Adhyaya 315
Vana ParvaAdhyaya 31550 Verses

Adhyaya 315

Chapter Arc: वन में जल की तीव्र आवश्यकता के बीच युधिष्ठिर नकुल को सरोवर से पानी लाने भेजते हैं—पर वह लौटता नहीं, और मौन वन में अनिष्ट की आहट फैल जाती है। → नकुल के विलम्ब पर सहदेव, फिर अर्जुन, फिर भीम—एक-एक कर उसी दिशा में भेजे जाते हैं। सरोवर-तट पर जल के संकेत (जलाश्रयी वृक्ष, सारसों का कलरव) आशा जगाते हैं, पर प्रत्येक भाई वहाँ पहुँचकर किसी अदृश्य चेतावनी-स्वर को अनसुना कर जल पीता है और अचेत होकर गिर पड़ता है। → अर्जुन दौड़ते हुए आकाशवाणी सुनता है—‘प्रश्नों का उत्तर दिए बिना मत पीओ’—पर वह अवज्ञा कर जल पीता है और तुरंत मूर्छित हो गिर पड़ता है; चारों भाइयों का एक ही सरोवर-तट पर निःशब्द पतन संकट को चरम पर पहुँचा देता है। → इस अध्याय में समाधान नहीं आता; केवल यह स्थापित होता है कि सरोवर पर कोई यक्ष-शक्ति पहरा दे रही है और उसके नियम का उल्लंघन प्राणघातक सिद्ध हो रहा है। → चारों भाई अचेत पड़े हैं; अब युधिष्ठिर स्वयं क्या करेंगे—क्या वे भी जल पीकर गिरेंगे, या यक्ष के प्रश्नों का सामना करेंगे?

Shlokas

Verse 1

हि >> आन (0) हि 7 आम द्वादर्शाधिकत्रिशततमो< ध्याय: पानी लानेके लिये गये हुए नकुल आदि चार भाइयोंका सरोवरके तटपर अचेत होकर गिरना युधिछिर उवाच नापदामस्ति मर्यादा न निमित्तं न कारणम्‌ | धर्मस्तु विभजत्यर्थमुभयो: पुण्यपापयो:,युधिष्ठिर बोले--भैया! आपत्तियोंकी न तो कोई सीमा है, न कोई निमित्त दिखायी देता है और न कोई विशेष कारण ही परिलक्षित होता है। पहलेका किया हुआ पुण्य और पापरूप कर्म ही प्रारब्ध बनकर सुख और दुःखरूप फल बाँटता रहता है

ຢຸທິສຖິຣະ ກ່າວວ່າ: «ນ້ອງເອີຍ, ໄພພິບັດບໍ່ມີຂອບເຂດແນ່ນອນ; ບໍ່ເຫັນເຫດການຫຼືໂອກາດອັນຊັດເຈນ, ແລະບໍ່ປາກົດເຫດຜົນພິເສດໃດໆ. ແທ້ຈິງແລ້ວ ທຳມະ—ອັນເຄື່ອນໄຫວຜ່ານກຳເກົ່າຂອງຕົນ—ແບ່ງສັນຜົນຂອງບຸນແລະບາບ, ແຈກຢາຍເປັນຄວາມສຸກແລະຄວາມທຸກ».

Verse 2

भीम उवाच प्रातिकाम्यनयत्‌ कृष्णां सभायां प्रेष्यवत्‌ तदा । न मया निहततस्तत्र तेन प्राप्ता: सम संशयम्‌,भीमसेनने कहा--जब प्रातिकामीकी जगह दूत बनकर गया हुआ दु:शासन द्रौपदीको कौरवोंकी सभामें दासीकी भाँति बलपूर्वक खींच ले आया, उस समय मैंने जो उसका वध नहीं कर डाला; इसीके कारण हमलोग ऐसे धर्मसंकटमें पड़े हैं

ພີມະ ກ່າວວ່າ: «ເມື່ອນັ້ນ ດຸຫະສານະ ໄດ້ໄປແທນປຣະຕິກາມິນ ດັ່ງທູດຮັບໃຊ້, ແລ້ວລາກ ກຣິສນາ (ດຣໍປະດີ) ເຂົ້າສູ່ສະພາຂອງກົວຣະວະ ດັ່ງທາດຍິງ ດ້ວຍກຳລັງ. ໃນຂະນະນັ້ນ ຂ້ອຍບໍ່ໄດ້ຟັນຂ້າລາວໃຫ້ຕາຍໃນທີ່ນັ້ນ; ເພາະຄວາມຜິດພາດນັ້ນ ພວກເຮົາຈຶ່ງຕົກຢູ່ໃນວິກິດທາງທຳມະອັນໜັກໜ່ວງ ແລະຄວາມສົງໄສ.»

Verse 3

अजुन उवाच वाचस्तीक्ष्णास्थिभेदिन्य: सूतपुत्रेण भाषिता: । अतितीव्रा मया क्षान्तास्तेन प्राप्ता: सम संशयम्‌,अर्जुन बोले--सूतपुत्र कर्णके कहे हुए कठोर अस्थियोंको भी विदीर्ण कर देनेवाले अत्यन्त कड़वे वचन सुनकर भी जो हमने सहन कर लिये; उसीसे आज हम धर्मसंकटकी अवस्थामें आ पहुँचे हैं

ອະຣະຈຸນ ກ່າວວ່າ: «ຖ້ອຍຄຳທີ່ບຸດແຫ່ງສູຕະ ກັນນະ ເວົ້ານັ້ນ ແຫຼມຄົມ—ຂົມຂື່ນຈົນຄືຈະຜ່າແມ່ນກະດູກ. ແຕ່ຂ້ອຍກໍອົດກັ້ນທົນຮັບຄຳດ່າທີ່ຮຸນແຮງນັ້ນ. ເພາະຂ້ອຍອົດທົນມັນນັ້ນແຫຼະ ພວກເຮົາຈຶ່ງມາຕົກຢູ່ໃນວິກິດທາງທຳມະອັນໜັກໜ່ວງນີ້ ບໍ່ຮູ້ວ່າທາງໃດຈຶ່ງຖືກ.»

Verse 4

सहदेव उवाच शकुनिस्त्वां यदाजैषीदक्षद्यूतेन भारत । स मया न हतत्तत्र तेन प्राप्ता: सम संशयम्‌,सहदेवने कहा--भारत! जब शकुनिने आपको जूएमें जीत लिया और उस समय मैंने उसे मार नहीं डाला, उसीका यह फल है कि आज हमलोग धर्मसंकटमें पड़ गये हैं

ສະຫະເທວ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ພາຣະຕະ! ເມື່ອ ສະກຸນິ ຊະນະພຣະອົງໃນການຫຼິ້ນລູກເຕົ໋າ, ຂ້າພະເຈົ້າບໍ່ໄດ້ຂ້າເຂົາໃນເວລານັ້ນ. ຜົນຂອງຄວາມລະເລີຍນັ້ນແມ່ນນີ້: ມື້ນີ້ພວກເຮົາຕົກຢູ່ໃນຄວາມສົງໄສແລະພິບັດອັນໜັກ ຕິດຢູ່ໃນວິກິດແຫ່ງທຳມະ».

