Adhyaya 151
Vana ParvaAdhyaya 15154 Verses

Adhyaya 151

Kuberasaras-darśana (Bhīma beholds Kubera’s guarded lotus-lake) / कुबेरसरः-दर्शनम्

Upa-parva: Saugandhika-haraṇa Parva (Episode of the Saugandhika lotuses near Kubera’s lake)

Vaiśaṃpāyana describes Bhīmasena’s arrival at a beautiful nalinī (lotus-lake) on the pleasant heights of Kailāsa, near Kubera’s abode. The lake is portrayed with dense lotuses, golden-hued blossoms, jewel-like stalks, cool and clear water likened to nectar, and a sanctifying, wondrous quality. It is characterized as Kubera’s recreational domain, honored by devas and frequented by gandharvas and apsarases, as well as visited by ṛṣis and guarded under Vaiśravaṇa’s authority. Bhīma, delighted at the sight, approaches; the rākṣasa guardians—identified as Krodhavaśā, numerous and well-armed—observe him and raise alarm. They converge and interrogate him formally: noting his ascetic-like attire and weapons, they ask his identity and purpose, establishing the immediate thematic frame of access-control, authority, and declared intention in a protected realm.

Chapter Arc: कदलीवन के भीतर भीमसेन के वचन सुनकर हनुमान स्मित करते हैं—और अपने सागर-लङ्घन-कालीन तेज का संकेत देते हुए, भीम के सामने अपना अद्भुत रूप प्रकट करने को उद्यत होते हैं। → भ्रातृ-प्रियता से प्रेरित होकर हनुमान अपना शरीर आयाम-विस्तार में बढ़ाते जाते हैं; पर्वत-तुल्य महाकाय, ताम्र-नेत्र, तीक्ष्ण-दंष्ट्र, भृकुटि-वक्र मुख—और दीर्घ लाङ्गूल को घुमाते हुए दिशाओं को मानो घेर लेते हैं। भीम के भीतर बल-गर्व और विस्मय साथ-साथ उठते हैं। → हनुमान का विराट् रूप—‘द्वितीय इव पर्वतः’—भीम के सामने साक्षात् खड़ा हो जाता है; उसी क्षण बल का अहंकार तप-तेज के आगे झुकता है और भीम को अपने पराक्रम की सीमा का बोध होता है। → संवाद का स्वर उपदेश में ढलता है: राजधर्म के साधन—साम, दान, दण्ड, भेद; गुप्तचर, उत्तम बुद्धि, सुरक्षित मन्त्रणा; निग्रह-अनुग्रह और चातुर्य—इनका विधान बताया जाता है। राजा को योग्य को योग्य कर्म में नियुक्त करने और दण्ड-नीति को काम-द्वेष से रहित, अलुब्ध, अक्रोधी होकर चलाने की शिक्षा दी जाती है; क्षत्रिय का स्वर्ग-मार्ग ‘निग्रह-पालन’ और सम्यक् दण्ड-प्रणयन से जोड़ा जाता है। → हनुमान के उपदेश के बाद भीम के भीतर यह प्रश्न शेष रहता है कि आगामी संघर्ष में वह बल को धर्म-नीति के अधीन कैसे रखेगा—और तीर्थयात्रा का अगला चरण किस परीक्षा की ओर ले जाएगा।

Shlokas

Verse 1

हि आय न [हुक हि 7 2 - सत्ययुगके मनुष्य आदि प्राणियोंमें दोषोंका अभाव बतलाया है, उसका यह अभिप्राय समझना चाहिये कि अधिकांशमें उनमें इन दोषोंका अभाव था। पजञज्चाशर्दाधिकशततमोब् ध्याय: श्रीहनुमानजीके द्वारा भीमसेनको अपने विशाल रूपका प्रदर्शन और चारों वर्णोके धर्मोका प्रतिपादन भीमसेन उवाच पूर्वरूपमदृष्टवा ते न यास्यामि कथंचन । यदि ते5हमनुग्राह्मो दर्शयात्मानमात्मना,भीमसेनने कहा--कपिप्रवर! मैं आपका वह पूर्वरूप देखे बिना किसी प्रकार नहीं जाऊँगा। यदि मैं आपका कृपापात्र होऊँ, तो आप स्वयं ही अपने-आपको मेरे सामने प्रकट कर दीजिये

Bhīmasena berkata: “Wahai kera termulia! Tanpa melihat wujudmu yang dahulu, aku tidak akan pergi—bagaimanapun juga. Jika aku layak menerima anugerahmu, maka nyatakanlah dirimu kepadaku dengan kuasamu sendiri.”

Verse 2

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु भीमेन स्मितं कृत्वा प्लवंगम: । तद्‌ रूप॑ दर्शयामास यद्‌ वै सागरलड्घने,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीमसेनके ऐसा कहनेपर हनुमानजीने मुसकराकर उन्हें अपना वह रूप दिखाया, जो उन्होंने समुद्र-लंघनके समय धारण किया था

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya! Setelah Bhīma berkata demikian, Hanumān sang pahlawan kera tersenyum, lalu memperlihatkan kepadanya wujud yang sama seperti yang ia kenakan ketika melompati samudra.”

Verse 3

भ्रातु: प्रियमभीप्सन्‌ वै चकार सुमहद्‌ वपुः । देहस्तस्य ततो$तीव वर्धत्यायामविस्तरै:,उन्होंने अपने भाईका प्रिय करनेकी इच्छासे अत्यन्त विशाल शरीर धारण किया। उनका शरीर लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाईमें बहुत बड़ा हो गया। वे अमित तेजस्वी वानरवीर वृक्षोंसहित समूचे कदलीवनको आच्छादित करते हुए गन्धमादन पर्वतकी ऊँचाईको भी लाँघकर वहाँ खड़े हो गये

Waiśampāyana berkata: Demi menyenangkan saudaranya, ia mengambil wujud yang amat besar. Maka tubuhnya pun mengembang luar biasa dalam panjang dan lebar, melampaui ukuran.

