Adhyaya 310
Vana ParvaAdhyaya 31030 Verses

Adhyaya 310

Chapter Arc: कुन्ती के बाल्यकाल का वह क्षण, जब जिज्ञासा और तप-बल से प्राप्त मन्त्र उसे सूर्यदेव का आवाहन करा देता है—और देवता स्वयं उपस्थित होकर उत्तर माँगते हैं। → कुन्ती भय से काँप उठती है: वह सूर्य को लौटा नहीं सकती, पर स्वीकार करने पर लोक-लज्जा, पिता/ब्राह्मण के शाप का संकट, और अपने भविष्य का अन्धकार—सब एक साथ सामने खड़े हो जाते हैं। सूर्यदेव अपने दिव्य स्वभाव का उद्घोष करते हैं कि उनके लिए कोई आवरण नहीं; वे सबको भीतर-बाहर से देखते हैं, और अपने आगमन को असत्य/अपमानित नहीं होने देंगे। → कुन्ती शर्त रखती है: यदि पुत्र हो तो वह कुण्डली-कवची, महाबाहु, महाबल, शूर और अद्वितीय हो—और सूर्यदेव योगबल से उसे तेज से मोहित कर, बिना दूषण के गर्भाधान करते हैं। → सूर्यदेव आश्वासन देते हैं कि कुन्ती की पवित्रता अक्षुण्ण रहेगी; वह पुनः चेतना/सामान्य अवस्था को प्राप्त करती है, और नियति का बीज उसके गर्भ में स्थापित हो जाता है। → गर्भ से उत्पन्न होने वाला वह दिव्य पुत्र आगे चलकर किस प्रकार लोक-धर्म, कुल-मान और युद्ध-भाग्य को उलट देगा—यह प्रश्न अध्याय के अंत में धड़कता रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

हि आन () है 7 आम - इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें सूर्यदेवने उस कारणका स्पष्टीकरण किया है। सप्ताधिकत्रिशततमो< ध्याय: सूर्यद्वारा कुन्तीके उदरमें गर्भस्थापन वैशम्पायन उवाच सातु कन्या बहुविध॑ ब्रुवन्ती मधुरं वच: । अनुनेतुं सहस्रांशुंन शशाक मनस्विनी,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! इस प्रकार राजकन्या मनस्विनी कुन्ती नाना प्रकारसे मधुर वचन कहकर अनुनय-विनय करनेपर भी भगवान्‌ सूर्यको मनानेमें सफल न हो सकी

Waiśampāyana berkata: Sang gadis Kuntī, meski berhati teguh dan mengucapkan banyak kata manis penuh bujukan, tetap tidak mampu menenteramkan Sahasrāṁśu, Dewa Surya.

Verse 2

न शशाक यदा बाला प्रत्याख्यातुं तमोनुदम्‌ । भीता शापात्‌ ततो राजन्‌ दध्यौ दीर्घमथान्तरम्‌,राजन्‌! जब वह बाला अन्धकारनाशक भगवान्‌ सूर्यदेवको टाल न सकी, तब शापसे भयभीत हो दीर्घकालतक मन-ही-मन कुछ सोचने लगी

Wahai raja! Ketika gadis muda itu tak sanggup menolak Sang Surya, penghalau kegelapan, ia pun takut akan kutuk dan lama merenung dalam batinnya.

Verse 3

अनागस: पितु: शापो ब्राह्मणस्य तथैव च । मन्निमित्त: कथं न स्यात्‌ क्रुद्धादस्माद्‌ विभावसो:,उसने सोचा कि “क्या उपाय करूँ? जिससे मेरे कारण मेरे निरपराध पिता तथा निर्दोष ब्राह्मणको क्रोधमें भरे हुए इन सूर्यदेवसे शाप न प्राप्त हो

Ia berpikir: “Bagaimana mungkin kutuk dari Vibhāvasu yang murka tidak jatuh—karena diriku—atas ayahku yang tak bersalah, dan juga atas brahmana yang suci? Apa upaya agar mereka selamat?”

