
Chapter Arc: रणभूमि में द्रोणपुत्र अश्वत्थामा उन्मत्त वेग से शत्रु-सैन्य को भल्लों से काटता हुआ शवों के पर्वत-से ढेर लगा देता है; उसी क्षण वह नारायणास्त्र के प्रयोग का संकल्प कर युद्ध का स्वरूप ही बदल देता है। → नारायणास्त्र सर्वत्र फैलता है; उसके तेज से पाण्डव-सेना का बल क्षीण होने लगता है और धर्मपुत्र युधिष्ठिर भय व खेद से भर उठते हैं। भीमसेन जैसे महाबली भी उस दिव्यास्त्र की ज्वालामय बाण-वृष्टि में घिरते दिखते हैं; पाण्डव-पक्ष में हाहाकार मचता है। → श्रीकृष्ण उपाय बताते हैं—अस्त्रों का त्याग, शस्त्र नीचे रखना, विनयपूर्वक स्थिर रहना; जैसे ही पाण्डव-सेना शस्त्र छोड़ती है, नारायणास्त्र का प्रचण्ड वेग शान्त होने लगता है और अश्वत्थामा का संहार-उन्माद निष्फल पड़ता है। → पाण्डव-सेना कृष्ण-वचन से बच जाती है; युधिष्ठिर का त्रास उतरता है और युद्ध में यह स्पष्ट हो जाता है कि दिव्यास्त्र के सामने अहंकार नहीं, समर्पण ही रक्षा है। अश्वत्थामा की क्रूरता और पाण्डवों की विवेकशीलता का तीखा विरोध उभरता है। → अस्त्र-शमन के बाद भी रण की आग बुझती नहीं—अश्वत्थामा का क्रोध और प्रतिशोध-भाव आगे किस पर टूटेगा, यह अनिश्चित रह जाता है।
Verse 1
ऑपनआ कराता छा अकाल नवनवरत्याधिकशततमो< ध्याय: अश्वत्थामाके द्वारा नारायणास्त्रका प्रयोग
قال سانجيا: ثم شرع أشفَتّامان، ابن درونا، في مذبحةٍ مروّعةٍ في صفوف جيش الأعداء. كأنه الموتُ نفسه—وقد حرّكه الزمانُ عند انقضاء العصر—ابتدأ بإهلاك الكائنات الحيّة.
Verse 2
ध्वजद्रुमं शस्त्रशुड्रंं हतनागमहाशिलम् । अश्वकिम्पुरुषाकीर्ण शरासनलतावृतम्
قال سانجيا: «بدا ميدان القتال كأنه جبل: أشجاره الرايات والألوية، وقممه الأسلحة، وصخوره العظام أجساد الفيلة المصرَوعة. وكان مكتظًّا بالخيل كأنها كِمْبُرُوشات تسكن ذلك الجبل، ومغطّى بالأقواس وأوتارها كأنها كرومٌ ممتدّة.»
Verse 3
क्रव्यादपक्षिसंघुष्ट भूतयक्षगणाकुलम् । निहत्य शात्रवान् भल्लै: सोडचिनोदू देहपर्वतम्
قال سانجيا: بعدما قتل المحاربين الأعداء بسهامٍ حادّة، كوّم الأجساد حتى صارت كالجبل. وكان ذلك الركام المروّع كأنه حيٌّ بصيحات الطيور الآكلة للّحم، وكأنه مكتظٌّ بجماعات البهوتا والياكشا.
Verse 4
ततो वेगेन महता विनद्य स नरर्षभ: । प्रतिज्ञां आ्रावयामास पुनरेव तवात्मजम्,नरश्रेष्ठ अश्वत्थामाने फिर बड़े वेगसे गर्जना करके आपके पुत्रको पुनः अपनी प्रतिज्ञा सुनायी
قال سانجيا: ثم اندفع ذلك الفحل بين الرجال باندفاعٍ عظيم وهو يزمجر، وجعل ابنك يسمع نذره مرةً أخرى.
Verse 5
यस्माद् युध्यन्तमाचार्य धर्मकञ्चुकमास्थित: । मुज्च शस्त्रमिति प्राह कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:
قال سانجيا: لما رأى يودهِشْتِهيرا، ابن كونتي، المعلّم يقاتل وهو ما يزال متدرّعًا بـ«درع الدارما»، نادى: «ألقِ سلاحك!»
Verse 6
तस्मात् सम्पश्यतस्तस्य द्रावयिष्यामि वाहिनीम् । विद्राव्य सर्वान् हन्तास्मि जाल्मं पाउ्चाल्यमेव तु
قال سانجيا: «لذلك، وهو ينظر بعينيه، سأجعل جيشه يفرّ هاربًا. وبعد أن أبدّدهم جميعًا، سأقتل ذلك البانشالا الوضيع وحده.»