Verse 4

सद्रुमं कदलीषण्डं छादयन्नमितद्युति: । गिरेश्लोच्छूयमाक्रम्य तस्थौ तत्र च वानर:,उन्होंने अपने भाईका प्रिय करनेकी इच्छासे अत्यन्त विशाल शरीर धारण किया। उनका शरीर लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाईमें बहुत बड़ा हो गया। वे अमित तेजस्वी वानरवीर वृक्षोंसहित समूचे कदलीवनको आच्छादित करते हुए गन्धमादन पर्वतकी ऊँचाईको भी लाँघकर वहाँ खड़े हो गये

Waiśampāyana berkata: Sang kera perkasa yang bercahaya tanpa batas menutupi seluruh rumpun pisang beserta pepohonannya. Melangkahi ketinggian gunung, ia pun berhenti berdiri di sana.

Verse 5

समुच्छितमहाकायो द्वितीय इव पर्वत: । ताम्रेक्षणस्तीक3्ष्णदंष्टो भूकुटीकुटिलानन:,उनका वह उन्नत विशाल शरीर दूसरे पर्वतके समान प्रतीत होता था। लाल आँखों तीखी दाढ़ों और टेढ़ी भौंहोंसे युक्त उनका मुख था

Waiśampāyana berkata: Ia berdiri dengan tubuh menjulang besar, laksana gunung kedua. Matanya merah tembaga, taringnya tajam, dan wajahnya garang oleh kerutan alis yang menegang.

Verse 6

दीर्घलाडरूलमाविध्य दिशो व्याप्य स्थित: कपि: । तद्‌ रूप॑ महदालक्ष्य भ्रातु: कौरवनन्दन:,वे वानरवीर अपनी विशाल पूँछको हिलाते हुए सम्पूर्ण दिशाओंको घेरकर खड़े थे। भाईके उस विराट्‌ रूपको देखकर कौरवनन्दन भीमको बड़ा आश्चर्य हुआ। उनके शरीरमें बार-बार हर्षसे रोमांच होने लगा। हनुमानजी तेजमें सूर्यके समान दिखायी देते थे। उनका शरीर सुवर्णमय मेरुपर्वतके समान था और उनकी प्रभासे सारा आकाशमण्डल प्रज्वलित- सा जान पड़ता था। उनकी ओर देखकर भीमसेनने दोनों आँखें बंद कर लीं। तब हनुमानजी उनसे मुसकराते हुए-से बोले---

Waiśampāyana berkata: Sang kera berdiri di sana sambil mengibaskan ekornya yang panjang, seakan memenuhi segala penjuru. Melihat wujud agung saudaranya itu, Bhīma—kebanggaan wangsa Kuru—tertegun oleh takjub.

Verse 7

विसिष्मिये तदा भीमो जहृषे च पुन: पुनः । तमर्कमिव तेजोभि: सौवर्णमिव पर्वतम्‌,वे वानरवीर अपनी विशाल पूँछको हिलाते हुए सम्पूर्ण दिशाओंको घेरकर खड़े थे। भाईके उस विराट्‌ रूपको देखकर कौरवनन्दन भीमको बड़ा आश्चर्य हुआ। उनके शरीरमें बार-बार हर्षसे रोमांच होने लगा। हनुमानजी तेजमें सूर्यके समान दिखायी देते थे। उनका शरीर सुवर्णमय मेरुपर्वतके समान था और उनकी प्रभासे सारा आकाशमण्डल प्रज्वलित- सा जान पड़ता था। उनकी ओर देखकर भीमसेनने दोनों आँखें बंद कर लीं। तब हनुमानजी उनसे मुसकराते हुए-से बोले---

Waiśampāyana berkata: Saat itu Bhīma tercengang, dan berulang kali hatinya meluap oleh sukacita. Ia memandang Hanumān bercahaya laksana matahari, dan berwujud laksana gunung emas.

Verse 8

प्रदीप्तमिव चाकाशं दृष्टवा भीमो न्यमीलयत्‌ । आबभाषे च हनुमान्‌ भीमसेनं स्मयन्निव,वे वानरवीर अपनी विशाल पूँछको हिलाते हुए सम्पूर्ण दिशाओंको घेरकर खड़े थे। भाईके उस विराट्‌ रूपको देखकर कौरवनन्दन भीमको बड़ा आश्चर्य हुआ। उनके शरीरमें बार-बार हर्षसे रोमांच होने लगा। हनुमानजी तेजमें सूर्यके समान दिखायी देते थे। उनका शरीर सुवर्णमय मेरुपर्वतके समान था और उनकी प्रभासे सारा आकाशमण्डल प्रज्वलित- सा जान पड़ता था। उनकी ओर देखकर भीमसेनने दोनों आँखें बंद कर लीं। तब हनुमानजी उनसे मुसकराते हुए-से बोले---

Melihat langit seakan menyala, Bhīma memejamkan mata. Lalu Hanumān, seolah tersenyum, menyapa Bhīmasena.

