Adhyaya 123
Bhishma ParvaAdhyaya 12377 Versesकौरव-पक्ष के लिए प्रतिकूल; भीष्म के पतन से नेतृत्व और मनोबल दोनों डगमगाते हैं।

Adhyaya 123

Chapter Arc: भीष्म के रथ से गिरकर शर-शय्या पर पड़ते ही रणभूमि का कोलाहल थम-सा जाता है; संजय धृतराष्ट्र को संकेत देता है कि अब युद्ध के बीच एक महात्मा का धर्म-आसन खुलने वाला है। → धृतराष्ट्र के मन में यह पीड़ा उभरती है कि यदि भीष्म ने शिखण्डी पर करुणा करके प्रहार न रोका होता तो पाण्डवों का विनाश हो चुका होता; अब वही करुणा कौरव-पक्ष के लिए सबसे बड़ा शोक बनकर खड़ी है। उधर विभिन्न जनपदों के नरेश, पाण्डव और कौरव महारथी शर-शय्या पर पड़े पितृतुल्य भीष्म के पास आते हैं—युद्ध का केंद्र क्षण भर को उपदेश-भूमि बन जाता है। → भीष्म, क्षत्रधर्म के वेत्ता और धर्मार्थ-तत्त्वज्ञ, अर्जुन से शय्या के अनुरूप तकिया (उपधान) देने को कहते हैं; सव्यसाची उनके अभिप्राय को समझकर ठीक प्रकार से सहारा लगाता है और भीष्म संतुष्ट होते हैं—यह क्षण बताता है कि शत्रुता के पार भी गुरु-शिष्य और पितृ-वत्सल संबंध जीवित हैं। → भीष्म की धर्मनिष्ठा देखकर उपस्थित राजागण विस्मित होते हैं; उनकी सेवा के लिए कुशल वैद्य और उपचरक समस्त उपकरणों सहित आते हैं। अध्याय का स्वर युद्ध-वृत्तांत से हटकर ‘महापुरुष की शय्या पर सेवा, मर्यादा और धर्म’ की स्थापना करता है। → भीष्म के संतुष्ट होने के बाद भी प्रश्न शेष रहता है—वे इस शर-शय्या से कौन-सा धर्मोपदेश देंगे, और कौरव-पाण्डव उस वाणी को कैसे ग्रहण करेंगे?

Shlokas

Verse 1

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल १२५ श्लोक हैं।] #स्न्ैमा+ () अिमनने विशर्त्याधिकशततमो< ध्याय: भीष्मजीकी महत्ता तथा अर्जुनके द्वारा भीष्मको तकिया देना एवं उभय पक्षकी सेनाओंका अपने शिबिरमें जाना और श्रीकृष्ण-युधिषिर-संवाद धृतराष्ट उवाच कथमासंस्तदा योधा हीना भीष्मेण संजय । बलिना देवकल्पेन गुर्वर्थे ब्रह्मचारिणा,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! भीष्मजी बलवान्‌ और देवताके समान थे। उन्होंने अपने पिताके लिये आजीवन ब्रह्मचर्यका पालन किया था। उस दिन उनके रथसे गिर जानेके कारण उनके सहयोगसे वंचित हुए मेरे पक्षके योद्धाओंकी क्या दशा हुई?

قال دِهْرِتَراشْتْرَة: «يا سنجيا، ما حالُ المحاربين في ذلك الوقت حين حُرموا من بهيشما—القويّ الشبيه بالآلهة، الذي التزم البراهماتشاريا (brahmacarya) عفّةً مدى الحياة من أجل أبيه—بعد أن سقط من عربته؟»

Verse 2

तदैव निहतान्‌ मन्ये कुरूनन्यांश्व॒ पाण्डवै: | न प्राहरद्‌ यदा भीष्मो घृणित्वाद्‌ द्रपदात्मजम्‌,भीष्मजीने अपनी दयालुताके कारण जब ट्रुपदकुमार शिखण्डीपर प्रहार करनेसे हाथ खींच लिया, तभी मैंने यह समझ लिया था कि अब पाण्डवोंके हाथसे अन्य कौरव भी अवश्य मारे जायँगे

قال دِهْرِتَراشْتْرَة: «حين كفَّ بهيشما يده رحمةً فلم يضرب شيخَنْدي، ابن دروبادا، عندئذٍ علمتُ أن سائر الكورو سيُقتلون لا محالة على أيدي الباندافا.»

Verse 3

ततो दुःखतरं मन्ये किमन्यत्‌ प्रभविष्यति । अद्याहं पितरं श्र॒ुत्वा निहतं सम सुदुर्मति:,मेरी समझमें इससे बढ़कर महान्‌ दुःखकी बात और क्या होगी कि आज अपने ताऊ भीष्मके मारे जानेका समाचार सुनकर भी जीवित हूँ। मेरी बुद्धि बहुत ही खोटी है

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «بعد هذا، أيُّ حزنٍ أعظم يمكن أن يقع؟ لقد سمعتُ اليوم أنَّ بهيشما (Bhīṣma)، كبيرَنا الذي كان لي بمنزلة الأب، قد صُرِع، ومع ذلك ما زلتُ حيًّا—وا أسفاه، ما أشدَّ ضلالَ عقلي!»

Verse 4

अश्मसारमयं नूनं॑ हृदयं मम संजय । श्रुत्वा विनिहतं भीष्मं शतधा यजन्न दीर्यते,संजय! निश्चय ही मेरा हृदय लोहेका बना हुआ है; क्योंकि आज भीष्मजीके मारे जानेका समाचार सुनकर भी यह सैकड़ों टुकड़ोंमें विदीर्ण नहीं हो रहा है

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «لا ريب أن قلبي من حجرٍ وحديد، يا سَنْجَايَا؛ فمع أني سمعتُ أن بهيشما قد صُرِع، لم ينفطر إلى مئة قطعة. كان ينبغي للحزن أن يحطّمني، غير أن التعلّق والوهم يُبقِياني غيرَ مُنْكَسِر.»

Verse 5

यदन्यबन्निहतेनाजी भीष्मेण जयमिच्छता । चेष्टितं कुरुसिंहेन तन्मे कथय सुव्रत,उत्तम व्रतका पालन करनेवाले संजय! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले कुरुकुलसिंह भीष्म जब युद्धमें मारे गये, उस समय उन्होंने दूसरी कौन-कौन-सी चेष्टाएँ की थीं? वह सब मुझसे कहो

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «يا سَنْجَايَا، يا من ثبتَّ على النذور الرفيعة، أخبرني على التمام: ما الأعمال الأخرى التي أتاها بهيشما—أسدُ الكورو—الذي كان يبتغي الظفر، حين صُرِع في المعركة؟»

Verse 6

पुन:पुनर्न मृष्यामि हतं देवव्रतं रणे । न हतो जामदग्न्येन दिव्यैरस्त्रैरयं पुरा

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «مرةً بعد مرة لا أطيق احتمالَ أن دِيفَفْرَتَا (Devavrata) بهيشما قد قُتِل في ساحة القتال. ففي الأزمنة السالفة لم يقتله حتى جامَدَغْنْيَا (Jāmadagnya) باراشوراما (Paraśurāma) بأسلحةٍ سماوية؛ فكيف سقط الآن؟»

Verse 7

स हतो द्रौपदेयेन पाउ्चाल्येन शिखण्डिना । रणभूमिमें देवव्रत भीष्मका मारा जाना मुझे बारंबार असह् हो उठता है। जो भीष्म पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुरामके दिव्यास्त्रोंद्रार भी नहीं मारे जा सके, वे ही द्रपदकुमार पांचालदेशीय शिखण्डीके हाथसे मारे गये; यह कितने दुःखकी बात है ।। ६६ || संजय उवाच सायाह्वे निहतो भूमौ धार्तराष्ट्रानू विषादयन्‌

قال سَنْجَايَا: «لقد صُرِعَ دِيفَفْرَتَا بهيشما في ساحة القتال على يد ابنِ دْرُوبَدَا، أميرِ البَنْشَال شِخَنْدِين (Shikhaṇḍin). مرةً بعد مرة لا أجد احتمالًا لأن بهيشما قد قُتِل: ذلك البهيشما الذي لم تستطع أسلحةُ باراشوراما (Paraśurāma) الإلهية، ابنِ جامَدَغْنِي (Jāmadagnya)، أن تقتله في الأزمنة الخالية—ها هو اليوم يسقط بيد شِخَنْدِين. يا لعِظَمِ هذا السبب في الحزن! وفي أواخر العصر كان مطروحًا على الأرض، مُلقِيًا أبناءَ دِهْرِتَرَاشْتْرَا في اليأس.»

