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सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’ से ‘भक्ति का समाज’ तक। बालकाण्ड में राम-नाम और राम-रूप का प्रथम स्थापन होता है; यहाँ विवाह-लीला ‘सगुण’ की साकार मधुरता के द्वारा जीव को ‘निरगुण’ सत्य की ओर उन्मुख करती है—लोक-रीति (वैदिक/लौकिक) के अनुशासन में प्रेम का शुद्धीकरण। यह चरण साधक को बताता है कि मुक्ति का द्वार ‘मंगल-आचार’ और ‘समधी-भाव’ (समता, आदर, विनय) से खुलता है।
यह प्रकरण ‘सोपान-प्रवेश’ का जीवंत रूपक है: (1) वैदिक+लौकिक रीति = साधना का अनुशासन; प्रेम को मर्यादा में ढालकर शुद्ध करना। (2) पाद-प्रक्षालन/मधुपर्क/होम/पाणिग्रहण/भावँरी = इन्द्रिय-आनन्द का शोधन, अहं का नम्रकरण, और संबंधों का देवत्व-आरोप। (3) जनक–दशरथ की समधी-समता = सामाजिक-भक्ति का आदर्श; सत्ता नहीं, विनय-समता से ‘मंगल’ प्रकट होता है। (4) देव-पुष्पवृष्टि और मुनि-आशीष = यह संकेत कि जब लोकाचार धर्माचार बनता है, तब प्रकृति/देवता भी अनुकूल हो जाते हैं। (5) सगुण-विवाह-रस का अंतिम संकेत निर्गुण-सिद्धान्त की ओर: जो ‘मनोज-अरि’ (काम-विजयी) हैं, वही ‘कलिमल-भंजन’—रूप-रस के भीतर सत्य का शान्त प्रकाश।
Verse 667 (चौपाई)
मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीतीं।। मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजे।। लही न कतहुँ हारि हियँ मानी। इन्ह सम एइ उपमा उर आनी।। सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु गावन लागे।। जगु बिरंचि उपजावा जब तें। देखे सुने ब्याह बहु तब तें।। सकल भाँति सम साजु समाजू। सम समधी देखे हम आजू।। देव गिरा सुनि सुंदर साँची। प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची।। देत पाँवड़े अरघु सुहाए। सादर जनकु मंडपहिं ल्याए।।
जनक और दशरथ मिलके बहुत खुश हुए। दोनों ने शादी के सारे रसम पूरी किए, वैदिक और दुनिया वाले दोनों। दोनों बड़े राजे मिलके चमक रहे थे। कवि भी उनकी उपमा ढूंढते ढूंढते हार गए। कोई उदाहरण ही नहीं मिल रहा था जो दिल को सही लगे। बस यही सोचा, इन दोनों जैसा कोई है ही नहीं। देवियों ने यह रिश्ता देखके बहुत प्यार भरा। फूल बरसाए और गाने शुरू कर दिए। जबसे ब्रह्मा ने दुनिया बनाई है, तबसे बहुत शादियां देखी और सुनी हैं। आज जैसा अरेंजमेंट और जैसा समाज है, ऐसे ही समधि हमने आज देखे हैं। देवियों की बात सुनके सची सोचने लगी, दोनों तरफ बहुत प्यार है। जनक ने इज्जत से सबको मंडप में बुलाया, बैठने की जगह दी और तोहफे भी दिए।
Verse 668 (छंद)
मंडपु बिलोकि बिचीत्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे।। निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे।। कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही। कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही।।
मंडप देखके रिशियों का दिल खुश हो गया। इतना सुंदर बनाया था वो। जनक ने अपने हाथ से सबके लिए सिंहासन रखवाया। वसिष्ठ को उन्होंने अपने कुल के देवता जैसा मान के पूजा किया। उन्होंने विनय से आशीर्वाद लिया। विश्वामित्र को भी बहुत प्यार से पूजा किया। कैसे बताएं कितना इज्जत दिया उनको।
Verse 669 (दोहा/सोरठा)
बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस। दिए दिब्य आसन सबहि सब सन लही असीस।।320।।
बामदेव और दूसरे रिशियों को राजा ने खुशी से पूजा किया। सबको आशीर्वाद दिया और अच्छी जगह पर बैठाया। सबने आशीर्वाद ले लिया।
Verse 670 (चौपाई)
