
Brahmopadeśa: Adhipatitva-kathana, Dharma-lakṣaṇa, and Kṣetra–Kṣetrajña Viveka (Book 14, Chapter 43)
Upa-parva: Āśvamedhika-parva — Brahmopadeśa on Dharma-lakṣaṇa and Kṣetrajña (Chapter 43 context unit)
Brahmā enumerates representative ‘chiefs’ or archetypal exemplars across categories (social orders, animals, trees, mountains, celestial bodies, deities), using adhipati/rāja language to map an ordered cosmos. The discourse then turns normative: dharma is defined by ahiṃsā, while adharma is defined by hiṃsā; kings are urged to protect dvijas and sādhus, with stated consequences for neglect versus protection. Next, the text supplies lakṣaṇas of elements and faculties—ākāśa as sound, vāyu as touch, waters as taste, earth as smell—alongside speech, mind (cintā), and buddhi (vyavasāya/decisive determination). It advances toward a sāṃkhya-leaning metaphysics: yoga is characterized by pravṛtti (disciplined engagement), jñāna by saṃnyāsa-lakṣaṇa, and liberation is described as transcending dualities. The latter portion distinguishes avyakta kṣetra (the field where guṇas arise and dissolve) from the nirguṇa kṣetrajña (knower), portrayed as unmarked (aliṅga), steady, and beyond ritualized self-assertion; the teaching culminates in the recommendation to relinquish attachment to guṇas and enter the standpoint of the kṣetrajña through knowledge and renunciation.
Chapter Arc: गुरु-शिष्य संवाद में ब्रह्माजी की वाणी से जगत के ‘अधिपतियों’ का क्रम खुलता है—चराचर प्राणियों, वृक्षों, ग्रह-नक्षत्रों और समाज-व्यवस्थाओं तक, मानो सृष्टि का शासन-मानचित्र सामने रख दिया गया हो। → सूची मात्र नहीं, एक सूक्ष्म संकेत उभरता है: बाह्य जगत में अधिपति-व्यवस्था जितनी स्पष्ट है, उतनी ही कठिन है भीतर के राज्य (मन-बुद्धि) का शासन। योग, ज्ञान और संन्यास के लक्षणों पर आते-आते प्रश्न तीखा होता है—किस मार्ग से मनुष्य द्वन्द्व, जरा और मृत्यु को लाँघे? → निर्णायक उद्घोष: ‘प्रवृत्तिलक्षणो योगो, ज्ञानं संन्यासलक्षणम्’—बुद्धिमान को ज्ञान को अग्रणी रखकर संन्यास (वैराग्य/त्याग-बुद्धि) की ओर झुकना चाहिए; ज्ञानयुक्त संन्यासी द्वन्द्वातीत होकर तम, मृत्यु और जरा को पार करता है। → अध्याय मन-बुद्धि के भेद-लक्षणों (चिन्तन मन का, निश्चय बुद्धि का) और धर्म-रक्षा से राज्य-कल्याण की परिणति (श्रेष्ठ पुरुषों की रक्षा करने वाले नरेश का लोक में आनंद) के साथ स्थिर निष्कर्ष देता है—बाह्य शासन का आदर्श भीतर की साधना से पुष्ट होता है।
