Bala KandaPrakarana 924 Verses

Prakarana 9

सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का बीज’—शिव-उमा संवाद के माध्यम से जीव के भीतर संकल्प (हठ), श्रद्धा (गुर-वचन-प्रतीति) और काम-निग्रह का उदय। यहाँ कथा-भूमि राम-जन्म से पहले ‘अंतःकरण-शुद्धि’ की तैयारी करती है: देवहित हेतु तप, वर-चयन, और मदन-दहन द्वारा राग का क्षय—जिससे रामकथा-श्रवण/स्मरण के लिए पात्रता बनती है।

यह प्रकरण ‘भक्ति का बीज’ बोता है: (1) संकल्प/हठ—उमा का तप-निश्चय, (2) श्रद्धा—गुरु-वचन-प्रतीति, (3) काम-निग्रह—मदन-दहन द्वारा राग का क्षय। कामदेव यहाँ केवल व्यक्तिगत वासना नहीं, ‘समष्टि-संसार’ का विक्षोभ है—जो विवेक-जप-वैराग्य जैसे गुणों को भी क्षण भर डिगा देता है; इससे तुलसी मनोविज्ञान दिखाते हैं कि साधना में विकार-संघर्ष सार्वभौम है। त्रिनेत्र-उद्घाटन ‘ज्ञान-अग्नि’ का प्रतीक है: ईश्वर-चेतना जागते ही वासना भस्म होती है। ‘जिमि मद उतरि गएँ मतवारे’ उपमा बताती है कि शिव-दर्शन/ईश्वर-स्मरण से चित्त का उन्माद उतरता है और पात्रता (अंतःकरण-शुद्धि) बनती है—यही आगे रामकथा-श्रवण/स्मरण की भूमि तैयार करता है। मदन के ‘अनंग’ होने का संकेत यह भी कि वासना देह से नहीं, संस्कार/कल्पना से चलती है; अतः उसका शमन बाह्य नहीं, अंतःकरण-प्रकाश से होता है।

Verses

चौपाई 80.1-4

अजहूँ मानहु कहा हमारा।हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा।।

अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला।गावहिं बेद जासु जस लीला।।

दूषन रहित सकल गुन रासी।श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी।।

अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी।सुनत बिहसि कह बचन भवानी।।

सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा।हठ न छूट छूटै बरु देहा।।

कनकउ पुनि पषान तें होई।जारेहुँ सहजु न परिहर सोई।।

नारद बचन न मैं परिहरऊँ।बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ।।

गुर कें बचन प्रतीति न जेही।सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।।

ajahũ mānahu kahā hamārā.hama tumha kahũ baru nīka bicārā..

ati sundara suci sukhada susīlā.gāvahĩ beda jāsu jasa līlā..

dūṣana rahita sakala guna rāsī.śrīpati pura baikunṭha nivāsī..

asa baru tumhahi milāuba ānī.sunata bihasi kaha bacana bhavānī..

satya kahehu giribhava tanu ehā.haṭha na chūṭa chūṭai baru dehā..

kanakau puni paṣāna tẽ hoī.jārehũ sahaja na parihara soī..

nārada bacana na maĩ pariharaũ.basau bhavanu ujarau nahĩ ḍaraũ..

gura kẽ bacana pratīti na jehī.sapanehũ sugama na sukha sidhi tehī..

अभी भी मेरी बात ध्यान से सुनो। मैंने तुम्हारे लिए एक बहुत अच्छा वर सोचा है। वो बहुत सुंदर है, पाक है, दयालु है, अच्छी स्वभाव वाला है। वेद उसकी कीर्ति और उसके काम गाते हैं। उसमे कोई दोष नहीं, सारे गुण भरे पड़े हैं। लक्ष्मी के पति हैं, वैकुंठ मे रहते हैं। ऐसा वर मैं लाऊंगा और तुम्हे उसके साथ जोड़ दूंगा। ये सुनके भवानी मुस्कुराई और बोली। तुमने सच कहा कि ये बदन पहाड़ से पैदा हुआ है। ज़िद नहीं छूटती, चाहे बदन ही छूट जाए। सोना भी पत्थर से बनता है। आग मे जलाओ, फिर भी अपनी असलियत नहीं छोड़ता। मैं नारद जी के बात को नहीं छोड़ूंगी। घर बसा रहे या उजड़ जाए, मुझे डर नहीं। जो अपने गुरु के बोल पे भरोसा न रखे, उसे सपने मे भी सुख और सिद्धि आसानी से नहीं मिलती।