Verse 5

वैशम्पायन उवाच ततो युधिषछिरो राजा नकुलं वाक्यमब्रवीत्‌ । आरुह्द वृक्ष माद्रेय निरीक्षस्व दिशो दश,वैशम्पायनजी कहते हैं--तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने नकुलसे कहा--“माद्रीनन्दन! किसी वृक्षपर चढ़कर सब दिशाओंमें दृष्टिपात करो। कहीं आस-पास पानी हो, तो देखो अथवा जलके किनारे होनेवाले वृक्षोंपर भी दृष्टि डालो। तात! तुम्हारे ये भाई थके-माँदे और प्यासे हैं!

ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ຕໍ່ມາ ພຣະຣາຊາ ຢຸທິສຖິຣ ໄດ້ກ່າວກັບ ນະກຸລະ ວ່າ: «ໂອ ລູກແຫ່ງ ມາດຣີ, ຈົ່ງປີນຂຶ້ນຕົ້ນໄມ້ ແລ້ວສຳຫຼວດທິດທັງສິບ. ເບິ່ງວ່າມີນ້ຳຢູ່ໃກ້ໆບໍ, ຫຼືມີຕົ້ນໄມ້ໃດທີ່ບອກເຖິງຝັ່ງນ້ຳ ຫຼືບ່ອນມີນ້ຳ. ລູກເອີຍ, ພີ່ນ້ອງຂອງເຈົ້າເຫນື່ອຍລ້າ ແລະຖືກທຸກທ້ອນໂດຍຄວາມຫິວນ້ຳ».

Verse 6

पानीयमन्तिके पश्य वृक्षांश्चाप्युदकाश्रितान्‌ । एते हि भ्रातर: श्रान्तास्तव तात पिपासिता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने नकुलसे कहा--“माद्रीनन्दन! किसी वृक्षपर चढ़कर सब दिशाओंमें दृष्टिपात करो। कहीं आस-पास पानी हो, तो देखो अथवा जलके किनारे होनेवाले वृक्षोंपर भी दृष्टि डालो। तात! तुम्हारे ये भाई थके-माँदे और प्यासे हैं!

ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ຈົ່ງເບິ່ງນ້ຳຢູ່ໃກ້ໆ ແລະເບິ່ງຕົ້ນໄມ້ທີ່ເກີດຢູ່ບ່ອນມີນ້ຳດ້ວຍ. ເພາະພີ່ນ້ອງເຫຼົ່ານີ້ຂອງເຈົ້າ, ລູກເອີຍ, ເຫນື່ອຍລ້າ ແລະຫິວນ້ຳຢ່າງໜັກ».

Verse 7

नकुलस्तु तथेत्युक्त्वा शीघ्रमारुह्म पादपम्‌ । अब्रवीद्‌ भ्रातरं ज्येष्ठमभिवीक्ष्य समन्तत:,तब नकुल “बहुत अच्छा” कहकर शीघ्र ही एक पेड़पर चढ़ गये और चारों ओर दृष्टि डालकर अपने बड़े भाईसे बोले--

ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ນະກຸລະ ຕອບວ່າ «ເປັນຕາມນັ້ນ» ແລ້ວປີນຂຶ້ນຕົ້ນໄມ້ຢ່າງວ່ອງໄວ. ເມື່ອສຳຫຼວດໄປທົ່ວທິດທາງແລ້ວ ຈຶ່ງກ່າວກັບພີ່ໃຫຍ່ຂອງຕົນ.

Verse 8

पश्यामि बहुलान्‌ राजन्‌ वृक्षानुदकसंश्रयान्‌ । सारसानां च निर्हादमत्रोदकमसंशयम्‌,“राजन! मैं ऐसे बहुतेरे वृक्ष देख रहा हूँ, जो जलके किनारे ही होते हैं। सारसोंकी आवाज भी सुनायी देती है; अतः नि:संदेह यहाँ आस-पास ही कोई जलाशय है”

ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ຂ້າແຕ່ພຣະຣາຊາ, ຂ້າພະເຈົ້າເຫັນຕົ້ນໄມ້ຫຼາຍຕົ້ນທີ່ມັກຂຶ້ນຢູ່ໃກ້ນ້ຳ. ຂ້າພະເຈົ້າຍັງໄດ້ຍິນສຽງຮ້ອງຂອງ ສາຣະສະ (ນົກກະຮອກ/ນົກກະຮຽນ) ອີກດ້ວຍ; ດັ່ງນັ້ນ ບໍ່ມີຂໍ້ສົງໄສ ວ່າມີແຫຼ່ງນ້ຳຢູ່ໃກ້ໆນີ້».

Verse 9

ततोअब्रवीत्‌ सत्यधृतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । गच्छ सौम्य ततः शीघ्र तूणी: पानीयमानय,तब सत्यका पालन करनेवाले कुन्तीनन्दन युधिष्ठटिरने नकुलसे कहा--'सौम्य! शीघ्र जाओ और तरकसोंमें पानी भर लाओ'

ແລ້ວ ຢຸທິສຖິຣະ ບຸດຂອງກຸນຕີ ຜູ້ຍຶດໝັ້ນໃນຄວາມຈິງ ໄດ້ກ່າວວ່າ: «ໂອ ຜູ້ດີ, ຈົ່ງໄປໃຫ້ໄວ—ໄວໆ—ແລະນຳນ້ຳມາໃສ່ກະບອກລູກສອນ».

Verse 10

नकुलस्तु तथेत्युक्त्वा भ्रातुर्ज्येछ्सल्थ शासनात्‌ । प्राद्रवद्‌ यत्र पानीयं शीघ्रं चैवान्वपद्यत,नकुल “बहुत अच्छा” कहकर बड़े भाईकी आज्ञासे शीघ्रतापूर्वक गये और जहाँ जलाशय था, वहाँ तुरंत पहुँच गये

ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ນະກຸລະ ຕອບວ່າ «ເປັນດັ່ງນັ້ນ» ແລ້ວເຊື່ອຟັງຄຳສັ່ງຂອງອ້າຍໃຫຍ່. ລາວຮີບຮ້ອນອອກໄປທັນທີ ໄປຫາບ່ອນທີ່ມີນ້ຳ ແລະໄປຮອດແຫຼ່ງນ້ຳຢ່າງໄວວາ.

Verse 11

स दृष्टवा विमल तोयं सारसै: परिवारितम्‌ । पातुकामस्ततो वाचमन्तरिक्षात्‌ स शुश्रुवे

ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ລາວເຫັນນ້ຳໃນສະໜອງນັ້ນໃສບໍ່ມີມົນທິນ ແລະມີນົກສາຣະສະ (ນົກກະຮອກ) ລ້ອມຮອບ. ເມື່ອຢາກດື່ມ ລາວກໍໄດ້ຍິນສຽງໜຶ່ງມາຈາກຟ້າ.

