Adhyaya 285
Vana ParvaAdhyaya 28556 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; यह लंका-युद्ध की निर्णायक तैयारी और पारगमन-चरण है—रणनीतिक बढ़त राम-पक्ष की ओर।

Adhyaya 285

सूर्य–कर्णोपदेशः (Sūrya’s Counsel to Karṇa on Kīrti and the Kuṇḍala)

Upa-parva: Karna–Indra–Sūrya Saṃvāda (Kundala-dāna Pratiṣedha Episode)

Sūrya addresses Karṇa, affirming his prior beneficence toward self, friends, family, and parents, then reframes the pursuit of lasting fame (kīrti) as incompatible with actions that destroy life (prāṇa-virodha). He argues that meaningful work and social obligations belong to the living—parents, children, kin, and rulers act only while life remains—and that fame is valuable chiefly for one who can experience and operationalize it. The discourse introduces a guarded divine secret (deva-guhya), withheld until the proper time, and pivots to a concrete injunction: Karṇa should not give his radiant kuṇḍala to a mendicant who is in fact Vajrapāṇi (Indra). Sūrya underscores the ornaments’ protective and symbolic power, asserts that Arjuna cannot defeat Karṇa while he retains them (even if Indra’s own force were weaponized), and advises rhetorical strategies to repeatedly and plausibly deflect Indra’s request. The chapter thus integrates moral reasoning (fame versus life), devotion-based admonition, and strategic foresight oriented toward an impending martial encounter.

Chapter Arc: समुद्र-तट पर राम के चारों ओर वानर-सेना का महासंगठन होता है—कोटि-कोटि तरस्वी यूथपति, सुषेण, गज, गवय आदि अपने-अपने दलों सहित उपस्थित होकर लंका-गमन की घड़ी को विराट बना देते हैं। → समुद्र अजेय बाधा बनकर सामने खड़ा है। राम उपाय से पहले विनय चुनते हैं—समुद्र की आराधना और उपवास का संकल्प; पर भीतर-ही-भीतर यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि यदि मार्ग न मिला तो वे अप्रतिहत महास्त्रों से समुद्र को दग्ध कर देंगे। → राम का निर्णायक संकल्प—‘मार्ग न दिखा तो दहन’—प्रकृति के सामने धर्म-बल और राज-बल का चरम उद्घोष बनता है; इसी निर्णायक क्षण से समाधान का द्वार खुलता है और सेतु-निर्माण की दिशा निश्चित होती है। → विभीषण की सम्मति के अनुसार सेतु के द्वारा राम एक मास में समस्त सेना सहित महासागर को पार करते हैं। मार्ग बन जाता है, अभियान को ठोस आधार मिलता है, और लंका के द्वार पर युद्ध की भूमिका तैयार हो जाती है। → लंका-समक्ष पहुँचकर राक्षस-दूत अपने वास्तविक रूप में प्रकट होते हैं; राम उन्हें अपनी सेना का दर्शन कराकर छोड़ देते हैं—अब अगला चरण सीधे लंका-युद्ध की देहरी पर है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ श्लोक मिलाकर कुल ७१ ६ “लोक हैं) 3 “+(>9) #2<# # 5-7 त्रयशीर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: वानर-सेनाका संगठन, है का का निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना मार्कण्डेय उवाच ततस्तत्रैव रामस्य समासीनस्य तै: सह । समाजग्मु: कपिश्रेष्ठा: सुग्रीववचनात्‌ तदा,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर सुग्रीवकी आज्ञाके अनुसार बड़े-बड़े वानरवीर माल्यवान्‌ पर्वतपर लक्ष्मण आदिके साथ बैठे हुए भगवान्‌ श्रीरामके पास पहुँचने लगे

Mārkaṇḍeya berkata: Kemudian, di tempat itu juga, ketika Rāma sedang duduk bersama mereka, para vanara terkemuka berkumpul dan datang kepadanya saat itu, menaati perintah Sugrīva.

Verse 2

वृत: कोटिसहस्रेण वानराणां तरस्विनाम्‌ । श्वशुरो वालिन: श्रीमान्‌ सुषेणो राममभ्ययात्‌,सबसे पहले वालीके श्वशुर श्रीमान्‌ सुषेण श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें उपस्थित हुए। उनके साथ वेगशाली वानरोंकी सहस्र कोटि (दस अरब) सेना थी

Dikelilingi oleh seribu krore vanara yang tangkas dan perkasa, Suṣeṇa yang termasyhur—mertua Vālin—datang menghadap Rāma terlebih dahulu.

Verse 3

कोटीशतवृतो वापि गजो गवय एव च । वानरेन्द्रौ महावीर्यों पृथक्‌ पृथगदृश्यताम्‌,फिर महापराक्रमी वानरराज “गज” और “गवय' पृथक्‌-पृथक्‌ एक-एक अरब सेनाके साथ आते दिखायी दिये

Kemudian tampak, masing-masing secara terpisah, dua raja vanara yang sangat perkasa—Gaja dan Gavaya—masing-masing dikelilingi oleh ratusan krore pengikut.

