Adhyaya 160
Vana ParvaAdhyaya 16033 Verses

Adhyaya 160

Adhyāya 160: Dikpāla-Cosmography and the Sun’s Kālacakra (दिक्पाल-विश्ववर्णनम् तथा आदित्यस्य कालचक्रम्)

Upa-parva: Dik-Cosmology and Solar Circuit Discourse (Āraṇyaka-parva episodic unit)

Vaiśaṃpāyana reports that at sunrise Dhaumya completes his morning rites and approaches the Pandavas with Ārṣṭiṣeṇa. The brothers formally salute their elders and honor the assembled Brahmins. Dhaumya then takes Yudhiṣṭhira by the hand, faces east, and outlines a directional cosmography: Mandara is presented as a prominent mountain; the quarters are linked with divine authorities (e.g., Indra and Vaiśravaṇa), while the south is associated with Yama and the sacred, formidable Saṃyamana—described as the abode of the lord of departed beings. The west is connected with Varuṇa and the oceanic realm; the north is illuminated by Mahāmeru, associated with Brahmā’s assembly and progenitive powers, and with the abiding station of the seven devarṣis. From this axis, Dhaumya describes a supreme, radiant locus identified with Nārāyaṇa/Vişṇu, difficult to behold even for devas and dānavas, approached by disciplined ascetics and yogic adepts who do not return to ordinary embodiment. The chapter then pivots to temporal mechanics: the Sun’s unceasing circumambulation around Meru, his transitions through directions, the production of seasons (including cold), the modulation of vitality (tejas) in beings, and the generation of day-night and calendrical divisions—framing cosmic motion as the architecture of life and ethical reflection.

Chapter Arc: वन में पर्व-संधि के रहस्यमय समय पर पाण्डव एक महर्षि के आश्रम/पर्वत-प्रदेश में पहुँचते हैं, जहाँ प्रकृति स्वयं अद्भुत संकेतों से बोलती प्रतीत होती है। → द्रौपदी, भीम, नकुल-सहदेव और पुरोहित धौम्य सहित पाण्डव मस्तक झुकाकर ऋषि की सेवा करते हैं। ऋषि युधिष्ठिर से तीखे, आत्म-परीक्षण कराने वाले प्रश्न पूछते हैं—क्या सत्य से विचलन तो नहीं, क्या धर्म-मार्ग स्थिर है, माता-पिता के प्रति वृत्ति और आचरण में शिथिलता तो नहीं। साथ ही कर्म-फल की जिज्ञासा उठती है: दूसरों के दुष्कृत/सुकृत का फल हमें क्या भोगना पड़ता है? → ऋषि पर्व-संधि (पूर्णिमा/अमावस्या की संधि) के समय पर्वत-श्रेष्ठ पर होने वाले अलौकिक दृश्यों का रहस्य खोलते हैं—ऋषि-गण वायु/जल-आहार जैसे कठोर व्रतों से देह को साधकर आकाश-मार्ग से विचरते हैं, और इस काल में अनेक प्राणी अद्भुत दर्शन करते हैं; पर पाण्डवों को वहाँ जाने की इच्छा नहीं करनी चाहिए—जो जानना है, यहीं रहकर सुनें/देखें। → ऋषि युधिष्ठिर को धैर्य और अचंचलता का उपदेश देते हैं—यहाँ श्रद्धा से निवास करो, नियमपूर्वक विहार करो; समय आने पर तुम शस्त्रजित पृथ्वी का पालन करोगे। → पाण्डवों के लिए यह संकेत छोड़ दिया जाता है कि वन-वास का यह संयम ही भविष्य के राज्य-धर्म का आधार बनेगा, और पर्व-संधि के रहस्य अभी और भी गहरे हैं।