Verse 12

वहाँ सारसोंसे घिरे हुए जलाशयका स्वच्छ जल देखकर नकुलको उसे पीनेकी इच्छा हुई। इतनेमें ही आकाशसे उनके कानोंमें एक स्पष्ट वाणी सुनायी दी ।। यक्ष उवाच मा तात साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा तु माद्रेय ततः पिब हरस्व च,यक्ष बोला--तात! तुम इस सरोवरका पानी पीनेका साहस न करो। इसपर पहलेसे ही मेरा अधिकार हो चुका है। माद्रीकुमार! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर पानी पीओ और ले भी जाओ

ຍັກສະ ກ່າວວ່າ: «ລູກເອີຍ, ຢ່າເຮັດຢ່າງຫຸນຫັນ. ສະໜອງນີ້ຂ້ອຍໄດ້ຍຶດຄອງໄວ້ແຕ່ກ່ອນ. ໂອ ບຸດຂອງມາດຣີ, ຈົ່ງຕອບຄຳຖາມຂອງຂ້ອຍກ່ອນ; ແລ້ວຈຶ່ງດື່ມ ແລະຈະນຳນ້ຳໄປກໍໄດ້».

Verse 13

अनादृत्य तु तद्‌ वाक्यं नकुलः सुपिपासितः । अपिबच्छीतलं तोय॑ं पीत्वा च निपपात ह,नकुलकी प्यास बहुत बढ़ गयी थी। उन्होंने यक्षेके कथनकी अवहेलना करके वहाँका शीतल जल पी लिया। पीते ही वे अचेत होकर गिर पड़े

ແຕ່ນະກຸລະ ຜູ້ຫິວນ້ຳຢ່າງໜັກ ກໍບໍ່ໃສ່ໃຈຄຳນັ້ນ. ລາວດື່ມນ້ຳເຢັນນັ້ນ ແລະເມື່ອດື່ມແລ້ວກໍລົ້ມລົງໝົດສະຕິ.

Verse 14

चिरायमाणे नकुले कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । अब्रवीद्‌ भ्रातरं वीर॑ं सहदेवमरिंदमम्‌,नकुलके लौटनेमें जब अधिक विलम्ब हो गया, तब कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने अपने शत्रुहन्ता वीर भ्राता सहदेवसे कहा--

ເມື່ອນະກຸລະຊ້າຢູ່ດົນ ຢຸທິສຖິຣະ ບຸດແຫ່ງກຸນຕີ ຈຶ່ງເວົ້າກັບນ້ອງຊາຍຜູ້ກ້າຫານ ສະຫະເທວະ ຜູ້ປາບສັດຕູ—ໃຫ້ລົງມືຕາມຄວາມຮັບຜິດຊອບ.

Verse 15

भ्राता हि चिरयातो न: सहदेव तवाग्रज: । तथैवानय सोदर्य पानीयं च त्वमानय,“सहदेव! हमारे अनुज और तुम्हारे अग्रज भ्राता नकुलको यहाँसे गये बहुत देर हो गयी। तुम जाकर अपने सहोदर भाईको बुला लाओ और पानी भी ले आओ'

«ສະຫະເທວະ! ນ້ອງຊາຍຂອງພວກເຮົາ—ແຕ່ເປັນອ້າຍຂອງເຈົ້າ ຄືນະກຸລະ—ໄປດົນແລ້ວ. ເຈົ້າຈົ່ງໄປເອີ້ນອ້າຍຮ່ວມເລືອດຂອງເຈົ້າມາ ແລະນຳນ້ຳມາດ້ວຍ».

Verse 16

सहदेवस्तथेत्यक्त्वा तां दिशं प्रत्यपद्यत । ददर्श च हतं भूमौ भ्रातरं नकुलं तदा,तब सहदेव “बहुत अच्छा” कहकर उसी दिशाकी ओर चल दिये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा, भाई नकुल पृथ्वीपर मरे पड़े हैं

ສະຫະເທວະຕອບວ່າ «ເປັນດັ່ງນັ້ນ» ແລ້ວກໍ່ອອກໄປທາງນັ້ນທັນທີ. ເມື່ອໄປຮອດ ລາວເຫັນນະກຸລະ ພີ່ຊາຍນອນຕາຍຢູ່ເທິງພື້ນດິນ.

Verse 17

भ्रातृशोकाभिसंतप्तस्तृषया च प्रपीडित: । अभिदुद्राव पानीयं ततो वागभ्यभाषत

ດ້ວຍຄວາມໂສກເສົ້າຕໍ່ພີ່ນ້ອງ ໃຈຂອງລາວຮ້ອນລົງ ແລະຖືກຄວາມຫິວນ້ຳບີບຄັ້ນ. ລາວຈຶ່ງພຸ່ງໄປຫານ້ຳ; ໃນຂະນະນັ້ນ ມີສຽງໜຶ່ງເວົ້າຂຶ້ນ.

Verse 18

भाईके शोकसे उनका हृदय संतप्त हो उठा। साथ ही प्याससे भी वे बहुत कष्ट पा रहे थे; अतः पानीकी ओर दौड़े। उसी समय आकाशवाणी बोल उठी-- ।। मा तात साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा यथाकामं पिबस्व च हरस्व च,“तात! पानी पीनेका साहस न करो। यहाँ पहलेसे ही मेरा अधिकार हो चुका है। तुम पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर इच्छानुसार जल पीओ और साथ ले भी जाओ”

ຍັກສະເວົ້າວ່າ: «ລູກເອີຍ ຢ່າຫານກ້າຫຸນຫັນ. ນ້ຳນີ້ຂ້າໄດ້ຈັບຈອງໄວ້ແລ້ວ. ຈົ່ງຕອບຄຳຖາມຂອງຂ້າກ່ອນ; ແລ້ວເຈົ້າຈະດື່ມຕາມໃຈ ແລະຈະຕັກໄປກໍໄດ້».

Verse 19

अनादृत्य तु तद्‌ वाक्‍्यं सहदेव: पिपासित: । अपिबच्छीतलं तोय॑ं पीत्वा च निपपात ह,प्यासे सहदेव उस वचनकी अवहेलना करके वहाँका ठंडा जल पीने लगे एवं पीते ही अचेत होकर गिर पड़े

ແຕ່ສະຫະເທວະ ຜູ້ຖືກຄວາມຫິວນ້ຳບີບຄັ້ນ ກໍບໍ່ໃສ່ໃຈຄຳເຕືອນນັ້ນ. ລາວໄດ້ດື່ມນ້ຳເຢັນຈາກທີ່ນັ້ນ ແລະທັນທີທີ່ດື່ມແລ້ວ ກໍລົ້ມລົງໝົດສະຕິ—ເປັນອຸທາຫອນເຖິງອັນຕະລາຍຂອງການຝ່າຝືນຄຳສອນທາງທຳ ແລະປະຕິບັດຕາມແຮງກະຕຸ້ນອັນລົ້ນເກີນ.