Verse 4

षष्टिकोटिसहस्राणि प्रकर्षन्‌ प्रत्यदृश्यत । गोलाड्गूलो महाराज गवाक्षो भीमदर्शन:,महाराज! गोलांगूल (लंगूर) जातिका वानर गवाक्ष, जो देखनेमें बड़ा भयंकर था, साठ सहस्र कोटि (छ: खरब) वानर-सेना साथ लिये दृष्टिगोचर हुआ

Wahai Maharaja, kemudian tampak Gavākṣa dari golāṅgūla (langur), mengerikan dipandang, mendorong maju bala tentara vanara berjumlah enam puluh ribu krore.

Verse 5

गन्धमादनवासी तु प्रथितो गन्धमादन: । कोटीशतसहस््राणि हरीणां समकर्षत,गन्धमादन पर्वतपर रहनेवाला गन्धमादन नामसे विख्यात वानर वानरोंकी दस खरब सेना साथ लेकर आया

Mārkaṇḍeya berkata: “Ada seekor wanara termasyhur bernama Gandhamādana, yang berdiam di Gunung Gandhamādana. Ia menghimpun pasukan wanara yang tak terbilang—beratus-ratus koṭi dan ribuan jumlahnya—lalu membawanya datang, sehingga kekuatan bala wanara pun membesar.”

Verse 6

पनसो नाम मेधावी वानर: सुमहाबल: । कोटीर्दश द्वादश च त्रिंशत्‌ पञ्च प्रकर्षति,पनस नामक बुद्धिमान्‌ तथा महाबली वानर सत्तावन करोड़ सेना साथ लेकर आया

Mārkaṇḍeya berkata: “Ada pemimpin wanara bernama Panasa—bijaksana dan sangat perkasa. Ia mengerahkan bala yang amat besar, berjumlah sepuluh, dua belas, dan tiga puluh lima koṭi.”

Verse 7

श्रीमान्‌ दधिमुखो नाम हरिवृद्धो5तिवीर्यवान्‌ । प्रचकर्ष महासैन्यं हरीणां भीमतेजसाम्‌,वानरोंमें वृद्ध तथा अत्यन्त पराक्रमी श्रीमान्‌ दधिमुख भयंकर तेजसे सम्पन्न वानरोंकी विशाल सेना साथ लेकर आये

Mārkaṇḍeya berkata: “Ada wanara tua bernama Dadhimukha—mulia, termasyhur, dan berdaya luar biasa. Ia menghimpun serta memimpin maju bala besar para wanara yang berkilau dengan tenaga dahsyat.”

Verse 8

कृष्णानां मुखपुण्ड्राणामृक्षाणां भीमकर्मणाम्‌ | कोटीशतसहस्रेण जाम्बवानू्‌ प्रत्यदृश्यत,जिनके मुख (ललाट)-पर तिलकका चिह्न शोभा पा रहा था तथा जो भयंकर पराक्रम करनेवाले थे, ऐसे काले रंगके शतकोटि सहस्र (दस खरब) रीछोंकी सेनाके साथ वहाँ जाम्बवान्‌ दिखायी दिये

Mārkaṇḍeya berkata: “Di sana tampak Jāmbavān, disertai pasukan beruang-beruang hitam yang dahsyat perbuatannya, dengan tanda tilaka di dahi—berjumlah ratusan koṭi dan ribuan.”

Verse 9

एते चान्ये च बहवो हरियूथपयूथपा: । असंख्येया महाराज समीयू रामकारणात्‌,महाराज! ये तथा और भी बहुत-से वानर-यूथपतियोंके भी यूथपति, जिनकी कोई संख्या नहीं थी, श्रीरामचन्द्रजीके कार्यसे वहाँ एकत्र हुए

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai raja agung! Mereka ini, dan banyak lagi pemimpin pasukan wanara—bahkan para pemimpin di atas para pemimpin—yang tak terhitung jumlahnya, berhimpun di sana demi tugas Rama.”

Verse 10

गिरिकूटनिभाड़ानां सिंहानामिव गर्जताम्‌ | श्रूयते तुमुल: शब्दस्तत्र तत्र प्रधावताम्‌,उनके अंग पर्वतोंके शिखरके सदृश जान पड़ते थे। वे सबके सब सिंहोंके समान गरजते और इधर-उधर दौड़ते थे। उन सबका सम्मिलित शब्द बड़ा भयंकर प्रतीत होता था

Anggota tubuh mereka tampak laksana puncak-puncak gunung. Sambil mengaum seperti singa dan berlari ke sana kemari, terdengarlah di berbagai tempat suara gemuruh yang dahsyat—hiruk-pikuk menggentarkan yang lahir dari gerak mereka bersama.

Verse 11

गिरिकूटनिभा: केचित्‌ केचिन्महिषसंनिभा: । शरदशभ्रप्रतीकाशा: केचिद्धिड्डुलकानना:,कोई पर्वत-शिखरके समान ऊँचे थे तो कोई भैंसोंके सदूश मोटे और काले। कितने ही वानर शरद-ऋतुके बादलोंकी तरह सफेद दिखायी देते थे, कितनोंके ही मुख सिन्दूरके समान लाल रंगके थे

Sebagian menjulang laksana puncak gunung; sebagian lain kekar dan gelap seperti kerbau. Ada kera-kera yang tampak putih bagai awan musim gugur, sementara yang lain berwajah merah seperti sindur (vermiliun).