बहुरि कीन्ह कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा।। कीन्ह जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई।। पूजे भूपति सकल बराती। समधि सम सादर सब भाँती।। आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मूख एक उछाहू।। सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर बानी।। बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ।। कपट बिप्र बर बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ।। पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचानें।।
फिर कोसले के राजा ने पूजा किया। उनको पता था भगवान जैसा प्यार कोई और नहीं कर सकता। हाथ जोड़के बहुत विनय किया और अपने भाग्य की बात बताई। राजा ने सारे बारातियों की इज्जत की, समधि जैसा प्यार सबसे किया। सबको अच्छी जगह दी बैठने के लिए। क्या बताएं, मेरा दिल भी खुशी से भर रहा है। जनक ने पूरे बारात की इज्जत की, तोहफे दिए और प्यार से बात की। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, और दूसरे देवियां, जो राम की शक्ति को जानते थे, वो सब पंडित बना के आए थे। यह सब देखने आए थे और सच में यह एक बहुत बड़ी बात थी। जनक ने उनको देवता समझ के पूजा किया, अच्छी जगह दी, बस पहचाना नहीं कि वो कौन हैं।
Verse 671 (छंद)
पहिचान को केहि जान सबहिं अपान सुधि भोरी भई। आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनँद मई।। सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए। अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए।।
कोई उन्हे पहचान नहीं पा रहा था। सब अपने ही खयाल में डूब गए थे, रात काफी बीत चुकी थी। दूल्हे को देख के सब खुश हो गए, दोनों तरफ से खुशी छा गई। देवी-देवताओं ने राम को देखा, वो समझदार थे। सबने दिल से उनकी पूजा की, मन ही मन आसन बिठाया। प्रभु के स्वभाव और अच्छे चरित्र को देख के रिशियों के दिल खुश हो गए।
Verse 672 (दोहा/सोरठा)
रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर। करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर।।321।।
रामचंद्र का चेहरा चाँद जैसा सुंदर था। उनकी आँखें चकोर पक्षी जैसी प्यारी थी। सबने आदर से पान खाया। सबका प्यार और खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।
Verse 673 (चौपाई)
समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए।। बेगि कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई।। रानी सुनि उपरोहित बानी। प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी।। बिप्र बधू कुलबृद्ध बोलाईं। करि कुल रीति सुमंगल गाईं।। नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा।। तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारीं। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं।। बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी।। सीय सँवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चलीं लवाई।।
वशिष्ठ जी ने वक्त देख के बुलाया। शतानंद ने सुन के आदर से आ गए। जल्दी जाओ और राजकुमारी को अभी लाओ, उन्होंने कहा। रिशि खुश होकर आदेश पाके चले गए। रानियों ने बात सुन के खुशी मनाई, उनकी सहेलियों ने भी साथ दिया। ब्राह्मण औरतों को बुलाया, घर के बड़े लोगों ने। कुल की रिवाज़ के हिसाब से शुभ गाने गाए। देवियाँ जिन्होंने औरतों का रूप लिया था, सब सुंदर थी और श्याम रंग की थी। उन्हे देख के औरतों को खुशी मिली। पहचाना भी नहीं, फिर भी जान से भी प्यारी लगने लगी। रानियों ने बार-बार सम्मान किया। उन्हे उमा, रामा और शारदा जैसा माना। सीता को सजाया, जुलूस बनाया। खुश होकर मंडप की तरफ ले गए।
