सोपान-प्रथम: ‘भक्ति का जन्म’ और ‘श्रद्धा का संस्कार’। बालकाण्ड में जगत्-व्यवस्था (विधि), गुरु-वाक्य, और कथा-श्रवण की पात्रता निर्मित होती है। शिव–पार्वती संवाद के माध्यम से साधक के भीतर संशय→विश्वास, भय→समर्पण, और लोक-लज्जा→ईश-लीला-बोध का रूपांतरण होता है—यही मुक्ति-सीढ़ी का प्रथम पायदान है।
यह प्रकरण ‘भक्ति का जन्म’ और ‘श्रद्धा का संस्कार’ का द्वार है: (1) रूप-विरोध बनाम तत्त्व-सत्य—जो असंगत/भयावह दिखे, वही ईश-लीला का सत्य हो सकता है; साधक को दृश्य-आकर्षण/विकर्षण से ऊपर उठना है। (2) गुरु-वाक्य की प्रतिष्ठा—नारद का उपदेश कथा-श्रवण की पात्रता बनाता है; संशय→विश्वास का मनो-परिवर्तन। (3) लोक-लज्जा बनाम ईश-लीला-बोध—समाज की दृष्टि से ‘अनुचित’ लगने वाला दृश्य भी दिव्य योजना में मंगल है। (4) शैव-वैष्णव समन्वय—विवाह-लीला में शिव, विष्णु, ब्रह्मा, देव और गण एक साथ; भक्ति का पंथ विभाजन नहीं, समन्वय है। (5) शक्ति-शिव-अर्धांग—विवाह केवल सामाजिक घटना नहीं, ब्रह्म-तत्त्व का संकेत: चेतना (शिव) और शक्ति (पार्वती) का अविभाज्य योग।
चौपाई 90.1-4
सुनि बोलीं मुसकाइ भवानी।उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी।।
तुम्हरें जान कामु अब जारा।अब लगि संभु रहे सबिकारा।।
हमरें जान सदा सिव जोगी।अज अनवद्य अकाम अभोगी।।
जौं मैं सिव सेये अस जानी।प्रीति समेत कर्म मन बानी।।
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा।करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा।।
तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा।सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा।।
तात अनल कर सहज सुभाऊ।हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ।।
गएँ समीप सो अवसि नसाई।असि मन्मथ महेस की नाई।।
suni bolīṁ musakāi bhavānī |ucita kahehu munibar bigyānī ||
tumhareṁ jān kāmu aba jārā |aba lagi saṁbhu rahe sabikārā ||
hamareṁ jān sadā siva jogī |aja anavadya akāma abhogī ||
jauṁ maiṁ siva seyeṁ asa jānī |prīti sameta karma mana bānī ||
tau hamāra pana sunahu munīsā |karihahiṁ satya kṛpānidhi īsā ||
tumha jo kahā hari jāreu mārā |soi ati baṛa abibeku tumhārā ||
tāta anala kara sahaja subhāū |him tehi nikaṭa jāi nahiṁ kāū ||
gaēṁ samīpa so avasi nasāī |asi manmatha mahesa kī nāī ||
भवानी ने सुन कर मुस्कुराते हुए बोला, हे सबसे बड़े ज्ञानी रिशी, तुमने बिलकुल सही कहा। तुम्हारे हिसाब से अब शिव ने कामदेव को जला दिया, और अब तक वो वैराग्य में नही थे। मेरे हिसाब से तो शिव सदा से जोगी थे, जनम से निर्मल, किसी चाहत के बिना, किसी सुख-भोग से दूर। अगर मैंने शिव को ऐसे ही जान कर उनकी सेवा की, दिल से, काम से, सोच से और बोल से। तो सुनो रिशियों के स्वामी, दया के सागर ईश्वर मेरा वादा सच करके दिखाएंगे। तुमने जो कहा कि शिव ने कामदेव को जला दिया, तो ये तुम्हारी बहुत बड़ी बेवकूफी है। भाई, आग का ये अपना नैचुरल स्वभाव है, बर्फ उसके पास भी नही जा सकती। जो पास गया वो पक्का जल गया। कामदेव का भी शिव के सामने यही हाल हुआ।
दोहा 90
हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास॥
चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास॥90॥
hiyaṁ haraṣe muni bacana suni dekhi prīti bisvāsa |cale bhavānihi nāi sira gae himācala pāsa ||90||
रिशियों के दिल खुश हो गए जब उनोने उसके बात सुनी और उसकी प्यार और विश्वास देखा। उन्होने भवानी को सिर झुका के प्रणाम किया, फिर निकल पड़े और हिमालय पहुंच गए।
चौपाई 91.1-4
सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा।मदन दहन सुनि अति दुखु पावा।।
बहुरि कहेउ रति कर बरदाना।सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना।।
हृदयँ बिचारि संभु प्रभुताई।सादर मुनिबर लिए बोलाई।।
सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई।बेगि बेदबिधि लगन धराई।।
पत्री सप्तरिषिन्ह सोइ दीन्ही।गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही।।
जाइ बिधिहि दीन्हि सो पाती।बाचत प्रीति न हृदयँ समाती।।