Verse 12

उत्पतन्तः पतन्तश्न प्लवमानाश्न वानरा: । उद्धुन्वन्तो 5परे रेणून्‌ समाजग्मु: समन्ततः,वे वानर सैनिक उछलते, गिरते-पड़ते, कूदते-फाँदते और धूल उड़ाते हुए चारों ओरसे एकत्र हो रहे थे

Para kera melompat tinggi, terjatuh, lalu kembali melesat dan menerjang; sementara yang lain mengguncang dan menghamburkan debu. Demikianlah mereka berkumpul dari segala penjuru.

Verse 13

स वानरमहासैन्य: पूर्णसागरसंनिभ: । निवेशमकरोत तत्र सुग्रीवानुमते तदा,वानरोंकी वह विशाल सेना भरे-पूरे महासागरके समान दिखायी देती थी। सुग्रीवकी आज्ञासे उस समय माल्यवान्‌ पर्वतके आस-पास ही उस समस्त सेनाका पड़ाव पड़ गया

Pasukan besar para kera itu tampak bagaikan samudra yang penuh dan mengembang. Saat itu, dengan persetujuan Sugrīva, mereka mendirikan perkemahan di sana.

Verse 14

ततस्तेषु हरीन्द्रेषु समावृत्तेषु सर्वश: । तिथौ प्रशस्ते नक्षत्रे मुहूर्ते चाभिपूजिते,तदनन्तर उन समस्त श्रेष्ठ वानरोंक सब ओरसे एकत्र हो जानेपर सुग्रीवसहित भगवान्‌ श्रीरामने एक दिन शुभ तिथि, उत्तम नक्षत्र और शुभ मुहूर्तमें युद्धके लिये प्रस्थान किया। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो वे उस व्यूहरचनायुक्त सेनाके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंका संहार करने जा रहे हैं

Kemudian, ketika para pemimpin kera itu telah berkumpul dari segala penjuru, dan tibalah tithi yang mujur, rasi bintang yang menguntungkan, serta muhūrta suci yang telah dihormati menurut tata upacara, Rāma—bersama Sugrīva—berangkat menuju perang. Saat itu tampak seolah-olah, dengan bala yang tersusun dalam formasi, mereka hendak menimpakan kebinasaan atas seluruh dunia.

Verse 15

तेन व्यूढेन सैन्येन लोकानुद्)र्तयन्निव । प्रययौ राघव: श्रीमान्‌ सुग्रीवसहितस्तदा,तदनन्तर उन समस्त श्रेष्ठ वानरोंक सब ओरसे एकत्र हो जानेपर सुग्रीवसहित भगवान्‌ श्रीरामने एक दिन शुभ तिथि, उत्तम नक्षत्र और शुभ मुहूर्तमें युद्धके लिये प्रस्थान किया। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो वे उस व्यूहरचनायुक्त सेनाके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंका संहार करने जा रहे हैं

Dengan bala tentara yang tersusun dalam formasi perang itu, Rāghava yang mulia berangkat saat itu bersama Sugrīva; tampak seakan-akan, dengan kekuatan pasukan yang tertata rapi itu, ia akan mengguncang dan menyapu bersih seluruh dunia.

Verse 16

मुखमासीत्‌ तु सैन्यस्य हनूमान्‌ मारुतात्मज: । जघनं पालयामास सौमित्रिरकुतोभय:,उस सेनाके मुहानेपर वायुपुत्र हनुमानजी विद्यमान थे। किसीसे भी भय न माननेवाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण उसके पृष्ठभागकी रक्षा कर रहे थे

Di barisan terdepan pasukan berdiri Hanūmān, putra Dewa Angin; sedangkan Saumitrī (Lakṣmaṇa) yang tak gentar oleh apa pun menjaga barisan belakang.

Verse 17

बद्धगोधाडुलित्राणौ राघवौ तत्र जम्मतुः । वृतौ हरिमहामात्रै श्वन्द्रसूर्यों ग्रहैरिव,दोनों रघुवंशी वीर श्रीराम और लक्ष्मण हाथोंमें गोहके चमड़ेके बने हुए दस्ताने पहने हुए थे। वे ग्रहोंसे घिरे हुए चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति वानरजातीय मन्त्रियोंके बीचमें होकर चल रहे थे

Di sana kedua keturunan Raghu—Śrī Rāma dan Lakṣmaṇa—melangkah maju dengan sarung tangan dari kulit iguana; dikelilingi para menteri agung pasukan Vānara, mereka bergerak laksana bulan dan matahari yang dikelilingi planet-planet.

Verse 18

प्रबभौ हरिसैन्यं तत्‌ सालतालशिलायुधम्‌ | सुमहच्छालिभवनं यथा सूर्योदयं प्रति

Pasukan Hari itu bersinar—bersenjata pohon sāla dan tāla serta batu-batu besar—laksana istana-kota yang amat megah berkilau menghadap terbitnya matahari.

