Adhyaya 199
Adi ParvaAdhyaya 19932 Verses

Adhyaya 199

खाण्डवप्रस्थप्रवेशः तथा इन्द्रप्रस्थनिर्माणवर्णनम् | Entry into Khāṇḍavaprastha and Description of Indraprastha’s Founding

Upa-parva: Khāṇḍavaprastha–Indraprastha Niveśa (Settlement and City-Founding Episode)

The chapter presents a sequence of diplomatic assent and administrative transition. Drupada affirms the counsel received and expresses satisfaction with the newly formed relationship, indicating that initiation of travel should align with Yudhiṣṭhira’s judgment and with Kṛṣṇa’s approval. Yudhiṣṭhira responds with a posture of deference, signaling coordinated decision-making. With Drupada’s permission, the Pāṇḍavas, accompanied by Kṛṣṇa, Vidura, Draupadī, and Kuntī, proceed to Hāstinapura, where public enthusiasm frames their return as socially restorative. They offer formal respects to Dhṛtarāṣṭra, Bhīṣma, and other elders; after rest, Dhṛtarāṣṭra instructs them to avoid renewed discord and to enter Khāṇḍavaprastha upon receiving half the kingdom, emphasizing security under Arjuna’s protection. The Pāṇḍavas accept, depart to the formidable forested region, and develop a fortified, prosperous city described through extensive urban imagery—moats, gates, armaments, planned roads, residences, gardens, lakes, and the influx of learned and commercial populations—culminating in Indraprastha’s splendor. After settling them, Kṛṣṇa, with Balarāma, returns to Dvāravatī with the Pāṇḍavas’ consent.

Chapter Arc: लाक्षागृह की ज्वाला से बचकर पाण्डवों के जीवित रहने और द्रौपदी-स्वयंवर में अर्जुन द्वारा लक्ष्य-वेध की गुप्त खबर हस्तिनापुर पहुँचती है—और उसी क्षण कौरव-सभा में भय, ईर्ष्या और अविश्वास की आँधी उठती है। → दुर्योधन अपने भाइयों और कर्ण-शकुनि के साथ पाण्डवों की बढ़ती कीर्ति का लेखा-जोखा रखता है—अर्जुन की धनुर्धरता, भीम की रण-उग्रता, और द्रुपद से उनका संधि-संबंध; वह धृतराष्ट्र की ‘पाण्डव-प्रेम’ प्रवृत्ति को भी अपने मार्ग की सबसे बड़ी बाधा मानता है। → दुर्योधन स्पष्ट शब्दों में नीति-आवरण हटाकर कहता है कि समय आ गया है—पाण्डवों को पुत्र-बल-बान्धव सहित बढ़ने से पहले रोकना होगा; ‘अन्य कार्य’ छोड़कर ‘बल-विघात’ का उपाय ही नित्य करना चाहिए। → सभा में निर्णय का बीज पड़ता है: पाण्डवों के उत्कर्ष को राज्य-नीति के नाम पर नियंत्रित/कुचलने की योजना बनती है, और धृतराष्ट्र के मन को साधने की आवश्यकता स्वीकार की जाती है। → दुर्योधन की यह उग्र सलाह आगे किस रूप में कार्य-योजना बनेगी—कूटनीति, छल, या खुला वैर—यह प्रश्न अगले प्रसंग पर टिका रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

अपर बक। ] अिफकशशाएड< (विदुरागमनराज्यलम्भपर्व) नवनवत्यधिकशततमोड ध्याय: पाण्डवोंके विवाहसे दुर्योधन आदिकी चिन्ता, धृतराष्ट्रका पाण्डवोंके प्रति प्रेमका दिखावा और दुर्योधनकी कुमन्त्रणा वैशम्पायन उवाच ततो राज्ञां चरैराप्तै: प्रवृत्तिरुपनीयत । पाण्डवैरुपसम्पन्ना द्रौपदी पतिभि: शुभा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदननन्‍्तर सब राजाओंको अपने विश्वसनीय गुप्तचरोंद्वारा यह यथार्थ समाचार मिल गया कि शुभलक्षणा द्रौपदीका विवाह पाँचों पाण्डवोंके साथ हुआ है

Vaiśampāyana said: Thereafter, through their trusted spies, the kings were accurately informed of the development—that the auspicious Draupadī had been duly married to the Pāṇḍavas as her husbands. The verse underscores how political intelligence swiftly spreads decisive events, shaping alliances, anxieties, and future counsel.

Verse 2

येन तद्‌ धनुरादाय लक्ष्यं विद्धं महात्मना । सोर्डर्जुनो जयतां श्रेष्ठी महाबाणधनुर्धर:,जिन महात्मा पुरुषने वह धनुष लेकर लक्ष्यको वेधा था, वे विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ तथा महान्‌ धनुष-बाण धारण करनेवाले स्वयं अर्जुन थे

Vaiśampāyana said: The very one who took up that bow and struck the target with a master’s precision was Arjuna himself—foremost among the victorious, a great bearer of bow and mighty arrows. The passage underscores how true excellence is shown not by claim or birth alone, but by disciplined skill and steadfast resolve displayed in action.

Verse 3

य: शल्यं मद्रराजं वै प्रोत्क्षिप्पापातयद्‌ बली । त्रासयामास संक्रुद्धो वृक्षेण पुरुषान्‌ रणे,जिस बलवान वीरने अत्यन्त कुपित हो मद्रराज शल्यको उठाकर पृथ्वीपर पटक दिया था और हाथमें वृक्ष ले रणभूमिमें समस्त योद्धाओंको भयभीत कर डाला था तथा जिस महातेजस्वी शूरवीरको उस समय तनिक भी घबराहट नहीं हुई थी, वह शत्रुसेनाके हाथी, घोड़े आदि अंगोंको मार गिरानेवाला तथा स्पर्शमात्रसे भय उत्पन्न करनेवाला महाबली भीमसेन था

Vaiśaṃpāyana said: The mighty warrior who, seizing King Śalya of Madra, hurled him down to the ground, and who—enraged—terrified the men on the battlefield by wielding a tree as a weapon, was Bhīmasena, a great champion whose very touch inspired fear and who struck down the enemy’s forces, including their elephants and horses. The verse highlights overwhelming martial power used to break hostile ranks and morale in war.