Verse 7
'धर्मका चोला पहने हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने युद्धपरायण आचार्यसे “शस्त्र त्याग दीजिये” ऐसा कहा था और शस्त्र रखवा दिया; इसलिये मैं उसके देखते-देखते उनकी सारी सेनाको खदेड़ दूँगा और समस्त सैनिकोंको भगाकर उस नीच पांचालपुत्रको मार डालूँगा ।।
قال سانجيا: «لأن يودهيشثيرا ابن كونتي، وقد تزيّا بوشاح الدارما، قال للمعلّم المتعطّش للقتال: “ألقِ سلاحك”، وجعله يضع سلاحه جانبًا؛ لذلك—وأمام عينيه—سأطرد جيشهم كلَّه. سأجعل الجنود جميعًا يفرّون، وبعد أن أبدّدهم في الهرب سأقتل ذلك الوضيع، ابن بانشالا. وإن اختاروا أن يقاتلوني في ساحة المعركة فسأقتلهم جميعًا—أقسم لك بذلك قسمًا صادقًا. فارجع بقواتك.»
Verse 8
तच्छुत्वा तव पुत्रस्तु वाहिनी पर्यवर्तयत् | सिंहनादेन महता व्यपोहा[ सुमहद् भयम्,यह सुनकर आपके पुत्रने महान् सिंहनादके द्वारा अपनी सेनाका भारी भय दूर करके फिर उसे लौटाया
قال سانجيا: فلما سمع ذلك ابنك ثبّت الجيش وجمعه ثم أعاده إلى القتال؛ وبزئيرٍ عظيم كزئير الأسد بدّد الخوف الجسيم الذي استولى على الجنود.
Verse 9
ततः समागमो राजन् कुरुपाण्डवसेनयो: । पुनरेवाभवत् तीव्र: पूर्णसागरयोरिव
قال سانجيا: ثم، أيها الملك، التقت جيوش الكورو والباندافا مرة أخرى؛ واشتدّ الاصطدام من جديد، كالتقاء محيطين ممتلئين متلاطمين.
Verse 10
राजन! फिर भरे हुए दो महासागरोंके समान कौरव-पाण्डव-सेनाओंमें घोर संग्राम आरम्भ हो गया ।।
قال سانجيا: أيها الملك، اندلعت مرة أخرى معركة مروّعة بين جيشي الكاورافا والباندافا، كاصطدام محيطين عظيمين ممتلئين. وقد استقرّ الكاورافا واشتدّ عزمهم بعدما طمأنهم ابن درونا، فامتلأوا غضبًا وحماسةً متجددة للقتال. وعلى الجانب الآخر، كان الباندافا والبنشالا أشدّاء من قبل، ثم ازدادوا اندفاعًا بعد مقتل درونا.
Verse 11
तेषां परमहृष्टानां जयमात्मनि पश्यताम् | संरब्धानां महावेग: प्रादुरासीद् विशाम्पते,प्रजानाथ! वे अत्यन्त हर्षोत्फुल्ल होकर अपनी ही विजय देख रहे थे। रोषावेषमें भरे हुए उन सैनिकोंका महान् वेग प्रकट हुआ
قال سنجيا: «لما طفقوا يطربون بأقصى الفرح، يرون النصر كأنه قد صار لهم، اندفعت في أولئك المحاربين—وقد استعر فيهم الغضب—دفعةٌ هائلة من القوة؛ يا سيدَ الرعية، يا حاميَ الرعايا!»
Verse 12
यथा शिलोच्चये शैल: सागरे सागरो यथा । प्रतिहन्येत राजेन्द्र तथा55सन् कुरुपाण्डवा:
قال سنجيا: «يا ملكَ الملوك، كما يصطدم جبلٌ بجبلٍ على ذُرى الصخر، وكما يندفع بحرٌ ليلقى بحرًا، كذلك تصادم الكورو والباندافا—لقاءٌ متكافئ القوة، عظيم السعة، صلب العزم لا يلين.»
Verse 13
तत: शड्खसहस्राणि भेरीणामयुतानि च । अवादयन्त संहृष्टा: कुरुपाण्डवसैनिका:,तदनन्तर हर्षमग्न हुए कौरव-पाण्डव-सैनिक सहस्रों शंख और हजारों रणभेरियाँ बजाने लगे
قال سنجيا: «ثم إن جنود الكورو والباندافا، وقد غمرتهم البهجة، نفخوا آلاف الأصداف ونقروا عشرات الألوف من طبول الحرب، فارتفع في الميدان صخبٌ مدوٍّ.»
Verse 14
यथा निर्मथ्यमानस्य सागरस्य तु निःस्वनः । अभवत् तव सैन्यस्य सुमहानद्भुतोपम:,जैसे मथे जाते हुए समुद्रका महान् शब्द सब ओर गूँज उठा था, उसी प्रकार आपकी सेनाका महान् कोलाहल भी अद्भुत एवं अनुपम था
قال سنجيا: «وكما يعلو هديرٌ عظيمٌ من البحر إذا خُضَّ وقُلِب، فيتردد في كل ناحية، كذلك ارتفع من جيشك ضجيجٌ هائل، عجيبٌ لا نظير له.»