Verse 19

श्रीरामचन्द्रजीके सम्मुख साल, ताल और शिलारूपी आयुध लिये वे समस्त वानर सैनिक सूर्योदयके समय पके हुए धानके विशाल खेतोंके समान जान पड़ते थे ।। नलनीलाड्डदक्राथमैन्दद्धिविदपालिता । ययौ सुमहती सेना राघवस्यार्थसिद्धये,नल, नील, अंगद, क्राथ, मैन्द तथा द्विविदके द्वारा सुरक्षित हुई वह विशाल वानरसेना श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सिद्ध करनेके लिये आगे बढ़ती चली जा रही थी

Dijaga dan dipimpin oleh Nala, Nīla, Aṅgada, Krātha, Mainda, dan Dvivida, bala yang amat besar itu terus maju demi menuntaskan tujuan Rāghava.

Verse 20

विविधेषु प्रशस्तेषु बहुमूलफलेषु च । प्रभूतमधुमूलेषु वारिमत्सु शिवेषु च,जहाँ फल-मूलकी बहुतायत होती, मधु और कन्द-मूल प्रचुरमात्रामें उपलब्ध होते तथा जलकी अधिक सुविधा होती, ऐसे कल्याणकारी और उत्तम विविध पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालती हुई वह वानरसेना बिना किसी विघ्न-बाधाके खारे पानीवाले समुद्रके निकट जा पहुँची

Berpindah dari satu tempat yang mujur ke tempat yang lain—puncak-puncak gunung yang termasyhur karena kelimpahan buah dan umbi-umbian, kaya madu dan umbi yang dapat dimakan, serta cukup air—pasukan wanara itu berkemah tanpa halangan dan akhirnya mendekati samudra air asin.

Verse 21

निवसन्ती निराबाधा तथैव गिरिसानुषु । उपायाद्धरिसेना सा क्षारोदमथ सागरम्‌,जहाँ फल-मूलकी बहुतायत होती, मधु और कन्द-मूल प्रचुरमात्रामें उपलब्ध होते तथा जलकी अधिक सुविधा होती, ऐसे कल्याणकारी और उत्तम विविध पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालती हुई वह वानरसेना बिना किसी विघ्न-बाधाके खारे पानीवाले समुद्रके निकट जा पहुँची

Bermukim tanpa gangguan di lereng dan punggung pegunungan, pasukan Hari (para wanara) itu terus maju hingga akhirnya mencapai samudra air asin.

Verse 22

द्वितीयसागरनिभं तद्‌ बल॑ बहुलध्वजम्‌ | वेलावनं समासाद्य निवासमकरोत्‌ तदा,असंख्य ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित वह विशाल वाहिनी दूसरे महासागरके समान जान पड़ती थी। सागरके तटवर्ती वनमें पहुँचकर उसने अपना पड़ाव डाला

Pasukan besar itu, padat oleh banyak panji, tampak bagaikan samudra kedua. Setelah mencapai hutan di tepi pantai, mereka pun mendirikan perkemahan di sana.

Verse 23

ततो दाशरथि: श्रीमान्‌ सुग्रीव॑ प्रत्यभाषत । मध्ये वानरमुख्यानां प्राप्तकालमिदं वच:,तत्पश्चात्‌ मुख्य-मुख्य वानरोंके बीचमें बैठे हुए दशरथनन्दन भगवान्‌ श्रीरामने सुग्रीवसे यह समयोचित बात कही--

Kemudian Rāma, putra Daśaratha yang mulia, berbicara kepada Sugrīva. Duduk di tengah para pemimpin wanara terkemuka, ia mengucapkan kata-kata yang tepat pada waktunya.

Verse 24

उपाय: को नु भवतां मतः सागरलड्घने । इयं हि महती सेना सागरश्नातिदुस्तर:,“मित्रो! हमारी यह सेना बहुत बड़ी है और सामने अत्यन्त दुस्तर महासागर लहरें ले रहा है। ऐशी दशामें आपलोग समुद्रके पार जानेके लिये कौन-सा उपाय ठीक समझते हैं?

“Wahai sahabat-sahabatku, menurut pertimbangan kalian, cara apakah yang patut ditempuh untuk menyeberangi samudra? Pasukan ini sungguh besar, dan samudra di hadapan kita amat sukar dilalui.”

Verse 25

तत्रान्ये व्याहरन्ति सम वानरा बहुमानिन: । समर्था लड्घने सिन्धोर्न तु तत्‌ कृत्स्नकारकम्‌,तब वहाँ बहुत-से दूसरे-दूसरे वानर, जो बड़े अभिमानी थे, कहने लगे--“'हम तो समुद्रको लाँघ जानेमें समर्थ हैं, परंतु सब नहीं लाँध सकते”

Di sana, monyet-monyet lain juga—penuh kebanggaan dan keyakinan diri—berseru: “Kami sanggup melompati samudra; namun menuntaskan seluruh tugas ini secara utuh bukanlah sesuatu yang dapat kami lakukan.”

