Opening the text

Sukta 5.9
Vasiṣṭha (probable for 5.9)
Agni (Jātavedas)
Gāyatrī/Anuṣṭubh-like short meter (uncertain from single verse; requires scan of full hymn 5.9)
This hymn invokes Agni as Jātavedas, the all-knowing Fire who receives offerings and carries them along the human ritual path to the gods. It praises Agni’s beneficent guidance and wealth-giving power while acknowledging his hard-to-master, potentially consuming force when unrestrained. The prayer culminates in a request for victorious prosperity, growth, and protection in conflicts.
Mantra 1
त्वामग्ने हविष्मन्तो देवं मर्तास ईळते । मन्ये त्वा जातवेदसं स हव्या वक्ष्यानुषक् ॥
अग्नि, इंसान जो भगवान के लिए सामग्री लाते हैं, वो तुम्हे ढूंढते हैं। मैं तुम्हे जातवेदस मानता हूँ, जो सब कुछ जानने वाला है। इसलिए हमारी सामग्री ले के भगवान तक पहुँचाओ, बार-बार।
Mantra 2
अग्निर्होता दास्वतः क्षयस्य वृक्तबर्हिषः । सं यज्ञासश्चरन्ति यं सं वाजासः श्रवस्यवः ॥
अग्नि वो पुजारी है जो दाने वाले के घर में बैठता है जहाँ सब तैयार होता है। उसके पास सब यज्ञ आते हैं और वो ताकतें आती हैं जो लोगों को बढ़ाती हैं।
Mantra 3
उत स्म यं शिशुं यथा नवं जनिष्टारणी । धर्तारं मानुषीणां विशामग्निं स्वध्वरम् ॥
दो लकड़ियाँ आपस में रगड़ के आग पैदा करती हैं, जैसे कोई नया बच्चा पैदा हो। उसी तरह अग्नि को जन्मा देती हैं। यह अग्नि लोगों का सहारा बनता है। वो सबको संभालता है। लोग उसे सही तरीके से पूजा में बैठाते हैं। यह वो आग है जो सबसे अच्छा हवन करती है।
Mantra 4
उत स्म दुर्गृभीयसे पुत्रो न ह्वार्याणाम् । पुरू यो दग्धासि वनाग्ने पशुर्न यवसे ॥
अग्नि को पकड़ना मुश्किल है, जैसे कोई बिगड़ा हुआ बेटा हो जो सुनता नहीं। यह आग बहुत सारे जंगल जला देती है। जैसे कोई जानवर खुला छोड़ दिया हो, वैसे ही यह फैलती है। अगर इसे सही से संभाला न जाए, तो यह सब को खा जाती है। इसलिए इसपे कंट्रोल रखना ज़रूरी है।
Mantra 5
अध स्म यस्यार्चयः सम्यक्संयन्ति धूमिनः । यदीमह त्रितो दिव्युप ध्मातेव धमति शिशीते ध्मातरी यथा ॥
जब आग का धुआँ सीधा हो जाता है, तब पता चलता है कि आग ठीक से जल रही है। आसमान में त्रित नाम का देवता है जो इस आग को फूँक मार के तेज़ करता है। जैसे कोई लोहा गरम कर के चमकाता है, वैसे ही यह आग भी चमक उठती है। ऊपर वाली ताकत इस आग को और मज़बूत बनाती है।
Mantra 6
तवाहमग्न ऊतिभिर्मित्रस्य च प्रशस्तिभिः । द्वेषोयुतो न दुरिता तुर्याम मर्त्यानाम् ॥
हे अग्नि, तुम्हारी मदद से मैं दुश्मनी दूर कर लेता हूँ। मित्र जैसे मित्र बना के रहते हैं, वैसे ही तुम भी साथ देते हो। मैं मुश्किल वक्त से निकल जाऊँ। इंसान के लिए जो भी बुरा वक्त आता है, मैं उसे पार कर जाऊँ। मुझे किसी दुश्मन का भय न हो।
Mantra 7
तं नो अग्ने अभी नरो रयिं सहस्व आ भर । स क्षेपयत्स पोषयद्भुवद्वाजस्य सातय उतैधि पृत्सु नो वृधे ॥
अग्नि, हम लोगों के लिए धन और शक्ति लाओ। इसको जीत के लाओ, हार के नहीं। यह धन हमारे दुश्मन को गिराए और हमें आगे बढ़ाए। हमारे पास खाना कपड़ा और शक्ति सब बढ़ जाए। जब भी लड़ाई आए, हम उसमें जीते रहें। हमें हर काम में फायदा हो।
Agni, especially as Jātavedas—the fire-god who knows all origins and carries human offerings to the gods.
It points to Agni’s double nature: when tended with discipline he protects and blesses, but when uncontrolled he becomes a consuming force like wildfire.
It asks for rayi (substantial well-being/wealth), poṣa (growth and increase), the defeat of obstacles, and strength for success in conflicts.
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