
Adhyāya 33: Rauhiṇeya (Balarāma) is welcomed and takes his seat to witness the gadā-engagement
Upa-parva: Gadāyuddha-darśana (Balarāma’s return to witness the mace duel)
Saṃjaya reports that, amid a severe ongoing confrontation, the principal Pāṇḍava leaders are seated as observers. Balarāma (Tāladhvaja, Halāyudha, Rauhiṇeya), hearing that his two disciples’ confrontation is at hand, arrives to witness their gadā-competition. The assembled rulers greet him with honor and invite him to observe the display of skill. Balarāma states he had departed on pilgrimage forty-two days earlier under Puṣya and has returned under Śravaṇa, explicitly desiring to see the disciples’ mace duel. Yudhiṣṭhira embraces him and inquires after his welfare; Kṛṣṇa Vāsudeva and Arjuna (both addressed as ‘Kṛṣṇa’ in the verse tradition) greet him with formal respect, as do the Mādrī-sons, Draupadī’s five sons, and Bhīma. Balarāma reciprocates courtesies, embraces Janārdana (Kṛṣṇa) and Sātyaki affectionately, and is honored by them as a guru. At Yudhiṣṭhira’s request, he sits prominently among the chiefs, described with luminous imagery, as the duel’s tumultuous onset becomes imminent.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को रणभूमि का वृत्त सुनाते हैं—गदाहस्त दुर्योधन युद्ध के लिए उपस्थित है, और पाण्डव उसे कैलास-शिखर-सा अडिग देखते हैं। → युधिष्ठिर के मुख से एक असावधान, दुःसाहसपूर्ण वचन निकलता है—मानो दुर्योधन ‘हममें से किसी एक’ को मारकर राजा बन जाए। श्रीकृष्ण तुरंत उसे फटकारते हैं और बताते हैं कि ऐसे वचन से सेना का मनोबल टूटता है। साथ ही वे भीमसेन की सामर्थ्य का स्मरण कराते हैं—गदा-युद्ध में दुर्योधन को जीत पाना असाधारण है, पर भीम ही वह पुरुष है जो उसे परास्त कर सकता है। → भीम और दुर्योधन के बीच वाग्युद्ध तीखा हो उठता है—प्रतिज्ञा, अपमान और प्रतिशोध की ज्वाला के बीच श्रीकृष्ण भीम को लक्ष्य-स्मरण कराते हैं: दुर्योधन का अंत निश्चित है, और उसकी जंघाएँ तोड़ने की प्रतिज्ञा पूरी होगी। → पाण्डव पक्ष का संकल्प स्थिर होता है—युधिष्ठिर का विचलन शान्त होता है, भीम को प्रशंसा और निर्देश दोनों मिलते हैं, और दुर्योधन की निर्भय, सिंह-सी स्थिति के बावजूद उसे ‘पापी’ कहकर उसके विनाश का विधान घोषित किया जाता है। → गदायुद्ध का निर्णायक क्षण निकट है—दुर्योधन अडोल खड़ा है और भीम प्रतिज्ञा-पूर्ति के लिए उद्यत; अब रणभूमि अगले प्रहार की प्रतीक्षा करती है।
Verse 1
#5-.2/+5 >> धन #* त्रयस्त्रिंशो5 ध्याय: श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको फटकारना, भीमसेनकी प्रशंसा तथा भीम और दुर्योधनमें वाग्युद्ध संजय उवाच एवं दुर्योधने राजन् गर्जमाने मुहुर्मुहु: । युधिष्ठिरस्य संक्रुद्धों वासुदेवो5ब्रवीदिदम्,संजय कहते हैं--राजन्! जब यों कहकर दुर्योधन बारंबार गर्जना करने लगा, उस समय भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त कुपित होकर युधिष्ठिरसे बोले--
三阇耶说道:大王啊,杜利约陀那说罢此言,仍一再咆哮怒吼;其时,婆苏提婆(圣克里希纳)为犹提湿提罗之故而勃然大怒,便以如下言辞对他说道。此一幕显出克里希纳对夸矜而好斗之暴行的道义不耐,并显出他在战乱喧嚣中扶持达摩、使之安定的决心。
Verse 2
यदि नाम हायं युद्धे वरयेत् त्वां युधिष्ठिर । अर्जुन नकुलं चैव सहदेवमथापि वा,'युधिष्ठिर! यदि यह दुर्योधन युद्धमें तुमको, अर्जुनको अथवा नकुल या सहदेवको ही युद्धके लिये वरण कर ले, तब क्या होगा?
三阇耶说道:“犹提湿提罗啊,若在此战中,杜利约陀那点名选择你——或阿周那,或那俱罗,乃至萨诃提婆——作为他所指定的对手来决斗,那么接下来将会如何?”
Verse 3
किमिदं साहसं राजंस्त्वया व्याहृतमीदृशम् । एकमेव निहत्याजौ भव राजा कुरुष्विति,“राजन! आपने क्यों ऐसी दुःसाहस पूर्ण बात कह डाली कि “तुम हममेंसे एकको ही मारकर कौरवोंका राजा हो जाओ'
三阇耶说道:“大王啊,你为何说出这般鲁莽之言?‘只要在战场上杀死我们中的一人,便可成为俱卢之王’——你怎能提出如此大胆而在道义上凶险的主张?”
