Adhyaya 3
Svargarohana ParvaAdhyaya 349 Verses

Adhyaya 3

स्वर्गारोहणपर्व — तृतीयोऽध्यायः (Indra and Dharma’s Consolation; Celestial Gaṅgā Purification)

Upa-parva: Svargārohaṇa (Divine Consolation and Purification Episode)

Vaiśaṃpāyana reports that after Yudhiṣṭhira stands briefly in the prior grim setting, the devas arrive led by Śakra (Indra), alongside Maruts, Vasus, Aśvins, Rudras, Ādityas, Siddhas, and great ṛṣis. With their luminous presence, the infernal markers—Vaitaraṇī, Kūṭaśālmalī, iron cauldrons, and other punitive visions—cease to appear, and an auspicious, fragrant, cooling wind arises. Indra addresses Yudhiṣṭhira with reassurance: the gods are pleased; his success is secured; and the experience of naraka is described as a necessary sight for kings, interpreted through a doctrine of karmic sequencing (some enjoy merit first then suffer, others suffer first then enjoy). Indra further explains that Yudhiṣṭhira’s brief ordeal corresponds to a residual ethical blemish linked to a ‘vyāja’ (pretext/deception) involving Droṇa, and that similar ‘by pretext’ descents applied to his companions. He is invited to behold his allies and even Karṇa established in their proper stations, and to relinquish grief. Dharma then appears in embodied form, explicitly praising Yudhiṣṭhira’s devotion, truthfulness, forbearance, and self-restraint, stating that this is the third and final test, and clarifying that the earlier perception of the brothers’ suffering was a divinely arranged māyā. Indra and Dharma guide him to the celestial Gaṅgā (Ākāśa-Gaṅgā); upon immersion, Yudhiṣṭhira’s human condition falls away, he attains a divine body, becomes free of enmity and distress, and proceeds surrounded by devas and praised by sages.

Chapter Arc: नरक-दर्शन के धुएँ और भय के बीच युधिष्ठिर को अचानक दिव्य प्रकाश का स्पर्श मिलता है—देवगण आते हैं और तमस छँटने लगता है। → युधिष्ठिर के चारों ओर दिखते विकृत शरीर और पीड़ा के दृश्य एक-एक कर अदृश्य होते हैं; तभी साक्षात् धर्म देह धारण कर उपस्थित होते हैं और इस विचित्र अनुभव का अर्थ खोलने लगते हैं—कर्मफल की दो राशियाँ, शुभ-अशुभ, और उनका क्रम। → धर्म युधिष्ठिर को कर्मफल-क्रम का रहस्य सुनाते हैं: कोई पहले नरक भोगकर फिर स्वर्ग पाता है, और कोई पहले स्वर्ग भोगकर फिर नरक—यह क्रम शेष बचे पुण्य-पाप के ‘भोग’ से तय होता है; साथ ही वे बताते हैं कि यह नरक-दर्शन ‘व्याज’ (उपाय/छल) से कराया गया था। → धर्म स्पष्ट करते हैं कि यह परीक्षा और दर्शन युधिष्ठिर के कल्याण हेतु था; फिर वे युधिष्ठिर को दिखाते हैं कि युद्ध में मारे गए अनेक राजा और योद्धा पापमुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त हो चुके हैं। अंततः युधिष्ठिर की सिद्धि और अक्षय लोकों की प्राप्ति की घोषणा होती है। → धर्म यह भी खोलते हैं कि द्रौपदी और पाण्डव भ्राताओं को भी इसी प्रकार ‘व्याज’ से नरक-दर्शन कराया गया—पाठक के मन में प्रश्न उठता है कि उनके सूक्ष्म दोष क्या थे और स्वर्गारोहण का अंतिम दृश्य कैसे पूर्ण होगा।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत स्वगरिह्हणपर्वमें युधिष्टिरकों नरकका दर्शनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥/ २ ॥ ऑपन-माज बछ। अल तृतीयो<थध्याय: इन्द्र और धर्मका युधिष्िरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना वैशम्पायन उवाच स्थिते मुहूर्त पार्थे तु धर्मराजे युधिष्ठिरे । आजम्मुस्तत्र कौरव्य देवा: शक्रपुरोगमा:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरको उस स्थानपर खड़े हुए अभी दो ही घड़ी बीतने पायी थी कि इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता वहाँ आ पहुँचे

ویشَمپاین نے کہا: اے کوروونشی جنمیجَے! جب دھرم راج یُدھشٹھِر وہاں ابھی تھوڑی ہی دیر کھڑا تھا کہ شکر (اندر) کی پیشوائی میں تمام دیوتا اس مقام پر آ پہنچے۔

Verse 2

सच विग्रहवान्‌ धर्मो राजानं प्रसमीक्षितुम्‌ तत्राजगाम यत्रासौ कुरुराजो युधिषिर:,साक्षात्‌ धर्म भी शरीर धारण करके राजासे मिलनेके लिये उस स्थानपर आये जहाँ वे कुरुराज युधिष्छिर विद्यमान थे

اور خود دھرم نے بھی جسمانی صورت اختیار کی، تاکہ بادشاہ کو روبرو دیکھے اور پرکھے؛ چنانچہ وہ اسی جگہ آیا جہاں کورو راج یُدھشٹھِر موجود تھا۔

