
Cyavana’s Tapas, Sukanyā’s Curiosity, and Śaryāti’s Appeasement (च्यवन-सुकन्या-उपाख्यान आरम्भ)
Upa-parva: Cyavana–Sukanyā Upākhyāna (Episode within Āraṇyaka-parva)
Lomāśa introduces Cyavana, son of Bhṛgu, engaged in severe tapas near a lake. Over time he becomes motionless, covered by vines and enclosed within a vāl mīka (anthill), like an earthen mound, yet continues austerities. King Śaryāti arrives at the lake for recreation with a vast retinue and his daughter Sukanyā. While wandering with companions, Sukanyā approaches the anthill; noticing two luminous points (Cyavana’s eyes), she impulsively pierces them with a thorn out of curiosity and confusion. Cyavana, angered, responds by afflicting Śaryāti’s camp with a bodily blockage (cessation of excretion/urination), causing collective distress. Śaryāti investigates, questions his soldiers and associates, and receives no admission until Sukanyā confesses her act. The king rushes to the anthill, finds the aged ascetic, and petitions forgiveness, framing the act as ignorance by a young girl. Cyavana stipulates a condition for pardon: he will forgive if Śaryāti gives Sukanyā to him in marriage. Śaryāti consents; Cyavana is appeased; the king returns with his retinue. Sukanyā thereafter is depicted as exemplary in service—attending to her husband, fires, and guests with disciplined devotion.
Chapter Arc: लोमश ऋषि युधिष्ठिर को च्यवन-ऋषि की अद्भुत तपस्या सुनाते हैं—जो वीरस्थाने स्थाणु-सा अचल खड़े रहे और काल के प्रवाह में वल्मीकि से ढँक गए। → एकान्त वन में वल्मीकि-आवृत च्यवन को देखकर शर्याति की पुत्री सुकन्या कौतूहलवश उनके भीतर चमकते ‘खद्योत’ समान नेत्रों को काँटे से बेध देती है; ऋषि के अपमान से तपोबल का क्रोध जागता है और राजा-परिवार पर संकट छा जाता है। → अपराध का पता चलने पर शर्याति भयभीत होकर वल्मीकि तक पहुँचता है; सुकन्या का अज्ञानजन्य कृत्य ऋषि-कोप का कारण बनता है और राजा को क्षमा-याचना तथा प्रायश्चित्त का मार्ग चुनना पड़ता है। → राजा सत्य स्वीकार कर विनय करता है; सुकन्या को च्यवन की सेवा-परायणता हेतु समर्पित किया जाता है—वह अनसूया होकर अग्नियों, अतिथियों और ऋषि की शुश्रूषा से शीघ्र ही उन्हें प्रसन्न करती है। → सुकन्या की सेवा से च्यवन का अनुग्रह तो प्राप्त होता है, पर आगे यह संबंध और ऋषि-वरदान/परिणाम राजवंश के भाग्य को किस दिशा में मोड़ेंगे—यह प्रश्न शेष रहता है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं) 2.3 अपर () है ० ३. यूपके ऊपरका गोलाकार काष्ठ। २. यूप--यज्ञस्तम्भ। 3. चमस--सोमपानका पात्र। ४. बटलोई। ५. पकी-पकायी रखनेका सामग्री-पात्र। ६. हविष्य अर्पण करनेका उपकरण। ७. घृत आदिकी आहुति डालनेका साधन। द्वाविशर्त्याधेकशततमो< ध्याय: महर्षि च्यवनको सुकन्याकी प्राप्ति लोगश उवाच भगोर्महर्षे: पुत्रो5 भूच्च्यवनो नाम भारत | समीपे सरसस्तस्य तपस्तेपे महाद्युति:,लोमशजी कहते हैं--युधिष्ठिर! महर्षि भृगुके पुत्र च्यवन मुनि हुए, जो महान् तेजस्वी थे। उन्होंने उस सरोवरके समीप तपस्या आरम्भ की। पाण्डुनन्दन! परम तेजस्वी महात्मा च्यवन वीरासनसे बैठकर ढूँठे काठके समान जान पड़ते थे। राजन्! वे एक ही स्थानपर दीर्घकालतक अविचलभावसे बैठे रहे
Lomāśa berkata: “Wahai Bhārata (Yudhiṣṭhira), ada seorang resi bernama Cyavana, putra maharsi Bhṛgu. Berkilau oleh kemuliaan tapa, ia memulai pertapaan yang berat di dekat sebuah danau.”
