
दुर्योधनस्य लज्जा-प्रायोपवेशविचारः (Duryodhana’s Shame and Consideration of Prāyopaveśa)
Upa-parva: Gandharva-Mokṣaṇa Episode (Duryodhana’s humiliation and response)
This chapter presents a post-encounter political-psychological crisis. Duryodhana articulates the humiliation of being bound and brought before Yudhiṣṭhira, emphasizing dishonor in the presence of women and enemies, and reframes his survival as an intolerable reversal of status. He expresses a preference for death in battle over life marked by ridicule, and he contemplates prāyopaveśa (a resolve to end life through fasting) as an escape from reputational collapse. In a consequential gesture, he offers Duhśāsana an abhiṣeka (investiture) and instructs him to rule with attention to kin, Brahmins, elders, and allies—indicating an attempt to convert shame into orderly succession. Duhśāsana refuses with hyperbolic oaths, reaffirming Duryodhana’s primacy. Karṇa then intervenes as a stabilizing advisor: he criticizes excessive lamentation, argues that release by adversaries is not inherently disgraceful, and stresses that retainers and subjects often act to preserve royal interest. The chapter ends with Duryodhana still fixed on a ‘heavenward’ resolve, leaving the crisis ethically and politically unresolved.
Chapter Arc: वन में निर्वासित पाण्डवों की छाया अभी ताज़ी है, और हस्तिनापुर के राजसभा-परिसर में शकुनि और कर्ण दुर्योधन के कानों में विजय का मधु घोलते हैं—‘तुमने अपने पराक्रम से पाण्डवों को देशनिकाला दिया।’ → दोनों उसे बताते हैं कि पृथ्वी अब उसके अधीन है, अन्य राजा उसके शासन में किंकरवत् हैं, और पाण्डव शोक से शीघ्र ही दुर्बल हो चुके हैं। इसी उकसावे के साथ वे दुर्योधन को ‘वन में जाकर’ पाण्डवों के सामने अपने वैभव का प्रदर्शन करने और उन्हें और अधिक जलाने के लिए प्रेरित करते हैं। → कर्ण और शकुनि दुर्योधन के सामने साम्राज्य-स्वामित्व, राजाओं की अधीनता और पाण्डवों की कथित पराजय का चित्र खींचकर उसे निर्णायक रूप से ‘घोषयात्रा/वन-यात्रा’ के लिए उभारते हैं—यह क्षण दुर्योधन के अहंकार को नीति पर भारी कर देता है। → वैशम्पायन के कथनानुसार, इतना कहकर कर्ण और शकुनि दोनों वाक्यांत में मौन हो जाते हैं—मानो अब निर्णय का भार दुर्योधन के भीतर उठती वासना और दर्प पर छोड़ दिया गया हो। → दुर्योधन इस उकसावे पर क्या आदेश देगा—क्या वह सचमुच पाण्डवों के पास वन में जाकर अपमान का नया अध्याय खोलेगा?
Verse 1
हि >> आय न () आफ अप सप्तत्रिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना वैशम्पायन उवाच धृतराष्ट्रस्य तद् वाक्यं निशम्य शकुनिस्तदा । दुर्योधनमिदं काले कर्णेन सहितो<ब्रवीत्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धृतराष्ट्रके पूर्वोिक्त वचन सुनकर उस समय कर्णसहित शकुनिने अवसर देखकर दुर्योधनसे इस प्रकार कहा--
Vaiśampāyana berkata: Wahai Janamejaya! Setelah mendengar kata-kata Dhṛtarāṣṭra itu, Śakuni—bersama Karṇa—melihat saat yang tepat dan berkata kepada Duryodhana sebagai berikut:
Verse 2
प्रत्राज्य पाण्डवान् वीरान् स्वेन वीर्येण भारत । भुड्क्ष्वेमां प्थिवीमेको दिवि शम्बरहा यथा,“भरतनन्दन! तुमने अपने पराक्रमसे पाण्डव-वीरोंको देशनिकाला देकर वनवासी बना दिया है। अब तुम स्वर्गमें इन्द्रकी भाँति अकेले ही इस पृथ्वीका राज्य भोगो
Waiśampāyana berkata: “Wahai Bhārata, dengan kekuatanmu sendiri engkau telah mengusir para Pāṇḍava yang gagah ke pembuangan dan menjadikan mereka penghuni rimba; kini nikmatilah kekuasaan atas bumi ini seorang diri—seperti Śambarahā (Indra) di surga.”
