Adhyaya 5
Vana ParvaAdhyaya 522 Verses

Adhyaya 5

विदुर-धृतराष्ट्रसंवादः (Vidura–Dhṛtarāṣṭra Dialogue on Rajadharma and Restitution)

Upa-parva: Vidura–Dhṛtarāṣṭra Nīti-saṃvāda (Counsel after the Pāṇḍavas enter the forest)

Vaiśaṃpāyana narrates that after the Pāṇḍavas enter the forest, Dhṛtarāṣṭra—internally afflicted—addresses Vidura, praising his impartiality and subtle knowledge of dharma and requesting guidance on what should be done and how the citizens might respond. Vidura replies with a doctrinal framing: the trivarga is rooted in dharma, and kingship itself is said to be dharma-rooted. He identifies the assembly’s lapse—dharma being violated through the dice episode led by Śakuni’s faction—and proposes a remedy: restore to the Pāṇḍavas what was wrongfully extracted, seek their satisfaction, and reduce the influence/humiliation associated with Śakuni’s role. Vidura warns that failure will lead to Kuru destruction, noting the martial capacities of Bhīma and Arjuna and the inevitability of escalation if grievance is left unaddressed. He further prescribes reconciliation gestures: Duryodhana and allies should approach the Pāṇḍavas with goodwill; reparative requests should be made (including addressing the offense involving Draupadī); and Dhṛtarāṣṭra should console and honor Yudhiṣṭhira, installing him in sovereignty to stabilize the realm. Dhṛtarāṣṭra responds that Vidura’s counsel does not enter his heart, suspects Vidura of prioritizing the Pāṇḍavas, asserts paternal partiality toward Duryodhana, and dismisses Vidura with harsh comparatives. The narration closes with Dhṛtarāṣṭra withdrawing into the inner chambers, while Vidura departs swiftly toward where the Pārthas reside.

Chapter Arc: वनवास की धूल और निर्वासन की चुप्पी के बीच पाण्डव सरस्वती–दृषद्वती–यमुना का सेवन करते हुए पश्चिम दिशा में वन-से-वन भटकते हैं, मानो राज्य से कटे हुए भी धर्म के पथ पर टिके रहने का संकल्प खोज रहे हों। → सरस्वती-तट के समभूमि और मरुधन्व प्रदेश पार कर वे मुनिजनप्रिय काम्यकवन में प्रवेश करते हैं; वहीं धृतराष्ट्र के दरबार की घुटन और दुर्योधन-पक्ष की कठोरता से आहत विदुर, तीव्रगामी रथ से पाण्डवों तक पहुँचते हैं—राजनीति का विष वन की शान्ति में भी उतर आता है। → विदुर युधिष्ठिर को धृतराष्ट्र का संदेश और अपना हृदय-निष्कर्ष सुनाते हैं: जो तीव्र क्लेशों में भी क्षमा और समय-प्रतीक्षा रखता है, वह भीतर-भीतर अग्नि की तरह शक्ति बढ़ाकर अंततः पृथ्वी (राज्य) को अकेला भोगता है; और जो सहायकों को अविभक्त धन, समान अन्न, सत्य व समता देता है, वही स्थायी संग्रह कर पाता है। → युधिष्ठिर विदुर की नीति-धर्मयुक्त वाणी स्वीकार करते हैं—देश-काल के अनुरूप, प्रमाद-रहित होकर वही करने का वचन देते हैं जो हितकर है, और आगे के लिए विवेकपूर्ण मार्गदर्शन माँगते हैं। → विदुर की सीख के बाद प्रश्न खुला रह जाता है: क्या पाण्डव क्षमा और धैर्य के साथ शक्ति-संचय करेंगे, या अपमान का भार उन्हें शीघ्र प्रतिशोध की ओर धकेलेगा?