Verse 1
>> ह््न हि कमी त्रिचत्वारिशो<् ध्याय: चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता ब्रह्मोवाच मनुष्याणां तु राजन्य: क्षत्रियो मध्यमो गुण: । कुण्जरो वाहनानां च सिंहश्लारण्यवासिनाम्,ब्रह्माजीनी कहा--महर्षियो! मनुष्योंका राजा तो रजोगुणसे युक्त क्षत्रिय है। सवारियोंमें हाथी, बनवासियोंमें सिंह, समस्त पशुओंमें भेड़ और बिलमें रहनेवालोंमें सर्प, गौओंमें बैल एवं स्त्रियोंमें पुरुष प्रधान है
梵天说道:“诸位大圣仙啊!在人类之中,执掌王权的种姓——刹帝利(Kṣatriya)——主要以‘罗阇’之性(rajas,行动与统御之驱力)为其特征。诸乘与载具之中,大象为首;而居于荒林野地的众生之中,狮子最为尊胜。”
Verse 2
अवि: पशाूनां सर्वेषामहिस्तु बिलवासिनाम् | गवां गोवृषभश्चैव स्त्रीणां पुरुष एव च,ब्रह्माजीनी कहा--महर्षियो! मनुष्योंका राजा तो रजोगुणसे युक्त क्षत्रिय है। सवारियोंमें हाथी, बनवासियोंमें सिंह, समस्त पशुओंमें भेड़ और बिलमें रहनेवालोंमें सर्प, गौओंमें बैल एवं स्त्रियोंमें पुरुष प्रधान है
风神伐由说道:“在一切家畜之中,羊为首;在穴居之类中,蛇为首。于牛群之中,公牛最为卓越;而于女子之中,男子依传统被视为主位。”
Verse 3
न्यग्रोधो जम्बुवृक्षश्ष पिप्पल: शाल्मलिस्तथा । शिंशपा मेषशृज्ञश्न तथा कीचकवेणव:
风神伐由说道:“尼耶伽罗陀(榕树/菩提榕)、阎浮树、毕波罗树(aśvattha)、娑罗摩梨;又有尸摩舍波、梅沙室陵吉,以及奇恰迦竹(kīcaka-veṇu)。”
Verse 4
हिमवान् पारियात्रश्न सह्यो विन्ध्यस्त्रिकूटवान्,हिमवान्, पारियात्र, सहा, विन्ध्य, त्रिकूट, श्वेत, नील, भास, कोष्ठवान् पर्वत, गुरुस्कन्ध, महेन्द्र और माल्यवान् पर्वत--ये सब पर्वत पर्वतोंके अधिपति हैं। गणोंके मरुद्गण, ग्रहोंके सूर्य और नक्षत्रोंके चन्द्रमा अधिपति हैं
风神伐由宣示自然与宇宙秩序中的尊卑: “在群山之中,喜马梵(Himavān)、帕里亚特拉(Pāriyātra)、萨希耶(Sahya)、温陀耶(Vindhya)、特里库塔(Trikūṭa)、湿吠多(Śveta)、尼罗(Nīla)、婆娑(Bhāsa)、拘湿吒梵(Koṣṭhavān)、古鲁斯堪陀(Guruskandha)、摩诃因陀罗(Mahendra)与摩利耶梵(Mālyavān),皆被称为山中王者。同样,在诸天众中,摩鲁特众(Maruts)为首;在诸行星中,太阳为主;在诸月宿(nakṣatra)中,月亮居于统摄之位。”
Verse 5
श्वैतो नीलक्ष भासश्न कोष्ठवांश्रैव पर्वत: । गुरुस्कन्धो महेन्द्रश्न माल्यवान् पर्वतस्तथा,हिमवान्, पारियात्र, सहा, विन्ध्य, त्रिकूट, श्वेत, नील, भास, कोष्ठवान् पर्वत, गुरुस्कन्ध, महेन्द्र और माल्यवान् पर्वत--ये सब पर्वत पर्वतोंके अधिपति हैं। गणोंके मरुद्गण, ग्रहोंके सूर्य और नक्षत्रोंके चन्द्रमा अधिपति हैं
风神伐由说道:“雪山Śvaita、青山Nīla、Bhāsa与Koṣṭhavān;又有Guru-skandha、Mahendra以及Mālyavān山;并且还有Himavān、Pāriyātra、Sahya、Vindhya、Trikūṭa、Śveta、Nīla、Bhāsa与Koṣṭhavān——这些皆为群山之主。在诸神众(gaṇa)之中,马鲁特众(Maruts)为首;在诸行星(graha)之中,太阳为首;在诸月宿之中,月亮为首。”
Verse 6
