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Love, Unity & Statecraft
अथर्ववेद का काण्ड 3 (31 सूक्त, 230 मंत्र; 4 अनुवाक) अथर्वणीय कर्मकाण्डों के द्वारा राष्ट्र (rāṣṭra) और गृह (gṛha) की स्थिरता पर केन्द्रित है—शत्रुता का प्रतिषेध, अभिचार/टोने-टोटके का निराकरण, तथा सामाजिक और ब्रह्माण्डीय ऋत (ṛta) की पुनर्स्थापना इसका मुख्य लक्ष्य है। इसमें शान्तिक और पौष्टिक (paustika) प्रकार के अभिषेक/प्रतिष्ठा-कर्म—जल, निवास-स्थान, गोशाला और क्षेत्र—के साथ मानव-समृद्धि की व्यावहारिक ‘उपाय-विद्याएँ’ भी जुड़ी हैं: व्यापार-सफलता, प्रेम/आकर्षण (स्त्री-कर्माणि), विजय और सामूहिक एकता। यह काण्ड भैषज्य (bhaisajya) सामग्री से भी विशेष रूप से चिह्नित है—यक्ष्मा और पाप्मन् के निष्कासन तथा औषधियों की शक्ति पर आधारित मंत्र, विशेषतः कुष्ठ (kuṣṭha) के प्रयोग द्वारा, प्राण-शरीर की पूर्णता और समायुस् (samāyus) की पुनर्स्थापना हेतु।
4 anuvakas (sections) to explore.
मुख्य विषय: राष्ट्र-स्थिरीकरण और प्रतिमंत्र-प्रयोग—राजत्व, राज्य और गृह की सुरक्षा, शत्रुता का प्रतिघात कर व्यवस्था की पुनर्स्थापना। उपविषय: (1) शापों और वैरभाव का प्रत्यानीयन (लौटाकर भेजना)। (2) राजकर्म—अभिषेक तथा स्वाराज्य का दृढ़ीकरण। (3) राष्ट्र-निवेशन—राज्य को निवासयोग्य, एकसूत्र, और ऋत-अनुकूल बनाना। (4) विरोधी की शक्ति और यश को बाँधकर निष्क्रिय करना। (5) मणि/ताबीज-आधारित सामाजिक संरक्षण और मैत्री-बंधन। (6) दीर्घकालीन, जड़ जमाए रोग (क्षेत्रिय) का उपचार।
मुख्य विषय: जीवन की सुरक्षा हेतु अनुष्ठानिक उपाय—स्वास्थ्य, गृह, आजीविका, प्रजनन-समृद्धि और सामाजिक व्यवस्था—के लिए प्रमुख स्थलों (घर, जल, गोष्ठ/बाड़ा, खेत) का अभिषेक/प्रतिष्ठापन तथा मानव-कर्तृत्व (व्यापार, प्रेम, युद्ध) का सशक्तीकरण। उप-विषय: (1) यक्ष्मा और मृत्यु से मुक्ति/मोचन, (2) पवित्र ‘आपः’ (जल) द्वारा शुद्धि और चिकित्सा, (3) स्थैर्य व समृद्धि हेतु गृह और देहरी/सीमा का संस्कार, (4) गोष्ठ/बाड़े में पशुओं की एकता और संरक्षण, (5) व्यापार और यात्रा में सफलता व सुरक्षा, (6) प्रेम/आकर्षण तथा युद्ध/विजय के लिए समर्थक मंत्र-प्रयोग।
गृहस्थ-जीवन की सुरक्षा और समृद्धि: अथर्वणिक कर्मों द्वारा भीतर-बाहर के संकटों को शांत कर, समृद्धि, उर्वरता, पारिवारिक एकता और जीवन-रक्षा की स्थापना। उपविषय: (1) खतरनाक दाह/ताप की शान्ति और उसे संरक्षण में रूपान्तरित करना (अग्नि—अन्तर्निहित अग्नि)। (2) पौष्टिक वृद्धि: भण्डार, खेत, पशुधन, ‘भग’ और ‘वर्चस्’ (सार्वभौम समृद्धि और सार्वजनिक तेज)। (3) उर्वरता की पुनर्स्थापना तथा बाँझपन का निवारण/स्थानान्तरण। (4) दिशात्मक एवं सीमा-रक्षा (दिक्-रक्षा; चतुर्दिक्/सीमाबन्धन)।
मुख्य विषय: यक्ष्मा और पाप्मन् का भैषज्य-स्वरूप अपसारण/उच्छेदन करके रोगी में समायुस् (पूर्ण आयु) की पुनर्स्थापना। उप-विषय: (1) रोग को रोगी से ‘वियोजन’ (अलग करना) की विधि, (2) रोगी को अखण्डता, बल-प्राण और अविकल जीवन से पुनः जोड़ना, (3) चिकित्सा-कारण रूप मानी गई दुष्ट/मलिन अशुद्धि (पाप्मन्) से शुद्धि, (4) क्षय-रोग के पुनरावर्तन से रक्षा हेतु संरक्षणात्मक दृढ़ीकरण। व्यावहारिक उपयोग: जब किसी में क्षय/क्षीणता, दीर्घकालिक दुर्बलता, या बार-बार रोग लौटने के लक्षण हों—तब मंत्र-प्रयोग द्वारा रोग-अपसारण और आयु-बल की स्थापना के लिए।
It focuses on protecting and stabilizing realm and household—repelling hostility and sorcery, consecrating key spaces (house, waters, byre, field), and installing prosperity, cohesion, and health.
Because it contains prominent hymns praising and activating the kuṣṭha herb as a potent bhaiṣajya remedy, linked with restoring vitality and countering afflictions like yakṣma and pāpman.
Yes. Its strī-karmāṇi present attraction and union as ritualized, goal-directed acts—binding affection and concord while remaining embedded within broader household security and prosperity aims.
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