Adhyaya 276
Vana ParvaAdhyaya 27642 Verses

Adhyaya 276

Mārkaṇḍeya’s Consolation to the King: Exempla of Rāma and the Efficacy of Allies (मार्कण्डेयाश्वासनम्)

Upa-parva: Mārkaṇḍeya-samvāda (Consolation and Exempla Discourse)

This chapter presents a structured reassurance delivered by the sage Mārkaṇḍeya. He affirms that the king’s present crisis is historically intelligible by recalling that even Rāma, famed for immense energy, encountered severe adversity due to forest-exile. The sage then directly prohibits grief, emphasizing the listener’s kṣatriya identity and the path of arm-strength and resolute decision. He asserts that no moral fault is visible in the king, and that even divine and anti-divine beings would falter on such a path—thus reframing suffering as a measure of difficulty rather than personal failure. Mārkaṇḍeya cites collective victories (e.g., Vṛtra’s defeat by Indra with the Maruts) to foreground the practical advantage of coordinated support. He contrasts this with Rāma’s recovery of Vaidehī and defeat of Daśagrīva despite being ‘without assistance,’ and then highlights the Pandavas’ own demonstrated capacity: the retrieval of Draupadī and the subjugation of Jayadratha. He concludes that great-souled leaders do not succumb to grief. Vaiśaṃpāyana closes the unit by noting the king’s renewed steadiness after being consoled.

Chapter Arc: युधिष्ठिर के समक्ष रामोपाख्यान में राक्षस-वंश की जड़ें खुलती हैं—रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखा की उत्पत्ति, उनकी तपस्या और वर-प्राप्ति का वृत्तांत आरम्भ होता है। → लंकापुरी में वैभवशाली वैश्रवण (कुबेर) का निवास और राक्षसी परिचारिकाओं का प्रसंग आते ही सत्ता-प्रतिस्पर्धा की छाया गहराती है; उधर रावण और उसके भ्राताओं की कठोर तपस्या (भूमि-शयन, आहार-संयम, पर्णाहार) उन्हें अलौकिक सामर्थ्य की ओर धकेलती है। → ब्रह्मा वरदान देते हुए सीमा रेखा खींचते हैं—देव, दानव, गन्धर्व आदि से अभय, पर ‘मनुष्य’ से नहीं; इसी क्षण रावण का भविष्य-बीज पड़ता है, और उसका नामकरण-भाव भी उभरता है: जो लोकों को रुलाए, वही ‘रावण’। → वर-प्राप्ति के साथ रावण का अहं और भय-उत्पादन स्पष्ट होता है—दशग्रीव का बल देवताओं में भी आतंक जगाता है; कथा यह स्थापित करती है कि तपस्या से शक्ति तो मिलती है, पर मर्यादा-विहीन इच्छा उसे विनाश की ओर मोड़ देती है। → वरदान की ‘मनुष्य-अपवाद’ वाली शर्त भविष्य के निर्णायक प्रतिद्वन्द्वी की ओर संकेत करती है—अब प्रश्न यह है कि कौन-सा मनुष्य इस अभय-ढाल को भेदेगा?

Shlokas

Verse 1

ऑड2 # () ऑणआ अप पज्चसप्तर्त्याधिकाद्वेशततमो< ध्याय: रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना मार्कण्डेय उवाच पुलस्त्यस्य तु यः क्रोधादर्धदेहो 5 भवन्मुनि: । विश्रवा नाम सक्रोध: स वैश्रवणमैक्षत,मार्कण्डेयजी कहते हैं--राजन! पुलस्त्यके क्रोधसे उनके आधे शरीरसे जो “विश्रवा' नामक मुनि प्रकट हुए थे, वे कुबेरको कुपित दृष्टिसे देखने लगे

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Raja, dari amarah Pulastya seakan-akan dari separuh tubuhnya muncullah seorang resi bernama Viśravā. Masih diliputi murka, Viśravā menatap Vaiśravaṇa (Kubera) dengan pandangan marah.”

Verse 2

बुबुधे तं तु सक्रोध॑ पितरं राक्षसे श्वर: । कुबेरस्तत्प्रसादार्थ यतते सम सदा नूप,युधिष्ठिर! राक्षसोंके स्वामी कुबेरको जब यह बात मालूम हो गयी कि मेरे पिता मुझपर रष्ट रहते हैं, तब वे उन्हें प्रसन्न रखनेका यत्न करने लगे

Wahai Yudhiṣṭhira, ketika Kubera, penguasa para Rākṣasa, mengetahui bahwa ayahku murka kepadanya, ia pun senantiasa menahan diri dengan hati seimbang dan terus berusaha meraih keridaan sang ayah.