Verse 9

एतावदिह शक्तस्त्वं द्रष्ट रूप॑ं ममानघ । वर्धेडहं चाप्पतो भूयो यावन्मे मनसि स्थितम्‌ | भीमशशत्रुषु चात्यर्थ वर्धते मूर्तिरोजसा,“अनघ! तुम यहाँ मेरे इतने ही बड़े रूपको देख सकते हो, परंतु मैं इससे भी बड़ा हो सकता हूँ। मेरे मनमें जितने बड़े स्वरूपकी भावना होती है, उतना ही मैं बढ़ सकता हूँ। भयानक शशत्रुओंके समीप मेरी मूर्ति अत्यन्त ओजके साथ बढ़ती है”

Wahai yang tak bercela, di sini engkau hanya sanggup memandang bentukku sebesar ini. Namun aku dapat mengembang lebih jauh: sebesar apa pun wujud yang terbayang dalam benakku, sejauh itulah aku dapat bertumbuh. Dan ketika musuh-musuh yang mengerikan mendekat, wujud jasmaniku membesar luar biasa, sarat daya yang menggentarkan.

Verse 10

वैशम्पायन उवाच तदद्धुतं महारौद्रं विन्ध्यपर्वतसंनिभम्‌ । दृष्टवा हनूमतो वर्ष्म सम्भ्रान्त: पवनात्मज:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! हनुमानजीका वह विन्‍न्ध्य पर्वतके समान अत्यन्त भयंकर और अद्भुत शरीर देखकर वायुपुत्र भीमसेन घबरा गये। उनके शरीरमें रोंगटे खड़े होने लगे। उस समय उदार-हृदय भीमने हाथ जोड़कर अपने सामने खड़े हुए हनुमानूजीसे कहा--

Vaiśaṃpāyana berkata: Melihat tubuh Hanūmān—ajaib, amat mengerikan, dan laksana gunung Vindhya—putra Dewa Angin, Bhīma, terguncang oleh rasa takjub.

Verse 11

प्रत्युवाच ततो भीम: सम्प्रहृष्टतनूरुह: । कृताञ्जलिरदीनात्मा हनूमन्तमवस्थितम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! हनुमानजीका वह विन्‍न्ध्य पर्वतके समान अत्यन्त भयंकर और अद्भुत शरीर देखकर वायुपुत्र भीमसेन घबरा गये। उनके शरीरमें रोंगटे खड़े होने लगे। उस समय उदार-हृदय भीमने हाथ जोड़कर अपने सामने खड़े हुए हनुमानूजीसे कहा--

Lalu Bhīma menjawab. Tubuhnya bergetar oleh haru; dengan kedua telapak tangan dirangkapkan dan hati yang tak gentar, ia berbicara kepada Hanūmān yang berdiri di hadapannya.

Verse 12

दृष्ट प्रमाणं विपुलं शरीरस्यास्य ते विभो । संहरस्व महावीर्य स्वयमात्मानमात्मना,'प्रभो! आपके इस शरीरका विशाल प्रमाण प्रत्यक्ष देख लिया। महापराक्रमी वीर! अब आप स्वयं ही अपने शरीरको समेट लीजिये

Wahai Prabhu, aku telah menyaksikan langsung keluasan tubuhmu ini. Wahai pahlawan berdaya agung, kini tariklah kembali wujud itu—himpunlah dirimu ke dalam dirimu sendiri dengan kehendakmu.

Verse 13

न हि शव्नोमि त्वां द्रष्टं दिवाकरमिवोदितम्‌ । अप्रमेयमनाधृष्यं मैनाकमिव पर्वतम्‌,“आप तो सूर्यके समान उदित हो रहे हैं। मैं आपकी ओर देख नहीं सकता। आप अप्रमेय तथा दुर्धर्ष मैनाक पर्वतके समान खड़े हैं

Aku tak sanggup memandangmu—laksana matahari yang baru terbit. Engkau berdiri tak terukur dan tak tergoyahkan, bagaikan Gunung Maināka.

Verse 14

विस्मयश्चैव मे वीर सुमहान्‌ मनसोउद्य वै । यद्‌ रामस्त्वयि पार्श्रस्थे स्वयं रावणमभ्यगात्‌,“वीर! आज मेरे मनमें इस बातको लेकर बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि आपके निकट रहते हुए भी भगवान्‌ श्रीरामने स्वयं ही रावणका सामना किया

Wahai pahlawan, hari ini timbul keheranan besar dalam benakku: bahwa Rāma, meski engkau berdiri dekat di sisinya, tetap maju sendiri menghadapi Rāvaṇa.

Verse 15

त्वमेव शक्तस्तां लड़कां सयोधां सहवाहनाम्‌ | स्वबाहुबलमाश्रित्य विनाशयितुमज्जसा,“आप तो अकेले ही अपने बाहुबलका आश्रय लेकर योद्धाओं और वाहनोंसहित समूची लंकाको अनायास नष्ट कर सकते थे

Engkau seorang diri—bersandar pada kekuatan lenganmu sendiri—mampu dengan cepat membinasakan seluruh Laṅkā, beserta para ksatria dan kendaraan-kendaraan mereka.

Verse 16

नहि ते किंचिदप्राप्यं मारुतात्मज विद्यते | तव नैकस्य पर्याप्तो रावण: सगणो युधि,“मारुतनन्दन! आपके लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। समरभूमिमें अपने सैनिकोंसहित रावण अकेले आपका ही सामना करनेमें समर्थ नहीं था'

Wahai putra Dewa Angin, tiada sesuatu pun yang tak dapat kau capai. Di medan perang, Rāvaṇa—meski bersama seluruh pengikutnya—takkan cukup untuk menghadapi engkau seorang diri.

Verse 17

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु भीमेन हनूमान्‌ प्लवगोत्तम: । प्रत्युवाच ततो वाक्य स्निग्धगम्भीरया गिरा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीमके ऐसा कहनेपर कपिश्रेष्ठ हनुमानजीने स्नेहयुक्त गम्भीर वाणीमें इस प्रकार उत्तर दिया--

Vaiśampāyana berkata: Setelah Bhīma berkata demikian, Hanūmān—yang utama di antara para kera—lalu menjawab dengan tutur yang lembut namun dalam.