Shlokas

Verse 1

हि >> आय ० () हि २ 7 पञठ्चमो<ध्याय: पाण्डवोंका काम्यकवनमें प्रवेश और विदुरजीका वहाँ जाकर उनसे मिलना और बातचीत करना वैशम्पायन उवाच पाण्डवास्तु वने वासमुद्दिश्य भरतर्षभा: । प्रययुर्जाह्नवीकूलात्‌ कुरुक्षेत्र सहानुगा:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भरतवंश-शिरोमणि पाण्डव वनवासके लिये गंगाजीके तटसे अपने साथियोंसहित कुरक्षेत्रमें गये

Vaiśampāyana berkata: “Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, para Pāṇḍava—bertekad menjalani pengasingan di hutan—berangkat dari tepi Jāhnavī (Gaṅgā) menuju Kurukṣetra, bersama para pengikut mereka.”

Verse 2

सरस्वतीदृषद्धत्यौ यमुनां च निषेव्य ते । ययुर्वनेनैव वनं सततं पश्चिमां दिशम्‌,उन्होंने क्रमशः सरस्वती, दृषद्वती और यमुना नदीका सेवन करते हुए एक वनसे दूसरे वनमें प्रवेश किया। इस प्रकार वे निरन्तर पश्चिम दिशाकी ओर बढ़ते गये

Mereka, setelah berturut-turut mendatangi sungai Sarasvatī, Dṛṣadvatī, dan Yamunā—memanfaatkan airnya serta singgah di tepiannya—melanjutkan perjalanan menembus rimba, berpindah dari satu hutan ke hutan lain, dan terus bergerak mantap ke arah barat.

Verse 3

ततः सरस्वतीकूले समेषु मरुधन्वसु । काम्यकं नाम ददृशुर्वनं मुनिजनप्रियम्‌,तदनन्तर सरस्वती-तट तथा मरुभूमि एवं वन्य प्रदेशोंकी यात्रा करते हुए उन्होंने काम्यकवनका दर्शन किया, जो ऋषि-मुनियोंके समुदायको बहुत ही प्रिय था

Kemudian, menyusuri tepi Sungai Sarasvatī—melintasi dataran rata dan wilayah kering yang disapu angin—mereka melihat sebuah hutan bernama Kāmyaka, rimba yang sangat dicintai oleh perhimpunan para resi.

Verse 4

तत्र ते न्यवसन्‌ वीरा वने बहुमृगद्धिजे । अन्वास्यमाना मुनिश्रि: सान्त्व्यमानाश्न भारत,भारत! उस वनमें बहुत-से पशु-पक्षी निवास करते थे। वहाँ मुनियोंने उन्हें बिठाया और बहुत सान्त्वना दी। फिर वे वीर पाण्डव वहीं रहने लगे

Wahai Bhārata, di sana para pahlawan itu menetap di hutan yang kaya akan berbagai binatang dan burung. Para resi mulia mempersilakan mereka duduk, melayani, dan menenteramkan dengan kata-kata penghiburan; maka para Pāṇḍava yang gagah pun tinggal di rimba itu.

Verse 5

विदुरस्त्वथ पाण्डूनां सदा दर्शनलालस: । जगामैकरयथेनैव काम्यकं वनमृद्धिमत्‌,इधर विदुरजी सदा पाण्डवोंको देखनेके लिये उत्सुक रहा करते थे। वे एकमात्र रथके द्वारा काम्यकवनमें गये, जो वनोचित सम्पत्तियोंसे भरा-पूरा था इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरनिर्वासे पठचमो<ध्याय:

Sesudah itu, Vidura—yang selalu rindu melihat para Pāṇḍava—berangkat hanya dengan satu kereta dan pergi ke hutan Kāmyaka yang kaya akan bekal kehidupan rimba.

Verse 6

ततो गत्वा विदुर: काम्यकं त- च्छीघ्रैरश्वेर्वाहिना स्यन्दनेन । ददर्शासीनं धर्मात्मानं विविक्ते सार्थ द्रौपद्या भ्रातृभिन्र्मिणैश्व,शीघ्रगामी अश्वोंद्वारा खींचे जानेवाले रथसे काम्यक-वनमें पहुँचकर विदुरजीने देखा धर्मात्मा युधिष्ठिर एकान्त प्रदेशमें द्रौपदी, भाइयों तथा ब्राह्मणोंके साथ बैठे हैं

Kemudian Vidura pergi ke hutan Kāmyaka dengan kereta yang ditarik kuda-kuda cepat. Di sana ia melihat Yudhiṣṭhira yang berhati dharma duduk di tempat sunyi bersama Draupadī, saudara-saudaranya, dan para brāhmaṇa.