Verse 4

बालेनापि सता मोहादू भृशं पापकृतान्यपि । नाभ्यासादयितव्यानि तेजांसि च तपांसि च,“सज्जन बालकको भी चाहिये कि वह अत्यन्त मोहके कारण पापशून्य, तेजस्वी तथा तपस्वी पुरुषोंके अत्यन्त निकट न जाय

Bahkan seorang anak yang berniat baik, bila diliputi kebingungan, dapat melakukan dosa besar; karena itu jangan gegabah mendekati orang-orang yang bercahaya rohani dan bertapa keras—daya tapa mereka bukan untuk diperlakukan ringan.

Verse 5

साहमद्य भृशं भीता गृहीता च करे भृशम्‌ | कथं त्वकार्य कुर्या वै प्रदानं ह्वात्मन: स्वयम्‌,'परंतु मैं तो आज अत्यन्त भयभीत हो भगवान्‌ सूर्यदेवके हाथमें पड़ गयी हूँ, तो भी स्वयं अपने शरीरको देने-जैसा न करनेयोग्य नीच कर्म कैसे करूँ?”

“Namun hari ini aku sangat ketakutan dan telah digenggam kuat oleh tangannya; meski demikian, bagaimana mungkin aku melakukan perbuatan terlarang—menyerahkan diriku sendiri?”

Verse 6

वैशम्पायन उवाच सा वै शापपरित्रस्ता बहु चिन्तयती हृदा । मोहेनाभिपरीतड्री स्मयमाना पुन: पुनः

Vaiśampāyana berkata: Diliputi takut oleh kutuk itu, ia merenung dalam-dalam di dalam hati. Namun oleh delusi pandangannya terbalik, dan ia terus tersenyum berulang-ulang.

Verse 7

त॑ देवमब्रवीद्‌ भीता बन्धूनां राजसत्तम । व्रीडाविह्ललया वाचा शापत्रस्ता विशाम्पते

Wahai raja terbaik, karena takut bagi sanak-keluarganya ia berbicara kepada dewa itu. Dengan suara gemetar karena malu, terguncang oleh takut akan kutuk, ia berkata, wahai pelindung rakyat.

Verse 8

वैशम्पायनजी कहते हैं--नृपश्रेष्ठ! कुन्ती शापसे अत्यन्त डरकर मन-ही-मन तरह- तरहकी बातें सोच रही थी। उसके सारे अंग मोहसे व्याप्त हो रहे थे। वह बार-बार आश्चर्यचवकित हो रही थी। एक ओर तो वह शापसे आतंकित थी, दूसरी ओर उसे भाई- बन्धुओंका भय लगा हुआ था। भूपाल! उस दशामें वह लज्जाके कारण विशृंखल वाणीद्वारा सूर्यदेवसे इस प्रकार बोली ।। कुन्त्युवाच पिता मे प्रियते देव माता चान्ये च बान्धवा: । न तेषु प्रियमाणेषु विधिलोपो भवेदयम्‌,कुन्तीने कहा--देव! मेरे पिता, माता तथा अन्य बान्धव जीवित हैं। उन सबके जीते- जी स्वयं आत्मदान करनेपर कहीं शास्त्रीय विधिका लोप न हो जाय?

Vaiśampāyana berkata: Wahai raja terbaik, Kuntī—takut oleh kutuk—membolak-balik banyak pikiran dalam batinnya. Delusi merasuki seluruh tubuhnya; berulang kali ia tertegun dalam keheranan. Di satu sisi ia diguncang takut akan kutuk, di sisi lain ia cemas akan aib dan bahaya bagi saudara serta kerabatnya. Dalam keadaan demikian, karena malu dan dengan suara tersendat, ia berbicara kepada Dewa Matahari sebagai berikut. Kuntī berkata: Wahai dewa, ayahku, ibuku, dan para kerabatku yang lain masih hidup. Selagi mereka hidup, bila aku menyerahkan diriku, tidakkah itu menjadi pelanggaran tata-aturan yang ditetapkan?