Verse 15
प्रादुश्चक्रे ततो द्रौणिरस्त्रं नारायणं तदा । अभिसंधाय पाण्डूनां पञ्चालानां च वाहिनीम्
قال سنجيا: «ثم إن دراوني (أشڤتّامان) أظهر في تلك اللحظة سلاحَ نارايانا. وجّهه نحو جيوش الباندافا والبانتشالا وأطلقه—تصعيدٌ يجعل ساحة القتال امتحانًا للضبط والالتزام بالدارما بقدر ما هو امتحانٌ للقوة، إذ إن مثل هذه المقذوفات الإلهية تهدد بخرابٍ لا يميّز بين أحد، وتستدعي جوابًا أخلاقيًا لا مجرد عنفٍ مضاد.»
Verse 16
प्रादुरासंस्ततो बाणा दीप्ताग्रा: खे सहस्रश: । पाण्डवान् क्षपयिष्यन्तो दीप्तास्था: पन्नगा इव
قال سانجيا: ثم فجأةً ظهرت في السماء آلاف السهام، ورؤوسها تتقد اشتعالًا. وانقضّت كالأفاعي ذات الأفواه النارية، قاصدةً إفناء مقاتلي الباندافا—مظهرًا مشؤومًا لقوةٍ لا تُقاوَم أُطلقت في هياج الحرب.
Verse 17
0 ते दिश:ः खं च सैन्यं च समावृण्वन् महाहवे । मुहूर्ताद् भास्करस्येव लोके राजन् गभस्तय:
قال سانجيا: في ذلك القتال العظيم انتشرت تلك السهام فغطّت الجهات والسماء والجيوش—كما أن أشعة الشمس، يا أيها الملك، تعمّ العالم في لحظة وجيزة. وتُبرز هذه الصورة كيف تتسع عنفُ البشر سريعًا وبصورة طاغية متى أُطلق في ساحة الحرب.
Verse 18
तथापरे द्योतमाना ज्योतींषीवामलाम्बरे | प्रादुरासन् महाराज कार्ष्णायसमया गुडा:
قال سانجيا: «ثم، أيها الملك العظيم، ظهرت أشكال أخرى—تلمع كالكواكب في سماء صافية—كتلٌ داكنة بلون الحديد تجلّت فجأة. وكان المشهد نذيرَ انعطافٍ مشؤوم، كأن الطبيعة نفسها تُظهر الآيات وسط عنف الحرب».
Verse 19
महाराज! इसी प्रकार वहाँ निर्मल आकाशमें प्रकाशित होनेवाले ज्योतिर्मय ग्रह- नक्षत्रोंके समान काले लोहेके चलते हुए गोले भी प्रकट हो-होकर गिरने लगे ।।
قال سانجيا: أيها الملك، في ذلك الموضع، كأن السماء الصافية تتلألأ فيها الكواكب والنجوم، كذلك كانت كُراتٌ من حديدٍ أسود تتحرك من تلقاء نفسها، تظهر تباعًا ثم تهوي. وظهرت śataghnī ذات الأربع عجلات وذات العجلتين، وكثير من الهراوات، وأقراصٌ قتالية عديدة حوافُّها مسننة بشفرات، متألقة كدوائر الشمس—معلنةً اشتدادًا مروّعًا، يكاد يكون فوق بشري، لعنف المعركة.
Verse 20
शस्त्राकृतिभिराकीर्णमतीव पुरुषर्षभ । दृष्टवान्तरिक्षमाविग्ना: पाण्डुपाउ्चालसृज्जया:
قال سانجيا: يا ثور الرجال، لما رأى الباندافا والبانيچالا والسِرِنْجَيا السماء كأنها ممتلئة تمامًا بأشكالٍ على هيئة الأسلحة، اضطربوا قلقًا وفزعًا. إن السماء حين تبدو محمّلةً بالسلاح تُعلن رعب الحرب الأخلاقي—إذ ينتشر الخوف لا في الجيوش وحدها، بل في العالم كله، كأن العنف يطغى حتى على نظام الطبيعة.
Verse 22
अभश्रत्थामाके द्वारा पाण्डव-सेनापर नारायणास्त्रका प्रयोग जनेश्वर! पाण्डव-महारथी जैसे-जैसे युद्ध करते थे, वैसे-ही-वैसे उस अस्त्रका वेग बढ़ता जाता था ।।
قال سنجيا: «يا سيد الناس! لما أطلق أشفَتّھاما سلاح نارايانا على جيش الباندافا، كان اندفاعه يشتدّ بقدر ما كان عظماء فرسان المركبات من الباندافا يواصلون القتال بضراوة. وقد عُذِّب الجنود في ساحة المعركة من كل جانب حين أصابتهم نارايانا-أسترا، كأنما تُلْهَبهم النار إحراقًا من كل جهة».