Verse 3

स राजराजो लड्कायां न्‍न्यवसन्नरवाहन: । राक्षसी: प्रददौ तिस्र: पितुर्वे परिचारिका:,राजराज कुबेर स्वयं लंकामें ही रहते थे। वे मनुष्योंद्वारा ढोई जानेवाली पालकी आदिकी सवारीपर चलते थे, इसलिये नरवाहन कहलाते थे। उन्होंने अपने पिता विश्रवाकी सेवाके लिये तीन राक्षसकन्याओंको परिचारिकाओंके रूपमें नियुक्त कर दिया था

Raja di antara para raja, Kubera, tinggal di Laṅkā. Ia dikenal sebagai Naravāhana karena bepergian dengan tandu atau kendaraan yang dipanggul manusia. Demi pelayanan kepada ayahnya, Viśravā, ia menempatkan tiga gadis rākṣasī sebagai dayang-dayang.

Verse 4

ता: सदा तं महात्मानं संतोषयितुमुद्यता: । ऋषिं भरतशार्दूल नृत्यगीतविशारदा:,भरतमश्रेष्ठ! वे तीनों ही नाचने और गानेकी कलामें निपुण थीं तथा सदा ही उन महात्मा महर्षिको संतुष्ट रखनेके लिये सचेष्ट रहती थीं ॥॥|॥॥॥/ / ५५५५ ॥॥॥॥॥॥॥५/७ ३३७॥

Ketiga perempuan itu senantiasa berusaha menyenangkan sang resi agung. Wahai harimau di antara kaum Bharata, mereka sangat mahir dalam tari dan nyanyian, dan terus-menerus berupaya menjaga sang rsi tetap puas dan tenteram.

Verse 5

पुष्पोत्कटा च राका च मालिनी च विशाम्पते । अन्योन्यस्पर्धया राजन्‌ श्रेयस्कामा: सुमध्यमा:,महाराज! उनके नाम थे--पुष्पोत्कटा, राका तथा मालिनी। वे तीनों सुन्दरियाँ अपना भला चाहती थीं। इसलिये एक-दूसरीसे स्पर्धा रखकर मुनिकी सेवा करती थीं

Wahai penguasa rakyat, ada tiga perempuan bernama Puṣpotkaṭā, Rākā, dan Mālinī. Mereka ramping pinggangnya dan menginginkan kebaikan tertinggi bagi diri mereka; maka, wahai raja, mereka saling berlomba dalam bakti melayani sang muni.

Verse 6

स तासां भगवांस्तुष्टो महात्मा प्रददौ वरान्‌ । लोकपालोपमान्‌ पुत्रानेकैकस्या यथेप्सितान्‌

Sang Mahātma yang mulia itu, puas terhadap mereka, menganugerahkan karunia: kepada masing-masing, putra-putra sesuai kehendaknya, setara dengan para penjaga dunia (Lokapāla).

Verse 7

वे ऐश्वर्यशशाली महात्मा उनकी सेवाओंसे प्रसन्न हो गये और उनमेंसे प्रत्येकको उनकी इच्छाके अनुसार लोकपालोंके समान पराक्रमी पुत्र होनेका वरदान दिया ।। पुष्पोत्कटायां जज्ञाते द्वौ पुत्रौ राक्षसेश्वरी । कुम्भकर्णदशग्रीवौ बलेनाप्रतिमौ भुवि,पुष्पोत्कटाके दो पुत्र हुए--रावण और कुम्भकर्ण। ये दोनों ही राक्षसोंके अधिपति थे। भूमण्डलमें इनके समान बलवान दूसरा कोई नहीं था

Sang Mahātma yang penuh kemuliaan itu, berkenan atas pengabdian mereka, menganugerahkan kepada masing-masing putra-putra perkasa laksana para Lokapāla, sesuai kehendaknya. Maka dari Puṣpotkaṭā lahirlah dua putra—Kumbhakarṇa dan Daśagrīva (Rāvaṇa), para penguasa rākṣasa, tiada banding kekuatannya di muka bumi.