Verse 674 (छंद)
चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं। नवसप्त साजें सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनीं।। कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं। मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गती बर बाजहीं।।
सहेलियों के साथ सीता को आदर से सजाके लाया। औरतें शुभ गहने पहने हुई थी। सात सौ सुंदर औरतें चली, उनकी चाल मद हाथी जैसी थी। उनका गाना सुन के रिशियों ने ध्यान छोड़ दिया। प्यार के कोयल भी शर्मा गई। पायल, घुंघरू और कंगनों की आवाज़ उनके चलने पे सुर में बज रही थी।
Verse 675 (दोहा/सोरठा)
सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय। छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय।।322।।
सीता औरतों के बीच ऐसी चमक रही थी जैसे खुद से ही सुंदर हो। उसकी खूबसूरती देख के लगता था जैसे कोई अपनी ही अलग दुनिया में है।
Verse 676 (चौपाई)
सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई।। आवत दीखि बरातिन्ह सीता।।रूप रासि सब भाँति पुनीता।। सबहि मनहिं मन किए प्रनामा। देखि राम भए पूरनकामा।। हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनँदु जेता।। सुर प्रनामु करि बरसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला।। गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी।। एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई।। तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू। दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारू।।
सीता की सुंदरता को मैं बता नहीं सकता। मेरा दिमाग छोटा है, इतनी खूबसूरती समझ में नहीं आती। बारात आती देख के सीता सामने आई। वो रूप का खज़ाना थी, हर तरह से साफ और शुद्ध। सब लोग दिल में मन से प्रणाम किए। राम को देख के सबकी इच्छाएँ पूरी हो गई। दशरथ अपने बेटों के साथ बहुत खुश हुआ। उसके दिल का आनंद बताया नहीं जा सकता। देवताओं ने फूल बरसाए और प्रणाम किया। रिशियों ने आशीर्वाद दिया, जो मंगल का मूल है। गाना, ढोल की आवाज़, बहुत शोर हुआ। आदमी और औरतें प्रेम और खुशी में डूब गए। ऐसे ही सीता मंडप में आई। रिशि खुशी और शांति से भजन पढ़ने लगे। उस वक्त विधि के हिसाब से दोनों तरफ के कुल गुरु ने सारे रस्में निभाई।
Verse 677 (छंद)
आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं। सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं।। मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहैं। भरे कनक कोपर कलस सो सब लिएहिं परिचारक रहैं।।1।। कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो। एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो।। सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेम काहु न लखि परै।। मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै।।2।।
रस्में करके गुरु, गौरी और गणेश की पूजा हुई। खुश ब्राह्मण लोगों ने यह सब करवाया। देवता सामने आए, पूजा ली और आशीर्वाद दिया। सबको बहुत खुशी मिली। जो भी चीज़ें चाहिए थी, मधुपर्क और मंगल सामग्री, रिशियों के दिल में जो था, वो सब लगा दिया। सोने के बर्तन और कलश भरे गए। नौकर लोग सब ले के तैयार खड़े थे। कुल रिवाज़ और प्यार से सूरज को बुलाया गया। सब कुछ इज़्ज़त से किया गया। ऐसे ही देवताओं की पूजा हुई। सीता को एक सुंदर सिंहासन दिया गया। सीता और राम एक दूसरे को देख रहे थे। उनका प्यार कोई नहीं देख सकता। यह मन, बुद्धि, बात और इंद्रियों से पारे है। कवि कैसे लिखेगा?