Verse 8

स शेते शरतल्पस्थो मेदिनीमस्पृशंस्तदा,वे पृथ्वीका स्पर्श किये बिना ही उस समय बाणशय्यापर सो रहे थे। भीष्मके रथसे गिरकर धरतीपर पड़ जानेपर समस्त प्राणियोंमें भयंकर हाहाकार मच गया

قال سنجيا: في ذلك الحين كان بهيشما مضطجعًا على سريرٍ من السهام، لا يمسّ الأرض. فلما سقط بهيشما من عربته إلى وجه الأرض، ارتفع بين جميع الكائنات عويلٌ مروّعٌ من النواح. ويُبرز المشهد معًا فداحة ثمن الحرب، وجلَدَ بهيشما العجيب المقيَّد بنذره، إذ تُصان حياته وسط الألم بعزمٍ ثابت وبالدارما.

Verse 9

भीष्मे रथात्‌ प्रपतिते प्रच्युते धरणीतले । हाहेति तुमुलः शब्दो भूतानां समपद्यत,वे पृथ्वीका स्पर्श किये बिना ही उस समय बाणशय्यापर सो रहे थे। भीष्मके रथसे गिरकर धरतीपर पड़ जानेपर समस्त प्राणियोंमें भयंकर हाहाकार मच गया

قال سنجيا: لما سقط بهيشما من عربته وانزلق إلى سطح الأرض، علا بين جميع الكائنات صراخٌ مدوٍّ: «وا أسفاه! وا أسفاه!». وكانت تلك اللحظة صدمةً أخلاقيةً في ساحة القتال: فسقوط الشيخ الموقَّر، حارس الدارما، صار نواحًا جماعيًا، كاشفًا أن الحرب لا تجرح الأجساد وحدها، بل تجرح ضمير العالم أيضًا.

Verse 10

सीमावृक्षे निपतिते कुरूणां समितिंजये । सेनयोरुभयो राजन क्षत्रियानू भयमाविशत्‌,राजन! कुरुकुलके युद्धविजयी वीर भीष्म दोनों दलोंके लिये सीमावर्ती वृक्षके समान थे। उनके गिर जानेसे उभय पक्षकी सेनाओंमें जो क्षत्रिय थे, उनके मनमें भारी भय समा गया

قال سنجيا: أيها الملك، لما سقط بهيشما—قاهرُ المعارك وكأنه شجرةُ الحدّ الفاصل لآل كورو—دبّ الخوف في قلوب الكشاتريا في الجيشين كليهما. لقد كانت هيبته قائمة كحدٍّ واقٍ لكل فريق؛ فلما انهار، أحسّ المحاربون على الجبهتين بانكشافٍ مفاجئ وباضطرابٍ في مصير الحرب ومسارها.

Verse 11

भीष्मं शान्तनवं दृष्टवा विशीर्णकवचध्वजम्‌ । कुरव: पर्यवर्तन्त पाण्डवाश्न विशाम्पते,प्रजानाथ! जिनके कवच और ध्वज छिजन्न-भिन्न हो गये थे, उन शान्तनुनन्दन भीष्मजीको उस अवस्थामें देखकर कौरव और पाण्डव दोनों ही उन्हें घेरकर खड़े हो गये

قال سنجيا: لما رأوا بهيشما ابنَ شانتانو وقد تكسّر درعه وتمزّق لواؤه—يا سيدَ الشعب وحاميَ الرعية—ارتدّ الكورو والپاندڤا معًا ووقفوا يحيطون به. ويُبرز المشهد كيف أن سقوط شيخٍ مهيبٍ أو وهنه، حتى في خضم قتالٍ لا يهدأ، يوقف العداوة لحظةً ويجمع الفريقين على اعترافٍ مشترك بالمقام والواجب وبالثمن المأساوي للحرب.

Verse 12

खं तम:संवृतमभूदासीद्‌ भानुर्गतप्रभ: । ररास पृथिवी चैव भीष्मे शान्तनवे हते,उस समय आकाशमें अन्धकार छा गया। सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी। शान्तनुनन्दन भीष्मके मारे जानेपर यह सारी पृथ्वी भयानक शब्द करने लगी

قال سنجيا: اكتسى السماءُ ظلامًا، وخبا شعاعُ الشمس كأنه يذوي. ولما ضُرِب بهيشما ابنُ شانتانو فسقط، دوّت الأرضُ نفسها بزئيرٍ مروّع—إشارةً إلى أن ركنًا من أركان الدارما في ساحة القتال قد هوى، وأن ثِقَل الحرب الأخلاقي قد ازداد عمقًا.

Verse 13

अयं ब्रद्मविदां श्रेष्ठो हायं ब्रह्मविदां वर: | इत्यभाषन्त भूतानि शयानं पुरुषर्षभम्‌,वहाँ सोये हुए पुरुषप्रवर भीष्मको देखकर कुछ दिव्य प्राणी कहने लगे, “ये ब्रह्मज्ञानियोंके शिरोमणि हैं, ये ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं

قال سنجيا: لما رأى بهيشما—ثورَ الرجال—مضطجعًا على مضجعه، تكلّم بعضُ الكائنات السماوية قائلين: «هذا هو الأوّل بين عارفي البراهمان (Brahman)؛ بل هو خيرُ من يملك معرفةَ براهمَا». وهكذا لا تُصوَّر سقطةُ بهيشما على أنها هزيمةٌ في الحرب فحسب، بل تكريمٌ لحياةٍ من النذور المنضبطة، والصدق، والثبات على الدارما، شهد بها حتى أهلُ العوالم العليا.

Verse 14

अयं पितरमाज्ञाय कामार्त शान्तनुं पुरा । ऊर्ध्वरेतसमात्मानं चकार पुरुषर्षभ:,“इन्हीं पुरुषसिंहने पूर्वकालमें अपने पिता शान्तनुको कामासक्त जानकर अपने- आपको ऊउर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) बना लिया”

قال سنجيا: منذ زمن بعيد، حين أدرك أن أباه شانتانو كان معذَّبًا بالشهوة، جعل ذلك الثور بين الرجال نفسه ثابتًا على العفّة—مختارًا البراهمتشريا (العزوبة) مدى الحياة. وبذلك أخضع لذّته الخاصة لواجب البرّ بالأب ولمطالب الدارما الأوسع.

Verse 15

इति सम शरतल्पस्थं भरतानां महत्तमम्‌ | ऋषयस्त्वभ्यभाषन्त सहिता: सिद्धचारणै:,इस प्रकार सिद्धों और चारणोंसहित ऋषिगण भरतकुलके महापुरुष भीष्मको बाणशगय्यापर स्थित देख पूर्वोक्त बातें कहते थे

قال سنجيا: «وهكذا، إذ رأى الحكماءُ بهيشما—أعظمَ رجال آل بهاراتا—مستقرًّا على فراش السهام، خاطبوه، ومعهم السِّدْهَة (Siddha) والشارَنة (Cāraṇa)، بالكلمات التي وُصفت آنفًا».

Verse 16

हते शान्तनवे भीष्मे भरतानां पितामहे । न किंचित्‌ प्रत्यपद्यन्त पुत्रास्तव हि मारिष,आर्य! भरतवंशियोंके पितामह शान्तनुनन्दन भीष्मके मारे जानेपर आपके पुत्रोंको कुछ भी नहीं सूझता था

قال سنجيا: لما ضُرِب بهيشما—ابنَ شانتانو وجدَّ آل بهاراتا—حتى سقط، لم يستطع أبناؤك، أيها الجليل، أن يستعيدوا رباطة جأشهم أو يهتدوا إلى مسلكٍ واضح. فسقوط الشيخ الذي كان يجسّد سلطان السلالة ونظام الفروسية تركهم مضطربين في الداخل، تائهين وسط الصدمة الأخلاقية للحرب.

