang telah memasuki hidup rimba. Karena itu para vānaprastha wajib menunaikan laku ini. Dengarkan bagaimana laku itu seharusnya.

Verse 6

(भूत्वा पूर्व गृहस्थस्तु पुत्रानृण्यमवाप्य च । कलत्रकार्य संतृप्प कारणात्‌ संत्यजेद्‌ गृहम्‌ ।। मनुष्य पहले गृहस्थ होकर पुत्रोंके उत्पादन-द्वारा पितरोंक ऋणसे उऋण हो पत्नीसे सम्पन्न होनेवाले कार्यकी पूर्ति करके धर्मसम्पादनके लिये गृहका परित्याग कर दे ।। अवस्थाप्य मनो धृत्या व्यवसायपुरस्सर: । निर्दनडो वा सदारो वा वनवासाय सव्रजेत्‌ ।। मनको धैर्यपूर्वक स्थिर करके मनुष्य दृढ़ निश्चयके साथ निर्द्धनद्ध (एकाकी) होकर अथवा स्त्रीको साथ रखकर वनवासके लिये प्रस्थान करे ।। देशा: परमपुण्या ये नदीवनसमन्विता: । अबोधमुक्ता: प्रायेण तीर्थायतनसंयुता: ।। तत्र गत्वा विधि ज्ञात्वा दीक्षां कुर्याद्‌ यथाक्रमम्‌ । दीक्षित्वैकमना भूत्वा परिचर्या समाचरेत्‌ ।। नदी और वनसे युक्त जो परम पुण्यमय प्रदेश हैं, वे प्रायः अज्ञानसे मुक्त और तीथर्थों तथा देवस्थानोंसे सुशोभित हैं। उनमें जाकर विधिका ज्ञान प्राप्त करके क्रमश: ऋषिधर्मकी दीक्षा ग्रहण करे और दीक्षित होनेके पश्चात्‌ एकचित्त हो परिचर्या आरम्भ करे ।। कल्योत्थानं च शौचं च सर्वदेवप्रणामनम्‌ । शकृदालेपन काये त्यक्तदोषप्रमादता ।। सायम्प्रातश्नाभिषेकं चाग्निहोत्रं यथाविधि । काले शौचं च कार्य च जटावल्कलधारणम्‌ ।। सततं वनचर्या च समित्कुसुमकारणात्‌ । नीवाराग्रयणं काले शाकमूलोपचायनम्‌ ।। सदायतनशौचं च तस्य धर्माय चेष्यते । सबेरे उठना, शौचाचारका पालन करना, सब देवताओंको मस्तक झुकाना, शरीरमें गायका गोबर लगाकर नहाना, दोष और प्रमादका त्याग करना, सायंकाल और प्रात:ःकाल स्नान एवं विधिवत्‌ अग्निहोत्र करना, ठीक समयपर शौचाचारका पालन करना, सिरपर जटा और कटियप्रदेशमें वल्कल धारण करना, समिधा और पुष्पका संग्रह करनेके लिये सदा वनमें विचरना, समयपर नीवारसे आग्रयण कर्म (नवशस्येष्टि यज्ञका सम्पादन) करना, साग और मूलका संकलन करना तथा सदा अपने घरको शुद्ध रखना--आदि कार्य वानप्रस्थ मुनिके लिये अभीष्ट है। इनसे उसके धर्मकी सिद्धि होती है ।। अतिथीनामाभिमुख्यं तत्परत्वं च सर्वदा ।। पाद्यासनाभ्यां सम्पूज्य तथाहारनिमन्त्रणम्‌ । अग्राम्यपचनं काले पितृदेवार्चनं॑ तथा ।। पश्चादतिथिसत्कारस्तस्य धर्मा: सनातना: । पहले अतिथियोंके सम्मुख जाय, फिर सदा उनकी सेवामें तत्पर रहे। पाद्य और आसन आदिके द्वारा उनकी पूजा करके उन्हें भोजनके लिये बुलावे। समयपर ऐसी वस्तुओंसे रसोई बनावे, जो गाँवमें पैदा न हुई हों। उस रसोईके द्वारा पहले देवताओं और पितरोंका पूजन करे। तत्पश्चात्‌ अतिथिको सत्कारपूर्वक भोजन करावे। ऐसा करनेवाले वानप्रस्थको सनातन धर्मकी सिद्धि प्राप्त होती है ।। शिष्टैर्थर्मासने चैव धर्मार्थसहिता: कथा: ।। प्रतिश्रयविभागश्व भूमिशय्या शिलासु वा । धर्मासनपर बैठे हुए शिष्ट पुरुषोंद्वारा उसे धर्मार्थयुक्त कथाएँ सुननी चाहिये। उसे अपने लिये पृथक्‌ आश्रम बना लेना चाहिये। वह पृथ्वी अथवा प्रस्तरकी शय्यापर सोये ।। व्रतोपवासयोगकश्न क्षमा चेन्द्रियनिग्रह: ।। दिवारात्र यथायोगं शौचं धर्मस्य चिन्तनम्‌ ।) वानप्रस्थ मुनि व्रत और उपवासमें तत्पर रहे, दूसरोंपर क्षमाका भाव रखे, अपनी इन्द्रियोंको वशमें करे। दिन-रात यथासम्भव शौचाचारका पालन करके धर्मका चिन्तन करे ।। त्रिकालमभिषेकं च पितृदेवार्चनं तथा । अग्निहोत्रपरिस्पन्द इष्टिहोमविधिस्तथा

Śrī Maheśvara bersabda: Setelah terlebih dahulu hidup sebagai kepala rumah tangga, seseorang hendaknya melunasi hutang kepada leluhur dengan memperanakkan putra, serta menuntaskan kewajiban yang timbul dari istri dan kehidupan berumah tangga. Sesudah itu, demi menyempurnakan dharma, ia patut meninggalkan rumah. Dengan meneguhkan batin melalui ketegaran dan dipimpin tekad yang bulat, ia berangkat menuju kehidupan rimba—tanpa harta dan seorang diri, atau bersama istrinya—memasuki laku vānaprastha sebagai peralihan etis yang sadar dari tugas duniawi menuju praktik rohani.

Verse 7

उन्हें दिनमें तीन बार स्नान, पितरों और देवताओंका पूजन, अग्निहोत्र तथा विधिवत्‌ यज्ञ करने चाहिये ।। नीवारग्रहणं चैव फलमूलनिषेवणम्‌ | इड्डुदैरण्डतैलानां स्नेहार्थे च निषेवणम्‌,वानप्रस्थको जीविकाके लिये नीवार (तिन्नीका चावल) और फल-मूलका सेवन करना चाहिये तथा शरीरमें स्निग्धता लाने या तेलसे होनेवाले कार्योंके निर्वाहके लिये इंगुद और रेड़ीके तेलका सेवन करना उचित है

Ia hendaknya mandi tiga kali sehari, memuja para leluhur dan para dewa, menunaikan agnihotra, serta melaksanakan yajña menurut tata cara. Untuk penghidupan, seorang vānaprastha patut bersandar pada biji-bijian nivāra serta buah dan umbi; dan demi pemeliharaan tubuh serta keperluan yang niscaya—bukan untuk memanjakan diri, melainkan untuk menopang dharma—ia boleh memakai minyak seperti iṅguda dan minyak jarak (castor) secukupnya.