Verse 8

मालिनी जनयामास पुत्रमेक॑ विभीषणम्‌ । राकायां मिथुनं जज्ञे खर: शूर्पणखा तथा,मालिनीने एक ही पुत्र विभीषणको जन्म दिया। राकाके गर्भसे एक पुत्र और एक पुत्री हुई। पुत्रका नाम खर था और पुत्रीका शूर्पणखा

Mālinī melahirkan seorang putra, Vibhīṣaṇa. Dari Rākā lahir anak kembar—seorang putra bernama Khara dan seorang putri bernama Śūrpaṇakhā.

Verse 9

विभीषणस्तु रूपेण सर्वेभ्यो5भ्यधिको5भवत्‌ । स बभूव महाभागो धर्मगोप्ता क्रियारति:,इन सब बालकोंमें विभीषण ही सबसे अधिक रूपवान्‌, सौभाग्यशाली, धर्मरक्षक तथा कर्तव्यपरायण थे

Namun Vibhīṣaṇa melampaui semuanya dalam keelokan rupa. Ia menjadi insan yang amat beruntung—penjaga dharma, yang bersukacita dalam tindakan yang benar dan pelaksanaan kewajiban.

Verse 10

दशग्रीवस्तु सर्वेषां श्रेष्ठो राक्षसपुड्भव: । महोत्साहो महावीरयों महासत्त्वपराक्रम:,रावणके दस मस्तक थे। वही सबमें ज्येष्ठ तथा राक्षसोंका स्वामी था। उत्साह, बल, धैर्य और पराक्रममें भी वह महान्‌ था

Daśagrīva (Rāvaṇa) bertubuh sepuluh kepala; ia yang terdepan di antara semuanya, pemimpin utama para rākṣasa. Ia memiliki daya usaha yang besar, kepahlawanan yang agung, keteguhan jiwa, dan keperkasaan yang dahsyat.

Verse 11

कुम्भकर्ण शारीरिक बलमें सबसे बढ़ा-चढ़ा था। युद्धमें भी वह सबसे बढ़कर था। मायावी और रणकुशल तो था ही, वह निशाचर बड़ा भयंकर भी था

Kumbhakarṇa melampaui yang lain dalam kekuatan jasmani, dan dalam pertempuran pun ia berdiri di atas semuanya. Ia mahir tipu daya dan terampil dalam seni perang; sebagai rākṣasa pengembara malam, ia juga amat mengerikan.

Verse 12

खरो धनुषि विक्रान्तो ब्रह्मद्विट॒ पिशिताशन: । सिद्धविघ्नकरी चापि रौद्री शूर्पणखा तथा,खर थधर्नुर्विद्यामें विशेष पराक्रमी था। वह ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाला तथा मांसाहारी था। शूर्पणखाकी आकृति बड़ी भयानक थी। वह सिद्ध ऋषि-मुनियोंकी तपस्यामें विध्न डाला करती थी

Khara sangat gagah dalam penggunaan busur; ia pembenci brāhmaṇa dan pemakan daging. Demikian pula Śūrpaṇakhā: berwatak garang, berwujud mengerikan, dan kerap menghalangi tapa para resi yang telah mencapai kesempurnaan.

Verse 13

कुम्भकर्णो बलेनासीत्‌ सर्वेभ्यो5भ्यधिको युधि । मायावी रणशौण्डश्न रौद्रश्न रजनीचर:,सर्वे वेदविद: शूरा: सर्वे सुचरितव्रता: । ऊषुः: पित्रा सह रता गन्धमादनपर्वते वे सभी बालक वेददवेत्ता, शूरवीर तथा ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले थे और अपने पिताके साथ गन्धमादन पर्वतपर सुखपूर्वक रहते थे

Kumbhakarṇa, karena kekuatannya, melampaui semuanya dalam pertempuran; ia mahir tipu daya, gandrung pada perang, garang, dan pengembara malam. Mereka semua adalah para pengenal Veda, para pahlawan, dan teguh dalam laku-sumpah yang baik. Dengan penuh bakti kepada ayah mereka, mereka tinggal bahagia di Gunung Gandhamādana.