दोहा 80

महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम।।⁠80।।

mahādeva avaguna bhavana biṣṇu sakala guna dhāma |jehi kara manu rama jāhi sana tehi tehī sana kāma ||⁠80||

महादेव में खराबियां भरी हैं और विष्णु में सारी अच्छी बातें हैं। पर जिसका दिल किसी में खुश होता है, उसका काम उसी से ही होता है।

चौपाई 81.1-4

जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा।सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा।।

अब मैं जन्मु संभु हित हारा।को गुन दूषन करै बिचारा।।

जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी।रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी।।

तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं।बर कन्या अनेक जग माहीं।।

जन्म कोटि लगि रगर हमारी।बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी।।

तजउँ न नारद कर उपदेसू।आपु कहहि सत बार महेसू।।

मैं पा परउँ कहइ जगदंबा।तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा।।

देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी।जय जय जगदंबिके भवानी।।

jauṁ tumha milatehu prathama munīsā |sunatiuṁ sikha tumhāri dhari sīsā ||

aba maiṁ janmu sambhu hita hārā |ko guna dūṣana karai bicārā ||

jauṁ tumhare haṭha hṛdayaṁ biseṣī |rahi na jāi binu kiyeṁ bareṣī ||

tau kautukianha ālasu nāhīṁ |bara kanyā aneka jaga māhīṁ ||

janma koṭi lagi ragara hamārī |barauṁ sambhu na ta rahauṁ kuārī ||

tajauṁ na nārada kara upadesū |āpu kahahi sata bāra mahesū ||

maiṁ pā parauṁ kahai jagadambā |tumha gṛha gavanahu bhayau bilambā ||

dekhi premu bole muni gyānī |jaya jaya jagadambike bhavānī ||

अरे रिशियों के सरदार, अगर तुम मुझसे पहले मिलते, तो मैं तुम्हारी बात सुनकर सिर पे रख लेती। लेकिन अब मैंने अपनी जान शिव पे लग दी है। अब कौन उसके गुण और दोष तोलता है? अगर तुम्हारे दिल में ये बात ज्यादा चुभी है, और बिना रिश्ता कराये तुम रह नहीं सकते, तो रिश्ता करवाने वालों को आलस नहीं होना चाहिये। दुनिया में बहुत सारे दूल्हे और दुल्हन हैं। पर मेरी ज़िद्द करोड़ जनम तक रहेगी। या तो मैं शिव से ब्याहूंगी, या कुँवारी ही रहूंगी। मैं नारद जी का उपदेश नहीं छोड़ूंगी, चाहे शिव खुद सौ बार बोले। मैं तुम्हारे पाँव पड़ती हूँ, जगत की माँ ने कहा। अब अपने घर जाओ, बहुत वक्त बर्बाद हो गया। उनका प्यार देखकर समझदार रिशियों ने कहा, जय जय तुझको भवानी, जगत की माँ।

दोहा 81

तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु।नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु।।⁠81।।

tumha māyā bhagavāna siva sakala jagata pitu mātu |nāi carana sira muni cale puni-puni haraṣata gātu ||⁠81||

तुम माया हो और शिव भगवान हो। तुम दोनों पूरी दुनिया के माँ बाप हो। रिशि उनके पैरों में सिर झुका के चले गए, और बार बार खुशी से उनका बदन काँप रहा था।

चौपाई 82.1-4

जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए।करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए।।

बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई।कथा उमा कै सकल सुनाई।।

भए मगन सिव सुनत सनेहा।हरषि सप्तरिषि गवने गेहा।।

मनु थिर करि तब संभु सुजाना।लगे करन रघुनायक ध्याना।।

तारकु असुर भयउ तेहि काला।भुज प्रताप बल तेज बिसाला।।

तेंहि सब लोक लोकपति जीते।भए देव सुख संपति रीते।।

अजर अमर सो जीति न जाई।हारे सुर करि बिबिध लराई।।

तब बिरंचि सन जाइ पुकारे।देखे बिधि सब देव दुखारे।।

jāi muninh himavaṃtu paṭhāe.kari binatī girajāhiṃ gṛha lyāe..

bahuri saptariṣi siva pahiṃ jāī.kathā umā kai sakala sunāī..

bhae magana siva sunata sanehā.haraṣi saptariṣi gavane gehā..

manu thira kari taba saṃbhu sujānā.lage karana raghunāyaka dhyānā..

tāraku asura bhayau tehi kālā.bhuja pratāpa bala teja bisālā..

tẽhi saba loka lokapati jīte.bhae deva sukha saṃpati rīte..

ajara amara so jīti na jāī.hāre sura kari bibidha larāī..

taba biraṃci sana jāi pukāre.dekhe bidhi saba deva dukhāre..