एते पर्वतराजानो गणानां मरुतस्तथा । सूर्यो ग्रहाणामधिपो नक्षत्राणां च चन्द्रमा:,हिमवान्, पारियात्र, सहा, विन्ध्य, त्रिकूट, श्वेत, नील, भास, कोष्ठवान् पर्वत, गुरुस्कन्ध, महेन्द्र और माल्यवान् पर्वत--ये सब पर्वत पर्वतोंके अधिपति हैं। गणोंके मरुद्गण, ग्रहोंके सूर्य और नक्षत्रोंके चन्द्रमा अधिपति हैं
风神伐由说道:“这些是群山之中的王者;在诸神众(gaṇa)之中,马鲁特众为首。在诸行星(graha)之中,太阳为主;在诸星宿之中,月亮为主。”
Verse 7
यम: पितृणामधिप: सरितामथ सागर: । अम्भसां वरुणो राजा मरुतामिन्द्र उच्यते,यमराज पितरोंके और समुद्र सरिताओंके स्वामी हैं। वरुण जलके और इन्द्र मरुदगणोंके स्वामी कहे जाते हैं
风神伐由说道:“阎摩(Yama)是祖灵Pitṛs之主。大海是诸河之主。伐楼那(Varuṇa)被称为水之王,而因陀罗(Indra)被说为马鲁特众(Maruts)之主。”
Verse 8
अरको<धिपतिरुष्णानां ज्योतिषामिन्दुरुच्यते । अग्निर्भूतपतिर्नित्यं ब्राह्मणानां बृहस्पति:,उष्णप्रभाके अधिपति सूर्य हैं और ताराओंके स्वामी चन्द्रमा कहे गये हैं। भूतोंके नित्य अधीश्वर अग्निदेव हैं तथा ब्राह्मणोंके स्वामी बृहस्पति हैं
风神伐由说道:“在一切热源之中,太阳被宣为主宰;在诸光明体之中,月亮被称为君主。阿耆尼(Agni)恒为众生之主,而布里哈斯帕提(Bṛhaspati)为婆罗门(Brāhmaṇas)之主。”
Verse 9
ओषधीनां पति: सोमो विष्णुर्बलवतां वर: । त्वष्टाधिराजो रूपाणां पशूनामीश्वर: शिव:,ओषधियोंके स्वामी सोम हैं तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ विष्णु हैं। रूपोंके अधिपति सूर्य और पशुओंके ईश्वर भगवान् शिव हैं
风神伐由说道:“苏摩(Soma)为药草之主;毗湿奴(Viṣṇu)为强者之最。特瓦什特里(Tvaṣṭṛ)为诸形之君,而湿婆(Śiva)为群兽之主。”
Verse 10
दीक्षितानां तथा यज्ञो दैवानां मघवा तथा । दिशामुदीची विप्राणां सोमो राजा प्रतापवान्,दीक्षा ग्रहण करनेवालोंके यज्ञ और देवताओंके इन्द्र अधिपति हैं। दिशाओंकी स्वामिनी उत्तर दिशा है एवं ब्राह्मणोंके राजा प्रतापी सोम हैं
风神伐由说道:“在受灌顶持戒者之中,主宰者乃祭祀(Yajña)本身;在诸天之中,摩伽婆(因陀罗)为主。于诸方之中,北方执掌尊位;于婆罗门之中,威德赫赫的苏摩王(月神)被奉为首领。”
Verse 11
कुबेर: सर्वरत्नानां देवतानां पुरंदर: । एव भूताधिप: सर्ग: प्रजानां च प्रजापति:,सब प्रकारके रत्नोंके स्वामी कुबेर, देवताओंके स्वामी इन्द्र और प्रजाओंके स्वामी प्रजापति हैं। यह भूतोंके अधिपतियोंका सर्ग है
风神伐由说道:“俱毗罗为一切珍宝之主;破城者(因陀罗)为诸天之主;而生主(Prajāpati)为众生之主。是故在造化之中,诸有情各有其所辖之主宰。”
Verse 12
सर्वेषामेव भूतानामहं ब्रह्ममयो महान् । भूतं परतरं मत्तो विष्णोर्वापि न विद्यते,मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंका महान् अधीश्वर और ब्रह्ममय हूँ। मुझसे अथवा विष्णुसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है
风神伐由说道:“我乃一切众生之大主,遍满梵(Brahman)之性。世间并无任何存在高于我——甚至也无高于毗湿奴者。”
Verse 13
राजाधिराज: सर्वेषां विष्णुब्रह्ममयों महान् । ईश्वरत्वं विजानी ध्वं कर्तारमकृतं हरिम,ब्रह्ममय महाविष्णु ही सबके राजाधिराज हैं, उन्हींको ईश्वर समझना चाहिये। वे श्रीहरि सबके कर्ता हैं, किंतु उनका कोई कर्ता नहीं है