Verse 18

हनूमानुवाच एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत । भीमसेन न पर्याप्तो ममासौ राक्षसाधम:,हनुमानजी बोले--भारत! महाबाहु भीमसेन! तुम जैसा कहते हो, ठीक ही है। वह अधम राक्षस वास्तवमें मेरा सामना नहीं कर सकता था

Hanuman berkata: “Benar demikian, wahai Bhārata yang berlengan perkasa—sebagaimana engkau katakan, Bhīmasena. Rākṣasa hina itu sungguh bukan tandinganku.”

Verse 19

मया तु निहते तस्मिन्‌ रावणे लोककण्टके । कीर्तिनिश्येद्‌ राघवस्य तत एतदुपेक्षितम्‌,किंतु सम्पूर्ण लोकोंको काँटेके समान कष्ट देनेवाला रावण यदि मेरे ही हाथों मारा जाता, तो भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजीकी कीर्ति नष्ट हो जाती। इसीलिये मैंने उसकी उपेक्षा कर दी

“Namun, seandainya Rāvaṇa—duri bagi seluruh dunia—kubunuh dengan tanganku sendiri, kemasyhuran Rāghava (Śrī Rāma) akan pudar; karena itulah aku mengabaikannya.”

Verse 20

तेन वीरेण तं हत्वा सगणं राक्षसाधमम्‌ । आनीता स्वपुरं सीता कीर्तिश्वाख्यापिता नृूषु

Sang pahlawan membunuh rākṣasa paling hina itu beserta para pengikutnya, lalu membawa Sītā kembali ke kotanya sendiri; dan kemasyhurannya pun termasyhur di kalangan manusia.

Verse 21

वीरवर श्रीरामचन्द्रजी सेनासहित उस अधम राक्षसका वध करके सीताजीको अपनी अयोध्यापुरीमें ले आये। इससे मनुष्योंमें उनकी कीर्तिका भी विस्तार हुआ ।। तद्‌ गच्छ विपुलप्रज्ञ भ्रातु: प्रियहिते रत: । अरिष्ट क्षेममध्वानं वायुना परिरक्षित:,अच्छा, महाप्राज्ञ! अब तुम अपने भाईके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहकर वायुदेवतासे सुरक्षित हो क्लेशरहित मार्गसे कुशलपूर्वक जाओ

“Karena itu, wahai yang berakal luas, pergilah—teguh mengupayakan yang dicintai dan bermanfaat bagi saudaramu. Tempuhlah jalan yang aman dan sejahtera, dilindungi oleh Dewa Angin.”

Verse 22

एष पन्था: कुरुश्रेष्ठ सौगन्धिकवनाय ते । द्रक्ष्यससे धनदोद्यानं रक्षितं यक्षराक्षसै:,कुरुश्रेष्ठ! यह मार्ग सौगन्धिक वनको जाता है। इससे जानेपर तुम्हें कुबेरका बगीचा दिखायी देगा, जो यक्षों तथा राक्षसोंसे सुरक्षित है

“Wahai yang terbaik di antara para Kuru, inilah jalan yang membawamu ke hutan Saugaṇdhika. Melaluinya engkau akan melihat taman Dhanada (Kubera), yang dijaga oleh Yakṣa dan Rākṣasa.”

Verse 23

न च ते तरसा कार्य: कुसुमावचय: स्वयम्‌ । देवतानि हि मान्यानि पुरुषेण विशेषत:,वहाँ जाकर तुम जल्दीसे स्वयं ही उसके फूल न तोड़ने लगना। मनुष्योंको तो विशेषरूपसे देवताओंका सम्मान ही करना चाहिये

Di sana jangan bertindak tergesa-gesa dengan memetik bunga sendiri. Para dewa memang patut dihormati—terutama oleh manusia.

Verse 24

बलिहोमनमस्कारेैर्मन्त्रैक्ष भरतर्षभ । दैवतानि प्रसादं हि भक्‍त्या कुर्वन्ति भारत,भरतश्रेष्ठ! पूजा, होम, नमस्कार, मन्त्रजप तथा भक्तिभावसे देवता प्रसन्न होकर कृपा करते हैं

Vaiśampāyana berkata: “Wahai yang terbaik di antara Bharata, melalui persembahan, homa, penghormatan dengan sujud, dan japa mantra, para dewa menjadi berkenan; dan wahai Bhārata, karena bhakti-lah mereka menganugerahkan rahmat.”

Verse 25

मा तात साहसं कार्षी: स्वधर्मं परिपालय । स्वधर्मस्थ: परं धर्म बुध्यस्व गमयस्व च,तात! तुम दुःसाहस न कर बैठना, अपने धर्मका पालन करना, स्वधर्ममें स्थित रहकर तुम श्रेष्ठ धर्मको समझो और उसका पालन करो

Vaiśampāyana berkata: “Anakku, jangan bertindak nekat. Jagalah dan tegakkan svadharma-mu. Berdirilah teguh pada jalanmu sendiri, pahamilah dharma yang lebih tinggi—lalu laksanakanlah, anakku.”

Verse 26

न हि धर्ममविज्ञाय वृद्धाननुपसेव्य च । धर्मार्थी वेदितुं शक्यौ बृहस्पतिसमैरपि,क्योंकि धर्मको जाने बिना और वृद्ध पुरुषोंकी सेवा किये बिना बृहस्पति-जैसे विद्वानोंके लिये भी धर्म और अर्थके तत्त्वको समझना सम्भव नहीं है

Vaiśampāyana berkata: “Tanpa terlebih dahulu memahami dharma, dan tanpa melayani serta belajar dari para sesepuh, hakikat dharma dan artha tidak dapat dipahami—bahkan oleh cendekia setara Bṛhaspati.”