Shlokas

Verse 1

#+ #+० ()) #अल अप - सिन्धुवार शब्दका अर्थ आचार्य नीलकण्ठने कमल माना है। आधुनिक कोषकारोंने 'सिन्धुवार'को शेफालिका या निर्गुण्डीका पर्याय माना है। उसके फूल मंजरीके आकारमें केसरिया रंगके होते हैं, अत: तोमरसे उनकी उपमा ठीक बैठती है। इसीलिये यहाँ शेफालिका अर्थ लिया गया। एकोनषष्टर्याधकशततमो< ध्याय: प्रश्नके रूपमें आर्डिषिणका युधिष्ठिरके प्रति उपदेश वैशम्पायन उवाच युधिष्ठिरस्तमासाद्य तपसा दग्धकिल्बिषम्‌ | अभ्यवादयत प्रीतः शिरसा नाम कीर्तयन्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजर्षि आर्टिषेणने तपस्याद्वारा अपने सारे पाप दग्ध कर दिये थे। राजा युधिष्ठिरने उनके पास जाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपना नाम बताते हुए उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया

Vaiśaṃpāyana berkata: Yudhiṣṭhira mendekati Ārtiṣeṇa, yang dosa-dosanya telah terbakar habis oleh tapa. Dengan hati gembira, ia menundukkan kepala, menyebutkan namanya sendiri, dan menyampaikan penghormatan.

Verse 2

ततः कृष्णा च भीमश्न यमौ च सुतपस्विनौ । शिरोभ्रि: प्राप्य राजर्षि परिवार्योपतस्थिरे,तदनन्तर द्रौपदी, भीमसेन और परम तपस्वी नकुल-सहदेव--ये सभी मस्तक झुकाकर उन राजर्षिको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये

Kemudian Kṛṣṇā (Draupadī), Bhīma, serta kedua saudara kembar—Nakula dan Sahadeva—yang teguh dalam tapa, mendekati sang rājaṛṣi dengan kepala tertunduk. Mereka berdiri mengelilinginya dari segala sisi, dengan sikap hormat dan rendah hati.

Verse 3

तथैव धौम्यो धर्मज्ञ: पाण्डवानां पुरोहित: । यथान्यायमुपाक्रान्तस्तमृषिं संशितव्रतम्‌,उसी प्रकार पाण्डवोंके पुरोहित धर्मज्ञ धौम्यजी कठोर व्रतका पालन करनेवाले राजर्षि आ्शडिषिणके पास यथोचित शिष्टाचारके साथ उपस्थित हुए

Demikian pula Dhaumya, purohita para Pāṇḍava dan seorang yang mengetahui dharma, mendatangi resi yang teguh dalam laku-tekad itu sesuai tata krama yang semestinya.

Verse 4

अन्वजानातू स धर्मज्ञो मुनिर्दिव्येन चक्षुषा । पाण्डो: पुत्रान्‌ कुरुश्रेष्ठानास्यतामिति चाब्रवीत्‌,उन धर्मज्ञ मुनि आर्डिषेणने अपनी दिव्यदृष्टिसे कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंको जान लिया और कहा, “आप सब लोग बैठें”

Sang resi yang mengetahui dharma itu mengenali putra-putra Pāṇḍu—para Pāṇḍava, yang utama di antara kaum Kuru—dengan penglihatan ilahinya, lalu berkata, “Duduklah kalian semua.”

Verse 5

कुरूणामृषभं पार्थ पूजयित्वा महातपा: । सह भ्रातृभिरासीनं पर्यपृच्छटदनामयम्‌,महातपस्वी आर्टिषिणने भाइयोंसहित कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिका यथोचित आदर-सत्कार किया और जब वे बैठ गये, तब उनसे कुशल-समाचार पूछा--

Waiśampāyana berkata: Sang pertapa agung, setelah menghormati Yudhiṣṭhira—lembu jantan di antara para Kuru, wahai Pārtha—sesuai tata dharma, lalu ketika ia telah duduk bersama saudara-saudaranya, menanyakan kabar kesejahteraannya.

Verse 6

नानृते कुरुषे भावं कच्चिद्‌ धर्मे प्रवर्तसे । मातापित्रोश्व ते वृत्ति: कच्चित्‌ पार्थ न सीदति,“कुन्तीनन्दन! कभी झूठकी ओर तो तुम्हारा मन नहीं जाता? तुम धर्ममें लगे रहते हो न? माता-पिताके प्रति जो तुम्हारी सेवावृत्ति होनी चाहिये, वह है न? उसमें शिथिलता तो नहीं आयी है?