Verse 8

योगचर्याकृतैः: सिद्धै: कामक्रोधविवर्जिति: । वीरशय्यामुपासद्धिर्वीरस्थानोपसेविभि:,उन्हें योगका अभ्यास करके उसमें सिद्धि प्राप्त करनी चाहिये। काम और क्रोधको त्याग देना चाहिये। वीरासनसे बैठकर वीरस्थान (विशाल और घने जंगल) में निवास करने चाहिये

Śrī Maheśvara bersabda: “Jalankan disiplin yoga dan, melalui laku yang tekun, raihlah keberhasilan di dalamnya. Tinggalkan nafsu dan amarah. Berteguh dalam vīrāsana dan menempuh ‘ranjang sang pahlawan’, tinggallah di tempat-tempat yang gagah—rimba yang luas dan lebat—seraya menumbuhkan keteguhan, pengendalian, dan penguasaan diri.”

Verse 9

युक्तैयोंगवहै: सद्धिग्रीष्मे पजचतपैस्तथा । मण्डूकयोगनियतैर्यथान्यायं निषेविभि:,मनको एकाग्र रखकर योगसाधनमें तत्पर रहना चाहिये। श्रेष्ठ वानप्रस्थको गर्मीमें पंचाग्नि सेवन करना चाहिये। हठयोगशास्त्रमें प्रसिद्ध मण्डूकयोगके अभ्यासमें नियमपूर्वक लगे रहना चाहिये। किसी भी वस्तुका न्यायानुकूल सेवन करना चाहिये

Mahādeva bersabda: “Dengan disiplin yang tepat yang mengantarkan pada yoga, hendaknya ia tekun berlatih dengan batin terpusat. Pada musim panas, vānaprastha yang utama menjalankan tapa ‘lima api’. Ia juga harus tekun, menurut aturan, dalam laku maṇḍūka-yoga (postur katak) yang dikenal dalam tradisi haṭha-yoga. Dan apa pun yang diambil atau dinikmati, hendaknya hanya dilakukan sesuai keadilan dan kepatutan.”

Verse 10

वीरासनरतैर्नित्यं स्थण्डिले शयनं तथा । शीततोयाग्नियोगश्न चर्तव्यो धर्मबुद्धिभि:,सदा वीरासनसे बैठना और वेदी या चबूतरेपर सोना चाहिये। धर्ममें बुद्धि रखनेवाले वानस्थ मुनियोंकों शीततोयाग्नियोगका आचरण करना चाहिये अर्थात्‌ उन्हें सर्दीकी मौसममें रातको जलके भीतर बैठना या खड़े रहना, बरसातमें खुले मैदानमें सोना और ग्रीष्म-ऋतुमें पंचाग्निका सेवन करना चाहिये

Mahādeva bersabda: “Hendaknya ia senantiasa tekun dalam vīrāsana dan tidur di tanah yang telanjang. Mereka yang berakal budi berlandaskan dharma juga patut menjalankan disiplin ‘air dingin dan api’: pada malam musim dingin berdiri atau duduk di air yang dingin, pada musim hujan berbaring di tempat terbuka, dan pada musim panas menanggung tapa ‘lima api’.”

Verse 11

अब्भक्षेवायुभक्षैश्न शैवलोत्तरभोजनै: । अश्मकुट्टैस्तथा दान्तै: सम्प्रक्षालैस्तथापरै:

Mahesvara bersabda: “Sebagian hidup hanya dengan air; sebagian seakan-akan hanya ‘memakan’ angin; yang lain bertahan dengan alga dan santapan yang amat sedikit. Ada yang menanggung tapa sekeras mengunyah batu; ada pula yang mengekang indria, disucikan oleh pembasuhan berulang dan laku disiplin lainnya.”

Verse 12

वे वायु अथवा जल पीकर रहें। सेवारका भोजन करें। पत्थरसे अन्न या फलको कूँचकर खायाँ अथवा दाँतोंसे चबाकर ही भक्षण करें। सम्प्रक्षालके नियमसे रहें अर्थात्‌ दूसरे दिनके लिये आहार संग्रह करके न रखें ।। चीरवल्कलसंवीतैर्मुगचर्मनिवासिभि: । कार्या यात्रा यथाकालं यथाधर्म यथाविधि,अधोवस्त्रकी जगह चीर और वल्कल पहनें, उत्तरीयके स्थानमें मृगछालेसे ही अपने अंगोंको आच्छादित करें। उन्हें समयके अनुसार धर्मके उद्देश्यसे विधिपूर्वक तीर्थ आदि स्थानोंकी ही यात्रा करनी चाहिये

Mahesvara bersabda: “Biarlah mereka hidup dengan ‘meminum’ angin atau air, atau cukup dengan apa yang diperoleh melalui pelayanan. Biarlah mereka makan biji-bijian atau buah setelah ditumbuk dengan batu, atau hanya dengan mengunyahnya dengan gigi. Hendaklah mereka menjalani aturan ‘samprakṣālaka’—yakni tidak menyimpan makanan untuk esok hari. Berbalut kain compang-camping dan kulit kayu, serta menutupi tubuh dengan kulit rusa, hendaklah mereka melakukan perjalanan—seperti ziarah tirtha—hanya pada waktu yang patut, demi dharma, dan menurut tata-ritus yang ditetapkan.”

Verse 13

वननित्यैर्वनचरैर्वनस्थैर्वनगोचरै: । वन॑ गुरुमिवासाद्य वस्तव्यं वनजीविभि:,वानप्रस्थको सदा वनमें ही रहना, वनमें ही विचरना, वनमें ही ठहरना, वनके ही मार्गपर चलना और गुरुकी भाँति वनकी शरण लेकर वनमें ही जीवन-निर्वाह करना चाहिये

Mahadeva bersabda: “Mereka yang hidup dari hutan hendaklah menjadikan hutan sebagai rumah yang tetap—bergerak di dalamnya, tinggal di dalamnya, dan menapaki jalan-jalannya. Mendekati hutan laksana mendekati seorang guru, hendaklah mereka berlindung padanya dan menegakkan hidup mereka di sana.”

Verse 14

तेषां होमक्रिया धर्म: पठचयज्ञनिषेवणम्‌ | भागं च पजञ्चयज्ञस्य वेदोक्तस्यथानुपालनम्‌,प्रतिदिन अग्निहोत्र और पंचमहायज्ञोंका सेवन वानप्रस्थोंका धर्म है। उन्हें विभागपूर्वक वेदोक्त पंच-यज्ञोंका निरन्तर पालन करना चाहिये

Bagi mereka, dharma yang benar ialah melaksanakan homa (persembahan api) dan terus-menerus menunaikan yajña-yajña harian. Mereka hendaklah, menurut pembagian yang tertib, tanpa lalai menjalankan lima yajña Veda sebagaimana diperintahkan.

Verse 15

अष्टमीयज्ञपरता चातुर्मास्यनिषेवणम्‌ । पौर्णमासादयो यज्ञा नित्ययज्ञस्तथैव च,अष्टमी तिथिको होनेवाले अष्टका श्राद्धरूप यज्ञमें तत्पर रहना, चातुर्मास्य व्रतका सेवन करना, पौर्णमास और दर्शादि यज्ञ तथा नित्ययज्ञका अनुष्ठान करना वानप्रस्थ मुनिका धर्म है

Mahadeva bersabda: “Inilah disiplin yang patut bagi vānaprastha: bertekun pada yajña Aṣṭamī (ritus Aṣṭakā pada hari kedelapan), menjalankan kaul musiman Cāturmāsya, serta menunaikan upacara-upacara mulai dari persembahan Paurṇamāsa, bersama yajña harian yang wajib.”

Verse 16

विमुक्ता दारसंयोगैरविमुक्ता: सर्वसंकरै: । विमुक्ता: सर्वपापैश्न चरन्ति मुनयो वने,वानप्रस्थ मुनि स्त्री-समागम, सब प्रकारके संकर तथा सम्पूर्ण पापोंसे दूर रहकर वनमें विचरते रहते हैं

Para resi, terbebas dari pergaulan suami-istri, tidak terjerat oleh campur-aduk atau kekacauan moral apa pun, dan lepas dari segala dosa, mengembara di hutan. Inilah dharma vānaprastha: pengendalian diri, kemurnian laku, dan penarikan diri dari ikatan rumah tangga.

