Adhyaya 214
Vana ParvaAdhyaya 21441 Verses

Adhyaya 214

Skanda-janma: Śivā/Svāhā, Agni, and the Manifestation of Guha (Mahābhārata 3.214)

Upa-parva: Mārkaṇḍeya-upākhyāna (Skanda-janma-prasaṅga)

Mārkaṇḍeya recounts how Śivā—described as Aṅgiras’ wife and endowed with conduct and beauty—approaches Agni (Hutāśana/Pāvaka) in a state of desire and requests union. Agni questions her knowledge and references the wives beloved of the Seven Ṛṣis; Śivā responds that Agni’s intent has been inferred and that she has been sent. After union, she takes the emitted seed (śukra) and, concerned about public misattribution and reputational blame, transforms into a bird-form (Suparṇī/Garuḍī) to depart the forest. She reaches a formidable white mountain region guarded by serpents and fearsome beings and deposits the seed into a golden vessel/pool. The narrative then emphasizes repeated depositions (sixfold) by Svāhā, culminating in the generation of a radiant son honored by ṛṣis and becoming Skanda. The child appears with multiple heads and enhanced senses, takes up a great bow and other emblems, and produces a roar that draws beings to seek refuge. He demonstrates power by striking and splitting the Krauñca mountain and by hurling a great spear, after which the earth steadies and the world adopts an observance of Skanda on the bright fifth lunar day (Śukla Pañcamī).

Chapter Arc: मार्कण्डेय युधिष्ठिर से कहते हैं कि ब्राह्मण के गूढ़ प्रश्न का उत्तर महात्मा धर्मव्याध ने दिया—और उसी उत्तर में देह के भीतर प्राण-वायु और अग्नि की स्थिति का रहस्य खुलता है। → धर्मव्याध शरीर-रचना के सूक्ष्म संकेतों के सहारे बताता है कि कैसे मूर्धा में स्थित वह्नि और प्राण परस्पर आश्रित होकर देह का पालन करते हैं; फिर नाभि से पायु-पर्यन्त जठरानल-प्रदेश और उससे निकलने वाले स्रोतसों का वर्णन कर साधक को ‘भीतर’ की यात्रा पर ले जाता है। → उपदेश का शिखर तब आता है जब वह साधना-नीति को एक कठोर अनुशासन में बाँध देता है—क्रोध से तप की रक्षा, मत्सर से धर्म की रक्षा, मान-अपमान से विद्या की रक्षा, और प्रमाद से आत्मा की रक्षा; तथा ‘आकिञ्चन्य, संतोष, निराशित्व, अचापल’ को परम ज्ञान का सार घोषित करता है। → धर्मव्याध वैराग्य की पराकाष्ठा बताता है—जो सुख-दुःख दोनों का परित्याग कर देता है, वह असंग होकर ब्रह्मपद को प्राप्त होता है; फिर वह कहता है कि जो कुछ सुना था, उसे संक्षेप में कह दिया—अब और क्या सुनना है? → ब्राह्मण के लिए प्रश्न खुला रह जाता है—क्या वह केवल सुनकर तृप्त होगा, या इस असंग-वैराग्य को जीवन में उतारने का अगला चरण पूछेगा?

Shlokas

Verse 1

#::73:.8 #:23::.7 () हि 2 7 त्रयोदशाधिकद्विशततमो< ध्याय: प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय ब्राह्मण उवाच पार्थिवं धातुमासाद्य शारीरो5ग्नि: कथं भवेत्‌ । अवकाशविशेषेण कथं वर्तयतेडनिल:,ब्राह्मणने पूछा--व्याध! शरीरमें रहनेवाला अग्निस्वरूप प्राण पार्थिव धातुका अवलम्बन करके कैसे रहता है? और प्राणवायु नाड़ियोंके मार्गविशेषके द्वारा किस प्रकार (रस-रक्तादिका) संचालन करता है?

Sang brāhmaṇa berkata: “Wahai vyādha, bagaimana api dalam tubuh—prāṇa yang berwujud panas batin—bertahan dengan bersandar pada unsur bumi (dhātu pṛthvī) di dalam badan? Dan bagaimana prāṇa-vāyu, melalui saluran serta ruang-ruang khusus, menjalankan fungsinya?”

Verse 2

मार्कण्डेय उवाच प्रश्नमेतं समुद्दिष्ट ब्राह्मणेन युधिष्ठिर । व्याधस्तु कथयामास ब्राह्मणाय महात्मने,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! ब्राह्मणके द्वारा उपस्थित किये गये इस प्रश्नको सुनकर धर्मव्याधने उन महामना ब्राह्मणसे इस प्रकार कहा--

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, ketika sang brāhmaṇa mengajukan pertanyaan itu, Dharma-vyādha pun mulai menjelaskannya kepada brāhmaṇa yang berhati luhur itu.”