Verse 3

तेषु भासुरदेहेषु पुण्याभिजनकर्मसु । समागतेषु देवेषु व्यगमत्‌ तत्‌ तमो नृूप,राजन्‌! जिनके कुल और कर्म पवित्र हैं, उन तेजस्वी शरीरवाले देवताओंके आते ही वहाँका सारा अन्धकार दूर हो गया इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि युधिष्ठिरतनुत्यागे तृतीयो5ध्याय:

اے راجَن! جن کا کُل اور کرم پاکیزہ ہے، اُن نورانی جسم والے دیوتاؤں کے آتے ہی وہاں کا سارا اندھیرا دور ہو گیا۔

Verse 4

नादृश्यन्त च तास्तत्र यातना: पापकर्मिणाम्‌ | नदी वैतरणी चैव कूटशाल्मलिना सह

وہاں گناہگاروں کے لیے مقرر کی گئی کوئی عذاب ناک صورتیں دکھائی نہ دیں—نہ ویتَرَنی ندی، نہ ہی کُوٹ-شالمَلی (کانٹوں والا ہولناک شالمَلی درخت)۔

Verse 5

विकृतानि शरीराणि यानि तत्र समन्तत:,ववौ देवसमीपस्थ: शीतलो5तीव भारत | कुरुकुलनन्दन राजा युधिष्ठिरने वहाँ चारों ओर जो विकृत शरीर देखे थे वे सभी अदृश्य हो गये। तदनन्तर वहाँ पावन सुगन्ध लेकर बहनेवाली पवित्र सुखदायिनी वायु चलने लगी। भारत! देवताओंके समीप बहती हुई वह वायु अत्यन्त शीतल प्रतीत होती थी

اے بھارت! وہاں چاروں طرف جو بگڑی ہوئی صورتوں والے جسم دکھائی دیتے تھے، وہ سب اوجھل ہو گئے۔ پھر پاکیزہ خوشبو لیے راحت بخش ہوا چلنے لگی؛ دیوتاؤں کے قریب بہنے والی وہ ہوا نہایت ٹھنڈی محسوس ہوتی تھی۔

Verse 6

ददर्श राजा कौरव्यस्तान्यदृश्यानि चाभवन्‌ । ततो वायु: सुखस्पर्श: पुण्यगन्धवह: शुचि:

کوروَ راجا نے وہ عجیب نشانیاں دیکھیں؛ جو اوجھل تھیں وہ بھی ظاہر ہو گئیں۔ پھر خوشگوار لمس والی، پاکیزہ خوشبو اٹھائے ہوئے شفاف ہوا چلنے لگی۔

Verse 7

मरुत: सह शक्रेण वसवश्चाश्चिनौ सह

شَکر (اِندر) کے ساتھ مَروت گن، وَسو گن اور دونوں اَشوِنی کُمار بھی (وہاں موجود تھے)۔

Verse 8

साध्या रुद्रास्तथा55दित्या ये चान्येडपि दिवौकस: । सर्वे तत्र समाजग्मु: सिद्धाश्व॒ परमर्षय:

وَیشَمپایَن نے کہا—سادھیہ، رودر، آدتیہ اور دیگر تمام آسمانی باشندے وہاں جمع ہو گئے؛ اور سِدھ بھی، ساتھ ہی برترین رِشی بھی وہاں آ پہنچے۔ یہ وہ لمحہ تھا جب کائنات کے اعلیٰ ترین طبقاتِ وجود، انجامِ اخلاق و روحانیت کی گواہی دینے کے لیے یکجا ہوئے۔

Verse 9

यत्र राजा महातेजा थधर्मपुत्र: स्थितो5भवत्‌ । इन्द्रके साथ मरुद्गण, वसुगण, दोनों अश्विनीकुमार, साध्यगण, रुद्रगण, आदित्यगण, अन्यान्य देवलोकवासी सिद्ध और महर्षि सभी उस स्थानपर आये जहाँ महातेजस्वी धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर खड़े थे ।। ततः शक्र: सुरपति: श्रिया परमया युत:

جہاں عظیم تابندگی والے، دھرم کے فرزند، راجا یُدھِشٹھِر کھڑے تھے، وہیں اندر مرودوں اور وسوؤں کے جتھوں کے ساتھ، دونوں اشونی کمار، سادھیہ، رودر، آدتیہ اور دیگر دیولोक کے باشندے، سِدھ اور مہارِشی—سب کے سب آ کر جمع ہو گئے۔ پھر دیوتاؤں کے سردار شکر، اعلیٰ ترین جلال و شکوہ سے آراستہ، نمودار ہوا۔

Verse 10

युधिष्ठिर महाबाहो लोकाश्षाप्यक्षयास्तव,“महाबाहु युधिष्ठिर! तुम्हें अक्षयलोक प्राप्त हुए हैं। पुरुषसिंह! प्रभो! अबतक जो हुआ सो हुआ। अब अधिक कष्ट उठानेकी आवश्यकता नहीं है। आओ हमारे साथ चलो। महाबाहो! तुम्हें बहुत बड़ी सिद्धि मिली है; साथ ही अक्षयलोकोंकी भी प्राप्ति हुई है