Verse 27

अधर्मो यत्र ध्माख्यो धर्मश्चाधर्मसंज्ञित: । स विज्ञेयो विभागेन यत्र मुहान्त्यबुद्धयः,कहीं अधर्म ही धर्म कहलाता है और कहीं धर्म भी अधर्म कहा जाता है। अतः धर्म और अधर्मके स्वरूपका पृथक्‌-पृथक्‌ ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। बुद्धिहीनलोग इसमें मोहित हो जाते हैं

Di tempat di mana adharma disebut sebagai dharma, dan dharma justru dinamai adharma, di sanalah harus dikenali dengan pembedaan yang jernih; sebab di sanalah orang-orang yang tak berakal menjadi bingung dan terperdaya.

Verse 28

आचारसम्भवो धर्मों धर्मे वेदा: प्रतिष्ठिता: । वेदैर्यज्ञा: समुत्पन्ना यज्जैर्देवा: प्रतिष्ठिता:,आचारसे धर्मकी उत्पत्ति होती है। धर्ममें वेदोंकी प्रतिष्ठा है। वेदोंसे यज्ञ प्रकट हुए हैं और यज्ञोंसे देवताओंकी स्थिति है

Waiśaṃpāyana berkata: Dharma lahir dari ācāra—laku yang benar. Di dalam dharma, Weda tegak bersemayam; dari Weda muncullah yajña, dan oleh yajña para dewa dipelihara serta tetap berdiri pada kedudukan yang telah ditetapkan. Demikianlah laku, pengetahuan suci, ritus, dan tatanan semesta terjalin sebagai satu rantai yang saling bergantung.

Verse 29

वेदाचारविधानोक्तिर्यज्नैर्धार्यन्ति देवता: । बृहस्पत्युशन:प्रोक्तैर्नयैर्धार्यन्ति मानवा:,वेदोक्त आचारके विधानसे बतलाये हुए यज्ञोंद्वारा देवतवाओंकी आजीविका चलती है और बृहस्पति तथा शुक्राचार्यकी कही हुई नीतियाँ मनुष्योंके जीवन-निर्वाहकी आधारभूमि हैं

Melalui yajña yang dilaksanakan menurut tata ācāra sebagaimana diajarkan Weda, para dewa ditopang dan dipelihara; sedangkan manusia ditopang oleh naya—kaidah kebijakan dan tata negara—yang diajarkan oleh Bṛhaspati dan Uśanas (Śukrācārya).

Verse 30

पण्याकरवणिज्याभि: कृष्यागोजाविपोषणै: । विद्यया धार्यते सर्व धर्मरेतैद्विजातिभि:,हाट-बाजार करना, कर (लगान या टैक्स) लेना, व्यापार, खेती, गोपालन, भेड़ और बकरोंका पोषण तथा विद्या पढ़ना-पढ़ाना--इन धर्मानुकूल वृत्तियोंद्वारा द्विजगण सम्पूर्ण जगतकी रक्षा करते हैं

Dengan kegiatan pasar, pemungutan pajak, perdagangan, pertanian, pemeliharaan sapi, pemeliharaan kambing dan domba, serta belajar-mengajar ilmu—melalui mata pencaharian yang selaras dengan dharma inilah para dvija yang berpegang pada dharma menopang dan melindungi seluruh dunia.

Verse 31

त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्तिस््रो विद्या विजानताम्‌ | ताभि: सम्यक्‌ प्रयुक्ताभिलोंकयात्रा विधीयते,वेदत्रयी, वार्ता (कृषि-वाणिज्य आदि) और दण्डनीति--ये तीन विद्याएँ हैं (इनमें वेदाध्ययन ब्राह्मणकी, वार्ता वैश्यकी और दण्डनीति क्षत्रियकी जीविकावृत्ति है)। विज्ञ पुरुषोंद्वारा इन वृत्तियोंका ठीक-ठीक प्रयोग होनेसे लोकयात्राका निर्वाह होता है

Waiśampāyana berkata: Tiga Weda, vārtā (penghidupan seperti pertanian dan perdagangan), dan daṇḍanīti (ilmu pemerintahan dan penegakan hukuman)—inilah tiga cabang pengetahuan menurut orang bijak. Bila diterapkan dengan tepat dan sewajarnya, perjalanan hidup dunia berlangsung dan tatanan masyarakat terpelihara.

Verse 32

सा चेद्‌ धर्मकृता न स्यात्‌ त्रयीधर्ममृते भुवि । दण्डनीतिमृते चापि निर्मर्यादमिदं भवेत्‌,यदि लोकमयात्रा धर्मपूर्वक न चलायी जाय, इस पृथ्वीपर वेदोक्त धर्मका पालन न हो और दण्डनीति भी उठा दी जाय तो यह सारा जगत्‌ मर्यादाहीन हो जाय

Waiśampāyana berkata: Jika perjalanan dunia tidak ditopang oleh dharma; jika di bumi ini tatanan dharma yang berlandaskan tiga Weda lenyap; dan bila daṇḍanīti—disiplin pemerintahan serta penegakan hukuman—juga disingkirkan, maka seluruh dunia akan menjadi tanpa batas, tanpa kendali, dan tanpa tata tertib.

Verse 33

वार्ताधर्मे ह्ुवर्तिन्यो विनश्येयुरिमा: प्रजा: । सुप्रवृत्तैस्त्रिभिह तिर्धर्म सूयन्ति वै प्रजा:,यदि यह प्रजा वार्ता-धर्म (कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य) में प्रवृत्त न हो तो नष्ट हो जायगी। इन तीनोंकी सम्यक प्रवृत्ति होनेसे प्रजा धर्मका सम्पादन करती है

Vaiśampāyana berkata: Jika rakyat ini tidak menekuni dharma penghidupan—pertanian, perlindungan ternak (sapi), dan perdagangan—mereka akan binasa. Namun bila ketiganya dijalankan dengan semestinya, rakyat sungguh menumbuhkan dan menegakkan dharma (tatanan sosial dan hidup benar).