Verse 3

व्याध उवाच मूर्धानमाश्रितो वह्निः शरीरं परिपालयन्‌ | प्राणो मूर्थनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते,धर्मव्याध बोला--ब्रह्मन! प्राणीके शरीरको सुरक्षित रखता हुआ अग्निस्वरूप उदान वायु मस्तकका आश्रय लेकर शरीरमें रहता है एवं मुख्य प्राण मस्तक और उदानवायु--इन दोनोंमें स्थित हुआ समस्त शरीरमें जीवनका संचार करता है*

Sang pemburu berkata: “Prinsip api, yang bernaung di kepala, menjaga tubuh. Dan prāṇa, berdiam di kepala sekaligus pada api itu, bergerak serta bekerja, menghidupkan seluruh tubuh.”

Verse 4

भूतं भव्यं भविष्यं च सर्व प्राणे प्रतिष्ठितम्‌ । श्रेष्ठ तदेव भूतानां ब्रह्मयोनिमुपास्महे,भूत, वर्तमान और भविष्य--सब कुछ प्राणके ही आश्रित है, वह प्राण ही समस्त भूतोंमें श्रेष्ठ है।। अतः परब्रह्मसे उत्पन्न होनेवाले प्राणकी हम सब उपासना करते हैं;

Masa lampau, masa kini, dan masa depan—semuanya bertumpu pada prāṇa. Prāṇa itulah yang tertinggi di antara semua makhluk; maka kami memuja prāṇa, yang bersumber dari Brahman, sebagai asal penopang kehidupan.

Verse 5

स जन्तु: सर्वभूतात्मा पुरुष: स सनातन: । महान्‌ बुद्धिरहड्कारो भूतानां विषयश्न सः,वह प्राण ही जीव है, वही समस्त प्राणियोंका आत्मा है, वही सनातन पुरुष है, महत्तत्त्व, बुद्धि और अहंकार तथा पाँचों भूतोंके कार्यरूप इन्द्रियाँ और उनके विषय सब कुछ वही है (क्योंकि इस शरीरमें सबकी स्थिति उसीके आश्रित है और भविष्यमें मिलनेवाले शरीरमें जाना-आना भी इसीके आश्रित रहकर होता है। इसलिये यह प्राणकी स्तुति की गयी है):

Prāṇa itulah yang disebut makhluk hidup; Dialah Ātman bagi semua makhluk, Dialah Purusha yang kekal. Dialah pula Mahat, buddhi (akal-batin), dan ahamkāra (rasa “aku”); indria yang bekerja melalui unsur-unsur serta objek-objeknya pun adalah Dia—sebab tegaknya tubuh ini dan perpindahan menuju penjelmaan berikutnya bergantung pada-Nya. Karena itu Prāṇa dipuji.

Verse 6

(अव्यक्तं सत्त्वसंज्ञं च जीव: काल: स चैव हि । प्रकृति: पुरुषश्चैव प्राण एव द्विजोत्तम ।। जागर्ति स्वप्नकाले च स्वप्रे स्वप्रायते च सः । द्विजश्रेष्ठ! प्राण ही अव्यक्त, सत्त्व, जीव, काल, प्रकृति और पुरुष है। वही जाग्रत्‌- अवस्थामें जागता है। वही स्वप्नकालमें स्वप्न-जगत्‌का निर्माण करके स्वप्लावस्थाकी सारी चेष्टाएँ करता है ।। जाग्रत्सु बलमाधत्ते चेष्टत्सु चेष्टयत्यपि ।। तस्मिन्‌ निरुद्धे विप्रेन्द्र मृत इत्यभिधीयते । त्यक्त्वा शरीरं भूतात्मा पुनरन्यत्‌ प्रपद्यते ।।) वही जाग्रतकालमें बलका आधान करता है और चेष्टाशील प्राणियोंमें चेष्टा उत्पन्न करता है। विप्रवर! उस प्राणका निरोध हो जानेपर ही प्रत्येक जीव मरा हुआ कहलाता है। भूतात्मा प्राण एक शरीरको छोड़कर फिर दूसरे शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है ।। एवं त्विह स सर्वत्र प्राणेन परिपाल्यते । पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रित:,इस प्रकार इस जगतमें सर्वत्र प्राणकी स्थिति है। प्राणके द्वारा ही सबका पालन होता है। पीछे वही प्राण जब समानवायु भावको प्राप्त होता है तब अपनी-अपनी पृथक्‌ गतिका आश्रय लेता है

Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, Prāṇa sendiri disebut Yang Tak-Termanifest (Avyakta); ia pula sattva, jiwa-individual, dan Waktu. Ia adalah Prakṛti dan juga Puruṣa. Dialah yang terjaga pada keadaan jaga; dan pada masa mimpi ia membentuk dunia-mimpi serta menjalankan seluruh gerak laku keadaan mimpi. Pada yang terjaga ia menegakkan kekuatan, dan pada yang berusaha ia menggerakkan usaha. Bila Prāṇa itu tertahan, wahai utama para brahmana, seseorang disebut mati. Setelah meninggalkan satu tubuh, Sang Diri-Elemental memasuki tubuh yang lain. Demikianlah di dunia ini segala sesuatu di mana-mana dipelihara oleh Prāṇa; dan kemudian, dalam wujud napas penyama (samāna), ia menempuh jalan masing-masing makhluk.

Verse 7

बस्तिमूलं गुदं चैव पावकं समुपाश्रित: । वहन्‌ मूत्र पूरीषं वाउप्यपान: परिवर्तते,समानवायुके रूपमें जठराग्निका आश्रय ले वह प्राण जब मूत्राशय और गुदामें स्थित होता है, उस समय मल और मूत्रका भार वहन करनेके कारण वह अपानवायुके नामसे विख्यात हो संचरण करता है

Ketika daya-hayat itu, dengan bersandar pada api pencernaan, mengambil tempat di pangkal kandung kemih dan di anus, ia memikul beban urin dan tinja; dalam fungsi itu ia beredar dan dikenal sebagai apāna, napas yang bergerak ke bawah.

Verse 8

प्रयत्ने कर्मणि बले स एपष त्रिषु वर्तते । उदानमिति त॑ प्राहुरध्यात्मविदुषो जना:,वही प्राण जब प्रयत्न (काम करनेकी चेष्टा), कर्म (उत्क्षेपषण और गमन आदि) तथा बल (बोझ उठानेकी शक्ति)--इन तीन विषयोंमें प्रवृत्त होता है, तब अध्यात्मवेत्ता मनुष्य उसे उदान कहते हैं

Ketika Prāṇa bergerak dalam tiga hal—upaya, tindakan, dan kekuatan—para ahli adhyātma menyebutnya sebagai udāna.

Verse 9

संधौ संधौ संनिविष्ट: सर्वेष्वपि तथानिल: । शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते,वही जब मनुष्य-शरीरके प्रत्येक संधिस्थलमें व्याप्त होकर रहता है, तब उसे व्यान कहते हैं

Ketika daya-hayat itu meresapi tubuh manusia dan menetap pada setiap persendian serta menyebar ke seluruh anggota, para resi mengajarkannya sebagai vyāna.

Verse 10

धातुष्वग्निस्तु विततः स तु वायुसमीरित: । रसान्‌ धातुूंश्न दोषांश्व वर्तयन्‌ परिधावति,त्वचा आदि सब धातुओंमें जठरानल व्याप्त है। वह प्राण आदि वायुओंसे प्रेरित होकर अन्न आदि रसों, त्वचा आदि धातुओं तथा पित्त आदि दोषोंको परिपक्व करता हुआ समूचे शरीरमें दौड़ा करता है

Api pencernaan (jatharāgni) meresapi seluruh jaringan tubuh, mulai dari kulit dan seterusnya. Digerakkan oleh hembusan vital seperti prāṇa, ia beredar ke segenap badan, mematangkan sari makanan, jaringan-jaringan, serta humor seperti empedu; demikianlah tubuh dipelihara oleh tatanan batin yang teratur.

Verse 11

प्राणानां संनिपातात्‌ तु संनिपात: प्रजायते । ऊष्मा चाग्निरिति ज्ञेयो योडन्न॑ं पचति देहिनाम्‌,प्राण आदि वायुओंके परस्पर मिलनेसे एक संघर्ष उत्पन्न होता है, उससे प्रकट होनेवाले उत्तापको ही जठरानल समझना चाहिये। वही देहधारियोंके खाये हुए अन्नको पचाता है

Dari pertemuan timbal-balik napas-napas vital (prāṇa) timbul suatu ‘pergesekan’ batin; panas yang lahir darinya patut dipahami sebagai api tubuh. Panas itulah—disebut api lambung—yang mencerna makanan yang dimakan makhluk berjasad.

Verse 12

समानोदानयोर्मध्ये प्राणापानौ समाहितौ । समर्थितस्त्वधिष्ठानं सम्यक्‌ पचति पावक:,समान और उदान वायुओंके बीचमें प्राण और अपानवायुकी स्थिति है। उनके संघर्षसे उत्पन्न जठरानल अन्नको पचाता है और उसके रससे इस शरीरको भलीभाँति पुष्ट करता है;

Di antara arus vital Samāna dan Udāna, Prāṇa dan Apāna ditahan dalam keseimbangan. Dari keteraturan itu bangkitlah api pencernaan, yang memasak makanan dengan tepat dan, dari sarinya, menyehatkan serta menguatkan tubuh ini.