Verse 23
यथा यथा हायुध्यन्त पाण्डवानां महारथा: । तथा तथा तदस्त्र॑ वै व्यवर्धत जनाधिप
قال سنجيا: «أيها الملك، كلما واصل عظماء فرسان المركبات من الباندافا القتال ازداد ذلك السلاح قوةً. وكما أن نارًا تُوقَد بعد انقضاء الشتاء، في قيظ الحر، تحرق الحطب اليابس والأجمة، كذلك بدأ ذلك السلاح، يا مولاي، يلتهم جيش الباندافا».
Verse 24
आपूर्यमाणेनास्त्रेण सैन्ये क्षीयति च प्रभो । जगाम परम॑ त्रासं धर्मपुत्रो युधिष्ठिर:
قال سنجيا: «يا مولاي، لما انتشر ذلك السلاح في كل مكان وبدأ الجيش يذوي تحت وطأته، استولى على يودهيشتيرا، ابن الدارما، خوفٌ بالغٌ شديد».
Verse 25
द्रवमाणं तु तत् सैन्यं दृष्टवा विगतचेतनम् । मध्यस्थतां च पार्थस्य धर्मपुत्रो5ब्रवीदिदम्,उन्होंने अपनी उस सेनाको जब अचेत होकर भागती और दुन्तीपुत्र अर्जुनको तटस्थभावसे खड़ा देखा, तब इस प्रकार कहा--
قال سنجيا: لما رأى دهرمابوترا (يودهيشتيرا) جيشه يفرّ مذعورًا كأنه فاقدٌ للوعي، ولاحظ بارثا (أرجونا) ابن باندو واقفًا على الحياد، منفصلًا لا يتدخل، قال هذه الكلمات.
Verse 26
धृष्टद्युम्न पलायस्व सह पाज्चालसेनया । सात्यके त्वं च गच्छस्व वृष्ण्यन्धकवृतों गृहान्
قال سنجيا: «يا دْهريشتاديومنَ، انسحب حالًا—بل اهرب مع جيش البانچالا. وأنت أيضًا يا ساتياكي، ارجع إلى الديار، وليصحبك أبطال الفريشنيين والأنذكيين حراسةً».
Verse 27
वासुदेवो5पि धर्मात्मा करिष्यत्यात्मन: क्षमम् | श्रेयो हपदिशत्येष लोकस्य किमुतात्मन:
قال سَنجايا: «إن فاسوديفا أيضًا بارٌّ في باطنه؛ سيفعل ما يليق به لنفسه. وهو الذي يعلّم العالم كلَّه ما فيه الخير الحقّ—فكيف لا يضمن لنفسه خيرها كذلك؟»
Verse 28
संग्रामस्तु न कर्तव्य: सर्वसैन्यान् ब्रवीमि व: । अहं हि सह सोदर्य: प्रवेक्ष्य हव्यवाहनम्,“मैं तुम सभी सैनिकोंसे कह रहा हूँ, कोई भी युद्ध न करे। अब मैं भाइयोंके साथ अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा
قال سَنجايا: «لا ينبغي أن تُخاض معركة. أقول هذا لجميع الجند. أمّا أنا، فمع إخوتي، فسأدخل النار.»
Verse 29
भीष्पद्रोणार्णवं तीर्त्वा संग्रामे भीरुदुस्तरे । विमज्जिष्यामि सलिले सगणो द्रौणिगोष्पदे
قال سَنجايا: «بعد أن عبرتُ، في هذه المعركة العسيرة على الجبناء، ذلك المحيط العظيم الذي هو بهيشما ودرونا، فسأغرق بعد ذلك—مع أتباعي—في ماءٍ ليس إلا كأثر حافر بقرة، أي أشوَتّھاما.»
Verse 30
काम: सम्पद्यतामस्य बी भत्सोराशु मां प्रति । कल्याणवृत्तिराचार्यो मया युधि निपातित:
قال سَنجايا: «ليتحقق سريعًا مرادُ هذا البيبهتسو (أرجونا) في شأني؛ فقد أسقطتُ في ساحة القتال المعلّمَ ذا السيرة الكريمة.»
Verse 31
“अर्जुनकी मेरे प्रति जो शुभ कामना है, वह शीघ्र पूरी हो जानी चाहिये; क्योंकि सदा अपने कल्याणमें संलग्न रहनेवाले आचार्यको मैंने युद्धमें मरवा दिया है ।।
قال سَنجايا: «ليتحقق سريعًا رجاءُ أرجونا الحسن في شأني؛ فقد تسببتُ في موت المعلّم في ساحة القتال، ذلك الذي كان مواظبًا على ما يراه صلاحًا لنفسه. حقًّا إن ذلك الفتى ابن سوبهادرا—وهو غير متمرّس بفنون الحرب—قد صُرِع على أيدي كثير من الفرسان الأقوياء القساة، ولم يُحمَ.»
