
Duḥṣantasya Vana-praveśaḥ (King Duḥṣanta’s Entry into the Forest Hunt)
Upa-parva: Duḥṣanta–Śakuntalā Upākhyāna (Ādi Parva episode)
Vaiśaṃpāyana narrates Duḥṣanta’s departure on a hunt with extensive cavalry and elephants, surrounded by armed warriors bearing swords, spears, clubs, maces, and lances. The movement is marked by martial acoustics—lion-roars of soldiers, conches and drums, chariot-wheel resonance, elephant trumpeting, and the mixed sounds of neighing and shouted signals—creating a public spectacle of royal force. Women positioned on palace rooftops observe and praise the king as an enemy-subduing, Indra-like figure, showering flowers as a sign of approval and auspiciousness. Praised by Brahmins and followed by townspeople for a distance, Duḥṣanta proceeds in a bird-like (Suparṇa-comparable) chariot, filling earth and sky with sound. He reaches a forest described as Nandana-like yet harsh: uneven, rocky, expansive, waterless, and uninhabited, populated by formidable animal groups. The king and his retinue range through it, hunting diverse game; he kills tigers and other animals with arrows at distance and with sword at close range, also employing spear and mace techniques. The forest’s fauna scatter; thirsty, exhausted animals collapse near a dry riverbed, while some are consumed by hungry predators and forest-dwellers who kindle fire and cook meat. Wounded, panicked elephants trample many men. The chapter closes with an image of the forest “covered” by the king’s force like a storm-cloud with a shower of arrows, its large beasts felled—an emphatic portrayal of kṣātra dominance within a liminal wilderness setting.
Chapter Arc: पौरवनन्दन राजा उपरिचर वसु—इन्द्र के उपदेश से रमणीय चेदिदेश का राज्य ग्रहण कर—धर्म-प्रतिष्ठा और राजधर्म की नई रीति का प्रवर्तन करता है। → राजा वसु का वैराग्य-प्रवृत्त आश्रम-वास और तपोनिधि-से जीवन देखकर शक्रपुरोग देवगण भी उसे उपासना देने आते हैं; वहीं से राजसत्ता, तपस्या और देव-आज्ञा के बीच सूक्ष्म तनाव उभरता है। आगे कथा सत्यवती तक मुड़ती है—उसके जीवन में लोक-लज्जा, देह-गन्ध और भविष्य के महापुरुषों की छाया एक साथ घिरने लगती है। → सत्यवती महर्षि से वर मांगती है—‘गात्रसौगन्ध्यमुत्तमम्’—और उसे मनोवांछित वरदान मिलता है; कुहरे/माया-रचना से परिवेश अन्धकार-सा हो उठता है और तपस्विनी कन्या विस्मित व लज्जित होती है, मानो भाग्य स्वयं उसके चारों ओर आवरण बुन रहा हो। → वरदान के फलस्वरूप सत्यवती ‘योजनगन्धा’ नाम से प्रसिद्ध होती है; उसके जीवन में नारीत्व के समागमोचित गुणों का उदय होता है और वंश-परम्परा की धारा (व्यासादि प्रमुख पात्रों की भूमिका) के लिए भूमि तैयार हो जाती है। साथ ही राजा वसु द्वारा आरम्भ की गई राज-रीति—श्रेष्ठ राजाओं द्वारा यष्टि-प्रवेश की परम्परा—स्थापित होकर ‘तबसे आजतक’ चलती बताई जाती है। → कथा आगे कुरुवंश के महाविग्रह की ओर संकेत करती है—अपरिमेय राजाओं की सेनाएँ जुटेंगी, जिनके नाम भी असंख्य हैं—और श्रोताओं को आने वाले महासमर की विराटता का पूर्वाभास देकर छोड़ देती है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ११३ श्लोक मिलाकर कुल ६४ ३ “लोक हैं) जा >> हु नाग त्रेषष्टितमोड्ध्याय: राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्न्मकथा वैशम्पायन उवाच राजोपरिचरो नाम धर्मनित्यो महीपति: । बभूव मृगयां गन्तुं सदा किल धृतव्रत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पहले उपरिचर नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो नित्य-निरन्तर धर्ममें ही लगे रहते थे। साथ ही सदा हिंसक पशुओंके शिकारके लिये वनमें जानेका उनका नियम था
Vaiśampāyana berkata: Dahulu ada seorang raja bernama Uparicara, penguasa yang senantiasa teguh dalam dharma. Namun demikian, dikisahkan bahwa ia pun memegang kebiasaan yang kukuh: selalu pergi berburu (mṛgayā).
Verse 2
स चेदिविषयं रम्यं वसु: पौरवनन्दन: । इन्द्रोपदेशाज्जग्राह रमणीयं महीपति:,पौरवनन्दन राजा उपरिचर वसुने इन्द्रके कहनेसे अत्यन्त रमणीय चेदिदेशका राज्य स्वीकार किया था
Vasu, kebanggaan wangsa Paurava, menerima kerajaan Cedi yang elok—sebuah negeri yang amat menawan—atas nasihat Indra.
Verse 3
तमाश्रमे न्यस्तशस्त्र निवसन्तं तपोनिधिम् । देवा: शक्रपुरोगा वै राजानमुपतस्थिरे,एक समयकी बात है, राजा वसु अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग करके आश्रममें निवास करने लगे। उन्होंने बड़ा भारी तप किया, जिससे वे तपोनिधि माने जाने लगे। उस समय इन्द्र आदि देवता यह सोचकर कि यह राजा तपसयाके द्वारा इन्द्रपद प्राप्त करना चाहता है, उनके समीप गये। देवताओंने राजाको प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्हें शान्तिपूर्वक समझाया और तपस्यासे निवृत्त कर दिया
Pada suatu masa, sang raja (Vasu) meletakkan senjata, tinggal di pertapaan, dan menjadi laksana gudang tapa. Maka para dewa, dengan Śakra (Indra) di depan, mendatangi raja itu.
Verse 4
इन्द्रत्वमहों राजायं तपसेत्यनुचिन्त्य वै । त॑ सान्त्वेन नृपं साक्षात् तपस: संन्यवर्तयन्,एक समयकी बात है, राजा वसु अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग करके आश्रममें निवास करने लगे। उन्होंने बड़ा भारी तप किया, जिससे वे तपोनिधि माने जाने लगे। उस समय इन्द्र आदि देवता यह सोचकर कि यह राजा तपसयाके द्वारा इन्द्रपद प्राप्त करना चाहता है, उनके समीप गये। देवताओंने राजाको प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्हें शान्तिपूर्वक समझाया और तपस्यासे निवृत्त कर दिया
Sambil berpikir, “Ah! Raja ini menghendaki kedaulatan Indra melalui tapa,” para dewa menampakkan diri dan dengan bujukan yang lembut menarik sang penguasa kembali dari pertapaannya yang keras.
Verse 5
देवा ऊचु: न संकीर्येत धर्मो5यं पृथिव्यां पृथिवीपते । त्वया हि धर्मो विधृतः कृत्स्नं धारयते जगत्,देवता बोले--पृथ्वीपते! तुम्हें ऐसी चेष्टा रखनी चाहिये जिससे इस भूमिपर वर्णसंकरता न फैलने पावे (तुम्हारे न रहनेसे अराजकता फैलनेका भय है, जिससे प्रजा स्वधर्ममें स्थित नहीं रह सकेगी। अतः तुम्हें तपस्या न करके इस वसुधाका संरक्षण करना चाहिये)। राजन! तुम्हारे द्वारा सुरक्षित धर्म ही सम्पूर्ण जगत्को धारण कर रहा है
Para dewa berkata: “Wahai penguasa bumi, jagalah agar dharma ini tidak menjadi kacau di muka bumi. Sebab dharma yang engkau tegakkanlah yang menopang seluruh jagat.”
Verse 6
इन्द्र वाच लोके धर्म पालय त्वं नित्ययुक्तः समाहित: । धर्मयुक्तस्ततो लोकान् पुण्यान् प्राप्स्यसि शाश्वतान्,इन्द्रने कहा--राजन्! तुम इस लोकमें सदा सावधान और प्रयत्नशील रहकर धर्मका पालन करो। धर्मयुक्त रहनेपर तुम सनातन पुण्यलोकोंको प्राप्त कर सकोगे
Indra berkata: “Di dunia ini, tegakkanlah dharma—senantiasa berdisiplin dan berhati teguh. Bila engkau selaras dengan dharma, engkau akan mencapai alam-alam kebajikan yang kekal.”
Verse 7
दिविष्ठस्य भुविष्ठस्त्वं सखाभूतो मम प्रिय: । रम्य: पृथिव्यां यो देशस्तमावस नराधिप,यद्यपि मैं स्वर्गमें रहता हूँ और तुम भूमिपर; तथापि आजसे तुम मेरे प्रिय सखा हो गये। नरेश्वर! इस पृथ्वीपर जो सबसे सुन्दर एवं रमणीय देश हो, उसीमें तुम निवास करो
Vaiśampāyana berkata: “Walau aku berdiam di surga dan engkau di bumi, mulai hari ini engkau menjadi sahabatku yang terkasih. Wahai raja manusia, tinggallah di wilayah bumi yang paling indah dan menenteramkan.”
Verse 8
पशव्यश्रैव पुण्यश्च प्रभूतधनधान्यवान् । स्वारक्ष्यश्चैव सौम्यश्न भोग्यैर्भूमिगुणैर्युत:
Vaiśampāyana berkata: Ia kaya akan ternak dan juga berbudi luhur; ia memiliki harta dan gandum berlimpah. Ia mampu melindungi kerajaannya sendiri, berwatak lembut, serta dianugerahi kenikmatan dan keunggulan alamiah tanah itu—sumber daya yang patut dinikmati dengan benar dan dijaga.
Verse 9
अर्थवानेष देशो हि धनरत्नादिभिय्युत: । वसुपूर्णा च वसुधा वस चेदिषु चेदिप
Vaiśampāyana berkata: “Wilayah ini sungguh makmur, dipenuhi harta, permata, dan sebagainya. Tanah di sini pun sarat kekayaan; maka, wahai raja Cedi, tinggallah di tengah bangsa Cedi.”
Verse 10
धर्मशीला जनपदा: सुसंतोषाश्न साधव: । न च मिथ्याप्रलापो>त्र स्वैरेष्वपि कुतोडन्यथा
Waiśampāyana berkata: “Rakyat negeri itu teguh dalam dharma—puas hati dan berbudi. Di sana tiada ucapan dusta atau senda-gurau yang sia-sia; bahkan dalam perkara yang diserahkan pada pilihan sendiri pun, bagaimana mungkin ada penyimpangan dari yang benar?”
Verse 11
न च पित्रा विभज्यन्ते पुत्रा गुरुहिते रता: । युज्जते धुरि नो गाश्न कृशान् संधुक्षयन्ति च
Waiśampāyana berkata: “Putra-putra yang mengabdi demi kesejahteraan guru tidak dipisah-pisahkan atau dibeda-bedakan bahkan oleh ayahnya. Mereka layak dipasang pada palang kuk untuk bekerja; mereka tidak gentar pada jerih payah, bahkan menyalakan api—siap melayani tugas apa pun yang diperlukan.”
Verse 12
सर्वे वर्णा: स्वधर्मस्था: सदा चेदिषु मानद । न ते>स्त्यविदितं किंचित् त्रिषु लोकेषु यद् भवेत्
Waiśampāyana berkata: “Wahai pemberi kehormatan, bila semua varṇa di Cedi senantiasa teguh pada dharma masing-masing, maka tiada sesuatu pun di tiga dunia yang dapat tetap tersembunyi darimu.”
Verse 13
इस समय चेदिदेश पशुओंके लिये हितकर, पुण्यजनक, प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न, स्वर्गके समान सुखद होनेके कारण रक्षणीय, सौम्य तथा भोग्य पदार्थों और भूमिसम्बन्धी उत्तम गुणोंसे युक्त है। यह देश अनेक पदार्थोंसे युक्त और धन-रत्न आदिसे सम्पन्न है। यहाँकी वसुधा वास्तवमें वसु (धन-सम्पत्ति)-से भरी-पूरी है। अतः तुम चेदिदेशके पालक होकर उसीमें निवास करो। यहाँके जनपद धर्मशील, संतोषी और साधु हैं। यहाँ हास- परिहासमें भी कोई झूठ नहीं बोलता, फिर अन्य अवसरोंपर तो बोल ही कैसे सकता है। पुत्र सदा गुरुजनोंके हितमें लगे रहते हैं, पिता अपने जीते-जी उनका बाँटवारा नहीं करते। यहाँके लोग बैलोंको भार ढोनेमें नहीं लगाते और दीनों एवं अनाथोंका पोषण करते हैं। मानद! चेदिदेशमें सब वर्णोंके लोग सदा अपने-अपने धर्ममें स्थित रहते हैं। तीनों लोकोंमें जो कोई घटना होगी, वह सब यहाँ रहते हुए भी तुमसे छिपी न रहेगी--तुम सर्वज्ञ बने रहोगे || ८-- १२ || देवोपभोग्यं दिव्यं त्वामाकाशे स्फाटिक॑ महत् । आकाशांगं त्वां मद्दत्तं विमानमुपपत्स्यते,जो देवताओंके उपभोगमें आने योग्य है, ऐसा स्फटिक मणिका बना हुआ एक दिव्य, आकाशचारी एवं विशाल विमान मैंने तुम्हें भेंट किया है। वह आकाशमें तुम्हारी सेवाके लिये सदा उपस्थित रहेगा
Waiśampāyana berkata: “Pada masa itu negeri Cedi baik bagi ternak, mendatangkan kebajikan, kaya akan harta dan gandum, serta menyenangkan laksana surga—maka patut dijaga. Negeri itu lembut perangainya, penuh bahan kenikmatan dan keunggulan tanahnya. Ia berlimpah aneka hasil, makmur oleh harta dan permata; buminya sungguh sarat ‘vasu’—kekayaan. Karena itu, jadilah pelindung Cedi dan tinggallah di sana. Rakyatnya berpegang pada dharma, puas hati, dan berbudi; bahkan dalam senda-gurau pun mereka tidak berdusta—apalagi pada kesempatan lain. Putra-putra senantiasa mengutamakan kesejahteraan para guru; sang ayah tidak membagi-bagi mereka selagi hidup. Mereka tidak membebani lembu untuk memikul beban, dan mereka memelihara kaum papa serta yatim piatu. Wahai pemberi kehormatan, di Cedi semua varṇa teguh pada dharma masing-masing; apa pun yang terjadi di tiga dunia tidak akan tersembunyi darimu—engkau akan tetap mahatahu. Dan telah kuhadiahkan kepadamu sebuah vimāna yang besar, bening laksana kristal, bersifat ilahi, layak dinikmati para dewa, dan bergerak di angkasa; vimāna pemberianku itu akan senantiasa hadir di langit untuk melayanimu.”