Verse 2
स्थाणुभूतो महातेजा वीरस्थानेन पाण्डव । अतिष्ठत चिरं कालमेकदेशे विशाम्पते,लोमशजी कहते हैं--युधिष्ठिर! महर्षि भृगुके पुत्र च्यवन मुनि हुए, जो महान् तेजस्वी थे। उन्होंने उस सरोवरके समीप तपस्या आरम्भ की। पाण्डुनन्दन! परम तेजस्वी महात्मा च्यवन वीरासनसे बैठकर ढूँठे काठके समान जान पड़ते थे। राजन्! वे एक ही स्थानपर दीर्घकालतक अविचलभावसे बैठे रहे
Wahai Pāṇḍava, sang pertapa agung itu duduk dalam vīrāsana, laksana tunggul yang tak bergerak. Wahai penguasa rakyat, ia bertahan lama sekali, tak bergeser, di satu tempat.
Verse 3
स वल्मीको5भवदृषिर्लताभिरिव संवृतः । कालेन महता राजन् समाकीर्ण: पिपीलिकै:,धीरे-धीरे अधिक समय बीतनेपर उनका शरीर चींटियोंसे व्याप्त हो गया। वे महर्षि लताओंसे आच्छादित हो गये और बाँबीके समान प्रतीत होने लगे
Wahai Raja, seiring waktu yang panjang, sang resi tertutup laksana oleh sulur-sulur, menjadi seperti gundukan sarang semut; dan tubuhnya pun dipenuhi semut-semut.
Verse 4
तथा स संवृतो धीमान् मृत्पिण्ड इव सर्वश: । तप्यते सम तपो घोरं वल्मीकेन समावृत:,इस प्रकार लता-वेलोंसे आच्छादित हो बुद्धिमान् च्यवन मुनि सब ओरसे केवल मिट्टीके लोंदेके समान जान पड़ने लगे। दीमकोंद्वारा जमा की हुई मिट्टीके ढेरसे ढके हुए वे बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे
Demikian tertutup, sang resi yang bijak tampak sepenuhnya seperti segumpal tanah. Meski terbungkus gundukan sarang semut, ia tetap menanggung tapa yang dahsyat tanpa goyah.
Verse 5
अथ दीर्घस्य कालस्य शर्यातिर्नाम पार्थिव: | आजगाम सरो रम्यं विहर्तुमिदमुत्तमम्,इस प्रकार दीर्घकाल व्यतीत होनेपर राजा शर्याति इस उत्तम एवं रमणीय सरोवरके तटपर विहारके लिये आये
Setelah waktu yang panjang berlalu, raja bernama Śaryāti datang ke danau yang unggul dan elok ini untuk berpesiar dan menikmati rekreasi.
Verse 6
तस्य स्त्रीणां सहस््राणि चत्वार्यासन् परिग्रहे । एकैव च सुता सुभ्रू: सुकन्या नाम भारत,युधिष्ठिर! उनके अन्तःपुरमें चार हजार स्त्रियाँ थीं, परंतु संतानके नामपर केवल एक ही सुन्दरी पुत्री थी, जिसका नाम सुकन्या था
Wahai Bhārata, wahai Yudhiṣṭhira, ia memiliki empat ribu perempuan dalam istananya; namun dalam hal keturunan, hanya ada seorang putri saja—gadis beralis elok bernama Sukanyā.
Verse 7
सा सर्खीभि: परिवृता दिव्याभरणभूषिता । चंक्रम्पमाणा वल्मीकं भार्गवस्य समासदत्,वह कन्या दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सखियोंसे घिरी हुई वनमें इधर-उधर घूमने लगी। घूमती-घामती वह भृगुनन्दन च्यवनकी बाँबीके पास जा पहुँची
Gadis itu, dikelilingi para sahabatnya dan berhias perhiasan bak surgawi, berjalan-jalan di hutan hingga mendekati gundukan semut milik resi Bhārgava, Cyavana.
Verse 8
सा वै वसुमतीं तत्र पश्यन्ती सुमनोरमाम् । वनस्पतीन् विचिन्वन्ती विजहार सखीवृता,वहाँकी भूमि उसे बड़ी मनोहर दिखायी दी। वह सखियोंके साथ वृक्षोंके फल-फूल तोड़ती हुई चारों ओर घूमने लगी
Di sana ia memandang bumi begitu elok dan menawan; dikelilingi para sahabatnya, ia bersenang-senang sambil memetik bunga dan buah dari pepohonan hutan.
Verse 9
रूपेण वयसा चैव मदनेन मदेन च । बभज्ज वनवृक्षाणां शाखा: परमपुष्पिता:,सुन्दर रूप, नयी अवस्था, कामभावके उदय और यौवनके मदसे प्रेरित हो सुकन्याने उत्तम फूलोंसे भरी हुई वन-वृक्षोंकी बहुत-सी शाखाएँ तोड़ लीं। वह सखियोंका साथ छोड़कर अकेली टहलने लगी। उस समय उसके शरीरपर एक ही वस्त्र था और वह भाँति- भाँतिके अलंकारोंसे अलंकृत थी। बुद्धिमान् च्यवन मुनिने उसे देखा। वह चमकती हुई विद्युतके समान चारों ओर विचर रही थी
Didorong oleh kecantikan dan usia mudanya—oleh bangkitnya hasrat dan mabuk keangkuhan remaja—Sukanyā mematahkan banyak dahan pepohonan hutan yang sarat bunga.