रिशि लोग गए और हिमवंत को रस्ते पर लगाया। फिर विनती करके गिरजा को वापस घर ले आए। फिर सात रिशि शिव के पास गए और उमा की सारी कथा सुना दी। शिव उनकी प्यार की बात सुनकर खुश हो गए, और सात रिशि भी खुश होकर अपने घर चले गए। फिर सब कुछ जानने वाले शिव ने अपना मन ठीक किया और रघु के स्वामी का ध्यान लगाने लगे। उस वक्त एक राक्षस था जिसका नाम तारका था। उसकी ताकत, बल और तेज बहुत बड़ा था। उसने सारे लोक और उनके रखवाले जीत लिए। देव लोग खुशी और दौलत से खाली रह गए। वो न बूढ़ा होता था न मरता था, और उसको हराया नहीं जा सकता था। देव लोग उससे कई लड़ाइयां लड़े पर हार गए। फिर वो ब्रह्मा के पास गए और मदद के लिए चिल्लाए। ब्रह्मा ने देखा कि सारे देव दुखी हैं।

दोहा 82

सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ।संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ।।⁠82।।

saba sana kahā bujhāi bidhi danuja nidhana taba hoi |saṁbhu śukra saṁbhūta suta ehi jītai rana soi ||⁠82||

सब को समझा दिया, तब ही दानव का खतम होगा जब शिव जी का बेटा पैदा होगा, और वही उस दानव को युद्ध में हरायेगा।

चौपाई 83.1-4

मोर कहा सुनि करहु उपाई।होइहि ईस्वर करिहि सहाई।।

सतीं जो तजी दच्छ मख देहा।जनमी जाइ हिमाचल गेहा।।

तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी।सिव समाधि बैठे सबु त्यागी।।

जदपि अहइ असमंजस भारी।तदपि बात एक सुनहु हमारी।।

पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं।करै छोभु संकर मन माहीं।।

तब हम जाइ सिवहि सिर नाई।करवाउब बिबाहु बरिआई।।

एहि बिधि भलेहि देवहित होई।मत अति नीक कहइ सबु कोई।।

अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू।प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू।।

mora kahā suni karahu upāī |hoihi īsvara karihi sahāī ||

satīṁ jo tajī daccha makha dehā |janamī jāi himācala gehā ||

tehiṁ tapu kīnha sambhu pati lāgī |siva samādhi baiṭhe sabu tyāgī ||

jadapi ahai asamañjasa bhārī |tadapi bāta eka sunahu hamārī ||

paṭhavahu kāmu jāi siva pāhīṁ |karai chobhu saṅkara mana māhīṁ ||

taba hama jāi sivahi sira nāī |karavāuba bibāhu bariāī ||

ehi bidhi bhalehi devahita hoī |mata ati nīka kahai sabu koī ||

astuti suranha kīnhi ati hetū |pragaṭeu biṣama-bāna jhaṣaketū ||

मेरा जो बोल रहा हूँ सुनो और कोई उपाय सोचो. भगवान मदद करेंगे और काम हो जाएगा. सती ने दक्ष के यज्ञ में अपनी जान दे दी थी. अब वो हिमालय के घर में पैदा हुई है. वो तपस्या कर रही है ताकि शिव को पति पाए. शिव ने सब छोड़ दिया है और समाधि में बैठा है. मुश्किल बहुत बड़ी है, फिर भी मेरी एक बात सुनो. काम देव को शिव के पास भेजो, ताकि शिव के मन में हलचल हो. फिर मैं जाकर शिव को सिर नतक कर उनकी शादी करवा दूँगा, उन्हें समझा के. इस तरह देवताओं का भला हो जाएगा. सब ने कहा कि यह सलाह बहुत अच्छी है. देवताओं ने बहुत दिल से स्तुति की. और काम देव प्रकट हुआ, जिसके तीर बहुत खतरनाक हैं और जिसके झंडे पर मछली बनी है.

दोहा 83

सुरन्ह कहीं निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार।संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार।।⁠83।।

suranhaṁ kahīṁ nija bipati saba suni mana kīnha bicāra |sambhu birodha na kusala mohi bihasi kahe’u asa māra ||⁠83||

देवों ने अपनी परेशानी सब कामदेव को बता दी. कामदेव ने सब सुन के दिमाग में सोचा, फिर मुसकरा के बोला, शिव से दुश्मनी करना मेरे लिए अच्छा नहीं.