Verse 17

विषण्णवदनाश्नासन्‌ हतश्रीकाश्न भारत । अतिष् न व्रीडिताश्वैव ह्िया युक्ता हधोमुखा:,भारत! उनके मुखपर विषाद छा गया था। वे श्रीहीन और लज्जित हो नीचेकी ओर मुँह लटकाये खड़े थे

قال سنجيا: «يا بهاراتا، لقد غشّى الكآبةُ وجوهَهم. خبا بهاؤهم؛ وتحت وطأة الخجل والحياء وقفوا مطأطئي الرؤوس، مطرحي الأبصار إلى أسفل».

Verse 18

पाण्डवाश्न जयं लब्ध्वा संग्रामशिरसि स्थिता: । सर्वे दध्मुर्महाशड्खान्‌ हेमजालपरिष्कृतान्‌,पाण्डव विजय पाकर युद्धके मुहानेपर खड़े थे और सब-के-सब सोनेकी जालियोंसे विभूषित बड़े-बड़े शंखोंको बजा रहे थे

قال سنجيا: لما أحرز الباندافا النصر ثبتوا راسخين في مقدّمة ساحة القتال. ونفخوا جميعًا في محاراتٍ عظيمة مزدانة بزخارف كشبكةٍ من ذهب—فكان ذلك إعلانًا لعزمٍ قويم، وحشدًا لقلوب جنودهم، وإشارةً إلى ثقتهم بعدالة قضيتهم في خضمّ الثقل الأخلاقي للحرب.

Verse 19

हर्षात्‌ तूर्यससहस्रेषु वाद्यमानेषु चानघ । अपश्याम महाराज भीमसेनं महाबलम्‌,निष्पाप महाराज! जब हर्षातिरेकसे सहस्रों बाजे बज रहे थे, उस समय हमने कुन्तीकुमार महाबली भीमसेनको देखा। वे महान्‌ बल और पराक्रमसे सम्पन्न शत्रुको वेगपूर्वक मार देनेके कारण अत्यन्त हर्षके साथ नाच रहे थे

قال سنجيا: «يا أيها الملك الطاهر من الإثم، حين كانت آلاف الأبواق وسائر الآلات تُقرَع وتُنفَخ في فيضانٍ من الابتهاج، عندئذٍ، أيها الملك العظيم، أبصرنا بهيماسينا ذا القوة الجبّارة.»

Verse 20

विक्रीडमानं कौन्तेयं हर्षण महता युतम्‌ । निहत्य तरसा शत्रुं महाबलसमन्वितम्‌,निष्पाप महाराज! जब हर्षातिरेकसे सहस्रों बाजे बज रहे थे, उस समय हमने कुन्तीकुमार महाबली भीमसेनको देखा। वे महान्‌ बल और पराक्रमसे सम्पन्न शत्रुको वेगपूर्वक मार देनेके कारण अत्यन्त हर्षके साथ नाच रहे थे

قال سنجيا: أيها الملك العظيم الطاهر من الإثم، لقد رأينا بهيما ابن كونتي يفيض ابتهاجًا عظيمًا—كأنه يلهو—بعد أن صرع على عَجَلٍ عدوًّا موفور القوة. وفي موجة الظفر بساحة القتال فاضت طاقته الظافرة إلى حركات احتفال، كاشفةً كيف يمكن لواجب الحرب القاسي أن يوقِد أيضًا نشوةً شرسة في قلب المحارب.

Verse 21

सम्मोहश्नापि तुमुल: कुरूणाम भवत्‌ ततः । कर्णदुर्योधनौ चापि नि:श्वसेतां मुहुर्मुहु:

قال سنجيا: ثم استولى على الكورو ذهولٌ عاصف. وكان كارنا ودوريودانا أيضًا يطلقان زفراتٍ عميقة مرارًا وتكرارًا—علامةً ظاهرة على اضطراب عزيمتهما تحت صدمةٍ أخلاقيةٍ واستراتيجيةٍ في آنٍ واحد.

Verse 22

उस समय कौरवोंपर भयंकर मोह छा गया था। कर्ण और दुर्योधन भी बारंबार लंबी साँसें खींच रहे थे ।। तथा निपतिते भीष्मे कौरवाणां पितामहे । हाहाभूतमभूत्‌ सर्व निर्मर्यादमवर्तत,कौरवपितामह भीष्मके इस प्रकार रथसे गिर जानेपर सर्वत्र हाहाकार मच गया। कहीं कोई मर्यादा नहीं रह गयी

في تلك الساعة خيّم على الكورو ذهولٌ مرعب، وكان كارنا ودوريودانا يجرّان أنفاسًا طويلة مرارًا. ولمّا سقط بهيشما، بيتامها الكورو، من مركبته على ذلك النحو، ارتفع في كل ناحية صراخ «وا حسرتاه! وا حسرتاه!»؛ فانهارت كل قيود الوقار، ولم يبقَ حدٌّ ولا نظام.

Verse 23

दृष्टवा च पतितं भीष्म॑ पुत्रो दःशासनस्तव । उत्तमं जवमास्थाय द्रोणानीकमुपाद्रवत्‌,भीष्मजीको रणभूमिमें गिरा देख आपका वीर पुत्र पुरुषसिंह दुःशासन अपने भाईके भेजनेपर अपनी ही सेनासे घिरा हुआ बड़े वेगसे द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर दौड़ा गया। उस समय वह कौरव-सेनाको विषादमें डाल रहा था

قال سنجيا: لما رأى بهيشما ساقطًا، اندفع ابنك دُهشاسَنَة، وقد جمع أقصى سرعته، نحو كتيبة درونا القتالية. إن ذلك المنظر وحركة هذا المحارب المفاجئة وسط اضطراب جيش الكورافا عمّقا كآبة الجيش، فيما كانت المعركة تمضي وتشتدّ.

Verse 24

भ्रात्रा प्रस्थापितो वीर: स्वेनानीकेन दंशित: । प्रययौ पुरुषव्याप्र: स्वसैन्यं स विषादयन्‌,भीष्मजीको रणभूमिमें गिरा देख आपका वीर पुत्र पुरुषसिंह दुःशासन अपने भाईके भेजनेपर अपनी ही सेनासे घिरा हुआ बड़े वेगसे द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर दौड़ा गया। उस समय वह कौरव-सेनाको विषादमें डाल रहा था

قال سنجيا: وقد حثّه أخوه وأرسله، اندفع ذلك البطل—وهو محصور ومضغوط داخل صفوفه هو—إلى الأمام بقوة عظيمة. كأنه نمر بين الرجال، أسرع نحو كتيبة درونا، وبذلك ألقى جيش الكورافا في الكآبة، إذ إن منظر بطلهم وقد سقط في الميدان زعزع عزائمهم.

Verse 25

तमायान्तमभिप्रेक्ष्य कुरव: पर्यवारयन्‌ । दुःशासनं महाराज किमयं वक्ष्यतीति च,महाराज! दुःशासनको आते देख समस्त कौरव-सैनिक उसे चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये कि देखें, यह क्या कहता है

قال سنجيا: لما رأى الكورو دُهشاسَنَة مقبلًا أحاطوا به من كل جانب، أيها الملك، يتشوقون لمعرفة ما الذي سيقوله.

Verse 26

ततो द्रोणाय निहतं भीष्ममाचष्ट कौरव: । द्रोणस्तत्राप्रियं श्रुत्वा मुमोह भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! दुःशासनने द्रोणाचार्यसे भीष्मके मारे जानेका समाचार बताया। वह अप्रिय बात सुनते ही द्रोणाचार्य मूर्च्छित हो गये

قال سنجيا: ثم أخبر أحد الكورافا درونا بأن بهيشما قد قُتل. فلما سمع درونا ذلك الخبر الكريه في ساحة القتال غلبه الأسى فأغمي عليه—إذ كان سقوط الجدّ، عماد الدارما ونظام الفروسية، فاجعةً عظيمة حتى في حربٍ تسوقها الأدهارما.

Verse 27

स संज्ञामुपलभ्याशु भारद्वाज: प्रतापवान्‌ | निवारयामास तदा स्वान्यनीकानि मारिष,आर्य! सचेत होनेपर प्रतापी द्रोणाचार्यने शीघ्र ही अपनी सेनाओंको युद्धसे रोक दिया

قال سنجيا: وما إن استعاد بهارادفاجا (درونا) وعيه سريعًا حتى كفَّ على الفور تشكيلاته القتالية، وكبح جنوده عن مواصلة القتال.