Verse 10
तां सखीरहितामेकामेकवस्त्रामलंकृताम् । ददर्श भार्गवो धीमांश्वरन्तीमिव विद्युतम्,सुन्दर रूप, नयी अवस्था, कामभावके उदय और यौवनके मदसे प्रेरित हो सुकन्याने उत्तम फूलोंसे भरी हुई वन-वृक्षोंकी बहुत-सी शाखाएँ तोड़ लीं। वह सखियोंका साथ छोड़कर अकेली टहलने लगी। उस समय उसके शरीरपर एक ही वस्त्र था और वह भाँति- भाँतिके अलंकारोंसे अलंकृत थी। बुद्धिमान् च्यवन मुनिने उसे देखा। वह चमकती हुई विद्युतके समान चारों ओर विचर रही थी
Terpisah dari para sahabatnya, berjalan seorang diri, hanya berbalut sehelai kain dan berhias aneka perhiasan—demikianlah ia terlihat oleh Bhārgava Cyavana yang bijaksana; ia bergerak ke sana kemari laksana kilat yang menyambar-nyambar.
Verse 11
तां पश्यमानो विजने स रेमे परमद्युति: । क्षामकण्ठश्न विप्रर्षिस्तपोबलसमन्वित:,उसे एकान्तमें देखकर परम कान्तिमानू, तपोबल-सम्पन्न एवं दुर्बल कण्ठवाले ब्रह्मर्षि च्यवनको बड़ी प्रसन्नता हुई
Melihatnya di tempat sunyi, sang resi yang bercahaya luhur merasa bersukacita. Walau tenggorokannya lemah dan menipis oleh tapa, brahmarṣi itu dipenuhi kekuatan yang lahir dari askese; maka hatinya pun berseri.
Verse 12
तामाबभाषे कल्याणीं सा चास्य न शृणोति वै । ततः: सुकन्या वल्मीके दृष्टवा भार्गवचक्षुषी,उन्होंने उस कल्याणमयी राजकन्याको पुकारा; परंतु वह (त्रह्मर्षिका कण्ठ दुर्बल होनेके कारण) उनकी आवाज नहीं सुनती थी। उस बाँबीमें मुनिवर च्यवनकी चमकती हुई आँखोंको देखकर उसे बहुत कौतूहल हुआ। उसकी बुद्धिपर मोह छा गया और उसने विवश होकर यह कहती हुई कि “देखूँ यह क्या है?” एक काँटेसे उन्हें छेद दिया। उसके द्वारा आँखें बिंध जानेके कारण परम क्रोधी ब्रह्मर्षि च्यवन अत्यन्त कुपित हो उठे। फिर तो उन्होंने शर्यातिकी सेनाके मल-मूत्र बंद कर दिये। मल-मूत्रका द्वार बंद हो जानेसे मलावरोधके कारण सारी सेनाको बहुत दुःख होने लगा। सैनिकोंकी ऐसी अवस्था देखकर राजाने सबसे पूछा--“यहाँ नित्य-निरन्तर तपस्यामें संलग्न रहनेवाले वयोवृद्ध महामना च्यवन रहते हैं। वे स्वभावतः बड़े क्रोधी हैं। उनका जानकर या बिना जाने आज किसने अपकार किया है? जिन लोगोंने भी ब्रह्मर्षिका अपराध किया हो, वे तुरंत सब कुछ बता दें, विलम्ब न करें।' ५ 080 तब सम्पूर्ण सैनिकोंने उनसे कहा--“महाराज! हम नहीं जानते कि किसके द्वारा उनका अपराध हुआ है?
Ia memanggil sang putri yang berbudi, namun ia sama sekali tidak mendengar suaranya. Lalu Sukanyā melihat di dalam gundukan semut sepasang mata Bhārgava yang berkilau.