Verse 9

त्वया तु संगमो देव यदि स्याद्‌ विधिवर्जित: । मन्निमित्तं कुलस्यास्य लोके कीर्ति्निशेत्‌ ततः,भगवन! यदि आपके साथ मेरा वेदोक्त विधिके विपरीत समागम हो तो मेरे ही कारण जगत्‌में इस कुलकी कीर्ति नष्ट हो जायगी

Wahai dewa, bila persatuanku denganmu terjadi bertentangan dengan tata Veda, maka karena diriku nama baik wangsa ini akan musnah di mata dunia.

Verse 10

अथवा धर्ममेतं त्वं मन्यसे तपतां वर । ऋते प्रदानाद्‌ बन्धुभ्यस्तव काम॑ करोम्यहम्‌,अथवा तपनेवालोंमें श्रेष्ठ दिवाकर! यदि बन्धुजनोंके दिये बिना ही मेरे साथ अपने समागमको आप धर्मयुक्त समझते हों तो मैं आपकी इच्छा पूर्ण कर सकती हूँ

Atau, wahai Diwākara, yang terbaik di antara para pertapa: jika engkau memandang ini sebagai dharma—yakni bersatu denganku tanpa penyerahan resmi dari sanak-keluargaku—maka akan kupenuhi kehendakmu.

Verse 11

आत्मप्रदानं दुधर्ष तव कृत्वा सती त्वहम्‌ । त्वयि धर्मो यशश्रैव कीर्तिरायुश्व देहिनाम्‌,दुर्धर्ष देव! क्या मैं आपको आत्मदान करके भी सती-साध्वी रह सकती हूँ? आपमें ही देहधारियोंके धर्म, यश, कीर्ति तथा आयु प्रतिष्ठित हैं

Wahai Yang Tak Terkalahkan, bila aku mempersembahkan diriku kepadamu—dapatkah aku tetap menjadi istri yang suci dan setia? Sebab pada dirimulah tegak dharma, kehormatan, kemasyhuran, dan bahkan usia para makhluk berjasad.

Verse 12

सूर्य उवाच नते पिता न ते माता गुरवो वा शुचिस्मिते । प्रभवन्ति वरारोहे भद्रं ते शूणु मे वच:,भगवान्‌ सूर्यने कहा--शुचिस्मिते! वरारोहे! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरी बात सुनो। तुम्हारे पिता, माता अथवा अन्य गुरुजन तुम्हें (इस कामसे रोकनेमें) समर्थ नहीं हैं

Surya berkata: “Wahai yang senyumnya suci, wahai gadis mulia—semoga kebaikan menyertaimu. Dengarkan perkataanku. Dalam perkara ini, ayahmu, ibumu, bahkan para tetua dan gurumu pun tidak berkuasa menahanmu.”

Verse 13

सर्वान्‌ कामयते यस्मात्‌ कमेर्धातोश्व॒ भाविनि । तस्मात्‌ कन्येह सुश्रोणि स्वतन्त्रा वरवर्णिनि,सुन्दर भाववाली कुन्ती! “कम्‌' धातुसे कन्या शब्दकी सिद्धि होती है। सुन्दरी! वह (स्वयंवरमें आये हुए) सब वरोंमेंसे किसीको भी स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी कामनाका विषय बना सकती है; इसीलिये इस जगत्‌में उसे कन्या कहा गया है

Sūrya berkata: “Wahai wanita berbudi, karena ia dapat mengingini siapa pun—berasal dari akar kata kam (‘menghendaki’)—maka, wahai gadis berpinggul elok, wahai jelita, di dunia ini ia disebut ‘kanyā’. Dalam svayaṃvara, ia bebas menjadikan salah satu pelamar yang hadir sebagai pilihannya.”