Verse 28

विनिवृत्तान्‌ कुरून्‌ दृष्टवा पाण्डवा5पि स्वसैनिकान्‌ । दूतैः शीघ्राश्वसंयुक्तै:ः समन्‍्तात्‌ पर्यवारयन्‌,कौरवोंको युद्धसे लौटते देख पाण्डवोंने भी शीघ्रगामी अश्वोंपर चढ़े हुए दूतोंद्वारा सब ओर आदेश भेजकर अपने सैनिकोंका भी युद्ध बंद करा दिया

قال سنجيا: لما رأى محاربي الكورو ينسحبون من القتال، أرسل البانداف بدورهم رسلاً على خيل سريعة إلى كل الجهات، وأمروا جندهم أن يكفّوا عن المعركة.

Verse 29

निवृत्तेषु च सैन्येषु पारम्पर्येण सर्वश: । निर्मुक्तकवचा: सर्वे भीष्ममीयुर्नराधिपा:,बारी-बारीसे सब सेनाओंके युद्धसे निवृत्त हो जाने-पर सब राजा कवच खोलकर भीष्मके पास आये

قال سنجيا: لما كانت الجيوش قد انصرفت عن القتال تباعًا من كل ناحية، أقبل الملوك جميعًا وقد نزعوا دروعهم إلى بهيشما.

Verse 30

व्युपरम्य ततो युद्धाद्‌ योधा: शतसहस्रश: । उपतस्थुर्महात्मानं प्रजापतिमिवामरा:,तदनन्तर लाखों योद्धा युद्धसे विरत होकर जैसे देवता प्रजापतिकी सेवामें उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार महात्मा भीष्मके पास आये

قال سنجيا: ثم كفّ المحاربون عن القتال، وأقبل مئات الألوف منهم إلى بهيشما عظيم النفس، كما تحضر الآلهة إلى براجابتي.

Verse 31

ते तु भीष्म॑ समासाद्य शयानं भरतर्षभम्‌ | अभिवाद्यावतिष्ठन्त पाण्डवा: कुरुभि: सह,वे पाण्डव तथा कौरव बाणशय्यापर सोये हुए भरतश्रेष्ठ भीष्मकी सेवामें पहुँचकर उन्हें प्रणाम करके खड़े हो गये

قال سنجيا: ثم إن البانداف، مع الكورو، دنوا من بهيشما—ثور آل بهاراتا—وهو مضطجع على سرير من السهام. فانحنوا له إجلالًا، ثم وقفوا بين يديه في خدمةٍ وانتظار.

Verse 32

अथ पाण्डून्‌ कुरूंश्वैव प्रणिपत्याग्रत: स्थितान्‌ अभ्यभाषत धर्मात्मा भीष्म: शान्तनवस्तदा,पाण्डव तथा कौरव जब प्रणाम करके उनके सामने खड़े हुए, तब शान्तनुनन्दन धर्मात्मा भीष्मने उनसे इस प्रकार कहा--

ثم إن بهيشما، ابن شانتانو البارّ بالدharma، انحنى تحيةً للبانداف والكورو الواقفين أمامه، ثم خاطبهم مواجهةً.

Verse 33

स्वागतं वो महाभागा: स्वागतं वो महारथा: । तुष्यामि दर्शनाच्चाहं युष्माकममरोपमा:,“महाभाग नरेशगण! आपलोगोंका स्वागत है। देवोपम महारथियो! आपका स्वागत है। मैं आपलोगोंके दर्शनसे बहुत संतुष्ट हूँ

قال سنجيا: «مرحبًا بكم أيها العظماء ذوو الحظ السعيد؛ مرحبًا بكم أيها المَهارَثَة، فرسان العربات العظام. إن مجرد رؤيتكم تملأني رضا عميقًا، لأن بأسكم يشبه بأس الآلهة.»

Verse 34

अभिमन्त्रयाथ तानेवं शिरसा लम्बताब्रवीत्‌ | शिरो मे लम्बते>त्यर्थमुपधानं प्रदीयताम्‌,इस प्रकार उन सब लोगोंसे स्वागत-भाषण करके अपने लटकते हुए सिरके द्वारा ही वे बोले--'राजाओ! मेरा सिर बहुत लटक रहा है। इसके लिये आपलोग मुझे तकिया दें!

قال سنجيا: وبعد أن رحّب بهم على ذلك النحو، تكلّم كأن رأسه متدلٍّ: «أيها الملوك، إن رأسي يثقل ويهبط؛ فامنحوني وسادة.»

Verse 35

ततो नृपा: समाजहुस्तनूनि च मृदूनि च । उपधानानि मुख्यानि नैच्छत्‌ तानि पितामह:,तब राजालोग तत्काल बढ़िया, कोमल और महीन वस्त्रके बने हुए बहुत-से तकिये ले आये; परंतु पितामह भीष्मने उन्हें लेनेकी इच्छा नहीं की

ثم جاء الملوك بوسائد كثيرة نفيسة، مصنوعة من مواد ناعمة رقيقة؛ غير أن الجدّ بهيشما لم يُرِد أن يقبلها.

Verse 36

अथाब्रवीन्नरव्याप्र: प्रहसन्निव तान्‌ नृपान्‌ नैतानि वीरशय्यासु युक्तरूपाणि पार्थिवा:,तदनन्तर पुरुषसिंह भीष्मने हँसते हुए-से उन राजाओंसे कहा--'भूमिपालो! ये तकिये वीरशय्याके अनुरूप नहीं हैं!

قال سنجيا: ثم تكلّم ذلك النمر بين الرجال، كأنه يبتسم ابتسامة خفيفة، إلى أولئك الملوك: «يا حكّام الأرض، هذه الوسائد لا تليق بمضجع بطل.»

Verse 37

ततो वीक्ष्य नरश्रेष्ठम भ्यभाषत पाण्डवम्‌ | धनंजयं दीर्घबाहुं सर्वलोकमहारथम्‌,इसके बाद वे सम्पूर्ण लोकोंके विख्यात महारथी नरश्रेष्ठ महाबाहु पाण्डुपुत्र धनंजयकी ओर देखकर इस प्रकार बोले--

ثم نظر إلى خير الرجال من الباندافا—دهننجايا طويل الذراعين، المَهارَثَة المشهور في جميع العوالم—وخاطبه بهذه الكلمات.

Verse 38

धनंजय महाबाहो शिरो मे तात लम्बते । दीयतामुपधान वै यद्‌ युक्तमिह मन्यसे,“महाबाहु धनंजय! मेरा सिर लटक रहा है। बेटा! यहाँ इसके अनुरूप जो तकिया तुम्हें ठीक जान पड़े, वह ला दो”

«يا دهننجايا ذا الساعدين العظيمين، يا بُنيّ—إن رأسي يتهدّل. فهاتِ لي وسادةً هنا، ما تراه أنت لائقًا وموافقًا.»

Verse 39

संजय उवाच समारोप्य महच्चापमभिवाद्य पितामहम्‌ | नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यामिदं वचनमब्रवीत्‌,संजय कहते हैं--राजन्‌! तब अर्जुनने पितामह भीष्मको प्रणाम करके अपना विशाल धनुष चढ़ा लिया और आँसूभरे नेत्रोंसे देखकर इस प्रकार कहा--

قال سنجيا: ثم إن أرجونا، بعد أن أوتر قوسه العظيم وانحنى إجلالًا للجدّ الأكبر بهيشما، قال—وعيناه تفيضـان بالدمع—هذه الكلمات.

Verse 40

आज्ञापय कुरुश्रेष्ठ सर्वशस्त्रभृतां वर । प्रेष्यो5हं तव दुर्धर्ष क्रियतां किं पितामह,“समस्त शणस्त्रधारियोंमें अग्रगण्य कुरुश्रेष्ठ! दुर्जय वीर पितामह! मैं आपका सेवक हूँ; आज्ञा दीजिये; क्‍या सेवा करूँ?”

«مُرْني، يا خيرَ الكورو، يا أسبقَ حملةِ السلاح جميعًا. يا جدّي الأكبر الذي لا يُقهر، إنّي خادمُك—فبمَ تأمرني، وما الذي أصنعه في خدمتك؟»

Verse 41

तमब्रवीच्छान्तनव: शिरो मे तात लम्बते । उपधान कुरुश्रेष्ठ फाल्गुनोपदधत्स्व मे,तब शान्तनुनन्दनने उनसे कहा--“तात! मेरा सिर लटक रहा है। कुरुश्रेष्ठ फाल्गुन! तुम मेरे लिये तकिया लगा दो

قال سنجيا: ثم قال ابنُ شانتانو: «يا بُنيّ، إن رأسي يتهدّل. يا فالغونا، يا خيرَ الكورو، ضعْ لي وسادةً تحتي.»