लगन बाचि अज सबहि सुनाई।हरषे मुनि सब सुर समुदाई।।
सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे।मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे।।
sabu prasaṅgu giripatihi sunāvā |madana-dahana suni ati dukhu pāvā ||
bahuri kaheu rati-kara baradānā |suni himavaṁta bahuta sukhu mānā ||
hṛdayaṁ bicāri sambhu prabhutāī |sādara munibara liye bolāī ||
sudinu sunakhatu sugharī socāī |begi beda-bidhi lagana dharāī ||
patrī saptar̥ṣinih soi dīnhī |gahi pada binaya himācala kīnhī ||
jāi bidhihi dīnhi so pātī |bācata prīti na hṛdayaṁ samātī ||
lagana bāci aja sabahi sunāī |haraṣe muni saba sura samudāī ||
sumana br̥ṣṭi nabha bājana bāje |maṅgala kalasa dasahuṁ disi sāje ||
रिशियों ने पहाड़ के स्वामी को सारी बात बता दी। जब उन्होंने सुना कि कामदेव को जला दिया गया, तब उन्हें बहुत दुख हुआ। फिर उन्होंने बताया कि रति को क्या वरदान मिला। ये सुन कर हिमवंत को बहुत खुशी हुई। शिव की महिमा के बारे में दिल में सोच कर, उन्होंने बड़े रिशियों को इज्जत से बुलाया। अच्छा दिन, अच्छा नक्षत्र और शुभ समय ढूंढ्वा कर, उन्होंने जल्दी से वेद के नियम से शादी की तारीख तय करवा दी। उन्होंने सात रिशियों को वो पत्र दिया, और उनके पैर पकड़ कर हिमाचल ने विनती की। वो जा कर ब्रह्मा को वो पत्र दे दिया। ब्रह्मा जब वो पढ़ने लगे, तो उनके दिल का प्यार दब नहीं पाया। ब्रह्मा ने शादी की तारीख सब को पढ़ कर सुना दी। रिशि और सारे देवता बहुत खुश हुए। आसमान से फूल बरसने लगे और बाजे बजने लगे। सारी दिशा में मंगल कलश सज गए।
दोहा 91
लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान।होहि सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान।।91।।
lage saṁvāran sakala sura bāhana bibidha bimāna |hohi saguna maṅgala subhada karahiṁ apacharā gāna ||91||
सारे भगवान ने अपनी अपनी वाहन और उड़ने वाली गाड़ियाँ सजानी शुरू कर दी। अच्छे शगुन ज़ाहिर हुए जिसमें बरकत थी। और ऊपर वाली लड़कियाँ, यानी अप्सराएँ, गाना गाने लगी।
चौपाई 92.1-4
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा।जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा।।
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला।तन बिभूति पट केहरि छाला।।
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा।नयन तीनि उपबीत भुजंगा।।
गरल कंठ उर नर सिर माला।असिव बेष सिवधाम कृपाला।।
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा।चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा।।
देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं।बर लायक दुलहिनि जग नाहीं।।
बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता।चढ़ि चढ़ि बाहन चले बराता।।
सुर समाज सब भाँति अनूपा।नहिं बरात दूलह अनुरूपा।।
sivahi sambhu-gana karahiṁ siṅgārā |jaṭā mukuṭ ahi mauru saṁvārā ||
kuṇḍala kaṅkana pahire byālā |tana bibhūti paṭ kehari chālā ||
sasi lalāṭa suṁdara sira gaṅgā |nayana tīni upabīta bhujaṅgā ||
garala kaṇṭha ura nara sira mālā |asiva beṣa sivadhāma kṛpālā ||
kara trisūla aru ḍamaru birājā |cale basahaṁ caṛhi bājahiṁ bājā ||
dekhi sivahi sura-triya musukāhīṁ |bara lāyaka dulahini jaga nāhīṁ ||
biṣṇu birañci ādi sura-bhrātā |caṛhi-caṛhi bāhana cale barātā ||
sura samāja saba bhāṁti anūpā |nahiṁ barāta dūlaha anurūpā ||
शिव के साथियों ने शिव को सजाना शुरू किया। उनके जटा से एक ताज बनाया और एक सांप को सेहरा की तरह लगाया। उन्होंने सांप को कुंडल और कंगन की तरह पहना। शरीर पर राख लगी थी और कपडे की जगह शेर की खाल ढांकी थी। महीन उनके माथे पर चमक रहा था और गंगा उनके सिर पर। उनकी तीन आंखें थी और सांप उनका जनेऊ था। उनके गले में जहर था और छाती पर इंसानों की खोपडियों की माला। उनका पहनावा अशुभ था, पर वो दयालु शिव हैं जहां सब शुभ होता है। हाथ में त्रिशूल और डमरू चमक रहे थे। वो बैल पर बैठ कर निकले और साथ में बाजे बज रहे थे। देवियों ने शिव को देख कर मुस्कुराया और कहा, दुनिया में ऐसी कोई दुल्हन नहीं जो इस दूल्हे के लायक हो। विष्णु, ब्रह्मा और बाकी सारे देवता अपनी अपनी सवारी पर बैठ बैठ कर बारात में चले गए। देवताओं की भीड हर तरह से लाजवाब थी, पर इस दूल्हे के हिसाब से बारात नहीं बन रही थी।