وَیشَمپایَن نے کہا—اے مہاباہو یُدھِشٹھِر! اَمر (اَکشَی) لوک تمہارے لیے مقرر ہیں۔ اے مردوں کے شیر، اے پروردگار! جو ہو چکا سو ہو چکا۔ اب مزید رنج اٹھانے کی ضرورت نہیں۔ آؤ، ہمارے ساتھ چلو۔ اے قوی بازو! تم نے عظیم سِدھی پائی ہے اور اس کے ساتھ لازوال جہانوں کی بھی نیلگوں عطا۔

Verse 11

“महाबाहु युधिष्ठिर! तुम्हें अक्षयलोक प्राप्त हुए हैं। पुरुषसिंह! प्रभो! अबतक जो हुआ सो हुआ। अब अधिक कष्ट उठानेकी आवश्यकता नहीं है। आओ हमारे साथ चलो। महाबाहो! तुम्हें बहुत बड़ी सिद्धि मिली है; साथ ही अक्षयलोकोंकी भी प्राप्ति हुई है

وَیشَمپایَن نے کہا—اے مہاباہو یُدھِشٹھِر! تم نے اَکشَی (لازوال) لوک پا لیے ہیں۔ اے مردوں کے شیر، اے پروردگار! اب تک جو ہوا سو ہوا۔ اب مزید رنج اٹھانے کی ضرورت نہیں۔ آؤ، ہمارے ساتھ چلو۔ اے قوی بازو! تمہیں عظیم سِدھی حاصل ہوئی ہے اور اس کے ساتھ ابدی جہانوں کی بھی نیلگوں عطا۔

Verse 12

न च मन्युस्त्वया कार्य: शृणु चेद॑ वचो मम | अवश्यं नरकस्तात द्रष्टव्य: सर्वराजभि:,“तात! तुम्हें जो नरक देखना पड़ा है इसके लिये क्रोध न करना। मेरी यह बात सुनो! समस्त राजाओंको निश्चय ही नरक देखना पड़ता है

وَیشَمپایَن نے کہا—اس بات پر تمہیں غضب نہ کرنا چاہیے؛ میری بات سنو۔ اے عزیز! تمام بادشاہوں کو لازماً دوزخ کا دیدار کرنا پڑتا ہے۔

Verse 13

शुभानामशुभानां च द्वौ राशी पुरुषर्षभ । यः पूर्व सुकृतं भुड्चक्ते पश्चान्रिरयमेव स:,'पुरुषप्रवर! मनुष्यके जीवनमें शुभ और अशुभ कर्मोंकी दो राशियाँ सज्चित होती हैं। जो पहले ही शुभ कर्म भोग लेता है उसे पीछे नरकमें ही जाना पड़ता है

وَیشَمپایَن نے کہا— اے مردوں میں برتر! انسان کی زندگی میں نیکی اور بدی کے اعمال کے دو ڈھیر جمع ہوتے ہیں۔ جو پہلے اپنے ثواب کا پھل بھگت لیتا ہے، اسے بعد میں باقی گناہوں کی سزا بھگتنے کے لیے لازماً دوزخ ہی جانا پڑتا ہے۔

Verse 14

पूर्व नरकभाग्‌ यस्तु पश्चात्‌ स्वर्गमुपैति सः । भूयिष्ठं पापकर्मा यः स पूर्व स्वर्गमश्षुते,'परंतु जो पहले नरक भोग लेता है वह पीछे स्वर्गमें जाता है। जिसके पास पापकर्मोका संग्रह अधिक है वह पहले ही स्वर्ग भोग लेता है

وَیشَمپایَن نے کہا— جو پہلے دوزخ کا حصہ بھگت لیتا ہے، وہ بعد میں جنت کو پاتا ہے۔ مگر جس کے گناہوں کا ذخیرہ زیادہ ہو، وہ پہلے جنت کی آسائشیں بھگتتا ہے اور پھر دردناک انجام سے دوچار ہوتا ہے۔

Verse 15

तेन त्वमेवं गमितो मया श्रेयोडर्थिना नूप । व्याजेन हि त्वया द्रोण उपचीर्ण: सुतं प्रति

اسی لیے، اے بادشاہ! میں نے تمہاری حقیقی بھلائی کی خواہش سے تمہیں اس طرح لے چلا۔ کیونکہ تم ہی نے ایک بہانے سے دروṇ کو اپنے بیٹے کے حق میں خاص التفات دکھانے پر آمادہ کیا تھا۔

Verse 16

यथैव त्वं तथा भीमस्तथा पार्थो यमौ तथा

جیسے تم ہو، ویسا ہی بھیِم ہے؛ ویسا ہی پارتھ ہے؛ اور ویسے ہی وہ دونوں جڑواں بھی ہیں۔

Verse 17

आगच्छ नरशार्दूल मुक्तास्ते चैव कल्मषात्‌,'पुरुषसिंह! आओ, वे सभी पापसे मुक्त हो गये हैं। भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे पक्षके जो-जो राजा युद्धमें मारे गये हैं वे सभी स्वर्गलोकमें आ पहुँचे हैं। चलो, उनका दर्शन करो