Verse 20

अथाब्रवीत्‌ स विजयं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । भ्रातरी ते चिरगतौ बीभत्सो शत्रुकर्शन,तदनन्तर कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने अर्जुनसे कहा--“शत्रुनाशन बीभत्सो! तुम्हारे दोनों भाइयोंको गये बहुत देर हो गयी

ແລ້ວ ຢຸທິສຖິຣະ ບຸດຂອງກຸນຕີ ກໍໄດ້ກ່າວກັບ ວິໄຊຍະ (ອາຣຊຸນ) ວ່າ: “ໂອ ບີພັດສຸ ຜູ້ປາບສັດຕູ—ສອງອ້າຍນ້ອງຂອງເຈົ້າໄປດົນແລ້ວ.” ໃນກອບຈັນຍາຂອງເຫດການຢັກສະ ຄຳນີ້ສະທ້ອນຄວາມຫ່ວງໃຍຢ່າງຮອບຄອບຂອງຢຸທິສຖິຣະຕໍ່ສະຫວັດດີພາບຂອງອ້າຍນ້ອງ ແລະຄວາມຮັບຜິດຊອບຂອງລາວ ແມ່ນແມ່ນກຳລັງເຜີຍໜ້າກັບອຳນາດລຶກລັບທີ່ກຳລັງທົດສອບຢູ່ກໍຕາມ.

Verse 21

तौ चैवानय भद्र ते पानीयं च त्वमानय । त्वं हि नस्तात सर्वेषां द:खितानामपाश्रय:,“तुम्हारा कल्याण हो। तुम उन दोनोंको बुला लाओ और साथ ही पानी भी ले आओ। तात! तुम्हीं हम सब दुःखी बन्धुओंके सहारे हो”

ຢັກສະໄດ້ກ່າວວ່າ: “ຂໍໃຫ້ຄວາມດີຈົ່ງບັງເກີດແກ່ເຈົ້າ. ໄປນຳສອງຄົນນັ້ນມາທີ່ນີ້ ແລະນຳນ້ຳມາດ້ວຍ. ລູກເອີຍ, ເຈົ້າແມ່ນທີ່ພຶ່ງພາພຽງຜູ້ດຽວຂອງພວກເຮົາ ບັນດາຍາດພີ່ນ້ອງຜູ້ໂສກເສົ້າ.”

Verse 22

एवमुक्तो गुडाकेश: प्रगृह्म सशरं धनु: । आमुक्तखड््‌गो मेधावी तत्‌ सर: प्रत्यपद्यत,युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर निद्राविजयी बुद्धिमान्‌ अर्जुन धनुष-बाण और खड़्ग लिये उस सरोवरके तटपर गये

ເມື່ອຖືກກ່າວດັ່ງນັ້ນ ກຸດາເກຊະ (ອາຣຊຸນ) ຜູ້ສະຫຼາດ ແລະຜູ້ຊະນະຄວາມງ່ວງນອນ ກໍຈັບຄັນທະນູພ້ອມລູກສອນ ແລະຄາດດາບໄວ້ ແລ້ວມຸ່ງໄປຫາສະນ້ຳນັ້ນ. ພາບນີ້ຊີ້ໃຫ້ເຫັນຄວາມພ້ອມຢ່າງມີວິໄນ: ແມ່ນແມ່ນຢູ່ໃນຄວາມບໍ່ແນ່ນອນ ຜູ້ຍຶດທຳກໍກະທຳດ້ວຍຄວາມຕື່ນຕົວ ຄວາມສຳລວມ ແລະການຕຽມພ້ອມ ບໍ່ໃຊ້ຄວາມຫຸນຫັນ.

Verse 23

ततः पुरुषशार्दूली पानीयहरणे गतौ । तौ ददर्श हतौ तत्र भ्रातरौ श्वेतवाहन:,श्वेतवाहन अर्जुनने जल लानेके लिये गये हुए उन दोनों पुरुषसिंह भाइयोंको वहाँ मरे हुए देखा

ຕໍ່ມາ ສະເວຕະວາຫະນະ (ອາຣຊຸນ) ເມື່ອໄປເອົານ້ຳ ກໍເຫັນຢູ່ທີ່ນັ້ນ ອ້າຍນ້ອງສອງຄົນຜູ້ດຸດດັ່ງສິງໃນຫມູ່ບຸລຸດ ນອນຕາຍຢູ່. ພາບນີ້ຍ້ຳເນັ້ນອັນຕະລາຍຂອງຄວາມປະມາດ ແລະນ້ຳໜັກທາງທຳຂອງການເຂົ້າໃກ້ສິ່ງທີ່ບໍ່ຮູ້ຈັກໂດຍບໍ່ມີວິຈາລະນະ—ເພາະຜົນຂອງຄວາມຜິດພາດມັກຕົກໃສ່ຍາດພີ່ນ້ອງຂອງຕົນກ່ອນ.

Verse 24

प्रसुप्ताविव तौ दृष्टवा नरसिंह: सुदु:खित: । धनुरुद्यम्य कौन्तेयो व्यलोकयत तद्‌ वनम्‌,दोनोंको प्रगाढ़ निद्रामें सोये हुएकी भाँति देखकर मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी अर्जुनको बहुत दुःख हुआ। उन्होंने धनुष उठाकर उस वनका अच्छी तरह निरीक्षण किया

ເຫັນທັງສອງນອນຢູ່ດັ່ງຄົນຫຼັບລຶກ ນະຣະສິງຫະ—ສິງໃນຫມູ່ມະນຸດ—ກໍເຕັມໄປດ້ວຍຄວາມໂສກ. ຍົກຄັນທະນູຂຶ້ນ ບຸດແຫ່ງກຸນຕີໄດ້ກວດກາປ່ານັ້ນຢ່າງລະອຽດ—ຕື່ນຕົວ ສືບຫາເຫດ ແລະພ້ອມກະທຳດ້ວຍຄວາມຍັບຍັ້ງ ບໍ່ໃຊ້ຄວາມຮຸນແຮງຢ່າງຫວານໄຫວ.

Verse 25

नापश्यत्‌ तत्र किज्चित्‌ स भूतमस्मिन्‌ महावने । सव्यसाची ततः श्रान्त: पानीयं सो5भ्यधावत,जब उस विशाल वनमें उन्हें कोई भी हिंसक प्राणी नहीं दिखायी दिया, तब सव्यसाची अर्जुन थककर पानीकी ओर दौड़े

ໃນປ່າໃຫຍ່ນັ້ນ ລາວບໍ່ເຫັນສັດຕົວໃດເລີຍ. ແລ້ວສະວະຍະສາຈີ (ອາຣະຈຸນ) ຜູ້ເມື່ອຍລ້າ ກໍຮີບໄປຫານ້ຳ—ເປັນການປູທາງໃຫ້ການທົດສອບທາງທຳມະຂອງຍັກສະທີ່ກຳລັງຈະມາ, ທີ່ຄວາມຍັບຍັ້ງແລະຄວາມປະພຶດຖືກຕ້ອງຈະສຳຄັນກວ່າພະລັງ.