风神伐由说道:“那伟大的主宰——为一切众生之王上之王——其性遍满毗湿奴与梵(Brahman),当被认作真正的至尊。须知哈利为万行之作者,而其自身不由他造,亦无造作者。”
Verse 14
नरकिन्नरयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् । देवदानवनागानां सर्वेषामीश्वरो हि सः,वे विष्णु ही मनुष्य, किन्नर, यक्ष, गन्धर्व, सर्प, राक्षस, देव, दानव और नाग सबके अधीश्वर हैं
风神伐由说道:“唯有他确是万类之主——人类、紧那罗、夜叉、乾闼婆、诸蛇、罗刹、诸天、达那婆以及那伽,皆在其统御之下。”
Verse 15
भगदेवानुयातानां सर्वासां वामलोचना । माहेश्वरी महादेवी प्रोच्यते पार्वती हि सा,कामी पुरुष जिनके पीछे फिरते हैं, उन सबमें सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्री प्रधान है। एवं जो माहेश्वरी, महादेवी और पार्वती नामसे कही जाती हैं, उन मंगलमयी उमादेवीको स्त्रियोंमें सर्वोत्तम जानो तथा रमण करने योग्य स्त्रियोंमें स्वर्णविभूषित अप्सराएँ प्रधान हैं
风神伐由说道:“在一切为欲望之人所追逐的女子之中,最为尊上的,是那双目清丽者——人们称她为摩诃湿婆利(Māheśvarī)、大天女(Mahādevī),亦即帕尔瓦蒂(Pārvatī)。当知吉祥的乌玛女神(Umā-devī)为女子之最;而在为享乐而被追求的女子之中,佩戴金饰的天女阿普萨拉(Apsaras)最为出众。”
Verse 16
उमां देवीं विजानी ध्वं नारीणामुत्तमां शुभाम् । रतीनां वसुमत्यस्तु स्त्रीणामप्सरसस्तथा,कामी पुरुष जिनके पीछे फिरते हैं, उन सबमें सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्री प्रधान है। एवं जो माहेश्वरी, महादेवी और पार्वती नामसे कही जाती हैं, उन मंगलमयी उमादेवीको स्त्रियोंमें सर्वोत्तम जानो तथा रमण करने योग्य स्त्रियोंमें स्वर्णविभूषित अप्सराएँ प्रधान हैं
风神伐由说道:“当识乌玛女神(Umā-devī)——吉祥而为女子之中至上者。至于作为欢娱之所缘的女子,则以富丽装饰的天女阿普萨拉(Apsaras)为首。”
Verse 17
धर्मकामाश्ष राजानो ब्राह्मणा धर्मसेतव: । तस्माद् राजा द्विजातीनां प्रयतेत सम रक्षणे,राजा धर्म-पालनके इच्छुक होते हैं और ब्राह्मण धर्मके सेतु हैं। अत: राजाको चाहिये कि वह सदा ब्राह्मणोंकी रक्षाका प्रयत्न करे
风神伐由说道:“诸王当以达摩与正当之旨为志;婆罗门乃维系达摩之桥梁。故王者应恒常竭力护持二次生者(再生族);护彼等,即护达摩之绵延不绝。”
Verse 18
राज्ञां हि विषये येषामवसीदन्ति साधव: । हीनास्ते स्वगुणै: सर्व: प्रेत्य चोन््मार्गगामिन:,जिन राजाओंके राज्यमें श्रेष्ठ पुरुषोंको कष्ट होता है, वे अपने समस्त राजोचित गुणोंसे हीन हो जाते और मरनेके बाद नीच गतिको प्राप्त होते हैं
风神伐由说道:“凡其国土之中使贤善之士陷于困厄的君王,必失尽其王者之德。其身后亦将堕入卑下之趣,因其已偏离正道而行。”
Verse 19
राज्ञां हि विषये येषां साधव: परिरक्षिता: । तेडस्मिल्लोके प्रमोदन्ते सुखं प्रेत्य च भुज्जते
凡其国土之中护持正直贤善之人的君王,今生便得欢悦;身后亦同享安乐。
Verse 20
अत ऊर्ध्व॑ प्रवक्ष्यामि नियतं धर्मलक्षणम्,अब मैं सबके नियत धर्मके लक्षणोंका वर्णन करता हूँ। अहिंसा सबसे श्रेष्ठ धर्म है और हिंसा अधर्मका लक्षण (स्वरूप) है। प्रकाश देवताओंका और यज्ञ आदि कर्म मनुष्योंका लक्षण है