Verse 13
कौतूहलात् कण्टकेन बुद्धिमोहबलात्कृता । कि नु खल्विदमित्युक्त्वा निर्बिभेदास्य लोचने,उन्होंने उस कल्याणमयी राजकन्याको पुकारा; परंतु वह (त्रह्मर्षिका कण्ठ दुर्बल होनेके कारण) उनकी आवाज नहीं सुनती थी। उस बाँबीमें मुनिवर च्यवनकी चमकती हुई आँखोंको देखकर उसे बहुत कौतूहल हुआ। उसकी बुद्धिपर मोह छा गया और उसने विवश होकर यह कहती हुई कि “देखूँ यह क्या है?” एक काँटेसे उन्हें छेद दिया। उसके द्वारा आँखें बिंध जानेके कारण परम क्रोधी ब्रह्मर्षि च्यवन अत्यन्त कुपित हो उठे। फिर तो उन्होंने शर्यातिकी सेनाके मल-मूत्र बंद कर दिये। मल-मूत्रका द्वार बंद हो जानेसे मलावरोधके कारण सारी सेनाको बहुत दुःख होने लगा। सैनिकोंकी ऐसी अवस्था देखकर राजाने सबसे पूछा--“यहाँ नित्य-निरन्तर तपस्यामें संलग्न रहनेवाले वयोवृद्ध महामना च्यवन रहते हैं। वे स्वभावतः बड़े क्रोधी हैं। उनका जानकर या बिना जाने आज किसने अपकार किया है? जिन लोगोंने भी ब्रह्मर्षिका अपराध किया हो, वे तुरंत सब कुछ बता दें, विलम्ब न करें।' ५ 080 तब सम्पूर्ण सैनिकोंने उनसे कहा--“महाराज! हम नहीं जानते कि किसके द्वारा उनका अपराध हुआ है?
Karena rasa ingin tahu, dan didorong oleh daya delusi yang mengaburkan nalar, ia berkata, “Apakah ini?” lalu menusuk mata sang resi dengan duri.
Verse 14
अक्रुध्यत् स तया विद्धे नेत्रे परममन्युमान् । ततः शर्यातिसैन्यस्य शकृन्मूत्रे समावृणोत्,उन्होंने उस कल्याणमयी राजकन्याको पुकारा; परंतु वह (त्रह्मर्षिका कण्ठ दुर्बल होनेके कारण) उनकी आवाज नहीं सुनती थी। उस बाँबीमें मुनिवर च्यवनकी चमकती हुई आँखोंको देखकर उसे बहुत कौतूहल हुआ। उसकी बुद्धिपर मोह छा गया और उसने विवश होकर यह कहती हुई कि “देखूँ यह क्या है?” एक काँटेसे उन्हें छेद दिया। उसके द्वारा आँखें बिंध जानेके कारण परम क्रोधी ब्रह्मर्षि च्यवन अत्यन्त कुपित हो उठे। फिर तो उन्होंने शर्यातिकी सेनाके मल-मूत्र बंद कर दिये। मल-मूत्रका द्वार बंद हो जानेसे मलावरोधके कारण सारी सेनाको बहुत दुःख होने लगा। सैनिकोंकी ऐसी अवस्था देखकर राजाने सबसे पूछा--“यहाँ नित्य-निरन्तर तपस्यामें संलग्न रहनेवाले वयोवृद्ध महामना च्यवन रहते हैं। वे स्वभावतः बड़े क्रोधी हैं। उनका जानकर या बिना जाने आज किसने अपकार किया है? जिन लोगोंने भी ब्रह्मर्षिका अपराध किया हो, वे तुरंत सब कुछ बता दें, विलम्ब न करें।' ५ 080 तब सम्पूर्ण सैनिकोंने उनसे कहा--“महाराज! हम नहीं जानते कि किसके द्वारा उनका अपराध हुआ है?
Ketika matanya tertusuk olehnya, sang resi yang amat pemarah menyala dalam murka; lalu ia menutup jalan buang air besar dan kecil bagi bala tentara Raja Śaryāti.
Verse 15
ततो रुद्धे शकन्मूत्रे सैन्यमानाहदु:खितम् । तथागतमभ्िप्रेक्ष्य पर्यपृच्छत् स पार्थिव:,उन्होंने उस कल्याणमयी राजकन्याको पुकारा; परंतु वह (त्रह्मर्षिका कण्ठ दुर्बल होनेके कारण) उनकी आवाज नहीं सुनती थी। उस बाँबीमें मुनिवर च्यवनकी चमकती हुई आँखोंको देखकर उसे बहुत कौतूहल हुआ। उसकी बुद्धिपर मोह छा गया और उसने विवश होकर यह कहती हुई कि “देखूँ यह क्या है?” एक काँटेसे उन्हें छेद दिया। उसके द्वारा आँखें बिंध जानेके कारण परम क्रोधी ब्रह्मर्षि च्यवन अत्यन्त कुपित हो उठे। फिर तो उन्होंने शर्यातिकी सेनाके मल-मूत्र बंद कर दिये। मल-मूत्रका द्वार बंद हो जानेसे मलावरोधके कारण सारी सेनाको बहुत दुःख होने लगा। सैनिकोंकी ऐसी अवस्था देखकर राजाने सबसे पूछा--“यहाँ नित्य-निरन्तर तपस्यामें संलग्न रहनेवाले वयोवृद्ध महामना च्यवन रहते हैं। वे स्वभावतः बड़े क्रोधी हैं। उनका जानकर या बिना जाने आज किसने अपकार किया है? जिन लोगोंने भी ब्रह्मर्षिका अपराध किया हो, वे तुरंत सब कुछ बता दें, विलम्ब न करें।' ५ 080 तब सम्पूर्ण सैनिकोंने उनसे कहा--“महाराज! हम नहीं जानते कि किसके द्वारा उनका अपराध हुआ है?
