
Sukta 5.2
Atri (traditional attribution for RV 5.2)
Agni
Triṣṭubh (probable)
This hymn praises Agni as the hidden yet ever-manifest Fire: concealed like a child in a secret place, but seen openly in human work and sacrifice. It invokes Agni as the wise Hotṛ who releases beings from bonds (as with Śunaḥśepa) and grants protection, peace, and a secure dwelling to the worshipper who prepares the sacred seat and offers oblations.
Mantra 1
कुमारं माता युवतिः समुब्धं गुहा बिभर्ति न ददाति पित्रे । अनीकमस्य न मिनज्जनासः पुरः पश्यन्ति निहितमरतौ ॥
एक जवान माँ अपने बेटे को छुपा के रखती है गुफा में। वो उसे पापा को नहीं देती। उसका चेहरा दिखता नहीं है, लोगों को नहीं दिखाता। लेकिन लोग उसे देख सकते हैं जब वो काम करता है। यह अग्नि अंदर छुपा है और बाहर भी दिखता है।
Mantra 2
कमेतं त्वं युवते कुमारं पेषी बिभर्षि महिषी जजान । पूर्वीर्हि गर्भः शरदो ववर्धापश्यं जातं यदसूत माता ॥
तुम इस बेटे को अपने पेट में ढाक के रखती हो। बड़ी माँ ने उसे पैदा किया है। कई साल तक यह बच्चा अंदर बढ़ता रहा। जब माँ ने उसे पैदा किया मैंने देखा। यह छुपा हुआ अग्नि आखिर में सामने आ गया।
Mantra 3
हिरण्यदन्तं शुचिवर्णमारात्क्षेत्रादपश्यमायुधा मिमानम् । ददानो अस्मा अमृतं विपृक्वत्किं मामनिन्द्राः कृणवन्ननुक्थाः ॥
मैंने उसे दूर से देखा खेत में। उसके दाँत सोना जैसे थे और वो बिल्कुल साफ था। वो अपने हथियार तैयार कर रहा था। वो अमृत देता है जो कभी खत्म नहीं होता। मेरे पास इंद्र नहीं है और स्तुति भी नहीं, फिर भी वो मुझे कुछ नहीं कर सकते।
Mantra 4
क्षेत्रादपश्यं सनुतश्चरन्तं सुमद्यूथं न पुरु शोभमानम् । न ता अगृभ्रन्नजनिष्ट हि षः पलिक्नीरिद्युवतयो भवन्ति ॥
मैंने उसको खेत से जाते हुए देखा। वो एक खुश हर्ड जैसा था, बहुत तरीके से चमक रहा था। लोगों ने उसको पकड़ नहीं पाया, क्योंकि वो उनके लिए पैदा ही नहीं हुआ था। बूढ़े लोग फिर से जवान हो जाते हैं जब वो आता है।
Mantra 5
के मे मर्यकं वि यवन्त गोभिर्न येषां गोपा अरणश्चिदास । य ईं जगृभुरव ते सृजन्त्वाजाति पश्व उप नश्चिकित्वान् ॥
क्या मेरी जवान ताकत को गो-भक्ति से अलग कर दिया? उनके पास कोई असली गो-पाल नहीं था। जिन्होंने मेरी ताकत पकड़ी है, वो उसे छोड़ दें। ज्ञान वाला हमें वापस ला दे, जिंदगी की ताकत और धन दोनों।
Mantra 6
वसां राजानं वसतिं जनानामरातयो नि दधुर्मर्त्येषु । ब्रह्माण्यत्रेरव तं सृजन्तु निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु ॥
यह घर का राजा है, लोगों का बसेरा। दुश्मन लोगों ने इसको बंद कर दिया है। अत्रि के शब्दों की ताकत इसको आज़ाद करे। जो बुरा बोलते हैं, वो खुद बुरा हो जाएँ।
Mantra 7
शुनश्चिच्छेपं निदितं सहस्राद्यूपादमुञ्चो अशमिष्ट हि षः । एवास्मदग्ने वि मुमुग्धि पाशान्होतश्चिकित्व इह तू निषद्य ॥
शुनःशेप को भी तूने बंधन से छुड़ाया था, जब वो यज्ञ के खूंटे से बाँधा हुआ था। उसने अपनी इच्छा पा ली थी। ऐसे ही अग्नि, हमारे बंधन खोल दो। तू ज्ञान वाला पुरोहित है, हमारे पास आ जा।
Mantra 8
हृणीयमानो अप हि मदैयेः प्र मे देवानां व्रतपा उवाच । इन्द्रो विद्वाँ अनु हि त्वा चचक्ष तेनाहमग्ने अनुशिष्ट आगाम् ॥
मैं शर्मिंदा होके अपनी गलती से दूर हो गया। देवियों के नियम के पहरेदार ने मुझे समझाया। इंद्र जो सब जानता है, उसने तुझे देखा है। उसी के बताए रास्ते पे मैं अग्नि, यहाँ आया हूँ।