Verse 14
त्वमेकः सर्वमर्त्येषु विमानवरमास्थित: । चरिष्यस्युपरिस्थो हि देवो विग्रहवानिव,सम्पूर्ण मनुष्योंमें एक तुम्हीं इस श्रेष्ठ विमानपर बैठकर मूर्तिमान् देवताकी भाँति सबके ऊपर-ऊपर विचरोगे
Waiśampāyana berkata: “Di antara semua insan fana, hanya engkau seorang—duduk di atas vimāna yang paling utama ini—akan bergerak melayang di atas semua, laksana dewa yang menampakkan wujudnya.”
Verse 15
ददामि ते वैजयन्तीं मालामम्लानपंकजाम् । धारयिष्यति संग्रामे या त्वां शस्त्रैरविक्षतम्,मैं तुम्हें यह वैजयन्ती माला देता हूँ, जिसमें पिरोये हुए कमल कभी कुम्हलाते नहीं हैं। इसे धारण कर लेनेपर यह माला संग्राममें तुम्हें अस्त्र-शस्त्रोंक आधातसे बचायेगी
Kuberikan kepadamu kalung Vaiśayantī ini, teruntai dari teratai yang tak pernah layu. Bila engkau mengenakannya, di medan perang ia akan menjaga engkau tetap tak terluka oleh hantaman senjata.
Verse 16
लक्षणं चैतदेवेह भविता ते नराधिप । इन्द्रमालेति विख्यातं धन्यमप्रतिमं महत्,नरेश्वर! यह माला ही इन्द्रमालाके नामसे विख्यात होकर इस जगत्में तुम्हारी पहचान करानेके लिये परम धन्य एवं अनुपम चिह्न होगी
Wahai raja manusia, inilah tanda pengenalmu di dunia ini. Termasyhur sebagai ‘Indramālā’, kalung agung, tiada banding, dan penuh berkah ini akan menjadi lambang yang membuatmu dikenali di seluruh jagat.
Verse 17
यष्टिं च वैणवीं तस्मै ददौ वृत्रनिषूदन: । इष्टप्रदानमुद्दिश्य शिष्टानां प्रतिपालिनीम्,ऐसा कहकर वृत्रासुरका नाश करनेवाले इन्द्रने राजाको प्रेमोपहारस्वरूप बाँसकी एक छड़ी दी, जो शिष्ट पुरुषोंकी रक्षा करनेवाली थी
Setelah berkata demikian, Indra, pembunuh Vṛtra, menganugerahkan kepadanya sebuah tongkat bambu sebagai hadiah kasih—dengan maksud menjadi sarana pemberi anugerah yang diinginkan, serta lambang yang menjaga kaum saleh dan beradab.
Verse 18
तस्या: शक्रस्य पूजार्थ भूमौ भूमिपतिस्तदा । प्रवेशं कारयामास गते संवत्सरे तदा,तदनन्तर एक वर्ष बीतनेपर भूपाल वसुने इन्द्रकी पूजाके लिये उस छड़ीको भूमिमें गाड़ दिया
Kemudian, setelah setahun berlalu, Raja Vasu, penguasa negeri, menancapkan tongkat itu ke dalam tanah sebagai penetapan, demi pemujaan kepada Śakra (Indra).
Verse 19
ततः प्रभृति चाद्यापि यष्टे: क्षितिपसत्तमै: । प्रवेश: क्रियते राजन् यथा तेन प्रवर्तित:,राजन्! तबसे लेकर आजतक श्रेष्ठ राजाओंद्वारा छड़ी धरतीमें गाड़ी जाती है। वसुने जो प्रथा चला दी, वह अबतक चली आती है
Wahai Raja, sejak saat itu hingga hari ini, para penguasa terkemuka melaksanakan upacara ‘menancapkan tongkat’ ke dalam bumi, sebagaimana dahulu ia menetapkannya. Demikianlah adat yang dimulai oleh Vasu tetap berlangsung sebagai laku kerajaan.
Verse 20
अपरेद्युस्ततस्तस्या: क्रियते<त्युच्छूयो नृपैः । अलंकृताया: पिटकैर्गन्धमाल्यैश्न भूषणै:,दूसरे दिन अर्थात् नवीन संवत्सरके प्रथम दिन प्रति-पदाको वह छड़ी वहाँसे निकालकर बहुत ऊँचे स्थानमें रखी जाती है; फिर कपड़ेकी पेटी, चन्दन, माला और आभूषणोंसे उसको सजाया जाता है। उसमें विधिपूर्वक फूलोंके हार और सूत लपेटे जाते हैं। तत्पश्चात् उसी छड़ीपर देवेश्वर भगवान् इन्द्रका हंसरूपसे पूजन किया जाता है
Waiśaṃpāyana berkata: Keesokan harinya para raja mengangkat tongkat itu dari tempatnya dan menegakkannya di kedudukan yang sangat tinggi. Lalu mereka menghiasinya dengan sarung kain, wewangian, rangkaian bunga, dan perhiasan.
Verse 21
माल्यदामपरिक्षिप्ता विधिवत् क्रियतेडपि च । भगवान् पूज्यते चात्र हंसरूपेण चेश्वर:,दूसरे दिन अर्थात् नवीन संवत्सरके प्रथम दिन प्रति-पदाको वह छड़ी वहाँसे निकालकर बहुत ऊँचे स्थानमें रखी जाती है; फिर कपड़ेकी पेटी, चन्दन, माला और आभूषणोंसे उसको सजाया जाता है। उसमें विधिपूर्वक फूलोंके हार और सूत लपेटे जाते हैं। तत्पश्चात् उसी छड़ीपर देवेश्वर भगवान् इन्द्रका हंसरूपसे पूजन किया जाता है
Waiśampāyana berkata: Tongkat itu dibalut dengan untaian karangan bunga sesuai tata cara, dan upacara yang ditetapkan pun dilaksanakan. Di sana, Sang Penguasa para dewa, Indra, dipuja dalam wujud haṃsa (angsa).
Verse 22
स्वयमेव गृहीतेन वसो: प्रीत्या महात्मन: । सतां पूजां महेन्द्रस्तु दृष्टवा देव: कृतां शुभाम्,इन्द्रने महात्मा वसुके प्रेमवश स्वयं हंसका रूप धारण करके वह पूजा ग्रहण की। नृपश्रेष्ठ वसुके द्वारा की हुई उस शुभ पूजाको देखकर प्रभावशाली भगवान् महेन्द्र प्रसन्न हो गये और इस प्रकार बोले--“चेदिदेशके अधिपति उपरिचर वसु जिस प्रकार मेरी पूजा करते हैं, उसी तरह जो मनुष्य तथा राजा मेरी पूजा करेंगे और मेरे इस उत्सवको रचायेंगे, उनको और उनके समूचे राष्ट्रको लक्ष्मी एवं विजयकी प्राप्ति होगी
Waiśampāyana berkata: Karena berkenan atas bakti Vasu yang mulia, Mahendra sendiri menerima persembahan itu dengan tangannya. Melihat pemujaan yang suci itu dilakukan menurut tata cara orang-orang saleh, Indra pun bersukacita.
Verse 23
वसुना राजमुख्येन प्रीतिमानब्रवीत् प्रभु: । ये पूजयिष्यन्ति नरा राजानश्न महं मम,इन्द्रने महात्मा वसुके प्रेमवश स्वयं हंसका रूप धारण करके वह पूजा ग्रहण की। नृपश्रेष्ठ वसुके द्वारा की हुई उस शुभ पूजाको देखकर प्रभावशाली भगवान् महेन्द्र प्रसन्न हो गये और इस प्रकार बोले--“चेदिदेशके अधिपति उपरिचर वसु जिस प्रकार मेरी पूजा करते हैं, उसी तरह जो मनुष्य तथा राजा मेरी पूजा करेंगे और मेरे इस उत्सवको रचायेंगे, उनको और उनके समूचे राष्ट्रको लक्ष्मी एवं विजयकी प्राप्ति होगी
Waiśampāyana berkata: Sang Penguasa, Indra, yang berkenan kepada Vasu, raja terkemuka itu, bersabda, “Barangsiapa—baik rakyat maupun raja—yang akan memujaku,
Verse 24
कारयिष्यन्ति च मुदा यथा चेदिपतिर्नुटप: । तेषां श्रीरविजयश्रैव सराष्ट्राणां भविष्यति,इन्द्रने महात्मा वसुके प्रेमवश स्वयं हंसका रूप धारण करके वह पूजा ग्रहण की। नृपश्रेष्ठ वसुके द्वारा की हुई उस शुभ पूजाको देखकर प्रभावशाली भगवान् महेन्द्र प्रसन्न हो गये और इस प्रकार बोले--“चेदिदेशके अधिपति उपरिचर वसु जिस प्रकार मेरी पूजा करते हैं, उसी तरह जो मनुष्य तथा राजा मेरी पूजा करेंगे और मेरे इस उत्सवको रचायेंगे, उनको और उनके समूचे राष्ट्रको लक्ष्मी एवं विजयकी प्राप्ति होगी
Waiśampāyana berkata: “Dan sebagaimana raja penguasa Cedi (Uparicara Vasu) dengan sukacita menyelenggarakan perayaan ini, demikian pula mereka—baik rakyat maupun raja—yang melaksanakannya dengan gembira akan memperoleh kemakmuran dan kemenangan, beserta seluruh negerinya.”
Verse 25
तथा स्फीतो जनपदो मुदितश्च भविष्यति | एवं महात्मना तेन महेन्द्रेण नराधिप,“इतना ही नहीं, उनका सारा जनपद ही उत्तरोत्तर उन्नतिशील और प्रसन्न होगा।' राजन! इस प्रकार महात्मा महेन्द्रने, जिन्हें मघवा भी कहते हैं, प्रेमपूर्वक महाराज वसुका भलीभाँति सत्कार किया। जो मनुष्य भूमि तथा रत्न आदिका दान करते हुए सदा देवराज इन्द्रका उत्सव रचायेंगे, वे इन्द्रोत्सवद्वारा इन्द्रका वरदान पाकर उसी उत्तम गतिको पा जायँगे, जिसे भूमिदान आदिके पुण्योंसे युक्त मानव प्राप्त करते हैं
Dengan demikian negeri itu akan kian makmur dan rakyat pun bersukacita. Wahai raja, begitulah Mahendra yang berhati agung (Indra, sang Maghavat) dihormati dengan penuh kasih sebagaimana mestinya.
Verse 26
वसु: प्रीत्या मघवता महाराजो5भिसत्कृत: । उत्सवं कारयिष्यन्ति सदा शक्रस्य ये नरा:,“इतना ही नहीं, उनका सारा जनपद ही उत्तरोत्तर उन्नतिशील और प्रसन्न होगा।' राजन! इस प्रकार महात्मा महेन्द्रने, जिन्हें मघवा भी कहते हैं, प्रेमपूर्वक महाराज वसुका भलीभाँति सत्कार किया। जो मनुष्य भूमि तथा रत्न आदिका दान करते हुए सदा देवराज इन्द्रका उत्सव रचायेंगे, वे इन्द्रोत्सवद्वारा इन्द्रका वरदान पाकर उसी उत्तम गतिको पा जायँगे, जिसे भूमिदान आदिके पुण्योंसे युक्त मानव प्राप्त करते हैं
Vaiśampāyana berkata: Raja Vasu dihormati dengan hangat dan penuh kasih oleh Maghavat (Indra). Orang-orang yang senantiasa menyelenggarakan perayaan Śakra (Indra) akan, melalui Indra-festival itu, memperoleh anugerah Indra dan mencapai tujuan luhur yang sama seperti mereka yang berbekal pahala derma—seperti pemberian tanah dan permata.
Verse 27
भूमिरत्नादिभिदनिस्तथा पूज्या भवन्ति ते । वरदानमहायज्ञैस्तथा शक्रोत्सवेन च,“इतना ही नहीं, उनका सारा जनपद ही उत्तरोत्तर उन्नतिशील और प्रसन्न होगा।' राजन! इस प्रकार महात्मा महेन्द्रने, जिन्हें मघवा भी कहते हैं, प्रेमपूर्वक महाराज वसुका भलीभाँति सत्कार किया। जो मनुष्य भूमि तथा रत्न आदिका दान करते हुए सदा देवराज इन्द्रका उत्सव रचायेंगे, वे इन्द्रोत्सवद्वारा इन्द्रका वरदान पाकर उसी उत्तम गतिको पा जायँगे, जिसे भूमिदान आदिके पुण्योंसे युक्त मानव प्राप्त करते हैं
Dengan derma berupa tanah, permata, dan sebagainya, mereka menjadi layak dihormati; demikian pula melalui pemberian anugerah, pelaksanaan yajña agung, dan perayaan Śakra (Indra).
Verse 28
सम्पूजितो मघवता वसुश्नैदी श्वरो नृप: । पालयामास धर्मेण चेदिस्थ: पृथिवीमिमाम्,इन्द्रके द्वारा उपर्युक्त रूपसे सम्मानित चेदिराज वसुने चेदिदेशमें ही रहकर इस पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया
Setelah dihormati sepantasnya oleh Maghavat (Indra), Raja Vasu—penguasa wangsa Śnaidi—tetap tinggal di negeri Cedi dan memerintah bumi ini menurut dharma.
Verse 29
इन्द्रप्रीत्या चेदिपतिश्नकारेन्द्रमहं वसु: । पुत्राश्नास्य महावीर्या: पज्चासन्नमितौजस:,इन्द्रकी प्रसन्नताके लिये चेदिराज वसु प्रतिवर्ष इन्द्रोत्तव मनाया करते थे। उनके अनन्त बलशाली महापराक्रमी पाँच पुत्र थे
Vaiśampāyana berkata: Demi menyenangkan Indra, Vasu, raja Cedi, merayakan Indra-festival setiap tahun di Nakāra. Ia memiliki lima putra—semuanya pahlawan besar dengan kekuatan tak terukur.
Verse 30
नानाराज्येषु च सुतान् स सम्राडभ्यषेचयत् । महारथो मागधानां विश्रुतो यो बृहद्रथ:,सम्राट् वसुने विभिन्न राज्योंपर अपने पुत्रोंको अभिषिक्त कर दिया। उनमें महारथी बृहद्रथ मगध देशका विख्यात राजा हुआ
Waiśampāyana berkata: Sang maharaja menobatkan putra-putranya sebagai penguasa di berbagai kerajaan. Di antara mereka, Bṛhadratha—mahakereta-perang yang termasyhur—menjadi raja besar kaum Magadha.
Verse 31
प्रत्यग्रह: कुशाम्बश्व यमाहुर्मणिवाहनम् । मावेल्लश्न यदुश्चैव राजन्यश्वापराजित:,दूसरे पुत्रका नाम प्रत्यग्रह था, तीसरा कुशाम्ब था, जिसे मणिवाहन भी कहते हैं। चौथा मावेलल था। पाँचवाँ राजकुमार यदु था, जो युद्धमें किसीसे पराजित नहीं होता था
Waiśampāyana berkata: Putra kedua bernama Pratyagraha. Putra ketiga ialah Kuśāmba, yang juga disebut Maṇivāhana. Putra keempat ialah Māvella. Putra kelima, pangeran Yadu, adalah seorang kṣatriya yang tak pernah terkalahkan di medan perang.