Verse 7

ततो<पश्यद्‌ विदुरं तूर्णमारा- दभ्यायान्तं सत्यसंध: स राजा । अथाब्रवीद्‌ भ्रातरं भीमसेनं कि नु क्षत्ता वक्ष्यति न: समेत्य,सत्यप्रतिज्ञ राजा युधिष्ठिरने जब बड़ी उतावलीके साथ विदुरजीको अपने निकट आते देखा तब भाई भीमसेनसे कहा--'ये विदुरजी हमारे पास आकर न जाने क्‍या कहेंगे

Lalu sang raja yang teguh pada kebenaran melihat Vidura cepat mendekat dari dekat. Ia pun berkata kepada saudaranya Bhīmasena, “Apa gerangan yang akan disampaikan sang kṣattā (Vidura) kepada kita ketika ia datang?”

Verse 8

कच्चिन्नायं वचनात्‌ सौबलस्य समाह्दाता देवनायोपयात: । कच्चित्‌ क्षुद्र: शकुनिर्नायुधानि जेष्यत्यस्मान्‌ पुनरेवाक्षवत्याम्‌,'ये शकुनिके कहनेसे हमें फिर जूआ खेलनेके लिये बुलाने तो नहीं आ रहे हैं। कहीं नीच शकुनि हमें फिर द्यूत-सभामें बुलाकर हमारे आयुधोंको तो जीत नहीं लेगा

Waiśampāyana berkata: “Apakah tidak ada utusan yang datang atas perintah Saubala (Śakuni), memanggil kita kembali ke permainan dadu? Jangan-jangan Śakuni yang picik itu sekali lagi, di balairung dadu, menyusun tipu daya untuk merampas senjata-senjata kita.”

Verse 9

समाहूतः केनचिदाद्रवेति नाहं शक्तो भीमसेनापयातुम्‌ | गाण्डीवे च संशयिते कथं नु राज्यप्राप्ति: संशयिता भवेन्न:,'भीमसेन! आओ, कहकर यदि कोई मुझे (युद्ध या द्यूतके लिये) बुलावे तो मैं पीछे नहीं हट सकता। ऐसी दशामें यदि हम गाण्डीव धनुष किसी तरह जूएमें हार गये तो हमारी राज्य-प्राप्ति संशयमें पड़ जायगी”

Waiśampāyana berkata: “Wahai Bhīmasena, bila seseorang memanggilku, ‘Datanglah segera!’, aku takkan sanggup menahan diri atau mundur. Dan bila dalam keadaan demikian busur Gāṇḍīva entah bagaimana hilang karena permainan dadu, maka pemulihan kerajaan kita sendiri akan menjadi diragukan.”

Verse 10

वैशम्पायन उवाच तत उत्थाय विदुरं पाण्डवेया: प्रत्यगृह्लन नृपते सर्व एव । तैः सत्कृत: स च तानाजमीढो यथोचितं पाण्डुपुत्रान्‌ समेयात्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर सब पाण्डवोंने उठकर विदुरजीकी अगवानी की। उनके द्वारा किया हुआ यथोचित स्वागत-सत्कार ग्रहण करके अजमीढवंशी विदुर पाण्डवोंसे मिले

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, kemudian semua putra Pāṇḍu bangkit dan pergi menyongsong Vidura. Setelah menerima penghormatan dan sambutan yang patut dari mereka, Vidura—keturunan Ajāmīḍha—bertemu dengan para pangeran Pāṇḍu sebagaimana layaknya.”

Verse 11

समाश्चस्तं विदुरं ते नरर्ष भा- स्ततो<पृच्छन्नागमनाय हेतुम्‌ । स चापि तेभ्यो विस्तरत: शशंस यथावृत्तो धृतराष्ट्रोडम्बिकेय:,विदुरजीके आदर-सत्कार पानेपर नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने उनसे वनमें आनेका कारण पूछा। उनके पूछनेपर विदुरने भी अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने जैसा बर्ताव किया था, वह सब विस्तारपूर्वक कह सुनाया

Kemudian para Pāṇḍava—laksana banteng di antara manusia—menyambut Vidura dengan semestinya dan menanyakan sebab kedatangannya ke hutan. Menjawab pertanyaan itu, Vidura menuturkan dengan rinci bagaimana Dhṛtarāṣṭra, putra Ambikā, bersikap dan apa saja yang telah terjadi.