Waiśampāyana berkata: “Wahai putra Kuntī, apakah batinmu tak pernah condong pada dusta? Apakah engkau teguh menapaki dharma? Dan, wahai Pārtha, apakah bakti serta kewajibanmu kepada ibu dan ayah tetap kokoh—tidak mengendur?”

Verse 7

कच्चित्‌ ते गुरव: सर्वे वृद्धा वैद्याश्न पूजिता: । कच्चिन्न कुरुषे भावं पार्थ पापेषु कर्मसु,“क्या तुमने समस्त गुरुजनों, बड़े-बूढ़ों और विद्वानोंका सदा समादर किया है? पार्थ! कभी पापकर्मामें तो तुम्हारी रुचि नहीं होती?

Waiśampāyana berkata: “Apakah engkau telah memuliakan semua gurumu, para sesepuh, dan tabib yang berilmu sebagaimana mestinya? Dan, wahai Pārtha, apakah engkau tidak membiarkan batinmu condong pada perbuatan dosa?”

Verse 8

सुकृतं प्रतिकर्तु च कच्चिद्धातुं च दुष्कृतम्‌ । यथान्यायं कुरुश्रेष्ठ जानासि न विकत्थसे,“कुरुश्रेष्ठ! क्या तुम अपने उपकारीको उसके उपकारका यथोचित बदला देना जानते हो? क्‍या तुम्हें अपना अपकार करनेवाले मनुष्यकी उपेक्षा कर देनेकी कला का ज्ञान है? तुम अपनी बड़ाई तो नहीं करते?

Waiśampāyana berkata: “Wahai yang terbaik di antara para Kuru, apakah engkau tahu membalas kebajikan dengan balasan yang patut, dan menyingkirkan (mengabaikan) kejahatan yang dilakukan orang durjana? Apakah engkau memahami apa yang adil—dan menahan diri dari memuji diri sendiri?”

Verse 9

यथा मानिता: कच्चित्‌ त्वया नन्दन्ति साधव: । वनेष्वपि वसन्‌ कच्चिद्‌ धर्ममेवानुवर्तसे,“क्या तुमसे यथायोग्य सम्मानित होकर साधु पुरुष तुमपर प्रसन्न रहते हैं? क्या तुम वनमें रहते हुए भी सदा धर्मका ही अनुसरण करते हो?

Waiśampāyana berkata: “Apakah orang-orang saleh, setelah engkau muliakan sebagaimana patut, benar-benar berkenan kepadamu? Dan meski tinggal di rimba, apakah engkau tetap mengikuti dharma semata?”

Verse 10

कच्चिद्‌ धौम्यस्त्वदाचारैर्न पार्थ परितप्यते । दानधर्मतपःशौचैरार्जवेन तितिक्षया,'पार्थ! तुम्हारे आचार-व्यवहारसे पुरोहित धौम्यजीको क्लेश तो नहीं पहुँचता है? कुन्तीनन्दन! कया तुम दान, धर्म, तप, शौच, सरलता और क्षमा आदिके द्वारा अपने बाप- दादोंके आचार-व्यवहारका अनुसरण करते हो? पाण्डुनन्दन! प्राचीन राजर्षि जिस मार्गसे गये हैं, उसीपर तुम भी चलते हो न?

Waiśampāyana berkata: “Wahai Pārtha, apakah pendeta Dhaumya tidak tersakiti oleh perilakumu? Wahai putra Kuntī, apakah engkau menegakkan laku leluhur melalui kedermawanan, dharma, tapa, kesucian, kelurusan hati, dan ketabahan—menapaki jalan yang dahulu ditempuh para raja-ṛṣi zaman silam?”

Verse 11

पितृपैतामहं वृत्तं कच्चित्‌ पार्थनुवर्तसे । कच्चिद्‌ राजर्षियातेन पथा गच्छसि पाण्डव,'पार्थ! तुम्हारे आचार-व्यवहारसे पुरोहित धौम्यजीको क्लेश तो नहीं पहुँचता है? कुन्तीनन्दन! कया तुम दान, धर्म, तप, शौच, सरलता और क्षमा आदिके द्वारा अपने बाप- दादोंके आचार-व्यवहारका अनुसरण करते हो? पाण्डुनन्दन! प्राचीन राजर्षि जिस मार्गसे गये हैं, उसीपर तुम भी चलते हो न?