Verse 17

खुग्भाण्डपरमा नित्यं त्रेताग्निशरणा: सदा | सन्त: सत्पथनित्या ये ते यान्ति परमां गतिम्‌,खुक्‌-सुवा आदि यज्ञपात्र ही उनके लिये उत्तम उपकरण हैं। वे सदा आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियोंकी शरण लेकर सदा उन्हींकी परिचर्यामें लगे रहते हैं और नित्य सन्मार्गपर चलते हैं। इस प्रकार अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाले वे श्रेष्ठ पुरुष परमगतिको प्राप्त होते हैं

Mereka yang senantiasa memandang perlengkapan yajña mereka sebagai yang utama, yang selalu berlindung pada tiga api Weda dan tekun melayaninya, serta tetap berjalan di jalan orang-orang baik—orang-orang saleh yang teguh pada dharmanya itu mencapai keadaan tertinggi.

Verse 18

ब्रह्मलोक॑ महापुण्यं सोमलोकं च शाश्वतम्‌ । गच्छन्ति मुनयः सिद्धा: सत्यधर्मव्यपाश्रया:,वे मुनि सत्यधर्मका आश्रय लेनेवाले और सिद्ध होते हैं, अतः महान्‌ पुण्यमय ब्रह्मलोक तथा सनातन सोमलोकमें जाते हैं

Para resi yang telah sempurna, yang bersandar pada satya (kebenaran) dan dharma (kebajikan), mencapai Brahmaloka yang amat penuh pahala, dan juga Somaloka yang kekal.

Verse 19

एष धर्मो मया देवि वानप्रस्थाश्रित: शुभ: । विस्तरेणाथ सम्पन्नो यथास्थूलमुदाह्वत:

Wahai Dewi, dharma yang mulia bagi tahap vānaprastha ini telah kujelaskan kepadamu dengan rinci; kini telah kukemukakan pula secara garis besar.

Verse 20

देवि! यह मैंने तुम्हारे निकट विस्तारयुक्त एवं मंगलमय वानप्रस्थधर्मका स्थूलभावसे वर्णन किया है ।। उमोवाच भगवन्‌ सर्वभूतेश सर्वभूतनमस्कृत । यो धर्मो मुनिसंघस्य सिद्धिवादेषु तं वद

Dewi, di hadapanmu telah kuuraikan dharma vānaprastha yang penuh berkah itu dengan rinci, dan kini dalam garis besarnya. Uma berkata: “Wahai Bhagavan, Penguasa segala makhluk, yang dihormati oleh semua makhluk—jelaskan kepadaku dharma milik perhimpunan para resi, sebagaimana dibahas dalam ajaran tentang pencapaian (siddhi).”

Verse 21

उमादेवी बोलीं--भगवन्‌! सर्वभूतेश्वर! समस्त प्राणियोंद्वारा वन्दित महेश्वर! ज्ञानगोष्ठियोंमें मुनि-समुदायका जो धर्म निश्चित किया गया है, उसे बताइये ।। सिद्धिवादेषु संसिद्धास्तथा वननिवासिन: । स्वैरिणो दारसंयुक्तास्तेषां धर्म: कथं स्मृत:,ज्ञानगोष्ठियोंमें जो सम्यक्‌ सिद्ध बताये गये हैं, वे वनवासी मुनि कोई तो एकाकी ही स्वच्छन्द विचरते हैं, कोई पत्नीके साथ रहते हैं। उनका धर्म कैसा माना गया है?

Umā Devī berkata: “Wahai Bhagavan, Penguasa segala makhluk, Maheśvara yang dipuja oleh semua insan—jelaskan kepadaku aturan dharma yang telah ditetapkan oleh perhimpunan para resi dalam musyawarah pengetahuan rohani. Di antara para pertapa penghuni rimba yang dinyatakan sepenuhnya berhasil dalam ajaran-ajaran tentang pencapaian, ada yang mengembara bebas seorang diri, dan ada pula yang hidup bersama istri. Bagaimanakah dharma mereka dipahami?”

Verse 22

श्रीमहेश्वर उवाच स्वैरिणस्तपसा देवि सर्वे दारविहारिण: । तेषां मौण्ड्यं कषायश्न वासे रात्रिश्न कारणम्‌,श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! सभी वानप्रस्थ तपस्यामें संलग्न रहते हैं, उनमेंसे कुछ तो स्वच्छन्द विचरनेवाले होते हैं (स्त्रीको साथ नहीं रखते) और कुछ अपनी-अपनी स्त्रीके साथ रहते हैं। स्वच्छन्द विचरनेवाले मुनि सिर मुड़ाकर गेरुए वस्त्र पहनते हैं; (उनका कोई एक स्थान नहीं होता) किंतु जो स्त्रीके साथ रहते हैं, वे रात्रिको अपने आश्रममें ही ठहरते हैं

Śrī Maheśvara bersabda: “Wahai Dewi, semua pertapa penghuni rimba itu tekun dalam tapa. Di antara mereka, sebagian mengembara bebas (tanpa menyertakan istri), dan sebagian hidup bersama istri masing-masing. Bagi yang mengembara bebas, tanda mereka ialah kepala dicukur dan mengenakan jubah oker; sedangkan yang hidup bersama istri menetap di pertapaan mereka pada malam hari.”

Verse 23

त्रिकालमभिषेक श्न होत्र॑ त्वृषिकृतं महत्‌ । समाधिसत्पथस्थानं यथोद्दिष्टनिषेवणम्‌,दोनों प्रकारके ही ऋषियोंका यह महान्‌ कर्तव्य है कि वे प्रतिदिन तीनों समय जलनमें स्नान करें और अग्निमें आहुति डालें। समाधि लगावें, सन्मार्गपर चलें और शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करें

Bagi kedua jenis resi, inilah kewajiban agung yang diwariskan para resi: mandi dengan air pada tiga waktu peralihan setiap hari, memelihara api suci dan mempersembahkan oblation, menumbuhkan samādhi, teguh di jalan yang benar, serta menjalankan laku yang diperintahkan oleh śāstra sebagaimana mestinya.

Verse 24

ये च ते पूर्वकथिता धर्मास्ते वनवासिनाम्‌ | यदि सेवन्ति धर्मास्तानाप्रुवन्ति तप:फलम्‌,पहले जो तुम्हारे समक्ष वनवासियोंके धर्म बताये गये हैं, उन सबका यदि वे पालन करते हैं तो उन्हें अपनी तपस्याका पूर्ण फल मिलता है

Kewajiban-kewajiban para penghuni rimba yang telah dijelaskan kepadamu sebelumnya—bila mereka benar-benar menjalankan dan menegakkan dharma-dharma itu, maka mereka meraih buah tapa mereka sepenuhnya.

Verse 25

ये च दम्पतिधर्माण: स्वदारनियतेन्द्रिया: । चरन्ति विधिवद्‌ दृष्टं तदनुकालाभिगामिन:,जो गृहस्थ दाम्पत्य धर्मका पालन करते हुए स्त्रीको अपने साथ रखते हैं, उसके साथ ही इन्द्रियसंयम-पूर्वक वेदविहित धर्मका आचरण करते हैं और केवल ऋतुकालनें ही स्त्री समागम करते हैं, उन धर्मात्माओंको ऋषियोंके बताये हुए धर्मोके पालन करनेका फल मिलता है। धर्मदर्शी पुरुषोंकोी कामनावश किसी भोगका सेवन नहीं करना चाहिये

Mahādeva bersabda: “Mereka yang menegakkan dharma rumah tangga, yang mengekang indra terhadap istri sahnya sendiri, yang menjalankan laku Veda sesuai tata cara, dan yang mendatangi istrinya hanya pada masa yang semestinya—para dharmika demikian memperoleh buah dari mengikuti dharma yang diajarkan para resi. Seorang yang berpandangan dharma tidak patut mengecap kenikmatan semata-mata karena nafsu.”