Verse 12

विदुर उवाच अवोचन्मां धृतराष्ट्रो ईनुगुप्त- मजातशत्रो परिगृह्माभिपूज्य । एवं गते समतामभ्युपेत्य पथ्य॑ तेषां मम चैव ब्रवीहि,विदुरजी बोले--अजातशत्रो! राजा धृतराष्ट्रने मुझे अपना रक्षक समझकर बुलाया और मेरा आदर करके कहा--“विदुर! आजकी परिस्थितिमें समभाव रखकर तुम ऐसा कोई उपाय बताओ जो मेरे और पाण्डवोंके लिये हितकर हो”

Vidura berkata: “Wahai Ajātaśatru, Dhṛtarāṣṭra memanggilku dengan menganggapku berada dalam lindungannya; lalu setelah memuliakanku, ia berkata: ‘Vidura, kini perkara telah sampai pada keadaan seperti ini; maka bersikaplah seimbang dan katakanlah jalan yang baik—yang membawa manfaat bagi mereka (para Pāṇḍava) dan juga bagiku.’”

Verse 13

मयाप्युक्तं यत्‌ क्षेमं कौरवाणां हित॑ पथ्य॑ धृतराष्ट्रस्य चैव । तद्‌ वै तस्मै न रुचाम भ्युपैति ततक्षाहं क्षेममन्यन्न मन्‍्ये,तब मैंने भी ऐसी बातें बतायीं जो सर्वधा उचित तथा कौरववंश एवं धृतराष्ट्रके लिये भी हितकर और लाभदायक थीं। वह बात उनको नहीं रुची और मैं उसके सिवा दूसरी कोई बात उचित नहीं समझता था

Aku pun telah mengucapkan apa yang akan menjamin kesejahteraan para Kaurawa—nasihat yang bermanfaat, menyehatkan, dan sungguh-sungguh demi kepentingan Dhṛtarāṣṭra juga. Namun petuah itu tidak berkenan padanya; dan selain jalan itu, aku tidak memandang ada cara lain yang membawa keselamatan.

Verse 14

परं श्रेय: पाण्डवेया मयोक्तं न मे तच्च श्रुतवानाम्बिकेय: । यथा<5तुरस्येव हि पथ्यमन्ने न रोचते स्मास्य तदुच्यमानम्‌,पाण्डवो! मैंने दोनों पक्षके लिये परम कल्याणकी बात बतायी थी, परंतु अम्बिकानन्दन महाराज धूृतराष्ट्रने मेरी वह बात नहीं सुनी। जैसे रोगीको हितकर भोजन अच्छा नहीं लगता, उसी प्रकार राजा धूृतराष्ट्रको मेरी कही हुई हितकर बात भी पसंद नहीं आती

Aku menyampaikan perkara yang paling utama demi kebaikan para Pāṇḍawa dan semua pihak; namun putra Ambikā, Dhṛtarāṣṭra, tidak mengindahkan kata-kataku. Seperti makanan yang menyehatkan tidak menarik bagi orang sakit, demikian pula nasihatku yang bermanfaat itu tidak berkenan baginya.

Verse 15

न श्रेयसे नीयतेडजातशत्रो स्त्री श्रोत्रियस्थेव गृहे प्रदुष्टा । ध्रुवं न रोचेद्‌ भरतर्षभस्य पति: कुमार्या इव षष्टिवर्ष:,अजातशशत्रो! जैसे श्रोत्रियके घरकी दुष्टा स्त्री श्रेयके मार्गपर नहीं लायी जा सकती, उसी प्रकार राजा धृतराष्ट्रको कल्याणके मार्गपर लाना असम्भव है। जैसे कुमारी कन्याको साठ वर्षका बूढ़ा पति अच्छा नहीं लगता, उसी प्रकार भरतश्रेष्ठ धृतराष्ट्रको मेरी कही हुई बात निश्चय ही नहीं रुचती

Wahai Ajātaśatru, sebagaimana seorang istri yang rusak budi di rumah seorang brāhmaṇa terpelajar tak dapat dituntun ke jalan kesejahteraan sejati, demikian pula mustahil menuntun Raja Dhṛtarāṣṭra menuju yang benar-benar bermanfaat. Sungguh kata-kataku tidak menyenangkan baginya, laksana suami berusia enam puluh tahun terasa menjijikkan bagi seorang gadis.