Ketika jalan keluarnya kotoran dan air seni terhalang, seluruh bala tentara menjadi gelisah dan tersiksa. Melihat mereka jatuh dalam keadaan demikian, sang raja menanyai mereka untuk mengetahui sebab malapetaka itu—seakan telah terjadi suatu pelanggaran terhadap seorang pertapa.
Verse 16
तपोनित्यस्य वृद्धस्य रोषणस्य विशेषत: । केनापकृतमग्येह भार्गवस्य महात्मन:,उन्होंने उस कल्याणमयी राजकन्याको पुकारा; परंतु वह (त्रह्मर्षिका कण्ठ दुर्बल होनेके कारण) उनकी आवाज नहीं सुनती थी। उस बाँबीमें मुनिवर च्यवनकी चमकती हुई आँखोंको देखकर उसे बहुत कौतूहल हुआ। उसकी बुद्धिपर मोह छा गया और उसने विवश होकर यह कहती हुई कि “देखूँ यह क्या है?” एक काँटेसे उन्हें छेद दिया। उसके द्वारा आँखें बिंध जानेके कारण परम क्रोधी ब्रह्मर्षि च्यवन अत्यन्त कुपित हो उठे। फिर तो उन्होंने शर्यातिकी सेनाके मल-मूत्र बंद कर दिये। मल-मूत्रका द्वार बंद हो जानेसे मलावरोधके कारण सारी सेनाको बहुत दुःख होने लगा। सैनिकोंकी ऐसी अवस्था देखकर राजाने सबसे पूछा--“यहाँ नित्य-निरन्तर तपस्यामें संलग्न रहनेवाले वयोवृद्ध महामना च्यवन रहते हैं। वे स्वभावतः बड़े क्रोधी हैं। उनका जानकर या बिना जाने आज किसने अपकार किया है? जिन लोगोंने भी ब्रह्मर्षिका अपराध किया हो, वे तुरंत सब कुछ बता दें, विलम्ब न करें।' ५ 080 तब सम्पूर्ण सैनिकोंने उनसे कहा--“महाराज! हम नहीं जानते कि किसके द्वारा उनका अपराध हुआ है?
Lomaśa berkata, “Di sini bersemayam sang Bhārgava agung (Cyavana)—tua, senantiasa teguh dalam tapa, dan terutama cepat tersulut amarah. Siapakah hari ini yang telah menyakitinya, baik dengan sengaja maupun tanpa sengaja?”
Verse 17
ज्ञातं वा यदि वज्ञातं तद् द्रुतं ब्रूत मा चिरम् । तमूचु: सैनिका: सर्वे न विद्योड5पकृतं वयम्,उन्होंने उस कल्याणमयी राजकन्याको पुकारा; परंतु वह (त्रह्मर्षिका कण्ठ दुर्बल होनेके कारण) उनकी आवाज नहीं सुनती थी। उस बाँबीमें मुनिवर च्यवनकी चमकती हुई आँखोंको देखकर उसे बहुत कौतूहल हुआ। उसकी बुद्धिपर मोह छा गया और उसने विवश होकर यह कहती हुई कि “देखूँ यह क्या है?” एक काँटेसे उन्हें छेद दिया। उसके द्वारा आँखें बिंध जानेके कारण परम क्रोधी ब्रह्मर्षि च्यवन अत्यन्त कुपित हो उठे। फिर तो उन्होंने शर्यातिकी सेनाके मल-मूत्र बंद कर दिये। मल-मूत्रका द्वार बंद हो जानेसे मलावरोधके कारण सारी सेनाको बहुत दुःख होने लगा। सैनिकोंकी ऐसी अवस्था देखकर राजाने सबसे पूछा--“यहाँ नित्य-निरन्तर तपस्यामें संलग्न रहनेवाले वयोवृद्ध महामना च्यवन रहते हैं। वे स्वभावतः बड़े क्रोधी हैं। उनका जानकर या बिना जाने आज किसने अपकार किया है? जिन लोगोंने भी ब्रह्मर्षिका अपराध किया हो, वे तुरंत सब कुछ बता दें, विलम्ब न करें।' ५ 080 तब सम्पूर्ण सैनिकोंने उनसे कहा--“महाराज! हम नहीं जानते कि किसके द्वारा उनका अपराध हुआ है?
“Entah dilakukan dengan sengaja atau tidak, katakan segera—jangan menunda.” Maka semua prajurit menjawab, “Wahai Raja, kami tidak tahu; kami tidak melakukan pelanggaran apa pun.”