Verse 14

ततो वैश्रवर्णं तत्र ददृशुर्नरवाहनम्‌ | पित्रा सार्थ समासीनमृद्धया परमया युतम्‌,एक दिन नरवाहन कुबेर अपने महान्‌ ऐश्वर्यसे युक्त होकर पिताके साथ बैठे थे। उसी अवस्थामें रावण आदिने उनको देखा

Kemudian mereka melihat di sana Vaiśravaṇa (Kubera), sang penguasa yang berwahana tandu yang dipanggul manusia, duduk bersama ayahnya, dipenuhi kemakmuran dan kemegahan yang tertinggi.

Verse 15

जातामर्षस्ततस्ते तु तपसे धृतनिश्चया: । ब्रह्माणं तोषयामासुर्घोरेण तपसा तदा,उनका वैभव देखकर इन बालकोंके हृदयमें डाह पैदा हो गयी। अतः उन्होंने मन-ही- मन तपस्या करनेका निश्चय किया और घोर तपस्याके द्वारा उन्होंने ब्रह्माजीको संतुष्ट कर लिया

Lalu timbullah iri hati dalam diri mereka; dengan tekad bulat untuk bertapa, pada saat itu mereka melakukan tapa yang dahsyat dan dengan tapas yang keras itu mereka menyenangkan Brahmā.

Verse 16

अतिष्ठदेकपादेन सहस््रं परिवत्सरान्‌ | वायुभक्षो दशग्रीव: पञ्चाग्नि: सुसमाहित:,रावण सहस्रों वर्षोतक एक पैरसे खड़ा रहा। वह चित्तको एकाग्र रखकर पंचाग्निसेवन करता और वायु पीकर रहता था

Daśagrīva (Rāvaṇa) berdiri dengan satu kaki selama seribu tahun. Hanya berbekal udara sebagai santapan, ia menjalani tapa lima api dengan batin yang sepenuhnya terpusat.

Verse 17

अध:शायी कुम्भकर्णो यताहारो यतव्रतः । विभीषण: शीर्णपर्णमेकम भ्यवहारयन्‌,कुम्भकर्णने भी आहारका संयम किया। वह भूमिपर सोता और कठोर नियमोंका पालन करता था। विभीषण केवल एक सूखा पत्ता खाकर रहते थे

Kumbhakarṇa berbaring di tanah, menahan makan dan menjalankan laku tapa dengan ikrar yang ketat. Adapun Vibhīṣaṇa, ia bertahan hidup dengan memakan hanya sehelai daun yang telah layu.

Verse 18

उपवासरतिर्धीमान्‌ सदा जप्यपरायण: । तमेव कालमातिष्ठत्‌ तीव्रं तप उदारधी:,उनका भी उपवासमें ही प्रेम था। बुद्धिमान्‌ एवं उदारबुद्धि विभीषण सदा जप किया करते थे। उन्होंने भी उतने समयतक तीव्र तपस्या की

Ia gemar berpuasa. Vibhīṣaṇa, yang bijaksana dan berhati luhur, senantiasa tekun dalam japa; dan selama masa yang sama ia pun menegakkan tapa yang keras.

Verse 19

खर: शूर्पणखा चैव तेषां वै तप्यतां तप: । परिचर्या च रक्षां च चक्रतुर्हष्टमानसौ

Mārkaṇḍeya berkata: “Khara dan Śūrpaṇakhā, dengan hati yang bersukacita, menjalankan pelayanan dan perlindungan bagi mereka yang tekun bertapa; mereka menopang laku tapa itu dan menjaga para pertapa saat menunaikan kaulnya.”

Verse 20

खर और शूर्पणखा ये दोनों प्रसन्नमनसे तपस्यामें लगे हुए अपने भाइयोंकी परिचर्या तथा रक्षा करते थे ।। पूर्णे वर्षमहस्रे तु शिरश्छित्त्वा दशानन: । जुहोत्यग्नौ दुराधर्षस्तेनातुष्यज्जगत्प्र भु:

Khara dan Śūrpaṇakhā, keduanya dengan hati gembira, melayani serta melindungi saudara-saudara mereka yang tekun bertapa. Lalu, ketika genap seribu tahun berlalu, Daśānana (Rāvaṇa) yang tak terkalahkan memenggal kepalanya sendiri dan mempersembahkannya ke dalam api kurban; oleh tapa yang dahsyat itu, Tuhan semesta pun berkenan.