Verse 13

अस्यापि पायुपर्यन्तस्तथा स्याद्‌ गुदसंज्ञित: । स्रोतांसि तस्माज्जायन्ते सर्वप्राणेषु देहिनाम्‌,इस जठरानलका स्थान नाभिसे लेकर पायुतक है। इसीको “गुदा” कहते हैं। उस गुदासे देहधारियोंके समस्त प्राणोंमें स्रोत (नाडीमार्ग) प्रकट होते हैं

Dalam tubuh ini, wilayah yang membentang hingga anus dikenal sebagai guda. Dari guda itulah muncul saluran-saluran (srotas) yang menampakkan diri dalam seluruh fungsi napas-vital pada makhluk berjasad.

Verse 14

अग्निवेगवह:ः प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते । स ऊर्ध्वमागम्य पुन: समुत्क्षिपति पावकम्‌,गुदासे प्राण अग्निके वेगको लेकर गुदान्तमें टकराता है, फिर वहाँसे ऊपरको उठकर वह जठराग्निको भी ऊपर उठाता है

Prāṇa, yang membawa daya dorong api, menghantam ujung guda; lalu ia naik kembali ke atas dan mengaduk serta mengangkat pencernaan-api itu sekali lagi.

Verse 15

पकक्‍्वाशयस्त्वधो नाभ्यामूर्थधमामाशय: स्थित: । नाभिमध्ये शरीरस्य प्राणा: सर्वे प्रतेष्ठिता:,नाभिके नीचे पक्‍वाशय (पके हुए भोजनका स्थान) है और ऊपर आमाशय (कच्चे भोजनका स्थान) है। शरीरमें स्थित समस्त प्राण नाभिमें ही प्रतिष्ठित हैं--वही उनका केन्द्रस्थान है

Di bawah pusar terletak pakvāśaya (tempat makanan yang telah matang/tercerna), dan di atasnya terletak āmāśaya (tempat makanan yang masih mentah/belum tercerna). Segala prāṇa dalam tubuh bersemayam di pusar—itulah pusatnya.

Verse 16

प्रवृत्ता हृदयात्‌ सर्वे तिर्यगूर्धष्वमधस्तथा । वहन्त्यन्नरसान्‌ नाड्यो दशप्राणप्रचोदिता:,नाड़ियाँ हृदयसे नीचे-ऊपर और इधर-उधर फैली हुई हैं। वे दस प्राणवायुओंसे प्रेरित हो शरीरके सब भागोंमें अन्नके रसोंको पहुँचाती रहती हैं

Nāḍī-nāḍī yang keluar dari jantung menyebar ke segala arah—menyamping, ke atas, dan ke bawah. Didorong oleh sepuluh prāṇa-vāyu, ia senantiasa mengalirkan sari makanan ke seluruh anggota tubuh.

Verse 17

योगिनामेष मार्गस्तु येन गच्छन्ति तत्‌ परम्‌ | जितक्लमा: समा धीरा मूर्थन्यात्मानमादधु: । एवं सर्वेषु विततौ प्राणापानौ हि देहिषु,जिन्होंने समस्त क्लेशोंको जीत लिया है, जो समदर्शी और धीर हैं, जिन्होंने (सुषुम्णा नाड़ीके द्वारा) अपने प्रागमय आत्माको मस्तक (वर्ती सहस्रारचक्र)-में ले जाकर स्थापित किया है, उन योगियोंके लिये यह (मस्तकसे लेकर पायुतकका सुषुम्णामय) मार्ग है, जिससे वे उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार समस्त जीवात्माओंके शरीरोंमें ये प्राणवायु और अपानवायु व्याप्त हैं

Inilah jalan para yogin; melalui jalan inilah mereka mencapai Yang Mahatinggi. Mereka yang menaklukkan letih dan derita, yang seimbang pandangannya dan teguh, menempatkan Ātman di ubun-ubun. Demikianlah, pada semua makhluk berjasad, arus prāṇa dan apāna meresap ke mana-mana.

