
Sukta 5.3
Vasiṣṭha (traditional for RV 5.3)
Triṣṭubh
This hymn praises Agni as the many-faced divine power who, when kindled, embodies the sovereign order of Varuṇa, the harmony of Mitra, and the victorious might of Indra. It asks Agni to protect the worshiper from guilt, hostile speech, and secret or open harm, while turning away curses and restoring right movement (yāma) toward the Vasu—goodness and prosperity.
Mantra 1
त्वमग्ने वरुणो जायसे यत्त्वं मित्रो भवसि यत्समिद्धः । त्वे विश्वे सहसस्पुत्र देवास्त्वमिन्द्रो दाशुषे मर्त्याय ॥
अग्नि, जब तुम पैदा होते हो तो वरुण बन जाते हो। जब तुम जलते हो तो मित्र बन जाते हो। तुम्मे सारे देवता हैं, तुम ताकत के बेटा हो। जो कोई दान करता है उसके लिए तुम इंद्र बन जाते हो। उसको जीत और ताकत मिलती है।
Mantra 2
त्वमर्यमा भवसि यत्कनीनां नाम स्वधावन्गुह्यं बिभर्षि । अञ्जन्ति मित्रं सुधितं न गोभिर्यद्दम्पती समनसा कृणोषि ॥
जब तू छोटे-छोटे शक्तियों का गुप्ता नाम संभालता है, तब तू आर्यमन बन जाता है। यह नाम छुपा हुआ है, तू उसे अपने पास रखता है। मित्र को लोग अच्छे से पूजारते हैं, जैसे किरणों से साफ करते हैं। जब तू घर के दोनों स्वामियों को एक मन बनाता है, तब घर में प्यार और समझ आ जाती है।
Mantra 3
तव श्रिये मरुतो मर्जयन्त रुद्र यत्ते जनिम चारु चित्रम् । पदं यद्विष्णोरुपमं निधायि तेन पासि गुह्यं नाम गोनाम् ॥
रुद्र, तेरे चमक के लिए मरुत देवता खुद को चमकदार बनाते हैं। तेरा जन्म कितना सुंदर और अलग है। जब विष्णु का सबसे बड़ा कदम रखा जाता है, तब तू उसके द्वारा रोशनी की गायों का गुप्ता नाम बचाता है।
Mantra 4
तव श्रिया सुदृशो देव देवाः पुरू दधाना अमृतं सपन्त । होतारमग्निं मनुषो नि षेदुर्दशस्यन्त उशिजः शंसमायोः ॥
देवा, तेरी चमक से सारे देवता अच्छे लगने लगते हैं। वो अमृत के रूप लेते हैं, कई तरह से। लोगों ने अग्नि को अपने पास बिठा लिया है जो हवन करता है। जो लोग इच्छुक हैं वो अच्छी प्रार्थना के लिए उसकी सेवा करते हैं और आशीर्वाद पाते हैं।
Mantra 5
न त्वद्धोता पूर्वो अग्ने यजीयान्न काव्यैः परो अस्ति स्वधावः । विशश्च यस्या अतिथिर्भवासि स यज्ञेन वनवद्देव मर्तान् ॥
अग्नि, तुझसे पहले कोई और पुजारी नहीं है। तुझसे बड़ा यज्ञ करने वाला कोई नहीं। रिशियों में भी तू सबसे ऊपर है, क्योंकि तू खुद अपनी शक्ति वाला है। जिसके लिए तू मेहमान बन जाता है, उसके लोगों का भला होता है। वो यज्ञ से अपना काम बनवा लेता है।
Mantra 6
वयमग्ने वनुयाम त्वोता वसूयवो हविषा बुध्यमानाः । वयं समर्ये विदथेष्वह्नां वयं राया सहसस्पुत्र मर्तान् ॥
अग्नि, हम तेरे साथ मिलकर धन और शक्ति पाना चाहते हैं। हविष से जाग के हम अमीरी माँगते हैं। संघर्ष में, सबके बीच, हम धन और बल पाना चाहते हैं। तू शक्ति का बेटा है, हमें भी वो शक्ति दे।
Mantra 7
यो न आगो अभ्येनो भरात्यधीदघमघशंसे दधात । जही चिकित्वो अभिशस्तिमेतामग्ने यो नो मर्चयति द्वयेन ॥
जो हमारे ऊपर पाप और दोष डालता है, और बुरी बात करने वाले को बुरा लगाता है, ऐसे लोग को मार डाल, अग्नि। जो लोग छुप के या सामने से हमारे पे वार करते हैं, उनको कचरा कर दे।
Mantra 8