Verse 32
एते तस्य सुता राजनू् राजर्षेर्भूरितेजस: । न््यवासयन् नामभ्रि: स्वैस्ते देशांश्ष पुराणि च,राजा जनमेजय! महातेजस्वी राजर्षि वसुके इन पुत्रोंने अपने-अपने नामसे देश और नगर बसाये
Waiśampāyana berkata: Wahai Raja Janamejaya, inilah putra-putra sang raja-ṛṣi yang bercahaya besar. Masing-masing mendirikan wilayah dan kota yang menyandang namanya sendiri.
Verse 33
वासवा: पड्च राजानः पृथग्वंशाश्व शाश्वता: | वसन्तमिन्द्रप्रासादे आकाशे स्फाटिके च तम्,पाँचों वसुपुत्र भिन्न-भिन्न देशोंके राजा थे और उन्होंने पृथक्ू-पृथक् अपनी सनातन वंशपरम्परा चलायी। चेदिराज वसु इन्द्रके दिये हुए स्फटिक मणिमय विमानमें रहते हुए आकाशमें ही निवास करते थे। उस समय उन महात्मा नरेशकी सेवामें गन्धर्व और अप्सराएँ उपस्थित होती थीं। सदा ऊपर-ही-ऊपर चलनेके कारण उनका नाम “राजा उपरिचर' के रूपमें विख्यात हो गया
Waiśaṃpāyana berkata: Lima raja yang dikenal sebagai para Vasu berasal dari garis keturunan yang berbeda-beda, masing-masing menegakkan tradisi dinasti purbanya. Di antara mereka, Vasu raja Cedi tinggal di angkasa, bersemayam dalam istana-wahana berkilau bak kristal yang dianugerahkan Indra. Dilayani para Gandharwa dan Apsara, ia termasyhur sebagai Uparicara—“ia yang bergerak di atas”—karena senantiasa hidup dan berkelana di wilayah tinggi.
Verse 34
उपतस्थुर्महात्मानं गन्धर्वाप्सरसो नृपम् । राजोपरिचरेत्येवं नाम तस्याथ विश्रुतम्,पाँचों वसुपुत्र भिन्न-भिन्न देशोंके राजा थे और उन्होंने पृथक्ू-पृथक् अपनी सनातन वंशपरम्परा चलायी। चेदिराज वसु इन्द्रके दिये हुए स्फटिक मणिमय विमानमें रहते हुए आकाशमें ही निवास करते थे। उस समय उन महात्मा नरेशकी सेवामें गन्धर्व और अप्सराएँ उपस्थित होती थीं। सदा ऊपर-ही-ऊपर चलनेके कारण उनका नाम “राजा उपरिचर' के रूपमें विख्यात हो गया
Waiśampāyana berkata: Para Gandharwa dan Apsara datang menghaturkan pelayanan kepada raja yang berhati luhur itu. Maka ia pun masyhur dengan nama Rājoparicara.
Verse 35
पुरोपवाहिनीं तस्य नदीं शुक्तिमतीं गिरि: । अरौत्सीच्चेतनायुक्त: कामात् कोलाहल: किल,उनकी राजधानीके समीप शुक्तिमती नदी बहती थी। एक समय कोलाहल नामक सचेतन पर्वतने कामवश उस दिव्यरूपधारिणी नदीको रोक लिया
Waiśampāyana berkata: Di dekat ibu kotanya mengalirlah sungai Śuktimatī. Dikisahkan, pada suatu ketika gunung bernama Kolāhala—yang berkesadaran—karena dorongan nafsu menghalangi aliran sungai itu, yang kala itu menampakkan wujud menakjubkan dan laksana ilahi.
Verse 36
गिरिं कोलाहलं तं तु पदा वसुरताडयत् । निश्षक्राम ततस्तेन प्रहारविवरेण सा,उसके रोकनेसे नदीकी धारा रुक गयी। यह देख उपरिचर वसुने कोलाहल पर्वतपर अपने पैरसे प्रहार किया। प्रहार करते ही पर्वतमें दरार पड़ गयी, जिससे निकलकर वह नदी पहलेके समान बहने लगी
Waiśampāyana berkata: Ketika arus sungai terhalang, Uparicara Vasu menghantam gunung Kolāhala dengan kakinya. Seketika terbukalah retakan pada gunung itu; melalui celah pukulan itu sungai pun menerobos keluar dan mengalir kembali seperti sediakala.
Verse 37
तस्यां नद्यामजनयन्मिथुनं पर्वत: स्वयम् । तस्माद् विमोक्षणात् प्रीता नदी राज्ञे न््यवेदयत्,पर्वतने उस नदीके गर्भसे एक पुत्र और एक कन्या, जुड़वीं संतान उत्पन्न की थी। उसके अवरोधसे मुक्त करनेके कारण प्रसन्न हुई नदीने राजा उपरिचरको अपनी दोनों संतानें समर्पित कर दीं
Waiśampāyana berkata: Di sungai itu gunung tersebut sendiri memperanakkan sepasang anak kembar. Karena dibebaskan dari halangan, sang sungai yang bersukacita mempersembahkan kedua anak itu kepada raja.
Verse 38
यः पुमानभवत् तत्र तं स राजर्षिसत्तम: | वसुर्वसुप्रदश्चक्रे सेनापतिमरिन्दम:,उनमें जो पुरुष था, उसे शत्रुओंका दमन करनेवाले धनदाता राजर्षिप्रवर वसुने अपना सेनापति बना लिया
Waiśampāyana berkata: Di antara keduanya, yang laki-laki—dialah yang oleh Vasu, sang mahārṣi-raja yang termasyhur sebagai pemberi kekayaan dan penunduk musuh, diangkat menjadi panglima bala tentara.
Verse 39
चकार पत्नीं कन्यां तु तथा तां गिरिकां नृपः । वसो: पत्नी तु गिरिका कामकालं न्यवेदयत्,और जो कन्या थी उसे राजाने अपनी पत्नी बना लिया। उसका नाम था गिरिका। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ जनममेजय! एक दिन ऋतुकालको प्राप्त हो स्नानके पश्चात् शुद्ध हुई वसुपत्नी गिरिकाने पुत्र उत्पन्न होने योग्य समयमें राजासे समागमकी इच्छा प्रकट की। उसी दिन पितरोंने राजाओंमें श्रेष्ठ वसुपर प्रसन्न हो उन्हें आज्ञा दी--'तुम हिंसक पशुओंका वध करो।' तब राजा पितरोंकी आज्ञाका उल्लंघन न करके कामनावश साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान अत्यन्त रूप और सौन्दर्यके वैभवसे सम्पन्न गिरिकाका ही चिन्तन करते हुए हिंसक पशुओंको मारनेके लिये वनमें गये
Waiśampāyana berkata: Adapun yang perempuan, sang raja menjadikannya permaisuri; namanya Girikā. Ketika musim yang layak tiba, Girikā—istri Vasu—setelah mandi dan menjadi suci menurut tata upacara, menyampaikan kepada raja hasratnya untuk bersatu pada waktu yang tepat demi memperoleh putra.
Verse 40
ऋतुकालमनुप्राप्ता सनाता पुंसवने शुचि: । तदह: पितरश्वैनमूचुर्जहि मृगानिति,और जो कन्या थी उसे राजाने अपनी पत्नी बना लिया। उसका नाम था गिरिका। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ जनममेजय! एक दिन ऋतुकालको प्राप्त हो स्नानके पश्चात् शुद्ध हुई वसुपत्नी गिरिकाने पुत्र उत्पन्न होने योग्य समयमें राजासे समागमकी इच्छा प्रकट की। उसी दिन पितरोंने राजाओंमें श्रेष्ठ वसुपर प्रसन्न हो उन्हें आज्ञा दी--'तुम हिंसक पशुओंका वध करो।' तब राजा पितरोंकी आज्ञाका उल्लंघन न करके कामनावश साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान अत्यन्त रूप और सौन्दर्यके वैभवसे सम्पन्न गिरिकाका ही चिन्तन करते हुए हिंसक पशुओंको मारनेके लिये वनमें गये
Waiśampāyana berkata: Ketika musim pembuahan telah tiba dan ia telah mandi serta menjadi suci untuk upacara puṃsavana, pada hari itu juga para Pitṛ berkata kepadanya, “Bunuhlah binatang-binatang buas.” Sang raja, tanpa melanggar titah para leluhur, berangkat ke hutan untuk berburu; namun batinnya tetap terpaut pada Girikā.
Verse 41
त॑ राजसत्तमं प्रीतास्तदा मतिमतां वर | स पितृणां नियोगं तमनतिक्रम्य पार्थिव:,और जो कन्या थी उसे राजाने अपनी पत्नी बना लिया। उसका नाम था गिरिका। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ जनममेजय! एक दिन ऋतुकालको प्राप्त हो स्नानके पश्चात् शुद्ध हुई वसुपत्नी गिरिकाने पुत्र उत्पन्न होने योग्य समयमें राजासे समागमकी इच्छा प्रकट की। उसी दिन पितरोंने राजाओंमें श्रेष्ठ वसुपर प्रसन्न हो उन्हें आज्ञा दी--'तुम हिंसक पशुओंका वध करो।' तब राजा पितरोंकी आज्ञाका उल्लंघन न करके कामनावश साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान अत्यन्त रूप और सौन्दर्यके वैभवसे सम्पन्न गिरिकाका ही चिन्तन करते हुए हिंसक पशुओंको मारनेके लिये वनमें गये
Waiśampāyana berkata: Wahai yang terbaik di antara para bijak, saat itu para Pitṛ berkenan kepada raja yang utama itu. Sang penguasa bumi, tanpa melanggar perintah para leluhur, memasuki hutan untuk membinasakan binatang-binatang buas; namun, dikuasai hasrat, pikirannya tetap terpaut pada Girikā—sang permaisuri yang telah mandi, menjadi suci pada musimnya, dan memohon persatuan pada waktu yang tepat untuk pembuahan.
Verse 42
चकार मृगयां कामी गिरिकामेव संस्मरन् | अतीवरूपसम्पन्नां साक्षाच्छियमिवापराम्,और जो कन्या थी उसे राजाने अपनी पत्नी बना लिया। उसका नाम था गिरिका। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ जनममेजय! एक दिन ऋतुकालको प्राप्त हो स्नानके पश्चात् शुद्ध हुई वसुपत्नी गिरिकाने पुत्र उत्पन्न होने योग्य समयमें राजासे समागमकी इच्छा प्रकट की। उसी दिन पितरोंने राजाओंमें श्रेष्ठ वसुपर प्रसन्न हो उन्हें आज्ञा दी--'तुम हिंसक पशुओंका वध करो।' तब राजा पितरोंकी आज्ञाका उल्लंघन न करके कामनावश साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान अत्यन्त रूप और सौन्दर्यके वैभवसे सम्पन्न गिरिकाका ही चिन्तन करते हुए हिंसक पशुओंको मारनेके लिये वनमें गये
Dikuasai hasrat, sang raja pergi berburu sambil terus-menerus mengingat Girikā—yang berlimpah kecantikan, laksana Lakṣmī kedua yang tampak nyata.
Verse 43
अशोकैश्नम्पकैश्वूतैरनेकैरतिमुक्तकै: । पुन्नागै: कर्णिकारैश्व वकुलैर्दिव्यपाटलै:,राजाका वह वन देवताओंके चैत्ररथ नामक वनके समान शोभा पा रहा था। वसन्तका समय था; अशोक, चम्पा, आम, अतिमुक्तक (माधवीलता), पुन्नाग (नागकेसर), कनेर, मौलसिरी, दिव्य पाटल, पाटल, नारियल, चन्दन तथा अर्जुन--से स्वादिष्ट फलोंसे युक्त, रमणीय तथा पवित्र महावृक्ष उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे। कोकिलाओंके कल-कूजनसे समस्त वन गूँज उठा था। चारों ओर मतवाले भौंरे कल-कल नाद कर रहे थे
Hutan itu berhias oleh aśoka, campaka, mangga, banyak sulur atimuktaka, punnāga, karṇikāra, vakula, dan pāṭala yang laksana surgawi.
Verse 44
पाटलैनरिकेलैश्व चन्दनैश्नार्जुनैस्तथा । एतै रम्यैर्महावक्षै: पुण्यै: स्वादुफलैर्युतम्,राजाका वह वन देवताओंके चैत्ररथ नामक वनके समान शोभा पा रहा था। वसन्तका समय था; अशोक, चम्पा, आम, अतिमुक्तक (माधवीलता), पुन्नाग (नागकेसर), कनेर, मौलसिरी, दिव्य पाटल, पाटल, नारियल, चन्दन तथा अर्जुन--से स्वादिष्ट फलोंसे युक्त, रमणीय तथा पवित्र महावृक्ष उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे। कोकिलाओंके कल-कूजनसे समस्त वन गूँज उठा था। चारों ओर मतवाले भौंरे कल-कल नाद कर रहे थे
Hutan itu dipenuhi pohon pāṭala, kelapa, cendana, dan arjuna—pohon-pohon besar yang elok dan suci, sarat buah-buah manis.
Verse 45
कोकिलाकुलसंनादं मत्तभ्रमरनादितम् । वसन्तकाले तत् तस्य वन चैत्ररथोपमम्,राजाका वह वन देवताओंके चैत्ररथ नामक वनके समान शोभा पा रहा था। वसन्तका समय था; अशोक, चम्पा, आम, अतिमुक्तक (माधवीलता), पुन्नाग (नागकेसर), कनेर, मौलसिरी, दिव्य पाटल, पाटल, नारियल, चन्दन तथा अर्जुन--से स्वादिष्ट फलोंसे युक्त, रमणीय तथा पवित्र महावृक्ष उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे। कोकिलाओंके कल-कूजनसे समस्त वन गूँज उठा था। चारों ओर मतवाले भौंरे कल-कल नाद कर रहे थे
Waiśampāyana berkata: Pada musim semi, hutan miliknya tampak laksana rimba Caitraratha yang termasyhur—bergema oleh paduan suara kawanan burung kukuk dan dipenuhi dengung lebah-lebah yang mabuk madu.
Verse 46
मन्मथाभिपरीतात्मा नापश्यद् गिरिकां तदा । अपश्यन् कामसंतप्तश्नरमाणो यदृच्छया,यह उद्दीपन-सामग्री पाकर राजाका हृदय कामवेदनासे पीड़ित हो उठा। उस समय उन्हें अपनी रानी गिरिकाका दर्शन नहीं हुआ। उसे न देखकर कामाग्निसे संतप्त हो वे इच्छानुसार इधर-उधर घूमने लगे
Waiśampāyana berkata: Dikuasai dewa asmara, sang raja saat itu tidak melihat Girikā. Karena tak melihatnya, terbakar oleh hasrat, ia pun mengembara ke sana kemari sebagaimana kebetulan menuntunnya.