चौपाई 84.1-4

तदपि करब मैं काजु तुम्हारा।श्रुति कह परम धरम उपकारा।।

पर हित लागि तजइ जो देही।संतत संत प्रसंसहिं तेही।।

अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई।सुमन धनुष कर सहित सहाई।।

चलत मार अस हृदयँ बिचारा।सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा।।

तब आपन प्रभाउ बिस्तारा।निज बस कीन्ह सकल संसारा।।

कोपेउ जबहि बारिचरकेतू।छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू।।

ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना।धीरज धरम ग्यान बिग्याना।।

सदाचार जप जोग बिरागा।सभय बिबेक कटकु सब भागा।।

tadapi karaba maiṁ kāju tumhārā |śruti kaha parama dharama upakārā ||

para hita lāgi tajai jo dehī |santata santa prasaṁsahiṁ tehī ||

asa kahi caleu sabahi siru nāī |sumana dhanuṣa kara sahita sahāī ||

calata māra asa hṛdayaṁ bicārā |siva birodha dhruva maranu hamārā ||

taba āpana prabhāu bistārā |nija basa kīnha sakala saṁsārā ||

kopeu jabahi bāricaraketū |chana mahuṁ miṭe sakala śruti setū ||

brahmacarja brata saṁjama nānā |dhīraja dharama gyāna bigyānā ||

sadācāra japa joga birāgā |sabhaya bibeka kaṭaku saba bhāgā ||

फिर भी मैं आपका काम करूँगा। वेद कहते हैं कि दूसरों का भला करना सबसे बड़ा धरम है। जो अपनी जान दे दे किसी और के भलाई के लिए, उसको संत हमेशा तारीफ करते हैं। ये कहकर उसने सबके आगे सिर झुकाया और निकल पड़ा। हाथ में फूलों का धनुष था और उसका साथी भी साथ था। जाते हुए काम ने दिल में सोचा: शिव के खिलाफ जाना मेरी पक्की मौत है। फिर उसने अपनी ताकत फैलाई और पूरा दुनिया अपने कंट्रोल में ले लिया। जैसे ही मछली झंडे वाले देव ने गुस्सा किया, वेद के सारे सेतु तुरंत टूट गए। ब्रह्मचर्य, व्रत, और कई तरह के संयम, धैर्य, धरम, ज्ञान और विज्ञान। अच्छा आचरण, जप, योग और वैराग्य: विवेक की पूरी फौज डर के मारे भाग गई।

छंद 84

भागेउ बिबेक सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे।सदग्रंथ पर्बत कंदरन्हि महुँ जाइ तेहि अवसर दुरे।।

होनिहार का करतार को रखवार जग खरभरु परा।दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुँ कोपि कर धनु सरु धरा।।

bhāgeu bibeka sahāya sahita so subhaṭa sañjuga mahi mure |sad-grantha parbata kandaranhi mahũ jāi tehi avasara dure ||

honihāra kā karatāra ko rakhavāra jaga kharabharu parā |dui mātha kehi ratinātha jehi kahũ kopi kara dhanu saru dharā ||

बिबेक नाम का बहादुर योद्धा अपने साथियों के साथ भाग गया और युद्ध का मैदान छोड़ दिया। उसी वक्त वो सब चले गए और अच्छी किताबों रूपी पहाड़ों की गुफाओं में छुप गए। जग में हहाकार मच गया। सब चिल्लाने लगे: अब क्या होगा? हे करतार, कौन बचाएगा हमें? किसके पास दो सर हैं कि वो रति के स्वामी के सामने खड़ा हो सके, जब उसने गुस्से में धनुष और तीर उठा लिया हो?

दोहा 84

जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम।ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम।।⁠84।।

je sajīva jaga acara cara nāri puruṣa asa nāma |te nija nija marajāda taji bhae sakala basa kāma ||⁠84||

दुनिया के सारे जीवित प्राणी, जो चलते फिरते हैं या जो एक जगह रहते हैं, जिन्हें औरत और आदमी के नाम से पुकारा जाता है, उन सब ने अपनी अपनी सही सीमा छोड़ दी, और सब काम के कब्जे में आ गए।

चौपाई 85.1-4

सब के हृदयँ मदन अभिलाषा।लता निहारि नवहिं तरु साखा।।

नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाई।संगम करहिं तलाव तलाई।।

जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी।को कहि सकइ सचेतन करनी।।

पसु पच्छी नभ जल थलचारी।भए कामबस समय बिसारी।।

मदन अंध ब्याकुल सब लोका।निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका।।