Verse 14

नाधर्मश्चरित: कश्चित्‌ त्वया भवति भाविनि । अधर्म कुत एवाहं वरेयं लोककाम्यया,कुन्ती! मेरे साथ समागम करनेसे तुम्हारे द्वारा कोई अधर्म नहीं बन रहा है। भला! मैं लौकिक कामवासनाके वशीभूत होकर अधर्मका वरण कैसे कर सकता हूँ?

Sūrya berkata: “Wahai wanita mulia, tiada ketidakbenaran yang menimpamu dalam perbuatan ini. Bagaimana mungkin aku memilih adharma, hanya karena hasrat duniawi—aku, Sang Surya? Wahai Kuntī!”

Verse 15

अनावृता: स्त्रिय: सर्वा नराश्न वरवर्णिनि । स्वभाव एष लोकानां विकारोडन्य इति स्मृत:,वरवर्णिनि! मेरे लिये सभी स्त्रियाँ और पुरुष आवरणरहित हैं; क्योंकि मैं सबका साक्षी हूँ। जो अन्य सब विकार हैं, यह तो प्राकृत मनुष्योंका स्वभाव माना गया है

Sūrya berkata: “Wahai wanita berparas elok, bagiku semua perempuan dan semua laki-laki tiada berpenutup, sebab akulah saksi atas segalanya. Adapun perubahan dan penyimpangan perilaku yang lain, hal itu dikenang sebagai tabiat alami manusia kebanyakan.”

Verse 16

सा मया सह संगम्य पुनः कन्या भविष्यसि । पुत्रश्न ते महाबाहुर्भविष्यति महायशा:,तुम मेरे साथ समागम करके पुनः कन्या ही बनी रहोगी और तुम्हें महाबाहु एवं महायशस्वी पुत्र प्राप्त होगा

Setelah bersatu denganku, engkau akan kembali menjadi gadis suci; dan bagimu akan lahir seorang putra berlengan perkasa, termasyhur namanya.

Verse 17

कुन्त्युवाच यदि पुत्रो मम भवेत्‌ त्वत्त: सर्वतमोनुद । कुण्डली कवची शूरो महाबाहुर्महाबल:,कुन्ती बोली--समस्त अन्धकारको दूर करनेवाले सूर्यदेव! यदि आपसे मुझे पुत्र प्राप्त हो तो वह महाबाहु, महाबली तथा कुण्डल और कवचसे विभूषित शूरवीर हो

Kuntī berkata: “Wahai Sūrya, penghalau segala kegelapan—jika aku memperoleh putra darimu, semoga ia seorang kesatria gagah, berhias anting dan berzirah, berlengan perkasa dan sangat kuat.”

Verse 18

सूर्य उवाच भविष्यति महाबाहु: कुण्डली दिव्यवर्मभृत्‌ | उभयं चामृतमयं तस्य भद्रे भविष्यति,सूर्यने कहा--भद्रे! तुम्हारा पुत्र महाबाहु, कुण्डल-धारी तथा दिव्य कवच धारण करनेवाला होगा। उसके कुण्डल और कवच दोनों अमृतमय होंगे

Sūrya berkata: “Wahai wanita yang mulia, putramu akan berlengan perkasa, mengenakan anting, dan mengenakan zirah ilahi. Anting dan zirahnya keduanya akan bersifat amerta—tak tersentuh maut.”

Verse 19

कुन्त्युवाच यद्येतदमृतादस्ति कुण्डले वर्म चोत्तमम्‌ । मम पुत्रस्य यं वै त्वं मत्त उत्पादयिष्यसि,कुन्ती बोली--प्रभो! आप मेरे गर्भसे जिसको जन्म देंगे, उस मेरे पुत्रके कुण्डल और कवच यदि अमृतसे उत्पन्न हुए होंगे; तो भगवन्‌! आपने जैसा कहा है, उसी रूपमें मेरा आपके साथ समागम हो। आपका वह पुत्र आपके ही समान वीर्य, रूप, धैर्य, ओज तथा धर्मसे युक्त होना चाहिये

Kuntī berkata: “Wahai Tuan, jika anting dan zirah utama itu benar-benar berasal dari amerta bagi putra yang akan engkau peranakkan dalam rahimku, maka—wahai Bhagavān—biarlah persatuan kita terjadi tepat seperti yang engkau nyatakan. Dan semoga putra itu memiliki sifat sepertimu: keberanian, keelokan, keteguhan, daya-jiwa, serta teguh dalam dharma.”