Verse 21

एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर दुर्धर्ष दशाननने अपना मस्तक काटकर अग्निमें उसकी आहुति दे दी। उसके इस अदभुत कर्मसे लोकेश्चर ब्रह्माजी बहुत संतुष्ट हुए ।। ततो ब्रह्मा स्वयं गत्वा तपसस्तान्‌ न्‍्यवारयत्‌ | प्रलोभ्य वरदानेन सवनिव पृथक्‌ पृथक्‌,तदनन्तर ब्रह्माजीने स्वयं जाकर उन सबको तपस्या करनेसे रोका और प्रत्येकको पृथक्‌-पृथक्‌ वरदानका लोभ देते हुए कहा--

Ketika genap seribu tahun berlalu, Daśānana yang dahsyat memenggal kepalanya sendiri dan mempersembahkannya ke dalam api sebagai oblation. Oleh perbuatan menakjubkan itu, Brahmā, Penguasa alam-alam, menjadi sangat berkenan. Lalu Brahmā sendiri datang ke sana dan menghentikan mereka dari tapa; dengan menggoda masing-masing secara terpisah melalui janji anugerah, ia berkata demikian—

Verse 22

ब्रह्मोवाच प्रीतो5स्मि वो निवर्तध्वं वरान्‌ वृणुत पुत्रका: । यद्‌ यदिष्टमृते त्वेकममरत्वं तथास्तु तत्‌

Brahmā bersabda: “Wahai anak-anakku, Aku berkenan kepada kalian. Kini hentikan tapa kalian; pilihlah anugerah. Apa pun yang kalian kehendaki akan terjadi—kecuali satu hal: keabadian. Itu tidak.”

Verse 23

ब्रह्माजी बोले--पुत्रो! मैं तुम सबपर प्रसन्न हूँ, वर माँगो और तपस्यासे निवृत्त हो जाओ। केवल अमरत्वको छोड़कर जिसकी जो-जो इच्छा हो, उसके अनुसार वह वर माँगे। उसका वह मनोरथ पूर्ण होगा ।। यद्‌ यदग्नौ हुतं सर्व शिरस्ते महदीप्सया । तथैव तानि ते देहे भविष्यन्ति यथेप्सया

Brahmā bersabda: “Wahai anak-anakku, mintalah anugerah dan berhentilah dari tapa. Kecuali keabadian, mintalah apa pun yang kalian kehendaki; hasrat kalian akan terpenuhi. Dan segala kepala yang telah kalian persembahkan ke dalam api dengan tekad yang menyala-nyala itu akan kembali menjelma pada tubuh kalian, persis sebagaimana yang kalian inginkan.”

Verse 24

(तत्पश्चात्‌ उन्होंने रावणकी ओर लक्ष्य करके कहा--) तुमने महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त करनेकी इच्छासे अपने जिन-जिन मस्तकोंकी अग्निमें आहुति दी है, वे सब-के-सब पूर्ववत्‌ तुम्हारे शरीरमें इच्छानुसार जुड़ जायँगे ।। वैरूप्यं च न ते देहे कामरूपधरस्तथा । भविष्यसि रणे5रीणां विजेता न च संशय:,तुम्हारे शरीरमें किसी प्रकारकी कुरूपता नहीं होगी, तुम इच्छानुसार रूप धारण कर सकोगे तथा युद्धमें शत्रुओंपर विजयी होओगे, इसमें संशय नहीं है

Kemudian, menatap Rāvaṇa, Mārkaṇḍeya bersabda: “Segala kepala yang telah kaupersembahkan ke dalam api demi hasrat meraih kedudukan luhur, semuanya akan dipulihkan ke tubuhmu seperti sediakala, menyatu kembali menurut kehendakmu. Tiada cacat akan tinggal pada ragamu; engkau akan mampu mengambil wujud sesukamu; dan di medan perang engkau akan menaklukkan musuh-musuhmu—tanpa keraguan.”

Verse 25

रावण उवाच गन्धर्वदेवासुरतो यक्षराक्षसतस्तथा । सर्पकिन्नरभूते भ्यो न मे भूयात्‌ पराभव:,रावण बोला--भगवन्‌! गन्धर्व, देवता, असुर, यक्ष, राक्षस, सर्प, किन्नर तथा भूतोंसे कभी मेरी पराजय न हो

Rāvaṇa berkata: “Wahai Bhagawan! Semoga aku tak pernah dikalahkan oleh Gandharwa, para dewa, Asura, Yakṣa, Rākṣasa, para Nāga, Kinnara, maupun Bhūta.”