Verse 42

शयनस्यानुरूपं वै शीघ्र वीर प्रयच्छ मे । त्वं हि पार्थ समर्थो वै श्रेष्ठ: सर्वधनुष्मताम्‌

قال سنجيا: «عَجِّلْ، أيها البطل، وامنحني مضجعًا يليق بحالي. فإنك، يا بارثا، قادرٌ حقًّا—بل أنت أسبقُ الرماة جميعًا.»

Verse 43

फाल्गुनो5पि तथेत्युक्त्वा व्यवसायमरोचयत्‌

قال سَنجايا: إن أرجونا أيضًا، وقد أجاب: «ليكن كذلك»، ثبّت عزمه—مُشيرًا إلى التزامٍ راسخٍ متعمَّدٍ بطريق الفعل في هذه اللحظة الحاسمة من سرد الحرب.

Verse 44

गृह्यानुमन्त्रय गाण्डीवं शरान्‌ संनतपर्वण: । अनुमान्य महात्मानं भरतानां महारथम्‌

قال سَنجايا: «فأخذ قوسَ غانديفا، وأخذ السهامَ المحكمةَ الوصلات، وبعد أن التمس على الوجه اللائق ونال موافقةَ ذلك العظيمِ النفس، المقاتلِ الجبّار على العربة بين آلِ بهاراتا، …»

Verse 45

त्रिभिस्ती&णैर्महावेगैरन्वगृह्नाच्छिर: शरै: | अर्जुनने “जो आज्ञा” कहकर इस कार्यके लिये प्रयत्न करना स्वीकार किया और गाण्डीव धनुष ले उसे अभिमन्त्रित करके झुकी हुई गाँठवाले तीन बाणोंको धनुषपर रखा। तत्पश्चात्‌ भरतकुलके महात्मा महारथी भीष्मकी अनुमति ले उन अत्यन्त वेगशाली तीन तीखे बाणोंद्वारा उनके मस्तकको अनुगृहीत किया (कुछ ऊँचा करके स्थिर कर दिया) ।। ४३-४४ $ ।। अभिप्राये तु विदिते धर्मात्मा सव्यसाचिना

قال سَنجايا: بثلاثة سهام—كلٌّ منها بالغُ السرعة—أسند أرجونا رأسَ بهيشما بحذر، فرفعه وثبّته في موضعه. ولم يُعرض هذا الفعل على أنه ظفرٌ بعدوٍّ ساقط، بل خدمةٌ واجبةٌ مشفوعةٌ بالرحمة في ساحة القتال لشيخٍ جليل، موافقةً لشرف الكشاتريا وللدَّرما حتى في أتون الحرب.

Verse 46

उपधानेन दत्तेन प्रत्यनन्दद्‌ धनंजयम्‌,उन्होंने वह तकिया देनेसे अर्जुनकी प्रशंसा करके उन्हें प्रसन्न किया और समस्त भरतवंशियोंकी ओर देखकर योद्धाओंमें श्रेष्ठ, सुहदोंका आनन्द बढ़ानेवाले, भरतकुलभूषण, कुन्तीपुत्र अर्जुनसे इस प्रकार कहा--

قال سَنجايا: وبعد أن قدّم له وسادةً، أبهج دهننجايا (أرجونا) بكلمات الثناء. ثم ألقى بصره على جميع آلِ بهاراتا، وخاطب أرجونا ابنَ كونتي—خيرَ المقاتلين، مُنمّي سرور الأصدقاء، وزينةَ سلالة بهاراتا—قائلًا ما يلي.

Verse 47

प्राह सर्वान्‌ समुद्वीक्ष्य भरतान्‌ भारतं प्रति । कुन्तीपुत्र युधां श्रेष्ठ सुह्ृदां प्रीतिवर्धनम्‌,उन्होंने वह तकिया देनेसे अर्जुनकी प्रशंसा करके उन्हें प्रसन्न किया और समस्त भरतवंशियोंकी ओर देखकर योद्धाओंमें श्रेष्ठ, सुहदोंका आनन्द बढ़ानेवाले, भरतकुलभूषण, कुन्तीपुत्र अर्जुनसे इस प्रकार कहा--

قال سَنجايا: وبعد أن تطلّع إلى جميع آلِ بهاراتا، خاطب سليلَ بهاراتا. وإذ أثنى على أرجونا ابنِ كونتي—خيرِ المقاتلين، ومُنمّي سرور الأصدقاء—كلّمه على هذا النحو ليشدّ أزره ويُمهّد لنبرة ما سيُقال وسط اجتماع الأقارب على شفا الحرب.

Verse 48

शयनस्यानुरूपं मे पाण्डवोपहितं त्वया । यद्यन्यथा प्रपद्येथा: शपेयं त्वामहं रुषा,'पाण्डुनन्दन! तुमने मेरी शय्याके अनुरूप मुझे तकिया प्रदान किया है। यदि इसके विपरीत तुमने और कोई तकिया दिया होता तो मैं कुपित होकर तुम्हें शाप दे देता

قال سنجيا: «يا ابن باندو، لقد وضعتَ لي وسادةً تلائم مضجعي. ولو قدّمتَ ما يخالف ما يليق، للعنّتُك غضبًا».

Verse 49

एवमेव महाबाहो धर्मेषु परितिष्ठता । स्वप्तव्यं क्षत्रियेणाजी शरतल्पगतेन वै

قال سنجيا: «هكذا إذن، يا عظيم الساعدين: من ثبت في الدارما، فعلى الكشاتريا أن يقبل النوم في ساحة القتال، بل حتى وهو مضطجع على سريرٍ من السهام».

Verse 50

“महाबाहो! अपने धर्ममें स्थित रहनेवाले क्षत्रियको युद्धस्थलमें इसी प्रकार बाणशय्यापर शयन करना चाहिये! ।। एवमुकक्‍्त्वा तु बीभत्सुं सर्वास्तानब्रवीद्‌ वच: । राज्ञश्न राजपुत्रांश् पाण्डवानभिसंस्थितान्‌,अर्जुनसे ऐसा कहकर भीष्मने पाण्डवोंके पास खड़े हुए उन समस्त राजाओं और राजपुत्रोंसे कहा--

قال سنجيا: «يا عظيم الساعدين! إن الكشاتريا الثابت في دارماه ينبغي له في ساحة الحرب أن يضطجع هكذا—حتى على سريرٍ من السهام.» ثم لما قال ذلك لأرجونا، توجّه بهيشما بالكلام إلى جميع أولئك الملوك وأبناء الملوك الواقفين قرب الباندافا.

Verse 51

पश्यध्वमुपधानं मे पाण्डवेनाभिसंधितम्‌ । शिश्येडहमस्यां शय्यायां यावदावर्तनं रवे:,'पाण्डुनन्दन अर्जुनने मेरे सिरमें यह तकिया लगाया है, उसे आपलोग देखें। मैं इस शय्यापर तबतक शयन करूँगा, जबतक कि सूर्य उत्तरायणमें नहीं लौट आते हैं

قال سنجيا: «انظروا إلى هذه الوسادة التي وضعها الباندافي تحت رأسي. سأظل مضطجعًا على هذا الفراش حتى يعود مسار الشمس—حتى يحين وقت الأوتّرايانا».

Verse 52

ये तदा मां गमिष्यन्ति ते च प्रेक्ष्यन्ति मां नृपा: । दिशं वैश्रवणाक्रान्तां यदा55गन्ता दिवाकर:,'सात घोड़ोंसे जुते हुए उत्तम तेजस्वी रथके द्वारा जब सूर्य कुबेरकी निवासभूत उत्तरदिशाके पथपर आ जायाँगे, उस समय जो राजा मेरे पास आयेंगे, वे मेरी ऊर्ध्व गतिको देख सकेंगे। निश्चय ही उसी समय मैं अत्यन्त प्रियतम सुहृदोंकी भाँति अपने प्यारे प्राणोंका त्याग करूँगा

قال سنجيا: «إن الملوك الذين سيأتون إليّ في ذلك الحين سيستطيعون أن يروني. فعندما تبلغ الشمس، راكبةً مركبتها البهيّة المتلألئة المجرورة بسبعة خيول، المسارَ الشمالي—الجهة التي يرعاها فايشرافانا (كوبيرا)—فإن الحكّام الذين يقتربون مني سيشهدون رحيلي صعودًا. نعم، في تلك اللحظة بعينها سأفارق نَفَسَ حياتي الحبيب، كما يفارق المرء أعزّ الأصدقاء.»