Verse 20

अस्तु मे सड़मो देव यथोक्तं भगवंस्त्वया । त्वद्वीर्यरूपसत्त्वौजा धर्मयुक्तो भवेत्‌ स च,कुन्ती बोली--प्रभो! आप मेरे गर्भसे जिसको जन्म देंगे, उस मेरे पुत्रके कुण्डल और कवच यदि अमृतसे उत्पन्न हुए होंगे; तो भगवन्‌! आपने जैसा कहा है, उसी रूपमें मेरा आपके साथ समागम हो। आपका वह पुत्र आपके ही समान वीर्य, रूप, धैर्य, ओज तथा धर्मसे युक्त होना चाहिये

Kuntī berkata: “Jadilah demikian, wahai dewa—biarlah persatuan kita terjadi tepat seperti yang engkau ucapkan. Dan semoga putra yang lahir dari rahimku memiliki keberanian dan daya sepertimu, keelokan dan keluhuran watak, keteguhan dan wibawa, serta berpegang teguh pada dharma.”

Verse 21

सूर्य उवाच अदित्या कुण्डले राज्ञि दत्ते मे मत्तकाशिनि । तेडस्य दास्यामि वै भीरु वर्म चैवेदमुत्तमम्‌,सूर्यदेवने कहा--यौवनके मदसे सुशोभित होनेवाली भीरु राजकुमारी! माता अदितिने मुझे जो कुण्डल दिये हैं, उन्हें मैं तुम्हारे इस पुत्रको दे दूँगा। साथ ही यह उत्तम कवच भी उसे अर्पित करूँगा

Surya berkata: “Wahai putri raja yang pemalu, bersinar oleh kebanggaan masa muda! Anting yang diberikan ibuku, Aditi, kepadaku—akan kuberikan sungguh-sungguh kepada putramu. Dan bersamanya akan kuanugerahkan pula baju zirah yang unggul ini.”

Verse 22

कुन्त्युवाच परम॑ भगवतन्नेवं संगमिष्ये त्वया सह । यदि पुत्रो भवेदेवं यथा वदसि गोपते,कुन्ती बोली--भगवन्‌! गोपते! जैसा आप कहते हैं, वैसा ही पुत्र यदि मुझे प्राप्त हो तो मैं आपके साथ उत्तम रीतिसे समागम करूँगी

Kuntī berkata: “Wahai Tuhan Yang Mahatinggi, wahai penguasa indria! Jika kepadaku dianugerahkan putra persis seperti yang engkau katakan, maka aku akan menyetujui untuk bersatu denganmu menurut tata yang semestinya.”

Verse 23

वैशम्पायन उवाच तथेत्युक्त्वा तु तां कुन्तीमाविवेश विहड्भम: । स्वर्भानुशत्रुर्योगात्मा नाभ्यां पस्पर्श चैव ताम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तब “बहुत अच्छा” कहकर आकाशचारी राहुशत्रु भगवान्‌ सूर्यने योगरूपसे कुन्तीके शरीरमें प्रवेश किया और उसकी नाभिको छू दिया

Vaiśampāyana berkata: Setelah menjawab, “Demikianlah,” Sang Surya yang melintas di angkasa—musuh Svarbhānu (Rāhu), berdaya yoga—memasuki tubuh Kuntī dan menyentuh pusarnya.

Verse 24

ततः सा विह्वलेवासीत्‌ कन्या सूर्यस्य तेजसा । पपात चाथ सा देवी शयने मूढचेतना,तब वह राजकन्या सूर्यके तेजसे विह्लल और अचेत-सी होकर शय्यापर गिर पड़ी

Kemudian sang putri raja, diliputi kedahsyatan cahaya Surya, menjadi guncang; dan perempuan mulia itu jatuh ke pembaringan, pikirannya tersaput dan indrianya seakan lenyap.