Verse 18

(तावग्निसहितौ ब्रह्मन्‌ विद्धि वै प्राणमात्मनि ।) एकादशविकारात्मा कलासम्भारसम्भृतः । मूर्तिमन्तं हि तं विद्धि नित्यं योगजितात्मकम्‌,ब्रह्म! वे प्राण और अपान जठरानलके साथ रहते हैं। प्राणको आत्मामें स्थित जानिये। आत्मा एकादश इन्द्रियरूप विकारोंसे युक्त, षोडश- कलाओंके समूहसे सम्पन्न, शरीरको धारण करनेवाला तथा नित्य है। उसने योगबलसे मन-बुद्धिको अपने अधीन कर रखा है। इस प्रकार आत्माके सम्बन्धमें आपको जानना चाहिये

Wahai Brahmana, prāṇa dan apāna berdiam bersama api pencernaan (jatharāgni); ketahuilah prāṇa sebagai tegak di dalam Sang Diri (Ātman). Ātman terkait dengan sebelas perubahan (indria dan manas), dipenuhi himpunan kalā, menopang wujud jasmani, kekal, dan oleh daya yoga menundukkan pikiran serta budi. Demikianlah Ātman patut dipahami.

Verse 19

तस्मिन्‌ यः संस्थितो हान्निर्नित्यं स्थाल्यामिवाहित: । आत्मानं तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम्‌,जैसे बटलोईमें आग रखी गयी हो, उसी प्रकार पूर्वोक्त कला-समूहरूप शरीरमें प्रकाशस्वरूप आत्मा सदा विद्यमान रहता है। आप उसे जानिये। वह नित्य तथा योगशक्तिसे मन-बुद्धिको अपने अधीन रखनेवाला है

Sebagaimana api yang diletakkan dalam periuk tetap hadir mantap di dalamnya, demikian pula Ātman yang bercahaya senantiasa bersemayam dalam tubuh—yang dipahami sebagai himpunan kalā yang telah disebut. Kenalilah Ātman itu: kekal, dan oleh yoga menaklukkan batin, menundukkan pikiran serta budi.

Verse 20

देवो यः संस्थितस्तस्मिन्नब्बिन्दुरिव पुष्करे | क्षेत्रज् तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम्‌,जैसे कमलके पत्तेपर पड़ी हुई जलकी बूँद निर्लिप्त होती है, उसी प्रकार ये आत्मदेव कलात्मक शरीरमें असंगभावसे स्थित हैं। वे ही क्षेत्रज्ञ हैं, आप उन्हें जानिये। वे योगसे अपने मन और बुद्धिपर अधिकार प्राप्त करनेवाले तथा नित्य हैं

Ketahuilah Diri Ilahi yang bersemayam di dalam tubuh namun tak tersentuh—laksana setetes air di atas daun teratai. Dialah Kṣetrajña, Sang Pengenal Medan: abadi, dan penakluk alat batin melalui yoga, yang menundukkan pikiran serta budi.

Verse 21

जीवात्मकानि जानीहि रज: सत्त्वं तमस्तथा । जीवमात्मगुणं विद्धि तथा55त्मानं परात्मकम्‌,ब्रह्म! आप यह जान लें कि सत्त्वगुण (प्रकाश), रजोगुण (प्रवृत्ति) और तमोगुण (मोह)--ये जीवात्मक हैं; अर्थात्‌ जीवात्माके अन्तःकरणके विकार हैं, जीव आत्माका गुण (सेवक) है और आत्मा परमात्मस्वरूप है। भाव यह कि परमात्माको ही यहाँ आत्मा कहा गया है

Ketahuilah bahwa rajas, sattva, dan tamas bersifat jīvātmika—yakni perubahan pada alat batin. Pahamilah jīva sebagai sifat yang bergantung pada Diri; sedangkan Diri itu bersifat Paramātman, wahai Brahmana.

Verse 22

अचेतनं जीवगुणं वदन्ति स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम्‌ । ततः पर क्षेत्रविदो वदन्ति प्राकल्पयद्‌ यो भुवनानि सप्त,शरीर-तत्त्वके ज्ञाता महात्मा पुरुष जड शरीर आदिको जीवका भोग्य बताते हैं। वह जीव शरीरके भीतर रहकर स्वयं चेष्टाशील होता है तथा शरीर और इन्द्रिय आदि सबको चेष्टाओंमें लगाता है। जिन्होंने सातों भुवनोंका निर्माण किया है, उन परमात्माको ज्ञानी पुरुष जीवात्मासे उत्कृष्ट बताते हैं

Para bijak berkata: tubuh yang tak berkesadaran hanyalah “sifat” atau alat bagi jīva untuk mengalami. Jīva sendiri bertindak, dan menggerakkan segala sesuatu untuk bertindak. Namun para pengenal Kṣetra menyatakan yang lebih tinggi dari itu: Dia yang sejak awal menata tujuh dunia.