Verse 26

तेषामृषिकृतो धर्मो धर्मिणामुपपद्यते । न कामकारात्‌ कामोडन्य: संसेव्यो धर्मदर्शिभि:,जो गृहस्थ दाम्पत्य धर्मका पालन करते हुए स्त्रीको अपने साथ रखते हैं, उसके साथ ही इन्द्रियसंयम-पूर्वक वेदविहित धर्मका आचरण करते हैं और केवल ऋतुकालनें ही स्त्री समागम करते हैं, उन धर्मात्माओंको ऋषियोंके बताये हुए धर्मोके पालन करनेका फल मिलता है। धर्मदर्शी पुरुषोंकोी कामनावश किसी भोगका सेवन नहीं करना चाहिये

Bagi mereka yang hidup menurut dharma, tata laku yang ditetapkan para resi sungguh berlaku dan berbuah. Para grihastha yang menegakkan dharma rumah tangga—menjadikan istri sebagai sahabat dalam dharma, mengekang indria, menjalankan kewajiban yang ditetapkan Weda, dan hanya bersetubuh pada masa yang semestinya—mereka memperoleh buah dari dharma yang diajarkan para resi. Orang yang melihat dharma dengan jernih tidak patut mengejar kenikmatan semata karena dorongan hasrat atau kehendak sesaat; pemanjaan yang digerakkan nafsu jangan dijadikan laku hidup.

Verse 27

सर्वभूतेषु यः सम्यग्‌ ददात्यभयदक्षिणाम्‌ । हिंसादोषविमुक्तात्मा स वै धर्मेण युज्यते,जो हिंसादोषसे मुक्त होकर सम्पूर्ण प्राणियोंको अभयदान कर देता है, उसीको धर्मका फल प्राप्त होता है

Maheshvara bersabda: “Siapa pun yang dengan cara yang benar menganugerahkan ‘karunia tanpa takut’ (abhaya-dana) kepada semua makhluk—dengan batin yang bebas dari cela kekerasan—dialah yang sungguh bersatu dengan Dharma dan meraih buahnya.”

Verse 28

सर्वभूतानुकम्पी यः सर्वभूतार्जवव्रत: । सर्वभूतात्मभूतश्न स वै धर्मेण युज्यते,जो सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करता है, सबके साथ सरलताका बर्ताव करता और समस्त भूतोंको आत्मभावसे देखता है, वही धर्मके फलसे युक्त होता है

Maheshvara bersabda: “Ia yang berbelas kasih kepada semua makhluk, yang berkaul untuk bersikap lurus terhadap setiap makhluk, dan yang memandang semua makhluk dengan rasa bahwa mereka adalah diri sendiri—dialah yang sungguh bersatu dengan dharma dan memiliki buahnya.”

Verse 29

सर्ववेदेषु वा स्नान सर्वभूतेषु चार्जवम्‌ । उभे एते समे स्यातामार्जवं वा विशिष्यते

Mahādeva bersabda: “Entah seseorang melakukan mandi penyucian yang ditetapkan dalam semua Weda, atau mempraktikkan kelurusan (arjava) terhadap semua makhluk—keduanya dapat dianggap setara; namun kelurusan itulah yang lebih utama.”

Verse 30

चारों वेदोंमें निष्णात होना और सब जीवोंके प्रति सरलताका बर्ताव करना--ये दोनों एक समान समझे जाते हैं अथवा सरलताका ही महत्त्व अधिक माना जाता है ।। आर्जवं धर्ममित्याहुरधर्मो जिह्म॒ उच्यते । आ्जवेनेह संयुक्तो नरो धर्मेण युज्यते,सरलताको धर्म कहते हैं और कुटिलताको अधर्म। सरलभावसे युक्त मनुष्य ही यहाँ धर्मके फलका भागी होता है

Mahādeva mengajarkan: kelurusan (arjava) itulah yang disebut dharma, sedangkan kelicikan yang bengkok disebut adharma. Orang yang di dunia ini berpaut pada kelurusan, sungguh berpaut pada dharma dan menjadi layak menerima buahnya. Bahkan kepandaian atas keempat Weda dipandang setara—dan di beberapa hal lebih rendah—dibanding kemurnian batin ini.

Verse 31

आर्जवे तु रतो नित्यं वसत्यमरसंनिधौ । तस्मादार्जवयुक्त: स्याद्‌ य इच्छेद्‌ धर्ममात्मन:,जो सदा सरल बर्तावमें तत्पर रहता है, वह देवताओंके समीप निवास करता है। इसलिये जो अपने धर्मका फल पाना चाहता हो, उसे सरलतापूर्ण बर्तावसे युक्त होना चाहिये

Seseorang yang senantiasa berpegang pada ārjava—kelugasan, kejujuran, dan tanpa tipu daya—seakan-akan tinggal di hadapan para dewa. Karena itu, siapa pun yang menghendaki buah sejati dari dharmanya hendaknya menumbuhkan perilaku yang sederhana, jujur, dan bersih dari kelicikan.

Verse 32

क्षान्तो दान्तो जितक्रोधो धर्मभूतो विहिंसक: । धर्मे रतमना नित्यं नरो धर्मेण युज्यते,क्षमाशील, जितेन्द्रिय, क्रोधविजयी, धर्मनिष्ठ, अहिंसक और सदा धर्मपरायण मनुष्य ही धर्मके फलका भागी होता है

Maheshvara bersabda: Orang yang pemaaf, mengekang diri, menaklukkan amarah—yang tabiatnya berakar pada dharma dan tidak menyakiti makhluk—yang batinnya senantiasa terpaut pada dharma, dialah yang sungguh bersatu dengan dharma dan berhak atas buahnya.

Verse 33

व्यपेततन्द्रिर्धर्मात्मा शकत्या सत्पथमाश्रित: । चारित्रपरमो बुद्धो ब्रह्मभूयाय कल्पते,जो पुरुष आलस्यरहित, धर्मात्मा, शक्तिके अनुसार श्रेष्ठ मार्गपपर चलनेवाला, सच्चरित्र और ज्ञानी होता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है

Maheshvara bersabda: Ia yang menyingkirkan kemalasan, berhati dharma, menapaki jalan mulia sesuai kemampuannya, serta unggul dalam laku dan kebijaksanaan—orang demikian layak mencapai keadaan Brahman.