Verse 4
न समर्थानहं मन्ये गदाहस्तस्य संयुगे | एतेन हि कृता योग्या वर्षाणीह त्रयोदश
三阇耶说道:“在战斗中,我不认为有人能与这位执钺持槌之人相匹敌。因为正是他,在此地,已成就了足以抵得上十三年之功的伟业。”
Verse 5
कथं नाम भवेत् कार्यमस्माभिर्भरतर्षभ
三阇耶说道:“婆罗多族中的雄牛啊,我们究竟该如何行事——我们应当采取怎样的方略?”
Verse 6
नान्यमस्यानुपश्यामि प्रतियोद्धारमाहवे
三阇耶说道:“在这战场上,我看不见还有别的人——能为他——真正挺身而出,作为对阵的勇士与之抗衡。”
Verse 7
तदिदं द्यूतमारब्धं पुनरेव यथा पुरा
三阇耶说道:“这同一场掷骰之局,又一次被重新开启,正如往昔一般。”
Verse 8
बली भीम: समर्थश्न कृती राजा सुयोधन:
三阇耶说道:“毗摩勇力无双,能为能战;而苏约陀那王(难敌,杜尔约陀那)亦是意志坚决、善于筹谋之人。”
Verse 9
बलवान् वा कृती वेति कृती राजन् विशिष्यते । “राजन! माना कि भीमसेन बलवान् और समर्थ हैं, परंतु राजा दुर्योधनने अभ्यास अधिक किया है। एक ओर बलवान हो और दूसरी ओर युद्धका अभ्यासी, तो उनमें युद्धका अभ्यास करनेवाला ही बड़ा माना जाता है ॥ ८ $ ।। सो<यं राजंस्त्वया शत्रु: समे पथि निवेशित:
三阇耶说道:“大王啊,或仅有蛮力,或真有技艺;被视为更胜一筹的,终究是技艺之人。因此,大王啊,正因你自己的作为,敌人被你置于同等的地位——仿佛与你走在同一条道路上。”
Verse 10
को नु सर्वान् विनिर्जित्य शत्रूनेकेन वैरिणा,“भला कौन ऐसा होगा, जो सब शत्रुओंको जीत लेनेके बाद जब एक ही बाकी रह जाय और वह भी संकटमें पड़ा हो तो उसके साथ अपने हाथमें आये हुए राज्यको दाँवपर लगाकर हार जाय और इस प्रकार एकके साथ युद्ध करनेकी शर्त रखकर लड़ना पसंद करे?
三阇耶说道:“有谁会在征服诸敌之后,当只剩一个仇敌——且那孤敌已陷困厄——还要把已得的王国押作赌注,并以赌约之战去与他相斗?”
Verse 11
कृच्छुप्राप्तेन च तथा हारयेद् राज्यमागतम् | पणित्वा चैकपाणेन रोचयेदेवमाहवम्,“भला कौन ऐसा होगा, जो सब शत्रुओंको जीत लेनेके बाद जब एक ही बाकी रह जाय और वह भी संकटमें पड़ा हो तो उसके साथ अपने हाथमें आये हुए राज्यको दाँवपर लगाकर हार जाय और इस प्रकार एकके साथ युद्ध करनेकी शर्त रखकर लड़ना पसंद करे?
三阇耶说道:“有谁会愚蠢到这种地步:明明已夺得王国,却只因最后剩下的一个敌人陷入困厄,便将到手的国土押作赌注而输掉?在征服其余一切之后,又有谁会选择立下这般赌约——把自己束缚在那样的条件之下,只与一名对手决战?”
Verse 12
न हि पश्यामि तं लोके योछ्द्य दुर्योधन रणे । गदाहस्तं विजेतुं वै शक्त: स्यादमरो5पि हि,“मैं संसारमें किसी भी शूरवीरको, वह देवता ही क्यों न हो, ऐसा नहीं देखता, जो आज रणभूमिमें गदाधारी दुर्योधनको परास्त करनेमें समर्थ हो
三阇耶说道:“确实,我在这世间看不见任何人——不,纵是神仙不死者也不行——能在今日战场上击败手执铁杵的难敌。”
Verse 13
न त्वं भीमो न नकुल: सहदेवो5थ फाल्गुन: । जेतुं न्यायेन शक्तो वै कृती राजा सुयोधन:,“आप, भीमसेन, नकुल, सहदेव अथवा अर्जुन-कोई भी न्यायपूर्वक युद्ध करके दुर्योधनपर विजय नहीं पा सकते; क्योंकि राजा सुयोधनने गदायुद्धका अधिक अभ्यास किया है
三阇耶说道:“不是你,毗摩——也不是那俱罗、娑诃提婆,甚至法尔古那(阿周那)——都不能以公正合乎法度的战斗战胜苏由陀那王;因为苏由陀那在杵战上修习更深,技艺最为纯熟。”
Verse 14
स कथं वदसे शत्रुं युध्यस्व गदयेति हि । एकं च नो निहत्याजौ भव राजेति भारत,“भारत! जब ऐसी अवस्था है, तब आपने अपने शत्रुसे कैसे यह कह दिया कि “तुम गदाद्वारा युद्ध करो और हममेंसे किसी एकको मारकर राजा हो जाओ”
三阇耶说道:“噢,婆罗多!既是如此情势,你怎能对你的敌人说:‘就用铁杵来战吧;在战场上杀死我们中的一人之后,你便为王’?”