Waiśampāyana berkata: “Wahai Pārtha, apakah engkau masih mengikuti laku yang diwariskan ayah dan kakekmu? Wahai Pāṇḍava, apakah engkau menapaki jalan yang ditempuh para raja-ṛṣi—menjaga ukuran kuno para raja yang berpegang pada dharma?”

Verse 12

स्वे स्वे किल कुले जाते पुत्रे नप्तरि वा पुन: । पितर: पितृलोकस्था: शोचन्ति च हसन्ति च,“कहते हैं, जब-जब अपने-अपने कुलमें पुत्र अथवा नातीका जन्म होता है, तब-तब पितृलोकमें रहनेवाले पितर शोकमग्न होते हैं और हँसते भी हैं। शोक तो उन्हें यह सोचकर होता है कि “क्या हमें इसके पापमें हिस्सा बँटाना पड़ेगा?” और हँसते इसलिये हैं कि “क्या हमें इसके पुण्यका कुछ भाग मिलेगा? यदि ऐसा हो तो बड़ी अच्छी बात है!

Waiśampāyana berkata: “Setiap kali, dalam tiap garis keluarga, seorang putra—atau lagi seorang cucu—lahir, para leluhur yang bersemayam di alam Pitṛ pun berduka dan bersukacita sekaligus.”

Verse 13

कि तस्य दुष्कृते5स्माभि: सम्प्राप्तव्यं भविष्यति । कि चास्य सुकृतेडस्माभि: प्राप्तव्यमिति शोभनम्‌,“कहते हैं, जब-जब अपने-अपने कुलमें पुत्र अथवा नातीका जन्म होता है, तब-तब पितृलोकमें रहनेवाले पितर शोकमग्न होते हैं और हँसते भी हैं। शोक तो उन्हें यह सोचकर होता है कि “क्या हमें इसके पापमें हिस्सा बँटाना पड़ेगा?” और हँसते इसलिये हैं कि “क्या हमें इसके पुण्यका कुछ भाग मिलेगा? यदि ऐसा हो तो बड़ी अच्छी बात है!

Mereka berpikir: “Bagian apa yang akan sampai kepada kami dari perbuatan jahatnya? Dan bagian apa yang akan kami terima dari perbuatan baiknya—betapa mulianya bila kami memperoleh sebagian dari kebajikannya!”

Verse 14

पिता माता तथैवाग्निर्गुरुरात्मा च पठचम: । यस्यैते पूजिता: पार्थ तस्था लोकावुभौ जितौ,'पार्थ! जिसके द्वारा पिता, माता, अग्नि, गुरु और आत्मा--इन पाँचोंका आदर होता है, वह यह लोक और परलोक दोनोंको जीत लेता है”

Waiśampāyana berkata: “Wahai Pārtha, siapa yang memuliakan lima ini—ayah, ibu, api suci (Agni), guru, dan diri (ātman)—ia menaklukkan kedua dunia: dunia ini dan dunia seberang.”

Verse 15

युधिछिर उवाच भगवन्नार्य माहैतद्‌ यथावद्‌ धर्मनिश्चयम्‌ । यथाशक्ति यथान्यायं क्रियते विधिवन्मया,युधिष्ठिरने कहा--भगवन्‌! आर्यचरण! आपने मुझे यह धर्मका निचोड़ बताया है। मैं अपनी शक्तिके अनुसार यथोचित रीतिसे विधिपूर्वक इसका पालन करता हूँ

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Bhagavan, wahai tuan mulia—engkau telah menguraikan penetapan dharma yang agung dan tepat ini. Sejauh kemampuanku, dengan cara yang adil dan patut, aku berusaha melaksanakannya menurut tata yang ditetapkan.”