Verse 47
पुष्पसंछन्नशाखाग्रं पललवैरुपशोभितम् । अशोकं स्तबकैश्छन्न॑ं रमणीयमपश्यत,घूमते-घूमते उन्होंने एक रमणीय अशोकका वृक्ष देखा, जो पल्लवोंसे सुशोभित और पुष्पके गुच्छोंसे आच्छादित था। उसकी शाखाओंके अग्रभाग फूलोंसे ढके हुए थे
Waiśampāyana berkata: Sambil mengembara, mereka melihat sebatang pohon aśoka yang elok—ujung-ujung rantingnya terselubung bunga, dihiasi tunas-tunas muda, dan tertutup rapat oleh gugusan-gugusan kembang.
Verse 48
अधस्तात् तस्य छायायां सुखासीनो नराधिप: । मधुगन्धैश्न संयुक्त पुष्पगन्धथमनोहरम्,राजा उसी वृक्षके नीचे उसकी छायामें सुखपूर्वक बैठ गये। वह वृक्ष मकरन्द और सुगन्धसे भरा था। फूलोंकी गन्धसे वह बरबस मनको मोह लेता था
Waiśampāyana berkata: Di bawah pohon itu, dalam naungannya, sang raja duduk dengan tenteram. Tempat itu dipenuhi harum madu dan semerbak bunga—begitu memikat hingga tanpa sadar menarik hati dan pikiran.
Verse 49
वायुना प्रेर्यमाणस्तु धूम्राय मुदमन्वगात् । तस्य रेत: प्रचस्कन्द चरतो गहने वने,उस समय कामोददीपक वायुसे प्रेरित हो राजाके मनमें रतिके लिये स्त्रीविषयक प्रीति उत्पन्न हुई। इस प्रकार वनमें विचरनेवाले राजा उपरिचरका वीर्य स्खलित हो गया
Waiśampāyana berkata: Terdorong oleh angin yang membangkitkan hasrat, batin sang raja condong pada kenikmatan asmara. Maka ketika ia berjalan di rimba yang lebat, maninya pun terlepas tanpa dikehendaki.
Verse 50
स्कन्नमात्रं च तद् रेतो वृक्षपत्रेण भूमिप: । प्रतिजग्राह मिथ्या मे न पतेद् रेत इत्युत,उसके स्खलित होते ही राजाने यह सोचकर कि मेरा वीर्य व्यर्थ न जाय, उसे वृक्षके पत्तेपर उठा लिया
Begitu benih itu terpancar, sang raja segera menampungnya di atas sehelai daun pohon, sambil berpikir, “Jangan sampai benihku jatuh sia-sia.”
Verse 51
इदं मिथ्या परिस्कन्नं रेतो मे न भवेदिति । ऋतुश्न तस्या: पत्न्या मे न मोघः स्यादिति प्रभु:,उन्होंने विचार किया, “मेरा यह स्खलित वीर्य व्यर्थ न हो, साथ ही मेरी पत्नी गिरिकाका ऋतुकाल भी व्यर्थ न जाय” इस प्रकार बारम्बार विचारकर राजाओंमें श्रेष्ठ वसुने उस वीर्यको अमोघ बनानेका ही निश्चय किया
Sang penguasa berpikir, “Jangan sampai benih yang telah terpancar ini menjadi sia-sia; dan jangan pula masa subur istriku berlalu tanpa hasil.”
Verse 52
संचिन्त्यैवं तदा राजा विचार्य च पुन: पुनः । अमोघत्वं च विज्ञाय रेतसो राजसत्तम:,उन्होंने विचार किया, “मेरा यह स्खलित वीर्य व्यर्थ न हो, साथ ही मेरी पत्नी गिरिकाका ऋतुकाल भी व्यर्थ न जाय” इस प्रकार बारम्बार विचारकर राजाओंमें श्रेष्ठ वसुने उस वीर्यको अमोघ बनानेका ही निश्चय किया
Setelah merenung demikian, sang raja menimbang-nimbang berulang kali; dan mengetahui bahwa benih itu dapat dibuat tidak sia-sia, raja terbaik itu bertekad menjadikannya berhasil.
Verse 53
शुक्रप्रस्थापने काल॑ महिष्या: प्रसमीक्ष्य वै अभिमन्त्रयाथ तच्छुक्रमारात् तिष्ठन्तमाशुगम्,तदनन्तर रानीके पास अपना वीर्य भेजनेका उपयुक्त अवसर देख उन्होंने उस वीर्यको पुत्रोत्पत्तिकारक मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित किया। राजा वसु धर्म और अर्थके सूक्ष्मतत्त्वको जाननेवाले थे। उन्होंने अपने विमानके समीप ही बैठे हुए शीघ्रगामी श्येन पक्षी (बाज)-के पास जाकर कहा--'सौम्य! तुम मेरा प्रिय करनेके लिये यह वीर्य मेरे घर ले जाओ और महारानी गिरिकाको शीघ्र दे दो; क्योंकि आज ही उनका ऋतुकाल है।” बाज वह वीर्य लेकर बड़े वेगके साथ तुरंत वहाँसे उड़ गया
Melihat saat yang tepat bagi sang permaisuri untuk pembuahan, ia menyucikan benih itu dengan mantra-mantra yang mendatangkan keturunan; lalu ia memandang elang yang cepat, yang berdiri dekat.
Verse 54
सूक्ष्मधर्मार्थतत्त्वज्ञो गत्वा श्येनं ततोडब्रवीत् । मत्प्रियार्थमिदं सौम्य शुक्रे मम गृहं नय,तदनन्तर रानीके पास अपना वीर्य भेजनेका उपयुक्त अवसर देख उन्होंने उस वीर्यको पुत्रोत्पत्तिकारक मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित किया। राजा वसु धर्म और अर्थके सूक्ष्मतत्त्वको जाननेवाले थे। उन्होंने अपने विमानके समीप ही बैठे हुए शीघ्रगामी श्येन पक्षी (बाज)-के पास जाकर कहा--'सौम्य! तुम मेरा प्रिय करनेके लिये यह वीर्य मेरे घर ले जाओ और महारानी गिरिकाको शीघ्र दे दो; क्योंकि आज ही उनका ऋतुकाल है।” बाज वह वीर्य लेकर बड़े वेगके साथ तुरंत वहाँसे उड़ गया
Raja yang memahami hal-hal halus tentang dharma dan artha itu mendatangi elang tersebut dan berkata, “Wahai yang lembut, demi menyenangkan hatiku, bawalah benih ini ke rumahku.”
Verse 55
गिरिकाया: प्रयच्छाशु तस्या हागर्तवमद्य वै । गृहीत्वा तत् तदा श्येनस्तूर्णमुत्पत्य वेगवान्,तदनन्तर रानीके पास अपना वीर्य भेजनेका उपयुक्त अवसर देख उन्होंने उस वीर्यको पुत्रोत्पत्तिकारक मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित किया। राजा वसु धर्म और अर्थके सूक्ष्मतत्त्वको जाननेवाले थे। उन्होंने अपने विमानके समीप ही बैठे हुए शीघ्रगामी श्येन पक्षी (बाज)-के पास जाकर कहा--'सौम्य! तुम मेरा प्रिय करनेके लिये यह वीर्य मेरे घर ले जाओ और महारानी गिरिकाको शीघ्र दे दो; क्योंकि आज ही उनका ऋतुकाल है।” बाज वह वीर्य लेकर बड़े वेगके साथ तुरंत वहाँसे उड़ गया
Waiśampāyana berkata: “Segera antarkan itu kepada Girikā; sebab hari ini sungguh saatnya yang tepat baginya.” Setelah mengambil benih itu, elang yang tangkas dan perkasa segera mengepakkan sayapnya dan terbang pergi dengan tergesa.
Verse 56
जवं परममास्थाय प्रदुद्राव विहंगम: । तमपश्यदथायान्तं श्येनं श्येनस्तथापर:,वह आकाशबचारी पक्षी सर्वोत्तम वेगका आश्रय ले उड़ा जा रहा था, इतनेहीमें एक दूसरे बाजने उसे आते देखा
Burung itu menghimpun kecepatan tertinggi dan melesat di angkasa. Saat itu juga, seekor elang lain melihat elang itu datang mendekat.
Verse 57
अभ्यद्रवच्च तं सद्यो दृष्टवैवामिषशड्कया । तुण्डयुद्धमथाकाशे तावुभौ सम्प्रचक्रतु:,उस बाजको देखते ही उसके पास मांस होनेकी आशंकासे दूसरा बाज तत्काल उसपर टूट पड़ा। फिर वे दोनों पक्षी आकाशमें एक-दूसरेको चोंचोंसे मारते हुए युद्ध करने लगे
Melihatnya dan mengira ia membawa daging, elang yang lain seketika menyambar. Lalu di angkasa terbuka, keduanya bertarung paruh lawan paruh, saling menghantam dalam perkelahian.
Verse 58
युध्यतोरपतदू रेतस्तच्चापि यमुनाम्भसि । तत्राद्विकेति विख्याता ब्रह्मशापाद् वराप्सरा:,उन दोनोंके युद्ध करते समय वह वीर्य यमुनाजीके जलमें गिर पड़ा। अद्रिका नामसे विख्यात एक सुन्दरी अप्सरा ब्रह्माजीके शापसे मछली होकर वहीं यमुनाजीके जलमें रहती थी। बाजके पंजेसे छूटकर गिरे हुए वसुसम्बन्धी उस वीर्यको मत्स्यरूपधारिणी अद्विकाने वेगपूर्वक आकर निगल लिया। भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् दसवाँ मास आनेपर मत्स्यजीवी मल्लाहोंने उस मछलीको जालमें बाँध लिया और उसके उदरको चीरकर एक कन्या और एक पुरुष निकाला
Ketika keduanya bertarung, benih itu terjatuh dan jatuh ke dalam air Sungai Yamunā. Di sana ada seorang apsaras mulia bernama Adrikā, yang karena kutukan Brahmā hidup di Yamunā dalam wujud ikan.
Verse 59
मीनभावमनुप्राप्ता बभूव यमुनाचरी । श्येनपादपरि भ्रष्ट तद् वीर्यमथ वासवम्,उन दोनोंके युद्ध करते समय वह वीर्य यमुनाजीके जलमें गिर पड़ा। अद्रिका नामसे विख्यात एक सुन्दरी अप्सरा ब्रह्माजीके शापसे मछली होकर वहीं यमुनाजीके जलमें रहती थी। बाजके पंजेसे छूटकर गिरे हुए वसुसम्बन्धी उस वीर्यको मत्स्यरूपधारिणी अद्विकाने वेगपूर्वक आकर निगल लिया। भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् दसवाँ मास आनेपर मत्स्यजीवी मल्लाहोंने उस मछलीको जालमें बाँध लिया और उसके उदरको चीरकर एक कन्या और एक पुरुष निकाला
Apsaras yang berdiam di Yamunā itu, karena kutukan, telah mencapai keadaan sebagai ikan. Pada saat itu benih milik Vāsava (Indra)—yang terlepas dari cengkeraman elang—jatuh ke dalam Yamunā.
Verse 60
जग्राह तरसोपेत्य साद्रिका मत्स्यरूपिणी । कदाचिदपि मत्सीं तां बबन्धुर्मत्स्यजीविन:,उन दोनोंके युद्ध करते समय वह वीर्य यमुनाजीके जलमें गिर पड़ा। अद्रिका नामसे विख्यात एक सुन्दरी अप्सरा ब्रह्माजीके शापसे मछली होकर वहीं यमुनाजीके जलमें रहती थी। बाजके पंजेसे छूटकर गिरे हुए वसुसम्बन्धी उस वीर्यको मत्स्यरूपधारिणी अद्विकाने वेगपूर्वक आकर निगल लिया। भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् दसवाँ मास आनेपर मत्स्यजीवी मल्लाहोंने उस मछलीको जालमें बाँध लिया और उसके उदरको चीरकर एक कन्या और एक पुरुष निकाला
Waiśampāyana berkata: Adrikā yang berwujud ikan segera melesat maju dan merenggutnya. Kelak para nelayan yang hidup dari menangkap ikan menjaring dan mengikat ikan itu; dan ketika perutnya dibelah, tampak di dalamnya seorang anak perempuan dan seorang anak laki-laki—demikianlah akibat ganjil dari hasrat dan takdir tersingkap di perairan Yamunā.
Verse 61
मासे च दशमे प्राप्तेतदा भरतसत्तम । उज्जहुरुदरात् तस्याः स्त्री पुमांसं च मानुषम्,उन दोनोंके युद्ध करते समय वह वीर्य यमुनाजीके जलमें गिर पड़ा। अद्रिका नामसे विख्यात एक सुन्दरी अप्सरा ब्रह्माजीके शापसे मछली होकर वहीं यमुनाजीके जलमें रहती थी। बाजके पंजेसे छूटकर गिरे हुए वसुसम्बन्धी उस वीर्यको मत्स्यरूपधारिणी अद्विकाने वेगपूर्वक आकर निगल लिया। भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् दसवाँ मास आनेपर मत्स्यजीवी मल्लाहोंने उस मछलीको जालमें बाँध लिया और उसके उदरको चीरकर एक कन्या और एक पुरुष निकाला
Waiśampāyana berkata: “Wahai yang terbaik di antara Bharata, ketika bulan kesepuluh tiba, para nelayan menangkap ikan itu dengan jala. Mereka membelah perutnya dan mengeluarkan dua anak manusia—seorang anak perempuan dan seorang anak laki-laki.”
Verse 62
आश्चर्यभूतं तद् गत्वा राज्ञेडथ प्रत्यवेदयन् काये मत्स्या इमौ राजन् सम्भूतौ मानुषाविति,यह आश्चर्यजनक घटना देखकर मछेरोंने राजाके पास जाकर निवेदन किया --“महाराज! मछलीके पेटसे ये दो मनुष्य बालक उत्पन्न हुए हैं!
Waiśampāyana berkata: Menyaksikan kejadian yang mengherankan itu, para nelayan pergi menghadap raja dan melapor, “Wahai Raja, dari tubuh (perut) ikan ini telah lahir dua anak manusia.”
Verse 63
तयो: पुमांसं जग्राह राजोपरिचरस्तदा । स मत्स्यो नाम राजासीदू धार्मिक: सत्यसंगर:,मछेरोंकी बात सुनकर राजा उपरिचरने उस समय उन दोनों बालकोंमेंसे जो पुरुष था, उसे स्वयं ग्रहण कर लिया। वही मत्स्य नामक धर्मात्मा एवं सत्यप्रतिज्ञ राजा हुआ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि व्यासुद्ुत्पत्तौ त्रिषष्टितमो5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपव॑के अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें व्यास आदिकी उत्पत्तिये सम्बन्ध रखनेवाला तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
Kemudian Raja Uparicara mengambil anak laki-laki dari keduanya untuk diasuhnya. Anak itu kelak menjadi raja bernama Matsya—teguh dalam dharma dan kukuh pada ikrar kebenaran.