Verse 18
सर्वोपायैर्यथाकामं भवांस्तदधिगच्छतु । ततः स पृथिवीपाल: साम्ना चोग्रेण च स्वयम्,“आप अपनी रुचिके अनुसार सभी उपायोंद्वारा इसका पता लगावें।” तब राजा शर्यातिने साम और उग्रनीतिके द्वारा सभी सुहृदोंसे पूछा; परंतु वे भी इसका पता न लगा सके। तदनन्तर सुकन्याने सारी सेनाको मलावरोधके कारण दुःखसे पीड़ित और पिताको भी चिन्तित देख इस प्रकार कहा--“तात! मैंने इस वनमें घूमते समय एक बाँबीके भीतर कोई चमकीली वस्तु देखी, जो जुगनूके समान जान पड़ती थी। उसके निकट जाकर मैंने उसे काँटेसे बींध दिया।” यह सुनकर शर्याति तुरंत ही बाँबीके पास गये। वहाँ उन्होंने तपस्यामें बढ़े-चढ़े वयोवृद्ध महात्मा च्यवनको देखा और हाथ जोड़कर अपने सैनिकोंका कष्ट निवारण करनेके लिये याचना की--
“Wahai Paduka, dengan cara apa pun yang Paduka anggap tepat, temukanlah kebenaran perkara ini.” Maka sang raja, pelindung bumi, sendiri melakukan penyelidikan—dengan bujukan yang menenangkan maupun tindakan yang tegas. Namun sebabnya belum tersingkap hingga rangkaian peristiwa kemudian menuntunnya kepada pertapa Cyavana.
Verse 19
पर्यपृच्छत् सुद्ृद्वर्ग पर्यजानन्न चैव ते । आनाहार्त ततो दृष्टवा तत्सैन्यमसुखार्दितम्,“आप अपनी रुचिके अनुसार सभी उपायोंद्वारा इसका पता लगावें।” तब राजा शर्यातिने साम और उग्रनीतिके द्वारा सभी सुहृदोंसे पूछा; परंतु वे भी इसका पता न लगा सके। तदनन्तर सुकन्याने सारी सेनाको मलावरोधके कारण दुःखसे पीड़ित और पिताको भी चिन्तित देख इस प्रकार कहा--“तात! मैंने इस वनमें घूमते समय एक बाँबीके भीतर कोई चमकीली वस्तु देखी, जो जुगनूके समान जान पड़ती थी। उसके निकट जाकर मैंने उसे काँटेसे बींध दिया।” यह सुनकर शर्याति तुरंत ही बाँबीके पास गये। वहाँ उन्होंने तपस्यामें बढ़े-चढ़े वयोवृद्ध महात्मा च्यवनको देखा और हाथ जोड़कर अपने सैनिकोंका कष्ट निवारण करनेके लिये याचना की--
Sang raja berulang kali menanyai lingkaran sahabat setia dan para pengiringnya, namun mereka pun tidak mengetahui sebabnya. Lalu, ketika ia melihat seluruh bala tentara tersiksa karena tak mampu makan, beban itu menekan dirinya sebagai kewajiban seorang raja untuk menemukan kebenaran dan meringankan derita rakyatnya.
Verse 20
पितरं दुःखितं दृष्टवा सुकन्येदमथाब्रवीत् । मयावन्त्येह वल्मीके दृष्टं सत्व्मभिज्वलत्,“आप अपनी रुचिके अनुसार सभी उपायोंद्वारा इसका पता लगावें।” तब राजा शर्यातिने साम और उग्रनीतिके द्वारा सभी सुहृदोंसे पूछा; परंतु वे भी इसका पता न लगा सके। तदनन्तर सुकन्याने सारी सेनाको मलावरोधके कारण दुःखसे पीड़ित और पिताको भी चिन्तित देख इस प्रकार कहा--“तात! मैंने इस वनमें घूमते समय एक बाँबीके भीतर कोई चमकीली वस्तु देखी, जो जुगनूके समान जान पड़ती थी। उसके निकट जाकर मैंने उसे काँटेसे बींध दिया।” यह सुनकर शर्याति तुरंत ही बाँबीके पास गये। वहाँ उन्होंने तपस्यामें बढ़े-चढ़े वयोवृद्ध महात्मा च्यवनको देखा और हाथ जोड़कर अपने सैनिकोंका कष्ट निवारण करनेके लिये याचना की--
Melihat ayahnya diliputi duka, Sukanyā berkata: “Wahai Ayah, ketika aku berjalan-jalan di hutan ini, aku melihat di dalam sebuah gundukan semut sesuatu yang hidup dan berkilau terang. Kukira itu makhluk kecil bercahaya seperti kunang-kunang; aku mendekat dan, tanpa mengetahui, menusuknya dengan duri.”
