Deity · Atharvaveda

विष्णुः in the Atharvaveda

विष्णुNamed in 67 verses

In this book

Named as
Viṣṇu, Vishnu, Urugāya
  1. Kanda 33
  2. Kanda 53
  3. Kanda 61
  4. Kanda 714
  5. Kanda 81
  6. Kanda 92
  7. Kanda 1012
  8. Kanda 111
  9. Kanda 122
  10. Kanda 131
  11. Kanda 141
  12. Kanda 151
  13. Kanda 1715
  14. Kanda 181
  15. Kanda 193
  16. Kanda 206

Every verse that names विष्णुः

67 verses

  1. 3.20.4

    अवसे सोमं राजानम्, अग्निं च गीर्भिः हवामहे। आदित्यं विष्णुं सूर्यं ब्रह्माणं च बृहस्पतिं च (हवामहे)।

  2. 3.20.7

    अर्यमणं बृहस्पतिमिन्द्रं दानाय चोदय । वातं विष्णुं सरस्वतीं सवितारं च वाजिनम् ॥

  3. 3.27.5

    ध्रुवा दिक्। तस्या अधिपतिः विष्णुः; रक्षिता कल्माषग्रीवः; वीरुध इषवः। तेभ्यो नमः—अधिपतिभ्यो नमः, रक्षितृभ्यो नमः, इषुभ्यो नमः; एभ्यो नमोऽस्तु—एवमस्तु। योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः, तं वो जम्भे दध्मः।

  4. 5.3.3

    मम देवाः विहवे सन्तु सर्वे—इन्द्रवन्तो मरुतो विष्णुरग्निः। मम अन्तरिक्षम् उरुलोकम् अस्तु; मह्यं वातः पवतां शुद्धये, अस्य कामस्य सिद्धये।

  5. 5.25.5

    विष्णुर्हि योनिं कल्पयतु; त्वष्टा रूपाणि पिंशतु। प्रजापतिरासिञ्चतु; धाता ते गर्भं दधातु स्थिरम्।

  6. 5.26.7

    विष्णुरस्मिन् यज्ञे बहुधा तपांसि युनक्तु—सुयुजः; स्वाहा।

  7. 6.3.1

    आत्मगोपनम्। पातु न इन्द्रापूषणौ, अदितिः पान्तु, मरुतः पान्तु। अपां नपात् पातु; सिन्धवः सप्त पातन; पातु नो विष्णुरुत द्यौः।

  8. 7.17.4

    धाता रातिः सविता चेदं जुषन्ताम्; प्रजापतिः निधिपतिः नोऽग्निश्च (अनुगृह्णातु)। त्वष्टा विष्णुश्च प्रजया सह संरराणौ यजमानाय द्रविणं धनं च दधाताम्।

  9. 7.25.1

    विष्णुः। ययोरोजसा स्कभिता रजांसि यौ वीर्यौऽर्वीरतमा शविष्ठा। यौ पत्येते अप्रतीतौ सहोभिर्विष्णुमगन् वरुणं पूर्वहूतिः॥

  10. 7.25.2

    यस्येदं प्रदिशि यद्विरोचते प्र चानति वि च चष्टे शचीभिः। पुरा देवस्य धर्मणा सहोभिर्विष्णुमगन् वरुणं पूर्वहूतिः॥

  11. 7.26.1

    विष्णुः। विष्णोर्नु कं प्र वोचं वीर्याणि—यः पार्थिवानि रजांसि विममे; यः उत्तरं सधस्थम् अस्कभायत्; त्रेधा विचक्रमाणः उरुगायः।

  12. 7.26.2

    प्र तद् विष्णु स्तवते वीर्याणि—मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः। परावत आ जगम्यात् परस्याः।

  13. 7.26.3

    यस्योरुषु त्रिषु विक्रमनेषु अधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा। उरु विष्णो वि क्रमस्व; उरु क्षयाय नस्कृधि। घृतं घृतयोने पिब; प्रप्र यज्ञपतिं तिर।

  14. 7.26.4

    इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदाः। समूढमस्य पांसुरे॥

  15. 7.26.5

    विष्णुः गोपा अदा॑भ्यः त्रीणि पदा विचक्रमे। इतः धर्माणि धारयन्।

  16. 7.26.6

    विष्णोः कर्माणि पश्यत यतः व्रतानि पस्पशे। इन्द्रस्य युज्यः सखा।

  17. 7.26.7

    तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवि इव चक्षुराततम्।

  18. 7.26.8

    दिवो विष्णो उत वा पृथिव्या महो विष्ण उरोरन्तरिक्षात्। हस्तौ पृणस्व बहुभिर्वसव्यैराप्रयच्छ दक्षिणादोत सव्यात्॥

  19. 7.29.1

    अग्नाविष्णू। महि तद्वां महित्वं—घृतस्य पाथो गुह्यस्य नाम। दमे-दमे सप्त रत्नानि दधानौ; प्रति वां जिह्वा घृतमाचरण्यात्।

  20. 7.29.2

    अग्नाविष्णू महि धाम प्रियं वां; घृतस्य वीथो गुह्या जुषाणौ। दमे दमे सुष्टुत्या वावृधानौ; प्रति वां जिह्वा घृतम् उच्चरण्यात्॥