Verse 3
(तवाद्य पृथिवी राजन्नखिला सागराम्बरा | सपर्वतवनारामा सह स्थावरजड़मा ।।) “राजन! पर्वत, वन, उद्यान एवं स्थावर-जड़मोंसहित यह सारी समुद्रपर्यना पृथ्वी आज तुम्हारे अधिकारमें है ।। प्राच्याश्न दाक्षिणात्याश्व प्रतीच्योदीच्यवासिन: । कृता: करप्रदा: सर्वे राजानस्ते नराधिप,“नरेश्वर! पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाके सभी राजाओंको तुम्हारे लिये करदाता बना दिया है
Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, hari ini seluruh bumi yang dilingkari samudra—beserta gunung, hutan, taman-taman kenikmatan, juga segala yang tak bergerak maupun yang bergerak—berada di bawah kuasamu. Wahai penguasa manusia, para raja di timur, selatan, barat, dan utara semuanya telah dijadikan pembayar upeti bagimu.”
Verse 4
या हि सा दीप्यमानेव पाण्डवानभजत् पुरा । साद्य लक्ष्मीस्त्वया राजन्नवाप्ता भ्रातृभि: सह,“राजन! जो दीप्तिमती श्री पहले पाण्डवोंकी सेवा करती थी, वही आज भाइयोंसहित तुम्हारे अधिकारमें आ गयी है
Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, Dewi Śrī yang bercahaya—yang dahulu menaungi para Pāṇḍava—kini telah engkau peroleh, bersama saudara-saudaramu.”
Verse 5
इन्द्रप्रस्थगते यां तां दीप्यमानां युधिष्ठिरे । अपश्याम श्रियं राजन् दृश्यते सा तवाद्य वै,“महाराज! इन्द्रप्रस्थमें जानेपर युधिष्ठिरके यहाँ हम लोग जिस राजलक्ष्मीको प्रकाशित होते देखते थे, वही आज तुम्हारे यहाँ उद्भासित होती दिखायी देती है
Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, kemilau śrī kerajaan yang dahulu kami lihat bersinar di istana Yudhiṣṭhira ketika kami pergi ke Indraprastha—kini sungguh tampak termanifestasi padamu.”
Verse 6
शत्रवस्तव राजेन्द्र न चिरं शोककर्शिता: । सातु बुद्धिबलेनेयं राज्ञस्तस्माद् युधिष्ठिरात्
Waiśampāyana berkata: “Wahai raja, musuh-musuhmu tidak akan lama bertahan, terkikis oleh duka; sebab hasil ini ditegakkan oleh kekuatan budi dan siasat milik raja itu—Yudhiṣṭhira.”
Verse 7
तथैव तव राजेन्द्र राजान: परवीरहन्
Waiśampāyana berkata: “Demikian pula, wahai raja segala raja; para raja yang menumbangkan para pahlawan musuh pun akan menerima balasan yang setimpal.”
Verse 8
तवेयं पृथिवी राजन् निखिला सागराम्बरा,“राजन! इस समय यह सारी समुद्रवसना पृथ्वीदेवी पर्वत, वन, ग्राम, नगर तथा खानोंके साथ तुम्हारे अधिकारमें आ गयी है। यह नाना प्रकारके प्रदेशोंसे युक्त तथा पर्वतोंसे सुशोभित है
Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, seluruh bumi ini—yang diselubungi samudra—kini telah berada di bawah wewenangmu.”
Verse 9
सपर्वतवना देवी सग्रामनगराकरा | नानावनोद्देशवती पर्वतैरुपशोभिता,“राजन! इस समय यह सारी समुद्रवसना पृथ्वीदेवी पर्वत, वन, ग्राम, नगर तथा खानोंके साथ तुम्हारे अधिकारमें आ गयी है। यह नाना प्रकारके प्रदेशोंसे युक्त तथा पर्वतोंसे सुशोभित है
Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, pada saat ini Dewi Bumi—yang berbusana samudra—beserta gunung dan rimbanya, beserta desa-kota dan tambangnya, telah berada di bawah wewenangmu. Ia memiliki beragam wilayah dan dihiasi oleh pegunungan.”