Verse 678 (दोहा/सोरठा)
होम समय तनु धरि अनलु अति सुख आहुति लेहिं। बिप्र बेष धरि बेद सब कहि बिबाह बिधि देहिं।।323।।
हवन के वक्त अग्नि भगवान ने शरीर लिया। वो आहुति ले रहे थे और बहुत खुश थे। ब्राह्मण का रूप धांक के वेद खुद शादी की सारी विधि बता रहे थे।
Verse 679 (चौपाई)
जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी।। सुजसु सुकृत सुख सुदंरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई।। समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाई। सुनत सुआसिनि सादर ल्याई।। जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनि जनु मयना।। कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुंगध मंगल जल पूरे।। निज कर मुदित रायँ अरु रानी। धरे राम के आगें आनी।। पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन झरि अवसरु जानी।। बरु बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत पखारन लागे।।
जनक और उनकी रानी पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। सीता की माँ की तारीफ कैसे करें? उसकी बड़ाई, पुण्य, खुशी और सुंदरता, ब्रह्मा ने सब कुछ मिला के बनाया था। सही वक्त जानके बड़े रिशियों को बुलाया गया। सुहागन औरतों ने इज़्ज़त से सारी मंगल चीज़ें लाई। जनक के बाएं तरफ सीता चमक रही थी। जैसे हिमालय के पास चाँद हो। सोने के कलश, नगीना जड़े बर्तन, सब सुंदर और साफ थे। सुगंधित और मंगल पानी से भरे थे। राजा और रानी ने अपने हाथों से लिया और राम के सामने रख दिया। रिशि लोग वेद पढ़ रहे थे, मंगल बातें बोल रहे थे। वक्त आने पर आसमान से फूल बरसे। दोनों का प्यार देख के उनके पवित्र पैर धोने लगे।
Verse 680 (छंद)
लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली। नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली।। जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं। जे सकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं।।1।। जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई। मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई।। करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहैं। ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहै।।2।। बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं। भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आँनद भरैं।। सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो। करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो।।3।। हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई। तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई।। क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरी। करि होम बिधिवत गाँठि जोरी होन लागी भावँरी।।4।।
पैर धोने लगे, प्रेम से शरीर काँप गया। आसमान में गाना और ढोल की आवाज़, जैसे चारों तरफ खुशी फैल गई। वो चरण कमल हमेशा कामदेव के दुश्मन के दिल में रहते हैं। एक बार याद करने से मन साफ हो जाता है और कलि युग के सब पाप मिट जाते हैं। जिनका स्पर्श करके रिशि की पत्नी मुक्ति पा गई, जबकि वो पापी थी। जिनका अमृत शिव अपने सिर पे धांके हैं, देवता हमेशा उनकी तारीफ करते हैं। जिन्हें रिशि और योगी मन में पूजा करके अपनी मंज़िल पाते हैं। जनक ने भाग्य वाले उनके पैर धोए, सब ने जय जय कहा। दोनों कुल गुरु ने राजकुमार और कुंवारी के हाथ जोड़े। हाथ मिलते ही ब्रह्मा, देवता, इंसान और रिशि खुशी से भर गए। दूल्हे को देखके जो खुशी का मूल है, दोनों का शरीर काँपा और दिल खुशी से झूमा। वेद और दुनिया के नियम के हिसाब से राजा ने कन्यादान किया। जैसे हिमालय ने गिरिजा को शिव को दिया, हरि ने लक्ष्मी को समुंदर को दिया, वैसे ही जनक ने सीता को राम को दिया। दुनिया में नई बड़ाई फैल गई। जनक ने कैसे बिना किया, शरीर छोड़ के जैसे कोई ममता नहीं। हवन करके विधि के हिसाब से गाँठ बाँधी और शादी शुरू हो गई।