Verse 4

न चास्य सम्भ्रम: कश्चिदासीत्‌ तत्र महात्मन: । स भीमो भीमसंस्पर्श: शत्रुसेनाड्रपातन:,जिस बलवान वीरने अत्यन्त कुपित हो मद्रराज शल्यको उठाकर पृथ्वीपर पटक दिया था और हाथमें वृक्ष ले रणभूमिमें समस्त योद्धाओंको भयभीत कर डाला था तथा जिस महातेजस्वी शूरवीरको उस समय तनिक भी घबराहट नहीं हुई थी, वह शत्रुसेनाके हाथी, घोड़े आदि अंगोंको मार गिरानेवाला तथा स्पर्शमात्रसे भय उत्पन्न करनेवाला महाबली भीमसेन था

Vaiśampāyana said: In that moment, there was not the slightest agitation in that great-souled hero. It was Bhīma—terrible to touch, a bringer-down of the enemy’s pride—who stood firm, embodying fearless resolve amid violence and proving that true strength is steadiness of mind even in the press of battle.

Verse 5

ब्रह्मरूपधराउचदूत्वा प्रशान्तान्‌ पाण्डुनन्दनान्‌ | कौन्तेयान्‌ मनुजेन्द्राणां विस्मप: समजायत,ब्राह्मणगका रूप धारण करके प्रशान्तभावसे बैठे हुए वे वीर पुरुष कुन्तीपुत्र पाण्डव ही थे, यह सुनकर वहाँ आये हुए राजाओंको बड़ा आश्वर्य हुआ

Vaiśampāyana said: When it was announced that those calm, self-possessed heroes seated there in the guise of brāhmaṇas were in fact the Pāṇḍava brothers, the sons of Pāṇḍu—Kuntī’s sons—great astonishment arose among the assembled kings. The moment underscores how outward appearance can conceal true worth, and how restraint and composure can coexist with royal power.

Verse 6

सपुत्रा हि पुरा कुन्ती दग्धा जतुगृहे श्रुता । पुनर्जातानिव च तांस्ते5मन्यन्त नराधिपा:,उन्होंने पहले सुन रखा था कि कुन्ती अपने पुत्रोंसहित लाक्षागृहमें जल गयी। अब उन्हें जीवित सुनकर वे राजालोग यह मानने लगे कि इन पाण्डवोंका फिर नया जन्म-सा हुआ है

Vaiśampāyana said: They had earlier heard that Kuntī, together with her sons, had been burned in the lac-house. Now, on hearing that they were alive, those kings came to think of the Pāṇḍavas as though newly born again—returned from death, as it were, by the force of fate and the protection of dharma.

Verse 7

धिगकुर्वस्तदा भीष्म॑ धृतराष्ट्रं च कौरवम्‌ | कर्मणातिनृशंसेन पुरोचनकृतेन वै,पुरोचनके किये हुए अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्मका स्मरण हो आनेसे उस समय सभी नरेश कुरुवंशी धृतराष्ट्र तथा भीष्मको धिक्कारने लगे

Vaiśampāyana said: Recalling the exceedingly cruel deed carried out by Purocana, the assembled kings at that time began to denounce Bhīṣma and also Dhṛtarāṣṭra of the Kuru line, crying “Shame!”—for their complicity and failure to restrain such ruthless wrongdoing.