آؤ، اے نَرشارْدُول! وہ سب کے سب آلودگی (کلمش) سے آزاد ہو چکے ہیں۔

Verse 18

स्वपक्ष्याश्वैव ये तुभ्यं पार्थिवा निहता रणे । सर्वे स्वर्गमनुप्राप्तास्तान्‌ पश्य भरतर्षभ,'पुरुषसिंह! आओ, वे सभी पापसे मुक्त हो गये हैं। भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे पक्षके जो-जो राजा युद्धमें मारे गये हैं वे सभी स्वर्गलोकमें आ पहुँचे हैं। चलो, उनका दर्शन करो

اے مردِ شیر! آؤ—وہ سب گناہوں سے پاک ہو چکے ہیں۔ اے بھرت شریشٹھ! تمہارے پکش کے جو جو راجے رَن میں مارے گئے تھے، وہ سب سوَرگ لوک کو پہنچ گئے ہیں؛ چلو، ان کا دیدار کرو۔

Verse 19

कर्णश्रैव महेष्वास: सर्वशस्त्रभृतां वर: । स गत: परमां सिद्धि यदर्थ परितप्यसे,“तुम जिनके लिये सदा संतप्त रहते हो वे सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर कर्ण भी परम सिकद्धिको प्राप्त हुए हैं

اور کرن بھی—وہ مہادھنوردھر، تمام ہتھیار برداروں میں افضل—اعلیٰ ترین کمال (پرَم سِدھی) کو پہنچ گیا ہے؛ جس کے لیے تم ہمیشہ غم میں جلتے رہتے ہو۔

Verse 20

त॑ पश्य पुरुषव्याप्रमादित्यतनयं विभो । स्वस्थानस्थं महाबाहो जहि शोकं नरर्षभ,'प्रभो! नरश्रेष्ठ! महाबाहो! तुम पुरुषसिंह सूर्यकुमार कर्णका दर्शन करो। वे अपने स्थानमें स्थित हैं। तुम उनके लिये शोक त्याग दो

اے پروردگار! اے نر شریشٹھ! اے مہاباہو! آدتیہ کے پتر، مردِ شیر کرن کو دیکھو—وہ اپنے ہی مقام پر قائم ہے؛ لہٰذا اس کے لیے غم چھوڑ دو۔

Verse 21

भ्रातृश्चान्यांस्तथा पश्य स्वपक्ष्याश्रैव पार्थिवान्‌ । स्वं स्वं स्थानमनुप्राप्तान्‌ व्येतु ते मानसो ज्वर:,“अपने दूसरे भाइयोंको तथा पाण्डवपक्षके अन्यान्य राजाओंको भी देखो। वे सब अपने-अपने योग्य स्थानको प्राप्त हुए हैं। उन सबकी सद्गतिके विषयमें अब तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये

اپنے دوسرے بھائیوں کو بھی دیکھو، اور اپنے پکش کے دوسرے راجاؤں کو بھی۔ وہ سب اپنے اپنے مقام کو پہنچ چکے ہیں؛ اب تمہارے دل و دماغ کا جَور—یعنی فکر—دور ہو جائے۔

Verse 22

कृच्छू पूर्व चानुभूय इत:प्रभूति कौरव । विहरस्व मया साथे गतशोको निरामय:,“कुरुनन्दन! पहले कष्टका अनुभव करके अबसे तुम मेरे साथ रहकर रोग-शोकसे रहित हो स्वच्छन्द विहार करो

اے کورو! پہلے سختی جھیل کر، اب سے میرے ساتھ رہو اور آزادانہ سیر کرو—غم سے پاک، بیماری سے بے نیاز۔

Verse 23

कर्मणां तात पुण्यानां जितानां तपसा स्वयम्‌ । दानानां च महाबाहो फल प्राप्रुहि पार्थिव,“तात! महाबाहु! पृथ्वीनाथ! अपने किये हुए पुण्यकर्मोंका, तपस्यासे जीते हुए लोकोंका और दानींका फल भोगो

ویشَمپایَن نے کہا— اے فرزند! اے مہاباہو، اے زمین کے ناتھ! اب اپنے کیے ہوئے نیک اعمال کے پھل، تپسیا سے جیتے ہوئے عوالم، اور دان کے اجر کو حاصل کر اور اس سے بہرہ مند ہو۔

Verse 24

अद्य त्वां देवगन्धर्वा दिव्याश्षाप्सरसो दिवि | उपसेवन्तु कल्याण्यो विरजो<म्बरभूषणा:,“आजसे देव, गन्धर्व तथा कल्याणस्वरूपा दिव्य अप्सराएँ स्वच्छ वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो स्वर्गलोकमें तुम्हारी सेवा करें

ویشَمپایَن نے کہا— آج سے آسمان میں دیوتا، گندھرو اور مبارک و پاکیزہ دیوی اپسرائیں—بےداغ لباس اور زیورات سے آراستہ ہو کر—تمہاری خدمت کریں۔

Verse 25

राजसूयजिताॉल्लोकान श्वमेधाभिवर्धितान्‌ । प्राप्रुहि त्वं महाबाहो तपसश्न महाफलम्‌,“महाबाहो! राजसूय यज्ञद्वारा जीते हुए तथा अश्वमेध यज्तद्वारा वृद्धिको प्राप्त हुए पुण्य लोकोंको प्राप्त करो और अपने तपके महान्‌ फलको भोगो