Verse 64
साप्सरा मुक्तशापा च क्षणेन समपद्यत । या पुरोक्ता भगवता तिर्यग्योनिगता शुभा
Waiśampāyana berkata: Seketika itu juga ia terbebas dari kutuk dan kembali menjadi seorang Apsaras—dialah yang dahulu telah disebut oleh Sang Bhagavān sebagai yang jatuh ke rahim makhluk hewan (tiryak-yoni).
Verse 65
मानुषौ जनयित्वा त्वं शापमोक्षमवाप्स्यसि । ततः सा जनयित्वा तौ विशस्ता मत्स्यघातिना
Waiśampāyana berkata: “Setelah engkau melahirkan dua putra manusia, engkau akan terbebas dari kutukan.” Lalu ia melahirkan keduanya, dan sesudah itu ia dibunuh oleh pembunuh ikan.
Verse 66
संत्यज्य मत्स्यरूपं सा दिव्यं रूपमवाप्य च । सिद्धर्षिचारणपथं जगामाथ वराप्सरा:
Waiśampāyana berkata: Meninggalkan wujudnya sebagai ikan, ia memperoleh rupa ilahi yang bercahaya; lalu apsaras yang mulia itu berangkat menempuh jalan para Siddha, Ṛṣi, dan Cāraṇa, kembali ke alam surgawi yang tinggi.
Verse 67
इधर वह शुभलक्षणा अप्सरा अद्विका क्षणभरमें शापमुक्त हो गयी। भगवान् ब्रह्माजीने पहले ही उससे कह दिया था कि 'तिर्यगू-योनिमें पड़ी हुई तुम दो मानव-संतानोंको जन्म देकर शापसे छूट जाओगी।” अतः मछली मारनेवाले मललाहने जब उसे काटा तो वह मानव-बालकोंको जन्म देकर मछलीका रूप छोड़ दिव्य रूपको प्राप्त हो गयी। इस प्रकार वह सुन्दरी अप्सरा सिद्ध महर्षि और चारणोंके पथसे स्वर्गलोकमें चली गयी || ६४-- ६६ || सा कन्या दुहिता तस्या मत्स्या मत्स्यसगन्धिनी । राज्ञा दत्ता च दाशाय कन्येयं ते भवत्विति,उन जुड़वी संतानोंमें जो कन्या थी, मछलीकी पुत्री होनेसे उसके शरीरसे मछलीकी गन्ध आती थी। अतः राजाने उसे मल्लाहको सौंप दिया और कहा--“यह तेरी पुत्री होकर रहे!
Waiśampāyana berkata: Pada saat itu juga apsaras Advikā yang bertanda baik terbebas dari kutukan. Dewa Brahmā telah lebih dahulu berkata kepadanya, “Setelah jatuh ke rahim makhluk hewan, engkau akan lepas dari kutukan setelah melahirkan dua anak manusia.” Maka ketika nelayan (mallāha) membelah ikan itu, ia melahirkan dua bayi manusia; meninggalkan wujud ikan, ia kembali memperoleh rupa ilahi. Demikianlah apsaras yang elok itu menempuh jalan para Siddha, para Ṛṣi agung, dan para Cāraṇa, lalu pergi ke alam surga. Dari pasangan kembar itu, anak perempuan—karena putri ikan—berbau amis; maka raja menyerahkannya kepada si dāśa (nelayan) sambil berkata, “Biarlah gadis ini menjadi putrimu.”
Verse 68
रूपसत्त्वसमायुक्ता सर्वे: समुदिता गुणै: । सा तु सत्यवती नाम मत्स्यघात्यभिसंश्रयात्,वह रूप और सत्त्व (सत्य)-से संयुक्त तथा समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न होनेके कारण 'सत्यवती” नामसे प्रसिद्ध हुई। मछेरोंके आश्रयमें रहनेके कारण वह पवित्र मुसकानवाली कन्या कुछ कालतक मत्स्यगन्धा नामसे ही विख्यात रही। वह पिताकी सेवाके लिये यमुनाजीके जलमें नाव चलाया करती थी। एक दिन तीर्थयात्राके उद्देश्स्से सब ओर विचरनेवाले महर्षि पराशरने उसे देखा। वह अतिशय रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित थी। सिद्धोंके हृदयमें भी उसे पानेकी अभिलाषा जाग उठती थी
Waiśampāyana berkata: Berhias kecantikan dan kebajikan batin, serta dipenuhi segala sifat luhur, ia pun dikenal dengan nama Satyavatī. Namun karena hidup dalam lindungan kaum nelayan, ia juga disebut Matsyagandhā. Demi melayani ayahnya, ia biasa mengemudikan perahu di perairan Yamunā. Pada suatu hari, Mahārṣi Parāśara yang mengembara untuk ziarah suci melihatnya—ia bersinar oleh keelokan yang luar biasa, hingga bahkan para makhluk sempurna pun tergerak hasrat untuk memperolehnya.
Verse 69
आसीत् सा मत्स्यगन्धैव कंचित् काल शुचिस्मिता । शुश्रूषार्थ पितुर्नावं वाहयन्तीं जले च ताम्,वह रूप और सत्त्व (सत्य)-से संयुक्त तथा समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न होनेके कारण 'सत्यवती” नामसे प्रसिद्ध हुई। मछेरोंके आश्रयमें रहनेके कारण वह पवित्र मुसकानवाली कन्या कुछ कालतक मत्स्यगन्धा नामसे ही विख्यात रही। वह पिताकी सेवाके लिये यमुनाजीके जलमें नाव चलाया करती थी। एक दिन तीर्थयात्राके उद्देश्स्से सब ओर विचरनेवाले महर्षि पराशरने उसे देखा। वह अतिशय रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित थी। सिद्धोंके हृदयमें भी उसे पानेकी अभिलाषा जाग उठती थी
Waiśampāyana berkata: Untuk beberapa waktu gadis itu tetap dikenal sebagai Matsyagandhā; dengan senyum yang bening, ia mengemudikan perahu di atas air demi melayani ayahnya.
Verse 70
तीर्थयात्रां परिक्रामन्नपश्यद् वै पराशर: । अतीवरूपसम्पन्नां सिद्धानामपि काड्क्षिताम्,वह रूप और सत्त्व (सत्य)-से संयुक्त तथा समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न होनेके कारण 'सत्यवती” नामसे प्रसिद्ध हुई। मछेरोंके आश्रयमें रहनेके कारण वह पवित्र मुसकानवाली कन्या कुछ कालतक मत्स्यगन्धा नामसे ही विख्यात रही। वह पिताकी सेवाके लिये यमुनाजीके जलमें नाव चलाया करती थी। एक दिन तीर्थयात्राके उद्देश्स्से सब ओर विचरनेवाले महर्षि पराशरने उसे देखा। वह अतिशय रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित थी। सिद्धोंके हृदयमें भी उसे पानेकी अभिलाषा जाग उठती थी
Waiśampāyana berkata: Ketika mengembara dalam ziarah dari satu tirtha ke tirtha lain, resi Parāśara melihat seorang gadis muda berparas luar biasa—begitu memikat hingga para Siddha pun dapat merindukannya.
Verse 71
दृष्टवैव स च तां धीमांश्नकमे चारुहासिनीम् । दिव्यां तां वासवीं कन्यां रम्भोरुं मुनिपुड़व:,उसकी हँसी बड़ी मोहक थी, उसकी जाँघें कदलीकी-सी शोभा धारण करती थीं। उस दिव्य वसुकुमारीको देखकर परम बुद्धिमान् मुनिवर पराशरने उसके साथ समागमकी इच्छा प्रकट की
Waiśampāyana berkata: Begitu sang resi agung melihatnya—berkulit gelap, tersenyum memikat, bertungkai laksana batang pisang—ia mengenalinya sebagai gadis bercahaya bak putri surgawi; dan karena terpikat, Parāśara menyatakan hasrat untuk bersatu dengannya.
Verse 72
संगमं मम कल्याणि कुरुष्वेत्यभ्यभाषत । साब्रवीत् पश्य भगवन् पारावारे स्थितानूषीन्,और कहा--'कल्याणी! मेरे साथ संगम करो।” वह बोली--“भगवन्! देखिये, नदीके आर-पार दोनों तटोंपर बहुत-से ऋषि खड़े हैं
Waiśampāyana berkata: Ia berkata, “Wahai wanita berbudi, bersatulah denganku.” Gadis itu menjawab, “Bhagavan, lihatlah—di kedua tepi sungai, di seberang dan di sini, banyak resi sedang berdiri.”
Verse 73
आवयोर्दष्टयोरेभि: कथं तु स्थात् समागम: । एवं तयोक्तो भगवान् नीहारमसूजत् प्रभु:,“और हम दोनोंको देख रहे हैं। ऐसी दशामें हमारा समागम कैसे हो सकता है?” उसके ऐसा कहनेपर शक्तिशाली भगवान् पराशरने कुहरेकी सृष्टि की
Gadis itu berkata, “Mereka memandang kita berdua; bagaimana mungkin pertemuan ini terjadi?” Mendengar demikian, sang resi perkasa Parāśara menciptakan selubung kabut.
Verse 74
येन देश: स सर्वस्तु तमोभूत इवाभवत् । दृष्टवा सृष्ट तु नीहारं ततस्तं परमर्षिणा
Waiśampāyana berkata: Karena kabut itu, seluruh kawasan tampak seolah tenggelam dalam kegelapan. Melihat kabut yang diciptakan oleh resi agung itu, mereka pun memahami sebabnya.
Verse 75
सत्यवत्युवाच विद्धि मां भगवन् कनन््यां सदा पितृवशानुगाम्,सत्यवतीने कहा--भगवन्! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं सदा अपने पिताके अधीन रहनेवाली कुमारी कन्या हूँ
Satyavatī berkata: “Wahai Bhagawan, ketahuilah tentang diriku: aku seorang gadis perawan yang senantiasa hidup dalam ketaatan pada wewenang ayahku.”
Verse 76
त्वत्संयोगाच्च दुष्येत कन््याभावो ममानघ । कन्यात्वे दूषिते वापि कथं शक्ष्ये द्विजोत्तम,निष्पाप महर्ष!! आपके संयोगसे मेरा कनन््याभाव (कुमारीपन) दूषित हो जायगा। द्विजश्रेष्ठ) कन्याभाव दूषित हो जानेपर मैं कैसे अपने घर जा सकती हूँ। बुद्धिमान् मुनी श्वर! अपने कन्यापनके कलंकित हो जानेपर मैं जीवित रहना नहीं चाहती। भगवन्! इस बातपर भलीभाँति विचार करके जो उचित जान पड़े, वह कीजिये
“Wahai resi tanpa cela, karena bersatu denganmu keadaan perawan dalam diriku akan ternoda. Wahai yang terbaik di antara para dwija, bila keperawananku tercemar, bagaimana mungkin aku kembali ke rumah? Jika noda itu jatuh atas keperawananku, aku tak ingin terus hidup. Ya Bhagawan, renungkanlah baik-baik dan lakukanlah apa yang engkau nilai benar.”
Verse 77
गृहं गन्तुमृषे चाहं धीमन् न स्थातुमुत्सहे । एतत् संचिन्त्य भगवन् विधत्स्व यदनन्तरम्,निष्पाप महर्ष!! आपके संयोगसे मेरा कनन््याभाव (कुमारीपन) दूषित हो जायगा। द्विजश्रेष्ठ) कन्याभाव दूषित हो जानेपर मैं कैसे अपने घर जा सकती हूँ। बुद्धिमान् मुनी श्वर! अपने कन्यापनके कलंकित हो जानेपर मैं जीवित रहना नहीं चाहती। भगवन्! इस बातपर भलीभाँति विचार करके जो उचित जान पड़े, वह कीजिये
“Wahai resi bijaksana, aku tak sanggup kembali ke rumah, dan aku pun tak berani tinggal di sini. Ya Bhagawan, pikirkanlah hal ini dan tetapkan apa yang harus dilakukan selanjutnya.”
Verse 78
एवमुक्तवतीं तां तु प्रीतिमानृषिसत्तम: । उवाच मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यसि,सत्यवतीके ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ पराशर प्रसन्न होकर बोले--“भीरु! मेरा प्रिय कार्य करके भी तुम कन्या ही रहोगी। भामिनि! तुम जो चाहो, वह मुझसे वर माँग लो। शुचिस्मिते! आजसे पहले कभी भी मेरा अनुग्रह व्यर्थ नहीं गया है”
Ketika ia berkata demikian, resi termulia yang dipenuhi kasih berkata kepadanya: “Sekalipun engkau melakukan apa yang menyenangkan hatiku, engkau akan tetap menjadi seorang perawan.”
Verse 79
वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि | वृथा हि न प्रसादो मे भूतपूर्व: शुचिस्मिते,सत्यवतीके ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ पराशर प्रसन्न होकर बोले--“भीरु! मेरा प्रिय कार्य करके भी तुम कन्या ही रहोगी। भामिनि! तुम जो चाहो, वह मुझसे वर माँग लो। शुचिस्मिते! आजसे पहले कभी भी मेरा अनुग्रह व्यर्थ नहीं गया है”
“Pilihlah sebuah anugerah, wahai yang pemalu—apa pun yang kau kehendaki, wahai wanita bersemangat. Sebab rahmatku tak pernah, pada masa lampau, menjadi sia-sia, wahai yang senyumnya suci.”
Verse 80
एवमुक्ता वरं वव्रे गात्रसौगन्ध्यमुत्तमम् । स चास्यै भगवान् प्रादान्मनस:काडूक्षितं भुवि,महर्षिके ऐसा कहनेपर सत्यवतीने अपने शरीरमें उत्तम सुमन होनेका वरदान माँगा। भगवान् पराशरने इस भूतलपर उसे वह मनोवांछित वर दे दिया
Demikian ditegur, Satyavatī memilih anugerah berupa keharuman terbaik bagi tubuhnya. Maka sang resi mulia Parāśara pun menganugerahkan kepadanya di bumi ini karunia yang diidamkan hatinya—wangi tubuh yang amat elok.
Verse 81
ततो लब्धवरा प्रीता स्त्रीभावगुण भूषिता । जगाम सह संसर्गमृषिणाद्भधुतकर्मणा,तस्या योजनगन्धेति ततो नामापरं स्मृतम् । तदनन्तर वरदान पाकर प्रसन्न हुई सत्यवती नारीपनके समागमोचित गुण (सद्यः ऋतुस्नान आदि)-से विभूषित हो गयी और उसने अद्धुतकर्मा महर्षि पराशरके साथ समागम किया। उसके शरीरसे उत्तम गन्ध फैलनेके कारण पृथ्वीपर उसका गन्धवती नाम विख्यात हो गया। इस पृथ्वीपर एक योजन दूरके मनुष्य भी उसकी दिव्य सुगन्धका अनुभव करते थे। इस कारण उसका दूसरा नाम योजनगन्धा हो गया
Sesudah memperoleh anugerah itu, Satyavatī bersukacita; berhias dengan sifat-sifat yang layak bagi keadaan seorang perempuan, ia pun bersatu dengan resi Parāśara yang berdaya gaib. Karena keharuman dari tubuhnya menyebar, di bumi ia dikenang dengan nama lain: Yojanagandhā, “yang wanginya menjangkau satu yojana.”