देव दनुज नर किंनर ब्याला।प्रेत पिसाच भूत बेताला।।

इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी।सदा काम के चेरे जानी।।

सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी।तेपि कामबस भए बियोगी।।

sab ke hṛdayaṁ madana abhilāṣā |latā nihāri navahiṁ taru sākhā ||

nadīṁ umagi aṁbudhi kahuṁ dhāī |saṅgama karahiṁ talāva talāī ||

jahaṁ asi dasā jaṛanha kai baranī |ko kahi sakai sacetana karanī ||

pasu pacchī nabha-jala-thala-cārī |bhae kāmabasa samaya bisārī ||

madana-aṁdha byākula saba lokā |nisi dinu nahiṁ avalokahiṁ kokā ||

deva danuja nara kiṁnara byālā |preta pisāca bhūta betālā ||

inha kai dasā na kaheuṁ bakhānī |sadā kāma ke cere jānī ||

siddha birakta mahāmuni jogī |tepi kāmabasa bhae biyogī ||

सब के दिल में इच्छा की तड़प थी। लता देख कर पेड़ की डालियाँ उनकी तरफ झुक गई। नदियाँ उबल कर समुंदर की तरफ भागी। झील और तालाब भी आपस में मिल गए। जहाँ बेजान चीजों की हालत ऐसी बताई गई, वहाँ जान वाले जीव क्या करते, वो कोई बता सकता है? जानवर, पक्षी, आसमान, पानी और ज़मीन के सब जीव, सब इच्छा के कब्ज़े में आ गए और अपना सही वक्त भूल गए। सब लोक इच्छा से अंधे और परेशान हो गए। चक्रवाक पक्षी ने दिन रात एक दूसरे को नहीं देखा। देवता, दानव, इंसान, किन्नर, साँप, प्रेत, पिशाच, भूत और बेताल। इन सब की हालत मैं डिटेल से नहीं बताई, क्योंकि हमेशा से इच्छा के नौकर ही माने जाते हैं। सिद्ध, वैरागी, बड़े रिशि और योगी, वो भी इच्छा के कब्ज़े में आ गए और जुदाई की तकलीफ़ महसूस की।

छंद 85

भए कामबस जोगीस तापस पावँरन्हि की को कहै।देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे।।

अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं।दुइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं।।

bhae kāmabasa jogīsa tāpasa pāvaṁranhi kī ko kahai.dekhahiṁ carācara nārimaya je brahmamaya dekhata rahe..

abalā bilokahiṁ puruṣamaya jagu puruṣa saba abalāmayaṁ.dui daṁḍa bhari brahmāṁḍa bhitara kāmakṛta kautuka ayaṁ..

बड़े बड़े योगी और तपस्वी भी काम के वश में आ गए, तोह आम कमज़ोर लोगों का क्या कहना। जिन लोगों ने हमेशा दुनिया को ब्रह्म रूप देखा था, उन्होंने अब हर चीज़, चलती-फिरती हो या नहीं, सब को नारी रूप में देखना शुरू कर दिया। औरतों ने दुनिया को पुरुष रूप में देखा, और पुरुषों ने सब को नारी रूप में। दो घंटे तक पूरे ब्रह्मांड में यह काम का खेल चलता रहा।

सोरठा 85

धरी न काहूँ धिर सबके मन मनसिज हरे।जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ।।⁠85।।

dharī na kāhū̃ dhira sabake mana manasija hare |je rākhe raghubīra te ubare tehi kāla mahũ ||⁠85||

किसी का भी दिमाग नहीं ठहरा। काम देव ने सबके खयाल चुरा लिए थे। जिस जिस को रघुकुल के राम ने बचाया, सिर्फ वही लोग उस वक्त बचे रहे।

चौपाई 86.1-4

उभय घरी अस कौतुक भयऊ।जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ।।

सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू।भयउ जथाथिति सबु संसारू।।

भए तुरत सब जीव सुखारे।जिमि मद उतरि गएँ मतवारे।।

रुद्रहि देखि मदन भय माना।दुराधरष दुर्गम भगवाना।।

फिरत लाज कछु करि नहिं जाई।मरनु ठानि मन रचेसि उपाई।।

प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा।कुसुमित नव तरु राजि बिराजा।।

बन उपबन बापिका तड़ागा।परम सुभग सब दिसा बिभागा।।

जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा।देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा।।

ubhay gharī asa kautuka bhayū.jau lagi kāmu saṁbhu pahiṁ gayū..

sivahi biloki sasaṅkeu mārū.bhayau jathāthiti sabu saṁsārū..

bhae turata saba jīva sukhāre.jimi mada utari gaeṁ mata-vāre..

rudrahi dekhi madana bhaya mānā.durādharṣa durgama bhagavānā..

phirata lāja kachu kari nahiṁ jāī.maranu ṭhāni mana racēsi upāī..

pragaṭēsi turata rucira ritu-rājā.kusumita nava taru rāji birājā..

bana upa-bana bāpikā taṛāgā.parama subhaga saba disā bibhāgā..

jahāṁ tahāṁ janu umagata anurāgā.dekhi muehuṁ mana manasija jāgā..

