खाण्डवप्रस्थप्रवेशः तथा इन्द्रप्रस्थनिर्माणवर्णनम् | Entry into Khāṇḍavaprastha and Description of Indraprastha’s Founding
(धार्मिकान् वृत्तसम्पन्नान् मातु: प्रियहिते रतान् । यदा तानीदृशान् पार्थनुत्सादयितुमिच्छति ।। 'देखो न; धर्मात्मा, सदाचारी तथा माताके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहनेवाले कुन्तीकुमारोंको भी यह धृतराष्ट्र नष्ट करना चाहता है (भला, इससे बढ़कर निन्दनीय कौन होगा)।/ ततः स्वयंवरे वत्ते धार्तराष्ट्रा: सम भारत । मन्त्रयन्ते ततः सर्वे कर्णसौबलदूषिता: ।। जनमेजय! उधर स्वयंवर समाप्त होनेपर धुृतराष्ट्रके सभी पुत्र, जिन्हें कर्ण और शकुनिने बिगाड़ रखा था, इस प्रकार सलाह करने लगे। शकुनिरुवाच कश्चिच्छत्रु: कर्शनीय: पीडनीयस्तथापर: । उत्सादनीया: कौन्तेया: सर्वे क्षत्रस्थ मे मता: ।। शकुनि बोला--संसारमें कोई शत्रु तो ऐसा होता है, जिसे सब प्रकारसे दुर्बल कर देना उचित है; दूसरा ऐसा होता है, जिसे सदा पीड़ा दी जाय। परंतु कुन्तीके ये सभी पुत्र तो समस्त क्षत्रियोंके लिये समूल नष्ट कर देनेयोग्य हैं। इनके विषयमें मेरा यही मत है। एवं पराजिता: सर्वे यदि यूयं गमिष्यथ । अकृत्वा संविदं कांचित् तद् वस्तप्स्यत्यसंशयम् ।। यदि इस प्रकार पराजित होकर आप सब लोग इन (पाण्डवोंके विनाशकी) युक्ति निश्चित किये बिना ही चले जायँगे, तो अवश्य ही यह भूल आपलोगोंको सदा संतप्त करती रहेगी। अयं देशश्ष कालश्न पाण्डवोद्धरणाय न: । न चेदेवं करिष्यध्वं लोके हास्या भविष्यथ ।। पाण्डवोंको जड़मूलसहित विनष्ट करनेके लिये हमारे सामने यही उपयुक्त देश और काल उपस्थित है। यदि आपलोग ऐसा नहीं करेंगे तो संसारमें उपहासके पात्र होंगे। यमेते संश्रिता वस्तुं कामयन्ते च भूमिपम् । सो<ल्पवीर्यबलो राजा दट्रुपदो वै मतो मम ।। ये पाण्डव जिस राजाके आश्रयमें रहनेकी इच्छा रखते हैं, उस द्रपदका बल और पराक्रम मेरी रायमें बहुत थोड़ा है। यावदेतान् न जानन्ति जीवतो वृष्णिपुड्रवा: । चैद्यश्न पुरुषव्याप्र: शिशुपाल: प्रतापवान् ।। जबतक वृष्णिवंशके श्रेष्ठ वीर यह नहीं जानते कि पाण्डव जीवित हैं, पुरुषसिंह चेदिराज प्रतापी शिशुपाल भी जबतक इस बातसे अनभिज्ञ है, तभीतक पाण्डवोंको मार डालना चाहिये। एकीभावं गता राज्ञा ट्रुपदेन महात्मना । दुराधर्षतरा राजन् भविष्यन्ति न संशय: ।। राजन! जब ये महात्मा राजा ट्रुपदके साथ मिलकर एक हो जायँगे, तब इन्हें परास्त करना अत्यन्त कठिन हो जायगा, इसमें संशय नहीं है। यावदत्वरतां सर्वे प्राप्तुवन्ति नराधिपा: । तावदेव व्यवस्याम: पाण्डवानां वध प्रति ।। जबतक सब राजा ढीले पड़े हैं, तभीतक हमें पाण्डवोंके वधके लिये पूरा प्रयत्न कर लेना चाहिये। मुक्ता जतुगृहाद् भीमाद् आशीविषमुखादिव । पुनर्यदीह मुच्यन्ते महन्नो भयमाविशेत् ।। विषधर सर्पके मुख-सदृश भयंकर लाक्षागृहसे तो वे बच ही