Verse 26

अभिधावंस्ततो वाक्यमन्तरिक्षात्‌ स शुश्रुवे । किमासीदसि पानीयं नैतच्छक्यं बलात्‌ त्वया,दौड़ते समय उन्हें आकाशकी ओरसे आती हुई वाणी सुनायी दी--“कुन्तीनन्दन! क्‍यों पानीके निकट जा रहे हो? तुम जबरदस्ती यह जल नहीं पी सकते। भारत! यदि मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे सको, तो यहाँका पानी पीओ और साथ ले भी जाओ'

ເມື່ອລາວຮີບໄປຂ້າງໜ້າ ກໍໄດ້ຍິນສຽງຈາກຟ້າກ່າວວ່າ: “ໂອ ບຸດແຫ່ງກຸນຕີ, ເຈົ້າຮີບໄປຫານ້ຳເພາະຫຍັງ? ເຈົ້າບໍ່ອາດດື່ມນ້ຳນີ້ດ້ວຍກຳລັງ. ໂອ ພາຣະຕະ, ຖ້າເຈົ້າຕອບຄຳຖາມຂອງຂ້າໄດ້ ຈຶ່ງດື່ມນ້ຳນີ້—ແລະຈະຕັກເອົາໄປກໍໄດ້ຕາມໃຈ.”

Verse 27

कौन्तेय यदि प्रश्नांस्तान्‌ मयोक्तान्‌ प्रतिपत्स्यसे । ततः पास्यसि पानीयं हरिष्यसि च भारत,दौड़ते समय उन्हें आकाशकी ओरसे आती हुई वाणी सुनायी दी--“कुन्तीनन्दन! क्‍यों पानीके निकट जा रहे हो? तुम जबरदस्ती यह जल नहीं पी सकते। भारत! यदि मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे सको, तो यहाँका पानी पीओ और साथ ले भी जाओ'

ຍັກສະກ່າວວ່າ: “ໂອ ບຸດແຫ່ງກຸນຕີ, ເຈົ້າໄປຫານ້ຳເພາະຫຍັງ? ເຈົ້າບໍ່ອາດດື່ມນ້ຳນີ້ດ້ວຍກຳລັງ. ໂອ ພາຣະຕະ, ຖ້າເຈົ້າຕອບຄຳຖາມທີ່ຂ້າຖາມໄວ້ໄດ້ຢ່າງຖືກຕ້ອງ ເຈົ້າຈຶ່ງດື່ມນ້ຳນີ້ໄດ້—ແລະຈະຕັກເອົາໄປກໍໄດ້.”

Verse 28

वारितस्त्वब्रवीत्‌ पार्थो दृश्यमानो निवारय । यावद्‌ बाणैविंनिर्भिन्न: पुनर्नैंवं वदिष्यसि,इस प्रकार रोके जानेपर अर्जुनने कहा--“जरा सामने आकर रोको। सामने आते ही बाणोंसे टुकड़े-टुकड़े हो जानेपर फिर तुम इस प्रकार नहीं बोल पाओगे”

ເມື່ອຖືກຫ້າມ ອາຣະຈຸນຕອບວ່າ: “ຖ້າເຈົ້າຈະຫ້າມຂ້າ ຈົ່ງປາກົດຕົວອອກມາແລ້ວລອງ. ເມື່ອເຈົ້າຖືກລູກສອນຂອງຂ້າຍິງຈົນແຕກເປັນຊິ້ນໆ ເຈົ້າຈະບໍ່ອາດເວົ້າແບບນີ້ອີກ.” ຖ້ອຍຄຳນີ້ສະທ້ອນຄວາມພອງໃຈຂອງນັກຮົບແລະຄວາມຮ້ອນໃຈ—ຄຳເວົ້າທີ່ເກີດຈາກຝີມືຫາກບໍ່ແມ່ນຈາກປັນຍາ—ຕໍ່ໜ້າການທົດສອບຂອງຍັກສະ.

Verse 29

एवमुक्त्वा ततः पार्थ: शरैरस्त्रानुमन्त्रितै: । प्रववर्ष दिश: कृत्स्ना: शब्दवेधं च दर्शयन्‌,ऐसा कहकर अर्जुनने अपनी शब्दवेध-कलाका परिचय देते हुए दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंकी सब ओर झड़ी लगा दी

ເມື່ອເວົ້າດັ່ງນັ້ນແລ້ວ ປາຣຖະ (ອາຣຊຸນ) ກໍໄດ້ສະແດງຄວາມຊໍານານໃນການຍິງຕາມສຽງ ໂດຍຍິງລູກສອນທີ່ຖືກປະສິດທິດ້ວຍມັນຕຣາອາວຸດສັກສິດ ໃຫ້ຕົກດັ່ງຝົນໄປທົ່ວທິດ—ເປັນການສະແດງຝີມືອັນມີວິໄນ ບໍ່ແມ່ນຄວາມຮຸນແຮງບໍ່ຍັ້ງຄິດ.

Verse 30

कर्णिनालीकनाराचानुत्सूजन्‌ भरतर्षभ । स त्वमोघानिषून्‌ मुक्‍्त्वा तृष्णयाभिप्रपीडित:

ຍັກສະເວົ້າວ່າ: “ໂອ ຜູ້ປະເສີດໃນວົງພະຣະຕະ, ເຈົ້າກໍກໍາລັງຍິງລູກສອນມີຫົວຫຼັກ—ນາລິກາ ແລະ ນາຣາຈາ. ແຕ່ເຈົ້າຜູ້ຖືກຄວາມຫິວນໍ້າບີບຄັ້ນ ກໍໄດ້ປ່ອຍລູກສອນທີ່ບໍ່ພາດເປົ້າເປັນຝົນຫຼາຍດອກແລ້ວ”។

Verse 31

यक्ष उवाच कि विघातेन ते पार्थ प्रश्नानुकत्वा ततः पिब

ຍັກສະເວົ້າວ່າ: “ໂອ ປາຣຖະ, ການຕໍ່ສູ້ນີ້ຈະເປັນປະໂຫຍດອັນໃດແກ່ເຈົ້າ? ຕອບຄໍາຖາມກ່ອນ ແລ້ວຈຶ່ງດື່ມ.”

Verse 32

एवमुक्तस्तत: पार्थ: सव्यसाची धनंजय:

ແລ້ວເມື່ອຖືກເວົ້າດັ່ງນັ້ນ ປາຣຖະ—ອາຣຊຸນ ຜູ້ໂດງດັງນາມ ສະວັຍະສາຈີ ແລະ ທະນັນຊະຍະ—ກໍຕອບກັບ; ເປັນຂະນະທີ່ຄໍາຖາມອັນສອບສວນຂອງຍັກສະ ດຶງເຂົາເຂົ້າສູ່ການທົດສອບແຫ່ງປັນຍາ, ການຄວບຄຸມຕົນ, ແລະ ທັມມະ.