Verse 16

आर्शिषिण उवाच अब्भक्षा वायुभक्षाश्व प्लवमाना विहायसा । जुषन्ते पर्वतश्रेष्ठमृषय: पर्वसंधिषु,आर्डिषेण बोले--पार्थ! पर्वोकी संधिवेलामें (पूर्णिमा तथा प्रतिपदाकी संधिमें) बहुत- से ऋषिगण आकाशभमार्गसे उड़ते हुए आते हैं और इस श्रेष्ठ पर्वतका सेवन करते हैं। उनमेंसे कितने तो केवल जल पीकर जीवन-निर्वाह करते हैं और कितने केवल वायु पीकर रहते हैं

Sang resi berkata: “Wahai Pārtha! Pada saat-saat peralihan hari-hari suci (seperti pertemuan purnama dan pratipadā), banyak resi melintas di jalan langit dan datang berlindung pada gunung terbaik ini. Di antara mereka ada yang hidup hanya dengan air, dan ada pula yang bertahan hanya dengan udara.”

Verse 17

कामिन: सह कान्ताभि: परस्परमनुव्रता: । दृश्यन्ते शैलशूड्रस्था यथा किम्पुरुषा नृप,राजन! कितने ही किम्पुरुष-जातिके कामी अपनी कामिनियोंके साथ परस्पर अनुरक्तभावसे यहाँ क्रीडाके लिये आते हैं और पर्वतके शिखरोंपर घूमते दिखायी देते हैं

Sang resi berkata: “Wahai raja! Di sini tampak seakan di negeri Kimpuruṣa—para pecinta bersama kekasih mereka, saling setia dan seirama—datang untuk bersenang-senang dan berkeliaran di puncak-puncak gunung.”

Verse 18

अरजांसि च वासांसि वसाना: कौशिकानि च । दृश्यन्ते बहवः पार्थ गन्धर्वाप्सरसां गणा:,कुन्तीकुमार! गन्धर्वों और अप्सराओंके बहुत-से गण यहाँ देखनेमें आते हैं, उनमेंसे कितने ही स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और कितने ही रेशमी वस्त्रोंसे सुशोभित होते हैं

Sang resi berkata: “Wahai Pārtha! Di sini tampak banyak rombongan Gandharva dan Apsaras. Sebagian mengenakan busana yang bersih tanpa noda, dan sebagian lagi berhias dalam kain sutra.”

Verse 19

विद्याधरगणाश्षैव स्रग्विण: प्रियदर्शना: । महोरगगणांश्वैव सुपर्णाश्षीरगादय:,विद्याधरोंके गण भी सुन्दर फूलोंके हार पहने अत्यन्त मनोहर दिखायी देते हैं। इनके सिवा बड़े-बड़े नागगण, सुपर्णजातीय पक्षी तथा सर्प आदि भी दृष्टिगोचर होते हैं

Sang resi berkata: “Rombongan Vidyādhara pun tampak—berkalungkan rangkaian bunga dan elok dipandang. Bersama mereka terlihat pula kawanan ular besar, burung-burung Suparṇa (keturunan Garuḍa), serta makhluk melata lainnya.”

Verse 20

अस्य चोपरि शैलस्य श्रूयते पर्वसंधिषु । भेरीपणवशड्खानां मृदड़ानां च नि:ःस्वन:,पर्वोकी संधि-बेलामें इस पर्वतके ऊपर भेरी, पणव, शंख और मृदंगोंकी ध्वनि सुनायी देती है

Di puncak gunung ini, pada pertemuan punggung-punggungnya, terdengar gaung—tabuh bhērī, genderang paṇava, sangkha, dan mṛdaṅga.

Verse 21

इहस्थैरेव तत्‌ सर्व श्रोतव्यं भरतर्षभा: । न कार्या व: कथंचित्‌ स्यात्‌ तत्राभिगमने मति:,भरतकुलभूषण पाण्डवो! तुम्हें यहीं रहकर वह सब कुछ देखना या सुनना चाहिये। वहाँ पर्वतके ऊपर जानेका विचार तुम्हें किसी प्रकार भी नहीं करना चाहिये

Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, tetaplah di sini saja dan ketahuilah semuanya dengan melihat dan mendengar dari tempat ini; jangan sekali-kali membiarkan pikiranmu condong untuk naik ke sana.