Verse 23

एवं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मा सम्प्रकाशते । दृश्यते त्वग्रयया बुद्धया सूक्ष्मया ज्ञानवेदिभि:,इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा परमेश्वर समस्त प्राणियोंके भीतर प्रकाशित हो रहे हैं। ज्ञानी महात्मा अपनी श्रेष्ठ एवं सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा उन्हें देख पाते हैं

Demikianlah Bhūtātman, Sang Tuhan, bersinar di dalam semua makhluk; namun Ia tampak hanya bagi para bijak yang berakal luhur, halus, dan berwawasan pengetahuan.

Verse 24

चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम्‌ । प्रसन्नात्मा55त्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्लुते,मनुष्य अपने चित्तकी पवित्रताके द्वारा ही समस्त शुभाशुभ कर्मोको नष्ट (फल देनेमें असमर्थ) कर देता है। जिसका अन्त:करण प्रसन्न (पवित्र) है, वह अपने-आपमें ही स्थित होकर अक्षय सुख (मोक्ष)-का भागी होता है

Dengan kejernihan dan ketenangan batin, seseorang memusnahkan daya mengikat dari perbuatan baik maupun buruk—menjadikannya tak mampu berbuah sebagai belenggu. Ia yang hatinya bening, berdiam dalam Diri, meraih kebahagiaan tanpa akhir dan tak binasa: pembebasan.

Verse 25

लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्त: सुखं स्वपेत्‌ । निवाते वा यथा दीपो दीप्येत्‌ कुशलदीपित:,जैसे भोजन आदिसे तृप्त हुआ मनुष्य सुखसे सोता है और जैसे वायुरहित स्थानमें चतुर मनुष्यके द्वारा जलाया हुआ दीप निश्चलभावसे प्रकाशित होता है; ऐसा ही लक्षण चित्तकी पवित्रताका भी है

Tanda kejernihan batin ialah: sebagaimana orang yang telah kenyang oleh santapan tidur dengan tenteram, dan sebagaimana pelita yang dinyalakan oleh orang terampil di tempat tanpa angin menyala teguh tanpa goyah; demikian pula tanda kemurnian citta (hati-batin).

Verse 26

पूर्वरात्रे परे चैव युज्जान: सततं मन: । लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यन्नात्मानमात्मनि,मनुष्यको चाहिये कि वह हलका भोजन करे और अन्तःकरणको शुद्ध रखे। रातके पहले और पिछले पहरमें सदा अपना मन परमात्माके चिन्तनमें लगावे। जो इस प्रकार निरन्तर अपने हृदयमें परमात्माके साक्षात्कारका अभ्यास करता है, वह प्रज्वलित दीपकके समान प्रकाशित होनेवाले अपने मनोमय प्रदीपके द्वारा निराकार परमेश्वरका साक्षात्कार करके तत्काल मुक्त हो जाता है

Hendaknya seseorang makan secukupnya dan menjaga batin tetap suci. Pada awal malam dan pada akhir malam, ia harus senantiasa menautkan pikiran pada perenungan, memandang Sang Diri di dalam Sang Diri.

Verse 27

प्रदीप्तेनेव दीपेन मनोदीपेन पश्यति । दृष्टवा55त्मानं निरात्मानं स तदा विप्रमुच्यते,मनुष्यको चाहिये कि वह हलका भोजन करे और अन्तःकरणको शुद्ध रखे। रातके पहले और पिछले पहरमें सदा अपना मन परमात्माके चिन्तनमें लगावे। जो इस प्रकार निरन्तर अपने हृदयमें परमात्माके साक्षात्कारका अभ्यास करता है, वह प्रज्वलित दीपकके समान प्रकाशित होनेवाले अपने मनोमय प्रदीपके द्वारा निराकार परमेश्वरका साक्षात्कार करके तत्काल मुक्त हो जाता है

Sebagaimana orang melihat dengan cahaya pelita yang menyala, demikian pula pencari melihat dengan pelita batin, yakni pelita pikiran. Ketika, oleh terang itu, ia menyaksikan Sang Diri sebagai bebas dari yang bukan-Diri, saat itu juga ia terbebaskan.

Verse 28

सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रह: । एतत्‌ पवित्र लोकानां तपो वै संक्रमो मत:,सम्पूर्ण उपायोंसे लोभ और क्रोधकी वृत्तियोंको दबाना चाहिए। संसारमें यही पवित्र तप है और यही सबके लिये भवसागरसे पार उतारनेवाला सेतु माना गया है

Dengan segala cara, hendaknya keserakahan dan amarah dikendalikan. Inilah tapa yang menyucikan bagi insan di dunia, dan inilah jembatan yang dianggap menyeberangkan seseorang melampaui samudra samsara.