दो घड़ी तक यह अजीब चल रहा था। फिर काम वहाँ पहुँच गया जहाँ शिव बैठे थे। शिव को देख कर काम डर गया। और पूरी दुनिया वापस अपने पुराने हाल में आ गई। तुरंत सारे जीव आराम से हो गए। जैसे नशा उतर जाने के बाद मतवाले शांत हो जाते हैं। रुद्र को देख कर मदन डर गया। क्योंकि भगवान को हरा नहीं जा सकता था और उनके पास पहुँचना मुश्किल था। वापस मुड़ना शर्म की बात थी, और कुछ किया नहीं जा सकता था। उसने मर जाना ठान लिया, और दिमाग में एक प्लान बनाया। तुरंत उसने बसंत का सुंदर मौसम पैदा कर दिया। नए फूल वाले पेड़ों की कतार हर तरफ चमक रही थी। जंगल और बाग, तालाब और कुंड, और आसमान के हर कोने सुंदर दिखने लगे। हर तरफ प्यार भरा हुआ लग रहा था। देख कर उन मन में भी ख्वाहिश जगी जो पहले मर चुके थे।

छंद 86

जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही।सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही।।

बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा।कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा।।

jāgai manobhava muehũ mana bana subhagatā na parai kahī.sītala sugandha su-manda māruta madana anala sakhā sahī..

bikase saranhi bahu kañja guñjata puñja mañjula madhukarā.kalahansa pika suka sarasa rava kari gāna nācahiṁ apacharā..

दिल की इच्छा तो मरों के भी जाग उठी। बन की खूबसूरती को लफजों में बयान नहीं किया ज सकता। ठंडी, खुशबू वाली, हवा प्यार की आग की साथी थी। झीलों में बहुत सारे कमल खिल उठे। प्यारी भोंरों के झुंड उनके उपर गुन गुना रहे थे। हंस, कोएल और तोता मीठी आवाज़ में बुला रहे थे। अप्सराएँ गाते हुए नाच रही थी।

दोहा 86

सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत।चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत।।⁠86।।

sakala kalā kari koṭi bidhi hāreu sena sameta |calī na acala samādhi siva kopeu hṛdayaniketa ||⁠86||

कमदेव ने हर तरह के जादू और कारोबार लगाए, अपनी पूरी सेना के साथ। लेकिन वो थक गया और हार गया। शिव जी की समाधि एक पल के लिए भी नहीं हिली। दिल में बसने वाला प्यार का देवता गुस्से में आ गया।

चौपाई 87.1-4

देखि रसाल बिटप बर साखा।तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा।।

सुमन चाप निज सर संधाने।अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने।।

छाड़े बिषम बिसिख उर लागे।छुटि समाधि संभु तब जागे।।

भयउ ईस मन छोभु बिसेषी।नयन उघारि सकल दिसि देखी।।

सौरभ पल्लव मदनु बिलोका।भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका।।