Verse 22

न चाप्यत: परं शक्‍्यं गन्तुं भरतसत्तमा: | विहारो ह्वञात्र देवानाममानुषगतिस्तु सा,भरतश्रेष्ठ] इससे आगे जाना असम्भव है। वहाँ देवताओंकी विहारस्थली है। वहाँ मनुष्योंकी गति नहीं हो सकती

Wahai yang terbaik di antara Bharata, tidak mungkin melangkah lebih jauh dari sini. Inilah taman kesenangan para dewa; jalan di depan itu milik alam non-manusia dan tak terjangkau oleh insan fana.

Verse 23

ईषच्चपलकर्माणं मनुष्यमिह भारत | द्विषन्ति सर्वभूतानि ताडयन्ति च राक्षसा:,भारत! यहाँ थोड़ी-सी भी चपलता करनेवाले मनुष्यसे सब प्राणी द्वेष करते हैं तथा राक्षसलोग उसपर प्रहार कर बैठते हैं

Wahai Bhārata, di sini seseorang yang menunjukkan sedikit saja kecerobohan atau ketergesa-gesaan dalam tindakannya akan dibenci oleh semua makhluk; dan para rākṣasa, memanfaatkan kelengahan itu, akan menghantamnya.

Verse 24

अस्यातिक्रम्य शिखरं कैलासस्य युधिष्छिर । गति: परमसिद्धानां देवर्षीणां प्रकाशते,युधिष्ठिर! इस कैलासके शिखरको लाँघ जानेपर परम सिद्ध देवर्षियोंकी गति प्रकाशित होती है

Wahai Yudhiṣṭhira, setelah melampaui puncak Gunung Kailāsa ini, tampaklah jalan luhur yang dikenal para Siddha tertinggi dan para ṛṣi ilahi.

Verse 25

चापलादिह गच्छन्तं पार्थ यानमित: परम्‌ | अय:शूलादिभिष्ष्नन्ति राक्षसा: शत्रुसूदन,शत्रुसूदन पार्थ! चपलतावश इससे आगेके मार्गपर जानेवाले मनुष्यको राक्षसगण लोहेके शूल आदिसे मारते हैं

Sang Ṛṣi berkata: “Wahai Pārtha, bila seseorang melangkah lebih jauh di jalan ini hanya karena kecerobohan, para Rākṣasa akan menumbangkannya dengan tombak besi dan senjata sejenis. Wahai Śatrusūdana—waspadalah.”

Verse 26

अप्सरोभि: परिवृत: समृद्धया नरवाहन: । इह वैश्रवणस्तात पर्वसंधिषु दृश्यते,तात! पर्वोकी संधिके समय यहाँ मनुष्योंपर सवार होनेवाले कुबेर अप्सराओंसे घिरकर अपने अतुल वैभवके साथ दिखायी देते हैं

Sang resi berkata: “Wahai anakku, di sini, pada pertemuan-pertemuan pegunungan, Vaiśravaṇa (Kubera) tampak—menaiki tandu yang dipanggul manusia, dikelilingi para apsaras, serta memancarkan kemegahan yang melimpah.”

Verse 27

शिखरस्थं समासीनमधिपं यक्षरक्षसाम्‌ । प्रेक्षन्ते सर्वभूततानि भानुमन्तमिवोदितम्‌,यक्षों तथा राक्षसोंके अधिपति कुबेर जब इस कैलाशशिखरपर विराजमान होते हैं, उस समय उदित हुए सूर्यकी भाँति शोभा पाते हैं। उस अवसरपर सब प्राणी उनका दर्शन करते हैं

Duduk di puncak gunung, sang penguasa Yakṣa dan Rākṣasa—Kubera—bersinar laksana matahari yang baru terbit. Pada saat itu, semua makhluk memandang kepadanya dan menyaksikan kemuliaannya.

Verse 28

देवदानवसिद्धानां तथा वैश्रवणस्य च । गिरे: शिखरमूद्यानमिदं भरतसत्तम,भरतश्रेष्ठ! पर्वतका यह शिखर देवताओं, दानवों, सिद्धों तथा कुबेरका क्रीड़ा-कानन है

Sang resi berkata: “Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, taman di puncak gunung ini adalah rimba-kesenangan milik para dewa, Dānava, Siddha, dan juga Vaiśravaṇa (Kubera).”