Verse 8

(धार्मिकान्‌ वृत्तसम्पन्नान्‌ मातु: प्रियहिते रतान्‌ । यदा तानीदृशान्‌ पार्थनुत्सादयितुमिच्छति ।। 'देखो न; धर्मात्मा, सदाचारी तथा माताके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहनेवाले कुन्तीकुमारोंको भी यह धृतराष्ट्र नष्ट करना चाहता है (भला, इससे बढ़कर निन्दनीय कौन होगा)।/ ततः स्वयंवरे वत्ते धार्तराष्ट्रा: सम भारत । मन्त्रयन्ते ततः सर्वे कर्णसौबलदूषिता: ।। जनमेजय! उधर स्वयंवर समाप्त होनेपर धुृतराष्ट्रके सभी पुत्र, जिन्हें कर्ण और शकुनिने बिगाड़ रखा था, इस प्रकार सलाह करने लगे। शकुनिरुवाच कश्चिच्छत्रु: कर्शनीय: पीडनीयस्तथापर: । उत्सादनीया: कौन्तेया: सर्वे क्षत्रस्थ मे मता: ।। शकुनि बोला--संसारमें कोई शत्रु तो ऐसा होता है, जिसे सब प्रकारसे दुर्बल कर देना उचित है; दूसरा ऐसा होता है, जिसे सदा पीड़ा दी जाय। परंतु कुन्तीके ये सभी पुत्र तो समस्त क्षत्रियोंके लिये समूल नष्ट कर देनेयोग्य हैं। इनके विषयमें मेरा यही मत है। एवं पराजिता: सर्वे यदि यूयं गमिष्यथ । अकृत्वा संविदं कांचित्‌ तद्‌ वस्तप्स्यत्यसंशयम्‌ ।। यदि इस प्रकार पराजित होकर आप सब लोग इन (पाण्डवोंके विनाशकी) युक्ति निश्चित किये बिना ही चले जायँगे, तो अवश्य ही यह भूल आपलोगोंको सदा संतप्त करती रहेगी। अयं देशश्ष कालश्न पाण्डवोद्धरणाय न: । न चेदेवं करिष्यध्वं लोके हास्या भविष्यथ ।। पाण्डवोंको जड़मूलसहित विनष्ट करनेके लिये हमारे सामने यही उपयुक्त देश और काल उपस्थित है। यदि आपलोग ऐसा नहीं करेंगे तो संसारमें उपहासके पात्र होंगे। यमेते संश्रिता वस्तुं कामयन्ते च भूमिपम्‌ । सो<ल्पवीर्यबलो राजा दट्रुपदो वै मतो मम ।। ये पाण्डव जिस राजाके आश्रयमें रहनेकी इच्छा रखते हैं, उस द्रपदका बल और पराक्रम मेरी रायमें बहुत थोड़ा है। यावदेतान्‌ न जानन्ति जीवतो वृष्णिपुड्रवा: । चैद्यश्न पुरुषव्याप्र: शिशुपाल: प्रतापवान्‌ ।। जबतक वृष्णिवंशके श्रेष्ठ वीर यह नहीं जानते कि पाण्डव जीवित हैं, पुरुषसिंह चेदिराज प्रतापी शिशुपाल भी जबतक इस बातसे अनभिज्ञ है, तभीतक पाण्डवोंको मार डालना चाहिये। एकीभावं गता राज्ञा ट्रुपदेन महात्मना । दुराधर्षतरा राजन्‌ भविष्यन्ति न संशय: ।। राजन! जब ये महात्मा राजा ट्रुपदके साथ मिलकर एक हो जायँगे, तब इन्हें परास्त करना अत्यन्त कठिन हो जायगा, इसमें संशय नहीं है। यावदत्वरतां सर्वे प्राप्तुवन्ति नराधिपा: । तावदेव व्यवस्याम: पाण्डवानां वध प्रति ।। जबतक सब राजा ढीले पड़े हैं, तभीतक हमें पाण्डवोंके वधके लिये पूरा प्रयत्न कर लेना चाहिये। मुक्ता जतुगृहाद्‌ भीमाद्‌ आशीविषमुखादिव । पुनर्यदीह मुच्यन्ते महन्नो भयमाविशेत्‌ ।। विषधर सर्पके मुख-सदृश भयंकर लाक्षागृहसे तो वे बच ही गये हैं। यदि फिर यहाँ हमारे हाथसे छूट जाते हैं तो उनसे हमलोगोंको महान्‌ भय प्राप्त हो सकता है। तेषामिहोपयातानामेषां च पुरवासिनाम्‌ । अन्तरे दुष्करं स्थातुं मेषयोर्महतोरिव ।। यदि वे वृष्णिवंशी और चेदिवंशी वीर यहाँ आ जायँ और यहाँके नागरिक भी अस्त्र- शस्त्र लेकर खड़े हो जायेँ तो इनके बीचमें खड़ा होना उतना ही कठिन होगा, जितना आपसमें लड़ते हुए दो विशाल मेढोंके बीचमें ठहरना। हलधृक्‌प्रगूहीतानि बलानि बलिनां स्वयम्‌ । यावन्न कुरुसेनायां पतन्ति पतगा इव ।। तावत्‌ सर्वाभिसारेण पुरमेतद्‌ विनाश्यताम्‌ । एतदत्र परं मन्ये प्राप्तकालं नरर्षभा: ।। जबतक हल धारण करनेवाले बलरामजीके द्वारा संचालित बलवान योद्धाओंकी सेनाएँ स्वयं ही आकर कौरवसेनारूपी खेतीपर टिड्डियोंकी भाँति न टूट पड़ें, तबतक हम सब लोग एक साथ आक्रमण करके इस नगरको नष्ट कर दें। नरश्रेष्ठ वीरो! मैं इस अवसरपर यही सर्वोत्तम कर्तव्य मानता हूँ! वैशम्पायन उवाच शकुनेर्वचनं श्रुत्वा भाषमाणस्य दुर्मते: । सौमदत्तिरिदं वाक्यं जगाद परम ततः ।। वैशम्पायनजी कहते हैं-दुर्बद्धि शकुनिका यह प्रस्ताव सुनकर सोमदतकुमार भूरिश्रवाने यह उत्तम बात कही। सौमदत्तिर्वाच प्रकृती: सप्त वै ज्ञात्वा आत्मनश्न परस्य च | तथा देशं च कालं च षड्विधांश्व नयेद्‌ गुणान्‌ ।। भूरिश्रवा बोले--अपने पक्षकी और शत्रुपक्षकी भी सातों* प्रकृतियोंको ठीक-ठीक जानकर ही देश और कालका ज्ञान रखते हुए छः: प्रकारके गुणोंका यथावसर प्रयोग करना चाहिये। स्थान वृद्धि क्षयं चैव भूमिं मित्राणि विक्रमम्‌ । समीक्ष्याथाभियुञ्जीत परं व्यसनपीडितम्‌ ।। स्थान, वृद्धि, क्षय, भूमि, मित्र तथा पराक्रम--इन सबकी ओर दृष्टि रखते हुए यदि शत्रु संकटसे पीड़ित हो तभी उसपर आक्रमण करना चाहिये। ततोऊ&हं पाण्डवान्‌ मन्ये मित्रकोशसमन्वितान्‌ । बलस्थान्‌ विक्रमस्थांश्व स्वकृतै: प्रकृतिप्रियान्‌ ।। इस दृष्टिसे देखनेपर मैं पाण्डवोंको मित्र और खजाना दोनोंसे सम्पन्न समझता हूँ। वे बलवान तो हैं ही, पराक्रमी भी हैं और अपने सत्कर्मोद्वारा समस्त प्रजाके प्रिय हो रहे हैं। वपुषा हि तु भूतानां नेत्राणि हृदयानि च । श्रोत्रं मधुरया वाचा रमयत्यर्जुनो नृणाम्‌ ।। अर्जुन अपने शरीरकी गठनसे (सभी) मनुष्योंके नेत्रों तथा हृदयको आनन्द प्रदान करते हैं और मीठी-मीठी वाणीद्वारा सबके कानोंको सुख पहुँचाते हैं। न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन भेजिरे । यद्‌ बभूव मनःकान्तं कर्मणा च चकार तत्‌ ।। केवल प्रारब्धसे ही प्रजा उनकी सेवा नहीं करती। प्रजाके मनको जो प्रिय लगता है, उसकी पूर्ति अर्जुन अपने प्रयत्नोंद्वारा करते रहते हैं। नहायुक्त न चासक्तं नानृतं न च विप्रियम्‌ । भाषितं चारुभाषस्य जज्ञे पार्थस्य भारती ।। मनोहर वचन बोलनेवाले अर्जुनकी वाणी कभी ऐसा वचन नहीं बोलती, जो अयुक्त, आमसत्तिपूर्ण, मिथ्या तथा अप्रिय हो। तानेवंगुणसम्पन्नान्‌ सम्पन्नान्‌ राजलक्षणै: । न तान्‌ पश्यामि ये शक्ता: समुच्छेत्तुं यथा बलात्‌ ।। समस्त पाण्डव राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न तथा उपर्युक्त गुणोंसे विभूषित हैं। मैं ऐसे किन्हीं वीरोंको नहीं देखता, जो अपने बलसे पाण्डवोंका वास्तवमें उच्छेद कर सकें। प्रभावशक्तिर्विपुला मन्त्रशक्तिश्न पुष्कला । तथैवोत्साहशक्तिक्ष पार्थेष्वभ्यधिका सदा ।। उनकी प्रभावशक्ति विपुल है, मन्त्रशक्ति भी प्रचुर है तथा उत्साहशक्ति भी पाण्डवोंमें सबसे अधिक है। मौलमित्रबलानां च कातलज्ञो वै युधिष्ठिर: । साम्ना दानेन भेदेन दण्डेनेति युधिष्ठिर: ।। अमित्रं यतते जेतुं न रोषेणेति मे मतिः ।। युधिष्ठिर इस बातको अच्छी तरह जानते हैं कि कब स्वाभाविक बलका प्रयोग करना चाहिये तथा कब मित्र और सैन्यबलका। राजा युधिष्ठिर साम, दान, भेद और दण्डनीतिके द्वारा ही यथासमय शत्रुको जीतनेका प्रयत्न करते हैं, क्रोधके द्वारा नहीं--ऐसा मेरा विश्वास है। परिक्रीय धनै: शत्रून्‌ मित्राणि च बलानि च | मूलं च सुदृढं कृत्वा हन्त्यरीन्‌ पाण्डवस्तदा ।। पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर प्रचुर धन देकर शत्रुओंको, मित्रोंको तथा सेनाओंको भी खरीद लेते हैं और अपनी नींवको सुदृढ़ करके शत्रुओंका नाश करते हैं। अशक्यान्‌ पाण्डवान्‌ मन्ये देवैरपि सवासवै: । येषामर्थे सदा युक्तौ कृष्णसंकर्षणावुभौ ।। मैं ऐसा मानता हूँ कि इन्द्र आदि देवता भी उन पाण्डवोंका कुछ नहीं बिगाड़ सकते, जिनकी सहायताके लिये कृष्ण और बलराम दोनों सदा कमर कसे रहते हैं। श्रेयश्ष॒ यदि मन्यध्वं मन्मतं यदि वो मतम्‌ । संविदं पाण्डवै: सार्थ कृत्वा याम यथागतम्‌ ।। यदि आपलोग मेरी बातको हितकर मानते हों, यदि मेरे मतके अनुकूल ही आपलोगोंका मत हो, तो हमलोग पाण्डवोंसे मेल करके जैसे आये हैं, वैसे ही लौट चलें। गोपुराट्टालकैरुच्चैरुपतल्पशतैरपि । गुप्तं पुरवरश्रेष्ठमेतदद्धिश्व संवृतम्‌ ।। तृणधान्येन्धनरसैस्तथा यन्त्रायुधौषधै: । युक्त बहुकपाटैश्व द्रव्यागारतुषादिकै: ।। यह श्रेष्ठ नगर गोपुरों, ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं तथा सैकड़ों उपतल्पोंसे सुरक्षित है। इसके चारों ओर जलसे भरी खाई है। घास-चारा, अनाज, ईंधन, रस, यन्त्र, आयुध तथा औषध आदिकी यहाँ बहुतायत है। बहुत-से कपाट, द्रव्यागार और भूसा आदिसे भी यह नगर भरपूर है। भीमोच्छितमहाचक्रं बृहदट्टालसंवृतम्‌ । दृढ्प्राकारनिर्यूहं शतघ्नीजालसंवृतम्‌ ।। यहाँ बड़े भयंकर और ऊँचे विशाल चक्र हैं। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंकी पंक्ति इस नगरको घेरे हुए है। इसकी चहारदीवारी और छज्जे सुदृढ़ हैं। शतघ्नी (तोप) नामक अस्त्रोंक समुदायसे यह नगरी घिरी हुई है। ऐष्टको दारवो वप्रो मानुषश्चवेति यः स्मृतः | प्राकारकर्तृभिवीरिर्नृगर्भस्तत्र पूजित: ।। इसकी रक्षाके लिये तीन प्रकारका घेरा बना है--एक तो ईंटोंका, दूसरा काठका और तीसरा मानव-सैनिकोंका। चहारदीवारी बनानेवाले वीरोंने यहाँ नरगर्भकी पूजा की है। तदेतन्नरगर्भेण पाण्डरेण विराजते । सालेनानेकतालेन सर्वतः संवृतं पुरम्‌ ।। अनुरक्ता: प्रकृतयो द्रुपदस्य महात्मन: । दानमानार्चिता: सर्वे बाह्माश्नाभ्यन्तराश्न ये ।। इस प्रकार यह नगर श्वेत नरगर्भसे शोभित है। अनेक ताड़के बराबर ऊँचे शालवृक्षोंकी पंक्तियोंद्वारा यह श्रेष्ठ नगरी सब ओरसे घिरी हुई है। महामना राजा द्रपदकी सभी प्रजा और प्रकृतियाँ (मन्त्री आदि) उनमें अनुराग रखती हैं। बाहर और भीतरके सभी कर्मचारियोंका दान और मानद्वारा सत्कार किया जाता है। प्रतिरुद्धानिमाउज्ञात्वा राजभिभ्भीमविक्रमै: । उपयास्यन्ति दाशार्हा: समुदग्रोच्छितायुधा: ।। भयानक पराक्रमी राजाओंद्वारा पाण्डवोंको सब ओरसे घिरा हुआ जानकर समस्त यदुवंशी वीर प्रचण्ड अस्त्र-शस्त्र लिये यहाँ उपस्थित हो जायँगे। तस्मात्‌ संधि वयं कृत्वा धार्तराष्ट्रस्य पापडवै: । स्वराष्ट्रमेव गच्छामो यद्याप्तवचनं मम ।। एतन्मम मत सर्व: क्रियतां यदि रोचते । एतद्धि सुकृतं मन्ये क्षेमं चापि महीक्षिताम्‌ ।।) अतः हम धुृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधनकी पाण्डवोंके साथ संधि कराकर अपने राज्यमें ही लौट चलें। यदि आपलोगोंको मेरी बातपर विश्वास हो और मेरा यह मत सबको ठीक जँचता हो तो आप सब लोग इसे काममें लायें। हमारा यही सर्वोत्तम कर्तव्य है और मैं इसीको राजाओंके लिये कल्याणकारी मानता हूँ। वृत्ते स्वयंवरे चैव राजान: सर्व एव ते । यथागतं विप्रजम्मुर्विदित्वा पाण्डवान्‌ वृतान्‌,स्वयंवर समाप्त हो जानेपर जब यह ज्ञात हो गया कि द्रौपदीने पाण्डवोंका वरण किया है, तब वे सभी राजा जैसे आये थे, वैसे ही (अपने-अपने) देशको लौट गये