Verse 10
(नानाध्वजपताकाड्का स्फीतराष्ट्रा महाबला) “नाना प्रकारकी ध्वजा-पताकाओंसे चिह्नित इस भूतलपर कितने ही समृद्धिशाली राष्ट्र हैं और वहाँ बहुत-सी विशाल सेनाएँ संगठित हैं ।। वन्द्यमानो द्विजै राजन् पूज्यमानश्व राजभि: । पौरुषाद् दिवि देवेषु भ्राजसे रश्मिवानिव,“राजन! तुम अपने पुरुषार्थसे द्विजोंद्वारा सम्मानित तथा राजाओंद्वारा पूजित होकर स्वर्ग एवं देवताओं में अंशुमाली सूर्यकी भाँति इस भूतलपर प्रकाशित हो रहे हो
Waiśampāyana berkata: “Di bumi ini ada banyak negeri makmur, bertanda aneka panji dan bendera, dan di sana berhimpun banyak bala tentara yang perkasa. Wahai Raja, oleh keberanianmu sendiri engkau dihormati para dwija dan dimuliakan para raja; di surga, di tengah para dewa, engkau bersinar laksana matahari yang memancarkan sinar.”
Verse 11
रुद्रैरिव यमो राजा मरुद्धिरिव वासव: । कुरुभिस्त्वं वृतो राजन् भासि नक्षत्रराडिव
Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, dikelilingi para Kuru engkau bersinar—laksana Yama di antara para Rudra, laksana Vāsava (Indra) di antara para Marut, dan laksana raja bintang-bintang (Bulan) di tengah gugusan rasi.”
Verse 12
“महाराज! जिस प्रकार रुद्रोंसे यमराज, मरुद्रणोंसे इन्द्र तथा नक्षत्रोंसे उनके स्वामी चन्द्रमाकी शोभा होती है, उसी प्रकार कौरवोंसे घिरे हुए तुम शोभा पा रहे हो ।। यै: सम ते नाद्रियेताज्ञा न च ये शासने स्थिता: । पश्यामस्तान् श्रिया हीनान् पाण्डवान् वनवासिन:,“जिन्होंने तुम्हारी आज्ञाका आदर नहीं किया था और जो तुम्हारे शासनमें नहीं थे, उन पाण्डवोंकी दशा हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। वे राजलक्ष्मीसे वज्चित हो वनमें निवास करते हैं
Waiśampāyana berkata: “Wahai Maharaja! Sebagaimana Yama menonjol di antara para Rudra, Indra di antara pasukan Marut, dan Sang Bulan—penguasa gugus bintang—di antara bintang-bintang, demikian pula Paduka bersinar, dikelilingi para Kaurava. Mereka yang dahulu tidak menghormati titah Paduka dan tidak tinggal dalam naungan pemerintahan Paduka—yakni para Pāṇḍava—kini kami lihat dengan mata kepala sendiri: kehilangan śrī kerajaan, mereka hidup sebagai orang buangan di rimba.”
Verse 13
श्रूयते हि महाराज सरो द्वैतवनं प्रति । वसन्तः पाण्डवाः सार्ध ब्राह्मुणैर्वनवासिभि:,“महाराज! सुननेमें आया है कि पाण्डवलोग द्वैतवनमें सरोवरके तटपर वनवासी ब्राह्मणोंके साथ रहते हैं
Waiśampāyana berkata: “Wahai Maharaja! Tersiar kabar bahwa para Pāṇḍava tinggal di tepi danau dekat hutan Dvaitavana, bersama para Brahmana yang hidup di rimba.”
Verse 14
स प्रयाहि महाराज श्रिया परमया युत: । तापयन् पाण्डुपुत्रांस्त्वं >श्मिवानिव तेजसा,“महाराज! तुम उत्कृष्ट राजलक्ष्मीसे सुशोभित होकर वहाँ चलो और जैसे सूर्य अपने तेजसे जगत्को संतप्त करते हैं, उसी प्रकार पाण्डुपुत्रोंकोी संताप दो
Waiśampāyana berkata: “Wahai Maharaja! Pergilah ke sana, berhias dengan śrī kerajaan yang tertinggi; dan laksana matahari yang menyengat dengan sinarnya, timpakanlah panas kuasamu kepada putra-putra Pāṇḍu.”
Verse 15
स्थितो राज्ये च्युतान् राज्याच्छिया हीनाञ्छ़िया वृत: । असमृद्धान् समृद्धार्थ: पश्य पाण्डुसुतान् नृप,“इस समय तुम राजाके पदपर प्रतिष्ठित हो और पाण्डव राज्यसे भ्रष्ट हो गये हैं। तुम श्रीसम्पन्न हो और वे श्रीहीन हैं। तुम समृद्धिशाली हो और वे निर्धन हो गये हैं। नरेश्वर! तुम इसी दशामें चलकर पाण्डवोंको देखो
Waiśampāyana berkata: “Engkau kini tegak di atas takhta, sedangkan putra-putra Pāṇḍu telah jatuh dari kerajaannya. Engkau dilingkupi śrī, mereka kehilangan śrī; engkau makmur, mereka papa. Wahai raja, pergilah dan pandanglah para Pāṇḍava dalam keadaan demikian.”