Verse 33

अथाब्रवीद्‌ भीमसेन कुन्तीपुत्रो युधिछ्ठिर:

ແລ້ວ ຢຸທິສຖິຣະ ລູກຂອງກຸນຕີ ໄດ້ເວົ້າກັບ ພີມະເສນ. ທ່າມກາງການທົດສອບຂອງຍັກສະ ພີ່ໃຫຍ່ຫັນໄປຫາພີມະ—ຊີ້ໃຫ້ເຫັນການປ່ຽນຈາກພະລັງອັນຫຸນຫັນ ໄປສູ່ຄໍາເວົ້າອັນມີວິໄນ ແລະ ການຕັດສິນທີ່ຖືກຕ້ອງ; ທັມມະຈະຖືກຮັກສາໂດຍການຕອບຢ່າງພອດດີ ບໍ່ແມ່ນໂດຍກໍາລັງ.

Verse 34

नकुल: सहदेवश्न बीभत्सुश्च॒ परंतप । चिरं गतास्तोयहेतोर्न चागच्छन्ति भारत

ຍັກສາໄດ້ກ່າວວ່າ: «ນະກຸລ ແລະ ສະຫະເທວ ທັງບີພັດສຸ (ອາຣຊຸນ) ດ້ວຍ, ໂອ ຜູ້ເຜົາຜານສັດຕູ—ເຂົາເຈົ້າໄປຊອກຫານ້ຳດົນນານແລ້ວ ແຕ່ບໍ່ກັບຄືນ, ໂອ ພາຣະຕະ»។

Verse 35

तांश्वैवानय भद्ठरें ते पानीयं च त्वमानय । तब कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भीमसेनसे कहा--“परंतप! भरतनन्दन! नकुल, सहदेव और अर्जुनको पानीके लिये गये बहुत देर हो गयी। वे अभीतक नहीं आ रहे हैं। तुम्हारा कल्याण हो। तुम जाकर उन्हें बुला लाओ और पानी भी ले आओ” ।। ३३-३४ $ ।। भीमसेनस्तथेत्युक्त्वा त॑ देशं प्रत्यपद्यत

ຍັກສາໄດ້ກ່າວວ່າ: «ຈົ່ງນຳເຂົາເຈົ້າມາທີ່ນີ້; ຂໍໃຫ້ຄວາມດີຈົ່ງມີແກ່ເຈົ້າ. ແລະເຈົ້າເອງກໍຈົ່ງນຳນ້ຳມາດ້ວຍ»។ ໄດ້ຍິນດັ່ງນັ້ນ ພີມເສນຕອບວ່າ «ເປັນດັ່ງນັ້ນ» ແລ້ວອອກໄປສູ່ບ່ອນນັ້ນ. ໃນບົດເລື່ອງຮອບຂ້າງ ຢຸທິສຖິຣະ—ກັງວົນວ່າ ນະກຸລ, ສະຫະເທວ ແລະ ອາຣຊຸນ ໄປຊອກຫານ້ຳດົນເກີນໄປ—ຈຶ່ງສົ່ງພີມໄປເອີ້ນໃຫ້ກັບຄືນ ແລະນຳນ້ຳມາ, ເພື່ອຊູມໃຫ້ເຫັນຄວາມເປັນຜູ້ນຳທີ່ຮັບຜິດຊອບ ແລະການຫ່ວງໃຍພວກພ້ອມເດີນທາງແມ່ນແມ່ນໃນຍາມທຸກຍາກ.

Verse 36

यत्र ते पुरुषव्याप्रा भ्रातरोडस्थ निपातिता: । तान्‌ दृष्टवा दु:खितो भीमस्तृषया च प्रपीडित:

ຍັກສາໄດ້ກ່າວວ່າ: «ທີ່ນັ້ນແຫຼະ ບ່ອນທີ່ອ້າຍນ້ອງຂອງເຈົ້າ—ຜູ້ກ້າຫານມີຄວາມພາກພຽນ—ນອນລົ້ມຢູ່ຈຳນວນແປດ. ພີມເຫັນເຂົາເຈົ້າແລ້ວ ກໍຖືກຄວາມໂສກເຂົ້າຄອບງຳ ແລະພ້ອມກັນນັ້ນກໍຖືກຄວາມຫິວນ້ຳບີບຄັ້ນ»។

Verse 37

तब भीमसेन “बहुत अच्छा” कहकर उस स्थान-पर गये, जहाँ वे पुरुषसिंह तीनों भाई पृथ्वीपर पड़े थे। उन्हें उस अवस्थामें देखकर भीमसेनको बड़ा दुःख हुआ। इधर प्यास भी उन्हें बहुत कष्ट दे रही थी ।। अमन्यत महाबाहु: कर्म तद्‌ यक्षरक्षसाम्‌ स चिन्तयामास तदा योद्धव्यं ध्रुवमद्य वै

ພີມເສນເວົ້າວ່າ «ດີຫຼາຍ» ແລ້ວໄປຍັງບ່ອນນັ້ນ ທີ່ອ້າຍນ້ອງສາມຄົນ—ດຸດດັ່ງສິງຫາຊາຍ—ນອນຢູ່ເທິງພື້ນດິນ. ເມື່ອເຫັນເຂົາເຈົ້າໃນສະພາບນັ້ນ ພີມເສນເສົ້າໂສກຢ່າງໜັກ ແລະຄວາມຫິວນ້ຳກໍບີບຄັ້ນເຂົາຢ່າງຫນັກ. ຜູ້ມີແຂນໃຫຍ່ນັ້ນຄິດວ່າ ນີ້ແມ່ນກຳມະຂອງຍັກສາ ຫຼື ຣັກສະ; ແລ້ວໃນຂະນະນັ້ນກໍຄິດວ່າ ມື້ນີ້ແນ່ນອນຕ້ອງຮົບ.

Verse 38

पास्यामि तावत्‌ पानीयमिति पार्थो वृकोदर: । ततो<भ्यधावत्‌ पानीयं पिपासु: पुरुषर्षभ:

«ຂ້ອຍຈະໄປຊອກຫານ້ຳກ່ອນ» ພາຣຖະ (ອາຣຊຸນ) ໄດ້ກ່າວກັບ ວຣິໂກດະຣະ (ພີມ). ແລ້ວຜູ້ເປັນຍອດຊາຍນັ້ນ ຜູ້ຖືກຄວາມຫິວນ້ຳບີບຄັ້ນ ກໍຮີບຮ້ອນແລ່ນໄປຫານ້ຳ—ເປັນການເປີດທາງໃຫ້ການທົດສອບທາງທຳມະທີ່ຈະມາໃນໄວໆນີ້ ເຊິ່ງຈະຮ້ອງຂໍຄວາມອົດກັ້ນ, ຄວາມເຄົາລົບ, ແລະການນອບນ້ອມຕໍ່ຄຳຕັກເຕືອນອັນຖືກຕ້ອງ ແທນການຫຸນຫັນຕາມຄວາມຢາກຂອງຕົນ.