तब सिवँ तीसर नयन उघारा।चितवत कामु भयउ जरि छारा।।

हाहाकार भयउ जग भारी।डरपे सुर भए असुर सुखारी।।

समुझि कामसुखु सोचहिं भोगी।भए अकंटक साधक जोगी।।

dekhi rasāla biṭapa bara sākhā |tehi para caṛheu madanu mana mākhā ||

sumana cāpa nija sara sandhāne |ati risa tāki śravana lagi tāne ||

chāṛe biṣama bisikha ura lāge |chuṭi samādhi sambhu taba jāge ||

bhayu īsa mana chobhu biseṣī |nayana ughāri sakala disi dekhī ||

saurabha pallava madanu bilokā |bhayu kopu kampeu trailokā ||

taba sivã tīsara nayana ughārā |citavata kāmu bhayu jari chārā ||

hāhākāra bhayu jaga bhārī |ḍarape sura bhae asura sukhārī ||

samujhi kāma-sukhu socahĩ bhogī |bhae akaṇṭaka sādhaka jogī ||

आम के पेड़ की अच्छी डाली देख के, मदन के मन में शरारत भरी और वो उस पर चढ़ गया। उसने फूलों के धनुष में तीर लगाया, और बहुत गुस्से में निशाना लगा कर डोर कान तक खींच ली। उसने काले तीर चलाए जो शिव के सीन में लगे। तब शम्भु की समाधि टूटी और वो जाग गए। भगवान के मन में बड़ा हलचल मची। उन्होंने आँखें खोली और हर तरफ देखा। उन्होंने सुगन्धित आम के पत्तों में मदन को देख लिया। गुस्सा चढ़ गया और तीनों लोक काँप गए। तब शिव ने तीसरा नेत्र खोला, और एक नज़र डालते ही काम जल कर राख हो गया। जग में बड़ा हाहाकार मचा। देवता डर गए और असुर खुश हो गए। भोगियों काम के सुख सोच कर दुखी हुए, और साधक और जोगी उस काँटे से आज़ाद हो गए।

छंद 87

जोगि अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई।रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई।।

अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही।प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही।।

jogi akaṇṭaka bhae pati gati sunata rati muruchita bhaī |rodati badati bahu bhā̃ti karuṇā karati śaṅkara pahĩ gaī ||

ati prema kari binatī bibidha bidhi jori kara sanmukha rahī |prabhu āsutoṣa kṛpāla śiva abalā nirakhi bole sahī ||

जो योगि थे उनका हर मसला खतम हो गया। लेकिन जब रति ने सुना कि उसके पति के साथ क्या हुआ, तो वो बेहोश गिर गई। रोते हुए और बहुत तरह से दुख दिखाते हुए, वो शिव के पास गई। बहुत प्यार से उसने हाथ जोड़ के शिव के सामने खड़ी होकर बहुत तरह से मिन्नत की। भगवान शिव जल्दी रजी होते हैं और बड़े दयालु हैं। उस बेचारी औरत को देख कर उन्होंने सची बात कही।

दोहा 87

अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु।बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु।।⁠87।।

aba te rati tava nātha kara hoihi nāmu anaṅgu |binu bapu byāpihi sabahi puni sunu nija milana prasaṅgu ||⁠87||

रति, अब से तेरा पति का नाम अनंग होगा, यानी बिना बदन वाला। वो बिना शरीर के सब्बी में घुल जाएगा। अब सुन, तू उससे दोबारा कैसे मिलोगी, वो भी सुन।

चौपाई 88.1-4

जब जदुबंस कृष्न अवतारा।होइहि हरन महा महिभारा।।

कृष्न तनय होइहि पति तोरा।बचनु अन्यथा होइ न मोरा।।

रति गवनी सुनि संकर बानी।कथा अपर अब कहउँ बखानी।।

देवन्ह समाचार सब पाए।ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए।।

सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता।गए जहाँ सिव कृपानिकेता।।

पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा।भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा।।

बोले कृपासिंधु बृषकेतू।कहहु अमर आए केहि हेतू।।

कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी।तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी।।

jaba jadubaṁsa kṛsna avatārā |hoihi harana mahā mahibhārā ||

kṛsna tanaya hoihi pati torā |bacanu anyathā hoi na morā ||

rati gavanī suni saṅkara bānī |kathā apara aba kahauṁ bakhānī ||

devanha samācāra saba pāe |brahmādika baikuṇṭha sidhāe ||

saba sura biṣnu birañci sametā |gae jahāṁ siva kṛpāniketā ||

pṛthaka pṛthaka tinh kīnhi prasaṁsā |bhae prasanna caṁdra avataṁsā ||

bole kṛpāsiṁdhu bṛṣaketū |kahahu amara āe kehi hetū ||

kaha bidhi tumha prabhu aṁtarajāmī |tadapi bhagati basa binavauṁ svāmī ||

जब कृष्ण यदु वंश में पैदा होंगे, तब इस दुनिया का बोझ उतर जाएगा। तुम्हारा पति कृष्ण के बेटे के रूप में जनम लेगा। मेरा बोल कभी उलटा नहीं होगा। शिव जी की बात सुनकर रति वहां से चली गई। अब मैं कहानी का अगला हिस्सा डिटेल में सुनाता हूं। सब देवताओं को सब खबर मिल गई। फिर ब्रह्मा और बाकी सब वैकुंठ चले गए। फिर सब देवता, विष्णु और ब्रह्मा सब मिलकर उस जगह गए जहां शिव, जिसमे दया बसी है, थे। सब ने अलग अलग तरह से उनकी प्रशंसा की। शिव जी, जिसके सिर पर चांद है, खुश हो गए। शिव जी, जो दया के सागर हैं और जिनका निशान बैल है, बोले, बताओ देवताओं, तुम लोग किस काम से आए हो? ब्रह्मा बोले, प्रभु, आप सब के दिल की बात जानते हो। फिर भी भक्ति के बस में होकर मैं आपसे गुजारिश करता हूं, स्वामी।