Verse 26

केचिन्नौभिव्यवस्यन्ति केचिच्च विविधै: प्लवै: । नेति रामस्तु तान्‌ सर्वान्‌ सान्त्वयन्‌ प्रत्यभाषत,कुछ वानर बड़ी-बड़ी नावोंके द्वारा समुद्रके पार जानेका निश्चय प्रकट करने लगे। कुछने नाव-डोंगी आदि विविध साधनोंद्वारा पार जानेकी बात बतायी। परंतु श्रीरामचन्द्रजीने उनकी यह सलाह माननेसे इनकार कर दिया और सबको सान्त्वना देते हुए कहा--

Sebagian bertekad menyeberangi samudra dengan perahu, sebagian lain mengusulkan berbagai rakit dan alat apung. Namun Rāma menolak semua usulan itu; sambil menenangkan mereka, ia pun berbicara dengan kata-kata yang menenteramkan.

Verse 27

शतयोजन विस्तारं न शक्ता: सर्ववानरा: । क्रान्तुं तोयनिधिं वीरा नैषा वो नैप्ठेकी मति:,“वीरो! सभी वानरोंमें इतनी शक्ति नहीं है कि वे सौ योजन विस्तृत समुद्रको लाँघ सकें; अतः तुम लोगोंका यह निर्णय सर्वमान्य सिद्धान्तके रूपमें ग्राह्म नहीं है

Wahai para pahlawan! Tidak semua kera sanggup melompati samudra yang terbentang seratus yojana; karena itu tekad kalian ini tidak dapat diterima sebagai kaidah yang teguh dan dapat diandalkan oleh semua.

Verse 28

नावो न सन्ति सेनाया बह्वदयस्तारयितुं तथा । वणिजामुपघातं च कथमस्मद्विधश्चरेत्‌,“इतनी बड़ी सेनाको पार उतारनेके लिये हमलोगोंके पास अधिक नौकाएँ भी नहीं हैं। (यदि कहें, व्यापारियोंके जहाजोंसे काम लिया जाय, तो) मेरे-जैसा पुरुष अपने स्वार्थके लिये व्यापारियोंके व्यवसायको हानि कैसे पहुँचा सकता है?

Kami tidak memiliki cukup perahu dan sejenisnya untuk menyeberangkan pasukan sebesar ini. Dan bila ada yang mengusulkan memakai kapal para pedagang, bagaimana mungkin orang seperti aku, demi kepentinganku sendiri, mencelakakan mata pencaharian dan usaha para saudagar?

Verse 29

विस्तीर्ण चैव नः सैन्यं हन्याच्छिद्रेण वै पर: । प्लवोडुपप्रतारश्न नैवात्र मम रोचते,“इसके सिवा नौका आदिसे यात्रा करनेपर हमारी सेना छिट-फुट होकर बहुत दूरतक फैल जायगी। उस दशामें अवसर पाकर शत्रु इसका नाश भी कर सकता है। इसीलिये डोंगी और नाव आदिपर बैठकर पार उतरनेकी बात मुझे ठीक नहीं जँचती है

Lagipula, bila kita menyeberang dengan perahu kecil dan rakit, pasukan kita akan tercerai-berai dan memanjang jauh. Saat itu musuh, melihat celah, dapat menyerang dan memusnahkannya. Karena itu, rencana menyeberang dengan duduk di dinghy dan perahu tidak berkenan bagiku di sini.

Verse 30

अहं त्विमं जलनिर्धि समारप्स्याम्युपायतः । प्रतिशेष्याम्युपवसन्‌ दर्शयिष्यति मां ततः,“मैं तो किसी उपायसे इस समुद्रकी ही आराधना आरम्भ करूँगा। इसके तटपर अन्न- जल छोड़कर धरना दूँगा। इससे यह अवश्य मुझे दर्शन देगा तथा कोई मार्ग दिखायेगा

Aku akan memulai, dengan suatu cara, pemujaan untuk menenteramkan samudra ini sendiri. Dengan berpuasa, aku akan berjaga teguh di tepinya, meninggalkan makanan dan air; maka ia pasti akan menampakkan diri kepadaku dan sesudah itu menunjukkan jalan ke depan.

Verse 31

न चेद्‌ दर्शयिता मार्ग धक्ष्याम्पेनमहं ततः । महास्त्रैरप्रतिहतैरत्यग्निपवनोज्ज्वलै:,“यदि यह स्वयं प्रकट होकर कोई मार्ग नहीं दिखायेगा तो मैं अग्नि और वायुसे भी अधिक तेजस्वी तथा कभी न चूकनेवाले महान दिव्यास्त्रोंद्रारा इसे जलाकर भस्म कर डालूँगा'

Dan bila ia tidak menampakkan diri serta menunjukkan jalan, maka akan kubakar ia hingga menjadi abu dengan mahāstra ilahi yang tak terhalangi, lebih menyala daripada api dan angin, dan tak pernah meleset.

Verse 32

इत्युक्त्वा सह सौमित्रिरुपस्पृश्याथ राघव: । प्रतिशिश्ये जलनिधिं विधिवत्‌ कुशसंस्तरे,ऐसा कहकर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीने आचमन करके समुद्रके तटपर कुशकी चटाई बिछाकर उसपर लेटकर विधिपूर्वक धरना दे दिया

Setelah berkata demikian, Rāghava bersama Saumitrī melakukan penyucian dengan menyeruput air. Lalu di tepi samudra ia membentangkan alas rumput kuśa; berbaring di atasnya, ia menjalankan tekad tapa (dharṇā) sesuai tata-ritus.