Verse 15
वृकोदरं समासाद्य संशयो वै जये हि नः । न्यायतो युध्यमानानां कृती होष महाबल:,'भीमसेनपर युद्धका भार रखा जाय तो भी हमें विजय मिलनेमें संदेह है; क्योंकि न्यायपूर्वक युद्ध करनेवाले योद्धाओंमें महाबली सुयोधनका अभ्यास सबसे अधिक है
三阇耶说道:“若让弗利拘陀罗(毗摩)上前对阵,我方的胜利便确实成了疑问。因为在遵循正义与战法而战的武士之中,那位大力者(难敌)修习最深、技艺最精。”
Verse 16
एकं वास्मान् निहत्य त्वं भव राजेति वै पुनः । नूनं न राज्यभागेषा पाण्डो: कुन्त्याश्व॒ संतति:
桑阇耶说道:“只要杀死我们中的一个,你便可再度为王。潘度与昆蒂的后裔,想来注定无缘分得此国土的一份。”
Verse 17
भीमसेन उवाच मधुसूदन मा कार्षीविषादं यदुनन्दन
毗摩塞那说道:“噢,诛灭摩度者,雅度族之欢欣——莫要沉入悲沮。”
Verse 18
अहं सुयोधनं संख्ये हनिष्यामि न संशय:
“在战场上,我必诛杀苏约陀那——毫无疑问。”
Verse 19
अध्यर्धेन गुणेनेयं गदा गुरुतरी मम,मेरी यह गदा दुर्योधनकी डेढ़गुनी भारी है। ऐसी दुर्योधनकी गदा नहीं है, अतः माधव! आप व्यथित न हों। मैं समरांगणमें इस गदाद्वारा इससे भिड़नेका उत्साह रखता हूं
毗摩说道:“以一倍半之重计,我这柄钉锤更为沉重。难敌(杜尔约陀那)并无如此之锤;因此,噢,摩陀婆,不必忧惧。我在战场上立誓要执此锤与他交锋。”
Verse 20
न तथा धार्तराष्ट्रस्य मा कार्षीमाधव व्यथाम् | अहमेनं हि गदया संयुगे 80 किक मुत्सहे,मेरी यह गदा दुर्योधनकी डेढ़गुनी भारी है। ऐसी दुर्योधनकी गदा नहीं है, अतः माधव! आप व्यथित न हों। मैं समरांगणमें इस गदाद्वारा इससे भिड़नेका उत्साह रखता हूं
毗摩塞那说道:“噢,摩陀婆,莫要为持国之子如此忧伤;因为我已决意在战阵中执锤与他相会。”
Verse 21
भवन्त: प्रेक्षका: सर्वे मम सन्तु जनार्दन । सामरानपि लोकांस्त्रीन् नानाशस्त्रधरान् युधि
毗摩塞那说道:“噢,阇那尔达那啊,愿你们众人都作我的见证。即便在此战中,三界连同诸天,手持百般兵刃,一齐与我为敌,我也绝不退却,绝不动摇我的誓志。”
Verse 22
योधयेयं रणे कृष्ण किमुताद्य सुयोधनम् । जनार्दन! आप सब लोग दर्शक बनकर मेरा युद्ध देखते रहें। श्रीकृष्ण! मैं रणक्षेत्रमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले देवताओंसहित तीनों लोकोंके साथ युद्ध कर सकता हूँ; फिर इस सुयोधनकी तो बात ही क्या है? ।। संजय उवाच तथा सम्भाषमाणं तु वासुदेवो वृकोदरम्
三阇耶说道:“噢,克里希纳,我能在战场上交锋——那么今日与苏由陀那一战又算得了什么?噢,阇那尔达那啊,你们众人且作见证,观看我的厮杀。噢,圣克里希纳,我甚至能与三界并诸天、那些执持各类兵刃者开战;何况只是这苏由陀那!”三阇耶又说:当毗摩如此言说之时,婆苏提婆(克里希纳)……
Verse 23
त्वामाश्रित्य महाबाहो धर्मराजो युधिषछिर:
三阇耶说道:“依凭于你,噢,大臂勇士,持守法(dharma)的尤提士提罗王(因此)行事坚定,立场不移。”
Verse 24
निहतारि: स्वकां दीप्तां श्रियं प्राप्तो न संशय: । त्वया विनिहता: सर्वे धृतराष्ट्रसुता रणे
三阇耶说道:“既已诛灭仇敌,他必已获得属于自己的炽盛荣光——此无可疑。因为在战场上,持多罗湿罗之诸子,皆为你所击倒。”
Verse 25
“महाबाहो! इसमें संदेह नहीं कि धर्मराज युधिष्ठिरने तुम्हारा आश्रय लेकर ही शत्रुओंका संहार करके पुनः अपनी उज्ज्वल राज्यलक्ष्मीको प्राप्त कर लिया है। धृतराष्ट्रके सभी पुत्र तुम्हारे ही हाथसे युद्धमें मारे गये हैं ।। राजानो राजतपूुत्राश्न नागाश्न विनिपातितः । कलिज्जा मागधा: प्राच्या गान्धारा: कुरवस्तथा
三阇耶说道:“噢,大臂勇士!毫无疑问,持法之王尤提士提罗依凭于你,诛灭仇敌,复得其王国那炽然光耀的福运。持多罗湿罗的诸子,皆在战阵中为你亲手所杀。诸王与王子,乃至那伽(Nāga)勇士,亦尽被击倒——迦陵伽(Kaliṅga)、摩揭陀(Māgadha)、东方诸国之人、犍陀罗(Gāndhāra)以及俱卢(Kuru)亦复如是。”
Verse 26
हत्वा दुर्योधनं चापि प्रयच्छोर्वीं ससागराम्
桑阇耶说道:“在诛杀了难敌之后,(他)还将把这大地——连同环绕四方的海洋——一并赐与。”
Verse 27
त्वां च प्राप्प रणे पापो धार्तराष्ट्रो विनड्क्ष्यति