ویشَمپایَن نے کہا— اے مہاباہو! وہ عالَم حاصل کر جو راجسوئے یَجْن سے جیتے گئے اور اشومیدھ یَجْن سے مزید بڑھائے گئے؛ اور اپنی تپسیا کے عظیم پھل سے بہرہ مند ہو۔

Verse 26

उपर्युपरि राज्ञां हि तव लोका युधिष्छिर । हरिश्वन्द्रसमा: पार्थ येषु त्वं विहरिष्यसि,“कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! तुम्हें प्राप्त हुए सम्पूर्ण लोक राजा हरिश्वन्द्रके लोकोंकी भाँति सब राजाओंके लोकोंसे ऊपर हैं; जिनमें तुम विचरण करोगे

ویشَمپایَن نے کہا— اے یُدھِشٹھِر، اے پارتھ! تمہیں جو عوالم ملے ہیں وہ دوسرے بادشاہوں کے عوالم سے کہیں بلند ہیں—بادشاہ ہریش چندر کے عوالم کے مانند؛ انہی بلند مقامات میں تم گردش و قیام کرو گے۔

Verse 27

मान्धाता यत्र राजर्षियत्र राजा भगीरथ: । दौष्यन्तिर्यत्र भरतस्तत्र त्वं विहरिष्यसि

ویشَمپایَن نے کہا— جہاں راجرشی ماندھاتا ہیں، جہاں بادشاہ بھگیرتھ ہیں، اور جہاں دُشیَنت کا بیٹا بھرت ہے—وہیں تم بھی خوشی سے گردش کرو گے۔

Verse 28

“जहाँ राजर्षि मान्धाता, राजा भगीरथ और दुष्यन्तकुमार भरत गये हैं, उन्हीं लोकोंमें तुम भी विहार करोगे ।। एषा देवनदी पुण्या पार्थ त्रैलोक्यपावनी । आकाशगड़् राजेन्द्र तत्राप्लुत्य गमिष्यसि,'पार्थ! ये तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली पुण्यसलिला देवनदी आकाशगड़ा हैं। राजेन्द्र! इनके जलमें गोता लगाकर तुम दिव्य लोकोंमें जा सकोगे

وَیشَمپایَن نے کہا— جن ہی جہانوں میں راجَرشی ماندھاتا، راجا بھگیرتھ اور دُشیَنت کے پُتر بھرت گئے ہیں، انہی میں تم بھی سیر کرو گے۔ اے پارتھ! یہ دیوتاؤں کی پاک ندی ہے، تینوں لوکوں کو پاک کرنے والی—آکاش گنگا۔ اے راجندر! اس کے پانی میں غوطہ لگا کر تم دیویہ لوکوں کی طرف روانہ ہو جاؤ گے۔

Verse 29

अत्र स्नातस्य भावस्ते मानुषो विगमिष्यति । गतशोको निरायासो मुक्तवैरो भविष्यसि,“मन्दाकिनीके इस पवित्र जलमें स्नान कर लेनेपर तुम्हारा मानव-स्वभाव दूर हो जायगा। तुम शोक, संताप और वैरभावसे छुटकारा पा जाओगे”

یہاں غسل کرنے سے تمہاری انسانی حالت دور ہو جائے گی۔ تم غم سے آزاد، بےکلفت، اور عداوت سے رہائی پا کر ہو جاؤ گے۔

Verse 30

एवं ब्रुवति देवेन्द्रे कौरवेन्द्रं युधिष्ठिरम्‌ । धर्मो विग्रहवान्‌ साक्षादुवाच सुतमात्मन:,देवराज इन्द्र जब इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय शरीर धारण करके आये हुए साक्षात्‌ धर्मने अपने पुत्र कौरवराज युधिष्ठिससे कहा--

جب دیوراج اندر کوروؤں کے فرمانروا یُدھشٹھِر سے اس طرح گفتگو کر رہا تھا، اسی وقت خود دھرم جسمانی صورت میں ظاہر ہوا اور اپنے ہی بیٹے سے مخاطب ہوا۔

Verse 31

भो भो राजन महाप्राज्ञ प्रीतो5स्मि तव पुत्रक । मद्धकत्या सत्यवाक्यैश्नल क्षमया च दमेन च,“महाप्राज्ञ नरेश! मेरे पुत्र! तुम्हारे धर्मविषयक अनुराग, सत्यभाषण, क्षमा और इन्द्रियसंयम आदि गुणोंसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ

اے راجن، اے نہایت دانا! اے میرے بیٹے! مجھ سے تیری عقیدت، تیری سچّی گفتار، تیری بردباری اور تیری ضبطِ نفس نے مجھے بےحد خوش کیا ہے۔

Verse 32

एषा तृतीया जिज्ञासा तव राजन्‌ कृता मया | न शकक्‍्यसे चालयितु स्वभावात्‌ पार्थ हेतुतः,“राजन! यह मैंने तीसरी बार तुम्हारी परीक्षा ली थी। पार्थ! किसी भी युक्तिसे कोई तुम्हें अपने स्वभावसे विचलित नहीं कर सकता

اے راجن! یہ تیری تیسری آزمائش تھی جو میں نے لی۔ اے پارتھ! کسی بھی دلیل یا بہانے سے تجھے تیرے اپنے مزاج و فطرت سے ہٹایا نہیں جا سکتا۔