Mantra 9
वि ज्योतिषा बृहता भात्यग्निराविर्विश्वानि कृणुते महित्वा । प्रादेवीर्मायाः सहते दुरेवाः शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे ॥
अग्नि एक बड़ी रोशनी से चमक रहा है। अपनी ताकत से वो सब चीज़ें साफ दिखाता है। वो धोखा और बुरी रास्तें हरा देता है। अपने सींगों को तेज़ करके वो राक्षस को मार देता है जो वहीं बैठा होता है।
Mantra 10
उत स्वानासो दिवि षन्त्वग्नेस्तिग्मायुधा रक्षसे हन्तवा उ । मदे चिदस्य प्र रुजन्ति भामा न वरन्ते परिबाधो अदेवीः ॥
अग्नि की आवाज़ें आसमान में गूँजती हैं। उसके हथियार तेज़ हैं जो राक्षस को मारते हैं। जब वो खुश होता है तब भी उसकी चमक फैलती है। बुरी ताकतें उससे नहीं रोक सकती।
Mantra 11
एतं ते स्तोमं तुविजात विप्रो रथं न धीरः स्वपा अतक्षम् । यदीदग्ने प्रति त्वं देव हर्याः स्वर्वतीरप एना जयेम ॥
यह स्तोत्र मैंने तुम्हारे लिए बनाया है, अग्नि। जैसे कोई इंटेलिजेंट आदमी रथ बनाता है, वैसे मैंने यह बनाया। अगर तुम्हे यह पसंद आए तो हम उस पानी को पा लेंगे जो सूरज को ले जाता है। वो रोशनी वाले धारें हैं।
Mantra 12
तुविग्रीवो वृषभो वावृधानोऽशत्र्वर्यः समजाति वेदः । इतीममग्निममृता अवोचन्बर्हिष्मते मनवे शर्म यंसद्धविष्मते मनवे शर्म यंसत् ॥
अग्नि एक ताकतवर बैल है जो बढ़ता जा रहा है। उसका कोई दुश्मन नहीं, वो सबसे मिल-जुल कर रहता है। देवताओं ने कहा है कि यह अग्नि उस आदमी को शांति देता है जो हवन करता है। जो भगवान के लिए समर्पण करता है उसको भी शांति मिलती है।
Agni is introduced through a paradox: like a ‘boy’ borne by a young mother, he is hidden in the secret place yet seen in front through human hands and work.
The hymn expands Agni’s roles—revealer, priestly knower, and effective helper—linking cosmic mystery (hidden fire) with ritual efficacy (fire in the aratí, the working hands).
Agni is invoked as the liberator who loosens bonds, exemplified by the release of Śunaḥśepa from the sacrificial post, and is asked to unbind the worshipper’s constraints.
It ends with a strong epithet-cluster (bull, mighty-necked, noble, non-hostile) and a repeated blessing: may Agni grant peace and shelter to the one who prepares the seat and offers oblations.
guhā bibharti ("bears him in the secret place")
vi mumugdhi pāśān ("loosen the bonds")
śarma yaṃsat ("may he grant shelter/peace")
It teaches that Agni is both hidden and visible: concealed in secret places like fire in wood, yet clearly present in ritual and human work. The hymn asks Agni to protect the worshipper and make the sacrifice effective.
Śunaḥśepa is remembered as one who was bound to a sacrificial post and was released. The hymn uses this as an example of Agni’s power to loosen bonds and remove constraining difficulties for the devotee.
It is suited to the start of a fire-rite: kindling Agni, inviting him as Hotṛ, and offering ghee or other havis. Its prayers are especially relevant when seeking protection, inner strength, and freedom from obstacles.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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