桑阇耶说道:“当他在战场上与你相遇时,那罪孽深重的持国之子必将覆灭。”
Verse 28
यत्नेन तु सदा पार्थ योद्धव्यो धृतराष्ट्रज:
桑阇耶说道:“噢,帕尔塔啊,持国之子必须时时以不懈的努力与警觉来对战。”
Verse 29
ततस्तु सात्यकी राजन् पूजयामास पाण्डवम्,राजन्! तदनन्तर सात्यकिने पाण्डुपुत्र भीमसेनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। धर्मराज आदि पाण्डव तथा पांचाल सभीने भीमसेनके उस वचनका बड़ा आदर किया
桑阇耶说道:“于是,噢大王,萨提亚吉礼敬那位般度之子。其后,萨提亚吉屡屡称颂般度之子毗摩塞那。法王与诸般度子,以及全体旁遮罗人,都以极大的敬意领受毗摩塞那之言。”
Verse 30
पज्चाला: पाण्डवेयाश्व धर्मराजपुरोगमा: । तद् वचो भीमसेनस्य सर्व एवाभ्यपूजयन्,राजन्! तदनन्तर सात्यकिने पाण्डुपुत्र भीमसेनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। धर्मराज आदि पाण्डव तथा पांचाल सभीने भीमसेनके उस वचनका बड़ा आदर किया
桑阇耶说道:“旁遮罗人与般度诸子,在尤提施提罗王的率领下,噢大王,众人皆礼敬并赞同毗摩塞那所说之言。”
Verse 31
ततो भीमबलो भीमो युधिष्ठिरमथाब्रवीत् । सृञ्जयै: सह तिष्ठन्तं तपनन््तमिव भास्करम्,तदनन्तर भयंकर बलशाली भीमसेनने सूंजयोंके साथ खड़े हुए तपते सूर्यके समान तेजस्वी युधिष्ठिस्से कहा--
三阇耶说道:于是,力大无比的毗摩对与斯林阇耶诸将并立、光焰如烈日的坚战(由提施提罗)开口说道。
Verse 32
अहमेतेन संगम्य संयुगे योद्धुमुत्सहे । न हि शक्तो रणे जेतुं मामेष पुरुषाधम:,'भैया! मैं रणभूमिमें इस दुर्योधनके साथ भिड़कर लड़नेका उत्साह रखता हूँ। यह नराधम मुझे युद्धमें परास्त नहीं कर सकता
三阇耶说道:“与他短兵相接之后,我渴望在战阵深处与之厮杀;这等卑劣之人,决不能在战争中胜过我。”
Verse 33
अद्य क्रोधं विमोक्ष्यामि निहितं हृदये भशम् । सुयोधने धार्तराष्ट्रे खाण्डवेडग्निमिवार्जुन:,“मेरे हृदयमें दीर्घकालसे जो अत्यन्त क्रोध संचित है, उसे आज मैं धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनपर उसी प्रकार छोड़ूँगा, जैसे अर्जुनने खाण्डव वनमें अग्निदेवको छोड़ा था इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि भीमसेनदुर्योधनसंवादे त्रयस्त्रिंशो 5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापव॑रमें भीमसेन और दुर्योधनका संवादविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
三阇耶说道:“今日我必将那久藏于心、如暗炭潜燃的狂怒,尽数倾泻在苏约陀那——持国之子——身上;正如阿周那昔日于建陀婆林放纵火神一般。”
Verse 34
शल्यमपद्योद्धरिष्यामि तव पाण्डव हृच्छयम् | निहत्य गदया पापमद्य राजन् सुखी भव,'पाण्डुनन्दन! नरेश! आज मैं गदाद्वारा पापी दुर्योधनका वध करके आपके हृदयका काँटा निकाल दूँगा; अत: आप सुखी होइये
三阇耶说道:“噢般度之子,我将拔去你心中所刺之芒。今日我必以铁杵诛杀罪恶的难敌(杜尤陀那);大王啊,请安然释怀。”
Verse 35
अद्य कीर्तिमयीं मालां प्रतिमोक्ष्ये तवानघ । प्राणाम् श्रियं च राज्यं च मोक्ष्यतेडद्य सुयोधन:,“अनघ! आज आपके गलेमें मैं कीर्तिमयी माला पहनाऊँगा तथा आज यह दुर्योधन अपने राज्यलक्ष्मी और प्राणोंका परित्याग करेगा
三阇耶说道:“无垢者啊,今日我将以名声之花环加于你颈。因为今日苏约陀那必将舍弃其性命、王者之福与其国土。”
Verse 36
राजा च धृतराष्ट्रोड्द्य श्रुत्वा पुत्र मया हतम् | स्मरिष्यत्यशुभं कर्म यत् तच्छकुनिबुद्धिजम्,“आज मेरे हाथसे पुत्रको मारा गया सुनकर राजा धृतराष्ट्र शकुनिकी सलाहसे किये हुए अपने अशुभ कर्मोको याद करेंगे”
三阇耶说道:“当持国王今日听闻其子已被我所杀,他必将追忆自己所作的不祥之业——那皆出自沙昆尼的谋策。”
Verse 37
इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठो गदामुद्यम्य वीर्यवान् । उदतिष्ठत युद्धाय शक्रो वृत्रमिवाह्दयन्,ऐसा कहकर भरतवंशी वीरोंमें श्रेष्ठ पराक्रमी भीमसेन गदा उठाकर युद्धके लिये उठ खड़े हुए और जैसे इन्द्रने वृत्रासुरको ललकारा था, उसी प्रकार उन्होंने दुर्योधनका आह्वान किया
三阇耶说道:言毕,勇力无双的毗摩塞那——婆罗多族中最杰出者——举起铁杵,起身赴战;他呼唤都利约陀那应战,正如因陀罗昔日喝令弗栗陀罗出阵。
Verse 38
तदाह्वानममृष्यन् वै तव पुत्रो$तिवीर्यवान् । प्रत्युपस्थित एवाशु मत्तो मत्तमिव द्विपम्,महाराज! उस समय आपका अत्यन्त पराक्रमी पुत्र दुर्योधन भीमसेनकी उस ललकारको न सह सका। वह तुरंत ही उनका सामना करनेके लिये उपस्थित हो गया, मानो एक मतवाला हाथी दूसरे मदोन्मत्त गजराजसे भिड़नेको उद्यत हो गया हो
三阇耶说道:大王啊,你那勇力绝伦的儿子无法忍受那般挑战,立刻上前迎战,宛如醉象奔向另一头狂醉的象王。
Verse 39
गदाहस्तं तव सुतं युद्धाय समुपस्थितम् । ददृशु: पाण्डवा: सर्वे कैलासमिव शृज्धिणम्,हाथमें गदा लेकर युद्धके लिये उपस्थित हुए आपके पुत्रको समस्त पाण्डवोंने शृंगधारी कैलासपर्वतके समान देखा
三阇耶说道:众般度子见你之子手执铁杵、列阵待战,巍然如群峰冠顶的凯拉萨山。
Verse 40
तमेकाकिनमासाद्य धार्तराष्ट्र महाबलम् । वियूथमिव मातज्ूुं समहृष्यन्त पाण्डवा:,जैसे कोई मतवाला हाथी अपने यूथसे बिछुड़ गया हो, उसी प्रकार अकेले आये हुए आपके महाबली पुत्र दुर्योधनको पाकर समस्त पाण्डव हर्षसे खिल उठे
三阇耶说道:般度子们逼近那位力大无比的持国之子,见他孤身而立,便心生欢喜——如猎人望见巨象离群,骤然雀跃。
Verse 41
न सम्भ्रमो न च भयं न च ग्लानिर्न च व्यथा । आसीद् दुर्योधनस्यापि स्थित: सिंह इवाहवे,उस समय दुर्योधनके मनमें न घबराहट थी, न भय। न ग्लानि थी, न व्यथा। वह युद्धस्थलमें सिंहके समान निर्भय खड़ा था
三阇耶说道:就在那一刻,连都利约陀那也既无惊惶,亦无恐惧——既无悔恨,亦无苦恼。他在战场上稳立不动,宛如雄狮,置身兵戈交击之中而不为所撼。
Verse 42
समुद्यतगदं दृष्टवा कैलासमिव शृद्.िणम् । भीमसेनस्तदा राजन् दुर्योधनमथाब्रवीत्,राजन! शृंगंधारी कैलासपर्वतके समान गदा उठाये दुर्योधनको देखकर भीमसेनने उससे कहा--
三阇耶说道:大王啊,毗摩塞那见都利约陀那高举铁槌,巍然如峰峦耸立的凯拉萨山,便在那时开口对他说道。
Verse 43
आयसे पुरुषे राजन् भीमसेनजिघांसया । “मैं नहीं मानता कि आपलोग युद्धमें गदाधारी दुर्योधनका सामना करनेमें समर्थ हैं। राजन्! इसने भीमसेनका वध करनेकी इच्छासे उनकी लोहेकी मूर्तिके साथ तेरह वर्षोतक गदायुद्धका अभ्यास किया है,राज्ञापि धृतराष्ट्रेण त्वया चास्मासु यत् कृतम् । समर तद् दुष्कृतं कर्म यद् भूतं वारणावते “दुर्योधन! तूने तथा राजा धृतराष्ट्रने भी हमलोगोंपर जो-जो अत्याचार किया था और वारणावत नगरमें जो कुछ हुआ था, उन सारे पापकर्मोंको याद कर ले
三阇耶说道:“大王啊,都利约陀那怀着要杀毗摩塞那之心,曾对着铁制人像苦练棍槌之战整整十三年。都利约陀那,你也当记起:由持国王与你加诸于我们的一切不义——往昔那些残酷之举,包括瓦拉纳瓦塔所发生的一切。此战之中,那些罪业如今就立在你面前,作为你自身行为的报应。”
Verse 44
द्रौपदी च परिक्लिष्टा सभामध्ये रजस्वला । द्यूते यद् विजितो राजा शकुनेरबुद्धिनिश्चयात्,“दुरात्मन्! तूने भरी सभामें रजस्वला द्रौपदीको क्लेश पहुँचाया, शकुनिकी सलाह लेकर राजा युधिष्ठिरको कपटपूर्वक जूएमें हराया तथा निरपराध दुन्तीपुत्रोंपर दूसरे-दूसरे जो पाप एवं अत्याचार किये थे, उन सबका महान् अशुभ फल आज तू अपनी आँखों देख ले
三阇耶说道:“而德劳帕蒂,身心困苦,且正值经期,却在王廷大会之中遭受凌辱;国王(坚战)又因沙恭尼精心筹谋的恶念,在掷骰赌局中被击败。你今日当亲眼目睹那等罪行沉重而不祥的果报——你如何在满朝众目之下折辱德劳帕蒂,如何依沙恭尼之计以欺诈胜过国王,又如何对无辜的般度之子犯下更多罪孽与暴行。”
Verse 45