गये हैं। यदि फिर यहाँ हमारे हाथसे छूट जाते हैं तो उनसे हमलोगोंको महान् भय प्राप्त हो सकता है। तेषामिहोपयातानामेषां च पुरवासिनाम् । अन्तरे दुष्करं स्थातुं मेषयोर्महतोरिव ।। यदि वे वृष्णिवंशी और चेदिवंशी वीर यहाँ आ जायँ और यहाँके नागरिक भी अस्त्र- शस्त्र लेकर खड़े हो जायेँ तो इनके बीचमें खड़ा होना उतना ही कठिन होगा, जितना आपसमें लड़ते हुए दो विशाल मेढोंके बीचमें ठहरना। हलधृक्प्रगूहीतानि बलानि बलिनां स्वयम् । यावन्न कुरुसेनायां पतन्ति पतगा इव ।। तावत् सर्वाभिसारेण पुरमेतद् विनाश्यताम् । एतदत्र परं मन्ये प्राप्तकालं नरर्षभा: ।। जबतक हल धारण करनेवाले बलरामजीके द्वारा संचालित बलवान योद्धाओंकी सेनाएँ स्वयं ही आकर कौरवसेनारूपी खेतीपर टिड्डियोंकी भाँति न टूट पड़ें, तबतक हम सब लोग एक साथ आक्रमण करके इस नगरको नष्ट कर दें। नरश्रेष्ठ वीरो! मैं इस अवसरपर यही सर्वोत्तम कर्तव्य मानता हूँ! वैशम्पायन उवाच शकुनेर्वचनं श्रुत्वा भाषमाणस्य दुर्मते: । सौमदत्तिरिदं वाक्यं जगाद परम ततः ।। वैशम्पायनजी कहते हैं-दुर्बद्धि शकुनिका यह प्रस्ताव सुनकर सोमदतकुमार भूरिश्रवाने यह उत्तम बात कही। सौमदत्तिर्वाच प्रकृती: सप्त वै ज्ञात्वा आत्मनश्न परस्य च | तथा देशं च कालं च षड्विधांश्व नयेद् गुणान् ।। भूरिश्रवा बोले--अपने पक्षकी और शत्रुपक्षकी भी सातों* प्रकृतियोंको ठीक-ठीक जानकर ही देश और कालका ज्ञान रखते हुए छः: प्रकारके गुणोंका यथावसर प्रयोग करना चाहिये। स्थान वृद्धि क्षयं चैव भूमिं मित्राणि विक्रमम् । समीक्ष्याथाभियुञ्जीत परं व्यसनपीडितम् ।। स्थान, वृद्धि, क्षय, भूमि, मित्र तथा पराक्रम--इन सबकी ओर दृष्टि रखते हुए यदि शत्रु संकटसे पीड़ित हो तभी उसपर आक्रमण करना चाहिये। ततोऊ&हं पाण्डवान् मन्ये मित्रकोशसमन्वितान् । बलस्थान् विक्रमस्थांश्व स्वकृतै: प्रकृतिप्रियान् ।। इस दृष्टिसे देखनेपर मैं पाण्डवोंको मित्र और खजाना दोनोंसे सम्पन्न समझता हूँ। वे बलवान तो हैं ही, पराक्रमी भी हैं और अपने सत्कर्मोद्वारा समस्त प्रजाके प्रिय हो रहे हैं। वपुषा हि तु भूतानां नेत्राणि हृदयानि च । श्रोत्रं मधुरया वाचा रमयत्यर्जुनो नृणाम् ।। अर्जुन अपने शरीरकी गठनसे (सभी) मनुष्योंके नेत्रों तथा हृदयको आनन्द प्रदान करते हैं और मीठी-मीठी वाणीद्वारा सबके कानोंको सुख पहुँचाते हैं। न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन भेजिरे । यद् बभूव मनःकान्तं कर्मणा च चकार तत् ।। केवल प्रारब्धसे ही प्रजा उनकी सेवा नहीं करती। प्रजाके मनको जो प्रिय लगता है, उसकी पूर्ति अर्जुन अपने प्रयत्नोंद्वारा करते रहते हैं। नहायुक्त न चासक्तं नानृतं न च विप्रियम् । भाषितं चारुभाषस्य जज्ञे पार्थस्य भारती ।। मनोहर वचन बोलनेवाले अर्जुनकी वाणी कभी ऐसा वचन नहीं बोलती, जो अयुक्त, आमसत्तिपूर्ण, मिथ्या तथा अप्रिय