Verse 681 (दोहा/सोरठा)
जय धुनि बंदी बेद धुनि मंगल गान निसान। सुनि हरषहिं बरषहिं बिबुध सुरतरु सुमन सुजान।।324।।
जय की आवाज़ें गूंजी, वैदिक मंतर पढ़े गए, मंगल गाने गाए गए और ढोल बजाए गए। देवताओं ने यह सब सुन के खुशी मनाई और स्वर्ग से फूल बरसाए।
Verse 682 (चौपाई)
कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं।।नयन लाभु सब सादर लेहीं।। जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी।। राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं । मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बिआहु अनूपा।। दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी।। भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे।। प्रमुदित मुनिन्ह भावँरी फेरी। नेगसहित सब रीति निबेरीं।। राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं।। अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें।। बहुरि बसिष्ठ दीन्ह अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन।।
राजकुमार और राजकुमारी दोनों शर्मा रहे थे और खुशी भी महसूस कर रहे थे। दोनों एक दूसरे को देख रहे थे और इज़्ज़त से नज़ारा ले रहे थे। यह जो जुड़ाई है, उसका कोई बयान नहीं हो सकता। कोई भी मिसाल दो, वो कमी पड़ेगी। राम और सीता कितने सुंदर लग रहे थे, जैसे पिलर के बीच में हीरे चमक रहे हों। मनो काम देव और रति ने कई रूप लिए हो और राम की शादी देख रहे हों। उनकी नज़र में प्यार था, शर्म भी थी। बार-बार एक दूसरे को देखते थे और फिर नज़रें हटा लेते थे। सब लोग देख के खो गए थे। जनक जैसा सबका ख्याल रखने वाला भी अपना आप भूल गया। खुशी से भरे रिशियों ने शादी की सारी रस्में पूरी की और दान भी दिया। राम और सीता ने मांग में सिंदूर भरा। उनकी चमक इतनी थी कि कोई बता नहीं सकता। चाँद पे लाल पोलन जैसा, साँप अमृत के लिए तड़प रहा था। फिर वशिष्ठ ने कहा और दूल्हा-दुल्हन एक सीट पर बैठ गए।
Verse 683 (छंद)
बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए। तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु फल नए।। भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा। केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा।।1।। तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै। माँडवी श्रुतिकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि के।। कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई। सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई।।2।। जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै। सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै।। जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी। सो दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी।।3।। अनुरुप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहीं। सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं।। सुंदरी सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं। जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिमुन सहित बिराजहीं।।4।।
राम और जानकी बैठे। दशरथ का मन खुशी से भरा था। बार-बार उन्हें देख के उसके शरीर में खुशी दौड़ती थी, जैसे उसके अच्छे करम का फल मिल गया हो। पूरी दुनिया में खुशी फैल गई। सब बस राम की शादी की बात कर रहे थे। ज़बान से कैसे बताएं, यह कितना बड़ा मंगल का दिन था। फिर जनक ने वशिष्ठ की परमिशन ली और शादी की तैयारी शुरू की। मांडवी, श्रुतकीर्ति और ऊर्मिला को राजकुमारों के साथ शादी करवाई। कुशध्वज की बेटी जो गुण और सुंदरता में सबसे आगे थी, उसने भरत को शादी कर दी। जानकी की छोटी बहन जो सब सुंदरियों में सबसे ऊपर थी, उसने लक्ष्मण को शादी कर दी। श्रुतकीर्ति जिसका नाम था, बड़ी सुंदर थी, उसने शत्रुघ्न को शादी कर दी। दूल्हा और दुल्हन एक दूसरे के सही मैच लग रहे थे। दोनों में शर्म भी थी और खुशी भी। सब लोग उनकी सुंदरता की तारीफ कर रहे थे और देवता फूल बरसा रहे थे। चार दूल्हा और चार दुल्हन एक ही मंडप में चमक रहे थे, मनो चारों पुरुषार्थ साथ में हों।