Verse 33

पूर्व परीक्षितो हि त्व॑ं प्रश्नाद्‌ द्वैृतवने मया । अरणीसहितस्यार्थ तच्च निस्तीर्णवानसि,'द्वैतववनमें अरणिकाष्ठका अपहरण करनेके पश्चात्‌ जब यक्षके रूपमें मैंने तुमसे कई प्रश्न किये थे वह मेरे द्वारा तुम्हारी पहली परीक्षा थी। उसमें तुम भलीभाँति उत्तीर्ण हो गये

ویشَمپاین نے کہا—اس سے پہلے دْوَیتَوَن میں، جب آگ جلانے کی لکڑیاں (ارَنی) لے لی گئی تھیں، میں نے سوالات کے ذریعے تمہاری آزمائش کی تھی۔ تم اس آزمائش میں خوب کامیاب رہے۔

Verse 34

सोदर्येषु विनष्टेषु द्रौपद्या तत्र भारत । श्वरूपधारिणा तत्र पुनस्त्व॑ मे परीक्षित:,“भारत! फिर द्रौपदीसहित तुम्हारे सभी भाइयोंकी मृत्यु हो जानेपर कुत्तेका रूप धारण करके मैंने दूसरी बार तुम्हारी परीक्षा ली थी। उसमें भी तुम सफल हुए

ویشَمپاین نے کہا—اے بھارت! جب وہاں دروپدی سمیت تمہارے سگے بھائی ہلاک ہو گئے، تو میں نے کتے کی صورت اختیار کر کے دوسری بار تمہاری آزمائش کی۔ اس آزمائش میں بھی تم ثابت قدم نکلے۔

Verse 35

इदं तृतीयं भ्रातृणामर्थ यत्‌ स्थातुमिच्छसि । विशुद्धोईसि महाभाग सुखी विगतकल्मष:,“अब यह तुम्हारी परीक्षाका तीसरा अवसर था; किंतु इस बार भी तुम अपने सुखकी परवा न करके भाइयोंके हितके लिये नरकमें रहना चाहते थे, अतः महाभाग! तुम इस तरहसे शुद्ध प्रमाणित हुए। तुममें पापका नाम भी नहीं है; अत: सुखी होओ

ویشَمپاین نے کہا—یہ تمہاری تیسری آزمائش تھی، تمہارے بھائیوں کے بھلے کے بارے میں۔ اپنے آرام کو نظرانداز کر کے تم ان کی خاطر (جہنم میں بھی) ٹھہرنا چاہتے تھے؛ اس لیے اے نہایت بخت والے! تم پاک ثابت ہوئے۔ تم ہر آلودگیِ گناہ سے بری ہو؛ پس اطمینان سے خوش رہو۔

Verse 36

नच ते भ्रातरः पार्थ नरकार्हा विशाम्पते । मायैषा देवराजेन महेन्द्रेण प्रयोजिता,'पार्थ! प्रजानाथ! तुम्हारे भाई नरकमें रहनेके योग्य नहीं हैं। तुमने जो उन्हें नरक भोगते देखा है वह देवराज इन्द्रद्वारा प्रकट की हुई माया थी

ویشَمپاین نے کہا—اے پارتھ، اے رعایا کے سردار! تمہارے بھائی جہنم کے لائق نہیں۔ تم نے انہیں جہنم میں عذاب بھگتتے جو دیکھا، وہ دیوراج مہندر (اِندر) کی دکھائی ہوئی محض مایا تھی۔

Verse 37

अवश्यं नरकास्तात द्रष्टव्या: सर्वराजभि: । ततस्त्वया प्राप्तमिदं मुहूर्त दुःखमुत्तमम्‌,“तात! समस्त राजाओंको नरकका दर्शन अवश्य करना पड़ता है; इसलिये तुमने दो घड़ीतक यह महान्‌ दु:ख प्राप्त किया है

ویشَمپاین نے کہا—اے بچے! تمام بادشاہوں کو لازماً دوزخوں کا دیدار کرنا پڑتا ہے۔ اسی لیے تم نے یہ عظیم ترین رنج صرف ایک مختصر لمحے کے لیے سہا۔

Verse 38

न सव्यसाची भीमो वा यमौ वा पुरुषर्षभौ | कर्णो वा सत्यवाक्‌ शूरो नरकार्ह श्चिरं नृप

ویشَمپایَن نے کہا—اے راجا! نہ سَویَسَچی (ارجن)، نہ بھیم، نہ وہ دونوں جڑواں (نکُل اور سہدیَو) جو مردوں میں برتر تھے، اور نہ ہی سچ بولنے والا دلیر کرن—ان میں سے کوئی بھی دیر تک دوزخ میں رہنے کے لائق نہ رہا۔

Verse 39

“नरेश्वर! सव्यसाची अर्जुन, भीमसेन, पुरुषप्रवर नकुल-सहदेव अथवा सत्यवादी शूरवीर कर्ण--इनमेंसे कोई भी चिरकालतक नरकमें रहनेके योग्य नहीं है ।। न कृष्णा राजपुत्री च नरकार्हा कथंचन । एहोहि भरतश्रेष्ठ पश्य गड्जां त्रिलोकगाम्‌,“भरतश्रेष्ठ) राजकुमारी कृष्णा भी किसी तरह नरकमें जानेयोग्य नहीं है। आओ, त्रिभुवनगामिनी गंगाजीका दर्शन करो”