दोहा 88

सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु।निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु।।⁠88।।

sakala suranha ke hṛdayaṁ asa saṅkara parama uchāhu |nija nayananhi dekhā chahahiṁ nātha tumhāra bibāhu ||⁠88||

हे शंकर, सभी देवता के दिल में एक ही बड़ी चाहत है। वो सब अपनी आँखों से तुम्हारे बियाह देखना चाहते हैं, प्रभु।

चौपाई 89.1-4

यह उत्सव देखिअ भरि लोचन।सोइ कछु करहु मदन मद मोचन॥

कामु जारि रति कहुँ बरु दीन्हा।कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा॥

सासति करि पुनि करहिं पसाऊ।नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ॥

पारबतीं तपु कीन्ह अपारा।करहु तासु अब अंगीकारा॥

सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी।ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी॥

तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं।बरषि सुमन जय जय सुर साई॥

अवसरु जानि सप्तरिषि आए।तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए॥

प्रथम गए जहँ रही भवानी।बोले मधुर बचन छल सानी॥

yaha utsava dekhi'a bhari locana |soi kachu karahu madana mada mocana ||

kāmu jāri rati kahũ baru dīnhā |kṛpāsiṅdhu yaha ati bhala kīnhā ||

sāsati kari puni karahĩ pasāū |nātha prabhunha kara sahaja subhāū ||

pārabatī̃ tapu kīnha apārā |karahu tāsu aba aṅgīkārā ||

suni bidhi binaya samujhi prabhu bānī |aise'i hou kahā sukhu mānī ||

taba devan̐ha duṃdubhī̃ bajā'ī̃ |baraṣi sumana jaya jaya sura sā'ī ||

avasaru jāni saptar̥ṣi ā'e |turatahĩ bidhi giribhavana paṭhā'e ||

prathama ga'e jahã rahī bhavānī |bole madhura bacana chala sānī ||

आप जो मदन के घमंड को तोड़ते हैं, कुछ कीजिए ताकि हम इस उत्सव को दिल भर देख सकें। कामदेव को जला कर आपने रति को वरदान दिया। दया के सागर, आपने बहुत अच्छा किया। पहले सजा देते हैं, फिर कृपा करते हैं। नाथ, यही मालिक का नेचुरल स्वभाव है। पार्वती ने बहुत बड़ी तपस्या की है। अब उन्हें अपना लो। ब्रह्मा की रिक्वेस्ट सुनके और प्रभु की बात समझके, शिव खुश होके बोले, ऐसा ही हो। फिर देवतो ने ढोल बजाए, फूल बरसाए, और बोले, जय जय, देवता के स्वामी! सही वक्त जानके सात रिशि आ गए। ब्रह्मा ने तुरंत उन्हें पहाड़ के राजा के घर भेज दिया। पहले वहाँ गए जहाँ भवानी थी, और मीठी बातें की जो धोखे से भरी थी।

दोहा 89

कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस॥

अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस॥⁠89॥

kahā hamāra na sunehu taba nārada keṃ upadesa.aba bhā jhūṭha tumhāra pana jāreu kāmu mahes..⁠89..

उस वक़्त जो मैने कहा था तुमने नहीं सुना, नारद की सलाह मान ली। अब तुम्हारा वादा झूठा हो गया, क्योंकि शिव ने काम को जला कर राख कर दिया।

Frequently Asked Questions

परंपरागत मान्यता में यह प्रसंग ‘काम-विकार-शमन’ और ‘गुर-वचन-श्रद्धा’ की पुष्टि करता है: शिव-उमा संवाद का पाठ/श्रवण मन को स्थिर करता, तप-भाव जगाता और राम-भक्ति के लिए अंतःकरण को पात्र बनाता है—विशेषतः मदन-जन्य चंचलता, आसक्ति और अविवेक में शांति देता है।

सामान्य मानस-पारायण परंपरा में यहाँ ‘श्रीराम’ नाम-स्मरण/राम-नाम-जप को संपुट-रूप में जोड़ा जाता है (जैसे प्रत्येक दोहा/खंड के बाद ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’). कुछ शिव-उपासक परंपराओं में ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप भी सहचर रूप से चलता है, पर मानस-केन्द्रित संपुट प्रायः राम-नाम ही माना जाता है।

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