Verse 53

नूनं सप्ताश्वयुक्तेन रथेनोत्तमतेजसा । विमोक्ष्येडहं तदा प्राणान्‌ सुहृदः सुप्रियानिव,'सात घोड़ोंसे जुते हुए उत्तम तेजस्वी रथके द्वारा जब सूर्य कुबेरकी निवासभूत उत्तरदिशाके पथपर आ जायाँगे, उस समय जो राजा मेरे पास आयेंगे, वे मेरी ऊर्ध्व गतिको देख सकेंगे। निश्चय ही उसी समय मैं अत्यन्त प्रियतम सुहृदोंकी भाँति अपने प्यारे प्राणोंका त्याग करूँगा

قال سنجيا: «حقًّا، في ذلك الحين سأُطلق أنفاس حياتي—مفارِقًا إيّاها كما يُفارَق الأصدقاء الأعزّاء—حينما تتحوّل الشمس، راكبةً عربةً فائقة الإشراق موثوقةً بسبعة جياد، إلى المسار الشمالي. إنّها مفارقة مقصودة في وقتها: فالموت لا يُنتزع يأسًا، بل يُتقبَّل وفق النظام الكوني، بسكينةٍ ووقارِ من يترك ما هو أحبّ إليه.»

Verse 54

परिखा खन्‍्यतामत्र ममावसदने नृपा: । उपासिष्ये विवस्वन्तमेवं शरशताचित:,“राजाओ! मेरे इस स्थानके चारों ओर खाई खोद दो। मैं यहीं इसी प्रकार सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त शरीरके द्वारा भगवान्‌ सूर्यकी उपासना करूँगा

قال سنجيا: «يا أيها الملوك، احفروا خندقًا هنا حول الموضع الذي أضطجع فيه. سأبقى هنا، وجسدي مثقوب ومكدَّس بمئات السهام، لأتعبّد لڤيفاسڤات، إله الشمس.»

Verse 55

उपारमध्वं संग्रामाद्‌ वैरमुत्सूज्य पार्थिवा: । 'भूपालगण! अब आपलोग आपसका वैरभाव छोड़कर युद्धसे विरत हो जायँ ।। ५४ - संजय उवाच उपातिष्ठ न्नथो वैद्या: शल्योद्धरणकोविदा:

قال سنجيا: «يا أيها الملوك، كُفّوا عن هذه المعركة؛ اطرحوا العداوة وتراجعوا.»

Verse 56

तान्‌ दृष्टवा जाह्ववीपुत्र: प्रोवाच तनयं तव,उन्हें देखकर गंगानन्दन भीष्मने आपके पुत्र दुर्योधनसे कहा--'वत्स! इन चिकित्सकोंको धन देकर सम्मानपूर्वक विदा कर दो। मुझे यहाँ इस अवस्थामें अब इन वैद्योंसे क्या काम है?

قال سنجيا: فلمّا رآهم بهيشما—ابن جاهناڤي (الغانغا)—خاطب ابنك قائلاً: «يا بُنيّ، أكرِم هؤلاء الأطباء بالعطايا واصرفهم باحترام. ففي حالتي هذه الآن، أيُّ حاجة لي بهؤلاء الأطباء هنا؟»

Verse 57

धनं दत्त्वा विसृज्यन्तां पूजयित्वा चिकित्सका: । एवंगते मयेदानीं वैद्ये: कार्यमिहास्ति किम्‌,उन्हें देखकर गंगानन्दन भीष्मने आपके पुत्र दुर्योधनसे कहा--'वत्स! इन चिकित्सकोंको धन देकर सम्मानपूर्वक विदा कर दो। मुझे यहाँ इस अवस्थामें अब इन वैद्योंसे क्या काम है?

«أعطوهم مالًا، وبعد أن تُكرِموهم، أطلقوا الأطباء. وقد صرتُ إلى ما ترون، فأيُّ عملٍ يبقى للأطباء هنا؟»

Verse 58

क्षत्रधर्मे प्रशस्तां हि प्राप्तोडस्मि परमां गतिम्‌ । नैष धर्मो महीपाला: शरतल्पगतस्य मे

قال سنجيا: «بواجب الكشاتريا الممدوح بلغتُ المسار الأعلى. أيها الملوك، إن هذا ليس بعدُ قانون السلوك اللائق بي وأنا مضطجعٌ على سرير السهام».

Verse 59

एभिरेव शरैश्षाहं दग्धव्यो5स्मि नराधिपा: । 'क्षत्रियधर्ममें जिसकी प्रशंसा की गयी है, उस उत्तम गतिको मैं प्राप्त हुआ हूँ। भूपालो! मैं बाणशय्यापर सोया हुआ हूँ। अब मेरा यह धर्म नहीं है कि इन बाणोंको निकालकर चिकित्सा कराऊँ। नरेश्वरो! मेरे इस शरीरको इन बाणोंके साथ ही दग्ध कर देना चाहिये || ५८ ह || तच्छुत्वा वचन तस्य पुत्रो दुर्योधनस्तव

قال سنجيا: «أيها الملوك، ينبغي أن أُحرَق ومعي هذه السهام بعينها ما تزال في جسدي. لقد بلغتُ المصير الأعلى الذي يُشاد به في دارما الكشاتريا. أيها الحكّام، أنا مضطجعٌ على سرير السهام؛ ولم يعد من واجبي أن تُنزع هذه السهام وأن ألتمس العلاج. يا سادة البشر، ليُحرَق هذا الجسد مع هذه السهام.»

Verse 60

वैद्यान्‌ विसर्जयामास पूजयित्वा यथा्हत: । भीष्मकी यह बात सुनकर आपके पुत्र दुर्योधनने यथायोग्य सम्मान करके वैद्योंको विदा किया || ५९ ह || ततस्ते विस्मयं जम्मुर्नानाजनपदेश्वरा:

قال سنجيا: إن دوريوذانا، ابنك، أكرم الأطباء بما يليق ثم صرفهم. وبعد ذلك أُصيب الملوك—سادة الأقاليم المتعددة—بدهشة عظيمة مما شهدوه.

Verse 61

स्थितिं धर्मे परां दृष्टवा भीष्मस्यामिततेजस: । तदनन्तर विभिन्न जनपदोंके स्वामी नरेशगण अमिततेजस्वी भीष्मकी यह धर्मविषयक उत्तम निष्ठा देखकर बड़े विस्मित हुए || ६० है ।। उपधान ततो दत्त्वा पितुस्ते मनुजेश्वरा:,राजन्‌! आपके पितृतुल्य भीष्मको उपर्युक्त तकिया देकर उन नरेश, पाण्डव तथा महारथी कौरव सभीने एक साथ सुन्दर बाणशय्यापर सोये हुए महात्मा भीष्मके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके उनकी तीन बार प्रदक्षिणा की और सब ओरसे भीष्मकी रक्षाकी व्यवस्था करके सभी वीर अपने शिविरको ही चल दिये। वे अत्यन्त आतुर होकर भीष्मका ही चिन्तन कर रहे थे। सायंकालमें खूनसे लथपथ हुए वे सब लोग अपने निवासस्थानपर गये

قال سنجيا: لما رأى الملوك—سادة الأقاليم المتعددة—ثباتَ بهيشما ذي البأس اللامحدود في الدارما ثباتًا أسمى، امتلأوا دهشةً من ذلك العزم النبيل القائم على الدارما. ثم، أيها الملك، بعد أن وضعوا وسادةً لبهیشما الذي كان لك بمنزلة الأب، تقدّم أولئك الحكّام ومعهم الباندافا وعظماء فرسان العجلات من الكورافا جميعًا إلى بهيشما عظيم النفس، وهو مضطجع على سرير سهامه الجميل. فانحنوا له، وطافوا به ثلاث مرات، ورتّبوا حراسته من كل جانب. وبعد ذلك عاد الأبطال إلى معسكراتهم؛ وعلى شدة قلقهم ظلّت عقولهم معلّقة ببهیشما وحده. وعند المساء، وقد تلطّخوا بالدم، رجعوا جميعًا إلى مساكنهم.