दोहा 92
बिष्नु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज।बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित समाज।।92।।
biṣṇu kahā asa bihasi taba boli sakala disirāja |bilaga bilaga hoi calahu saba nija nija sahita samāja ||92||
फिर विष्णु मुस्कुराए और ऐसे बोला। उन्होंने सब दिशाओं के रक्षकों को बुलाया। कहा, सब अलग अलग हो जाओ। अपने अपने ग्रुप के साथ चलो।
चौपाई 93.1-4
बर अनुहारि बरात न भाई।हँसी करैहहु पर पुर जाई।।
बिष्नु बचन सुनि सुर मुसकाने।निज निज सेन सहित बिलगाने।।
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं।हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं।।
अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे।भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे।।
सिव अनुसासन सुनि सब आए।प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए।।
नाना बाहन नाना बेषा।बिहसे सिव समाज निज देखा।।
कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू।बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू।।
बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना।रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना।।
bara anuhāri barāta na bhāī |hãsī karaihhū para pura jāī ||
biṣṇu bacana suni sura musakāne |nija nija sena sahita bilagāne ||
manahī̃ mana mahesu musukāhī̃ |hari ke biṅgya bacana nahĩ jāhī̃ ||
ati priya bacana sunata priya kere |bhṛṅgihi preri sakala gana ṭere ||
siva anusāsana suni saba āe |prabhu pada jalaja sīsa tinha nāe ||
nānā bāhana nānā beṣā |bihase siva samāja nija dekhā ||
kou mukhahīna bipula mukha kāhū |binu pada kara kou bahu pada bāhū ||
bipula nayana kou nayana bihīnā |riṣṭapuṣṭa kou ati tanakhīnā ||
भाई, ये कोई बारात नही जो दूल्हे के हिसाब से हो। परदेस शहर में जाओगे तो लोग हसाएंगे। विष्णु की बात सुन के देवता मुस्कुराए, और अपनी अपनी सेना ले के अलग अलग हो गए। शिव भी अंदर ही अंदर मुस्कुराए। हरि की मज़क भरी बात उसके सिर के ऊपर से नही गयी। अपने दोस्तों की बहुत प्यारी बात सुन के, शिव ने भृंगी को भेजा और सारे गण को बुलवा लिया। शिव के हुकुम सुन के सब आ गए, और प्रभु के चरण कमल में सिर झुका दिया। बहुत तरह के सवारी और बहुत तरह के कपडे पहने हुए आए। शिव अपनी टीम को देख के हस पडा। किसी के मूह नही था, किसी के बहुत मूह थे। किसी के हाथ पांव नही थे, किसी के बहुत पांव और हाथ थे। किसी के बहुत आंखे थी, किसी की कोई आंख नही थी। किसी का शरीर बहुत मोटा तगडा था, किसी का बहुत पतला कमजोर।
छंद 93
तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें।।
खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै।बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै।।
tana khīna kou ati pīna pāvana kou apāvana gati dhareṃ |bhūṣana karāla kapāla kara saba sadya sonita tana bhareṃ ||
khara svāna suara sṛkāla mukha gana beṣa aganita ko ganai |bahu jinsa preta pisāca jogi jamāta baranata nahiṃ banai ||
किसी का तन बहुत पतला था, किसी का बहिन मोटा। किसी का चेहरा साफ लगता था, किसी का गंदा। उनके गाने-बधाने डरावने थे, हाथ में किसी के खोपड़ी थी, और तन पर ताज़ा खून लगा हुआ था। किसी के गधबे, कुत्ते, सूअर या गिदर जैसा चेहरा था। उनके रूप और भेस अनेक थे, कोई गिन भी नहीं सकता। बहुत तरह के भूत, पिसाच और जोगियों के झुंड थे, सब को मिला कर बताना मुमकिन नहीं।
सोरठा 93
नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब।देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि।।93।।
nāca-hiṃ gāva-hiṃ gīta parama taraṅgī bhūta saba.dekhata ati biparīta bola-hiṃ bacana bicitra bidhi..93..