Verse 34

द्विजातीनामृतं धर्मो होकश्चैवैकलक्षण: । यज्ञाध्ययनदानानि त्रयः साधारणा: स्मृता:,द्विजातियोंका मुख्य धर्म है सत्य (सत्य-भाषण, सत्य-व्यवहार, सद्भाव)। यह धर्मका एक प्रधान लक्षण है। यज्ञ, स्वाध्याय और दान--ये तीन धर्म द्विजमात्रके सामान्य धर्म माने गये हैं

Dharma utama kaum dwija adalah kebenaran—itulah tanda pokok dharma. Adapun yajña, swādhyāya (belajar/menelaah), dan dāna (derma)—tiga hal ini dikenang sebagai dharma yang umum bagi semua dwija.

Verse 35

याजनाध्यापन विदप्रे धर्मश्नैव प्रतिग्रह: । पालन क्षत्रियाणां वै वैश्यधर्मश्ष पोषणम्‌,यज्ञ कराना, वेद और शास्त्रोंको पढ़ाना तथा दान ग्रहण करना--यह ब्राह्मणका ही आजीविकाप्रधान धर्म है। प्रजा-पालन क्षत्रियोंका और पशु-पालन वैश्योंका धर्म है

Menyelenggarakan yajña bagi orang lain, mengajar Weda dan śāstra, serta menerima pemberian—itulah kewajiban brāhmaṇa yang bertumpu pada penghidupan. Melindungi dan memerintah rakyat adalah dharma kṣatriya; sedangkan menopang kehidupan bersama melalui pemeliharaan dan pemenuhan—terutama dengan merawat ternak dan sumber daya produktif—adalah dharma vaiśya.

Verse 36

शुश्रूषा च द्विजातीनां शूद्राणां धर्म उच्यते । भैक्ष्यहोमव्रतैहीनास्तथैव गुरुवासिता:,ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोकी सेवा करना शूद्रोंका धर्म बताया गया है। तीनों वर्णोंकी सेवामें रहनेवाले शूद्रोंके लिये भिक्षा, होम और व्रत मना है

Melayani dan memberi perhatian penuh kepada kaum dwija dinyatakan sebagai dharma kaum Śūdra. Bagi Śūdra yang hidup dalam pelayanan kepada tiga varṇa yang lebih tinggi, tidaklah diwajibkan laku bhikṣā (mengemis), homa (persembahan api), maupun vrata (kaul).

Verse 37

क्षत्रधर्मो5त्र कौन्तेय तव धर्मोउत्र रक्षणम्‌ | स्वधर्म प्रतिपद्यस्व विनीतो नियतेन्द्रिय:,कुन्तीनन्दन! सबकी रक्षा करना क्षत्रियका धर्म है, अतः तुम्हारा धर्म भी यही है। अपने धर्मका पालन करो। विनयशील बने रहो और इन्द्रियोंको वशमें रखो

Wahai putra Kuntī, di sini dharma seorang kṣatriya adalah perlindungan; maka dalam perkara ini pun dharmamu adalah menjaga dan melindungi. Tegakkanlah svadharma-mu. Tetaplah rendah hati dan berdisiplin, mengekang indria-indriamu.

Verse 38

वृद्ध: सम्मन्त्रय सद्धिश्व बुद्धिमद्धि: श्रुतान्वितै: । आस्थित: शास्ति दण्डेन व्यसनी परिभूयते,वेद-शास्त्रोंके विद्वान, बुद्धिमान्‌ तथा बड़े-बूढ़े श्रेष्ठ पुरुषोंस सलाह करके उनका कृपापात्र बना हुआ राजा ही दण्डनीतिके द्वारा शासन कर सकता है। जो राजा दुर्व्यसनोंमें आसक्त होता है, उसका पराभव हो जाता है

Waiśampāyana berkata: Setelah bermusyawarah dengan para sesepuh—orang-orang baik, bijaksana, dan berilmu—raja yang teguh berpegang pada tuntunan mereka dapat memerintah dengan nīti denda, yakni kebijakan hukuman dan pengekangan. Namun penguasa yang terjerat kebiasaan buruk yang merusak akan direndahkan dan ditimpa kekalahan.

Verse 39

निग्रहानुग्रहैः सम्यग्‌ यदा राजा प्रवर्तते । तदा भवन्ति लोकस्य मर्यादा: सुव्यवस्थिता:,जब राजा निग्रह और अनुग्रहके द्वारा प्रजावर्गके साथ यथोचित बर्ताव करता है, तभी लोककी सम्पूर्ण मर्यादाएँ सुरक्षित होती हैं

Waiśampāyana berkata: Ketika raja bertindak dengan tepat—mengekang pelanggaran dan menganugerahkan kemurahan pada yang patut—maka tatanan, batas-batas, dan norma masyarakat tetap teguh serta tertata baik.

Verse 40

तस्माद्‌ देशे च दुर्गे च शत्रुमित्रबलेषु च । नित्यं चारेण बोद्धव्यं स्थान वृद्धि: क्षयस्तथा,इसलिये राजाको उचित है कि वह देश और दुर्गमें अपने शत्रु और मित्रोंके सैनिकोंकी स्थिति, वृद्धि और क्षयका गुप्तचरोंद्वारा सदा पता लगाता रहे

Karena itu, raja patut senantiasa mengetahui—melalui para mata-mata—keadaan di negeri dan di benteng-benteng, serta posisi, pertumbuhan, dan kemunduran kekuatan pasukan musuh maupun kawan.