Verse 39

महाबाहु भीमसेनने मन-ही-मन यह निश्चय किया कि “यह यक्षों तथा राक्षस्रोंका काम है।' फिर उन्होंने सोचा; “आज निश्चय ही मुझे शत्रुके साथ युद्ध करना पड़ेगा, अतः पहले जल तो पी लूँ।” ऐसा निश्चय करके प्यासे नरश्रेष्ठ कुन्तीकुमार भीमसेन जलकी ओर दौड़े ।। यक्ष उवाच मा तात साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च,यक्ष बोला--तात! पानी पीनेका साहस न करना। इस जलपर पहलेसे ही मेरा अधिकार स्थापित हो चुका है। कुन्तीकुमार! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर पानी पीओ और ले भी जाओ

ຍັກຂະເວົ້າວ່າ: «ລູກເອີຍ ຢ່າເຮັດຢ່າງຫຸນຫັນ. ນ້ຳນີ້ຂ້າໄດ້ຈັບຈອງໄວ້ແຕ່ກ່ອນແລ້ວ. ໂອ ລູກຂອງກຸນຕີ, ຈົ່ງຕອບຄຳຖາມຂອງຂ້າກ່ອນ; ແລ້ວຈຶ່ງດື່ມ—ແມ່ນກະທັ້ງຕັກເອົາໄປກໍໄດ້»។

Verse 40

एवमुक्तस्तदा भीमो यक्षेणामिततेजसा । अनुक्त्वैव तु तान्‌ प्रश्नान्‌ पीत्वैव निपपात ह,अमिततेजस्वी यक्षके ऐसा कहनेपर भी भीमसेन उन प्रश्नोंका उत्तर दिये बिना ही जल पीने लगे और पीते ही मूर्च्छिंत होकर गिर पड़े

ເຖິງແມ່ນຍັກຂະຜູ້ມີລັງສີອັນຫາທຽບບໍ່ໄດ້ຈະເວົ້າແລ້ວກໍຕາມ, ພີມະກໍຍັງດື່ມນ້ຳໂດຍບໍ່ຕອບຄຳຖາມເຫຼົ່ານັ້ນ. ພໍດື່ມເທົ່ານັ້ນ ລາວກໍລົ້ມລົງ ໝົດສະຕິ.

Verse 41

ततः कुन्तीसुतो राजा प्रचिन्त्य पुरुषर्षभ: । समुत्थाय महाबाहुर्दहुमानेन चेतसा,तदनन्तर कुन्तीपुत्र पुरुषरत्न महाबाहु राजा युधिष्ठिर बहुत देरतक सोच-विचार करके उठे और जलते हुए हृदयसे उन्होंने उस विशाल वनमें प्रवेश किया, जहाँ मनुष्योंकी आवाजतक नहीं सुनायी देती थी। वहाँ रुरु मृग, वराह तथा पक्षियोंके समुदाय ही निवास करते थे

ແລ້ວກະສັດ ບຸດຂອງກຸນຕີ—ຜູ້ເປັນຍອດບຸລຸດ—ໄດ້ຄິດໄຕ່ຕອງຢ່າງເລິກຊຶ້ງ. ຍຸທິສຖິຣະ ຜູ້ມີແຂນແຂງກ້າ ລຸກຂຶ້ນດ້ວຍໃຈທີ່ເຜົາໄໝ້ດ້ວຍຄວາມກັງວົນ ແລະອອກເດີນເຂົ້າສູ່ປ່າໃຫຍ່ອັນກວ້າງໃຫຍ່—ບ່ອນທີ່ບໍ່ມີແມ່ນແຕ່ສຽງຄົນ—ມີແຕ່ກວາງຣຸຣຸ, ໝູປ່າ, ແລະຝູງນົກເທົ່ານັ້ນອາໄສຢູ່.

Verse 42

व्यपेतजननिर्घोष॑ प्रविवेश महावनम्‌ । रुरुभिश्न वराहैश्व पक्षिभिश्न निषेवितम्‌,तदनन्तर कुन्तीपुत्र पुरुषरत्न महाबाहु राजा युधिष्ठिर बहुत देरतक सोच-विचार करके उठे और जलते हुए हृदयसे उन्होंने उस विशाल वनमें प्रवेश किया, जहाँ मनुष्योंकी आवाजतक नहीं सुनायी देती थी। वहाँ रुरु मृग, वराह तथा पक्षियोंके समुदाय ही निवास करते थे

ລາວເຂົ້າສູ່ປ່າໃຫຍ່ອັນປາດຈາກສຽງຄົນ—ມີແຕ່ກວາງຣຸຣຸ, ໝູປ່າ, ແລະຝູງນົກເທົ່ານັ້ນທີ່ອາໄສ. ຕໍ່ມາ ບຸດຂອງກຸນຕີ ກະສັດຍຸທິສຖິຣະ ຜູ້ມີແຂນແຂງກ້າ—ຫຼັງຈາກໄຕ່ຕອງຢ່າງໜັກໜ່ວງດົນນານ—ລຸກຂຶ້ນດ້ວຍໃຈທີ່ເຜົາໄໝ້ດ້ວຍຄວາມທຸກ ແລະກ້າວເຂົ້າສູ່ຖິ່ນກັນດານນັ້ນ ທີ່ບໍ່ມີແມ່ນແຕ່ສຽງຄົນ.

Verse 43

नीलभास्वरवर्णश्न॒ पादपैरुपशोभितम्‌ | भ्रमरैरुपगीतं च पक्षिभिश्न महायशा:,नीले रंगके चमकीले वृक्ष उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे। भ्रमरोंके गुंजन और विहंगोंके कलरवसे वह वनप्रान्त शब्दायमान हो रहा था

ໂອ ຜູ້ມີກຽດຍົດ, ບ່ອນປ່ານັ້ນງາມດ້ວຍຕົ້ນໄມ້ທີ່ມີສີຟ້າເຂັ້ມເປັນມັນງາມ. ມັນກ້ອງກັງວານໄປດ້ວຍສຽງ—ທັງສຽງຮ້ອງຮຳຂອງເຜິ້ງ ແລະສຽງເອີ້ນຂອງນົກ—ເຮັດໃຫ້ພາບປ່ານັ້ນມີຊີວິດຊີວາຢ່າງຍິ່ງ.

Verse 44

स गच्छन्‌ कानने तस्मिन्‌ हेमजालपरिष्कृतम्‌ । ददर्श तत्‌ सर: श्रीमान्‌ विश्वकर्मकृतं यथा,महायशस्वी श्रीमान्‌ युधिष्ठिरने उस वनमें विचरण करते हुए उस सरोवरको देखा, जो सुनहरे रंगके कुसुमकेसरोंसे विभूषित था। जान पड़ता था; साक्षात्‌ विश्वकर्माने ही उसका निर्माण किया है

ພຣະຢຸທິສຖິຣ ຜູ້ມີຍົກຍ້ອງແລະສິຣິ ເມື່ອເດີນຜ່ານປ່ານັ້ນ ກໍໄດ້ເຫັນສະຫຼອງນ້ຳອັນງາມສະຫງ່າ ປະດັບດັ່ງຕາຂ່າຍຄຳ ຮາວກັບເປັນຜົນງານທີ່ພຣະວິສະວະກັມມະສ້າງໄວ້ໂດຍຕົງ.