Verse 26

ब्रह्मोवाच य एते कीर्तिता: सर्वे न तेभ्यो5स्ति भयं तव । ऋते मनुष्याद्‌ भद्गं ते तथा तद्‌ विहितं मया,ब्रह्माजीने कहा--तुमने जिन लोगोंका नाम लिया है, इनमेंसे किसीसे भी तुम्हें भय नहीं होगा। केवल मनुष्यको छोड़कर तुम सबसे निर्भय रहो। तुम्हारा भला हो। तुम्हारे लिये मनुष्यसे होनेवाले भयका विधान मैंने ही किया है

Brahmā bersabda: “Dari semua yang kau sebutkan itu, tak satu pun akan menjadi sebab ketakutan bagimu. Kecuali manusia, engkau akan tetap tak gentar terhadap semuanya. Semoga baik adanya bagimu—batas ini, bahwa bahaya bagimu akan datang dari seorang manusia, telah kutetapkan sendiri.”

Verse 27

मार्कण्डेय उदाच एवमुक्तो दशग्रीवस्तुष्ट: समभवत्‌ तदा | अवमेने हि दुर्बुद्धिर्मनुष्पानू पुरुषादक:,/८४८ २ 4८८ थक ओ *्थ मार्कण्डेयजी कहते हैं--राजन! ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर दसमुख रावण बहुत प्रसन्न हुआ। वह दुर्बुद्धि नरभक्षी राक्षस मनुष्योंकी अवहेलना करता था

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Raja! Setelah Brahmā berkata demikian, Daśagrīva (Rāvaṇa) saat itu menjadi sangat puas. Sebab rākṣasa pemakan manusia yang berakal jahat itu memandang rendah manusia.”

Verse 28

कुम्भकर्णमथोवाच तथैव प्रपितामहः । स वत्रे महतीं निद्रां तमसा ग्रस्तचेतन:,तत्पश्चात्‌ ब्रह्माजीने कुम्भकर्णसे वर माँगनेको कहा। परंतु उसकी बुद्धि तमोगुणसे ग्रस्त थी; अतः: उसने अधिक कालतक नींद लेनेका वर माँगा

Kemudian Sang Pratama Leluhur (Brahmā) juga berbicara kepada Kumbhakarṇa, memintanya memilih anugerah. Namun batinnya dikuasai tamas; maka ia memohon anugerah berupa tidur maha panjang yang berlangsung lama.

Verse 29

तथा भविष्यतीत्युक्त्वा विभीषणमुवाच ह । वर वृष्णीष्व पुत्र त्वं प्रीतोडस्मीति पुन: पुन:,उसे 'ऐसा ही होगा” यों कहकर ब्रह्माजी विभीषणके पास गये और इस प्रकार बोले --<बेटा! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, अतः तुम भी वर माँगो।' ब्रह्माजीने यह बात बार-बार दुहरायी

Setelah berkata, “Demikianlah akan terjadi,” Brahmā mendekati Vibhīṣaṇa dan bersabda: “Anakku, aku sangat berkenan kepadamu; karena itu pilihlah sebuah anugerah.” Brahmā mengulang jaminan itu berulang-ulang.

Verse 30

विभीषण उवाच परमापद्गतस्यापि नाथर्मे मे मतिर्भवेत्‌ अशिक्षितं च भगवन ब्रद्मास्त्र प्रतिभातु मे,विभीषण बोले--भगवन्‌! बहुत बड़ा संकट आनेपर भी मेरे मनमें कभी पापका विचार न उठे तथा बिना सीखे ही मेरे हृदयमें ब्रह्मासत्रके प्रयोग और उपसंहारकी विधि स्फुरित हो जाय

Vibhīṣaṇa berkata: “Wahai Bhagavan, sekalipun aku tertimpa bencana terbesar, semoga pikiranku tidak condong pada adharma. Dan, ya Tuhan, tanpa belajar pun semoga tata cara pemakaian serta penarikan kembali Brahmāstra tersingkap dalam hatiku.”