Verse 25

सूर्य उवाच साधयिष्यामि सुश्रोणि पुत्र वै जनयिष्यसि । सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठ कन्या चैव भविष्यसि,सूर्यने कहा--सुन्दरी! मैं ऐसी चेष्टा करूँगा, जिससे तुम समस्त शशस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दोगी और कन्या ही बनी रहोगी

Surya berkata: “Wahai gadis berpinggul elok, akan kubuat hal itu terjadi: engkau sungguh akan melahirkan seorang putra, yang terunggul di antara semua pemanggul senjata; namun engkau tetap akan tinggal sebagai perawan.”

Verse 26

ततः सा व्रीडिता बाला तदा सूर्यमथाब्रवीत्‌ । एवमस्त्विति राजेन्द्र प्रस्थितं भूरिवर्चसम्‌,राजेन्द्र! तब संगमके लिये उद्यत हुए महातेजस्वी सूर्यदेवकी ओर देखकर लज्जित हुई उस राजकन्याने उनसे कहा--'प्रभो! ऐसा ही हो”

Maka gadis muda itu, diliputi rasa malu, berkata kepada Dewa Surya: “Demikianlah jadinya, wahai raja.” Sambil mengucapkannya, ia memandang Sang Surya yang bercahaya agung, telah berangkat dan siap untuk bersatu.

Verse 27

वैशम्पायन उवाच इति स्मोक्ता कुन्तिराजात्मजा सा विवस्वन्तं याचमाना सलज्जा । तस्मिन्‌ पुण्ये शयनीये पपात मोहाविष्टा भज्यमाना लतेव,वैशम्पायनजी कहते हैं--ऐसा कहकर कुन्तिनरेशकी कन्या पृथा भगवान्‌ सूर्यसे पुत्रके लिये प्रार्थना करती हुई अत्यन्त लज्जा और मोहके वशीभूत होकर कटी हुई लताकी भाँति उस पवित्र शय्यापर गिर पड़ी

Vaiśampāyana berkata: Setelah berkata demikian, Pṛthā, putri Raja Kuntī, dengan malu memohon kepada Vivasvān agar dianugerahi seorang putra. Lalu, dikuasai kebingungan, ia jatuh di ranjang suci itu bagaikan sulur yang terputus.

Verse 28

तिग्मांशुस्तां तेजसा मोहयित्वा योगेनाविश्यात्मसंस्थां चकार । न चैवैनां दूषयामास भानु: संज्ञां लेभे भूय एवाथ बाला,तत्पश्चात्‌ सूर्यदेवने उसे अपने तेजसे मोहित कर दिया और योगशक्तिके द्वारा उसके भीतर प्रवेश करके अपना तेजोमय वीर्य स्थापित कर दिया। उन्होंने कुन्तीको दूषित नहीं किया--उसका कनन्‍्याभाव अछूता ही रहा। तदनन्तर वह राजकन्या फिर सचेत हो गयी

Kemudian Surya yang bersinar tajam membiusnya dengan cahaya-Nya; lalu dengan daya yoga Ia memasuki dirinya dan menegakkan benih-Nya yang bercahaya di dalamnya. Namun Bhānu tidak menodainya—keperawanannya tetap utuh. Setelah itu sang putri raja pun sadar kembali.

Verse 306

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपववके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें यूर्यका आवाहनविषयक तीन सौ छठाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-306 dalam Vana Parva Śrī Mahābhārata, pada bagian Kuṇḍalāharaṇa Parva, mengenai pemanggilan Dewa Surya.

Verse 307

इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकुन्तीसमागमे सप्ताधिकत्रिशततमो<थध्याय:

Demikian, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, dalam bagian Kuṇḍalāharaṇa Parva, pada episode pertemuan Surya dan Kuntī, berakhir bab ke-317.