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मुख्य विषय: यक्ष्मा और पाप्मन् का भैषज्य-स्वरूप अपसारण/उच्छेदन करके रोगी में समायुस् (पूर्ण आयु) की पुनर्स्थापना। उप-विषय: (1) रोग को रोगी से ‘वियोजन’ (अलग करना) की विधि, (2) रोगी को अखण्डता, बल-प्राण और अविकल जीवन से पुनः जोड़ना, (3) चिकित्सा-कारण रूप मानी गई दुष्ट/मलिन अशुद्धि (पाप्मन्) से शुद्धि, (4) क्षय-रोग के पुनरावर्तन से रक्षा हेतु संरक्षणात्मक दृढ़ीकरण। व्यावहारिक उपयोग: जब किसी में क्षय/क्षीणता, दीर्घकालिक दुर्बलता, या बार-बार रोग लौटने के लक्षण हों—तब मंत्र-प्रयोग द्वारा रोग-अपसारण और आयु-बल की स्थापना के लिए।
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