ویشَمپایَن نے کہا—اے نریشور! نہ سَویَسَچی ارجن، نہ بھیمسین، نہ مردوں میں برتر نکُل اور سہدیَو، اور نہ ہی سچ بولنے والا شجاع کرن—ان میں سے کوئی بھی طویل مدت تک دوزخ میں رہنے کے لائق نہیں۔ اور نہ ہی راجکماری کرشنا کسی طرح دوزخ کی مستحق ہے۔ آؤ، اے بھرتوں میں برتر! تینوں لوکوں تک پہنچنے والی گنگا کے درشن کرو۔

Verse 40

एवमुक्त: स राजर्षिस्तव पूर्वपितामह: । जगाम सह धर्मेण सर्वैक्ष त्रिदिवालयै:,जनमेजय! धर्मके यों कहनेपर तुम्हारे पूर्वपितामह राजर्षि युधिष्ठिरने धर्म तथा समस्त स्वर्गवासी देवताओंके साथ जाकर मुनिजनवन्दित परम पावन पुण्यसलिला देवनदी गड़ाजीमें स्नान किया। स्नान करके राजाने तत्काल अपने मानवशरीरको त्याग दिया

ویشَمپایَن نے کہا—اے جنمیجَے! جب دھرم نے یوں کہا تو تمہارے پیش رو، راجرشی (یُدھشٹھِر)، دھرم کے ساتھ اور سوَرگ کے سب باشندوں کے ساتھ روانہ ہوئے۔

Verse 41

गड्ढां देवनदीं पुण्यां पावनीमृषिसंस्तुताम्‌ । अवगाहा ततो राजा तनुं तत्याज मानुषीम्‌,जनमेजय! धर्मके यों कहनेपर तुम्हारे पूर्वपितामह राजर्षि युधिष्ठिरने धर्म तथा समस्त स्वर्गवासी देवताओंके साथ जाकर मुनिजनवन्दित परम पावन पुण्यसलिला देवनदी गड़ाजीमें स्नान किया। स्नान करके राजाने तत्काल अपने मानवशरीरको त्याग दिया

ویشَمپایَن نے کہا—اے جنمیجَے! پھر بادشاہ نے دیونَدی گنگا میں غوطہ لگایا—وہ پاکیزہ اور پُنیہ ندی جس کی رشی ستائش کرتے ہیں؛ اور وہاں اشنان کرکے اسی دم اپنا انسانی جسم ترک کر دیا۔

Verse 42

ततो दिव्यवपुर्भूत्वा धर्मराजो युधिष्िर: । निर्वेरो गतसंतापो जले तस्मिन्‌ समाप्लुत:,तत्पश्चात्‌ दिव्यदेह धारण करके धर्मराज युधिष्ठिर वैरभावसे रहित हो गये। मन्दाकिनीके शीतल जलमें स्नान करते ही उनका सारा संताप दूर हो गया

ویشَمپایَن نے کہا—پھر دھرم راج یُدھشٹھِر نے دیویہ روپ (الٰہی جسم) اختیار کیا۔ وہ کینہ و عداوت سے پاک ہو گیا، اس کا سارا رنج و الم جاتا رہا، اور وہ اسی آب میں غرقِ اشنان ہوا۔

Verse 43

लोहकुम्भ्य: शिलाश्वैव नादृश्यन्त भयानका: । वहाँ पापकर्मी पुरुषोंको जो यातनाएँ दी जाती थीं वे सहसा अदृश्य हो गयीं। न वैतरणी नदी रह गयी, न कूटशाल्मलि वृक्ष। लोहेके कुम्भ और लोहमयी भयंकर तप्त शिलाएँ भी नहीं दिखायी देती थीं,ततो ययौ वृतो देवै: कुरुराजो युधिष्ठिर: । धर्मेण सहितो धीमान्‌ स्तूयमानो महर्षिभि: तत्पश्चात्‌ देवताओंसे घिरे हुए बुद्धिमान्‌ कुरुराज युधिष्छठिर महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए धर्मके साथ उस स्थानको गये जहाँ वे पुरुषसिंह शूरवीर पाण्डव और धृतराष्ट्रपुत्र क्रोध त्यागकर आनन्दपूर्वक अपने-अपने स्थानोंपर रहते थे

ہولناک لوہے کے کڑاہے اور لوہے جیسے دہکتے پتھر اب نظر نہ آتے تھے۔ تب دیوتاؤں سے گھِرے ہوئے، دھرم کے ساتھ، مہارشیوں کے دہن سے اپنی ستائش سنتے ہوئے دانا کورو راج یُدھشٹھِر آگے بڑھے۔ وہ اس دیس کی طرف گئے جہاں مرد-شیر جیسے بہادر پانڈو اور دھرتراشٹر کے پتر، غصہ چھوڑ کر، خوشی کے ساتھ اپنے اپنے مقام پر رہتے تھے۔