Verse 21
खद्योतवदभिज्ञातं तनन््मया विद्धमन्तिकात् । एतच्छुत्वा तु वल्मीकं शर्यातिस्तूर्णम भ्ययात्,“आप अपनी रुचिके अनुसार सभी उपायोंद्वारा इसका पता लगावें।” तब राजा शर्यातिने साम और उग्रनीतिके द्वारा सभी सुहृदोंसे पूछा; परंतु वे भी इसका पता न लगा सके। तदनन्तर सुकन्याने सारी सेनाको मलावरोधके कारण दुःखसे पीड़ित और पिताको भी चिन्तित देख इस प्रकार कहा--“तात! मैंने इस वनमें घूमते समय एक बाँबीके भीतर कोई चमकीली वस्तु देखी, जो जुगनूके समान जान पड़ती थी। उसके निकट जाकर मैंने उसे काँटेसे बींध दिया।” यह सुनकर शर्याति तुरंत ही बाँबीके पास गये। वहाँ उन्होंने तपस्यामें बढ़े-चढ़े वयोवृद्ध महात्मा च्यवनको देखा और हाथ जोड़कर अपने सैनिकोंका कष्ट निवारण करनेके लिये याचना की--
Sukanyā berkata, “Aku mengiranya berkilau seperti kunang-kunang, lalu dari dekat kutusuk.” Mendengar itu, Raja Śaryāti segera bergegas menuju gundukan semut itu.
Verse 22
तत्रापश्यत् तपोवृद्धं वयोवृद्धं च भार्गवम् । अयाचदथ सैन्यार्थ प्राउ्जलि: पृथिवीपति:,“आप अपनी रुचिके अनुसार सभी उपायोंद्वारा इसका पता लगावें।” तब राजा शर्यातिने साम और उग्रनीतिके द्वारा सभी सुहृदोंसे पूछा; परंतु वे भी इसका पता न लगा सके। तदनन्तर सुकन्याने सारी सेनाको मलावरोधके कारण दुःखसे पीड़ित और पिताको भी चिन्तित देख इस प्रकार कहा--“तात! मैंने इस वनमें घूमते समय एक बाँबीके भीतर कोई चमकीली वस्तु देखी, जो जुगनूके समान जान पड़ती थी। उसके निकट जाकर मैंने उसे काँटेसे बींध दिया।” यह सुनकर शर्याति तुरंत ही बाँबीके पास गये। वहाँ उन्होंने तपस्यामें बढ़े-चढ़े वयोवृद्ध महात्मा च्यवनको देखा और हाथ जोड़कर अपने सैनिकोंका कष्ट निवारण करनेके लिये याचना की--
Di sana sang raja melihat resi Bhārgava yang telah lanjut baik dalam tapa maupun usia. Lalu, sang penguasa bumi, dengan tangan terkatup, memohon demi keselamatan bala tentaranya.
Verse 23
अज्ञानाद् बालया यत् ते कृतं तत् क्षन्तुमरहसि । ततोअब्रवीन्महीपालं च्यवनो भार्गवस्तदा,“भगवन्! मेरी बालिकाने अज्ञानवश जो आपका अपराध किया है, उसे आप कृपापूर्वक क्षमा करें।” उनके ऐसा कहनेपर भृगुनन्दन च्यवनने राजासे कहा--“राजन्! तुम्हारी इस पुत्रीने अहंकारवश अपमानपूर्वक मेरी आँखें फोड़ी हैं, अत: रूप और उदारता आदि गुणोंसे युक्त तथा लोभ और मोहके वशीभूत हुई तुम्हारी इस कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त करके ही मैं इसका अपराध क्षमा कर सकता हूँ। भूपाल! यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ
Lomaśa berkata, “Wahai Bhagavan, ampunilah apa yang dilakukan putriku yang masih belia karena ketidaktahuan.” Lalu resi Bhārgava, Cyavana, berkata kepada sang raja: “Wahai Raja, putrimu—didorong kesombongan—telah menghina dan melukai mataku. Karena itu, aku hanya akan mengampuni pelanggaran ini bila aku menerima dia sebagai istriku: ia yang berhias rupa dan keluhuran budi, namun dapat terseret oleh daya nafsu dan delusi. Wahai penguasa, inilah kebenaran yang kukatakan.”
Verse 24
अपमानादहं विद्धो हानया दर्पपूर्णया । रूपौदार्यसमायुक्तां लोभमोहबलात्कृताम्,“भगवन्! मेरी बालिकाने अज्ञानवश जो आपका अपराध किया है, उसे आप कृपापूर्वक क्षमा करें।” उनके ऐसा कहनेपर भृगुनन्दन च्यवनने राजासे कहा--“राजन्! तुम्हारी इस पुत्रीने अहंकारवश अपमानपूर्वक मेरी आँखें फोड़ी हैं, अत: रूप और उदारता आदि गुणोंसे युक्त तथा लोभ और मोहके वशीभूत हुई तुम्हारी इस कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त करके ही मैं इसका अपराध क्षमा कर सकता हूँ। भूपाल! यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ
Gadis yang dipenuhi keangkuhan ini telah melukaiku dengan penghinaan. Meski berhias rupa dan keluhuran budi, ia melakukan perbuatan ini di bawah daya ketamakan dan delusi. Karena itu, wahai Raja, aku hanya akan mengampuni bila putrimu menjadi istriku; wahai penguasa, inilah kebenaran.