Verse 32
येनाविन्लुवता प्रश्न॑ तथा कृष्णा सभां गता । उपेक्षिता सपुत्रेण दासभावं नियच्छती
قال سَنْجَايَا: حين أُدخلت دروبدي (كِرِشْنَا) إلى مجلس الملك، تُرِكَ سؤالها بلا جواب؛ وبفعله—هو وابنه معًا—قوبلت بالإهمال والازدراء. وفي تلك اللحظة كانت الملكة المسكينة تجاهد لدرء حال العبودية التي كانوا يفرضونها عليها.
Verse 33
(रक्षणे च महान् यत्न: सैन्धवस्य कृतो युधि । अर्जुनस्य विघातार्थ प्रतिज्ञा येन रक्षिता ।।
قال سَنْجَايَا: في ساحة القتال بذل جهداً عظيماً لحماية ملك السِّندهو (جَياَدْرَثا)، وبهذا حفظ نذره الذي قصد به إهلاك أرجونا. وحين كنا، طامعين في الظفر، نريد التقدّم، أوقفنا عند بوابة التشكيل الحربي، بل كبح جيشنا العظيم وهو يحاول بكل ما أوتي من قوة أن يقتحم إلى الداخل. ولما أُنهِكت خيول أرجونا، وهاجمَه ابنُ دِهْرِتَرَاشْتْرَا (دوريودhana) وهو عازم على قتله، ستره بدرعٍ واقٍ—حفظاً لدوريودhana وضماناً لسلامة جَياَدْرَثا.
Verse 34
येन ब्रह्मास्त्रविदुषा पज्चाला: सत्यजिन्मुखा: । कुर्वाणा मज्जये यत्नं समूला विनिपातिता:
قال سَنْجَايَا: على يده—وهو العارف بسلاح براهماسترا—سقط محاربو البانچالا يتقدمهم ساتياجيت، الذين كانوا يجاهدون لتثبيت نصري، فدُمِّروا من الجذور.
Verse 35
येन प्रव्राज्यमानाश्न राज्याद् वयमधर्मतः । निवार्यमाणा नु वयं नानुयातास्तदेषिण:
قال سَنْجَايَا: «بواسطة مَن طُرِدْنا من المملكة طرداً جائراً، ومع أننا كنا نُمنَع، أفلم نتبع مع ذلك—طالبين تلك الغاية نفسها؟»
Verse 36
“जब कौरव अधर्मपूर्वक हमें राज्यसे निर्वासित कर रहे थे, तब जिन्होंने हमें रोकने (शान्त करने)-की ही चेष्टा की थी; किंतु उनका हित चाहनेवाले हमलोगोंका उस समय उन्होंने साथ नहीं दिया था ।।
قال سَنْجَايَا: «حين كان الكورافا يطردوننا من المملكة بوسائل جائرة، كان هناك من لم يحاول إلا كفَّنا وتهدئة الأمر؛ ومع أننا كنا نبتغي لهم الخير، لم يقفوا معنا آنذاك. والآن وقد قُتِلَ درونا—الذي أبدى لنا أسمى الصداقة وأعمق المودة—فإني أنا أيضاً سأمضي إلى الموت من أجله، مع ذوي قرابتي.»
Verse 37
एवं ब्रुवति कौन्तेये दाशा्हस्त्वरितस्तत: । निवार्य सैन्यं बाहुभ्यामिदं वचनमब्रवीत्
قال سانجيا: وبينما كان ابن كونتي (يودهيشثيرا) يتكلم على هذا النحو، بادر كريشنا السريع الفعل، فخر سلالة الداشاره، إلى كفِّ الجيش كله في الحال بإشارتين من ذراعيه، ثم نطق بهذه الكلمات.
Verse 38
शीघ्र॑ न््यस्यत शस्त्राणि वाहेभ्यश्षावरोहत । एष योगोऊत्र विहित: प्रतिषेधे महात्मना
قال سانجيا: «أسرعوا فضعوا أسلحتكم، وانزلوا عن دوابّكم ومراكبكم. فهذا هو السبيل القويم المقرر هنا—وهو نهيٌ سنَّه ذو نفسٍ عظيمة—لأجل الكفّ وتهدئة التصعيد».
Verse 39
'योद्धाओ! अपने अस्त्र-शस्त्र शीघ्र नीचे डाल दो और सवारियोंसे उतर जाओ। परमात्मा नारायणने इस अस्त्रके निवारणके लिये यही उपाय निश्चित किया है ।।
قال سانجيا: «يا معشر المقاتلين، ألقوا أسلحتكم سريعًا وانزلوا عن ركائبكم. إن الرب الأعلى نارايانا قد عيّن هذا التدبير بعينه لدرء هذا السلاح. انزلوا كلكم عن الفيلة والخيول والعربات، واثبتوا على الأرض. فهكذا، وأنتم واقفون على التراب بلا سلاح، لن يقدر هذا السلاح أن يصيبكم.»