Vaiśampāyana said: “When Dhṛtarāṣṭra even wishes to exterminate the Pārthas—men who are righteous, of impeccable conduct, and devoted to what is dear and beneficial to their mother—who could be more blameworthy than he?”

Verse 9

अथ दुर्योधनो राजा विमना भ्रातृभि: सह । अश्वत्थाम्ना मातुलेन कर्णेन च कृपेण च,द्रपदकुमारी कृष्णाने श्वेतवाहन अर्जुनको (जयमाला पहनाकर उनका) वरण किया है, यह अपनी आँखों देखकर राजा दुर्योधनके मनमें बड़ा दुःख हुआ। वह अभश्व॒त्थामा, मामा शकुनि, कर्ण, कृपाचार्य तथा अपने भाइयोंके साथ (ट्रपदकी राजधानीसे) हस्तिनापुरके लिये लौट पड़ा। मार्ममें द:ःशासनने लज्जित होकर दुर्योधनसे धीरे-धीरे (इस प्रकार) कहा --

Vaiśampāyana said: Then King Duryodhana, dejected at heart, set out together with his brothers—along with Aśvatthāman, his maternal uncle, Karṇa, and Kṛpa. Having witnessed with his own eyes Draupadī’s choice of Arjuna (the white-charioted hero) by placing the garland upon him, Duryodhana was overwhelmed with sorrow and humiliation; and thus he turned back toward Hastināpura with his companions. The episode underscores how wounded pride and envy, when unchecked, begin to harden into hostility and adharma.

Verse 10

विनिवृत्तो वृतं दृष्टवा द्रौपद्या श्वेतवाहनम्‌ । त॑ तु दुःशासनो व्रीडन्‌ मन्दं मन्दमिवाब्रवीत्‌,द्रपदकुमारी कृष्णाने श्वेतवाहन अर्जुनको (जयमाला पहनाकर उनका) वरण किया है, यह अपनी आँखों देखकर राजा दुर्योधनके मनमें बड़ा दुःख हुआ। वह अभश्व॒त्थामा, मामा शकुनि, कर्ण, कृपाचार्य तथा अपने भाइयोंके साथ (ट्रपदकी राजधानीसे) हस्तिनापुरके लिये लौट पड़ा। मार्ममें द:ःशासनने लज्जित होकर दुर्योधनसे धीरे-धीरे (इस प्रकार) कहा --

Vaiśampāyana said: Having turned back and seen the chosen bridegroom—Arjuna, the White-steeded one—selected by Draupadī, Duḥśāsana, feeling ashamed, spoke softly and slowly. The scene underscores how public defeat and thwarted desire can ferment humiliation, a moral pressure that later hardens into resentment and adharma.

Verse 11

यद्यसौ ब्राह्मणो न स्याद्‌ विन्देत द्रौपदी न सः । नहितं तत्त्वतो राजन वेद कश्चिद्‌ धनंजयम्‌,'भाईजी! यदि अर्जुन ब्राह्मणके वेशमें न होता तो वह कदापि द्रौपदीको न पा सकता था। राजन! वास्तवमें किसीको यह पता ही नहीं चला कि वह अर्जुन है

Vaiśaṃpāyana said: “Had he not appeared in the guise of a brāhmaṇa, he would not have won Draupadī. O King, in truth no one recognized him as Dhanañjaya (Arjuna) as he really was.”

Verse 12

दैवं च परमं मन्ये पौरुषं चाप्यनर्थकम्‌ | धिगस्तु पौरुषं तात ध्रियन्ते यत्र पाण्डवा:,“मैं तो भाग्यको ही प्रबल मानता हूँ, पुरुषका प्रयत्न निरर्थक है। तात! हमारे पुरुषार्थको धिक्‍कार है, जब कि पाण्डव अभीतक जी रहे हैं!

Vaiśaṃpāyana said: “I regard destiny as supreme, and human effort as futile. Shame on our vaunted exertion, dear one—when the Pāṇḍavas are still being sustained alive.”

Verse 13

एवं सम्भाषमाणास्ते निन्दन्तश्न पुरोचनम्‌ । विविशुर्हास्तिनपुरं दीना विगतचेतस:,इस प्रकार परस्पर बातें करते और पुरोचनको कोसते हुए वे सब कौरव दुःखी होकर हस्तिनापुरमें पहुँचे। (पाण्डवोंकी) सफलता देखकर, उनका चित्त ठिकाने न रहा

Thus conversing among themselves and condemning Purocana, they entered Hāstinapura—dejected and with their minds unsettled. Seeing the Pāṇḍavas’ success, their composure did not remain steady.