Verse 41

रज्ञामुपायश्चारश्न बुद्धिमन्त्रपराक्रमा: । निग्रहप्रग्रहौ चैव दाक्ष्यं वै कार्यसाधकम्‌

Waiśampāyana berkata: Bagi para raja, sarana keberhasilan ialah upāya (taktik), para mata-mata, musyawarah yang cerdas beserta keberanian, serta dua kemampuan: mengekang dan mendorong. Sungguh, kecakapan praktislah yang menuntaskan suatu urusan.

Verse 42

साम, दान, दण्ड, भेद--ये चार उपाय, गुप्तचर, उत्तम बुद्धि, सुरक्षित मन्त्रणा, पराक्रम, निग्रह, अनुग्रह और चतुरता--ये राजाओंके लिये कार्य-सिद्धिके साधन हैं ।। साम्ना दानेन भेदेन दण्डेनोपेक्षणेन च । साधनीयानि कर्माणि समासव्यासयोगत:,साम, दान, भेद, दण्ड और उपेक्षा--इन नीतियोंमेंसे एक-दोके द्वारा या सबके एक साथ प्रयोगद्वारा राजाओंको अपने कार्य सिद्ध करने चाहिये

Waiśampāyana berkata: Dengan sāma (pendekatan damai), dāna (pemberian), bheda (memecah-belah), daṇḍa (hukuman), dan juga upekṣā (mengabaikan secara strategis), seorang raja hendaknya menuntaskan perkara yang harus dituntaskan—menerapkannya sesuai keadaan: singkat atau lengkap, satu per satu, berpasangan, ataupun bersama-sama.

Verse 43

मन्त्रमूला नया: सर्वे चाराश्न भरतर्षभ । सुमन्त्रितेन या सिद्धिस्तां द्विजै:ः सह मन्त्रयेत्‌,भरतश्रेष्ठ! सारी नीतियों और गुप्तचरोंका मूल आधार है मन्त्रणाको गुप्त रखना। उत्तम मन्त्रणा या विचारसे जो सिद्धि प्राप्त होती है, उसके लिये द्विजोंके साथ गुप्त परामर्श करना चाहिये

Waiśampāyana berkata: “Wahai yang termulia di antara keturunan Bharata, segala kebijakan pemerintahan dan bahkan pekerjaan para mata-mata berakar pada musyawarah. Keberhasilan yang lahir dari pertimbangan yang matang hendaknya dikejar melalui perundingan rahasia bersama para brāhmaṇa yang berilmu.”

Verse 44

स्त्रिया मूढेन बालेन लुब्धेन लघुनापि वा । न मन्त्रयीत गुह्मानि येषु चोन्‍्मादलक्षणम्‌,स्त्री, मूर्ख, बालक, लोभी और नीच पुरुषोंके साथ तथा जिसमें उनन्‍्मादका लक्षण दिखायी दे, उसके साथ भी गुप्त परामर्श न करे

Dengan perempuan, orang bodoh, anak kecil, orang tamak, atau orang hina—dan juga dengan siapa pun yang tampak bergejala gila—janganlah bermusyawarah tentang rahasia.

Verse 45

मन्त्रयेत्‌ सह विद्वद्धिः शक्तै: कर्माणि कारयेत्‌ । स्निग्धैश्व नीतिविन्यासान्‌ मूर्खान्‌ सर्वत्र वर्जयेत्‌,विद्वानोंके साथ ही गुप्त मन्त्रणा करनी चाहिये। जो शक्तिशाली हों, उन्हींसे कार्य कराने चाहिये। जो स्नेही (सुहृद) हों उन्हींके द्वारा नीतिके प्रयोगका काम कराना चाहिये। मूर्खोको तो सभी कार्योसे अलग रखना चाहिये

Musyawarah rahasia hendaknya dilakukan hanya bersama orang-orang berilmu. Pekerjaan hendaknya dilaksanakan oleh mereka yang mampu dan kuat. Penerapan kebijakan dan siasat patut dipercayakan kepada sekutu yang setia dan penuh kasih. Adapun orang bodoh, hendaknya dijauhkan dari setiap usaha.

Verse 46

धार्मिकान्‌ धर्मकार्येषु अर्थकार्येषु पण्डितान्‌ । सत्रीषु क्लीबान्‌ नियुज्जीत क्रूरान्‌ क्रूरेषु कर्मसु,राजाको चाहिये कि वह धर्मके कार्योमें धार्मिक पुरुषोंको, अर्थसम्बन्धी कार्योमें अर्थशास्त्रके पण्डितोंको, स्त्रियोंकी देख-भालके लिये नपुंसकोंको और कठोर कार्याँमें क्रूर स्वभावके मनुष्योंको लगावे

Seorang raja hendaknya menugaskan orang-orang saleh pada urusan dharma, para cendekia pada urusan harta dan tata kelola, kaum kebiri untuk pengawasan lingkungan perempuan di istana, dan orang yang berwatak keras untuk tugas-tugas yang keras.

Verse 47

स्वेभ्यश्चैव परेभ्यश्व कार्याकार्यसमुद्धवा । बुद्धि: कर्मसु विज्ञेया रिपूणां च बलाबलम्‌,बहुत-से कार्योंकी आरम्भ करते समय अपने तथा शत्रुपक्षके लोगोंसे भी यह सलाह लेनी चाहिये कि अमुक काम करनेयोग्य है या नहीं। साथ ही, शत्रुकी प्रबलता और दुर्बलताको भी जाननेका प्रयत्न करना चाहिये

Pada awal memulai banyak usaha, hendaknya seseorang meminta pertimbangan baik dari pihak sendiri maupun bahkan dari pihak lawan: apakah suatu tindakan patut dilakukan atau tidak. Bersamaan dengan itu, ia juga harus berupaya memahami kekuatan dan kelemahan musuh.