风神伐由说道:“如今我将宣说辨识正法(dharma)的既定标志。不害(ahiṃsā)为至上之法,而暴力则是非法(adharma)的明证。光辉是诸天的特征;祭祀(yajña)及其相应诸业,则是人类的特征与本分之行。”
Verse 21
अहिंसा परमो धर्मो हिंसा चाधर्मलक्षणा । प्रकाशलक्षणा देवा मनुष्या: कर्मलक्षणा:,अब मैं सबके नियत धर्मके लक्षणोंका वर्णन करता हूँ। अहिंसा सबसे श्रेष्ठ धर्म है और हिंसा अधर्मका लक्षण (स्वरूप) है। प्रकाश देवताओंका और यज्ञ आदि कर्म मनुष्योंका लक्षण है
风神伐由说道:“我今将说明一切众生既定本分之标志。不害为至上之法,暴力为非法之相。诸天以光辉为性;人类以行作为性——尤以祭祀(yajña)与尽责之业为然。”
Verse 22
शब्दलक्षणमाकाशं वायुस्तु स्पर्शलक्षण: । ज्योतिषां लक्षणं रूपमापश्ष रसलक्षणा:,शब्द आकाशका, वायु स्पर्शका, रूप तेजका और रस जलका लक्षण है
风神伐由说道:“声为虚空(ākāśa)之相;触为风(vāyu)之相;色相为光火(tejas)之相;味为水(āpas)之相。”
Verse 23
धारिणी सर्वभूतानां पृथिवी गन्धलक्षणा । स्वरव्यज्जनसंस्कारा भारती शब्दलक्षणा,गन्ध सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली पृथ्वीका लक्षण है तथा स्वर-व्यंजनकी शुद्धिसे युक्त वाणीका लक्षण शब्द है
风神伐由说道:“大地能荷载一切众生,其相在于香(嗅)。言语(Bhāratī)由元音与辅音的正当发音而得以净炼,其相在于声。”
Verse 24
मनसो लक्षण चिन्ता चिन्तोक्ता बुद्धिलक्षणा । मनसा चिन्तितानर्थान् बुद्धया चेह व्यवस्यति
风神伐由说道:“心(manas)的分别作用在于‘思’——表现为念。慧(buddhi)的分别作用在于‘决断’:在此,慧能对心所仅仅构想的意义与目标,作出果断的判定。”
Verse 25
लक्षणं मनसो ध्यानमव्यक्त साधुलक्षणम्,मनका लक्षण ध्यान है और श्रेष्ठ पुरुषका लक्षण बाहरसे व्यक्त नहीं होता (वह स्वसंवेद्य हुआ करता है)। योगका लक्षण प्रवृति और संन्यासका लक्षण ज्ञान है। इसलिये बुद्धिमान पुरुषको चाहिये कि वह ज्ञानका आश्रय लेकर यहाँ संन्यास ग्रहण करे
风神婆由说道:“心之标志在于禅观;真正贤善之人的标志,并不外露——唯由内在的自证自觉而知。瑜伽之相,在于以纪律投入正当之行;出离(弃世)之相,在于真知。故智者当依止于知,在此时此地,受持出离之道。”
Verse 26
प्रवृत्तिलक्षणो योगो ज्ञानं संन्यासलक्षणम् | तस्माजज्ञानं पुरस्कृत्य संन्यसेदिह बुद्धिमान्,मनका लक्षण ध्यान है और श्रेष्ठ पुरुषका लक्षण बाहरसे व्यक्त नहीं होता (वह स्वसंवेद्य हुआ करता है)। योगका लक्षण प्रवृति और संन्यासका लक्षण ज्ञान है। इसलिये बुद्धिमान पुरुषको चाहिये कि वह ज्ञानका आश्रय लेकर यहाँ संन्यास ग्रहण करे
风神婆由说道:“瑜伽以依法行事(入世之行)为相;出离以真实之知为相。是故智者当以知为先,于此生之中受持出离——以觉悟为根本,而非仅凭外在标记来立弃世之道。”
Verse 27
संन्यासी ज्ञानसंयुक्तः प्राप्रोति परमां गतिम् | अतीतो द्वन्द्मभ्येति तमोमृत्युजरातिग:,ज्ञानयुक्त संन्यासी मौत और बुढ़ापाको लाँचकर सब प्रकारके द्वन्द्दोंसे परे हो अज्ञानान्धकारके पार पहुँचकर परमगतिको प्राप्त होता है
风神婆由说道:“具足真知的出离者,得至无上归趣。既越诸对待之相,便渡过无明之暗;超越死与老,抵达至高境界。”
Verse 28