Verse 14

त्रस्‍ता विगतसंकल्पा दृष्ट्वा पार्थानू महौजस: । मुक्तान्‌ हव्यभुजश्चैव संयुक्तान्‌ टद्रुपदेन च,महातेजस्वी कुन्तीकुमार लाक्षागृहकी आगसे जीवित बचकर राजा ट्रुपदके सम्बन्धी हो गये, यह अपनी आँखों देखकर और धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा द्रुपदके अन्य पुत्र युद्धकी सम्पूर्ण कलाओंमें दक्ष हैं, इस बातका विचार करके कौरव बहुत डर गये। उनकी आशा निराशामें परिणत हो गयी

Vaiśampāyana said: Seeing the mighty Pāṇḍava brothers—who had escaped the consuming fire—and finding them now allied with King Drupada, the Kauravas were struck with fear and lost their resolve. Their confident expectations collapsed into disappointment, for the very men they had sought to destroy had returned with strengthened support and martial readiness.

Verse 15

धृष्टय्युम्न॑ तु संचिन्त्य तथैव च शिखण्डिनम्‌ | द्रुपदस्यात्मजांश्षान्यान्‌ सर्वयुद्धविशारदान्‌,महातेजस्वी कुन्तीकुमार लाक्षागृहकी आगसे जीवित बचकर राजा ट्रुपदके सम्बन्धी हो गये, यह अपनी आँखों देखकर और धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा द्रुपदके अन्य पुत्र युद्धकी सम्पूर्ण कलाओंमें दक्ष हैं, इस बातका विचार करके कौरव बहुत डर गये। उनकी आशा निराशामें परिणत हो गयी

Vaiśampāyana said: Reflecting on Dhṛṣṭadyumna, and likewise on Śikhaṇḍin, and on Drupada’s other sons—each accomplished in every art of war—the Kauravas were seized with fear. Their hopes collapsed into despair as they realized the strength of those now allied with the sons of Kuntī.

Verse 16

विदुरस्त्वथ तां भ्रुत्वा द्रौपदी पाण्डवैर्वृतान्‌ । व्रीडितान्‌ धार्तराष्ट्रांक्ष भग्नदर्पानुपागतान्‌,विदुरजीने जब यह सुना कि पाण्डवोंने द्रौपदीको प्राप्त किया है और धृतराष्ट्रके पुत्र अपना अभिमान चूर्ण हो जानेसे लज्जित होकर लौट आये हैं, तब वे मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। राजन! तब वे धृतराष्ट्रके पास जाकर विस्मयसूचक वाणीमें बोले--“महाराज! हमारा अहोभाग्य है, जो कौरववंशकी वृद्धि हो रही है

Vaiśampāyana said: When Vidura heard that Draupadī had been won and that Dhṛtarāṣṭra’s sons had returned ashamed, their pride shattered, he felt inwardly pleased. Then he went to King Dhṛtarāṣṭra and, speaking in a tone of wonder, said: “O King, how fortunate we are that the Kuru line is being strengthened.” The verse highlights Vidura’s ethical satisfaction at a rightful outcome and his concern for the welfare and continuity of the dynasty rather than for partisan triumph.

Verse 17

ततः प्रीतमना: क्षत्ता धृतराष्ट्र विशाम्पते । उवाच दिष्टया कुरवो वर्धन्त इति विस्मित:,विदुरजीने जब यह सुना कि पाण्डवोंने द्रौपदीको प्राप्त किया है और धृतराष्ट्रके पुत्र अपना अभिमान चूर्ण हो जानेसे लज्जित होकर लौट आये हैं, तब वे मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। राजन! तब वे धृतराष्ट्रके पास जाकर विस्मयसूचक वाणीमें बोले--“महाराज! हमारा अहोभाग्य है, जो कौरववंशकी वृद्धि हो रही है

Vaiśampāyana said: Then Vidura, the chamberlain, inwardly delighted, went to Dhṛtarāṣṭra, O lord of the people. With a tone of wonder he said, “By good fortune, O King, the Kurus are prospering and increasing.”

Verse 18

| 4९ ' | (2.० ! हू हे | वैचित्रवीर्यस्तु वचो निशम्य विदुरस्य तत्‌ | अब्रवीत्‌ परमप्रीतो दिष्टया दिष्टयेति भारत,भारत! विचित्रवीर्यनन्दन राजा धृतराष्ट्र विदुरकी यह बात सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हो सहसा बोल उठे--'अहोभाग्य, अहोभाग्य”

Vaiśampāyana said: Hearing those words of Vidura, the son of Vicitravīrya spoke in sudden, overflowing joy: “How fortunate! How fortunate indeed, O Bhārata!” The exclamation underscores a ruler’s relief at counsel that aligns with dharma and promises stability for the realm.

Verse 19

मन्यते स वृतं पुत्र ज्येष्ठं द्रपदकन्यया । दुर्योधनमविज्ञानात्‌ प्रज्ञाचक्षुनरिश्वर:,उस अंधे नरेशने अज्ञानवश यह समझ लिया कि “ट्रुपदकन्याने मेरे ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधनका वरण किया है”

Vaiśampāyana said: Blinded by ignorance, the king—though famed as ‘wisdom-eyed’—mistook the matter and believed that Drupada’s daughter had chosen his eldest son Duryodhana as her husband. The verse highlights how delusion and partiality can distort judgment, especially in those entrusted with royal discernment.

Verse 20

अथ त्वाज्ञापयामास द्रौपद्या भूषणं बहु । आनीयतां वै कृष्णेति पुत्र दुर्योधनं तदा,इसलिये उन्होंने आज्ञा दी--'द्रौपदीके लिये बहुत-से आभूषण मँगाओ और मेरे पुत्र दुर्योधन तथा द्रौपदीको बड़ी धूमधामसे नगरमें ले आओ"

Then he issued an order: “Bring many ornaments for Draupadī; and bring Kṛṣṇā (Draupadī) together with my son Duryodhana into the city with great ceremony.” The command underscores the royal impulse to display honor and legitimacy through public spectacle, even as such outward celebration can mask deeper tensions of duty, consent, and political intent.