Verse 16

ध्रुवं विनाशो नृप कौरवाणां न वै श्रेयो धृतराष्ट्र: परैति । यथा च पर्णे पुष्करस्यावसिक्तं जल न तिषछेत्‌ पथ्यमुक्ते तथास्मिन्‌,राजन! राजा धृतराष्ट्र कल्याणकारी उपाय नहीं ग्रहण करते हैं, अत: यह निश्चय जान पड़ता है कि कौरवकुलका विनाश अवश्यम्भावी है। जैसे कमलके पत्तेपर डाला हुआ जल नहीं ठहर सकता, उसी प्रकार कही हुई हितकर बात राजा धृतराष्ट्रके मनमें स्थान नहीं पाती है

Wahai Raja, kehancuran para Kaurawa kini pasti, sebab Dhṛtarāṣṭra tidak menempuh apa yang sungguh membawa kebaikan. Seperti air yang dituangkan di atas daun teratai tak dapat menetap, demikian pula nasihat yang menyehatkan, meski diucapkan terang, tak menemukan tempat berdiam dalam benaknya.

Verse 17

ततः क्रुद्धो धृतराष्ट्रोडब्रवीन्मां यस्मिन्‌ श्रद्धा भारत तत्र याहि । नाहं भूय: कामये त्वां सहायं महीमिमां पालयितु पुरं वा,उस समय राजा धृतराष्ट्रने कृपित होकर मुझसे कहा--“भारत! जिसपर तुम्हारी श्रद्धा हो वहीं चले जाओ। अब मैं इस राज्य अथवा नगरका पालन करनेके लिये तुम्हारी सहायता नहीं चाहता'

Lalu Dhṛtarāṣṭra, dengan murka, berkata kepadaku: “Wahai Bhārata, pergilah ke mana pun keyakinanmu tertambat. Aku tak lagi menghendakimu sebagai penolong untuk memerintah—baik kerajaan ini maupun kota ini.”

Verse 18

सोऊहं त्यक्तो धृतराष्ट्रेण राज्ञा प्रशासितुं त्वामुपयातो नरेन्द्र । तद्‌ वै सर्व यन्मयोक्त सभायां तद्‌ धार्यतां यत्‌ प्रवक्ष्यामि भूय:,नरेन्द्र! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्रने मुझे त्याग दिया है; अतः मैं तुम्हें उपदेश देनेके लिये आया हूँ। मैंने सभामें जो कुछ कहा था और पुन: इस समय जो कुछ कह रहा हूँ, वह सब तुम धारण करो

Wahai penguasa manusia! Raja Dhṛtarāṣṭra telah menyingkirkan aku; sebab itu aku datang kepadamu untuk menasihati dan menuntunmu. Apa pun yang dahulu kukatakan di sidang istana—dan apa pun yang kini kukatakan kembali—peganglah semuanya teguh dalam benakmu.

Verse 19

क्लेशैस्तीव्रैर्युज्यमान: सपत्नै: क्षमां कुर्वन्‌ू कालमुपासते यः । संवर्धयन्‌ स्तोकमिवाग्निमात्मवान्‌ स वै भुड्क्ते पृथिवीमेक एव,जो शत्रुओंद्वारा दुःसह कष्ट दिये जानेपर भी क्षमा करते हुए अनुकूल अवसरकी प्रतीक्षा करता है; तथा जिस प्रकार थोड़ी-सी आगको भी लोग घास-फूसके द्वारा प्रज्वलित करके बढ़ा लेते हैं, वैसे ही जो मनको वशमें रखकर अपनी शक्ति और सहायकोंको बढ़ाता है, वह अकेला ही सारी पृथ्वीका उपभोग करता है

Orang yang, meski dihimpit penderitaan berat dari para pesaing, tetap menahan diri, memaafkan, dan menunggu saat yang tepat; serta perlahan menambah kekuatan dan dukungan—seperti api kecil yang diberi bahan bakar hingga menjadi nyala besar—dialah yang pada akhirnya seorang diri menikmati kedaulatan atas seluruh bumi.