Verse 34

उमोवाच (एषां यायावराणां तु धर्ममिच्छामि मानद । कृपया परया<<विष्टस्तन्मे ब्रूहि महेश्वर ।। उमादेवी बोलीं--सबको मान देनेवाले महेश्वर! मैं यायावरोंके धर्मको सुनना चाहती हूँ, आप महान्‌ अनुग्रह करके मुझे यह बताइये ।। श्रीमहेश्वर उवाच धर्म यायावराणां त्वं शृणु भामिनि तत्परा ।। व्रतोपवासशुद्धाज्ञास्तीर्थस्नानपरायणा: । श्रीमहेश्वरने कहा--भामिनि! तुम तत्पर होकर यायावरोंके धर्म सुनो। व्रत और उपवाससे उनके अंग-प्रत्यंग शुद्ध हो जाते हैं तथा वे तीर्थ-स्नानमें तत्पर रहते हैं ।। धृतिमन्त: क्षमायुक्ता: सत्यव्रतपरायणा: ।। पक्षमासोपवासै क्ष कर्शिता धर्मदर्शिन: । उनमें धैर्य और क्षमाका भाव होता है। वे सत्यव्रत-परायण होकर एक-एक पक्ष और एक-एक मासका उपवास करके अत्यन्त दुर्बल हो जाते हैं। उनकी दृष्टि सदा धर्मपर ही रहती है ।। वर्ष: शीतातपैरेव कुर्वन्त: परमं तप: ।। कालयोगेन गच्छन्ति शक्रलोकं शुचिस्मिते | पवित्र मुसकानवाली देवि! वे सर्दी, गर्मी और वर्षाका कष्ट सहन करते हुए बड़ी भारी तपस्या करते हैं और कालयोगसे मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं |। तत्र ते भोगसंयुक्ता दिव्यगन्धसमन्विता: ।। दिव्यभूषणसंयुक्ता विमानवरसंयुता: । विचरन्ति यथाकामं दिव्यस्त्रीगणसंयुता: ।। एतत्‌ ते कथित देवि कि भूय: श्रोतुमिच्छसि ।। वहाँ भी नाना प्रकारके भोगोंसे संयुक्त और दिव्यगन्धसे सम्पन्न हो दिव्य आभूषण धारण करके सुन्दर विमानोंपर बैठते और दिव्यांगनाओंके साथ इच्छानुसार विहार करते हैं। देवि! यह सब यायावरोंका धर्म मैंने तुम्हें बताया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।। उमोवाच तेषां चक्रचराणां च धर्ममिच्छामि वै प्रभो ।। उमाने कहा--प्रभो! वानप्रस्थ ऋषियोंमें जो चक्रचर (छकड़ेसे यात्रा करनेवाले) हैं उनके धर्मको मैं जानना चाहती हूँ ।। श्रीमहेश्वर उवाच एतत्‌ ते कथयिष्यामि शृणु शाकटिकं शुभे ।। श्रीमहेश्वरने कहा--शुभे! यह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। चक्रचारी या शाकटिक मुनियोंका धर्म सुनो ।। संवहन्तो धुरं दारै: शकटानां तु सर्वदा | प्रार्थयन्ते यथाकालं शकटैसभैंक्षचर्यया ।। तपोअ<र्जनपरा धीरास्तपसा क्षीणकल्मषा: । पर्यटन्तो दिश: सर्वा: कामक्रो धविवर्जिता: ।। वे अपनी स्त्रियोंक साथ सदा छकड़ोंके बोझ ढोते हुए यथासमय छकड़ोंद्वारा ही जाकर भिक्षाकी याचना करते हैं। सदा तपस्याके उपार्जनमें लगे रहते हैं। वे धीर मुनि तपस्याद्वारा अपने सारे पापोंका नाश कर डालते हैं तथा काम और क्रोधसे रहित हो सम्पूर्ण दिशाओंमें पर्यटन करते हैं ।। तेनैव कालयोगेन त्रिदिवं यान्ति शो भने । तत्र प्रमुदिता भोगैर्विचरन्ति यथासुखम्‌ ।। एतत्‌ ते कथित देवि कि भूय: श्रोतुमिच्छसि ।। शोभने! उसी जीवनचर्यासे रहित हुए वे कालयोगसे मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गमें जाते हैं और वहाँ दिव्य भोगोंसे आनन्दित हो अपने मौजसे घूमते-फिरते हैं। देवि! तुम्हारे इस प्रश्नका भी उत्तर दे दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो ।। उमोवाच वैखानसानां वै धर्म श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ।। उमाने कहा--प्रभो! अब मैं वैखानसोंका धर्म सुनना चाहती हूँ ।। श्रीमहेश्वर उवाच ते वै वैखानसा नाम वानप्रस्था: शुभेक्षणे । तीव्रेण तपसा युक्ता दीप्तिमन्त: स्वतेजसा ।। सत्यव्रतपरा धीरास्तेषां निष्कल्मषं तप: । श्रीमहेश्वरने कहा--शुभेक्षणे! वे जो वैखानस नामवाले वानप्रस्थ हैं, बड़ी कठोर तपस्यामें संलग्न रहते हैं। अपने तेजसे देदीप्यमान होते हैं। सत्यव्रत-परायण और धीर होते हैं। उनकी तपस्यामें पापका लेश भी नहीं होता है ।। अभ्मकुद्टास्तथान्ये च दन्‍्तोलूखलिनस्तथा । शीर्णपर्णाशिनश्चान्ये उज्छवृत्तास्तथा परे ।। कपोततवृत्तय श्चान्ये कापोतीं वृत्तिमास्थिता: । पशुप्रचारनिरता: फेनपाश्च तथा परे ।। मृगवन्मृगचर्यायां संचरन्ति तथा परे | उनमेंसे कुछ लोग अभश्मकुट्ट (पत्थरसे ही अन्न या फलको कूँचकर खानेवाले) होते हैं। दूसरे दाँतोंस ही ओखलीका काम लेते हैं, तीसरे सूखे पत्ते चबाकर रहते हैं, चौथे उज्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले होते हैं। कुछ कापोती वृत्तिका आश्रय लेकर कबूतरोंके समान अन्नके एक-एक दाने बीनते हैं। कुछ लोग पशुचर्याको अपनाकर पशुओंके साथ ही चलते और उन्हींकी भाँति तृण खाकर रहते हैं। दूसरे लोग फेन चाटकर रहते हैं तथा अन्य बहुतेरे वैखानस मृगचर्याका आश्रय लेकर मृगोंके समान उन्हींके साथ विचरते हैं ।। अब्भक्षा वायुभक्षाश्न निराहारास्तथैव च ।। केचिच्चरन्ति सद्विष्णो: पादपूजनमुत्तमम्‌ | कुछ लोग जल पीकर रहते, कुछ लोग हवा खाकर निर्वाह करते और कितने ही निराहार रह जाते हैं। कुछ लोग भगवान्‌ विष्णुके चरणारविन्दोंका उत्तम रीतिसे पूजन करते हैं।। संचरन्ति तपो घोरें व्याधिमृत्युविवर्जिता: ।। स्ववशादेव ते मृत्युं भीषयन्ति च नित्यश: ।। इन्द्रलोके तथा तेषां निर्मिता भोगसंचया: । अमरै: समतां यान्ति देववद्धोगसंयुता: ।। वे रोग और मृत्युसे रहित हो घोर तपस्या करते हैं और अपनी ही शक्तिसे प्रतिदिन मृत्युको डराया करते हैं। उनके लिये इन्द्रलोकमें ढेर-के-ढेर भोग संचित रहते हैं। वे देवतुल्य भोगोंसे सम्पन्न हो देवताओंकी समानता प्राप्त कर लेते हैं ।। वराप्सरोभि: संयुक्ताश्चिरकालमनिन्दिते | एतत्‌ ते कथित देवि भूय: श्रीतुं किमिच्छसि ।। सती साध्वी देवि! वे चिरकालतक श्रेष्ठ अप्सराजोंके साथ रहकर सुखका अनुभव करते हैं। यह तुमसे वैखानसोंका धर्म बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।। उमोवाच भगवन्‌ श्रोतुमिच्छामि वालखिल्यांस्तपोधनान्‌ ।। उमाने कहा--भगवन्‌! अब मैं तपस्याके धनी वालखिल्योंका परिचय सुनना चाहती हूँ ।। श्रीमहेश्वर उवाच धर्मचर्या तथा देवि वालखिल्यगतां शृणु ।। मृगनिर्मोकवसना निर्दन्द्धास्ते तपोधन: । अड्गुष्ठमात्रा: सुश्रोणि तेष्वेवाज्रेषु संयुता: ।। श्रीमहे श्वरने कहा--देवि! वालखिल्योंकी धर्मचर्याका वर्णन सुनो। वे मृगछाला पहनते हैं, शीत-उष्ण आदि द्वन्द्*ोंका उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। तपस्या ही उनका धन है। सुश्रोणि! उनके शरीरकी लम्बाई एक अंगूठेके बराबर है, उन्हीं शरीरोंमें वे सब एक साथ रहते हैं ।। उद्यन्तं सततं सूर्य स्तुवन्तो विविधै: स्तवै: । भास्करस्येव किरणै: सहसा यान्ति नित्यदा ।। द्योतयन्तो दिश: सर्वा धर्मज्ञा: सत्यवादिन: ।। वे प्रतिदिन नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा निरन्तर उगते हुए सूर्यकी स्तुति करते हुए सहसा आगे बढ़ते जाते हैं और अपनी सूर्यतुल्य किरणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते रहते हैं। वे सब-के-सब धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं ।। तेष्वेव निर्मल सत्यं लोकार्थ तु प्रतिक्तितम्‌ । लोको<थयं धार्यते देवि तेषामेव तपोबलात्‌ ।। महात्मनां तु तपसा सत्येन च शुचिस्मिते | क्षमया च महाभागे भूतानां संस्थितिं विदु: ।। उन्हींमें लोकरक्षाके लिये निर्मल सत्य प्रतिष्ठित है। देवि! उन वालखिल्योंके ही तपोबलसे यह सारा जगत्‌ टिका हुआ है। पवित्र मुसकानवाली महाभागे! उन्हीं महात्माओंकी तपस्या, सत्य और क्षमाके प्रभावसे सम्पूर्ण भूतोंकी स्थिति बनी हुई है, ऐसा मनीषी पुरुष मानते हैं ।। प्रजार्थमपि लोकार्थ महद्ि: क्रियते तप: । तपसा प्राप्यते सर्व तपसा प्राप्पते फलम्‌ ।। दुष्प्रापमपि यल्लोके तपसा प्राप्यते हि तत्‌ ।।) महान्‌ पुरुष समस्त प्रजावर्ग तथा सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये तपस्या करते हैं। तपस्यासे सब कुछ प्राप्त होता है। तपस्यासे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। लोकमें जो दुर्लभ वस्तु है, वह भी तपस्यासे सुलभ हो जाती है ।। उमोवाच आश्रमाभिरता देव तापसा ये तपोधना: । दीप्तिमन्तः कया चैव चर्ययाथ भवन्ति ते,उमाने पूछा--देव! जो तपस्याके धनी तपस्वी अपने आश्रमधर्ममें ही रम रहे हैं, वे किस आचरणसे तपस्वी होते हैं?