Verse 40
यथा यथा हि युध्यन्ते योधा ह्ास्त्रमिदं प्रति । तथा तथा भवन््त्येते कौरवा बलवत्तरा:,“हमारे योद्धा जैसे-जैसे इस अस्त्रके विरुद्ध युद्ध करते हैं, वैसे-ही-वैसे ये कौरव अत्यन्त प्रबल होते जा रहे हैं!
قال سانجيا: «كلما قاتل محاربونا مرارًا ضد هذا السلاح، ازداد هؤلاء الكوروڤا قوةً وبأسًا.»
Verse 41
निक्षेप्स्यन्ति च शस्त्राणि वाहनेभ्यो5वरुहाू ये । (ये5ज्जलिं कुर्वते वीरा नमन्ति च विवाहना: ।) तान्नैतदस्त्रं संग्रामे निहनिष्यति मानवान्
قال سانجيا: «الذين ينزلون عن مركباتهم ويضعون أسلحتهم، وأولئك الأبطال الذين يقفون بلا ركائب، يضمون أيديهم إجلالًا وينحنون—فإن هذا السلاح لن يقتلهم في ساحة القتال.»
Verse 42
ये त्वेतत्प्रतियोत्स्यन्ति मनसापीह केचन । निहनिष्यति तान् सर्वान् रसातलगतानपि,“जो कोई मनसे भी इस अस्त्रका सामना करेंगे, वे रसातलमें चले गये हों तो भी यह अस्त्र वहाँ पहुँचकर उन सबको मार डालेगा”
قال سَنجايا: «ولكن من حاول هنا، ولو في مجرد الخاطر، أن يعارض هذا السلاح—فإن هذا المقذوف الإلهي سيبلغهم ويقتلهم جميعًا، ولو كانوا قد هبطوا إلى رَساطَلا (Rasātala)».
Verse 43
ते वचस्तस्य तच्छुत्वा वासुदेवस्य भारत । ईषु: सर्वे समुत्स्रष्ठं मनोभि: करणेन च,भारत! भगवान् वासुदेवका यह वचन सुनकर सब योद्धाओंने अन्यान्य इन्द्रियों तथा मनसे भी अस्त्रको त्याग देनेका विचार कर लिया
قال سَنجايا: يا بهاراتا، لما سمع المحاربون كلام فاسوديفا (Vāsudeva) ذاك، عزموا جميعًا على إلقاء أسلحتهم—متخلّين عن العنف لا بالفعل الجسدي وحده، بل بالحواس وبالقلب أيضًا.
Verse 44
तत उत्स्रष्टकामांस्तानस्त्राण्यालक्ष्य पाण्डव: | भीमसेनोडब्रवीद् राजन्निदं संहर्षयन् वच:
فلما رأى أولئك المحاربين قد همّوا بإلقاء أسلحتهم، قال الباندافي بهيماسينا، أيها الملك، كلماتٍ ليوقظ بها عزائمهم—يثير فيهم الفرح والحماسة—وقال هكذا:
Verse 45
न कथंचन शस्त्राणि मोक्तव्यानीह केनचित् । अहमावारयिष्यामि द्रोणपुत्रास्त्रमाशुगै:
قال سَنجايا: «لا ينبغي لأي محارب هنا، في أي حالٍ كان، أن يلقي سلاحه. سأصدّ سلاح ابن درونا (Droṇa-putra) بسهامي السريعة الطيران».
Verse 46
गदयाप्यनया गुर्व्या हेमविग्रहया रणे । कालवत् प्रहरिष्यामि द्रौणेरस्त्र विशातयन्,“इस सुवर्णमयी भारी गदासे रणभूमिमें द्रोणपुत्रके अस्त्रोंको चूर-चूर करनेके लिये मैं कालके समान प्रहार करूँगा
قال سَنجايا: «وحتى بهذه الهراوة الثقيلة ذات الجسد الذهبي في ساحة القتال، سأضرب ضربًا كالموت نفسه، مُحطِّمًا أسلحة دراونيَيا (Drauṇeya)، ابن درونا».
Verse 47
नहि मे विक्रमे तुल्य: कश्चिदस्ति पुमानिह | यथैव सवितुस्तुल्यं ज्योतिरन्यन्न विद्यते
قال سانجيا: «في هذا العالم لا رجل يساويني في البأس. وكما لا جرمَ مضيئًا يضاهي الشمس، كذلك لا أحد يضاهي شجاعتي».