Verse 33

सागरस्तु ततः स्वप्ने दर्शयामास राघवम्‌ | देवो नदनदीभर्ता श्रीमान्‌ यादोगणैर्वृत:,तब नदों और नदियोंके स्वामी श्रीमान्‌ समुद्रदेवने जल-जन्तुओंके साथ प्रकट होकर स्वप्नमें श्रीरामचन्द्रजीको दर्शन दिया

Kemudian, dalam mimpi, Samudra menampakkan diri kepada Rāghava. Dewa samudra yang mulia—penguasa sungai dan aliran—tampak dikelilingi kawanan makhluk air.

Verse 34

कौसल्यामातरित्येवमाभाष्य मधुरं वच: । इदमित्याह रत्नानामाकरै: शतशो वृत:,वह सैकड़ों रत्नके आकरोंसे घिरा हुआ था। उसने “कौसल्यानन्दन” कहकर श्रीरामको सम्बोधित किया और मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा--

Ia dikelilingi ratusan tambang dan sumber permata. Dengan kata-kata manis ia menyapa, “Wahai putra Kausalyā,” lalu berkata lembut, “Inilah.”

Verse 35

ब्रृहि कि ते करोम्यत्र साहाय्यं पुरुषर्षभ । ऐक्ष्वाको हास्मि ते ज्ञातिरिति रामस्तमब्रवीत्‌,“नरश्रेष्ठ! कहो, मैं यहाँ तुम्हारी क्या सहायता करूँ? सगरपुत्रोंसे संवर्धित होनेके कारण मैं भी इक्ष्वाकुवंशीय तथा तुम्हारा भाई-बन्धु हूँ"। यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उससे कहा --

Rama berkata kepadanya: “Wahai yang terbaik di antara manusia, katakan—bantuan apa yang harus kuberikan di sini? Aku berasal dari wangsa Ikṣvāku dan aku pun kerabatmu; maka berbicaralah tanpa ragu.”

Verse 36

मार्गमिच्छामि सैन्यस्य दत्तं नदनदीपते । येन गत्वा दशग्रीवं हन्यां पौलस्त्यपांसनम्‌,“नद-नदीश्वर! मैं अपनी सेनाके लिये तुम्हारे द्वारा दिया हुआ मार्ग चाहता हूँ, जिससे जाकर पुलस्त्यकुलांगार दशमुख रावणको मार सकूँ

“Wahai penguasa sungai dan aliran air, aku memohon jalan yang telah engkau anugerahkan bagi pasukanku; agar melalui jalan itu aku dapat pergi dan menewaskan Daśagrīva (Rāvaṇa), noda bagi wangsa Pulastya.”

Verse 37

यद्येवं याचतो मार्ग न प्रदास्यति मे भवान्‌ | शरैस्त्वां शोषयिष्यामि दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितै:,“यदि इस प्रकार याचना करनेपर तुम मुझे मार्ग न दोगे तो मैं दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंद्वारा तुम्हें सुखा दूँगा”

“Jika, meski aku memohon demikian, engkau tetap tidak memberiku jalan, maka akan kukeringkan engkau dengan anak panah yang diberkahi daya senjata ilahi dan dipasangi mantra penangkalnya.”

Verse 38

इत्येवं ब्रुवत: श्रुत्वा रामस्य वरुणालय: । उवाच व्यथितो वाक्यमिति बद्धाञ्जलि: स्थित:,श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर वरुणालय समुद्र व्यथित हो उठा और खड़े हुए हाथ जोड़कर बोला--

Mendengar Rama berkata demikian, samudra—kediaman Varuṇa—terguncang oleh kegelisahan. Berdiri dengan kedua tangan terkatup, ia pun berkata demikian.

Verse 39

नेच्छामि प्रतिघातं ते नास्मि विघ्नकरस्तव । शृणु चेदं वचो राम श्रुत्वा कर्तव्यमाचर,“श्रीराम! मैं तुम्हारा सामना करना नहीं चाहता और न मैं तुम्हारे मार्गमें विघ्न डालनेकी ही इच्छा रखता हूँ। मेरी यह बात सुनो और सुनकर जो कर्तव्य हो, उसे करो

“Wahai Rāma, aku tidak ingin melawanmu, dan aku bukan penghalang di jalanmu. Dengarkanlah perkataanku ini; setelah mendengarnya, lakukanlah apa yang menjadi dharma.”

Verse 40

यदि दास्यामि ते मार्ग सैन्यस्य व्रजतो55ज्ञया । अन्ये>प्याज्ञापयिष्यन्ति मामेवं धनुषो बलात्‌,“यदि मैं इस समय तुम्हारी आज्ञासे तुम्हें और लंका जाती हुई तुम्हारी सेनाको मार्ग दे दूँगा तो दूसरे लोग भी इसी प्रकार धनुषके बलसे मुझपर हुक्म चलाया करेंगे

Mārkaṇḍeya berkata: “Jika atas perintahmu aku menunjukkan jalan bagi pasukanmu yang sedang bergerak, maka orang lain pun akan mulai memerintahku dengan cara yang sama—semata-mata dengan kekuatan busur.”