Verse 62

सहिता: पाण्डवा: सर्वे कुरवश्च महारथा: । उपगम्य महात्मानं शयानं शयने शुभे,राजन्‌! आपके पितृतुल्य भीष्मको उपर्युक्त तकिया देकर उन नरेश, पाण्डव तथा महारथी कौरव सभीने एक साथ सुन्दर बाणशय्यापर सोये हुए महात्मा भीष्मके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके उनकी तीन बार प्रदक्षिणा की और सब ओरसे भीष्मकी रक्षाकी व्यवस्था करके सभी वीर अपने शिविरको ही चल दिये। वे अत्यन्त आतुर होकर भीष्मका ही चिन्तन कर रहे थे। सायंकालमें खूनसे लथपथ हुए वे सब लोग अपने निवासस्थानपर गये

قال سنجيا: إن الباندافا جميعًا مجتمعين، ومعهم الكورافا—عظماء فرسان العجلات—تقدّموا إلى بهيشما النبيل وهو مضطجع على سريره المبارك. أيها الملك، دنوا منه بخشوع، مكرّمين الشيخ الذي كان لهم كالأب، واعتنوا بتدبير حمايته حتى وسط مطالب الحرب القاسية.

Verse 63

तेडभिवाद्य ततो भीष्म॑ कृत्वा च त्रि: प्रदक्षिणम्‌ । विधाय रक्षां भीष्मस्य सर्व एव समन्ततः,राजन्‌! आपके पितृतुल्य भीष्मको उपर्युक्त तकिया देकर उन नरेश, पाण्डव तथा महारथी कौरव सभीने एक साथ सुन्दर बाणशय्यापर सोये हुए महात्मा भीष्मके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके उनकी तीन बार प्रदक्षिणा की और सब ओरसे भीष्मकी रक्षाकी व्यवस्था करके सभी वीर अपने शिविरको ही चल दिये। वे अत्यन्त आतुर होकर भीष्मका ही चिन्तन कर रहे थे। सायंकालमें खूनसे लथपथ हुए वे सब लोग अपने निवासस्थानपर गये

قال سانجيا: ثم إنهم جميعًا أدّوا التحية لبهِيشما وطافوا حوله ثلاث مرات، ورتّبوا حمايته من كل جانب. وهكذا، بعد أن كرّموا الجدّ الأكبر المضطجع على سرير السهام، انصرف المحاربون إلى معسكراتهم—وإن كانت قلوبهم مضطربة وخواطرهم مشدودة إليه. ويُبرز هذا المشهد لحظة إجلال وواجب في خضم الحرب: فالخصوم والحلفاء على السواء يعترفون بالسلطان الأخلاقي للشيخ، ويضمنون سلامته حين يكون عاجزًا.

Verse 64

वीरा: स्वशिबिराण्येव ध्यायन्त: परमातुरा: । निवेशायाभ्युपागच्छन्‌ सायाह्ले रुधिरोक्षिता:,राजन्‌! आपके पितृतुल्य भीष्मको उपर्युक्त तकिया देकर उन नरेश, पाण्डव तथा महारथी कौरव सभीने एक साथ सुन्दर बाणशय्यापर सोये हुए महात्मा भीष्मके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके उनकी तीन बार प्रदक्षिणा की और सब ओरसे भीष्मकी रक्षाकी व्यवस्था करके सभी वीर अपने शिविरको ही चल दिये। वे अत्यन्त आतुर होकर भीष्मका ही चिन्तन कर रहे थे। सायंकालमें खूनसे लथपथ हुए वे सब लोग अपने निवासस्थानपर गये

قال سانجيا: إن المحاربين، وقد استبدّ بهم الكرب ولم يشغلهم إلا أمر معسكراتهم (وما يجري فيها)، عادوا إلى مساكنهم في أواخر العصر. وقد تناثرت عليهم لطخات الدم، رجعوا إلى مواضع راحتهم—غير أن نفوسهم بقيت مضطربة، وأذهانهم معلّقة بالقائد الساقط وبواجبات الحرب القاتمة.

Verse 65

निविष्टान्‌ पाण्डवांश्वैव प्रीयमाणान्‌ महारथान्‌ । भीष्मस्य पतने हृष्टानुपगम्य महाबल:,पाण्डव महारथी भीष्मके गिर जानेसे बहुत प्रसन्न थे और हर्षमें भरकर विश्राम कर रहे थे। उस समय महाबली भगवान्‌ श्रीकृष्ण यथासमय उनके पास पहुँचकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले--“कुरुनन्दन! सौभाग्यकी बात है कि तुम जीत रहे हो। यह भी भाग्यकी ही बात है कि भीष्म रथसे गिरा दिये गये

قال سانجيا: لما رأى عظماء فرسان العربة من الباندافا جالسين في راحة، مسرورين ومبتهجين بسقوط بهِيشما، دنا منهم ذو البأس في الوقت الملائم. ويُظهر هذا المشهد أن النصر—even في حربٍ عادلة—يحمل مشاعر متشابكة: ارتياحًا وفرحًا عند منعطف حاسم، غير أنه يظل مُظلَّلًا بثقل سقوط شيخٍ مُبجَّل وبمطالب الدارما في السلوك وضبط النفس.

Verse 66

उवाच माधव: काले धर्मपुत्र॑ युधिष्ठिरम्‌ । दिष्ट्या जयसि कौरव्य दिष्ट्या भीष्मो निपातित:,पाण्डव महारथी भीष्मके गिर जानेसे बहुत प्रसन्न थे और हर्षमें भरकर विश्राम कर रहे थे। उस समय महाबली भगवान्‌ श्रीकृष्ण यथासमय उनके पास पहुँचकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले--“कुरुनन्दन! सौभाग्यकी बात है कि तुम जीत रहे हो। यह भी भाग्यकी ही बात है कि भीष्म रथसे गिरा दिये गये

قال سانجيا: وفي الوقت الملائم خاطب ماذافا (شري كريشنا) دارمابوترا يودهيشثيرا قائلاً: «طوبى لك يا سليل الكورو—إنك تغلب. وبمثل هذا الحظّ أيضًا سقط بهِيشما.» إن هذه الكلمة لا تجعل ما جرى مجرد نجاحٍ تكتيكي، بل تصوّره منعطفًا أذن به القدر، مثقلًا بوزنٍ أخلاقي عظيم—لأن الساقط هو الشيخ الموقَّر وحارس دارما الكورو.

Verse 67

अवध्यो मानुषैरेव सत्यसंधो महारथ: । अथवा दैवतै: सार्ध सर्वशास्त्रस्य पारग:

قال سانجيا: «إنه لا يُغلَب على يد البشر وحدهم—ثابتٌ على الصدق، وهو من عظماء فرسان العربة. بل إنه، حتى لو اجتمع معه الآلهة، فهو الذي بلغ الضفة الأخرى من جميع العلوم والشرائع (الشاسترا).»

Verse 68

त्वां तु चक्षुर्णं प्राप्प दग्धो घोरेण चक्षुषा । 'ये सत्यप्रतिज्ञ महारथी भीष्म सम्पूर्ण शास्त्रोंके पारंगत विद्वान्‌ थे। इन्हें मनुष्य तथा सम्पूर्ण देवता मिलकर भी मार नहीं सकते थे। आप दृष्टिपातमात्रसे ही दूसरोंको भस्म करनेमें समर्थ हैं। आपके पास पहुँचकर भीष्म आपकी घोर दृष्टिसे ही नष्ट हो गये हैं' | ६७ £ न्‍ एवमुक्तो धर्मराज: प्रत्युवाच जनार्दनम्‌,उनके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने भगवान्‌ श्रीकृष्णको इस प्रकार उत्तर दिया --'श्रीकृष्ण! आप हमारे आश्रय हैं तथा आप ही भक्तोंको अभय दान करनेवाले हैं। आपके ही कृपा-प्रसादसे विजय होती है और आपके ही रोषसे पराजय प्राप्त होती है

قال سنجيا: «ولكنه ما إن دخل في مدى نظرك حتى احترق—واستُهلك بهول عينك.» تُبرز هذه العبارة مفارقةً أخلاقية: فبهِيشما، مع شهرته بأنه لا يُقهر، وبأنه مَهاراثيٌّ موفٍ بنذره، متبحّرٌ في فنون السلاح والـشاسترا، يُصوَّر هنا وقد انكسر لا بالسلاح وحده، بل بالقوة الطاغية التي يسندها الدَّرما والمتجلّية في حضور كريشنا—إشارةً إلى أن القدرة المؤيَّدة بالحق قد تطغى على أعظم البأس الحربي.