सब भूत बहुत खुश थे। वो नाच रहे थे और गाने गा रहे थे। उन्हें देखने में बहुत अजीब लगता था। और वो अनोखी अनोखी बातें बोल रहे थे।
चौपाई 94.1-4
जस दूलहु तसि बनी बराता।कौतुक बिबिध होहिं मग जाता।।
इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना।अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना।।
सैल सकल जहँ लगि जग माहीं।लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं।।
बन सागर सब नदीं तलावा।हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा।।
कामरूप सुंदर तन धारी।सहित समाज सहित बर नारी।।
गए सकल तुहिनाचल गेहा।गावहिं मंगल सहित सनेहा।।
प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए।जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए।।
पुर सोभा अवलोकि सुहाई।लागइ लघु बिरंचि निपुनाई।।
jasa dūlahu tasi banī barātā |kautuka bibidha hohiṁ maga jātā ||
ihāṁ himācala raceu bitānā |ati bicitra nahiṁ jāi bakhānā ||
saila sakala jahaṁ lagi jaga māhīṁ |laghu bisāla nahiṁ barani sirāhīṁ ||
bana sāgara saba nadīṁ talāvā |himagiri saba kahuṁ nevata paṭhāvā ||
kāmarūpa sundara tana dhārī |sahita samāja sahita bara nārī ||
gae sakala tuhinācala gehā |gāvahiṁ maṅgala sahita sanehā ||
prathamahiṁ giri bahu gṛha saṁvarāe |jathāyogu tahaṁ tahaṁ saba chāe ||
pura sobhā avaloki suhāī |lāgai laghu birañci nipunāī ||
दुलहा जैसा था, बरात भी वैसी बनी। जाते हुए रास्ते में बहुत तरह के कमाल हुए। यहाँ हिमालय ने एक बड़ा छता बनाया। इतना अजीब और खूबसूरत कि बता नहीं जा सकता। दुनिया में जितने भी पहाड़ हैं, छोटे या बड़े, गिनना और पूरा बताना मुमकिन नहीं। जंगल, समुंदर, सारी नदिया और तालाब। हिमालय ने सबको बुलावा भेजा। अपनी मर्जी से खूबसूरत शरीर बनाकर, अपने परिवार और सुंदर औरतों के साथ। सब हिमालय के घर गए। प्यार के साथ मंगल गीत गाते हुए। शुरू में पहाड़ ने बहुत सारे घर बनवाए और सजाए। हर जगह जैसा चाहिए था वैसा सब लगा दिया। शहर की खूबसूरती देखकर, ब्रह्मा की कलाकारी भी छोटी लगने लगी।
छंद 94
लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही।बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही।।
मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं।बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं।।
laghu lāga bidhi kī nipunatā avaloki pura sobhā sahī |bana bāga kūpa taṛāga saritā subhaga saba saka ko kahī ||
maṅgala bipula torana patākā ketu gṛha gṛha sohahīṃ |banitā puruṣa sundara catura chabi dekhi muni mana mohahīṃ ||
शहर की सच्ची सोभा देख के लगता था जैसे ब्रह्मा की कलकारी भी छोटी हो गई। जंगल, बाग, कुएं, तालब और नदिया, सब इतनी सुंदर थी कि कोई इन सब का डिटेल दे ही नहीं सकता। हर घर मंगल के सामान ढेर सारा था। हर घर के ऊपर तोरन, पताके और झंदे सज रहे थे। औरत और मर्द दोनों सुंदर और चतुर थे, उनकी सोभा देख के रिशियों का मन भी मोह गया।
दोहा 94
जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ।रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ।।94।।
jagadambā jahã avatari so puru barani ki jāi |ṛddhi siddhi sampatti sukha nita nūtana adhikāi ||94||
जिस शहर में दुनिया की मा पैदा हुई, क्या उस शहर को बताया जा सकता है? वहां बरकत, चमत्कारी ताकत, दौलत और खुशी रोज बढती रहती थी, हमेशा नई नई।
चौपाई 95.1-4
नगर निकट बरात सुनि आई।पुर खरभरु सोभा अधिकाई।।
करि बनाव सजि बाहन नाना।चले लेन सादर अगवाना।।
हियँ हरषे सुर सेन निहारी।हरिहि देखि अति भए सुखारी।।
सिव समाज जब देखन लागे।बिडरि चले बाहन सब भागे।।
धरि धीरजु तहँ रहे सयाने।बालक सब लै जीव पराने।।
गएँ भवन पूछहिं पितु माता।कहहिं बचन भय कंपित गाता।।
कहिअ काह कहि जाइ न बाता।जम कर धार किधौं बरिआता।।
बरु बौराह बसहँ असवारा।ब्याल कपाल बिभूषन छारा।।