Verse 684 (दोहा/सोरठा)
मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि। जनु पार महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि।।325।।
अयोध्या के राजा दशरथ बड़े खुश थे। अपने चारों बेटों और उनकी दुल्हनों को साथ देख के। मनो किसी राजा ने चार ऐसे पेड़ देख लिए जो मनजूरी के फल देते हैं।
Verse 685 (चौपाई)
जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी।। कहि न जाइ कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु पूरी।। कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे।। गज रथ तुरग दास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी।। बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा।। लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने।। दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा।। तब कर जोरि जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी।।
जैसे राम की शादी हुई, वैसे ही बाकी राजकुमारों की भी शादी हुई। दहेज में इतना सामान दिया कि बताना मुश्किल है। सोना और हीरों का मंडप भरा पड़ा था। कंबल, कपड़े, अच्छे अच्छे रेशम के कपड़े, कितने किसम के, कितने महंगे। हाथी, रथ, घोड़े, नौकर, नौकरानी, गाय, सब कुछ दिया। इतना सामान कि कोई हिसाब नहीं रख सकता। सिर्फ वो लोग जानते हैं जिन्होंने देखा। देवता भी देख के हैरान रह गए। अयोध्या के राजा ने सब खुशी से लिया। जो मांगा, वो दिया। शादी में आए सब लोग वापस अपने घर चले गए। फिर जनक ने हाथ जोड़ा और सब बारातियों को इज़्ज़त से बोला।
Verse 686 (छंद)
सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ कै। प्रमुदित महा मुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै।। सिरु नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किएँ। सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिएँ।।1।। कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों। बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों।। संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए। एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए।।2।। ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई। अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीट्यो कई।। पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए। कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए।।3।। बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले। दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले।। तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै। दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै।।4।।
रिशियों ने पूरे बारात का बहुत इज्जत किया। इन्होंने सबको तोहफा दिया, विनम्र से बात की, और उनकी बहुत तारीफ की। रिशि लोग खुश हो गए और भक्ति से पूजा की। देवताओं ने सर झुकाया और हाथ जोड़ के सबसे कहा कि देवता और साधु लोग प्यार के समुंदर से खुश हैं, इसलिए पानी की अंजलि दे रहे हैं। जनक ने हाथ जोड़ के कोसल के राजा से प्यार और अच्छे स्वभाव से कहा। राजा, अब हम आपके रिश्तेदार बन गए हैं। हम सब को आप अपना नौकर समझो। यह बेटियाँ आपकी सेवा करेंगी, इनपर दया रखियेगा। कोई गलती हो तो माफ कीजिये, मैंने बहुत बोल दिया। फिर सूर्यवंश के राजा ने सबकी बहुत इज्जत की और कुबेर से रिश्ता जोड़ा। दोनों के दिल में प्यार भरा था, कोई बोलने की ज़रूरत नहीं थी। देवताओं ने फूल बरसाए जब राजा लोग अपने घर चले गए। आसमान में जय की आवाज़ और वैदिक मंत्र गूंजे। शहर वालों ने हैरानी और खुशी महसूस की। रिशियों के गुरु ने कहा, और औरतों ने मंगल गीत गाए। दूल्हा और दुल्हन दोनों सुहागन बन के शादी के मंडप में चले गए।