Verse 25
तामेव प्रतिगृह्माहं राजन् दुहितरं तव । क्षंस्यामीति महीपाल सत्यमेतद् ब्रवीमि ते,“भगवन्! मेरी बालिकाने अज्ञानवश जो आपका अपराध किया है, उसे आप कृपापूर्वक क्षमा करें।” उनके ऐसा कहनेपर भृगुनन्दन च्यवनने राजासे कहा--“राजन्! तुम्हारी इस पुत्रीने अहंकारवश अपमानपूर्वक मेरी आँखें फोड़ी हैं, अत: रूप और उदारता आदि गुणोंसे युक्त तथा लोभ और मोहके वशीभूत हुई तुम्हारी इस कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त करके ही मैं इसका अपराध क्षमा कर सकता हूँ। भूपाल! यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ
Wahai Raja, hanya putrimu yang itu jugalah yang akan kuterima; barulah aku akan mengampuni. Wahai pelindung bumi, inilah kebenaran yang kukatakan kepadamu.
Verse 26
लोगमश उवाच ऋषेवचनमाज्ञाय शर्यातिरविचारयन् | ददौ दुहितरं तस्मै च्यवनाय महात्मने,लोमशजी कहते हैं--च्यवन ऋषिका यह वचन सुनकर राजा शर्यातिने बिना कुछ विचार किये ही महात्मा च्यवनको अपनी पुत्री दे दी
Lomaśa berkata: Setelah memahami ucapan sang ṛṣi, Raja Śaryāti—tanpa pertimbangan lebih jauh—memberikan putrinya kepada Mahātmā Cyavana.
Verse 27
प्रतिगृह्य च तां कन््यां भगवान् प्रससाद ह । प्राप्पप्रसादो राजा वै ससैन्य: पुरमाव्रजत्,उस राजकन्याको पाकर भगवान् च्यवन मुनि प्रसन्न हो गये। तत्पश्चात् उनका कृपाप्रसाद प्राप्त करके राजा शर्याति सेनासहित सकुशल अपनी राजधानीको लौट आये
Setelah menerima gadis itu, sang Bhagavān Cyavana pun berkenan. Raja, setelah memperoleh anugerahnya, kembali ke ibu kota bersama bala tentaranya.
Verse 28
सुकन्यापि पतिं लब्ध्वा तपस्विनमनिन्दिता । नित्यं पर्यचरत् प्रीत्या तपसा नियमेन च,सुकन्या भी तपस्वी च्यवनको पतिरूपमें पाकर प्रतिदिन प्रेमपूर्वकत तप और नियमका पालन करती हुई उनकी परिचर्या करने लगी
Sukanyā pun—tak bercela—setelah memperoleh sang pertapa Cyavana sebagai suami, setiap hari melayaninya dengan kasih, teguh dalam tapa dan pengendalian diri.
Verse 29
अग्नीनामतिथीनां च शुश्रूषुरनसूयिका । समाराधयत क्षिप्रं च्यवनं सा शुभानना,सुमुखी सुकन्या किसीके गुणोंमें दोष नहीं देखती थी। वह त्रिविध अग्नियों और अतिथियोंकी सेवामें तत्पर हो शीघ्र ही महर्षि च्यवनकी आराधनामें लग गयी
Sukanyā yang berwajah elok, tanpa iri dan tanpa mencari-cari cela, tekun melayani api suci dan memuliakan para tamu; demikianlah ia segera memuja dan menyenangkan Cyavana.
Verse 122
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये द्वाविंशत्यधिकशततमो<ध्याय:
Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata pada Vana Parva, khususnya bagian Tīrtha-yātrā, dalam kisah ziarah suci Lomāśa, berakhirlah adhyāya ke-122 yang berkaitan dengan episode Sukanyā.
Verse 129
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशती र्थयात्राके प्रसंगमें युकन्योपाख्यानविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata pada Vana Parva, di bagian Tīrtha-yātrā, dalam konteks ziarah suci Lomāśa, berakhirlah adhyāya ke-121 yang membahas episode Yukan(y)ā.
How a ruler should respond when harm is caused unintentionally by someone under his protection—balancing truthful disclosure, public welfare, and a negotiated remedy with an offended ascetic authority.
Austerity and restraint are treated as socially consequential forces; therefore, curiosity without discernment can cause injury, and restoration requires confession, responsibility, and proportionate restitution.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as a narrative exemplum within Lomāśa’s instruction, illustrating the ethical logic of harm, appeasement, and restored order.