Verse 69

तव प्रसादाद्‌ विजय: क्रोधात्‌ तव पराजय: । त्वं हि न: शरणं कृष्ण भक्तानामभयंकर:,उनके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने भगवान्‌ श्रीकृष्णको इस प्रकार उत्तर दिया --'श्रीकृष्ण! आप हमारे आश्रय हैं तथा आप ही भक्तोंको अभय दान करनेवाले हैं। आपके ही कृपा-प्रसादसे विजय होती है और आपके ही रोषसे पराजय प्राप्त होती है

«بفضلك تكون الغَلَبة، وبسخطك تقع الهزيمة. يا كريشنا، أنت حقًّا ملجؤنا؛ وأنت مانحُ الأمان من الخوف لعبّادك المخلصين.» تُبرز هذه العبارة رؤيةً أخلاقية للحرب: فالمآلات ليست نتاج القوة وحدها، بل يحكمها في النهاية التأييد الإلهي المتوافق مع الدَّرما ومع الإخلاص.

Verse 70

अनाशक्षर्यों जयस्तेषां येषां त्वमसि केशव । रक्षिता समरे नित्यं नित्यं चापि हिते रत:

قال سنجيا: «النصرُ مضمونٌ لأولئك الذين تكون أنت، يا كيشافا، حاميَهم الدائم في ساحة القتال—ثابتًا لا يتزعزع، ومواظبًا على مراعاة خيرهم الحق.» يبيّن هذا البيت أن الظفر في الحرب ليس شأن القوة وحدها، بل ثمرة الهداية الرشيدة والحماية القيادية المتوافقة مع الدَّرما.

Verse 71

सर्वथा त्वां समासाद्य नाक्ष॒र्यमिति मे मतिः । “केशव! आप समरभूमिमें सदा जिनकी रक्षा करते हैं और नित्यप्रति जिनके हितमें तत्पर रहते हैं, उनकी विजय हो तो यह कोई आश्वर्यकी बात नहीं है। आपकी शरण लेनेपर सर्वथा विजयकी प्राप्ति कोई आश्रलर्यकी बात नहीं है, ऐसा मेरा निश्चय है” ।। एवमुक्त: प्रत्युवाच स्मयमानो जनार्दन: | तवैवैतद्‌ युक्तरूपं वचन पार्थिवोत्तम,युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर जनार्दन श्रीकृष्णने मुसकराते हुए कहा--“नृपश्रेष्ठी] आपका कथन सर्वथा युक्तिसंगत है”

قال سنجيا: «بعد أن اتُّخِذَتْ ملاذًا لك على كل وجه، فلا عجب في الأمر—هذا يقيني. يا كيشافا، من تحميه دائمًا في ساحة القتال وتظلّ مواظبًا على رعاية خيره، لا يمكن أن تكون غلبته مدعاة دهشة. ومن التمس كنفك التماسًا تامًّا، فنجاحه ليس أمرًا عجيبًا.» فلما قيل ذلك، أجاب جاناردانا كريشنا مبتسمًا: «يا أفضل الملوك، إن قولك لَسديدٌ كل السداد وموافقٌ للعقل.»

Verse 76

पज्चालानां ददौ हर्ष भीष्म: कुरुपितामह: । संजयने कहा--महाराज! कुरुकुलवृद्ध पितामह भीष्म सायंकालमें जब रणभूमिमें गिरे, उस समय उन्होंने आपके पुत्रोंको बड़े विषादमें डाल दिया और पांचालोंको हर्ष मनानेका अवसर दे दिया

قال سنجيا: «إن بهيشما، جدَّ الكورو، صار سببَ فرحٍ للبَانْچالا.» (وفي سياق السرد، يشير ذلك إلى اللحظة التي سقط فيها بهيشما في ساحة القتال؛ فغمر الحزنُ الكاورافا، بينما وجد البانچالا وحلفاؤهم سببًا للابتهاج—وهو منعطفٌ أخلاقيٌّ معقّد، إذ تنبثق الغَلَبة والأسى من الحدث نفسه.)

Verse 119

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्मजीके रथसे गिरनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

قال سانجيا: هكذا انتهى الفصل التاسع عشر بعد المئة من «بارفا بهيشما» في «شري مهابهاراتا»، ضمن القسم المتعلّق بسقوط بهيشما—والمتصل بواقعة نزول بهيشما عن عربته الحربية. ويُعدّ هذا السرد منعطفًا حاسمًا في الحرب، إذ إن سقوط الشيخ الجليل يبرز الكلفة المأساوية للصراع وتعقّد مطالب الواجب (الدهرما) في خضم العنف.

Verse 120

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मोपधानदाने विंशत्यधिकशततमो<ध्याय:

وهكذا ينتهي، في «شري مهابهاراتا»، ضمن «بارفا بهيشما»—وخاصة في القسم المتعلّق بسقوط بهيشما—هذا الفصل العشرون بعد المئة، الذي يصف تقديم ما يعين بهيشما ويُسند حاله. ويأتي هذا الخاتم ليغلق الفصل ويؤطّر الحادثة بوصفها فعلَ واجبٍ ورحمةٍ في خضم عنف الحرب.

Verse 426

क्षत्रधर्मस्य वेत्ता च बुद्धिसत्त्वगुणान्वित: । “वीर कुन्तीकुमार! इस शय्याके अनुरूप शीघ्र मुझे तकिया दो। तुम्हीं उसे देनेमें समर्थ हो; क्‍योंकि सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें तुम्हारा बहुत ऊँचा स्थान है। तुम क्षत्रियधर्मके ज्ञाता तथा बुद्धि और सत्त्व आदि सदगुणोंसे सम्पन्न हो”

قال سانجيا: «يا بطلَ ابنَ كونتي! إنك لَعالِمٌ بواجب الكشاتريا (kṣatriya-dharma)، موفورُ العقل، متحلٍّ بالصفة النبيلة ساتفا (sattva). فهلمّ سريعًا وأعطني وسادة تليق بهذا المضجع. أنت وحدك قادر على تقديمها، إذ إن مقامك بين جميع الرماة رفيعٌ جدًّا.»

Verse 456

अतुष्यद्‌ भरतश्रेष्ठो भीष्मो धर्मार्थतत्त्ववित्‌ | सव्यसाची अर्जुनने उनके अभिप्रायको समझकर जब ठीक तकिया लगा दिया, तब धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले धर्मात्मा भरतश्रेष्ठ भीष्म बहुत संतुष्ट हुए

قال سانجيا: إن بهيشما، أرفعَ البهاراتيين، العارفَ بحقائق الدهرما والأرثا (dharma و artha)، قد غمره الرضا العميق. فلما فهم سافياساشي أرجونا مراد بهيشما ووضع السند/الوسادة على الوجه الصحيح، سرّ بهيشما، صاحب الدهرما والعالم بأصول الدهرما والأرثا، سرورًا عظيمًا.

Verse 556

सर्वोपकरणैर्युक्ता: कुशलै: साधु शिक्षिता: । संजय कहते हैं--महाराज! तदनन्तर शरीरसे बाणको निकाल फेंकनेकी कलामें कुशल वैद्य भीष्मजीकी सेवामें उपस्थित हुए। वे समस्त आवश्यक उपकरणोंसे युक्त और कुशल पुरुषोंद्वारा भलीभाँति शिक्षा पाये हुए थे

قال سانجيا: أيها الملك! ثم حضر أطباءٌ مهرة لخدمة بهيشما—خبراء في فنّ استخراج السهام من الجسد. جاءوا مزوّدين بكل الأدوات اللازمة، وقد تلقّوا تدريبًا محكمًا على أيدي أساتذة مقتدرين. ويُبرز هذا المشهد أنه حتى في قسوة الحرب تُستدعى العناية المنضبطة والمهارة المتعلَّمة لصون الحياة وإكرام الجريح الساقط.