Verse 16
महाभिजनसम्पन्नं भद्रे महति संस्थितम् । पाण्डवास्त्वाभिवीक्षन्तां ययातिमिव नाहुषम्,'पाण्डव तुम्हें नहुषनन्दन ययातिकी भाँति महान वंशमें उत्पन्न तथा परम मंगलमयी स्थितिमें प्रतिष्ठित देखें
Waiśampāyana berkata: “Wahai wanita mulia, semoga para Pāṇḍava memandangmu—berkecukupan kemuliaan garis keturunan agung dan tegak pada kedudukan yang luhur serta amat mujur—laksana Yayāti, putra Nahuṣa.”
Verse 17
यां श्रियं सुहृदश्चैव दुर्हदश्च विशाम्पते । पश्यन्ति पुरुषे दीप्तां सा समर्था भवत्युत,'प्रजापालक नरेश! पुरुषमें प्रकाशित होनेवाली जिस लक्ष्मीको उसके सुहृद् और शत्रु दोनों देखते हैं, वही सबल होती है
Waiśampāyana berkata: “Wahai pelindung rakyat, raja! Kemakmuran yang tampak berkilau pada diri seseorang—yang disaksikan sama oleh sahabat maupun musuhnya—itulah satu-satunya keberuntungan yang sungguh berdaya dan berwibawa.”
Verse 18
समस्थो विषमस्थान् हि दुर्हददो योडभिवीक्षते । जगतीस्थानिवाद्रिस्थ: किमत: परमं सुखम्,'जैसे पर्वतकी चोटीपर खड़ा हुआ मनुष्य भूतलपर स्थित हुई सभी वस्तुओंको नीची और छोटी देखता है, उसी प्रकार जो पुरुष स्वयं सुखमें रहकर शत्रुओंको संकटमें पड़ा हुआ देखता है, उसके लिये इससे बढ़कर सुखकी बात और क्या होगी?
Waiśampāyana berkata: “Kebahagiaan apa yang lebih besar daripada ini: seseorang yang sendiri aman dan tenteram memandang para pembencinya jatuh dalam kesusahan? Seperti orang yang berdiri di puncak gunung melihat segala sesuatu di dataran tampak rendah dan kecil, demikian pula orang yang mapan dalam kenyamanan memandang mereka yang terjerumus dalam derita.”
Verse 19
न पुत्रधनलाभेन न राज्येनापि विन्दति । प्रीतिं नृपतिशार्दूल याममित्राघदर्शनात्,“नृपश्रेष्ठ! मनुष्यको अपने शत्रुओंकी दुर्दशा देखनेसे जो प्रसन्नता प्राप्त होती है, वह धन, पुत्र तथा राज्य मिलनेसे भी नहीं होती। हमलोगोंमेंसे जो भी स्वयं सिद्धमनोरथ होकर आश्रममें अर्जुनको वल्कल और मृगछाला पहने देखेगा, उसे कौन-सा सुख नहीं मिल जायगा?
Waiśampāyana berkata: “Wahai harimau di antara raja-raja, kegembiraan yang dirasakan seseorang ketika menyaksikan kehancuran dan penderitaan musuh-musuhnya tidak diperoleh bahkan dengan mendapatkan kekayaan, putra, ataupun kerajaan.”
Verse 20
कि नु तस्य सुखं न स्यादाश्रमे यो धनंजयम् । अभिवीक्षेत सिद्धार्थो वल्कलाजिनवाससम्,“नृपश्रेष्ठ! मनुष्यको अपने शत्रुओंकी दुर्दशा देखनेसे जो प्रसन्नता प्राप्त होती है, वह धन, पुत्र तथा राज्य मिलनेसे भी नहीं होती। हमलोगोंमेंसे जो भी स्वयं सिद्धमनोरथ होकर आश्रममें अर्जुनको वल्कल और मृगछाला पहने देखेगा, उसे कौन-सा सुख नहीं मिल जायगा?
Waiśampāyana berkata: “Wahai raja terbaik, kebahagiaan apa yang tidak akan diperoleh oleh orang yang telah mencapai maksudnya, ketika ia melihat Dhanañjaya di pertapaan, mengenakan pakaian kulit kayu dan kulit rusa?”