धर्मलक्षणसंयुक्तमुक्त वो विधिवन्मया । गुणानां ग्रहणं सम्यग् वक्ष्माम्यहमत: परम्,महर्षियो! यह मैंने तुमलोगोंसे लक्षणोंसहित धर्मका विधिवत् वर्णन किया। अब यह बतला रहा हूँ कि किस गुणको किस इन्द्रियसे ठीक-ठीक ग्रहण किया जाता है
风神婆由说道:“诸大圣仙啊!我已依正法次第,为汝等阐明具足标相之法(dharma)。今当更明言:诸种性质(guṇa)各由其相应的感官机能如何如实摄取。”
Verse 29
पार्थिवो यस्तु गन्धो वै घप्राणेन हि स गृहाते । प्राणस्थश्न तथा वायुर्गन्धज्ञाने विधीयते,पृथ्वीका जो गन्ध नामक गुण है, उसका नासिकाके द्वारा ग्रहण होता है और नासिकामें स्थित वायु उस गन्धका अनुभव करानेमें सहायक होती है
风神天说道:“地大之德为香,实由鼻根而取;而住于嗅觉之器官中的命风(普拉那之风),被安置以成就对彼香的了知。”
Verse 30
अपां धातू रसो नित्यं जिद्नया स तु गृहाते । जिद्दास्थश्न तथा सोमो रसज्ञाने विधीयते,जलका स्वाभाविक गुण रस है, जिसको जिद्ल्ाके द्वारा ग्रहण किया जाता है और जिह्लामें स्थित चन्द्रमा उस रसके आस्वादनमें सहायक होता है
风神说道:“味是属水大之永恒精髓,由舌而觉。月神苏摩常住于舌,被任为助缘,使众生得知味、得尝味。”
Verse 31
ज्योतिषश्च गुणो रूप॑ चक्षुषा तच्च गृहाते । चक्षु:स्थश्व॒ सदा55दित्यो रूपज्ञाने विधीयते,तेजका गुण रूप है और वह नेत्रमें स्थित सूर्यदेवताकी सहायतासे नेत्रके द्वारा सदा देखा जाता है
风神说道:“光明为一德性,形色由眼而取。日神恒住于眼,被立为神圣助缘,使形色得以真实了知。”
Verse 32
वायव्यस्तु सदा स्पर्शस्त्वाचा प्रज्ञायते च सः । त्वक्स्थश्वैव सदा वायु: स्पर्शने स विधीयते,वायुका स्वाभाविक गुण स्पर्श है, जिसका त्वचाके द्वारा ज्ञान होता है और त्वचामें स्थित वायुदेव उस स्पर्शका अनुभव करानेमें सहायक होता है
风神说道:“触为风大之常住本性,由皮肤而知。风住于皮肤之中,正是令触觉经验得以成就的作用力。”
Verse 33
आकाश स्य गुणो होष श्रोत्रेण च स गृहाते । श्रोत्रस्थाश्व दिश: सर्वा: शब्दज्ञाने प्रकीर्तिता:,आकाशके गुण शब्दका कानोंके द्वारा ग्रहण होता है और कानमें स्थित सम्पूर्ण दिशाएँ शब्दके श्रवणमें सहायक बतायी गयी हैं
风神说道:“虚空(ākāśa)之别相为声,由耳而取。一切方位住于听根之中,被说为助成对声音的了知。”
Verse 34
मनसश्च गुणश्रिन्ता प्रज्ञया स तु गृहाते । हृदिस्थश्लेतनो धातुर्मनोज्ञाने विधीयते,मनका गुण चिन्तन है, जिसका बुद्धिके द्वारा ग्रहण किया जाता है और हृदयमें स्थित चेतन (आत्मा) मनके चिन्तन-कार्यमें सहायता देता है
风神说道:“心识从事于观念诸德,其观念由慧别(prajñā)而得知。住于心中的觉知本原——内在之我——被安立为助缘,以扶持心之知与思惟。”
Verse 35
बुद्धिरध्यवसायेन ज्ञानेन च महांस्तथा । निश्चित्य ग्रहणाद् व्यक्तमव्यक्तं नात्र संशय:,निश्चयके द्वारा बुद्धिका और ज्ञानके द्वारा महत्तत्त्वका ग्रहण होता है। इनके कार्योंसे ही इनकी सत्ताका निश्चय होता है और इसीसे इन्हें व्यक्त माना जाता है, किंतु वास्तवमें तो अतीन्द्रिय होनेके कारण ये बुद्धि आदि अव्यक्त ही हैं, इसमें संशय नहीं है
风神伐由说道:“凭由决断之定意(adhyavasāya),可把握理智(buddhi);凭由知识,亦能确证大原理(mahat)。它们的存在由其作用而推知,因此被称为‘显现’;然而就真实而言,由于超越诸根诸境,这些——从理智起——仍属‘未显’。对此毫无疑惑。”