Verse 48
पश्यतेमौ हि मे बाहू नागराजकरोपमौ | समर्थो पर्वतस्यापि शैशिरस्य निपातने,“गजराजके शुण्डोंके समान मोटी मेरी इन भुजाओंको देखो तो सही, ये हिमालयपर्वतको भी धराशायी करनेमें समर्थ हैं
قال سانجيا: «انظروا إلى ذراعيَّ هاتين، غليظتين قويتين كذراعي ملك الأفاعي. إنهما لقادرتان حتى على إسقاط جبلٍ في فصل الشتاء».
Verse 49
नागायुतसमप्राणो हाहमेको नरेष्विह । शक्रो यथाप्रतिद्वन्द्ो दिवि देवेषु विश्रुतः
«بين البشر هنا، أنا وحدي ذو قوةٍ تعادل قوة عشرة آلاف فيل. وكما أنّ في السماء، بين الآلهة، لا يُعرَف بلا ندٍّ إلا إندرا (شَكرا)، كذلك أنا.»
Verse 50
अद्य पश्यत मे वीर्य बाह्दो: पीनांसयोर्युधि । ज्वलमानस्य दीप्तस्य द्रौणेरस्त्रस्य वारणे
قال سانجيا: «اليوم، في قلب المعركة، انظروا قوة ذراعيَّ هاتين، عريضتي الكتفين شديدتي البأس: كيف تقدرَان على صدّ سلاح أشفَتّامَن، ابن درونا، المتّقد المتلألئ».
Verse 51
यदि नारायणास्त्रस्य प्रतियोद्धा न विद्यते । अद्यैतत् प्रतियोत्स्यामि पश्यत्सु कुरुपाण्डुषु
قال سانجيا: «إن لم يوجد إلى الآن محاربٌ يستطيع مجابهة سلاح نارايانا (Nārāyaṇāstra)، فاليوم—وأمام أعين الكورو والباندافا—سأقف لملاقاته».
Verse 52
अर्जुनार्जुन बीभत्सो न न्यस्यं गाण्डिवं त्वया । शशाड्कस्येव ते पड़को नैर्मल्यं पातयिष्यति
قال سنجيا: «أرجونا—أرجونا! يا بيبهتسا! لا تدع قوسكَ غانديفا يسقط من يديك. فإن وضعته، لَصِقَتْ بك وصمةٌ كوصمةِ القمر، وتلك اللطخة تُسقِط صفاءك—نقاءَك الأخلاقي وشرفَ المحارب الذي كسبته بمشقة.»
Verse 53
अजुन उवाच भीम नारायणास्त्रे मे गोषु च ब्राह्मणेषु च । एतेषु गाण्डिवं न्यस्यमेतद्धि व्रतमुत्तमम्
قال أرجونا: «يا أخي بهيما، حين يُطلَق سلاح نارايانا—وفي حضرة الأبقار والبراهمة—سأضع قوس غانديفا. فهذا حقًّا أسمى نذري.»
Verse 54
एवमुक्तस्ततो भीमो द्रोणपुत्रमरिंदमम् । अभ्ययान्मेघघोषेण रथेनादित्यवर्चसा
فلما خوطب بهذا، تقدّم بهيما لملاقاة ابن درونا، قاهر الأعداء. وحده اندفع بعربةٍ زئيرُها كالرعد في السحاب، وبريقُها كالشمس—مجيبًا كلمات أرجونا بفعلٍ عاجلٍ وعزمٍ لا يلين وسط مقتضيات القتال على نهج الدارما.
Verse 55
(कम्पयन् मेदिनीं सर्वा त्रासयंश्व॒ चमूं तव । शड्खशब्दं महत् कृत्वा भुजशब्दं च पाण्डव: ।।
إنّ بهيما ابن باندو نفخ في صَدَفته نفخًا عظيمًا، وضرب بعضديه ضربًا مدوّيًا، فاهتزّت الأرض كلّها ودبّ الرعب في جيشك. فلما سمع جنودك زئير الصدفة ودويّ ضرب الذراعين، أحاطوا به من كل جانب وأمطروه بوابلٍ من السهام. غير أنّ بهيما ابن كونتي—سريع الحركة خاطف البأس—بلغ خصمه في لمح البصر، وببسطٍ عاجلٍ من النبال كالشبكة غطّاه تغطيةً تامّة.
Verse 56
ततो द्रौणि: प्रहस्यैनं द्रवन्तमभिभाष्य च । अवाकिर्त प्रदीप्ताग्रै: शरैस्तैरभिमन्त्रितै:
ثم إنّ دروني (أشڤتّاما) ضحك وخاطبه وهو يندفع، وأمطره بسِهامٍ مُقدَّسةٍ قد أُجريت عليها التعاويذ، تتوهّج رؤوسُها اشتعالًا—سهامٌ مُسندةٌ بقوة نارايانأسترا.
Verse 57
पन्नगैरिव दीप्तास्यैर्वमद्धिज्वलनं रणे | अवकीर्णो5भवत् पार्थ: स्फुलिज्जैरिव काउ्चनै:
في ساحة القتال بدت السهام كالأفاعي المتقدة الأفواه، كأنها تقذف نارًا. وغُطِّيَ بارثا (أرجونا) بها، كأن وابلًا من شررٍ ذهبيٍّ يهطل عليه—صورة تجمع بين الرهبة وشدة حرب الدharma التي لا تلين.