Verse 41

अस्ति त्वत्र नलो नाम वानर: शिल्पिसम्मत: । त्वष्टदेंवस्य तनयो बलवान विश्वकर्मण:,“तुम्हारी सेनामें एक नल नामक वानर है जो शिल्पियोंके लिये भी आदरणीय है। बलवान्‌ नल देवशिल्पी विश्वकर्माका पुत्र है

Mārkaṇḍeya berkata: “Di antara kalian ada seekor kera bernama Nala, dihormati bahkan oleh para ahli pertukangan. Ia perkasa—putra sang perajin ilahi Viśvakarman, lahir dari dewa Tvaṣṭṛ.”

Verse 42

स यत्‌ काष्ठ तृणं वापि शिलां वा क्षेप्स्यते मयि । सर्व तद्‌ धारयिष्यामि स ते सेतुर्भविष्यति,“वह अपने हाथसे उठाकर जो भी काठ, तिनका या पत्थर मेरे भीतर डाल देगा, वह सब मैं जलके ऊपर-धारण किये रहूँगा। वही तुम्हारे लिये पुल हो जायगा”

Mārkaṇḍeya berkata: “Apa pun—kayu, sehelai rumput, atau batu—yang ia lemparkan ke dalam diriku, akan kutopang semuanya di atas air; tumpukan itulah yang akan menjadi jembatan bagimu.”

Verse 43

इत्युक्त्वान्तरहिते तस्मिन्‌ रामो नलमुवाच ह । कुरु सेतु समुद्रे त्वं शक्तो हसि मतो मम,ऐसा कहकर समुद्र अन्तर्धान हो गया। तत्पश्चात्‌ श्रीयीमने उठकर नलसे कहा--“तुम समुद्रपर एक पुल तैयार करो। मैं जानता हूँ, तुममें यह कार्य करनेकी शक्ति है”

Setelah berkata demikian, Sang Samudra pun lenyap dari pandangan. Lalu Rama berkata kepada Nala: “Bangunlah sebuah causeway di atas lautan; menurut penilaianku, engkau sanggup melakukannya.”

Verse 44

तेनोपायेन काकुत्स्थ: सेतुबन्धमकारयत्‌ । दशयोजनविस्तारमायतं शतयोजनम्‌,उसी उपायसे रघुनाथजीने समुद्रपर सौ योजन लंबा और दस योजन चौड़ा पुल तैयार कराया

Mārkaṇḍeya berkata: “Dengan cara itulah Kakutstha (Rama) membuat sebuah causeway dibangun di atas lautan—seratus yojana panjangnya dan sepuluh yojana lebarnya.”

Verse 45

नलसेतुरिति ख्यातो योडद्यापि प्रथितो भुवि | रामस्थाज्ञां पुरस्कृत्य निर्यातो गिरिसंनिभ:,वह आज भी भूमण्डलमें “नलसेतु” के नामसे विख्यात है। श्रीरामजीकी आज्ञा मानकर समुद्रने उस पर्वताकार पुलको अपने ऊपर धारण किया

Jembatan itu termasyhur sebagai “Setu Nala” dan hingga kini dikenal di muka bumi. Menjunjung titah Śrī Rāma, samudra pun menanggung di atas dirinya jembatan yang laksana gunung itu.

Verse 46

तत्रस्थं स तु धर्मात्मा समागच्छद्‌ विभीषण: । भ्राता वै राक्षसेन्द्रस्य चतुर्भि: सचिवै: सह,श्रीरामचन्द्रजी अभी समुद्रके किनारे ही थे कि राक्षसराज रावणके भाई धर्मात्मा विभीषण अपने चार मन्सत्रियोंक साथ उनसे मिलनेके लिये आये

Ketika Śrī Rāma sedang berada di tepi samudra, Vibhīṣaṇa yang berhati luhur—saudara raja para Rākṣasa (Rāvaṇa)—datang menemuinya bersama empat menteri.

Verse 47

7 जन ] ४! । (/9,|।। #//7+7) ९३४४ ।। प्रतिजग्राह समस्तं स्वागतेन महामना: । सुग्रीवस्य तु शड्काभूत्‌ प्रणिधि: स्यादिति सम ह,महामना श्रीरामने स्वागतपूर्वक उन्हें अपनाया। उस समय सुग्रीवके मनमें यह शंका हुई कि “कहीं यह शत्रुका कोई गुप्तचर न हो”

Yang berhati agung (Rāma) menyambut mereka semua dengan kata-kata selamat datang. Namun dalam benak Sugrīva timbul keraguan: “Jangan-jangan ia mata-mata musuh.”