nagara nikaṭa barāta suni āī |pura kharabharu sobhā adhikāī ||
kari banāva saji bāhana nānā |cale lena sādara agavānā ||
hiyaṁ haraṣe sura sena nihārī |harihi dekhi ati bhae sukhārī ||
siva samāja jaba dekhana lāge |biḍari cale bāhana saba bhāge ||
dhari dhīraju tahaṁ rahe sayāne |bālaka saba lai jīva parāne ||
gaẽ bhavana pūchahiṁ pitu mātā |kahahiṁ bacana bhaya kaṁpita gātā ||
kahi-a kāha kahi jāi na bātā |jama kara dhāra kidhauṁ bariātā ||
baru baurāha basahaṁ asavārā |byāla kapāla bibhūṣana chārā ||
शहर वालों ने सुना कि बारात शहर के पास आ गई है। पूरा शहर हल्ला मच गया, और उसकी खूबसूरती और बढ़ गई। सब लोग अपने आप को सजाए, और अपनी सारी गाड़ियां सवारी। फिर इज्जत से बारात लेने के लिए निकल पड़े। देवताओं की सेना देख कर लोग दिल से खुश हुए। और हरि को देख कर वो बहुत ज्यादा खुश हो गए। लेकिन जब शिव के साथियों को देखना शुरू किया, तोह उनकी सारी सवारियां डर मारे भाग पड़ी। बड़े और समझदार लोग हिम्मत करके वहीं रुके रहे। लेकिन सारे बच्चे अपनी जान बचा कर भाग गए। जब घर पहुंचे तोह उनके मां बाप ने पूछा। उन्होंने जवाब दिया, उनका पूरा बदन डर से कांप रहा था। क्या कहें? ये बात बताई नहीं जा सकती। ये बारात है या यमराज की सेना? दूल्हा तोह पागल है, बैल पर सवार है। नाग और खोलदरियां जेवर है, और शरीर पर राख लगी है।
छंद 95
तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा।सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा।।
जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही।देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही।।
tana chāra byāla kapāla bhūṣana nagana jaṭila bhayaṅkarā |saṅga bhūta preta pisāca jogini bikaṭa mukha rajanīcarā ||
jo jiata rahihi barāta dekhata pun̐ya baṛa tehi kara sahī |dekhihi so umā bibāhu ghara-ghara bāta asi larikanha kahī ||
उसका तन राख से लिपडा है। साँप और खाली खोपड़ियाँ उसके गहने हैं। कपडे नहीं पहने, बाल बिखरे हैं, और रूप बहुत डरावना है। साथ में भूत, प्रेत, पिसाच और जोगिनियाँ हैं। रात को घूमने वाले डरावने चेहरे वाले राक्षस भी हैं। जो इस बारात को देख कर ज़िंदा रह जाए उसके पास बहुत बड़ा पुन्य है। वही इन्सान उमा की शादी देख पाएगा। बच्चे यही बात हर घर घर करके बोल रहे थे।
दोहा 95
समुझि महेस समाज सब जननि जनक मुसुकाहिं।बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु डरु नाहिं।।95।।
samujhi mahesa samāja saba janani janaka musukāhiṁ |bāla bujhāe bibidha bidhi niḍara hohu ḍaru nāhiṁ ||95||
सब समझ गए कि ये सब शिव जी का ही था, तोह माँ बाप सब मुस्काए। बच्चों को तरह तरह से समझाया, डरो मत, कोई डर नही है।
चौपाई 96.1-4
लै अगवान बरातहि आए।दिए सबहि जनवास सुहाए।।
मैनाँ सुभ आरती सँवारी।संग सुमंगल गावहिं नारी।।
कंचन थार सोह बर पानी।परिछन चली हरहि हरषानी।।
बिकट बेष रुद्रहि जब देखा।अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा।।
भागि भवन पैठीं अति त्रासा।गए महेसु जहाँ जनवासा।।
मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी।लीन्ही बोलि गिरीसकुमारी।।
अधिक सनेहँ गोद बैठारी।स्याम सरोज नयन भरे बारी।।
जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा।तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा।।
lai agavāna barātahi āe.die sabahi janavāsa suhāe..
mainā̃ subha āratī sãvārī.saṅga sumaṅgala gāvahi nārī..
kañcana thāra soha bara pānī.parichana calī harahi haraṣānī..
bikaṭa beṣa rudrahi jaba dekhā.abalanh ura bhaya bhayau biseṣā..
bhāgi bhavana paiṭhī̃ ati trāsā.gae mahesu jahā̃ janavāsā..
mainā hṛdayã bhayau dukhu bhārī.līnhī boli girīsakumārī..
adhika sanehã goda baiṭhārī.syāma saroja nayana bhare bārī..
jehĩ bidhi tumhahi rūpu asa dīnhā.tehĩ jaṛa baru bāura kasa kīnhā..