Verse 45

उपेतं नलिनीजालै: सिन्धुवारै: सवेतसै: । केतकै: करवीरैश्नव पिप्पलैश्वैव संवृतम्‌ । (ततो धर्मसुतः श्रीमान्‌ भ्रातृदर्शनलालस: ।) श्रमार्तस्तदुपागम्य सरो दृष्टवाथ विस्मित:,उस सरोवरका जल कमलकी बेलोंसे आच्छादित हो रहा था और उसके चारों किनारोंपर सिंदुवार, बेंत, केवड़े, करवीर तथा पीपलके वृक्ष उसे घेरे हुए थे। उस समय भाइयोंसे मिलनेके लिये उत्सुक श्रीमान्‌ धर्मनन्दन युधिष्ठिर थकावटसे पीड़ित हो उस सरोवरपर आये और वहाँकी अवस्था देखकर बड़े विस्मित हुए

ນ້ຳໃນສະຫຼອງນັ້ນຖືກປົກຄຸມດ້ວຍເຄືອບົວເປັນກຸ່ມໆ ແລະຕາມຂອບທັງສີ່ດ້ານມີພຸ່ມສິນທຸວາຣາ ຕົ້ນວີຕະສະ (ຫວາຍ/ຫຼິວ) ຕົ້ນເກຕະກະ ຕົ້ນກະຣະວີຣ ແລະຕົ້ນປິບພະລະ ຢືນລ້ອມຮອບເປັນກຳແພງ. ໃນເວລານັ້ນ ພຣະຢຸທິສຖິຣ ພຣະບຸດແຫ່ງທຳມະ ຜູ້ປາຖະໜາຈະພົບພີ່ນ້ອງ ມາຮອດສະຫຼອງນັ້ນດ້ວຍຄວາມເມື່ອຍລ້າ; ເມື່ອເຫັນສະຫຼອງແລະຄວາມສະຫງົບອັນປະຫຼາດ ກໍຕົກຕະລຶງຢ່າງຍິ່ງ.

Verse 306

अनेकैरिषुसड्घातैरन्तरिक्षे ववर्ष ह । भरतश्रेष्ठ जनमेजय! अर्जुन उस समय कर्णि, नालीक तथा नाराच आदि बाणोंकी वर्षा कर रहे थे। प्याससे पीड़ित हुए अर्जुनने कितने ही अमोघ बाणोंका प्रयोग करके आकाशमें भी कई बार बाण-समूहकी वर्षा की

ໂອ ພຣະຈະນະເມຊະຍະ ຜູ້ປະເສີດໃນວົງພາຣະຕະ! ໃນເວລານັ້ນ ອາຣະຈຸນໄດ້ຍິງລູກສອນເປັນຝົນຢູ່ໃນອາກາດ ດ້ວຍກອງລູກສອນຈຳນວນຫຼາຍ; ລູກສອນປະເພດກະຣະນີ, ນາລີກະ, ນາຣາຈ ແລະອື່ນໆ ຖືກສາດຊ້ຳໆ. ແມ່ນແຕ່ຖືກທຸກທ້ອນດ້ວຍຄວາມຫິວນ້ຳ ອາຣະຈຸນກໍຍັງໃຊ້ລູກສອນອັນບໍ່ຜິດພາດຫຼາຍດອກ ແລະເຮັດໃຫ້ຟ້າເຫມືອນຖືກຝົນລູກສອນຖອກລົງເປັນກຸ່ມໆ ຄັ້ງແລ້ວຄັ້ງເລົ່າ.

Verse 311

इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें मृगका अनुसंधानविषयक तीन सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ

ດັ່ງນີ້ ໃນມະຫາພາຣະຕະ ພາກວະນະປະຣະວະ ພາຍໃນຕອນອາຣະເນຍະ ບົດທີ 311 ວ່າດ້ວຍການຕາມຫາ ແລະຕິດຕາມຮອຍກວາງ ໄດ້ສິ້ນສຸດລົງແລ້ວ.

Verse 316

अनुक्त्वा च पिबन प्रश्नान्‌ पीत्वैव न भविष्यसि । यक्ष बोला--पार्थ! इस प्रकार प्राणियोंपर आघात करनेसे क्या लाभ? पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, फिर जल पीओ। यदि तुम प्रश्नोंका उत्तर दिये बिना ही यहाँका जल पीओगे, तो पीते ही मर जाओगे

ຢັກສະໄດ້ກ່າວວ່າ: “ຖ້າເຈົ້າດື່ມນ້ຳໂດຍບໍ່ຕອບຄຳຖາມຂອງຂ້າກ່ອນ ເຈົ້າຈະບໍ່ມີຊີວິດຫຼັງຈາກດື່ມ. ໂອ ປາຣຖະ! ການທຳຮ້າຍສັດມີຊີວິດແບບນີ້ ມີປະໂຫຍດອັນໃດ? ຈົ່ງຕອບຄຳຖາມຂອງຂ້າກ່ອນ ແລ້ວຈຶ່ງດື່ມນ້ຳ. ຖ້າເຈົ້າດື່ມນ້ຳທີ່ນີ້ໂດຍບໍ່ຕອບ ເຈົ້າຈະຕາຍທັນທີເມື່ອດື່ມ.”

Verse 323

अवज्ञायैव तां वाचं पीत्वैव निपपात ह । उसके ऐसा कहनेपर कुन्तीपुत्र सव्यसाची धनंजय उसके वचनोंकी अवहेलना करके जल पीने लगे और पीते ही अचेत होकर गिर पड़े

ເຂົາເມີນຄໍາເຕືອນຂອງຍັກສະ ແລ້ວກໍດື່ມນໍ້ານັ້ນຢູ່ດີ; ແຕ່ພໍດື່ມເຂົ້າໄປທັນທີ ກໍລົ້ມລົງ ໝົດສະຕິ. ເຫດການນີ້ຊີ້ໃຫ້ເຫັນຄ່າທາງທໍາອັນໜັກໜ່ວງຂອງການບໍ່ຟັງຄໍາຕັກເຕືອນທີ່ຖືກຕ້ອງ ແລະການກະທໍາຕາມອາລົມ ແທນການອົດກັ້ນ ແລະການພິຈາລະນາຮອບຄອບ.

Verse 3312

इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि नकुलादिपतने द्वादशाधिकत्रिशततमो<5ध्याय:

ດັ່ງນີ້ ຈົບລົງແລ້ວ ບົດທີ 324 (ມີເພີ່ມອີກ 12) ໃນວນະປະຣະວະ (Vana Parva) ຂອງ «ສຣີມະຫາພາຣະຕະ», ໃນພາກອາຣະເນຍ, ວ່າດ້ວຍການລົ້ມລົງຂອງນະກຸລ ແລະຜູ້ອື່ນໆ. ນີ້ແມ່ນຄໍາລົງທ້າຍ (colophon) ທີ່ໝາຍເຖິງການປິດບົດ ໃນຕອນສົນທະນາລະຫວ່າງຍັກສະ–ທໍາ, ທີ່ການທົດສອບທາງທໍາຂອງຢຸທິສຖິຣະ ຖືກເປີດເຜີຍຜ່ານຊະຕາກໍາຂອງພີ່ນ້ອງຂອງລາວ.