Uma berkata: “Wahai Maheshvara, pemberi hormat! Aku ingin mendengar dharma para yāyāvara (pertapa pengembara). Dengan belas kasih, jelaskanlah kepadaku.” Maheshvara bersabda: “Wahai Bhāminī, dengarkan dengan saksama dharma para yāyāvara. Dengan laku tapa, kaul, dan puasa, tubuh mereka disucikan; mereka tekun mandi di tīrtha. Berteguh hati dan berkesabaran, berpegang pada kaul kebenaran, mereka menjadi kurus oleh puasa dua pekan dan sebulan penuh, namun pandangan mereka tetap tertambat pada dharma. Menanggung hujan, dingin, dan terik, mereka menjalani tapa yang berat; dan ketika saatnya tiba menurut ketetapan Kala, wahai yang tersenyum suci, mereka berangkat menuju surga Śakra.”

Verse 35

राजानो राजतपूुत्राश्न निर्धना ये महाधना: । कर्मणा केन भगवनू्‌ प्राप्रुवन्ति महाफलम्‌,भगवन्‌! जो राजा या राजकुमार हैं अथवा जो निर्धन या महाधनी हैं, वे किस कर्मके प्रभावसे महान्‌ फलके भागी होते हैं?

Wahai Bhagavan! Dengan perbuatan apakah para raja dan pangeran—bahkan yang miskin maupun yang amat kaya—menjadi berhak atas buah yang agung?

Verse 36

नित्यं स्थानमुपागम्य दिव्यचन्दनभूषिता: । केन वा कर्मणा देव भवन्ति वनगोचरा:,देव! वनवासी मुनि किस कर्मसे दिव्य स्थानको पाकर दिव्य चन्दनसे विभूषित होते हैं?

Wahai Dewa, dengan perbuatan apakah para resi penghuni rimba—yang berkelana di hutan—senantiasa mencapai kediaman ilahi dan berhias cendana surgawi?

Verse 37

एतन्मे संशयं देव तपश्चर्या55श्रितं शुभम्‌ । शंस सर्वमशेषेण त्र्यक्ष त्रिपुरनाशन,देव! त्रिपुरनाशन त्रिलोचन! तपस्याके आश्रित शुभ फलके विषयमें मेरा यही संदेह है। इस सारे संदेहका उत्तर आप पूर्णरूपसे प्रदान करें

Wahai Dewa, dalam diriku timbul keraguan tentang buah kebajikan yang bergantung pada tapa-askese. Wahai Yang Bermata Tiga, Pemusnah Tripura—jelaskan semuanya kepadaku sepenuhnya, tanpa menyisakan apa pun.

Verse 38

श्रीमहेश्वर उवाच उपवासतव्रतैर्दान्ता हाहिंस्रा: सत्यवादिन: । संसिद्धा: प्रेत्य गन्धर्वै: सह मोदन्त्यनामया:,श्रीमहेश्वरने कहा--जो उपवास व्रतसे सम्पन्न, जितेन्द्रिय, हिंसारहित और सत्यवादी होकर सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं, वे मृत्युके पश्चात्‌ रोग-शोकसे रहित हो गन्धर्वोके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं

Śrī Maheśvara bersabda: Mereka yang disempurnakan oleh laku puasa dan vrata—mengekang diri, tidak menyakiti makhluk, dan berkata benar—setelah meraih kesempurnaan rohani, sesudah wafat bersukacita tanpa sakit dan duka, tinggal bersama para Gandharwa.

Verse 39

मण्डूकयोगशयनो यथान्यायं यथाविधि । दीक्षां चरति धर्मात्मा स नागै: सह मोदते,जो धर्मात्मा पुरुष न्यायानुसार विधिपूर्वक हठयोग-प्रसिद्ध मण्डूकयोगके अनुसार शयन करता और यज्ञकी दीक्षा लेता है, वह नागलोकमें नागोंके साथ सुख भोगता है

Orang saleh yang, menurut aturan yang benar dan tata cara yang ditetapkan, berbaring dalam sikap yang dikenal sebagai Maṇḍūka-yoga serta menjalani dīkṣā (penahbisan) yajña dengan semestinya, mencapai dunia Nāga dan bersukacita bersama para Nāga.

Verse 40

शष्पं मृगमुखोच्छिष्टं यो मृगैः सह भक्षति । दीक्षितो वै मुदा युक्त: स गच्छत्यमरावतीम्‌

Ia yang sedang menjalani dīkṣā, dengan hati gembira turut memakan bersama rusa-rusa rumput muda yang tersisa dari mulut rusa, akan mencapai Amarāvatī.