Verse 29

नित्यं क्रोधात्‌ तपो रक्षेद्‌ धर्म रक्षेच्च मत्सरात्‌ । विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादत:,सदा तपको क्रोधसे, धर्मको द्वेषसे, विद्याकों मान-अपमानसे और अपने-आपको प्रमादसे बचाना चाहिये

Selalu lindungilah tapa dari amarah; lindungilah dharma dari iri dengki. Lindungilah pengetahuan dari tarikan hormat dan hina, dan lindungilah dirimu sendiri dari kelalaian.

Verse 30

आनुृ्‌शंस्य॑ं परो धर्म: क्षमा च परमं बलम्‌ | आत्मज्ञानं परं ज्ञानं सत्यं व्रतपरं ब्रतम्‌,क्रूरताका अभाव (दया) सबसे महान धर्म है, क्षमा सबसे बड़ा बल है, सत्य सबसे उत्तम व्रत है और परमात्माके तत्त्वका ज्ञान ही सर्वोत्तम ज्ञान है

Belas kasih dan bebas dari kekejaman adalah dharma yang tertinggi; pemaafan adalah kekuatan yang terbesar. Pengetahuan tentang Diri (Atman) adalah pengetahuan yang paling luhur, dan kebenaran adalah laku-ikrar tertinggi di antara segala ikrar.

Verse 31

सत्यस्य वचन श्रेय: सत्यं ज्ञानं हितं भवेत्‌ यद्‌ भूतहितमत्यन्तं तद्‌ वै सत्यं परं मतम्‌,सत्य बोलना सदा कल्याणकारी है। यथार्थ ज्ञान ही हितकारक होता है। जिससे प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो उसे ही उत्तम सत्य माना गया है

Mengucapkan kebenaran adalah sumber kebaikan tertinggi. Kebenaran adalah pengetahuan yang menjadi bermanfaat. Apa pun yang membawa kesejahteraan terbesar bagi semua makhluk—itulah yang dipandang sebagai kebenaran yang paling luhur.

Verse 32

यस्य सर्वे समारम्भा निराशीर्बन्धना: सदा | त्यागे यस्य हुतं सर्व स त्यागी स च बुद्धिमान्‌,जिसके सम्पूर्ण आयोजन कभी कामनाओंसे बाँधे हुए नहीं होते तथा जिसने त्यागकी आगमें अपना सर्वस्व होम दिया है वही त्यागी और बुद्धिमान्‌ है

Ia sungguh seorang pelepas—dan sungguh bijaksana—yang setiap usahanya tak pernah terbelenggu oleh harap dan hasrat, dan yang telah mempersembahkan seluruh dirinya ke dalam api pelepasan.

Verse 33

यतो न गुरुरप्येनं श्रावयेदुपपादयेत्‌ । त॑ं विद्याद्‌ ब्रह्मणो योगं वियोगं योगसंज्ञितम्‌,इसलिये दृश्य संसारसे वियोग करानेवाले और योग नामसे कहे जानेवाले इस ब्रह्मययोगको स्वयं जानना और सम्पादन करना चाहिये। गुरुको भी उचित है कि वह इसे अपात्र शिष्यके प्रति न सुनावे

Karena itu, Brahma-yoga—yang memutus keterikatan dari dunia yang tampak dan disebut ‘yoga’—hendaknya diketahui dan dipraktikkan sendiri; dan seorang guru pun patut tidak menyampaikannya atau mengajarkannya kepada murid yang tidak layak.

Verse 34

न हिंस्यात्‌ सर्वभूतानि मैत्रायणगतकश्चरेत्‌ । नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित्‌,किसी प्राणीकी हिंसा न करे। सबसमें मित्रभाव रखते हुए विचरे। इस दुर्लभ मनुष्य- जीवनको पाकर किसीके साथ वैर न करे

Jangan menyakiti makhluk mana pun. Berjalanlah di dunia dengan batin yang berlandaskan persahabatan. Setelah memperoleh hidup manusia yang langka ini, jangan menumbuhkan permusuhan dengan siapa pun.

Verse 35

आकिज्चन्यं सुसंतोषो निराशित्वमचापलम्‌ | एतदेव पर ज्ञानं सदात्मज्ञानमुत्तमम्‌,कुछ भी संग्रह न रखना, सभी दशाओंमें अत्यन्त संतुष्ट रहना तथा कामना और लोलुपताको त्याग देना--यही परम ज्ञान है और यही सत्यस्वरूप उत्तम आत्मज्ञान है

Tidak memiliki apa pun, tetap sangat puas dalam setiap keadaan, serta meninggalkan hasrat dan ketamakan yang gelisah—itulah satu-satunya pengetahuan tertinggi. Itulah pengetahuan-diri yang paling luhur, selaras dengan kebenaran.