यानि चान्यानि दुष्टात्मन् पापानि कृतवानसि । अनाग:सु च पार्थेषु तस्य पश्य महत् फलम्,“दुरात्मन्! तूने भरी सभामें रजस्वला द्रौपदीको क्लेश पहुँचाया, शकुनिकी सलाह लेकर राजा युधिष्ठिरको कपटपूर्वक जूएमें हराया तथा निरपराध दुन्तीपुत्रोंपर दूसरे-दूसरे जो पाप एवं अत्याचार किये थे, उन सबका महान् अशुभ फल आज तू अपनी आँखों देख ले
三阇耶说道:“恶心之人啊,且看那巨大的后果——你所犯下的诸多罪孽,以及你加诸于无辜的普利塔之子的一切不义。如今就用你自己的眼睛,看看这些行为广大而苦涩的果实吧。”
Verse 46
त्वत्कृते निहत: शेते शरतल्पे महायशा: । गाज्नेयो भरतश्रेष्ठ: सर्वेषां न: पितामह:,“तेरे ही कारण हम सब लोगोंके पितामह महायशस्वी गंगानन्दन भरतश्रेष्ठ भीष्मजी आज शरशय्यापर पड़े हुए हैं
三阇耶说道:“皆因你之故,我们那位声名赫赫的祖父毗湿摩——恒河之子、婆罗多族中最卓越者——如今被杀,卧于箭床之上。他是我们众人的家长。”
Verse 47
हतो द्रोणश्न॒ कर्णश्ष॒ हतः शल्य: प्रतापवान् । वैरस्य चादिकर्तासौ शकुनिर्निहतो रणे,“तेरी ही करतूतोंसे आचार्य द्रोण, कर्ण, प्रतापी शल्य तथा वैरका आदिस्रष्टा वह शकुनि >-ये सभी रणभूमिमें मारे गये हैं
三阇耶说道:“德罗那已被诛,迦尔纳亦然;英勇的沙利耶也已陨落。至于沙昆尼——这场仇怨的始作俑者——亦在战阵中被杀。”
Verse 48
भ्रातरस्ते हता: शूरा: पुत्राश्न सहसैनिका: । राजानश्व हता: शूरा: समरेष्वनिवर्तिन:,'तेरे भाई, शूरवीर पुत्र, सैनिक तथा युद्धमें पीठ न दिखानेवाले अन्य बहुत-से शौर्यसम्पन्न नरेश भी मृत्युके अधीन हो गये हैं
三阇耶说道:“你的兄弟们已被杀——皆是勇士;你的儿子们也同他们的军队一道覆灭。还有许多战王,临阵不退、从不背战而走,也都倒在死神的权柄之下。”
Verse 49
एते चान्ये च निहता बहव: क्षत्रियर्षभा: । प्रातिकामी तथा पापो द्रौपद्या: क्लेशकृद्धतः,'ये तथा दूसरे बहुसंख्यक क्षत्रियशिरोमणि वीर मार डाले गये हैं। द्रौपदीको क्लेश पहुँचानेवाले पापी प्रातिकामीका भी वध हो चुका है
三阇耶说道:“这些人,以及许多其他人——刹帝利中的雄牛般英雄——都已被杀。普拉提迦弥亦然——那因加害德劳帕蒂而臭名昭著的罪人——也已被诛。”
Verse 50
अवशिष्टस्त्वमेवैक: कुलघ्नो5धमपूरुष: । त्वामप्यद्य हनिष्यामि गदया नात्र संशय:,“अब इस वंशका नाश करनेवाला नराधम एकमात्र तू ही बच गया है। आज इस गदासे तुझे भी मार डालूगा; इसमें संशय नहीं है
三阇耶说道:“如今只剩你一人——卑劣之徒,灭绝自家宗族者。今日我也必以此钉锤将你击毙;毫无疑问。”
Verse 51
अद्य तेडहं रणे दर्प सर्व नाशयिता नृप । राज्याशां विपुलां राजन् पाण्डवेषु च दुष्कृतम्,“नरेश्वर! आज रणभूमिमें मैं तेरा सारा घमंड चूर्ण कर दूँगा। राजन! तेरे मनमें राज्य पानेकी जो बड़ी भारी लालसा है, उसका तथा पाण्डवोंपर तेरे द्वारा किये जानेवाले अत्याचारोंका भी अन्त कर डालूँगा'
三阇耶说道:“今日,大王,在战场上我必粉碎你的一切傲慢。并且,君主啊,我将终结你对王权那无边的贪求,也将终结你对般度五子所犯下的罪恶。”
Verse 52
दुर्योधन उवाच कि कत्थितेन बहुना युद्धयस्वाद्य मया सह । अद्य तेडहं विनेष्यामि युद्धश्रद्धां वकोदर,दुर्योधन बोला--वृकोदर! बहुत बढ़-बढ़कर बातें बनानेसे क्या लाभ? आज मेरे साथ भिड़ तो सही। मैं युद्धका तेरा सारा हौसला मिटा दूँगा
难敌说道:“何必夸夸其谈?今日就与我交战。今日,弗利阔达罗啊,我要摧毁你在战斗中的自信。”
Verse 53
साहसं कृतवांस्त्वं तु हानुक्रोशान्नपोत्तम । 'भरतभूषण! अब हमलोग अपना कार्य कैसे सिद्ध कर सकते हैं? नृपश्रेष्ठी आपने दयावश यह दु:साहसपूर्ण कार्य कर डाला है,कि न पश्यसि मां पाप गदायुद्धे व्यवस्थितम् । हिमवच्छिखराकारां प्रगृह् महतीं गदाम् पापी! क्या तू देखता नहीं कि मैं हिमालयके शिखरकी भाँति विशाल गदा हाथमें लेकर युद्धके लिये खड़ा हूँ
三阇耶说道:“诸王之最啊,你因不合时宜的怜悯而行事鲁莽。如今我们如何成就所图?罪人哪,你难道看不见我已为棍战而立——手执巨大的铁棍,巍然如喜马拉雅之峰?”