जो लोग बारात ले के आए थे, उन्हें वेलकम करके अंदर लाया गया। सब को अच्छा गेस्ट रूम दिया गया। मैना ने वेलकम की आरती तैयार की। औरत लोग उसके साथ में मंगल गीत गाने लगी। हाथ में सोने की प्लेट चमक रही थी। मैना खुश होकर हर को वेलकम करने के लिए चली। पर जब औरतों ने रुद्र का डर वाला लुक देखा, तो उनके दिल में बहुत डर गया। बहुत डर के मारे वो भाग के घर के अंदर चली गई। और महेश आगे गेस्ट रूम में चला गया। मैना के दिल में बहुत दुख उठा। उसने पहाड़ के राजा की बेटी को बुलाया। बहुत प्यार से उसे गोदी में बिठाया। उसके काले कमल जैसी आँखों में आँसू आ गए। जिसने तुम्हें ऐसा रूप दिया, उसी ने तुम्हारे दूल्हे को पागल कैसे बना दिया?
छंद 96
कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई।।
तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।घरु जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं।।
kasa kīnha baru baurāha bidhi jehiṃ tumhahi suṃdaratā daī |jo phalu cahi-a sura-taruhin so barabasa babūrahim̃ lāgaī ||
tumha sahita giri teṃ girauṃ pāvaka jarauṃ jala-nidhi mahuṃ parauṃ |gharu jāu apajasu hou jaga jīvata bibāhu na hauṃ karauṃ ||
ब्रह्मा ने तुम्हे इतनी खूबसूरती दी, तो एक पागल को तुम्हारा दूल्हा कैसे बना दिया? जो फल ख्वाइश पूरी करने वाले पेड़ को मिलना चाहिए, वो जबरदस्ती बबूल के कांटे पर लगा दिया। मैं तुम्हारे साथ पहाड़ से कूद जाऊंगा, या आग में जलूंगा, या समुंदर में डूबूंगा। घर बर्बाद हो जाये, दुनिया में बदनामी हो, पर जिंदा रह कर ये शादी मैं होने नहीं दूंगा।
दोहा 96
भई बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि।करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि।।96।।
bhaī bikala abalā sakala dukhita dekhi girināri |kari bilāpu rodati badati sutā sanehu sãbhāri ||96||
पहाड़ के राजा की पत्नी बहुत परेशान थी। उसको देख के सारी औरतें भी दुखी हो गयी। अपनी बेटी से प्यार याद रखते हुए वो रो रही थी और दुख में बातें कर रही थी।
चौपाई 97.1-4
नारद कर मैं काह बिगारा।भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा।।
अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा।बौरे बरहि लगि तपु कीन्हा।।
साचेहुँ उन्ह के मोह न माया।उदासीन धनु धामु न जाया।।
पर घर घालक लाज न भीरा।बाझँ कि जान प्रसव कैं पीरा।।
जननिहि बिकल बिलोकि भवानी।बोली जुत बिबेक मृदु बानी।।
अस बिचारि सोचहि मति माता।सो न टरइ जो रचइ बिधाता।।
करम लिखा जौ बाउर नाहू।तौ कत दोसु लगाइअ काहू।।
तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका।मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका।।
nārada kari maiṁ kāhu bigārā |bhavanu mora jinha basata ujārā ||
a sa upadesu umāhi jinha dīnhā |baure barahi lagi tapu kīnhā ||
sācehuṁ unha ke moha na māyā |udāsīna dhanu dhāmu na jāyā ||
para-ghara ghālaka lāja na bhīrā |bājhaṁ ki jāna prasava kaiṁ pīrā ||
jananihi bikala biloki bhavānī |bolī juta bibeka mṛdu bānī ||
a sa bicāri socahi mati mātā |so na ṭarai jo racai bidhātā ||
karama likhā jau bāura nāhū |tau kata dosu lagāia kāhū ||
tumha sana miṭahiṁ ki bidhi ke aṅkā |mātu byartha jani lehu kalaṅkā ||
मैंने नारद को क्या बुरा किया था? उसने तो मेरे घर को ही उजाड़ दिया जहाँ मैं रह रही थी। उसने उमा को ऐसी सलाह दी कि वोह एक पागल दूल्हे के लिए तपस्या करने लगी है। सच में इनके अंदर न मोह है न दया। ये बेपरवाह हैं, इनके पास न दौलत है, न घर, न बीवी। ये दूसरों के घर उजाड़ते हैं, इनमे न शरम है न डर। जो औरत बाँझ हो, क्या वोह बच्चा पैदा करने का दर्द जानती है? माँ को उदास देखकर भवानी ने समझदारी भरी नरम बातें कहीं। माँ, ऐसे सोच और अपने मन में दुखी मत हो। जो विधाता तय करते हैं वोह कभी नहीं बदलता। अगर मेरी किस्मत में लिखा है कि मेरा पति पागल होगा, तोह किसी पर दोष क्यों लगाएँ? विधाता ने जो लिख दिया, क्या तुम उसे मिटा सकती हो? माँ, बेकार में अपने उपर दोष मत लो।
छंद 97
जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं॥
दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं॥॥
सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं॥
बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं॥
jani lehu mātu kalaṅku karunā pariharahu avasara nahīṃ |dukhu sukhu jo likhā lilāra hamareṃ jāba jahã pāuba tahīṃ ||
suni umā bacana binīta komala sakala abalā sochahīṃ |bahu bhā̃ti bidhihi lagāi dūṣana nayana bāri bimochahīṃ ||
माता, अपने उपर ये इलजाम मत लो। अपनी दया छोड़ दो, अब इसका वक्त नहीं है। मेरे माथे पर जो दुख या सुख लिखा है, मैं जहां बी वो मिलता है वहां जाऊंगा और वही पाऊंगा। उमा के नरम और विनम्र बातें सुन कर सारी औरतें दुखी हो गई। उन्होंने कई तरह से ब्रह्मा को दोष दिया, और आंखों से आंसू बह निकले।
दोहा 97
तेहि अवसर नारद सहित अरु रिषि सप्त समेत।समाचार सुनि तुहिनगिरि गवने तुरत निकेत।।97।।
tehi avasara nārada sahita aru ṛṣi sapta sameta |samācāra suni tuhina-giri gavane turata niketa ||97||
उस वक़्त नारद और सात रिशि साथ में आ पहुंचे. हिमालय, यानी बर्फ वाले पहाड़ के स्वामी, खबर सुन के तुरंत अपने घर चले गए.
चौपाई 98.1-4
तब नारद सबहि समुझावा।पूरुब कथाप्रसंगु सुनावा।।
मयना सत्य सुनहु मम बानी।जगदंबा तव सुता भवानी।।
अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि।सदा संभु अरधंग निवासिनि।।
जग संभव पालन लय कारिनि।निज इच्छा लीला बपु धारिनि।।
जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई।नामु सती सुंदर तनु पाई।।
तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं।कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं।।
एक बार आवत सिव संगा।देखेउ रघुकुल कमल पतंगा।।
भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा।भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा।।
taba nārada sabahi samujhāvā |pūruba kathā-prasaṅgu sunāvā ||
maynā satya sunahu mama bānī |jagadambā tava sutā bhavānī ||
ajā anādi sakti abināsini |sadā sambhu aradhaṅga nivāsini ||
jaga sambhava pālana laya kārini |nija icchā līlā bapu dhārini ||
janamīṁ prathama daccha gṛha jāī |nāmu satī sundara tanu pāī ||
tahāṁhuṁ satī saṅkarahi bibāhīṁ |kathā prasiddha sakala jaga māhīṁ ||
eka bāra āvata siva saṅgā |dekheu raghukula kamala pataṅgā ||
bhayu mohu siva kahā na kīnhā |bhrama basa beṣu sīya kara līnhā ||
फिर नारद ने सबको समझाया, और पुरानी कहानी सुनाई। मैना, मेरी बात सुनो, ये सच है, तेरी बेटी भवानी जग की मा है। वो न पैदा हुई है और न उसकी कोई शुरुआत है, वो नाश नही होने वाली शक्ति है, और हमेशा शंभु के शरीर का आधा हिस्सा बनकर रहती है। जग को बनाती है, चलाती है और खत्म करती है, और अपनी मर्जी से खेल में शरीर लेती है। पहले दक्ष के घर पैदा हुई, सुंदर शरीर पाई, और उसका नाम सती था। वहीं सती की शादी शंकर से हुई, और ये कहानी पूरी जग में मशहूर है। एक बार जब वो शिव के साथ चल रही थी, तब उसने राम को देखा, जो रघु वंस के कमल के लिए सूरज है। उसके ऊपर मोह आ गया, और उसने शिव की बात नही मानी, भ्रम में आ कर उसने सीता का रूप ले लिया।
छंद 98
सिय बेषु सती जो कीन्ह तेहि अपराध संकर परिहरीं।हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं।।
अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया।अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकर प्रिया।।
siya beṣu satī jo kīnha tehi aparādha saṅkara pariharīṁ |hari birahaṁ jāi bahori pitu keṁ jagya jogānala jarīṁ ||
aba janami tumhare bhavana nija pati lāgi dāruna tapu kiyā |asa jāni saṁsaya tajahu girijā sarbadā saṅkara priyā ||
सती ने सीता का रूप धरण किया था। इस अपराध की वजह से शंकर ने सती को छोड़ दिया। फिर हर से बिछड़कर वो अपने पिता के यज्ञ में गई और योग की अग्नि में जल गई। अब वो तुम्हारे घर पैदा हुई है। अपने पति के लिए उसने बहुत सख्त तप किया है। ये बात जानकर अपना शक छोड़ दो। गिरिजा हमेशा शंकर की प्रिया है।
दोहा 98
सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद।छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह संबाद।।98।।
suni nārada ke bacana taba saba kara miṭā biṣāda |chana mahũ byāpeu sakala pura ghara-ghara yaha saṃbāda ||98||
नारद जी की बात सुनकर सब का दुख चला गया। और पलक में ही ये खबर पूरे शहर में हर घर तक फैल गई।
चौपाई 99.1-4
तब मयना हिमवंतु अनंदे।पुनि पुनि पारबती पद बंदे।।
नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने।नगर लोग सब अति हरषाने।।
लगे होन पुर मंगलगाना।सजे सबहि हाटक घट नाना।।
भाँति अनेक भई जेवराना।सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा।।
सो जेवनार कि जाइ बखानी।बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी।।
सादर बोले सकल बराती।बिष्नु बिरंचि देव सब जाती।।
बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा।लागे परुसन निपुन सुआरा।।
नारिबृंद सुर जेवँत जानी।लगीं देन गारीं मृदु बानी।।
taba mainā himavantu anaṁde |puni puni pārabatī pada baṁde ||
nāri puruṣa sisu jubā sayāne |nagara loga saba ati haraṣāne ||
lage hona pura maṁgala-gānā |saje sabahi hāṭaka ghaṭa nānā ||
bhāṁti aneka bhaī jevar-ānā |sūpa-sāstra jasa kachu byavahārā ||
so jevanāra ki jāi bakhānī |basahiṁ bhavana jehiṁ mātu bhavānī ||
sādara bole sakala barātī |biṣṇu biraṁci deva saba jātī ||
bibidha pāṁti baiṭhī jevanārā |lāge parusana nipuna suārā ||
nāribṛṁda sur jevaṁta jānī |lagīṁ dena gārīṁ mṛdu bānī ||
फिर मयना और हिमवंत बहुत खुश हुए, और बार बार पारबती के पैर छूने लगे। औरतें, मर्द, बच्चे, जवान और बूढ़े, शहर के सब लोग बहुत खुश थे। शहर मे मंगल के गाने शुरू हो गए, और सब ने तरह तरह के सोने के बरतन सजाए। खाना तरह तरह से बनाया गया, जैसे खाना बनाने के नियम मे लिखा है। उस घर मे खाने का कैसे बताएं जहां माता भवानी खुद रहती हैं। सब बराती को इज्जत से बुलाया गया: विष्णु, ब्रह्मा, और हर जाति के देवता। सब अलग अलग लाइन मे बैठ के खाने लगे, और कुशल बावर्ची परोसना शुरू किए। देवतों को खाना खाते देख कर, औरतों ने नरमी से थोड़ी गालियां दे कर उन्हें छेड़ना शुरू किया।
छंद 99
गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं।भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं।।
जेवँत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो।अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहँ जाको रह्यो।।
gārīṁ madhura svara dehiṁ sundari biṅgya bacana sunāvahīṁ |bhojanu karahiṁ sura ati bilaṁbu binodu suni sacu pāvahīṁ ||
jevaṁta jo baḍhyo anaṁdu so mukha koṭihūṁ na parai kahyo |acavāṁi dīnhe pāna gavane bāsa jahaṁ jāko rahyo ||
सुंदर औरतें ने मीठी आवाज़ में छेड़-छाड़ के गाने गाए और मज़ाक वाली बातें की। देवता लोग खाना खाते रहे, बहुत देर तक बैठे रुके, और उस खेल तमाशे की आवाज़ का मज़ा लेते रहे। खाना खाते वक्त जो खुशी बढ़ती गई, उसे करोड़ के मुह भी कह नहीं सकते। जब उन्हें मुह धोने के लिए पानी और पान दिया गया, तब हर एक अपने ठहरे हुए जगह पर चला गया।
दोहा 99
बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ।समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ।।99।।
bahuri muninh himavanta kahũ lagana sunāī āi |samaya biloki bibāha kara paṭhae deva bolāi ||99||
फिर रिशि लोग आए और हिमवन को बताया कि शादी का टाइम आ गया है। हिमवन ने देखा कि शादी का सही समय आ गया है, तोह उन्होने गॉड्स को बुलाया भेज दिया।
परंपरा में शिव-पार्वती विवाह-प्रसंग का पाठ ‘गृह-मंगल’, ‘विवाह-विघ्न-निवारण’, तथा मन के भय/संशय-क्षय हेतु फलदायी माना जाता है; विशेषतः दोहा 98 के ‘अजा-अनादि शक्ति’ उपदेश से श्रद्धा स्थिर होती है।
सामान्यतः ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन’ जैसे नाम-संपुट चलन में हैं; शिव-प्रसंग में कई पाठ-परंपराएँ ‘ॐ नमः शिवाय’/‘जय गिरिजापति दीनदयाला’ को भी संपुट-रूप में जोड़ती हैं (स्थानीय संप्रदायानुसार)।
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