Verse 82
तेन गन्धवतीत्येवं नामास्या: प्रथितं भुवि | तस्यास्तु योजनाद् गन्धमाजिध्रन्त नरा भुवि
Karena itu, namanya pun termasyhur di bumi sebagai “Gandhavatī”, Sang Harum. Bahkan orang-orang di dunia dapat mencium keharumannya dari jarak satu yojana.
Verse 83
इति सत्यवती हृष्टा लब्ध्वा वरमनुत्तमम्,इस प्रकार परम उत्तम वर पाकर हर्षोल्लाससे भरी हुई सत्यवतीने महर्षि पराशरका संयोग प्राप्त किया और तत्काल ही एक शिशुको जन्म दिया। यमुनाके द्वीपमें अत्यन्त शक्तिशाली पराशरनन्दन व्यास प्रकट हुए
Demikian Satyavatī, bersukacita setelah memperoleh anugerah yang tiada banding, bersatu dengan resi agung Parāśara dan seketika melahirkan seorang putra. Di sebuah pulau di Sungai Yamunā tampaklah Vyāsa yang perkasa, putra Parāśara.
Verse 84
पराशरेण संयुक्ता सद्यो गर्भ सुषाव सा । जज्ञे च यमुनाद्वीपे पाराशर्य: स वीर्यवान्,इस प्रकार परम उत्तम वर पाकर हर्षोल्लाससे भरी हुई सत्यवतीने महर्षि पराशरका संयोग प्राप्त किया और तत्काल ही एक शिशुको जन्म दिया। यमुनाके द्वीपमें अत्यन्त शक्तिशाली पराशरनन्दन व्यास प्रकट हुए
Bersatu dengan Parāśara, ia seketika mengandung dan seketika pula melahirkan. Di pulau Yamunā lahirlah Pārāśarya (Vyāsa), putra Parāśara, yang gagah perkasa.
Verse 85
स मातरमनुज्ञाप्य तपस्येव मनो दधे | स्मृतो<5हं दर्शयिष्यामि कृत्येष्विति च सोडब्रवीत्,उन्होंने मातासे यह कहा--“आवश्यकता पड़नेपर तुम मेरा स्मरण करना। मैं अवश्य दर्शन दूँगा।/ इतना कहकर माताकी आज्ञा ले व्यासजीने तपस्यामें ही मन लगाया
Setelah memperoleh izin ibunya, ia memusatkan batinnya semata-mata pada tapa. Ia pun berkata kepadanya, “Bila kebutuhan datang, ingatlah aku; aku pasti akan menampakkan diri.” Demikian, setelah berpamitan kepada ibunya, Vyāsa menekuni tapa.
Verse 86
एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात् | न्यस्तो द्वीपे स यद् बालस्तस्माद् द्वैपायन: स्मृत:,इस प्रकार महर्षि पराशरद्वारा सत्यवतीके गर्भसे द्वैपायन व्यासजीका जन्म हुआ। वे बाल्यावस्थामें ही यमुनाके द्वीपमें छोड़ दिये गये, इसलिये “द्वैपायन' नामसे प्रसिद्ध हुए
Demikianlah Dvaipāyana (Vyāsa) lahir dari Satyavatī melalui resi Parāśara. Dan karena ketika masih kanak-kanak ia ditinggalkan di sebuah pulau, ia dikenang dengan nama “Dvaipāyana” (yang lahir di pulau).
Verse 87
(ततः सत्यवती हृष्टा जगाम स्वं निवेशनम् । तस्यास्त्वायोजनाद् गन्धमाजिध्रन्ति नरा भुवि ।। दाशराजस्तु तद्गन्धमाजिप्रन् प्रीतिमावहत् ।) तदनन्तर सत्यवती प्रसन्नतापूर्वक अपने घरपर गयी। उस दिनसे भूमण्डलके मनुष्य एक योजन दूरसे ही उसकी दिव्य गन्धका अनुभव करने लगे। उसका पिता दाशराज भी उसकी गन्ध सूँघकर बहुत प्रसन्न हुआ। दाश उवाच (त्वामाहुर्मत्स्यगन्धेति कथं बाले सुगन्धता । अपास्य मत्स्यगन्धत्वं केन दत्ता सुगन्धता ।।) दाशराजने पूछा--बेटी! तेरे शरीरसे मछलीकी-सी दुर्गन्ध आनेके कारण लोग तुझे “मत्स्यगन्धा" कहा करते थे, फिर तुझमें यह सुगन्ध कहाँसे आ गयी? किसने यह मछलीकी दुर्गन््ध दूर कर तेरे शरीरको सुगन्ध प्रदान की है? सत्यवत्युवाच (शक्ति: पुत्रो महाप्राज्ञ: पराशर इति स्मृत: ।। नावं वाहयमानाया मम दृष्टवा सुगर्हितम् । अपास्य मत्स्यगन्धत्वं योजनाद् गन्धतां ददौ ।। ऋषे: प्रसाद दृष्टवा तु जना: प्रीतिमुपागमन् ।) सत्यवती बोली--पिताजी! महर्षि शक्तिके पुत्र महाज्ञानी पराशर हैं, (वे यमुनाजीके तटपर आये थे; उस समय) मैं नाव खे रही थी। उन्होंने मेरी दुर्गग्धताकी ओर लक्ष्य करके मुझपर कृपा की और मेरे शरीरसे मछलीकी गन्ध दूर करके ऐसी सुगन्ध दे दी, जो एक योजन दूरतक अपना प्रभाव रखती है। महर्षिका यह कृपाप्रसाद देखकर सब लोग बड़े प्रसन्न हुए। पादापसारिणं धर्म स तु विद्वान युगे युगे । आयु: शक्ति च मर्त्यानां युगावस्थामवेक्ष्य च,विद्वान् द्वैपायनजीने देखा कि प्रत्येक युगमें धर्मका एक-एक पाद लुप्त होता जा रहा है। मनुष्योंकी आयु और शक्ति क्षीण हो चली है और युगकी ऐसी दुरवस्था हो गयी है। यह सब देख-सुनकर उन्होंने वेद और ब्राह्मणोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे वेदोंका व्यास (विस्तार) किया। इसलिये वे व्यास नामसे विख्यात हुए
Kemudian Satyavatī, dengan hati gembira, kembali ke rumahnya. Sejak hari itu, manusia di bumi dapat merasakan keharuman ilahinya bahkan dari jarak satu yojana. Ayahnya, Dāśarāja, pun mencium wangi itu dan dipenuhi sukacita. Dāśarāja berkata, “Anakku! Dahulu orang memanggilmu ‘Matsyagandhā’ karena bau ikan. Bagaimana kini engkau menjadi harum? Siapa yang menyingkirkan bau itu dan menganugerahkan wewangian ini?” Satyavatī menjawab, “Ayahanda! Resi Parāśara, putra Maharsi Śakti yang termasyhur bijaksana—ketika aku sedang mengemudikan perahu, beliau melihatku dan berbelas kasih. Beliau menghapus bau ikan dari tubuhku dan menganugerahkan harum yang menjangkau satu yojana. Melihat anugerah sang resi, orang-orang pun bersukacita.”
Verse 88
ब्रह्मणो ब्राह्मणानां च तथानुग्रहकाड्क्षया । विव्यास वेदान् यस्मात् स तस्माद् व्यास इति स्मृत:,विद्वान् द्वैपायनजीने देखा कि प्रत्येक युगमें धर्मका एक-एक पाद लुप्त होता जा रहा है। मनुष्योंकी आयु और शक्ति क्षीण हो चली है और युगकी ऐसी दुरवस्था हो गयी है। यह सब देख-सुनकर उन्होंने वेद और ब्राह्मणोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे वेदोंका व्यास (विस्तार) किया। इसलिये वे व्यास नामसे विख्यात हुए
Dengan hasrat menganugerahkan rahmat kepada Brahmā dan para Brahmana, ia mengembangkan serta membagi-bagi Veda. Karena ia melakukan “vyāsa” (pengembangan/pembagian) atas Veda, ia dikenang dengan nama Vyāsa.
Verse 89
वेदानध्यापयामास महाभारतपज्चमान् | सुमन्तुं जैमिनिं पैलं शुकं चैव स्वमात्मजम्,सर्वश्रेष्ठ वरदायक भगवान् व्यासने चारों वेदों तथा पाँचवें वेद महाभारतका अध्ययन सुमन्तु, जैमिनि, पैल, अपने पुत्र शुकदेव तथा मुझ वैशम्पायनको कराया। फिर उन सबने पृथक्-पृथक् महाभारतकी संहिताएँ प्रकाशित की
Bhagavān Vyāsa—yang termulia di antara para resi dan penganugerah karunia—mengajarkan keempat Veda serta Mahābhārata yang dihormati sebagai “Veda kelima” kepada Sumantu, Jaimini, Paila, putranya sendiri Śuka, dan kepadaku, Vaiśampāyana. Setelah itu, masing-masing dari mereka, menurut caranya sendiri, menampakkan dan menyebarkan saṁhitā Mahābhārata yang berbeda-beda.
Verse 90
प्रभुर्वरिष्ठो वरदो वैशम्पायनमेव च । संहितास्तै: पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिता:,सर्वश्रेष्ठ वरदायक भगवान् व्यासने चारों वेदों तथा पाँचवें वेद महाभारतका अध्ययन सुमन्तु, जैमिनि, पैल, अपने पुत्र शुकदेव तथा मुझ वैशम्पायनको कराया। फिर उन सबने पृथक्-पृथक् महाभारतकी संहिताएँ प्रकाशित की
Dāśa berkata: Sang Penguasa tertinggi, yang paling mulia dan penganugeraha anugerah—Bhagavān Vyāsa—mengajarkan kepadaku, Vaiśampāyana, serta kepada Sumantu, Jaimini, Paila, dan putranya sendiri Śukadeva, telaah atas keempat Veda dan juga Veda kelima, Mahābhārata. Sesudah itu, masing-masing dari mereka, secara terpisah, menampakkan dan menyebarluaskan saṁhitā (resensi) Mahābhārata yang berbeda-beda.
Verse 91
तथा भीष्म: शान्तनवो गड़ायाममितद्युति: | वसुवीर्यात् समभवन्महावीर्यो महायशा:,अमिततेजस्वी शान्तनुनन्दन भीष्म आठवें वसुके अंशसे तथा गंगाजीके गर्भसे उत्पन्न हुए। वे महान् पराक्रमी और अत्यन्त यशस्वी थे
Dāśa berkata: Demikianlah Bhīṣma, putra Śāntanu yang bercahaya tak terukur, lahir dari rahim Gaṅgā melalui daya (aṁśa) Vasu. Ia tumbuh menjadi kesatria berkeperkasaan besar dan termasyhur luas—termulia dalam kekuatan, keteguhan, dan nama baik.
Verse 92
वेदार्थविच्च भगवानृषिर्विप्रो महायशा: । शूले प्रोत: पुराणर्षिरचौरश्लनौरशड्कया,पूर्वकालकी बात है वेदार्थोंके ज्ञाता, महान् यशस्वी, पुरातन मुनि, ब्रह्मर्षि भगवान् अणीमाण्डव्य चोर न होते हुए भी चोरके संदेहसे शूलीपर चढ़ा दिये गये। परलोकमें जानेपर उन महायशस्वी महर्षिने पहले धर्मको बुलाकर इस प्रकार कहा--
Dāśa berkata: Ini kisah purba. Ada seorang Brahmarṣi yang mulia dan termasyhur—Aṇīmāṇḍavya—seorang brāhmaṇa, mahatahu makna Veda. Walau bukan pencuri, ia dipancang pada pasak hanya karena kecurigaan pencurian. Setelah ia berangkat ke alam sana, sang resi agung itu mula-mula memanggil Dharma dan berkata demikian.
Verse 93
अणीमाण्डव्य इत्येवं विख्यात: स महायशा: । स धर्ममाहूय पुरा महर्षिरिदमुक्तवान्,पूर्वकालकी बात है वेदार्थोंके ज्ञाता, महान् यशस्वी, पुरातन मुनि, ब्रह्मर्षि भगवान् अणीमाण्डव्य चोर न होते हुए भी चोरके संदेहसे शूलीपर चढ़ा दिये गये। परलोकमें जानेपर उन महायशस्वी महर्षिने पहले धर्मको बुलाकर इस प्रकार कहा--
Ia termasyhur dengan nama Aṇīmāṇḍavya, seorang resi agung yang mulia. Pada masa lampau, ia memanggil Dharma dan mengucapkan kata-kata ini.
Verse 94
इषीकया मया बाल्याद् विद्धा होका शकुन्तिका । तत् किल्बिषं स्मरे धर्म नान्यत् पापमहं स्मरे,'धर्मराज! पहले कभी मैंने बाल्यावस्थाके कारण सींकसे एक चिड़ियेके बच्चेको छेद दिया था। वही एक पाप मुझे याद आ रहा है। अपने दूसरे किसी पापका मुझे स्मरण नहीं है
Wahai Dharma-rāja! Pada masa kanak-kanak, karena kecerobohan kekanak-kanakan, aku pernah menusuk seekor anak burung dengan sebatang buluh. Itulah satu-satunya kesalahan yang kuingat; selain itu aku tak mengingat dosa apa pun dariku.
Verse 95
तन्मे सहस्रममितं कस्मान्नेहाजयत् तपः । गरीयान् ब्राह्णवध: सर्वभूतवधाद् यत:,“मैंने अगणित सहस्रगुना तप किया है। फिर उस तपने मेरे छोटे-से पापको क्यों नहीं नष्ट कर दिया। ब्राह्मणका वध समस्त प्राणियोंके वधसे बड़ा है
Aku telah menjalankan tapa-pertapaan seribu kali lipat, tak terhingga; mengapa tapa itu tidak menaklukkan dan memusnahkan dosa kecilku ini? Sebab membunuh seorang brāhmaṇa lebih berat—lebih mengerikan—daripada membunuh semua makhluk hidup lainnya.
Verse 96
तस्मात् त्वं किल्बिषी धर्म शूद्रयोनौ जनिष्यसि । तेन शापेन धर्मोडपि शूद्रयोनावजायत,(तुमने मुझे शूलीपर चढ़वाकर वही पाप किया है) इसलिये तुम पापी हो। अतः पृथ्वीपर शूद्रकी योनिमें तुम्हें जन्म लेना पड़ेगा।/ अणीमाण्डव्यके उस शापसे धर्म भी शूद्रकी योनिमें उत्पन्न हुए
Karena itu, wahai Dharma, engkau benar-benar ternoda oleh dosa; engkau akan lahir dalam rahim seorang Śūdra. Oleh kutukan itulah—sebab engkau membuatku dipancang pada tombak dan melakukan kesalahan yang sama—Dharma pun terlahir dalam rahim seorang Śūdra.