Verse 54
गदिनं कोड्द्य मां पाप हन्तुमुत्सहते रिपु: । न्यायतो युद्धयमानश्न देवेष्वपि पुरन्दर:,ओ पापी! आज कौन ऐसा शत्रु है, जो मेरे हाथमें गदा रहते हुए भी मुझे मार सके। न्यायपूर्वक युद्ध करते हुए देवताओंके राजा इन्द्र भी मुझे परास्त नहीं कर सकते
难敌说道:“卑鄙之徒!今日在我的敌人中,谁敢在我手持铁棍之时杀我?若按‘正当’与规矩而战,便是天帝破城者(因陀罗)也不能胜我。”
Verse 55
मा वृथा गर्ज कौन्तेय शारदा भ्रमिवाजलम् | दर्शयस्व बल॑ युद्धे यावत् तत् तेडद्य विद्यते,कुन्तीपुत्र! शरद-ऋतुके निर्जल मेघकी भाँति व्यर्थ गर्जना न कर। आज तेरे पास जितना बल हो, वह सब युद्धमें दिखा
难敌说道:“昆蒂之子啊,莫作徒然的咆哮——如秋云雷鸣却无雨。今日就在战场上,尽显你所剩的一切力量吧。”
Verse 56
तस्य तदू वचन श्रुत्वा पाण्डवा: सहसृज्जया: । सर्वे सम्पूजयामासुस्तद्वव्ो विजिगीषव:,दुर्योधनका यह वचन सुनकर विजयकी इच्छा रखनेवाले समस्त पाण्डवों और सूंजयोंने भी उसकी बड़ी सराहना की
众人听罢他的话,般度五子与斯林迦耶诸将——皆志在取胜——一致向那番言辞致敬称颂,承认其论断之力与用意,正映照出战争中法(dharma)所承受的道德张力。
Verse 57
उन्मत्तमिव मातज्ुं तलशब्देन मानवा: । भूय: संहर्षयामासू राजन् दुर्योधनं नृपम्,राजन! जैसे मतवाले हाथीको मनुष्य ताली बजाकर कुपित कर देते हैं, उसी प्रकार उन्होंने बारंबार ताल ठोककर राजा दुर्योधनके युद्धविषयक हर्ष और उत्साहको बढ़ाया
大王啊,正如人们以震耳的拍掌声挑动发情的狂象,使其愈发暴躁;他们也一再击掌,以那喧嚣之声更添都利约陀那王的战意欢腾与好战之心——此喻昭示:众口的喝彩,足以在法(dharma)的边界上滋养鲁莽的傲慢。
Verse 58
बृंहन्ति कुञ्जरास्तत्र हया ह्रेषन्ति चासकृत् । शस्त्राणि सम्प्रदीप्यन्ते पाण्डवानां जयैषिणाम्,उस समय वहाँ विजयाभिलाषी पाण्डवोंके हाथी बारंबार चिग्घाड़ने और घोड़े हिनहिनाने लगे। साथ ही उनके अस्त्र-शस्त्र दीप्तिसे प्रकाशित हो उठे
都利约陀那说道:“在那里,求胜的般度军象频频长鸣,战马也一再嘶叫;与此同时,他们的兵刃迸发出耀目的光辉——这是战意再起的凶兆,正当此役在道义与谋略上的赌注愈发紧迫之时。”
Verse 63
ऋते वृकोदरात् पार्थात् स च नातिकृतश्रम: । “मैं कुन्तीपुत्र भीमसेनके सिवा, दूसरे किसीको ऐसा नहीं देखता, जो गदायुद्धमें दुर्योधनका सामना कर सके, परंतु भीमसेनने भी अधिक परिश्रम नहीं किया है
三阇耶说道:“除去弗利阔达罗·毗摩塞那——普利塔(昆蒂)之子——我看无人能在棍棒(钉锤)决斗中真正与都利约陀那抗衡;而即便是毗摩,也尚未被迫到筋疲力尽。”
Verse 73
विषमं शकुनेश्वैव तव चैव विशाम्पते । “इस समय आपने पहलेके समान ही पुनः यह जूएका खेल आरम्भ कर दिया है। प्रजानाथ! आपका यह जूआ शकुनिके जूएसे कहीं अधिक भयंकर है
三阇耶说道:“民众之主啊,你如今所下的这盘棋凶险无比——比沙昆尼的赌局更为毁灭。正如从前,你又一次开启了同样的‘掷骰之戏’,把灾祸招向你的国土,也招向你自己的家族。”
Verse 96
न्यस्तश्नात्मा सुविषमे कृच्छमापादिता वयम् । “अतः महाराज! आपने अपने शत्रुको समान मार्गपर ला दिया है। अपने-आपको तो भारी संकटमें फँसाया ही है, हमलोगोंको भी भारी कठिनाईमें डाल दिया है
三阇耶说道:“我们的力量与镇定仿佛都已放下,被逼入极其险恶的困境。因此,大王啊,你使你的敌人与你站在同一等势之上。你不仅把自己投入深重的危机,也把我们众人抛入严酷的艰难之中。”
Verse 163
अत्यन्तवनवासाय सृष्टा भैक्ष्याय वा पुन: । 'फिर भी आपने बारंबार कहा है कि “तुम हमलोगोंमेंसे एकको भी मारकर राजा हो जाओ।/ निश्चय ही राजा पाण्डु और कुन्तीदेवीकी संतान राज्य भोगनेकी अधिकारिणी नहीं है। विधाताने इसे अनन्त कालतक वनवास करने अथवा भीख माँगनेके लिये ही पैदा किया है!