Verse 41

जो मृगचर्या-व्रतकी दीक्षा ले मृगोंके मुखसे उच्छिष्ट हुई घासको प्रसन्नतापूर्वक उन्हींके साथ रहकर भक्षण करता है, वह मृत्युके पश्चात्‌ अमरावतीपुरीमें जाता है ।। शैवालं शीर्णपर्ण वा तद्व॒ती यो निषेवते । शीतयोगवहो नित्यं स गच्छेत्‌ परमां गतिम्‌,जो व्रतधारी वानप्रस्थ मुनि सेवार अथवा जीर्ण-शीर्ण पत्तेका आहार करता तथा जाड़ेमें प्रतेदिन शीतका कष्ट सहन करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है

Mahesvara bersabda: Barangsiapa menerima inisiasi sumpah hidup seperti rusa, tinggal di antara mereka dengan hati puas, dan dengan gembira memakan rumput yang tersisa dari mulut mereka, maka setelah wafat ia pergi ke Amarāvatī, kota surgawi. Demikian pula, pertapa yang teguh berkaul, yang hidup dari alga atau daun-daun kering yang gugur, serta setiap hari menanggung derita dingin, mencapai keadaan tertinggi.

Verse 42

वायुभक्षो<म्बुभक्षो वा फलमूलाशनोडपि वा । यक्षेष्वैश्वर्यमाधाय मोदते5प्सरसां गणै:,जो वायु, जल, फल अथवा मूल खाकर रहता है, वह यक्षोंपर अपना प्रभुत्व स्थापित करके अप्सराओंके साथ आनन्द भोगता है

Mahādeva bersabda: Entah ia hidup dengan menyantap udara, menyantap air, ataupun dengan buah dan umbi-umbian, pertapa demikian menegakkan kewibawaan di antara para Yakṣa dan bersukaria bersama rombongan Apsaras.

Verse 43

अग्नियोगवह्ो ग्रीष्मे विधिदृष्टेन कर्मणा । चीर्त्वा द्वादशवर्षाणि राजा भवति पार्थिव:,जो गर्मीमें शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पंचाग्नि सेवन करता है, वह बारह वर्षोतक उक्त व्रतका पालन करके जन्मान्तरमें भूमण्डलका राजा होता है

Mahesvara bersabda: Barangsiapa pada terik musim panas menjalankan tapa panca-api sesuai tata-ritus yang ditetapkan śāstra, dan memeliharanya selama dua belas tahun, ia terlahir kembali sebagai raja yang memerintah bumi.

Verse 44

आहारनियमं कुत्वा मुनिर्द्धादिशवार्षिकम्‌ मरुं संसाध्य यत्नेन राजा भवति पार्थिव:,जो मुनि बारह वर्षोतक आहारका संयम करता हुआ यत्नपूर्वक मरु-साधना करके अर्थात्‌ जलको भी त्यागकर तप करता है, वह भी इस पृथ्वीका राजा होता है

Śrī Mahesvara bersabda: Seorang resi yang selama dua belas tahun menegakkan disiplin ketat atas makanan, lalu dengan tekun menuntaskan tapa ‘maru’—yakni bertapa sampai meninggalkan air—akan memperoleh kedaulatan dan menjadi raja di bumi.

Verse 45

स्थण्डिले शुद्धमाकाशं परिगृह्म समनन्‍्ततः: । प्रविश्य च मुदा युक्तो दीक्षां द्वादशवार्षिकीम्‌

Mahādeva bersabda: Setelah menandai pada tanah yang telah disucikan suatu ruang terbuka yang sakral di sekelilingnya, lalu memasukinya dengan hati gembira namun tertib, hendaknya seseorang mengambil dīkṣā—kaul inisiasi—selama dua belas tahun.

Verse 46

स्थण्डिलस्य फलान्याहुर्यानानि शयनानि च

Mahesvara bersabda: “Dikatakan bahwa tapa tidur di tanah telanjang (sthaṇḍila) memiliki buahnya sendiri—seperti kendaraan dan ranjang.”

Verse 47

आत्मानमुपजीवन्‌ यो नियतो नियताशन:

Mahadewa bersabda: “Ia yang hidup bersandar pada dirinya sendiri—terkendali dan teratur dalam makan—itulah orang yang teguh dalam pengekangan diri.”

Verse 48

आत्मानमुपजीवन दीक्षां द्वादशवार्षिकीम्‌

“Dengan hidup bersandar pada diri sendiri, hendaknya ia menjalani dīkṣā—kaul inisiasi—selama dua belas tahun.”

Verse 49

आत्मानमुपजीवन दीक्षां द्वादशवार्षिकीम्‌,जो अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ निर्द्धन्द्ध और परिग्रहशून्य हो बारह वर्षोके लिये व्रतकी दीक्षा ले अन्तमें पत्थरसे अपने पैरोंको विदीर्ण करके स्वयं ही अपने शरीरको त्याग देता है, वह गुह्कलोकमें आनन्द भोगता है

Mahesvara menyatakan: “Ia yang hidup hanya bersandar pada Diri, bebas dari pertentangan batin dan tanpa kepemilikan, menjalani dīkṣā-janji selama dua belas tahun; lalu pada akhirnya, dengan membelah kedua kakinya dengan batu dan dengan kehendaknya sendiri meninggalkan raga—ia mencapai alam Guhyaka dan menikmati kebahagiaan di sana.”

Verse 50

अश्मना चरणोौ भित्त्वा गुह्॒ुकेषु स मोदते । साधयित्वा55त्मना>5>5त्मान निर्दधन्द्धो निष्परिग्रह:,जो अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ निर्द्धन्द्ध और परिग्रहशून्य हो बारह वर्षोके लिये व्रतकी दीक्षा ले अन्तमें पत्थरसे अपने पैरोंको विदीर्ण करके स्वयं ही अपने शरीरको त्याग देता है, वह गुह्कलोकमें आनन्द भोगता है

“Dengan membelah kedua kakinya dengan batu, ia bersukacita di tengah para Guhyaka. Ia yang menundukkan dirinya dengan laku diri—bebas dari pasangan pertentangan dan tanpa kepemilikan.”

Verse 51

चीर्व्वा द्वादशवर्षाणि दीक्षामेतां मनोगताम्‌ । स्वर्गलोकमवाप्रोति देवैश्व सह मोदते,जो बारह वर्षोतक इस मनोगत दीक्षाका पालन करता है, वह स्वर्गलोकमें जाता और देवताओंके साथ आनन्द भोगता है

Śrī Maheśvara bersabda: “Barang siapa selama dua belas tahun dengan setia menjalankan dīkṣā yang telah diteguhkan di dalam batin, ia mencapai alam surga dan bersukacita di sana bersama para dewa.”

Verse 52

आत्मानमुपजीवन्‌ यो दीक्षां द्वादशवार्षिकीम्‌ । ह॒त्वाग्नौ देहमुत्सूज्य वह्विलोके महीयते,जो बारह वर्षोके लिये व्रत-पालनकी दीक्षा ले अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ अपने शरीरको अग्निमें होम देता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है

Maheśvara bersabda: “Seseorang yang hidup dari usahanya sendiri, menjalani dīkṣā selama dua belas tahun, lalu mempersembahkan tubuhnya ke dalam api dan melepaskannya—ia dimuliakan dan memperoleh kedudukan luhur di alam Agni.”

Verse 53

यस्तु देवि यथान्यायं दीक्षितो नियतो द्विज: । आत्मन्यात्मानमाधाय निर्ममों धर्मलालस:

Maheśvara bersabda: “Namun, wahai Dewi, brahmana (yang dua kali lahir) yang telah diinisiasi menurut tata yang benar, yang berdisiplin dan menahan diri, yang menempatkan batinnya di dalam Sang Diri, serta bebas dari rasa memiliki—dialah yang berhasrat pada dharma.”

Verse 54

चीर्व्वा द्वादशवर्षाणि दीक्षामेतां मनोगताम्‌ | अरणीसपितं स्कन्धे बद्ध्वा गच्छत्यनावृत:

Setelah menjalankan dīkṣā batiniah ini selama dua belas tahun, ia berangkat tanpa menoleh kembali, memanggul kayu bakar (samidh) dan batang araṇi yang terikat di bahunya.