Verse 36
एते द्रुमाणां राजानो लोके5स्मिन् नात्र संशय: । बरगद, जामुन, पीपल, सेमल, शीशम, मेषशुंग (मेढ़ासिंगी) और पोले बाँस--ये इस लोकमें वृक्षोंके राजा हैं, इसमें संदेह नहीं है,अलिड्डग्रहणो नित्य: क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मक: । तस्मादलिड्: क्षेत्रज्ञ: केवलं ज्ञानलक्षण: नित्य क्षेत्रज्ञ आत्माका कोई ज्ञापक लिंग नहीं है; क्योंकि वह (स्वयंप्रकाश और) निर्गुण है। अतः: क्षेत्रज्ष अलिंग (किसी विशेष लक्षणसे रहित) है; अतः केवल ज्ञान ही उसका लक्षण (स्वरूप) माना गया है
风神伐由说道:“这些乃此世树木之王,毫无疑问。永恒的‘知田者’(kṣetrajña,真我)不以任何外在标记而被把握,因为祂超越诸质(guṇa)。因此,知田者无可区别之相;唯有纯粹的觉知,才被承认为祂的界定特征。”
Verse 37
अब्यक्तं क्षेत्रमुद्दिष्टं गुणानां प्रभवाप्ययम् । सदा पश्याम्यहं लीनो विजानामि शृणोमि च,गुणोंकी उत्पत्ति और लयके कारणभूत अव्यक्त प्रकृतिको क्षेत्र कहते हैं। मैं उसमें संलग्न होकर सदा उसे जानता और सुनता हूँ
风神伐由说道:“未显者(Prakṛti)被宣说为‘田’(kṣetra),因为它是诸质(guṇa)的生起之源,也是其归灭之处。我安住并融入其中,恒常观见它;我了知它,也聆听(其真理)。”
Verse 38
पुरुषस्तद् विजानीते तस्मात् क्षेत्रज्ञ उच्यते । गुणवृत्तं तथा वृत्तं क्षेत्रज्ञ: परिपश्यति,आत्मा क्षेत्रको जानता है, इसलिये वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है। क्षेत्रज्ष आदि, मध्य और अन्तसे युक्त समस्त उत्पत्तिशील अचेतन गुणोंके कार्यको और उनकी क्रियाको भी भलीभाँति जानता है, किंतु बारंबार उत्पन्न होनेवाले गुण आत्माको नहीं जान पाते
风神伐由说道:“内在之人(puruṣa)知晓那经验之田,因此称为‘知田者’(kṣetrajña)。知田者清明观照诸质(guṇa)的运作及其种种活动。然而诸质虽在变易之域反复生起,却并不能真正认识真我。”
Verse 39
आदिमध्यावसानान्तं सृज्यमानमचेतनम् । न गुणा विदुरात्मानं सृज्यमाना: पुनः पुन:,आत्मा क्षेत्रको जानता है, इसलिये वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है। क्षेत्रज्ष आदि, मध्य और अन्तसे युक्त समस्त उत्पत्तिशील अचेतन गुणोंके कार्यको और उनकी क्रियाको भी भलीभाँति जानता है, किंतु बारंबार उत्पन्न होनेवाले गुण आत्माको नहीं जान पाते
风神伐由说道:“凡所生起者——本性无觉——皆有始、有中、有终。然而真我并不为诸质(guṇa)所知,纵使诸质一再生起亦复如是。反之,知田者(kṣetrajña)清楚了知整个无觉之田——其起源、其作用与其归灭——而诸质终不能领会真我。”
Verse 40
न सत्यं विन्दते वक्षित क्षेत्रज्ञस्त्वेव विन्दति । गुणानां गुणभूतानां यत् परं परमं महत्,जो गुणों और गुणोंके कार्योंसे अत्यन्त परे है, उस परम महान् सत्यस्वरूप क्षेत्रज्ञको कोई नहीं जानता, परंतु वह सबको जानता है
风神(Vāyu)说道:无人能真正了知或尽述那至上实相——“田知者”Kṣetrajña(知田者、内在见证者)——祂全然超越诸guṇa(德性/质性)及由guṇa所生的一切作用。然而,那至大至高之我却遍知一切众生与万事万物。
Verse 41