Verse 20

यस्याविभक्तं वसु राजन्‌ सहायै- स्तस्य दुःखे5प्यंशभाज: सहाया: । सहायानामेष संग्रहणे<ध्युपाय: सहायाप्तौ पृथिवीप्राप्तिमाहु:,राजन! जिसका धन सहायकोंके लिये बाँटा नहीं है; अर्थात्‌ जिसके धनको सहायक भी अपना ही समझकर भोगते हैं, उसके दुःखमें भी वे सब लोग हिस्सा बँटाते हैं। सहायकोंके संग्रहका यही उपाय है। सहायकोंकी प्राप्ति हो जानेपर पृथ्वीकी ही प्राप्ति हो गयी, ऐसा कहा जाता है

Wahai Raja, dia yang kekayaannya tidak dipisahkan dari para sahabat dan sekutunya—hingga mereka memandangnya seakan milik mereka sendiri untuk digunakan—akan mendapati bahwa mereka pun turut memikul dukanya. Inilah cara menghimpun dan mengokohkan para pendukung. Bila pendukung telah diperoleh, dikatakan seolah-olah bumi itu sendiri telah diperoleh.

Verse 21

सत्यं श्रेष्ठ पाण्डव विप्रलापं तुल्यं चान्नं सह भोज्यं सहायै: । आत्मा चैषामग्रतो न सम पूज्य एवंवृत्तिर्वर्धती भूमिपाल:,पाण्डुनन्दन! व्यर्थकी बकवादसे रहित सत्य बोलना ही श्रेष्ठ है। अपने सहायक भाई- बन्धुओंके साथ बैठकर समान अन्नका भोजन करना चाहिये। उन सबके आगे अपनी मान- बड़ाई तथा पूजाकी बातें नहीं करनी चाहिये। ऐसा बर्ताव करनेवाला भूपाल सदा उन्नतिशील होता है

Wahai putra Pāṇḍu, berkata benar tanpa ocehan sia-sia adalah yang terbaik. Seorang raja hendaknya duduk bersama para penolong dan kerabatnya, lalu makan makanan yang sama secara setara. Ia tidak patut menonjolkan diri di hadapan mereka, menuntut kehormatan atau pemujaan khusus. Raja yang demikian akan terus bertumbuh dalam kekuatan dan kemakmuran.

Verse 22

युधिछिर उवाच एवं करिष्यामि यथा ब्रवीषि परां बुद्धिमुपगम्याप्रमत्त: । यच्चाप्यन्यद्रेशकालोपपन्नं तद्‌ वै वाच्यं तत्‌ करिष्यामि कृत्स्नम्‌,युधिष्ठिर बोले--विदुरजी! मैं उत्तम बुद्धिका आश्रय ले सतत सावधान रहकर आप जैसा कहते हैं वैसा ही करूँगा। और भी देश-कालके अनुसार आप जो कर्तव्य उचित समझें, वह बतावें। मैं उसका पूर्णरूपसे पालन करूँगा

Yudhiṣṭhira berkata: “Aku akan melakukan tepat seperti yang engkau katakan, dengan berpegang pada kebijaksanaan tertinggi dan tetap selalu waspada. Dan kewajiban lain apa pun yang engkau nilai sesuai dengan tempat dan waktu—katakanlah itu juga; akan kulaksanakan sepenuhnya.”

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether a ruler should uphold justice by correcting an assembly-sanctioned but ethically corrupted outcome (the dice-driven dispossession) even when doing so requires restraining his own son and reversing politically convenient decisions.

Governance must be dharma-first: restore what was wrongfully taken, be content with rightful possessions, and prioritize reconciliation that protects the polity; delaying corrective justice converts a private wrong into systemic instability.

No formal phalaśruti is stated; the chapter’s meta-function is causal and diagnostic—linking ethical failure in counsel and kingship to predictable political collapse, and marking Vidura’s departure as a narrative signal of advisory breakdown.