Verse 48

बुद्धया स्वप्रतिपन्नेषु कुर्यात्‌ साधुष्वनुग्रहम्‌ । निग्रहं चाप्यशिष्टेषु निर्मर्यादेषु कारयेत्‌,बुद्धिसे सोच-विचारकर अपनी शरणमें आये हुए श्रेष्ठ कर्म करनेवाले पुरुषोंपर अनुग्रह करना चाहिये और मर्यादा भंग करनेवाले दुष्ट पुरुषोंको दण्ड देना चाहिये

Dengan kebijaksanaan, hendaknya raja melimpahkan anugerah kepada orang-orang saleh yang datang berlindung; dan terhadap mereka yang tak beradab, durjana, serta melanggar batas tata susila, hendaknya ia menegakkan pengekangan dan hukuman.

Verse 49

निग्रहे प्रग्रहे सम्यग्‌ यदा राजा प्रवर्तते । तदा भवति लोकस्य मर्यादा सुव्यवस्थिता,जब राजा निग्रह और अनुग्रहमें ठीक तौरसे प्रवृत्त होता है, तभी लोककी मर्यादा सुरक्षित रहती है

Ketika raja bertindak tepat—mengetahui kapan mengekang dan kapan menganugerahi—saat itulah batas-batas dharma dan tatanan masyarakat tetap tegak dan tertata baik.

Verse 50

एष ते5भिहित: पार्थ घोरो धर्मो दुरन्वय: । त॑ स्वधर्मविभागेन विनयस्थोडनुपालय,कुन्तीनन्दन! यह मैंने तुम्हें कठोर राज्य-धर्मका उपदेश दिया है। इसके मर्मको समझना अत्यन्त कठिन है। तुम अपने धर्मके विभागानुसार विनीतभावसे इसका पालन करो

Wahai Pārtha, demikian telah kujelaskan kepadamu dharma kerajaan yang menggetarkan ini—sukar dipahami dan sukar pula diterapkan. Maka, wahai putra Kuntī, dengan rendah hati, tegakkanlah ia menurut pembagian kewajibanmu sendiri.

Verse 51

तपोधर्मदमेज्याभिरविप्रा यान्ति यथा दिवम्‌ | दानातिथ्यक्रियाधर्मर्यान्ति वैश्याश्व सद्गतिम्‌

Dengan tapa, perilaku dharma, pengendalian diri, dan pemujaan melalui yajña, mereka yang bukan brāhmaṇa pun mencapai surga. Dan dengan sedekah, memuliakan tamu, serta menjalankan kewajiban yang ditetapkan, para vaiśya pun meraih keadaan yang baik dan mulia.

Verse 52

क्षत्र याति तथा स्वर्ग भुवि निग्रहपालनै: । सम्यक्‌ प्रणीतदण्डा हि कामद्वेषविवर्जिता: । अलुब्धा विगतक्रोधा: सतां यान्ति सलोकताम्‌

Demikian pula, seorang kṣatriya mencapai surga dengan menegakkan pengekangan dan perlindungan di bumi. Sebab mereka yang menjatuhkan hukuman dengan benar—bebas dari nafsu dan kebencian, tanpa ketamakan, dan tanpa amarah—mencapai dunia para insan bajik.

Verse 149

इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कदलीवनके भीतर हनुमानजी और भीमसेनका संवादविषयक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-149 dari Vana Parva dalam Śrī Mahābhārata, pada episode ziarah suci Lomasa: kisah dialog antara Hanumān dan Bhīmasena di dalam hutan Kadali. Dengan kolofon ini, bagian tersebut dinyatakan selesai.

Verse 150

जैसे तपस्या, धर्म, इन्द्रिय-संयम और यज्ञानुष्ठानके द्वारा ब्राह्मण उत्तम लोकमें जाते हैं तथा जिस प्रकार वैश्य दान और आतिथ्यरूप धर्मोसे उत्तम गति प्राप्त कर लेते हैं, उसी प्रकार इस लोकमें निग्रह और अनुग्रहके यथोचित प्रयोगसे क्षत्रिय स्वर्गलोकमें जाता है। जिनके द्वारा दण्डनीतिका उचित रीतिसे प्रयोग किया जाता है, जो राग-द्वेषसे रहित, लोभशून्य तथा क्रोधहीन हैं; वे क्षत्रिय सत्पुरुषोंको प्राप्त होनेवाले लोकोंमें जाते हैं ।। इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां हनुमद्धीमसेनसंवादे पज्चाशदधिकशततमो<ध्याय:

Vaiśampāyana berkata: Sebagaimana para brāhmaṇa mencapai alam tertinggi melalui tapa, dharma, pengendalian indria, dan pelaksanaan yajña yang semestinya; dan sebagaimana para vaiśya meraih tujuan mulia melalui dana serta dharma keramahtamahan; demikian pula seorang kṣatriya mencapai surga di dunia ini dengan menerapkan, secara tepat, baik pengekangan maupun anugerah. Mereka yang menjalankan dandanīti (tata hukuman dan pemerintahan) dengan benar—bebas dari keterikatan dan kebencian, tanpa keserakahan, dan tanpa amarah—kṣatriya semacam itu pergi ke alam yang dicapai para satpuruṣa (orang-orang luhur).

Frequently Asked Questions

The implicit dilemma concerns approaching a guarded, sovereign-controlled sacred resource: personal desire or initiative must be reconciled with the moral requirement of permission, identification, and respect for custodial authority.

The passage models procedural ethics: before action in contested or protected spaces, one should disclose identity, clarify purpose, and recognize jurisdiction—reducing conflict through transparent inquiry.

No explicit phalaśruti appears in these verses; the chapter’s function is primarily narrative staging and ethical framing, preparing subsequent developments rather than offering a stated merit formula.