三阇耶说道:“他们被造出,只配永远住在森林里——否则也不过是靠乞食度日。”此语极其刻薄轻蔑,用以否认般度子孙对王权的正当份额,把他们的命运描绘成流放与匮乏,而非君临与统治。
Verse 176
अद्य पारं गमिष्यामि वैरस्य भृशदुर्गमम् । यह सुनकर भीमसेन बोले--मधुसूदन! आप विषाद न करें। यदुनन्दन! मैं आज वैरकी उस अन्तिम सीमापर पहुँच जाऊँगा, जहाँ जाना दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है
听罢,毗摩塞那说道:“摩度苏陀那啊,莫要忧伤。雅度之子啊,今日我必渡过这仇怨之海那极难抵达的彼岸——抵达那最后的边界,旁人几乎无法到达之处。”
Verse 183
विजयो वै ध्रुव: कृष्ण धर्मराजस्य दृश्यते । श्रीकृष्ण! इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि मैं युद्धमें सुयोधनको मार डालूँगा। मुझे तो धर्मराजकी निश्चय ही विजय दिखायी देती है
毗摩说道:“噢,奎师那,达摩罗阇的胜利已然注定。我毫无一丝疑虑:在这场战争中,我必击杀苏约陀那。在我眼前,达摩罗阇的凯旋清清楚楚。”
Verse 223
हृष्ट: सम्पूजयामास वचन चेदमब्रवीत् | संजय कहते हैं--महाराज! भीमसेनने जब ऐसी बात कही, तब भगवान् श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न होकर उनकी प्रशंसा करने लगे और इस प्रकार बोले--
三阇耶说道:“大王啊!毗摩塞那说出这番话后,世尊室利·奎师那大为欢喜,热切地嘉许并称赞他,随后说道——”
Verse 256
त्वामासाद्य महायुद्धे निहता: पाण्डुनन्दन । “तुमने कितने ही राजाओं, राजकुमारों और गजराजोंको मार गिराया है। पाण्डुनन्दन! कलिंग, मगध, प्राच्य, गान्धार और कुरुदेशके योद्धा भी इस महायुद्धमें तुम्हारे सामने आकर कालके गालमें चले गये हैं
三阇耶说道:“噢,般度之子!在这场大决战中,凡与你迎面相逢者,多有丧命。你击倒了无数国王、王子与威猛战象;而迦陵伽、摩揭陀、东方诸族(普罗恰)、犍陀罗以及俱卢之地的勇士们,也在战场上与你对阵,尽皆落入死神之颚。”
Verse 283
कृती च बलवांश्वैव युद्धशौण्डश्न नित्यदा । 'किंतु पार्थ! तुम्हें दुर्योधनके साथ सदा प्रयत्नपूर्वक युद्ध करना चाहिये; क्योंकि वह अभ्यासकुशल, बलवान् और युद्धकी कलामें निरन्तर चतुर है'
三阇耶说道:“他能干而强壮,且常年沉浸战阵,久经沙场。因此,噢,帕尔塔啊,你必须以持久的努力与都利约陀那交战;因为他由操练而成,力大无比,并且不断精通兵战之艺。”
Verse 2636
धर्मराजाय कौन्तेय यथा विष्णु: शचीपते: । “कुन्तीकुमार! जैसे भगवान् विष्णुने शचीपति इन्द्रको त्रिलोकीका राज्य प्रदान किया था, उसी प्रकार तुम भी दुर्योधनका वध करके समुद्रोंसहित यह सारी पृथ्वी धर्मराज युधिष्ठिरको समर्पित कर दो
三阇耶说道:“噢,昆蒂之子!正如往昔毗湿奴赐予舍契之主因陀罗以三界之王权,你也应当如此——诛杀都利约陀那之后,将这被大海环绕的整个大地,奉献给法王由提施提罗。”
Verse 2736
त्वमस्य सक्थिनी भड्वक्त्वा प्रतिज्ञां पालयिष्यसि । “अवश्य ही रणभूमिमें तुमसे टक्कर लेकर पापी दुर्योधन नष्ट हो जायगा और तुम उसकी दोनों जाँघें तोड़कर अपनी प्रतिज्ञाका पालन करोगे
三阇耶说道:“你必定会以击碎他的双腿大腿来完成你的誓言。因为在战场上,那罪恶的都利约陀那一旦与你交锋,必将灭亡;而你以粉碎他两条大腿,便能守住你庄严的誓约。”
A guru arrives to witness disciples in a terminal confrontation: the tension lies between impartial evaluation of technique/propriety and the emotional weight of mentorship when pupils stand on opposing sides.
Even under extreme political stress, orderly conduct—greeting elders, reciprocating honor, and observing protocol—functions as a form of governance that preserves legitimacy and collective restraint.
No explicit phalaśruti appears in the provided verses; the meta-significance is conveyed narratively through framing (Saṃjaya’s report) and symbolic imagery of Balarāma’s central, luminous seating before the engagement.