Verse 44

यत्र ते पुरुषव्याप्रा: शूरा विगतमन्यव: । पाण्डवा धार्तराष्ट्रश्न स्वानि स्थानानि भेजिरे,तत्पश्चात्‌ देवताओंसे घिरे हुए बुद्धिमान्‌ कुरुराज युधिष्छठिर महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए धर्मके साथ उस स्थानको गये जहाँ वे पुरुषसिंह शूरवीर पाण्डव और धृतराष्ट्रपुत्र क्रोध त्यागकर आनन्दपूर्वक अपने-अपने स्थानोंपर रहते थे

جہاں وہ مردوں کے شیر جیسے سورما—غصّے سے پاک—پانڈو اور دھرتراشٹر کے پتر اپنے اپنے مقررہ مقاموں پر پہنچ چکے تھے۔ اس کے بعد دیوتاؤں سے گھِرا ہوا، دھرم کے ساتھ، مہارشیوں کے دہن سے اپنی ستائش سنتا ہوا دانا کورو راج یُدھشٹھِر اسی خطّے کی طرف گیا، جہاں شیر صفت بہادر خوشی سے اپنے اپنے مقام پر رہتے تھے۔

Verse 66

ववौ देवसमीपस्थ: शीतलो5तीव भारत | कुरुकुलनन्दन राजा युधिष्ठिरने वहाँ चारों ओर जो विकृत शरीर देखे थे वे सभी अदृश्य हो गये। तदनन्तर वहाँ पावन सुगन्ध लेकर बहनेवाली पवित्र सुखदायिनी वायु चलने लगी। भारत! देवताओंके समीप बहती हुई वह वायु अत्यन्त शीतल प्रतीत होती थी

اے بھارت! دیوتاؤں کے قریب بہنے والی وہ ہوا نہایت ٹھنڈی محسوس ہوتی تھی۔ کوروکُل کے نندن راجا یُدھشٹھِر نے وہاں چاروں طرف جو بگڑے ہوئے جسم دیکھے تھے، وہ سب کے سب غائب ہو گئے۔ اس کے بعد وہاں پاکیزہ خوشبو لانے والی، مقدّس اور راحت بخش ہوا چلنے لگی۔

Verse 93

युधिष्ठिरमुवाचेदं सान्त्वपूर्वमिदं वच: । तदनन्तर उत्तम शोभासे सम्पन्न देवराज इन्द्रने युधिष्ठिरको सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा

اس کے بعد نہایت درخشاں دیوراج اندر نے یُدھشٹھِر کو تسلّی دیتے ہوئے نرم لہجے میں اس طرح کہا۔

Verse 131

एहोहि पुरुषव्यात्र कृतमेतावता विभो । सिद्धि: प्राप्ता महाबाहो लोकाश्षाप्यक्षयास्तव

“آؤ، اے مردوں کے شیر، اے صاحبِ شوکت! اتنا ہی کافی ہے۔ اے قوی بازو! تم نے کمال (سِدھی) پا لیا ہے، اور تمہارے لیے جو عوالم ہیں وہ بھی اَبدی و اَزلی (اَکشَی) ہیں۔”

Verse 153

व्याजेनैव ततो राजन्‌ दर्शितो नरकस्तव । “नरेश्वर! मैंने तुम्हारे कल्याणकी इच्छासे तुम्हें पहले ही इस प्रकार नरकका दर्शन करानेके लिये यहाँ भेज दिया है। राजन! तुमने गुरुपुत्र अश्वत्थामाके विषयमें छलसे काम लेकर द्रोणाचार्यको उनके पुत्रकी मृत्युका विश्वास दिलाया था, इसलिये तुम्हें भी छलसे ही नरक दिखलाया गया है

وَیشَمپایَن نے کہا: اے راجَن! تمہیں دوزخ کا مشاہدہ محض ایک تدبیر (حیلہ) سے کرایا گیا۔ جس طرح تم نے درون آچاریہ کو اُن کے بیٹے اشوتھاما کے معاملے میں فریب سے یہ یقین دلایا تھا کہ بیٹا مارا گیا ہے، اسی طرح تمہیں بھی فریب ہی کے ذریعے دوزخ دکھائی گئی۔

Verse 1636

द्रौपदी च तथा कृष्णा व्याजेन नरकं गता: । 'जैसे तुम यहाँ लाये गये थे उसी प्रकार भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा ट्रपदकुमारी कृष्णा--ये सभी छलसे नरकके निकट लाये गये थे

وَیشَمپایَن نے کہا: دروپدی، جسے کرشنا بھی کہا جاتا ہے، ایک تدبیر (حیلہ) کے ذریعے دوزخ کی سمت لے جائی گئی۔ جیسے تمہیں یہاں لایا گیا تھا، اسی طرح بھیم سین، ارجن، نکُل، سہ دیو اور دروپد کی بیٹی کرشنا—یہ سب بھی فریب سے دوزخ کے قریب لائے گئے تھے۔

Frequently Asked Questions

The chapter confronts how a righteous king should respond when reality appears to contradict moral expectation—whether to accept personal elevation or to remain loyal to companions and to truth, even amid distressing visions.

Karmic results are depicted as temporally ordered rather than simplistic: merit and demerit may ripen in different sequences, and apparent injustice can function as a limited, instructive ordeal rather than a final verdict.

Yes: Dharma states the vision was māyā arranged by Indra, clarifies it as Yudhiṣṭhira’s third examination, and presents immersion in the celestial Gaṅgā as the transition point where the human state is relinquished and reconciliation is completed.