Verse 48

राघव: सत्यचेष्टाभि: सम्यक्‌ च चरितेज्डितै: । यदा तत्त्वेन तुष्टो$भूत्‌ तत एनमपूजयत्‌,परंतु श्रीरामचन्द्रजीने उनकी सत्य चेष्टाओं, उत्तम आचरणों और मुख-नेत्र आदिके संकेतोंसे सूचित होनेवाले मनोभावोंकी सम्यक्‌ समीक्षा करके जब अच्छी तरह संतोष प्राप्त कर लिया, तब विभीषणका बहुत आदर किया

Rāghava menilai dengan saksama usaha Vibhīṣaṇa yang jujur, keluhuran perilakunya, serta ketulusan yang tampak dari gerak-gerik dan raut wajahnya. Setelah benar-benar yakin akan maksudnya yang sejati, barulah ia memuliakannya dengan hormat yang patut.

Verse 49

सर्वराक्षसराज्ये चाप्यभ्यषिज्चद्‌ विभीषणम्‌ । चक्रे च मन्त्रसचिवं सुहृदं लक्ष्मणस्थ च

Kemudian ia menobatkan Vibhīṣaṇa sebagai raja atas seluruh kerajaan para Rākṣasa; dan ia pun mengangkat Lakṣmaṇa—sahabatnya yang terpercaya—sebagai menteri serta penasihat.

Verse 50

विभीषणमते चैव सोउत्यक्रामन्महार्णवम्‌ । ससैन्य: सेतुना तेन मासेनैव नराधिप,नरेश्वरर विभीषणकी सलाहसे श्रीरामचन्द्रजीने उसी सेतुद्वारा एक ही महीनेमें सेनासहित महासागरको पार कर लिया

Mengikuti nasihat Vibhīṣaṇa, ia menyeberangi samudra yang maha luas. Wahai raja, dengan seluruh bala tentaranya ia melintasinya melalui jembatan itu, dan dalam satu bulan saja penyeberangan itu terselesaikan.

Verse 51

ततो गत्वा समासाद्य लड़कोद्यानान्यनेकश: । भेदयामास कपिभिर्महान्ति च बहूनि च,तत्पश्चात्‌ उन्होंने लंकाकी सीमामें पहुँचकर वानरोंद्वारा वहाँके बहुत-से बड़े-बड़े उद्यानोंको छिन्न-भिन्न करा दिया

Kemudian, setelah pergi dan mencapai banyak taman kesenangan di Laṅkā, ia menyuruh para kera merusak dan meluluhlantakkan banyak taman besar di sana.

Verse 52

ततस्तौ रावणामात्यौ मन्त्रिणौ शुकसारणौ । चरौ वानररूपेण तौ जग्राह विभीषण:,उस सेनामें वानरोंका रूप घारण करके रावणके दो मन्त्री शुक और सारण गुप्तचरका काम करनेके लिये घुस आये थे। विभीषणने उन दोनोंको पहचानकर कैद कर लिया

Lalu dua menteri Rāvaṇa—Śuka dan Sāraṇa—masuk sebagai mata-mata dengan menyamar dalam wujud kera. Vibhīṣaṇa mengenali mereka dan menangkapnya.

Verse 53

प्रतिपन्नौ यदा रूप॑ राक्षसं तौ निशाचरौ । दर्शयित्वा तत: सैन्यं राम: पश्चादवासृजत्‌

Ketika kedua makhluk pengembara malam itu kembali menampakkan wujud rākṣasa, Rāma terlebih dahulu memperlihatkan kepada mereka bala tentaranya, lalu sesudah itu melepaskan mereka.

Verse 54

जब वे दोनों निशाचर अपने राक्षसरूपमें प्रकट हुए, तब श्रीरामने उन्हें अपनी सेनाका दर्शन कराकर छोड़ दिया ।। निवेश्योपवने सैन्यं तत्‌ पुर: प्राज्ञवानरम्‌ । प्रेषयामास दौत्येन रावणस्य ततो$5ज्भदम्‌,लंकापुरीके उपवनमें वानरसेनाको ठहराकर श्रीरघुनाथजीने बुद्धिमान्‌ वानर अंगदको दूतके रूपमें रावणके यहाँ भेजा

Setelah menempatkan pasukan kera di taman dekat kota Laṅkā, Śrī Rāma mengutus Aṅgada—kera yang bijaksana—sebagai duta kepada Rāvaṇa.

Verse 59

साथ ही उन्हें समस्त राक्षसोंके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और लक्ष्मणका सुहृद्‌ तथा अपना सलाहकार बना लिया

Bersamaan dengan itu, ia menobatkan mereka sebagai penguasa atas seluruh negeri para Rākṣasa, dan menjadikan Lakṣmaṇa sahabat tepercaya sekaligus penasihatnya sendiri.

Verse 283

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि सेतुबन्धने त्रयशीत्यधिकद्धिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ााभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें सेतुबन्धविषयक दो सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, di bagian Rāmopākhyāna, berakhirlah bab tentang pembangunan jembatan (ke Laṅkā), yakni bab ke-283.

Frequently Asked Questions

Whether the pursuit of enduring fame justifies self-harm or avoidable loss of life; Sūrya argues that fame sought through prāṇa-virodha is self-defeating and ethically unsound.

Reputation is ethically meaningful when aligned with the preservation of life and the capacity to fulfill duties; prudence and self-protection can be dharmic when they sustain one’s responsibilities.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-level emphasis is practical: dharma is evaluated through lived consequence—only the living can enact duty and meaningfully receive the fruits of fame.