Verse 21

अथास्य पश्चाद्‌ विदुर आचख्यौ पाण्डवान्‌ वृतान्‌ | सर्वान्‌ कुशलिनो वीरान्‌ पूजितान्‌ द्रपदेन ह,तब पीछेसे विदुरने उन्हें बताया कि--'द्रौपदीने पाण्डवोंका वरण किया है। वे सभी वीर राजा ट्रुपदके द्वारा पूजित होकर वहाँ कुशलपूर्वक रह रहे हैं

Then, afterwards, Vidura informed him about the Pāṇḍavas who had been chosen: that all those heroic princes were safe and well, and that they were being duly honoured by King Drupada there. The report underscores rightful hospitality and the restoration of order after a decisive marital choice, emphasizing welfare (kuśala) and proper royal conduct (pūjā) as markers of dharma.

Verse 22

तेषां सम्बन्धिनश्वान्यान्‌ बहूनू बलसमन्वितान्‌ । समागतान्‌ पाण्डवेयैस्तस्मिन्नेव स्वयंवरे,उसी स्वयंवरमें उनके बहुत-से अन्य सम्बन्धी भी, जो भारी सैनिकशक्तिसे सम्पन्न हैं, पाण्डवोंसे प्रेमपूर्वक मिले हैं

Vaiśampāyana said: At that very svayaṃvara, many other kinsmen of theirs as well—men endowed with considerable military strength—assembled and met the Pāṇḍavas there in a spirit of goodwill. The scene underscores how alliances and kinship networks, especially among the powerful, gather around a marriage-choice ceremony that can reshape political and ethical obligations.

Verse 23

(एतच्छुत्वा तु वचनं विदुरस्य नराधिप: । आकार च्छादनार्थ तु दिष्टया दिष्टयेति चाब्रवीत्‌ ।। विदुरका यह कथन सुनकर राजा धृतराष्ट्रने अपनी बदली हुई आकृतिको छिपानेके लिये कहा--'अहोभाग्य! अहोभाग्य!! धृतराष्ट उवाच एवं विदुर भद्रं ते यदि जीवन्ति पाण्डवा: । साध्वाचारा तथा कुन्ती सम्बन्धो द्रुपदेन च ।। अन्ववाये वसोर्जात: प्रकृष्टे मान्यके कुले । व्रतविद्यातपोवृद्धः पार्थिवानां धुरन्धर: ।। पुत्राश्नास्य तथा पौत्रा: सर्वे सुचरितव्रता: । तेषां सम्बन्धिनश्लान्ये बहव: सुमहाबला: ।।) धृतराष्ट्र (फिर) बोले--विदुर! यदि ऐसी बात है, यदि (वास्तवमें) पाण्डव जीवित हैं, तो बड़े आनन्दकी बात है, तुम्हारा कल्याण हो। अवश्य ही कुन्ती बड़ी साध्वी हैं। ट्रुपदके साथ जो सम्बन्ध हुआ है, वह हमारे लिये अत्यन्त स्पृहणीय है। विदुर! राजा द्रुपद वसुके श्रेष्ठ और सम्माननीय कुलमें उत्पन्न हुए हैं। व्रत, विद्या और तप--तीनोंमें वे बढ़े-चढ़े हैं। राजाओंमें तो वे अग्रगण्य हैं ही। उनके सभी पुत्र और पौत्र भी उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हैं। ट्रपदके अन्य बहुत-से सम्बन्धी भी अत्यन्त बलवान हैं। यथैव पाण्डो: पुत्रास्तु तथैवाभ्यधिका मम । यथा चाभ्यधिका बुद्धिर्मम तान्‌ प्रति तच्छूणु,विदुर! युधिष्ठिर आदि जैसे पाण्डुके पुत्र हैं, वैसे ही या उससे भी अधिक मेरे हैं। उनके प्रति मेरे मनमें अधिक अपनापनका भाव क्‍यों है?, यह बताता हूँ; सुनो

Having heard Vidura’s words, the king (Dhṛtarāṣṭra), wishing to conceal the change in his expression, exclaimed, “Fortune! Fortune indeed!” Dhṛtarāṣṭra said: “So, Vidura—blessings upon you—if the Pāṇḍavas are truly alive, it is a matter of great joy. Kuntī is surely a woman of noble conduct, and the alliance formed with Drupada is highly desirable for us. Drupada is born in the distinguished and honored lineage of Vasu; he excels in vows, learning, and austerity, and among kings he is a foremost pillar. His sons and grandsons all observe excellent disciplines, and many of his other relatives too are exceedingly mighty.”

Verse 24

यत्‌ ते कुशलिनो वीरा मित्रवन्तश्न पाण्डवा: । तेषां सम्बन्धिनश्नान्ये बहवश्ष महाबला:,वे वीर पाण्डव कुशलपूर्वक जीवित बच गये हैं और उन्हें मित्रोंका सहयोग भी प्राप्त हो गया है। इतना ही नहीं और भी बहुत-से महाबली नरेश उनके सम्बन्धी होते जा रहे हैं

Dhṛtarāṣṭra said: “Those heroic Pāṇḍavas are safe and thriving, and they have gained the support of allies. Moreover, many other mighty kings are also becoming connected to them through ties of relationship.”

Verse 25

को हि द्रुपदमासाद्य मित्र क्षत्त: सबान्धवम्‌ | न बुभूषेद्‌ भवेनार्थी गतश्रीरपि पार्थिव:,विदुर! कौन ऐसा राजा है, जिसकी सम्पत्ति नष्ट हो जानेपर भी बन्धु-बान्धवोंसहित द्रपदको मित्रके रूपमें पाकर जीना नहीं चाहेगा

Dhṛtarāṣṭra said: “Vidura, what king—though his fortune be lost—would not wish to live on, if he could approach Drupada as a friend, together with his kinsmen? For one in need, such an alliance is itself a means of restoration.”