Verse 687 (दोहा/सोरठा)
पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न। हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन।।326।।
सीता बार-बार राम को देख रही थी। उसका दिल शर्मा रहा था, पर फिर भी वो शर्मा नहीं रही थी। उसके प्यासे नैन राम के रूप की खूबसूरती को पी रहे थे जैसे मछली पानी को पीती है।
Verse 688 (चौपाई)
स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन।। जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए।। पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति बाल रबि दामिनि जोती।। कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।। पीत जनेउ महाछबि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई।। सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषन राजे।। पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती।। नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज निधाना।। सुंदर भृकुटि मनोहर नासा। भाल तिलकु रुचिरता निवासा।। सोहत मौरु मनोहर माथे। मंगलमय मुकुता मनि गाथे।।
राम का श्याम रंग का बदन अपने आप में खूबसूरत था। उनकी चमक इतनी थी कि लाखों काम देव भी शर्मा जाएं। उनके पाँव में पायजेब थी, और रिशि लोगों के मन उनके चरणों के पास रहते थे जैसे भौंरे फूल के पास रहते हैं। उनकी पीली धोती चमक रही थी, जैसे सूरज और बिजली चमकती है। उनकी कमर में घुंघरू वाली डोरी थी, और उनके बाजू में सुंदर गहने थे। उनका पीला जनेऊ बहुत अच्छा लग रहा था, और उंगली में अंगूठी ने दिल चुरा लिया। शादी के सारे गहने उनपर सूट हो रहे थे। छाती में हार था, और ऊपर वाला कपड़ा पीला था। दोनों कपड़ों के कोने में मोती और मणि जड़ी थी। आँखें कमल जैसी थी और कान में कुंडल था। चेहरा खूबसूरती का खज़ाना था। भौंरी और नाक सुंदर थी, और माथे पर तिलक चमक रहा था। माथे पे मुकुट था जिसमें मोती और मणि जड़ी थी।
Verse 689 (छंद)
गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब चित चोरहीं। पुर नारि सुर सुंदरीं बरहि बिलोकि सब तिन तोरहीं।। मनि बसन भूषन वारि आरति करहिं मंगल गावहिं। सुर सुमन बरिसहिं सूत मागध बंदि सुजसु सुनावहीं।।1।। कोहबरहिं आने कुँअर कुँअरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै। अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै।। लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं। रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं।।2।। निज पानि मनि महुँ देखिअति मूरति सुरूपनिधान की। चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी।। कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेमु न जाइ कहि जानहिं अलीं। बर कुअँरि सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं।।3।। तेहि समय सुनिअ असीस जहँ तहँ नगर नभ आनँदु महा। चिरु जिअहुँ जोरीं चारु चारयो मुदित मन सबहीं कहा।। जोगीन्द्र सिद्ध मुनीस देव बिलोकि प्रभु दुंदुभि हनी। चले हरषि बरषि प्रसून निज निज लोक जय जय जय भनी।।4।।
मुकुट में बड़े-बड़े रतन जड़े थे, और राम के अंग इतने सुंदर थे कि सबका दिल खो गया। शहर की औरतें और देवियाँ उन्हें देख कर उनकी तारीफ करने लगी। वो आरती उतार रही थी, मंगल गीत गा रही थी। देवता फूल बरसा रहे थे, और कवि लोग उनकी महिमा गा रहे थे। दूल्हा और दुल्हन को शादी के मंडप में लाया गया। सुहागन औरतों ने प्यार से रस्में निभाई। गोरी औरतें राम और सीता को सिखा रही थी। रानियों के महल में हंसी-मज़ाक और प्यार था, जैसे जनम का फल मिल गया हो। हाथ में शीशा लेकर अपना चेहरा देख रही थी। सीता अलग होने के डर से अपना हाथ नहीं उठा पा रही थी। यह खुशी और प्यार को अलग-अलग शब्दों में नहीं कहा जा सकता, सिर्फ औरतें जानती हैं। दुल्हन और उसकी सहेलियाँ मंडप में चली गई। उस वक़्त शहर में आशीर्वाद की आवाज़ गूंजी। सबने कहा कि तुम लंबी उम्र जियो और चारों ने एक दूसरे को गले लगाया। योगी, सिद्ध, रिशि और देवता सब खुश हो गए। उन्होंने जय-जय करके अपने लोक में चले गए।