हो। तानेवंगुणसम्पन्नान् सम्पन्नान् राजलक्षणै: । न तान् पश्यामि ये शक्ता: समुच्छेत्तुं यथा बलात् ।। समस्त पाण्डव राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न तथा उपर्युक्त गुणोंसे विभूषित हैं। मैं ऐसे किन्हीं वीरोंको नहीं देखता, जो अपने बलसे पाण्डवोंका वास्तवमें उच्छेद कर सकें। प्रभावशक्तिर्विपुला मन्त्रशक्तिश्न पुष्कला । तथैवोत्साहशक्तिक्ष पार्थेष्वभ्यधिका सदा ।। उनकी प्रभावशक्ति विपुल है, मन्त्रशक्ति भी प्रचुर है तथा उत्साहशक्ति भी पाण्डवोंमें सबसे अधिक है। मौलमित्रबलानां च कातलज्ञो वै युधिष्ठिर: । साम्ना दानेन भेदेन दण्डेनेति युधिष्ठिर: ।। अमित्रं यतते जेतुं न रोषेणेति मे मतिः ।। युधिष्ठिर इस बातको अच्छी तरह जानते हैं कि कब स्वाभाविक बलका प्रयोग करना चाहिये तथा कब मित्र और सैन्यबलका। राजा युधिष्ठिर साम, दान, भेद और दण्डनीतिके द्वारा ही यथासमय शत्रुको जीतनेका प्रयत्न करते हैं, क्रोधके द्वारा नहीं--ऐसा मेरा विश्वास है। परिक्रीय धनै: शत्रून् मित्राणि च बलानि च | मूलं च सुदृढं कृत्वा हन्त्यरीन् पाण्डवस्तदा ।। पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर प्रचुर धन देकर शत्रुओंको, मित्रोंको तथा सेनाओंको भी खरीद लेते हैं और अपनी नींवको सुदृढ़ करके शत्रुओंका नाश करते हैं। अशक्यान् पाण्डवान् मन्ये देवैरपि सवासवै: । येषामर्थे सदा युक्तौ कृष्णसंकर्षणावुभौ ।। मैं ऐसा मानता हूँ कि इन्द्र आदि देवता भी उन पाण्डवोंका कुछ नहीं बिगाड़ सकते, जिनकी सहायताके लिये कृष्ण और बलराम दोनों सदा कमर कसे रहते हैं। श्रेयश्ष॒ यदि मन्यध्वं मन्मतं यदि वो मतम् । संविदं पाण्डवै: सार्थ कृत्वा याम यथागतम् ।। यदि आपलोग मेरी बातको हितकर मानते हों, यदि मेरे मतके अनुकूल ही आपलोगोंका मत हो, तो हमलोग पाण्डवोंसे मेल करके जैसे आये हैं, वैसे ही लौट चलें। गोपुराट्टालकैरुच्चैरुपतल्पशतैरपि । गुप्तं पुरवरश्रेष्ठमेतदद्धिश्व संवृतम् ।। तृणधान्येन्धनरसैस्तथा यन्त्रायुधौषधै: । युक्त बहुकपाटैश्व द्रव्यागारतुषादिकै: ।। यह श्रेष्ठ नगर गोपुरों, ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं तथा सैकड़ों उपतल्पोंसे सुरक्षित है। इसके चारों ओर जलसे भरी खाई है। घास-चारा, अनाज, ईंधन, रस, यन्त्र, आयुध तथा औषध आदिकी यहाँ बहुतायत है। बहुत-से कपाट, द्रव्यागार और भूसा आदिसे भी यह नगर भरपूर है। भीमोच्छितमहाचक्रं बृहदट्टालसंवृतम् । दृढ्प्राकारनिर्यूहं शतघ्नीजालसंवृतम् ।। यहाँ बड़े भयंकर और ऊँचे विशाल चक्र हैं। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंकी पंक्ति इस नगरको घेरे हुए है। इसकी चहारदीवारी और छज्जे सुदृढ़ हैं। शतघ्नी (तोप) नामक अस्त्रोंक समुदायसे यह नगरी घिरी हुई है। ऐष्टको दारवो वप्रो मानुषश्चवेति यः स्मृतः | प्राकारकर्तृभिवीरिर्नृगर्भस्तत्र पूजित: ।। इसकी रक्षाके लिये तीन प्रकारका घेरा बना है--एक तो ईंटोंका, दूसरा काठका और तीसरा मानव-सैनिकोंका। चहारदीवारी बनानेवाले वीरोंने यहाँ नरगर्भकी पूजा की है। तदेतन्नरगर्भेण पाण्डरेण विराजते । सालेनानेकतालेन सर्वतः संवृतं पुरम् ।। अनुरक्ता: प्रकृतयो द्रुपदस्य महात्मन: । दानमानार्चिता: सर्वे बाह्माश्नाभ्यन्तराश्न ये ।। इस प्रकार यह नगर श्वेत नरगर्भसे शोभित है। अनेक ताड़के बराबर ऊँचे शालवृक्षोंकी पंक्तियोंद्वारा यह श्रेष्ठ नगरी सब ओरसे घिरी हुई है। महामना राजा द्रपदकी सभी प्रजा और प्रकृतियाँ (मन्त्री आदि) उनमें अनुराग रखती हैं। बाहर और भीतरके सभी कर्मचारियोंका दान और मानद्वारा सत्कार किया जाता है। प्रतिरुद्धानिमाउज्ञात्वा राजभिभ्भीमविक्रमै: । उपयास्यन्ति दाशार्हा: समुदग्रोच्छितायुधा: ।। भयानक पराक्रमी राजाओंद्वारा पाण्डवोंको सब ओरसे घिरा हुआ जानकर समस्त यदुवंशी वीर प्रचण्ड अस्त्र-शस्त्र लिये यहाँ उपस्थित हो जायँगे। तस्मात् संधि वयं कृत्वा धार्तराष्ट्रस्य पापडवै: । स्वराष्ट्रमेव गच्छामो यद्याप्तवचनं मम ।। एतन्मम मत सर्व: क्रियतां यदि रोचते । एतद्धि सुकृतं मन्ये क्षेमं चापि महीक्षिताम् ।।) अतः हम धुृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधनकी पाण्डवोंके साथ संधि कराकर अपने राज्यमें ही लौट चलें। यदि आपलोगोंको मेरी बातपर विश्वास हो और मेरा यह मत सबको ठीक जँचता हो तो आप सब लोग इसे काममें लायें। हमारा यही सर्वोत्तम कर्तव्य है और मैं इसीको राजाओंके लिये कल्याणकारी मानता हूँ। वृत्ते स्वयंवरे चैव राजान: सर्व एव ते । यथागतं विप्रजम्मुर्विदित्वा पाण्डवान् वृतान्,स्वयंवर समाप्त हो जानेपर जब यह ज्ञात हो गया कि द्रौपदीने पाण्डवोंका वरण किया है, तब वे सभी राजा जैसे आये थे, वैसे ही (अपने-अपने) देशको लौट गये
dhārmikān vṛttasampannān mātuḥ priyahite ratān | yadā tānīdṛśān pārthān utsādayitum icchati ||
Vaiśampāyana said: “When Dhṛtarāṣṭra even wishes to exterminate the Pārthas—men who are righteous, of impeccable conduct, and devoted to what is dear and beneficial to their mother—who could be more blameworthy than he?”
वैशम्पायन उवाच
The verse condemns the moral inversion of targeting the virtuous: a ruler’s intent to annihilate righteous, well-conducted heirs—especially those devoted to their mother’s welfare—is presented as a peak of blameworthiness, highlighting that power without dharma becomes ethically reprehensible.
Vaiśampāyana comments on Dhṛtarāṣṭra’s hostile intention toward the Pāṇḍavas, emphasizing their virtues and Kuntī-centered filial devotion, thereby framing the Kuru court’s emerging plot against them as ethically scandalous.