Verse 26

वैशम्पायन उवाच त॑ तथा भाषमाणं तु विदुर: प्रत्यभाषत । नित्यं भवतु ते बुद्धिरेषा राजज्छतं समा: । इत्युक्त्वा प्रययौ राजन्‌ विदुर: स्वं निवेशनम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसी बातें कहनेवाले राजा धृतराष्ट्रसे विदुर (इस प्रकार) बोले--“महाराज! सौ वर्षोतक आपकी बुद्धि ऐसी ही बनी रहे।” राजन्‌! इतना कहकर विदुरजी अपने घर चले गये

Vaiśampāyana said: Then Vidura replied to the king who was speaking in that manner: “O King, may this very understanding of yours remain constant for a hundred years.” Having said this, O King, Vidura departed for his own residence. The line carries a pointed ethical irony: Vidura’s words outwardly sound like a blessing, yet they also underscore that a ruler’s fixed mindset—if misguided—can become a long-lasting cause of harm.

Verse 27

ततो दुर्योधनश्लापि राधेयश्व विशाम्पते । धृतराष्ट्रमुपागम्य वचोड<ब्रूतामिदं तदा,जनमेजय! तदनन्तर दुर्योधन और कर्णने धृतराष्ट्रकरे पास आकर यह बात कही --

Then, O lord of the people, Duryodhana and Karṇa (son of Rādhā) approached Dhṛtarāṣṭra and, at that time, spoke these words—O Janamejaya. The narrative signals a deliberate move by the two principal instigators to influence the blind king’s judgment, foreshadowing counsel driven more by ambition and factional interest than by impartial dharma.

Verse 28

संनिधौ विदुरस्य त्वां दोषं वक्तुं न शक्‍नुव: । विविक्तमिति वक्ष्याव: कि तवेदं चिकीर्षितम्‌,“महाराज! विदुरके समीप हम आपसे आपका कोई दोष नहीं बता सकते। इस समय एकान्त है, इसलिये कहते हैं। आप यह क्या करना चाहते हैं? पूज्य पिताजी! आप तो शत्रुओंकी उन्नतिको ही अपनी उन्नति मानने लगे हैं और विदुरजीके निकट हमारे वैरियोंकी ही भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं

Vaiśampāyana said: “In Vidura’s presence we are unable to speak to you of your fault. But now, since this is a private moment, we will say it: what is it that you intend to do? You have begun to treat the rise of your enemies as though it were your own rise, and in Vidura’s hearing you repeatedly praise our adversaries.”

Verse 29

सपत्नवृद्धिं यत्‌ तात मन्यसे वृद्धिमात्मन: । अभिष्टौषि च यत्‌ क्षत्तु: समीपे द्विषतां वर,“महाराज! विदुरके समीप हम आपसे आपका कोई दोष नहीं बता सकते। इस समय एकान्त है, इसलिये कहते हैं। आप यह क्या करना चाहते हैं? पूज्य पिताजी! आप तो शत्रुओंकी उन्नतिको ही अपनी उन्नति मानने लगे हैं और विदुरजीके निकट हमारे वैरियोंकी ही भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं

Vaiśampāyana said: “Father, you have begun to regard the prosperity of your rivals as your own prosperity; and, in the presence of Vidura, you even lavish praise upon the foremost among those who bear enmity toward us. In Vidura’s proximity we cannot openly point out your fault; but now, in private, we ask—what is it that you intend to do?”

Verse 30

अन्यस्मिन्‌ नृप कर्तव्ये त्वमन्यत्‌ कुरुषेडनघ । तेषां बलविघातो हि कर्तव्यस्तात नित्यश:,निष्पाप नरेश! हमें करना तो कुछ और चाहिये, किंतु आप करते कुछ और (ही) हैं। तात! हमारे लिये तो यही उचित है कि हम सदा पाण्डवोंकी शक्तिका विनाश करते रहें

Vaiśampāyana said: “O king, when something else ought to be done, you—blameless one—do something different. For us, dear child, the proper course is this alone: to keep, at all times, working to break the strength of those men (the Pāṇḍavas).”

Verse 31

ते वयं प्राप्तकालस्य चिकीर्षा मन्त्रयामहे । यथा नो न ग्रसेयुस्ते सपुत्रबलबान्धवान्‌,“इस समय जैसा अवसर उपस्थित है, इसमें हमें क्या करना चाहिये--यही सोच- विचारकर निश्चय करना है, जिससे वे पाण्डव पुत्र, बान्धव तथा सेनासहित हमारा सर्वनाश न कर बैठे”

Vaiśampāyana said: “Now that the decisive moment has arrived, we must deliberate and determine what is to be done, so that those Pāṇḍavas—together with their sons, their kinsmen, and their armed forces—do not overwhelm us and bring about our total ruin.”

Verse 199

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि दुर्योधनवाक्ये नवनवत्यधिकशततमो<ध्याय:

Thus, in the Śrī Mahābhārata, within the Ādi Parva—under the section concerning Vidura’s arrival and the attainment of the kingdom—ends the one-hundred-and-ninety-ninth chapter, presented in the context of Duryodhana’s speech. The colophon marks the close of this unit, framing the narrative around the political consolidation of rule and the moral tensions implicit in Duryodhana’s words.

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns how to preserve kinship peace while distributing sovereignty: Dhṛtarāṣṭra’s instruction seeks to prevent renewed factional discord by formalizing a territorial solution, requiring the Pāṇḍavas to accept a pragmatic settlement without escalating rivalry.

Legitimacy is constructed through restraint, consent, and institution-building: ethical governance is shown not only in personal virtue but in procedures—permissions, homage, public accountability, and the creation of stable civic infrastructure.

No explicit phalaśruti is stated in this chapter; its meta-significance lies in illustrating how dharma operates through political form—agreements, jurisdiction, and the disciplined avoidance of renewed conflict within a shared dynasty.