Verse 97
विद्वान् विदुररूपेण धार्मी तनुरकिल्बिषी । संजयो मुनिकल्पस्तु जज्ञे सूतो गवल्गणात्,पापरहित विद्वान् विदुरके रूपमें धर्मराजका शरीर ही प्रकट हुआ था। उसी समय गवल्गणसे संजय नामक सूतका जन्म हुआ, जो मुनियोंके समान ज्ञानी और धर्मात्मा थे
Perwujudan Dharma yang saleh dan tanpa noda menampakkan diri dalam rupa Vidura yang bijaksana. Pada saat yang sama, dari Gavalgaṇa lahirlah Saṃjaya, seorang sūta yang berwawasan dan berbudi, laksana para resi.
Verse 98
सूर्याच्च कुन्तिकन्याया जज्ञे कर्णो महाबल: । सहजं कवचं बिश्रत् कुण्डलो द्योतितानन:,राजा कुन्तिभोजकी कन्या कुन्तीके गर्भसे सूर्यके अंशसे महाबली कर्णकी उत्पत्ति हुई। वह बालक जन्मके साथ ही कवचधारी था। उसका मुख शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए कुण्डलकी प्रभासे प्रकाशित होता था
Dari Sang Surya dan dari Kuntī sang gadis, lahirlah Karṇa yang mahakuat. Ia datang ke dunia telah mengenakan zirah alaminya, dan wajahnya bersinar oleh cahaya anting-anting yang lahir bersamanya.
Verse 99
अनुग्रहार्थ लोकानां विष्णुलोकनमस्कृत: । वसुदेवात् तु देवक्यां प्रादुर्भूतोी महायशा:,उन्हीं दिनों विश्ववन्दित महायशस्वी भगवान् विष्णु जगत्के जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये वसुदेवजीके द्वारा देवकीके गर्भसे प्रकट हुए
Demi menganugerahkan rahmat kepada segenap makhluk, Tuhan Viṣṇu yang termasyhur—yang dihormati bahkan di alam Viṣṇu—menampakkan diri, lahir melalui Vasudeva dalam kandungan Devakī.
Verse 100
अनादिनिधनो देव: स कर्ता जगत: प्रभु: । अव्यक्तमक्षरं ब्रह्म प्रधानं त्रिगुणात्मकम्,वे भगवान् आदि-अन्तसे रहित, द्युतिमान, सम्पूर्ण जगतके कर्ता तथा प्रभु हैं। उन्हींको अव्यक्त अक्षर (अविनाशी) ब्रह्म और त्रिगुणमय प्रधान कहते हैं
Dāśa berkata: Tuhan yang bercahaya itu tanpa awal dan tanpa akhir; Dialah pencipta dan penguasa seluruh jagat. Dialah yang disebut Yang Tak-Termanifest (Avyakta), Brahman yang Tak-Binasakan (Akṣara), dan Pradhāna—asas purba yang tersusun dari tiga guṇa.
Verse 101
आत्मानमव्ययं चैव प्रकृतिं प्रभवं प्रभुम् । पुरुष विश्वकर्माणं सत्त्वयोगं ध्रुवाक्षरम्,आत्मा, अव्यय, प्रकृति (उपादान), प्रभव (उत्पत्ति-कारण), प्रभु (अधिष्ठाता), पुरुष (अन्तर्यामी), विश्वकर्मा, सत्त्वगुणसे प्राप्त होने योग्य तथा प्रणवाक्षर भी वे ही हैं; उन्हींको अनन्त, अचल, देव, हंस, नारायण, प्रभु, धाता, अजन्मा, अव्यक्त, पर, अव्यय, कैवल्य, निर्मुण, विश्वरूप, अनादि, जन्मरहित और अविकारी कहा गया है। वे सर्वव्यापी, परम पुरुष परमात्मा, सबके कर्ता और सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं
Dāśa berkata: Dialah Sang Diri (Ātman), tak berubah dan tak binasa; Dialah pula Prakṛti, sumber kemunculan, dan Tuhan Yang Berdaulat. Dialah Puruṣa yang bersemayam di dalam, Viśvakarmā sang perajin semesta, dapat dicapai melalui disiplin sattva, dan suku kata yang teguh serta tak lapuk. Karena itu Ia dipuji dengan banyak nama—tanpa akhir dan tak tergoyahkan, ilahi, Haṃsa, Nārāyaṇa, Sang Penguasa, Sang Penopang, tak terlahir dan tak termanifest, tertinggi dan tak berubah, kaivalya yang mutlak dan melampaui guṇa, berwujud semesta, tanpa awal, tanpa kelahiran, dan tak mengalami perubahan. Meresapi segalanya, Ia adalah Puruṣa Tertinggi, Ātman Tertinggi—pelaku segala dan leluhur agung semua makhluk.
Verse 102
अनन्तमचलं देवं हंसं नारायणं प्रभुम् । धातारमजमव्यक्तं यमाहु: परमव्ययम्,आत्मा, अव्यय, प्रकृति (उपादान), प्रभव (उत्पत्ति-कारण), प्रभु (अधिष्ठाता), पुरुष (अन्तर्यामी), विश्वकर्मा, सत्त्वगुणसे प्राप्त होने योग्य तथा प्रणवाक्षर भी वे ही हैं; उन्हींको अनन्त, अचल, देव, हंस, नारायण, प्रभु, धाता, अजन्मा, अव्यक्त, पर, अव्यय, कैवल्य, निर्मुण, विश्वरूप, अनादि, जन्मरहित और अविकारी कहा गया है। वे सर्वव्यापी, परम पुरुष परमात्मा, सबके कर्ता और सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं
Dāśa berkata: Mereka menyebut-Nya Yang Tak Bertepi dan Tak Bergerak—Dewa, Haṃsa yang suci, Nārāyaṇa, Sang Penguasa; Sang Penopang, Yang Tak Terlahir, Yang Tak Termanifest, Yang Mahatinggi, Yang Tak Binasa. Dialah Diri batin yang tak berubah; Dialah Prakṛti sebagai sebab material, sumber kemunculan, penguasa yang memerintah, Puruṣa yang bersemayam di dalam, dan Viśvakarmā sang perajin kosmos. Dapat dicapai melalui sattva dan ditandai oleh suku kata suci Oṁ, Ia dipuji sebagai tanpa akhir, teguh, tanpa awal, tanpa kelahiran, tak berubah, meresapi segalanya—Puruṣa Tertinggi, Ātman Tertinggi—pelaku segala dan leluhur agung semua makhluk.
Verse 103
कैवल्यं निर्गुणं विश्वमनादिमजमव्ययम् | पुरुष: स विभु: कर्ता सर्वभूतपितामह:,आत्मा, अव्यय, प्रकृति (उपादान), प्रभव (उत्पत्ति-कारण), प्रभु (अधिष्ठाता), पुरुष (अन्तर्यामी), विश्वकर्मा, सत्त्वगुणसे प्राप्त होने योग्य तथा प्रणवाक्षर भी वे ही हैं; उन्हींको अनन्त, अचल, देव, हंस, नारायण, प्रभु, धाता, अजन्मा, अव्यक्त, पर, अव्यय, कैवल्य, निर्मुण, विश्वरूप, अनादि, जन्मरहित और अविकारी कहा गया है। वे सर्वव्यापी, परम पुरुष परमात्मा, सबके कर्ता और सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं
Dāśa berkata: Kenyataan Tertinggi itu adalah kaivalya—keesaan mutlak—melampaui guṇa; Ia adalah semesta yang meliputi segalanya, tanpa awal, tak terlahir, dan tak binasa. Dialah Puruṣa: meresapi segala, berdaulat, pelaku dan penata, Diri batin, serta leluhur agung semua makhluk. Ia juga dipuji dengan banyak sebutan suci—sebagai dasar material dan sumber penciptaan, Tuhan yang memerintah, Viśvakarmā, dapat dicapai melalui sattva, bahkan sebagai suku kata Oṁ—menunjukkan bahwa Yang Esa didekati melalui beragam uraian.
Verse 104
धर्मसंवर्धनार्थाय प्रजज्ञेडन्धकवृष्णिषु । अस्त्रज्ञौ तु महावीर्यों सर्वशास्त्रविशारदौ,उन्होंने ही धर्मकी वृद्धिके लिये अन्धक और वृष्णिकुलमें बलराम और श्रीकृष्णरूपमें अवतार लिया था। वे दोनों भाई सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता, महापराक्रमी और समस्त शास्त्रोंके ज्ञानमें परम प्रवीण थे
Dāśa berkata: Demi menumbuhkan dan menegakkan dharma, mereka lahir di tengah kaum Andhaka dan Vṛṣṇi. Dua bersaudara itu tampil di sana sebagai Balarāma dan Śrī Kṛṣṇa—perkasa dalam keberanian, mahir dalam segala senjata, dan sangat mendalam pengetahuannya dalam seluruh śāstra, baik suci maupun praktis.
Verse 105
सात्यकि: कृतवर्मा च नारायणमनुव्रतौ । सत्यकाद् हृदिकाच्चैव जज्ञाते<स्त्रविशारदौ,सत्यकसे सात्यकि और हृदिकसे कृतवर्माका जन्म हुआ था। वे दोनों अस्त्रविद्यामें अत्यन्त निपुण और भगवान् श्रीकृष्णके अनुगामी थे
Sātyaki dan Kṛtavarmā—keduanya teguh sebagai pengikut Nārāyaṇa—lahir masing-masing dari Satyaka dan dari Hṛdika. Keduanya sangat mahir dalam ilmu senjata dan setia mengikuti Śrī Kṛṣṇa.
Verse 106
भरद्वाजस्य च स्कन्न॑ द्रोण्यां शुक्रमवर्धत । महर्षेरुग्रतपसस्तस्माद् द्रोणो व्यजायत,एक समय उग्रतपस्वी महर्षि भरद्वाजका वीर्य किसी द्रोणी (पर्वतकी गुफा)-में स्खलित होकर धीरे-धीरे पुष्ट होने लगा। उसीसे द्रोणका जन्म हुआ
Benih sang maharsi Bharadvāja, pertapa dengan tapa yang keras, jatuh ke dalam sebuah droṇī dan di sana perlahan tumbuh serta matang. Dari benih itulah Droṇa lahir.
Verse 107
गौतमान्मिथुनं जज्ञे शरस्तम्बाच्छरद्वत: | अश्वत्थाम्नश्न॒ जननी कृपश्चैव महाबल:,किसी समय गौतमगोत्रीय शरद्वानका वीर्य सरकंडेके समूहपर गिरा और दो भागोंमें बँट गया। उसीसे एक कन्या और एक पुत्रका जन्म हुआ। कन्याका नाम कृपी था, जो अश्वत्थामाकी जननी हुई। पुत्र महाबली कृपके नामसे विख्यात हुआ
Dari resi Śaradvat keturunan Gautama, sepasang anak lahir dari rumpun ilalang. Benihnya jatuh pada rimbun ilalang itu dan terbelah dua, melahirkan seorang putri dan seorang putra. Putri itu bernama Kṛpī—kelak ibu Aśvatthāmā—dan putranya termasyhur sebagai Kṛpa yang perkasa.
Verse 108
अभश्रृत्थामा ततो जज्ञे द्रोणादेव महाबल: । तथैव धृष्टद्युम्नोडपि साक्षादग्निसमद्युति:,तदनन्तर द्रोणाचार्यसे महाबली अश्वत्थामाका जन्म हुआ। इसी प्रकार यज्ञकर्मका अनुष्ठान होते समय प्रज्वलित अग्निसे धृष्टद्युम्नका प्रादुर्भाव हुआ, जो साक्षात् अग्निदेवके समान तेजस्वी था। पराक्रमी वीर धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये धनुष लेकर प्रकट हुआ था
Sesudah itu, dari Droṇa lahirlah Aśvatthāmā yang perkasa. Demikian pula, ketika upacara kurban suci berlangsung, Dhṛṣṭadyumna menampakkan diri dari api yang menyala-nyala, bercahaya laksana Agni sendiri.
Verse 109
वैताने कर्मणि तत: पावकात् समजायत । वीरो द्रोणविनाशाय धनुरादाय वीर्यवान्,तदनन्तर द्रोणाचार्यसे महाबली अश्वत्थामाका जन्म हुआ। इसी प्रकार यज्ञकर्मका अनुष्ठान होते समय प्रज्वलित अग्निसे धृष्टद्युम्नका प्रादुर्भाव हुआ, जो साक्षात् अग्निदेवके समान तेजस्वी था। पराक्रमी वीर धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये धनुष लेकर प्रकट हुआ था
Kemudian, dalam upacara Veda yang khidmat, dari api (Pāvaka) lahirlah seorang pahlawan. Ia, gagah perkasa, mengangkat busur dan menampakkan diri demi kebinasaan Droṇa.
Verse 110
तत्रैव वेद्यां कृष्णापि जज्ञे तेजस्विनी शुभा । विभ्राजमाना वपुषा बिश्रती रूपमुत्तमम्,उसी यज्ञकी वेदीसे शुभस्वरूपा तेजस्विनी द्रौपदी उत्पन्न हुई, जो परम उत्तम रूप धारण करके अपने सुन्दर शरीरसे अत्यन्त शोभा पा रही थी
Di sana juga, di atas altar yajña, lahirlah Kṛṣṇā (Draupadī)—bertanda baik dan bercahaya. Berkilau oleh sinar tubuhnya, ia menampakkan diri dengan keelokan yang tiada banding.
Verse 111
प्रह्मदशिष्यो नग्नजित् सुबलश्चाभवत् ततः । तस्य प्रजा धर्महन्त्री जज्ञे देवप्रकोपनात्,प्रहादका शिष्य नग्नजित् राजा सुबलके रूपमें प्रकट हुआ। देवताओंके कोपसे उसकी संतति (शकुनि) धर्मका नाश करनेवाली हुई। गान्धारराज सुबलका पुत्र शकुनि एवं सौबल नामसे विख्यात हुआ तथा उनकी पुत्री गान्धारी दुर्योधनकी माता थी। ये दोनों भाई-बहिन अर्थशास्त्रके ज्ञानमें निपुण थे
Sesudah itu, dalam garis murid Brahmadaśa, Nagnajit menampakkan diri, lalu Subala pun lahir. Namun karena murka para dewa, keturunan Subala menjadi penghancur dharma.