Verse 31

ब्रह्मोवाच यस्माद्‌ राक्षसयोनौ ते जातस्यामित्रकर्शन । नाधर्मे धीयते बुद्धिरमरत्वं ददानि ते,ब्रह्माजीने कहा--शत्रुनाशन! राक्षसयोनिमें जन्म लेकर भी तुम्हारी बुद्धि अधर्ममें नहीं लगती; इसलिये (तुम्हारे माँगे हुए वरके अतिरिक्त) मैं तुम्हें अमरत्व भी देता हूँ

Brahmā bersabda: “Wahai penakluk musuh, meski engkau terlahir dalam rahim rākṣasa, buddhi-mu tidak berpaut pada adharma; karena itu (di samping anugerah yang kau minta) Aku karuniakan pula keabadian kepadamu.”

Verse 32

मार्कण्डेय उवाच राक्षसस्तु वरं लब्ध्वा दशग्रीवो विशाम्पते | लड़कायाश्ष्यावयामास युधि जित्वा धनेश्वरम्‌,मार्कण्डेयजी कहते हैं--राजन्‌! राक्षस दशाननने वर प्राप्त कर लेनेपर सबसे पहले अपने भाई कुबेरको युद्धमें परास्त किया और उन्हें लंकाके राज्यसे बहिष्कृत कर दिया

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai raja, rākṣasa Daśagrīva itu, setelah memperoleh anugerah, mula-mula menaklukkan Kubera, Sang Penguasa Kekayaan, dalam pertempuran dan mengusirnya dari kedaulatan Laṅkā.”

Verse 33

हित्वा स भगवॉल्लड्कामाविशद्‌ गन्धमादनम्‌ । गन्धर्वयक्षानुगतो रक्ष:किम्पुरुषै: सह

Meninggalkan Laṅkā, ia memasuki Gunung Gandhamādana. Ia berjalan dengan diiringi para Gandharva dan Yakṣa, bersama para Rākṣasa dan Kimpuruṣa.

Verse 34

भगवान्‌ कुबेर लंका छोड़कर गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा किम्पुरुषोंके साथ गन्धमादन पर्वतपर आकर रहने लगे ।। विमान पुष्पकं॑ तस्य जहाराक्रम्य रावण: । शशाप तं॑ वैश्रवणो न त्वामेतद्‌ वहिष्यति,श््ड्््स्क््ा ज्ख्ड ५ व] 22 2 ४ है (22722%24/ 822 2 |. ४2: रावणने आक्रमण करके उनका पुष्पक विमान भी छीन लिया। तब कुबेरने कुपित होकर उसे शाप दिया--'अरे! यह विमान तेरी सवारीमें नहीं आ सकेगा। जो युद्धमें तुझे मार डालेगा, उसीका यह वाहन होगा। मैं तेरा बड़ा भाई होनेके कारण मान्य था, परंतु तूने मेरा अपमान किया है। इससे बहुत शीघ्र तेरा नाश हो जायगा”

Markandeya berkata: Ravana menyerang dan merampas secara paksa kereta udara Pushpaka milik Kubera (Vaishravana). Maka Vaishravana murka dan mengutuknya: “Kereta ini tidak akan lagi mengangkutmu sebagai penunggangnya. Ia akan menjadi kendaraan orang yang menewaskanmu dalam perang. Aku, sebagai kakakmu, patut dihormati, namun engkau telah menghinaku; karena itu kebinasaanmu akan datang dengan segera.”

Verse 35

यस्तु त्वां समरे हन्ता तमेवैतद्‌ वहिष्यति । अवमन्य गुरुं मां च क्षिप्रं त्वं न भविष्यसि,श््ड्््स्क््ा ज्ख्ड ५ व] 22 2 ४ है (22722%24/ 822 2 |. ४2: रावणने आक्रमण करके उनका पुष्पक विमान भी छीन लिया। तब कुबेरने कुपित होकर उसे शाप दिया--'अरे! यह विमान तेरी सवारीमें नहीं आ सकेगा। जो युद्धमें तुझे मार डालेगा, उसीका यह वाहन होगा। मैं तेरा बड़ा भाई होनेके कारण मान्य था, परंतु तूने मेरा अपमान किया है। इससे बहुत शीघ्र तेरा नाश हो जायगा”

Orang yang akan menewaskanmu di medan perang—kereta udara inilah yang akan membawanya. Karena engkau meremehkan aku, yang lebih tua dan patut menjadi gurumu, engkau tidak akan bertahan lama; kehancuranmu akan segera tiba.