Verse 690 (दोहा/सोरठा)
सहित बधूटिन्ह कुअँर सब तब आए पितु पास। सोभा मंगल मोद भरि उमगेउ जनु जनवास।।327।।
फिर दूल्हा और दुल्हन दोनों अपने पिता के पास आए। शहर में खुशी और मंगल इतना था जैसे कोई जनम का घर हो।
Verse 691 (चौपाई)
पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती।। परत पाँवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा।। सादर सबके पाय पखारे। जथाजोगु पीढ़न्ह बैठारे।। धोए जनक अवधपति चरना। सीलु सनेहु जाइ नहिं बरना।। बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए।। तीनिउ भाई राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी।। आसन उचित सबहि नृप दीन्हे। बोलि सूपकारी सब लीन्हे।। सादर लगे परन पनवारे। कनक कील मनि पान सँवारे।।
फिर शादी का खाना बहुत तरीके से हुआ। जनक ने बरातियों को बुलवाया। सबके पाँव धोए और उनको अच्छे कपड़े दिए। राजा ने अपनी बेटियों के लिए विदाई की रस्में पूरी की। सबके पाँव साफ किए और उनको उनकी पोजीशन के हिसाब से बिठाया। जनक ने अयोध्या के राजा के पाँव धोए। उनकी अच्छाई और प्यार को शब्दों में नहीं बताया जा सकता। फिर उन्होंने राम के पाँव धोए जो दिल के सारे मैल धो देते हैं। उन्होंने तीनों भाइयों को राम के बराबर माना और अपने हाथों से उनके पाँव धोए। राजा ने सबको सही जगह बिठाया और उनको दामाद मान लिया। सब मेहमानों की बहुत इज्जत की और उनको सोना और मोती पहनाए।
Verse 692 (दोहा/सोरठा)
सूपोदन सुरभी सरपि सुंदर स्वादु पुनीत। छन महुँ सब कें परुसि गे चतुर सुआर बिनीत।।328।।
खाना महक रहा था, अच्छा लग रहा था, स्वादिष्ट था और साफ था। चतुर लोग जल्दी से सबको सब कुछ सर्व कर गए।
Verse 693 (चौपाई)
पंच कवल करि जेवन लअगे। गारि गान सुनि अति अनुरागे।। भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने।। परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना।। चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई।। छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भाँती।। जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी।। समय सुहावनि गारि बिराजा। हँसत राउ सुनि सहित समाजा।। एहि बिधि सबहीं भौजनु कीन्हा। आदर सहित आचमनु दीन्हा।।
पाँच निवाले लेकर खाना शुरू किया। गाने सुन के दिल खुश हो गया। कई तरह के पकवान मिले जो अमृत जैसे थे, बताना मुश्किल है। समझदार लोग सर्व करने लगे। कई तरह की डिशेज थी, कौन जाने उनके नाम? चार तरह का खाना बना था, एक एक को डिस्क्राइब करना मुश्किल है। डिशेज अच्छी थी और स्वादिष्ट थी, हर एक में अनेक स्वाद थे। खाते वक्त लोग मधुर गाने गा रहे थे। मर्द और औरत दोनों गाने में शामिल थे। टाइम अच्छा था, गाना भी अच्छा था। राजा सबके साथ हँस के सुन रहा था। ऐसे ही सबने खाना खाया और मुँह धोने के लिए पानी दिया गया।
Verse 694 (दोहा/सोरठा)
देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज। जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज।।329।।
जनक ने दशरथ और सब लोगों को पान देकर इज्जत की। सारे राजा खुश होकर अपने कमरे में चले गए।
परंपरागत मान्यता में विवाह-प्रसंग का पाठ ‘गृहस्थ-धर्म की शुद्धि’, दांपत्य-सौहार्द, कुल-समन्वय, और मंगल-कर्मों की सिद्धि देता है। विशेषतः ‘पद-पखारन/पाणिग्रहण/होम’ के वर्णन का श्रवण मन को ‘लोक-रस’ से उठाकर ‘हरि-रस’ में स्थिर करता है—विघ्न-शमन, सद्बुद्धि, और प्रेम-भक्ति की वृद्धि।
सामान्यतः विवाह/मंगल-प्रसंग में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-संकीर्तन) या ‘सियाराममय सब जग जानी’ भाव-स्मरण समपुट रूप में जोड़ा जाता है। कुछ परंपराओं में गौरी-गणपति पूजन-संदर्भ हेतु ‘गौरी गणपति’ मंगलाचरण/‘विघ्न हरन मंगल करन’ की आवृत्ति भी की जाती है।
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