Verse 36

परिग्रहं परित्यज्य भवेद्‌ बुद्धया यतव्रत: । अशोक स्थानमाश्रित्य निश्चलं प्रेत्य चेह च,इहलोक और परलोकके समस्त भोगोंका एवं सब प्रकारके संग्रहका त्याग करके शोकरहित निश्चल परमधामको लक्ष्य बनाकर बुद्धिके द्वारा मन और इन्द्रियोंका संयम करे

Dengan meninggalkan segala kenikmatan dunia dan akhirat serta setiap bentuk penimbunan, hendaknya seseorang—dengan tekad disiplin yang dituntun oleh kejernihan budi—mengekang pikiran dan indra. Menjadikan keadaan tertinggi yang tanpa duka dan tak tergoyahkan sebagai tujuan, ia meraih keteguhan dan kesejahteraan, baik di sini maupun setelah kematian.

Verse 37

तपोनित्येन दान्तेन मुनिना संयतात्मना | अजित जेतुकामेन भाव्यं सड्लेष्वसज्धिना,जो जितेन्द्रिय है, जिसने मनपर अधिकार प्राप्त कर लिया है तथा जो अजित पदको जीतनेकी इच्छा करता है, नित्य तपस्यामें संलग्न रहनेवाले उस मुनिको आसक्ति-जनक भोगोंसे अलग--अनासक्त रहना चाहिये

Seorang resi yang mengekang diri, menundukkan indra, dan tekun bertapa setiap hari—bila ia ingin menaklukkan keadaan ‘Tak-Terkalahkan’—hendaknya tetap tanpa keterikatan, sekalipun berada di tengah kenikmatan yang menimbulkan lekat.

Verse 38

गुणागुणमनासड्रमेककार्यमनन्तरम्‌ । एतत्‌ तद्‌ ब्रह्मणो वृत्तमाहुरेकपदं सुखम्‌,जो गुणमें रहता हुआ भी गुणोंसे रहित है, जो सर्वथा संगसे रहित है तथा जो एकमात्र अन्तरात्माके द्वारा ही साध्य है, जिसकी उपलब्धिमें अविद्याके सिवा और कोई व्यवधान नहीं है, वही ब्रह्मका अद्वितीय नित्य सिद्ध पद है और वही (निरतिशय) सुख है

Yang berada di tengah guna namun melampaui guna; yang sepenuhnya tanpa keterikatan; yang disadari hanya melalui satu Diri batin; dan yang tak terhalang oleh apa pun selain avidya—itulah, kata mereka, keadaan Brahman: satu-satunya kedudukan yang tiada banding, senantiasa telah sempurna; itulah kebahagiaan sejati.

Verse 39

परित्यजति यो दु:खं सुखं चाप्युभयं नर: । ब्रह्म प्राप्नोति सो5त्यन्तमसड्रेन च गच्छति,जो मनुष्य दुःख और सुख दोनोंको त्याग देता है, वही अनन्त ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। अनासक्तिके द्वारा भी उसी पदकी प्राप्ति होती है

Seseorang yang melepaskan baik duka maupun suka mencapai kedudukan Brahman yang tertinggi; dan melalui ketakterikatan pun, keadaan luhur itu juga diraih.

Verse 40

यथाश्रुतमिदं सर्व समासेन द्विजोत्तम । एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं कि भूय: श्रोतुमिच्छसि,द्विजश्रेष्ठ! मैंने यह सब जैसा सुना है, वैसा सब-का-सब थोड़ेमें आपसे कह सुनाया है। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?

Wahai brahmana terbaik, telah kuceritakan kepadamu—secara ringkas dan tepat sebagaimana kudengar—segala sesuatu seluruhnya. Sekarang katakanlah: apa lagi yang ingin kau dengar?

Verse 213

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे त्रयोदशाधिकद्धिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें ब्राह्मणव्याधसंवादविषयक दो सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata pada Vana Parva—khususnya bagian Markandeya-samāsya—berakhir dialog antara sang Brāhmaṇa dan sang Vyādha. Dengan ini selesailah bab ke-213.

Frequently Asked Questions

The dilemma centers on desire versus social integrity: the episode frames how unregulated attraction can generate reputational harm and misattribution, prompting concealment, transformation, and ritual relocation to prevent blame from falling on revered households.

The chapter suggests that powerful impulses must be managed through discernment and containment; actions produce social and cosmic consequences, and responsibility includes safeguarding communal trust while channeling disruptive energies into ordered outcomes.

A functional meta-marker appears as an etiological closure: the world’s adoption of Skanda’s Śukla Pañcamī observance serves as a narrative warrant for remembrance and ritual continuity rather than an explicit promise of merit in phalaśruti form.