Verse 36

विभीषणस्तु धर्मात्मा सतां मार्गमनुस्मरन्‌ । अन्वगच्छन्महाराज श्रिया परमया युत:,महाराज! विभीषण धर्मात्मा थे। उन्होंने सत्पुरुषोंके मार्गकका ध्यान रखकर सदा अपने भाई कुबेरका अनुसरण किया; अतः वे उत्तम लक्ष्मीसे सम्पन्न हुए

Wahai Raja, Vibhishana yang berhati dharma, mengingat jalan yang ditempuh orang-orang saleh, terus menapaki jalan itu; karena itu ia dianugerahi kemakmuran yang tertinggi.

Verse 37

तस्मै स भगवांस्तुष्टो भ्राता क्षात्रे धनेश्वर: । सैनापत्यं ददौ धीमान्‌ यक्षराक्षससेनयो:,बड़े भाई बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ कुबेरने संतुष्ट होकर छोटे भाई विभीषणको यक्ष तथा राक्षसोंकी सेनाका सेनापति बना दिया

Karena puas kepadanya, sang penguasa kekayaan—kakaknya yang tua, perkasa dalam wibawa ksatria—dengan bijak menganugerahkan kepadanya panglima atas bala tentara Yaksha dan Rakshasa.

Verse 38

राक्षसा: पुरुषादाश्ष पिशाचाश्न महाबला: । सर्वे समेत्य राजानमभ्यषिज्चन्‌ दशाननम्‌,नरभक्षी राक्षस तथा महाबली पिशाच--सबने मिलकर दशमुख रावणको राक्षसराजके पदपर अभिषिक्त किया

Para Rakshasa pemakan manusia dan para Pishaca yang sangat perkasa semuanya berkumpul dan menobatkan Dasanana (Si Bermuka Sepuluh), Ravana, sebagai raja.

Verse 39

दशग्रीवश्व दैत्यानां देवानां च बलोत्कट: । आक्रम्य रत्नान्यहरत्‌ कामरूपी विहड्भगम:,बलोन्मत्त रावण इच्छानुसार रूप धारण करने और आकाशमें भी चलनेमें समर्थ था। उसने दैत्यों और देवताओंपर आक्रमण करके उनके पास जो रत्न या रत्नभूत वस्तुएँ थीं, उन सबका अपहरण कर लिया

Rāvaṇa si Dasagrīva, yang sangat perkasa di antara para daitya dan para dewa, mampu mengambil wujud sesuka hati dan bergerak di angkasa laksana burung; mabuk oleh kekuatan. Ia menyerbu para daitya dan para dewa, lalu merampas seluruh permata serta benda-benda yang bernilai permata yang mereka miliki.

Verse 40

रावयामास लोकान्‌ यत्‌ तस्माद्रावण उच्यते । दशग्रीव: कामबलो देवानां भयमादधत्‌,उसने सम्पूर्ण लोकोंको रुला दिया था; इसलिये वह रावण कहलाता है। दशाननका बल उसके इच्छानुसार बढ़ जाता था; अतः वह सदा देवताओंको भयभीत किये रहता था

Ia membuat segenap dunia meratap; karena itulah ia disebut Rāvaṇa. Si Dasagrīva, yang kekuatannya meningkat sesuai kehendaknya, terus-menerus menanamkan ketakutan di hati para dewa.

Verse 274

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें राम- रावणजन्मकथनविषयक दो सौ चौद्वत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-274 dalam bagian Rāmopākhyāna di dalam Vana Parva dari Śrī Mahābhārata, yang memaparkan kisah kelahiran Rāma dan Rāvaṇa.

Verse 275

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि रावणादिवरप्राप्तौ पञ्चसप्तत्यधिकद्धिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें रवण आदिको वरप्राप्तिविषयक दो सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-275 dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, dalam bagian Rāmopākhyāna, mengenai perolehan anugerah (boon) oleh Rāvaṇa dan yang lainnya.

Frequently Asked Questions

The dilemma is how a ruler should respond to severe misfortune without abandoning duty: whether grief and self-reproach are justified, or whether steadiness and action consistent with kṣatriya ethics should prevail despite loss and humiliation.

Suffering is not proof of moral defect; it can accompany righteous conduct. Therefore, a leader should restrain despair, rely on disciplined judgment, and recognize the pragmatic force of capable allies and counsel.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary is narrative: Vaiśaṃpāyana reports the king’s restored composure, marking the discourse as a functional intervention that stabilizes leadership and continuity of dharma in exile.