Verse 112
गान्धारराजपुत्रो 5 भूच्छकुनि: सौबलस्तथा । दुर्योधनस्य जननी जज्ञातेडर्थविशारदौ,प्रहादका शिष्य नग्नजित् राजा सुबलके रूपमें प्रकट हुआ। देवताओंके कोपसे उसकी संतति (शकुनि) धर्मका नाश करनेवाली हुई। गान्धारराज सुबलका पुत्र शकुनि एवं सौबल नामसे विख्यात हुआ तथा उनकी पुत्री गान्धारी दुर्योधनकी माता थी। ये दोनों भाई-बहिन अर्थशास्त्रके ज्ञानमें निपुण थे
Dari raja Gāndhāra lahirlah Śakuni—yang juga termasyhur dengan nama Saubala. Dan saudari perempuannya, Gāndhārī, menjadi ibu Duryodhana. Keduanya dikenal mahir dalam arthaśāstra, siasat dan perhitungan duniawi.
Verse 113
कृष्णद्वैपायनाज्जज्ञे धृतराष्ट्रो जनेश्वर: । क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य पाण्डुश्वैव महाबल:,राजा विचित्रवीर्यकी क्षेत्रभूता अम्बिका और अम्बालिकाके गर्भसे कृष्णद्वैपायन व्यासद्वारा राजा धृतराष्ट्र और महाबली पाण्डुका जन्म हुआ। द्वैपायन व्याससे ही शूद्रजातीय स्त्रीके गर्भसे विदुरजीका भी जन्म हुआ था। वे धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण, बुद्धिमान, मेधावी और निष्पाप थे। पाण्डुसे दो स्त्रियोंके द्वारा पृथक्-पृथक् पाँच पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब देवताओंके समान थे। उन सबमें बड़े युधिष्ठिर थे। वे उत्तम गुणोंमें भी सबसे बढ़-चढ़कर थे
Dari Kṛṣṇa-Dvaipāyana (Vyāsa) lahirlah Dhṛtarāṣṭra, penguasa di antara manusia; dan pada kṣetra (rahim istri) Raja Vicitravīrya, Pāṇḍu pun lahir, besar kekuatannya.
Verse 114
धर्मार्थकुशलो धीमान् मेधावी धूतकल्मष: । विदुर: शूद्रयोनौ तु जज्ञे द्रैपायनादपि,राजा विचित्रवीर्यकी क्षेत्रभूता अम्बिका और अम्बालिकाके गर्भसे कृष्णद्वैपायन व्यासद्वारा राजा धृतराष्ट्र और महाबली पाण्डुका जन्म हुआ। द्वैपायन व्याससे ही शूद्रजातीय स्त्रीके गर्भसे विदुरजीका भी जन्म हुआ था। वे धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण, बुद्धिमान, मेधावी और निष्पाप थे। पाण्डुसे दो स्त्रियोंके द्वारा पृथक्-पृथक् पाँच पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब देवताओंके समान थे। उन सबमें बड़े युधिष्ठिर थे। वे उत्तम गुणोंमें भी सबसे बढ़-चढ़कर थे
Vidura pun—mahir dalam dharma dan artha, bijaksana, cerdas, dan bersih dari noda—lahir dari rahim seorang perempuan Śūdra; ia juga diperanakkan oleh Dvaipāyana (Vyāsa).
Verse 115
पाण्डोस्तु जज्ञिरे पज्च पुत्रा देवसमा: पृथक् । द्वयो: स्त्रियोर्गुणज्येष्ठस्तेषामासीद् युधिष्ठिर:,राजा विचित्रवीर्यकी क्षेत्रभूता अम्बिका और अम्बालिकाके गर्भसे कृष्णद्वैपायन व्यासद्वारा राजा धृतराष्ट्र और महाबली पाण्डुका जन्म हुआ। द्वैपायन व्याससे ही शूद्रजातीय स्त्रीके गर्भसे विदुरजीका भी जन्म हुआ था। वे धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण, बुद्धिमान, मेधावी और निष्पाप थे। पाण्डुसे दो स्त्रियोंके द्वारा पृथक्-पृथक् पाँच पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब देवताओंके समान थे। उन सबमें बड़े युधिष्ठिर थे। वे उत्तम गुणोंमें भी सबसे बढ़-चढ़कर थे
Dari Pāṇḍu lahirlah lima putra, masing-masing dari kedua istrinya secara terpisah, semuanya laksana para dewa. Di antara putra-putra dari kedua permaisuri itu, Yudhiṣṭhira adalah yang sulung dan yang paling unggul dalam budi—terdepan dalam kebajikan yang menegakkan dharma dan tata pemerintahan yang benar.
Verse 116
धर्माद् युधिष्ठिरो जज्ञे मारुताच्च वृकोदर: । इन्द्रादू धनंजय: श्रीमान् सर्वशस्त्रभृतां वर:,युधिष्ठिर धर्मसे, भीमसेन वायुदेवतासे, सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीमान् अर्जुन इन्द्रदेवसे तथा सुन्दर रूपवाले नकुल और सहदेव अभश्विनीकुमारोंसे उत्पन्न हुए थे। वे जुड़वें पैदा हुए थे। नकुल और सहदेव सदा गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहते थे
Dari Dharma lahir Yudhiṣṭhira; dari Māruta (Dewa Angin) lahir Vṛkodara (Bhīma); dan dari Indra lahir Dhanañjaya (Arjuna) yang mulia, terunggul di antara semua pemanggul senjata.
Verse 117
जज्ञाते रूपसम्पन्नावश्चिभ्यां च यमावपि । नकुल: सहदेवश्व गुरुशुश्रूषणे रतो,युधिष्ठिर धर्मसे, भीमसेन वायुदेवतासे, सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीमान् अर्जुन इन्द्रदेवसे तथा सुन्दर रूपवाले नकुल और सहदेव अभश्विनीकुमारोंसे उत्पन्न हुए थे। वे जुड़वें पैदा हुए थे। नकुल और सहदेव सदा गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहते थे
Dan dari para Aśvin lahirlah sepasang saudara kembar yang elok rupanya: Nakula dan Sahadeva, yang senantiasa tekun dalam bakti dan pelayanan kepada para guru serta para tua-tua.
Verse 118
तथा पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमत: । दुर्योधनप्रभूतयो युयुत्सु: करणस्तथा,परम बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रके दुर्योधन आदि सौ पुत्र हुए। इनके अतिरिक्त युयुत्सु भी उन्हींका पुत्र था। वह वैश्यजातीय मातासे उत्पन्न होनेके कारण “करण-” कहलाता था
Kemudian, raja Dhṛtarāṣṭra yang bijaksana memperanakkan seratus putra, dipimpin oleh Duryodhana; dan ia juga mempunyai Yuyutsu, yang disebut pula Karaṇa.
Verse 119
ततो दुःशासनश्वैव दुःसहश्लापि भारत | दुर्मर्षणो विकर्णश्व॒ चित्रसेनो विविंशति:,भरतवंशी जनमेजय! धृतराष्ट्रके पुत्रोंमें दुर्योधन, दुःशासन, दुःसह, दुर्मर्षण, विकर्ण, चित्रसेन, विविंशति, जय, सत्यव्रत, पुरुमित्र तथा वैश्यापुत्र युयुत्सु--ये ग्यारह महारथी थे
Lalu (disebut pula), wahai Bhārata: Duḥśāsana, Duḥsaha, Durmarṣaṇa, Vikarna, Citraseṇa, dan Viviṁśati—nama-nama ini pun termasuk dalam deretan putra-putra Dhṛtarāṣṭra.
Verse 120
जय: सत्यव्रतश्नैव पुरुमित्रश्न भारत । वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्नव एकादश महारथा:,भरतवंशी जनमेजय! धृतराष्ट्रके पुत्रोंमें दुर्योधन, दुःशासन, दुःसह, दुर्मर्षण, विकर्ण, चित्रसेन, विविंशति, जय, सत्यव्रत, पुरुमित्र तथा वैश्यापुत्र युयुत्सु--ये ग्यारह महारथी थे
Dāśa berkata: “Wahai Bhārata, di antara putra-putra Dhṛtarāṣṭra beserta para sekutunya, inilah sebelas mahāratha—Duryodhana, Duḥśāsana, Duḥsaha, Durmarṣaṇa, Vikarṇa, Citraseṇa, Viviṁśati, Jaya, Satyavrata, Purumitra, serta Yuyutsu, putra seorang perempuan Vaiśyā.”
Verse 121
अभिमन्यु: सुभद्रायामर्जुनादभ्यजायत । स्वस्त्रीयो वासुदेवस्य पौत्र: पाण्डोर्महात्मन:,अर्जुनद्वारा सुभद्राके गर्भसे अभिमन्युका जन्म हुआ। वह महात्मा पाण्डुका पौत्र और भगवान् श्रीकृष्णका भानजा था
Dāśa berkata: “Dari Arjuna, melalui Subhadrā, lahirlah Abhimanyu. Ia adalah kemenakan Vāsudeva (Kṛṣṇa) dan cucu dari Pāṇḍu yang berhati luhur.”
Verse 122
पाण्डवेभ्यो हि पाज्चाल्यां द्रौपद्यां पच जज्ञिरे । कुमारा रूपसम्पन्ना: सर्वशास्त्रविशारदा:,पाण्डवोंद्वारा द्रौपदीके गर्भसे पाँच पुत्र उत्पन्न हुए थे, जो बड़े ही सुन्दर और सब शास्त्रोंमें निपुण थे
Dāśa berkata: “Dari para Pāṇḍava, pada Draupadī putri Pāñcāla, lahirlah lima putra—para pangeran yang elok rupawan dan mahir dalam segala śāstra.”
Verse 123
प्रतिविन्ध्यो युधिष्ठिरात् सुतसोमो वृकोदरात् । अर्जुनाच्छुतकीर्तिस्तु शतानीकस्तु नाकुलि:,युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, भीमसेनसे सुतसोम, अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, नकुलसे शतानीक तथा सहदेवसे प्रतापी श्रुतसेनका जन्म हुआ था। भीमसेनके द्वारा हिडिम्बासे वनमें घटोत्कच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ
Dāśa berkata: “Dari Yudhiṣṭhira lahirlah Prativindhya; dari Vṛkodara (Bhīma) lahirlah Sutasoma; dari Arjuna lahirlah Śrutakīrti; dan dari Nakula lahirlah Śatānīka.”
Verse 124
तथैव सहदेवाच्च श्रुतसेन: प्रतापवान् | हिडिम्बायां च भीमेन वने जज्ञे घटोत्कच:,युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, भीमसेनसे सुतसोम, अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, नकुलसे शतानीक तथा सहदेवसे प्रतापी श्रुतसेनका जन्म हुआ था। भीमसेनके द्वारा हिडिम्बासे वनमें घटोत्कच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ
Dāśa berkata: “Demikian pula, dari Sahadeva lahirlah Śrutasena yang gagah perkasa. Dan di rimba, Bhīma memperanakkan pada Hiḍimbā seorang putra bernama Ghaṭotkaca.”
Verse 125
शिखण्डी द्रुपदाज्जज्ञे कन्या पुत्रत्वमागता । यां यक्ष: पुरुषं चक्रे स्थूण: प्रियचिकीर्षया,राजा ट्रपदसे शिखण्डी नामकी एक कन्या हुई, जो आगे चलकर पुत्ररूपमें परिणत हो गयी। स्थूणाकर्ण नामक यक्षने उसका प्रिय करनेकी इच्छासे उसे पुरुष बना दिया था
Dāśa berkata: Dari Drupada lahirlah Śikhaṇḍī sebagai seorang putri, yang kemudian dianggap sebagai putra. Seorang yakṣa bernama Sthūṇa, hendak berbuat kebajikan, mengubahnya menjadi laki-laki.
Verse 126
कुरूणां विग्रहे तस्मिन् समागच्छन् बहून् यथा । राज्ञां शतसहस्राणि योत्स्यमानानि संयुगे,कौरवोंके उस महासमरमें युद्ध करनेके लिये राजाओंके कई लाख योद्धा आये थे। दस हजार वर्षोतक गिनती की जाय तो भी उन असंख्य योद्धाओंके नाम पूर्णतः नहीं बताये जा सकते। यहाँ कुछ मुख्य-मुख्य राजाओंके नाम बताये गये हैं, जिनके चरित्रोंसे इस महाभारत-कथाका विस्तार हुआ है
Dāśa berkata: Dalam pertikaian para Kuru itu, sebagaimana dapat dibayangkan, berkumpullah kekuatan yang tak terhitung: ratusan ribu raja, semuanya berniat bertempur di medan laga.
Verse 127
तेषामपरिमेयानां नामथेयानि सर्वश: । न शकक््यानि समाख्यातुं वर्षाणामयुतैरपि । एते तु कीर्तिता मुख्या यैराख्यानमिदं ततम्,कौरवोंके उस महासमरमें युद्ध करनेके लिये राजाओंके कई लाख योद्धा आये थे। दस हजार वर्षोतक गिनती की जाय तो भी उन असंख्य योद्धाओंके नाम पूर्णतः नहीं बताये जा सकते। यहाँ कुछ मुख्य-मुख्य राजाओंके नाम बताये गये हैं, जिनके चरित्रोंसे इस महाभारत-कथाका विस्तार हुआ है
Nama-nama mereka yang tak terbilang itu (para raja dan kesatria) tidak mungkin diuraikan seluruhnya—sekalipun dihitung selama puluhan ribu tahun. Maka di sini hanya disebutkan tokoh-tokoh utama, melalui kisah merekalah riwayat ini terbentang luas.
Verse 743
विस्मिता साभवत् कन्या व्रीडिता च तपस्विनी । जिससे वहाँका सारा प्रदेश अन्धकारसे आच्छादित-सा हो गया। महर्षिद्वारा कुहरेकी सृष्टि देखकर वह तपस्विनी कन्या आश्वर्यचकित एवं लज्जित हो गयी
Gadis pertapa itu terperanjat, dan sekaligus merasa malu.
Verse 826
तस्या योजनगन्धेति ततो नामापरं स्मृतम् । तदनन्तर वरदान पाकर प्रसन्न हुई सत्यवती नारीपनके समागमोचित गुण (सद्यः ऋतुस्नान आदि)-से विभूषित हो गयी और उसने अद्धुतकर्मा महर्षि पराशरके साथ समागम किया। उसके शरीरसे उत्तम गन्ध फैलनेके कारण पृथ्वीपर उसका गन्धवती नाम विख्यात हो गया। इस पृथ्वीपर एक योजन दूरके मनुष्य भी उसकी दिव्य सुगन्धका अनुभव करते थे। इस कारण उसका दूसरा नाम योजनगन्धा हो गया
Sejak saat itu ia pun dikenang dengan nama lain: Yojanagandhā, “yang keharumannya menjangkau satu yojana.”
The chapter foregrounds an implicit dharma tension: the king’s duty to demonstrate protection and strength through the hunt versus the collateral disruption and suffering depicted in the wilderness ecosystem and among attendants.
Sovereignty is portrayed as performative and accountable: royal authority is sustained through visible discipline, coordinated force, and public endorsement, yet it operates within environments where power produces cascading consequences.
No explicit phalaśruti appears in this passage; its function is primarily narrative and thematic—establishing Duḥṣanta’s stature and the forest as a liminal arena that prepares for subsequent lineage-defining events.