Verse 29

उपासीनस्य धनदं तुम्बुरो: पर्वसंधिषु । गीतसामस्वनस्तात श्रूयते गन्धमादने,तात! पर्वसंधिके समय गन्धमादन पर्वतपर कुबेरकी सेवामें उपस्थित हुए तुम्बुरु गन्धर्वके साम-गानका स्वर स्पष्ट सुनायी पड़ता है

Wahai anakku, di Gandhamādana, pada celah-celah pegunungan, terdengar jelas lantunan Sāman dari Tumburu sang Gandharwa, ketika ia duduk berbakti melayani Dhanada (Kubera).

Verse 30

एतदेवंविध॑ चित्रमिह तात युधिष्िर । प्रेक्षन्ते सर्वभूतानि बहुश: पर्वसंधिषु

Wahai putra, Yudhiṣṭhira: di dunia ini, perubahan yang ganjil dan menakjubkan semacam ini tampak berulang kali. Pada ‘persimpangan parwa’ kehidupan—masa peralihan besar dan krisis—segala makhluk memandangnya seakan menyaksikan suatu pertunjukan.

Verse 31

तात युधिष्ठिर! इस प्रकार पर्वसंधिकालमें सब प्राणी यहाँ अनेक बार ऐसे-ऐसे अद्भुत दृश्योंका दर्शन करते हैं ।। भुज्जाना मुनिभोज्यानि रसवन्ति फलानि च । वसध्व॑ पाण्डवश्रेष्ठा यावदर्जुनदर्शनात्‌,श्रेष्ठ पाण्डवो! जबतक तुम्हारी अर्जुनसे भेंट न हो, तबतक मुनियोंके भोजन करनेयोग्य सरस फलोंका उपभोग करते हुए तुम सब लोग यहाँ (सानन्द) निवास करो

Wahai putra, Yudhiṣṭhira: demikianlah, pada masa ‘persimpangan parwa’, semua makhluk di sini berulang kali menyaksikan banyak pemandangan yang menakjubkan. Maka, wahai yang terbaik di antara para Pāṇḍava, nikmatilah buah-buah ranum yang layak bagi santapan para resi, dan tinggallah di sini dengan tenteram sampai engkau berjumpa kembali dengan Arjuna.

Verse 32

न तात चपलैर्भाव्यमिह प्राप्त: कथंचन । उषित्वेह यथाकामं यथाश्रद्ध॑ विहृत्य च | ततः शस्त्रजितां तात पृथिवीं पालयिष्यसि,तात! यहाँ आनेवाले लोगोंको किसी प्रकार चपल नहीं होना चाहिये। तुम यहाँ अपनी इच्छाके अनुसार रहकर और श्रद्धाके अनुसार घूम-फिरकर लौट जाओगे और श्त्रोंद्वारा जीती हुई पृथ्वीका पालन करोगे

Anakku, setelah engkau tiba di sini, janganlah sekali-kali bersikap gegabah atau berubah-ubah. Tinggallah di sini selama yang kau kehendaki, dan berkelanalah sesuai iman serta baktimu. Setelah itu engkau akan kembali dan memerintah bumi yang dimenangkan oleh senjata.

Verse 159

इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि आर्टिषेणयुधिष्ठटिरसंवादे एकोनषष्ट्यधिकशततमो<ध्याय

Demikianlah, dalam Mahābhārata yang suci, pada Vana Parva, dalam bagian Yakṣa-yuddha, pada dialog antara Ārtiṣeṇa dan Yudhiṣṭhira, berakhirlah bab ke-159 (ekonaṣaṣṭy-adhika-śatatama).

Frequently Asked Questions

Rather than a situational dispute, the chapter presents an orientation-problem: how a ruler-in-exile should stabilize judgment when external order is disrupted, by grounding conduct in enduring structures—directional order, time-cycles, and disciplined reverence.

Cosmic regularity functions as an ethical template: as the Sun sustains beings through continuous motion and measured transitions, human agency should emphasize steadiness, responsibility, and alignment with dharma across changing circumstances.

No explicit phalaśruti formula is stated here; the meta-function is implicit—understanding cosmology and kāla is presented as a contemplative aid that situates human action within a larger, accountable order.