Verse 21
सुवाससो हि ते भार्या वल्कलाजिनसंवृताम् । पश्यन्तु दुःखितां कृष्णां सा च निर्विद्यतां पुन:,“तुम्हारी रानियाँ सुन्दर साड़ियाँ पहनकर चलें और वनमें वल्कल एवं मृगचर्म लपेटकर दुःखमें डूबी हुई द्रपदकुमारी कृष्णाको देखें तथा द्रौपदी भी इन्हें देखकर बार-बार संताप करे
Waiśampāyana berkata: “Biarlah istri-istrimu, berbusana indah, memandang Kṛṣṇā (Draupadī) yang tenggelam dalam duka di hutan, terbalut kain kulit kayu dan kulit rusa; dan melihat mereka, biarlah Draupadī kembali dan kembali diliputi pedih dan kejijikan.”
Verse 22
विनिन्दतां तथा5७त्मानं जीवितं च धनच्युतम् । न तथा हि सभामध्ये तस्या भवितुमहति । वैमनस्यं यथा दृष्टवा तव भार्या: स्वलंकृता:,“वह धनसे वज्चित हुए अपने आत्मा तथा जीवनकी निन्दा करे--उन्हें बार-बार धिकक्कारे। सभामें उसके साथ जो बर्ताव किया गया था, उससे उसके हृदयमें इतना दुःख नहीं हुआ होगा, जितना कि तुम्हारी रानियोंको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित देखकर हो सकता है!
Waiśampāyana berkata: “Biarlah ia berulang kali mencela dirinya sendiri, bahkan hidupnya, kini setelah ia tercerabut dari harta. Sebab duka yang bangkit di hatinya ketika melihat para permaisurimu berhias megah dengan busana dan perhiasan akan lebih besar daripada pedih yang semestinya ia rasakan akibat perlakuan yang diterimanya di balairung sidang.”
Verse 23
वैशम्पायन उवाच एवमुक््त्वा तु राजानं कर्ण: शकुनिना सह । तृष्णीम्बभूवतुरुभौ वाक्यान्ते जनमेजय,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शकुनि और कर्ण दोनों राजा दुर्योधनसे ऐसा कहकर (अपनी बात पूरी होनेपर) चुप हो गये
Waiśampāyana berkata: Setelah berkata demikian kepada sang raja, Karṇa bersama Śakuni pun terdiam. Ketika kata-kata mereka berakhir, keduanya menjadi sunyi—wahai Janamejaya.
Verse 63
त्वया$5क्षिप्ता महाबाहो दीप्यमानेव दृश्यते । राजेन्द्र! तुम्हारे शत्रु शीघ्र ही शोकसे दीन-दुर्बल हो गये हैं। महाबाहो! तुमने राजा युधिष्ठिरसे इस लक्ष्मीको अपने बुद्धिबलसे छीन लिया है। अतः अब तुम्हारे यहाँ यह प्रकाशित होती-सी दिखायी दे रही है
Waiśampāyana berkata: “Wahai yang berlengan perkasa, kemakmuran yang kau rampas itu tampak seakan menyala. Wahai raja terbaik, musuh-musuhmu segera menjadi papa dan lemah oleh duka. Wahai yang berlengan perkasa, dengan kekuatan kelicikanmu sendiri engkau merebut kejayaan kerajaan ini dari Raja Yudhiṣṭhira; maka kini ia seolah bersinar di rumahmu.”
Verse 76
शासने<5धिष्तिता: सर्वे कि कुर्म इति वादिन: । शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाराज! इसी प्रकार सब राजा अपनेको किंकर बताते हुए आपकी आज्ञाके अधीन रहते हैं
Waiśampāyana berkata: “Mereka semua tegak di bawah perintahmu, berulang kali berkata, ‘Apa yang harus kami lakukan?’ Wahai raja, penghancur para kesatria musuh—demikianlah semua penguasa, menyatakan diri sebagai pelayanmu, tinggal di bawah kewenanganmu.”
Verse 237
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णशकुनिवाक्ये सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमो<5ध्याय:
Demikianlah berakhir, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, dalam bagian Ghoṣa-yātrā, bab ke-237 yang berjudul “Ucapan Karṇa dan Śakuni”.
The conflict between preserving life and political responsibility versus treating public dishonor as worse than death—raising the question of whether self-termination for shame can be reconciled with duties to kin, allies, and dependents.
The text contrasts emotion-driven absolutism with counsel-based restraint: Karṇa’s intervention frames adversity and temporary subjugation as contingencies that should be met with steadiness, strategic recalibration, and responsibility to one’s social order.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s meta-function is contextual—illustrating how honor culture, counsel, and succession anxieties shape decision-making, thereby informing the epic’s broader inquiry into governance and ethical agency.