Verse 58
तस्य रूपमभूद् राजन् भीमसेनस्य संयुगे । खटद्योतैरावृतस्येव पर्वतस्य दिनक्षये,राजन्! उस समय युद्धस्थलमें भीमसेनका रूप संध्याके समय जुगुनुओंसे भरे हुए पर्वतके समान प्रतीत हो रहा था
أيها الملك، في تلك المعركة بدا مظهر بهيماسينا كجبلٍ عند انقضاء النهار، كأنه مغطّى بأسراب اليراعات—صورة تزيد الهيبة من طاقته القتالية وتعمّق جوّ الغسق الموحش في الميدان.
Verse 59
तदस्त्रं द्रोणपुत्रस्य तस्मिन् प्रतिसमस्यति । अवर्धत महाराज यथाग्निरनिलोद्धत:
يا مولاي الملك، حين لاقى سلاحُ ابنِ دروṇa سهامَ الردّ لم يخمد؛ بل ازداد اندفاعًا، كالنار إذا هبّت عليها الريح فاشتعلت أشدّ. ويكشف المشهد خُلُقًا قاتمًا للحرب: إن التصعيد المتهوّر، سلاحًا بسلاح، قد يضاعف الخراب بدل أن يكبحه.
Verse 60
विवर्धमानमालक्ष्य तदस्त्रं भीमविक्रमम् | पाण्डुसैन्यमृते भीम॑ सुमहद् भयमाविशत्,उस अस्त्रको बढ़ते देख भयंकर पराक्रमी भीमसेनको छोड़कर शेष सारी पाण्डव- सेनापर महान् भय छा गया
فلما رأوا ذلك السلاح الرهيب يزداد قوةً على الدوام، استولى فزعٌ عظيم على جيش الباندافا—إلا بهيما، إذ لم تتزعزع شجاعته المهيبة.
Verse 61
ततः शस्त्राणि ते सर्वे समुत्सूज्य महीतले । अवारोहन रथेभ्यश्न हस्त्यश्रेभ्यश्व सर्वश:,तब वे समस्त सैनिक अपने अस्त्र-शस्त्रोंकोी धरतीपर डालकर रथ, हाथी और घोड़े आदि सभी वाहनोंसे उतर गये
ثم إن أولئك المحاربين جميعًا ألقوا أسلحتهم على الأرض، وترجّلوا تمامًا—نزلوا عن مركباتهم من العربات والفيلة والخيول.
Verse 62
तेषु निक्षिप्तशस्त्रेषु वाहनेभ्यश्ष्युतेषु च तदस्त्रवीर्य विपुलं भीममूर्धन्यथापतत्,उनके हथियार डाल देने और वाहनोंसे उतर जानेपर उस अस्त्रकी विशाल शक्ति केवल भीमसेनके माथेपर आ पड़ी
ولمّا ألقى أولئك المحاربون أسلحتهم ونزلوا عن مركباتهم، هوت مع ذلك القوة الهائلة لذلك السلاح على رأس بهيماسينا—مُظهِرةً أنّ السلاح إذا أُطلِق لا يكاد يُردّ، وأنّ أثره يصيب بحتمٍ لا مفرّ منه وسط فوضى الحرب.
Verse 63
हाहाकृतानि भूतानि पाण्डवाश्न विशेषतः । भीमसेनमपश्यन्त तेजसा संवृतं तथा,तब सभी प्राणी विशेषत: पाण्डव हाहाकार कर उठे। उन्होंने देखा, भीमसेन उस अस्त्रके तेजसे आच्छादित हो गये हैं
عندئذٍ أطلق جميع الكائنات—ولا سيّما آل باندافا—صيحة فزع. فقد رأوا بهيماسينا كأنّه قد غُشّيَ وغُطّيَ بوهج ذلك السلاح المتّقد.
Verse 198
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें धृष्टदुम्न और सात्यकिका क्रोधविषयक एक सौ अद्ठदानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ
وهكذا تنتهي في «المهابهارتا الجليلة» من «كتاب درونا»، ضمن فصل إطلاق سلاح نارايانا، الحكايةُ في الفصل الثامن والتسعين بعد المئة، المتعلّقة بغضب دْهْرِشْتَديومنَ وساتْيَكي.
Verse 199
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि पाण्डवसैन्यास्त्रत्यागे नवनवत्यधिकशततमो< ध्याय:
وهكذا، في «المهابهارتا الجليلة»، ضمن «كتاب درونا»—وتحديدًا في فصل إطلاق سلاح نارايانا—تنتهي الحكايةُ في الفصل الذي يصف إلقاء جيش الباندافا للسلاح.
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