Verse 55

वीराध्वानगतो नित्यं वीरासनरतस्तथा । वीरस्थायी च सततं स वीरगतिमाप्नुयात्‌

Śrī Maheśvara bersabda: “Ia yang senantiasa menempuh jalan kepahlawanan, tekun dalam vīrāsana dan disiplin seorang vīra, serta selalu teguh dalam tekad kepahlawanan—akan mencapai vīragati, tujuan para pahlawan.”

Verse 56

देवि! जो ब्राह्मण नियमपूर्वक रहकर यथोचित रीतिसे वनवास-व्रतकी दीक्षा ले अपने मनको परमात्मचिन्तनमें लगाकर ममताशून्य और धर्मका अभिलाषी होकर बारह वर्षोतक इस मनोगत दीक्षाका पालन करके अरणी-सहित अग्निको वृक्षकी डालीमें बाँधकर अर्थात्‌ अग्निका परित्याग करके अनावृत भावसे यात्रा करता है, सदा वीर मार्गसे चलता है, वीरासनपर बैठता है और वीरकी भाँति खड़ा होता है, वह वीरगतिको प्राप्त होता है ।। स शक्रलोकगो नित्यं सर्वकामपुरस्कृत: । दिव्यपुष्पसमाकीर्णो दिव्यचन्दनभूषित:,वह इन्द्रलोकमें जाकर सदा सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न होता है। उसके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होती है तथा वह दिव्य चन्दनसे विभूषित होता है

Maheshvara bersabda: “Wahai Dewi, seorang brahmana yang hidup dalam disiplin ketat, dengan semestinya mengambil dīkṣā sumpah tinggal di rimba; memusatkan batinnya pada perenungan Ātman Tertinggi; bebas dari rasa memiliki dan berhasrat pada dharma; memelihara penyucian batin itu selama dua belas tahun; lalu mengikat api beserta alat penggesek api (araṇi) pada dahan pohon—yakni melepaskan api rumah tangga—dan mengembara terbuka tanpa menyembunyikan diri; senantiasa menempuh ‘jalan para pahlawan’, duduk dalam sikap pahlawan, dan berdiri laksana pahlawan—orang demikian mencapai ‘takdir para pahlawan’. Setelah pergi ke dunia Śakra (Indra), ia senantiasa dianugerahi pemenuhan segala hasrat; ia diguyur bunga-bunga surgawi dan dihiasi cendana ilahi.”

Verse 57

सुखं वसति धर्मात्मा दिवि देवगणै: सह । वीरलोकगतो नित्यं वीरयोगसह: सदा,वह धर्मात्मा देवलोकमें देवताओंके साथ सुख-पूर्वक निवास करता है और निरन्तर वीरलोकमें रहकर वीरोंके साथ संयुक्त होता है

Maheshvara bersabda: “Jiwa yang berpegang pada dharma tinggal bahagia di surga bersama rombongan para dewa. Setelah mencapai alam para pahlawan, ia menetap di sana senantiasa, selalu bersatu dalam persekutuan dengan yang gagah.”

Verse 58

सच्त्वस्थ: सर्वमुत्सृज्य दीक्षितो नियत: शुचि: । वीराध्वानं प्रपद्येद्‌ यस्तस्य लोका: सनातना:,जो सब कुछ त्यागकर वनवासकी दीक्षा ले सत्त्वगुणमें स्थित नियमपरायण एवं पवित्र हो वीरपथका आश्रय लेता है, उसे सनातन लोक प्राप्त होते हैं

Mahādeva bersabda: “Barangsiapa teguh dalam sattva, melepaskan segalanya, menerima dīkṣā, hidup terkendali dan suci, serta menempuh ‘jalan kepahlawanan’—baginya dunia-dunia yang kekal menjadi miliknya.”

Verse 59

कामगेन विमानेन स वै चरति छन्‍्दत: । शक्रलोकगत: श्रीमान्‌ मोदते च निरामय:,वह इन्द्रलोकमें जाकर नीरोग और दिव्य शोभासे सम्पन्न हो आनन्द भोगता है और इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा स्वच्छन्द विचरता रहता है

Maheshvara bersabda: “Setelah mencapai dunia Śakra (Indra), ia—bercahaya dan bebas dari penyakit—bersukacita. Dengan vimāna yang bergerak menurut kehendak, ia berkelana sesukanya.”

Verse 141

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपव्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-141 dalam bagian Dāna-dharma pada Anuśāsana Parva dari Śrī Mahābhārata.

Verse 142

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्व॒रसंवादे द्विचत्वारिंशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्या भारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादाविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Anuśāsana Parva, di bagian Dharma tentang pemberian (dāna-dharma), dalam dialog antara Umā dan Maheśvara, berakhirlah bab ke-seratus empat puluh dua.

Verse 456

देहं चानशने त्यक्त्वा स स्वर्गे सुखमेधते । जो वानप्रस्थ अपने चारों ओर विशुद्ध आकाशको ग्रहण करता हुआ खुले मैदानमें वेदीपर सोता और बारह वर्षोके लिये प्रसन्नतापूर्वक व्रतकी दीक्षा ले उपवास करके अपना शरीर त्याग देता है, वह स्वर्गलोकमें सुख भोगता है

Barangsiapa menjalani tapa-aturan seorang vānaprastha, hidup di bawah langit terbuka yang suci, tidur di atas pelataran altar, menunaikan dīkṣā selama dua belas tahun, lalu melepaskan tubuhnya melalui puasa, ia berbahagia di surga.

Verse 463

गृहाणि च महाहणि चन्द्रशुभ्राणि भामिनि । भामिनि! वेदीपर शयन करनेसे प्राप्त होनेवाले फल इस प्रकार बताये गये हैं--सवारी, शय्या और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल बहुमूल्य गृह

Wahai bhāminī, inilah buah yang dinyatakan dari tidur di atas pelataran altar: kendaraan untuk ditunggangi, ranjang untuk beristirahat, dan rumah-rumah bernilai tinggi yang cemerlang putih laksana bulan.

Verse 473

देहं वानशने त्यक्त्वा स स्वर्ग समुपाश्ुते । जो केवल अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ नियमपूर्वक रहता है और नियमित भोजन करता है अथवा अनशन व्रतका आश्रय ले शरीरको त्याग देता है, वह स्वर्गका सुख भोगता है

Barangsiapa hidup bersandar pada dirinya sendiri, teguh dalam tata-aturan dan makan teratur, atau menempuh kaul puasa lalu melepaskan tubuhnya, ia menikmati kebahagiaan surga.

Verse 483

त्यक्त्वा महार्णवे देहं वारुणं लोकमश्रुते । जो अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ बारह वर्षोकी दीक्षा ले महासागरमें अपने शरीरका त्याग कर देता है, वह वरुणलोकमें सुख भोगता है

Barangsiapa hidup bersandar pada dirinya sendiri, menjalani dīkṣā selama dua belas tahun, lalu melepaskan tubuhnya di samudra raya, ia mencapai dunia Varuṇa dan menikmati kebahagiaan di sana.

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira asks how to decide dharma when perception and scripture both claim authority, and how dharma can be unitary if its proofs are multiple (Veda/śruti, perception, and conduct).

Follow the threefold evidentiary path in disciplined practice, consult reputable exemplars, avoid performative disputation, and anchor conduct in the stable virtues of non-injury, truth, non-anger, and giving.

Yes: Bhīṣma warns that doubt proliferates easily and that treating non-proof as proof produces disputes; he discourages excessive speculative inquiry that destabilizes dharma and emphasizes adherence to recognized pramāṇas and ethical fundamentals.