त्वामस्या व्युषि देव पूर्वे दूतं कृण्वाना अयजन्त हव्यैः । संस्थे यदग्न ईयसे रयीणां देवो मर्तैर्वसुभिरिध्यमानः ॥
जब यह दुनिया बनी थी, पुराने लोगों ने तुम्हे भगवान का दूता बनाया और पूजा की। जब तुम लोगों के दिए हुए सामान से जल के अमीरों के पास जाते हो, तब भगवान लोगों के बीच दिखाई देता है।
Mantra 9
अव स्पृधि पितरं योधि विद्वान्पुत्रो यस्ते सहसः सून ऊहे । कदा चिकित्वो अभि चक्षसे नोऽग्ने कदाँ ऋतचिद्यातयासे ॥
अग्नि, तुम अपने बाप के खिलाफ लड़ो, क्योंकि तुम समझदार हो। तुम ताकत के बेटा हो, छुप के काम करते हो। कब तुम हमारी तरफ देखोगे? कब तुम सच्चाई के साथ हमारा रास्ता सही करोगे?
Mantra 10
भूरि नाम वन्दमानो दधाति पिता वसो यदि तज्जोषयासे । कुविद्देवस्य सहसा चकानः सुम्नमग्निर्वनते वावृधानः ॥
जो लोग झुक के भगवान को नमस्ते करते हैं, वो बड़ा अच्छा पाते हैं, अगर तुम वो एक्सेप्ट करो। अग्नि खुश हो के ताकत से बढ़ता है और भगवान की कृपा पाता है।
Mantra 11
त्वमङ्ग जरितारं यविष्ठ विश्वान्यग्ने दुरिताति पर्षि । स्तेना अदृश्रन्रिपवो जनासोऽज्ञातकेता वृजिना अभूवन् ॥
अग्नि, तुम नए हो और जो लोग गाना गाते हैं उनको तुम मुश्किल से निकाल के ले जाते हो। चोरों का पता चल गया, दुश्मन लोग जो छुप के थे वो सीधे दिख गए और उनका असली चेहरा सामने आ गया।
Mantra 12
इमे यामासस्त्वद्रिगभूवन्वसवे वा तदिदागो अवाचि । नाहायमग्निरभिशस्तये नो न रीषते वावृधानः परा दात् ॥
यह रास्ते तुम्हारी तरफ जा रहे हैं, अच्छे के पास। लोग बोलते हैं यह हमारी गलती है। पर अग्नि हम पे बड़ा न करेगा। वो बढ़ रहा है, उसे कोई नुकसान नहीं। वो बुरी बात हमसे दूर भगा देगा।
Agni is invoked as the unified divine power—born as Varuṇa, becoming Mitra when kindled, and acting as Indra for the generous mortal.
The hymn turns from praise to petition: Agni is asked to guard the sacrificer from sin, guilt, and hostile imprecations, including attacks that come both openly and secretly.
A sharp protective command: Agni should strike down the abhiśasti and crush the one who harms ‘in the double way’ (visible and hidden).
The hymn ends with confidence that Agni, ever-growing, is not harmed by curses and will drive them away, redirecting the worshiper’s course toward the Vasu (the good/prosperous).
tvam agne varuṇo jāyase
yo no marcayati dvayena
इमे यामासस्त्वद्रिगभूवन्वसवे वा तदिदागो अवाचि । नाहायमग्निरभिशस्तये नो न रीषते वावृधानः परा दात् ॥It teaches that the ritual fire is one divine power showing different functions: Varuṇa as moral order, Mitra as harmony and friendship, and Indra as strength and victory for the worshiper.
It seeks relief from guilt and sin (āgas/enās) and asks Agni to repel curses, slander, and attacks that come both openly and secretly.
It is suited for recitation while kindling and offering into the fire, especially when seeking protection, purification of faults, and a return to right direction and prosperity.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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