तस्माद् गुणांश्नव सत्त्वं च परित्यज्येह धर्मवित् | क्षीणदोषो गुणातीत): क्षेत्रज्ञ प्रविशत्यथ,अतः इस लोकमें जिसके दोषोंका क्षय हो गया है, वह गुणातीत धर्मज्ञ पुरुष सत्त्व (बुद्धि) और गुणोंका परित्याग करके क्षेत्रज्ञके शुद्ध स्वरूप परमात्मामें प्रवेश कर जाता है
因此,就在此世,通达法(dharma)者应舍离对诸guṇa的执著——乃至对sattva(清明之性、智性的澄澈力)的执著亦当放下。待过失消磨殆尽,此人超越诸guṇa,便入于Kṣetrajña之清净本相——至上之我。
Verse 42
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,निर्द्धदद्वों निर्ममस्कारो नि:ःस्वाहाकार एव च | अचलकश्चानिकेतत्ष क्षेत्रज्ञ: स परो विभु: क्षेत्रज् सुख-दुखादि द्वन्द्ोंसे रहित, किसीको नमस्कार न करनेवाला, स्वाहाकाररूप यज्ञादि कर्म न करनेवाला, अचल और अनिकेत है। वही महान् विभु है
风神(Vāyu)说道:“田知者”(内在之我)离一切对待二相,如乐与苦;不以依赖而向任何人屈从礼拜;亦不为伴随“svāhā”之祭祀行为所系缚。祂不动而无定所;此Kṣetrajña即至上遍在之主。
Verse 43
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे त्रिचत्वारिंशो 5ध्याय:
至此,《圣摩诃婆罗多》阿湿婆梅陀迦篇(Aśvamedhika Parva)之《阿努歌谛》(Anugītā)部分,师徒对话第四十三章终。
Verse 193
प्राप्रुवन्ति महात्मान इति वित्त द्विजर्षभा: । द्विजवरो! जिनके राज्यमें श्रेष्ठ पुरुषोंकी सब प्रकारसे रक्षा की जाती है, वे महामना नरेश इस लोकमें आनन्दके भागी होते हैं और परलोकमें अक्षय सुख प्राप्त करते हैं, ऐसा समझो
风神(Vāyu)说道:“当知此理,噢诸婆罗门中之最胜者:凡其国中以种种方式护持贤善之士的高怀君王,今世得享安乐,身后更得不坏之福乐。”
Verse 243
बुद्धिह्हि व्यवसायेन लक्ष्यते नात्र संशय: । चिन्तन मनका और निश्चय बुद्धिका लक्षण है; क्योंकि मनुष्य इस जगतमें मनके द्वारा चिन्तन की हुई वस्तुओंका बुद्धिसे ही निश्चय करते हैं, निश्चयके द्वारा ही बुद्धि जाननेमें आती है, इसमें संदेह नहीं है
风神伐由说道:“智(buddhi)以其果断之力而为人所识;此中毫无疑惑。心(manas)可以驰骋于种种思虑与可能,但唯有智才能裁定并安立当取之事。故而,确定与坚决,正是识别智的显著标志。”
The chapter frames the ethical choice as governance through protection and non-harm: rulers must decide whether to uphold ahiṃsā-informed dharma by safeguarding sādhus and dvijas, or fall into adharma characterized by hiṃsā and neglect of moral dependents.
The listener is guided to diagnose reality via lakṣaṇas and to shift identification from guṇa-conditioned processes (kṣetra/avyakta) to the unmarked knower (kṣetrajña), cultivating knowledge and renunciation that culminate in freedom from dualities.
Rather than a formal phalaśruti formula, the chapter embeds outcome-statements: protecting the virtuous yields welfare here and favorable post-mortem results, while knowledge-linked saṃnyāsa leads to the ‘paramā gati’ described as beyond darkness, death, and aging.